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भारतीयता और बहुलता

-ब्रजरतन जोशी
भारतीयता और बहुलता कहने को दो अलग-अलग पद हैं, पर परस्पर इनका समबन्ध नाभिनालबद्ध है। वस्तुतः निरन्तरता के पथ पर पथारूढ अविचलित और अटल भारतीयता का प्राण तत्त्व बहुलता है। भारतीयता के अनुभव से गुज़रना यानी प्रवाह वैविध्य, संवेदनशीलता, संवाद निरन्तरता की त्रयी से गुजरना है। इसे यों भी कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी कि बहुलता भारतीयता का ही स्पन्दन है। इसी बहुलता के कारण ही ऊपरी तौर से दिखने वाली विविधता की काया में सौन्दर्य, संतुलन और आनंद का वह निर्झर बह रहा है जिसमें सद्यस्नात होकर हर सभ्यता-संस्कृति के लोग प्रफुल्लित हो उठते हैं। अपने उन्मीलित नेत्रों में वे जिस नैसर्गिक आनंद के लोक की परिकल्पना को देखते हैं, हमारी संस्कृति उसका जीवन्त उदाहरण एवं प्रमाण है। हमारी बहुभाषिकता, बहुसांस्कृतिक परिवेश और बहुवचनीयता ही हमारी असली ताकत है, जिसके कारण निरन्तर विघटन के पथ पर अग्रगामी इस समाज की सांस्कृतिक संरचना के मूल को बचाते हुए देश, काल और वातावरण के अनुसार हम वांछित परिवर्तनों को आत्मसात करते रहे हैं। इसी कारण इस भू-भाग के विविध अंचलों का गुंजित गान एक महाराग में बदल जाता है, और वह महाराग बहुलता ही है। यह हमारी ही संस्कृति की सृजनात्मक शक्ति का पराक्रम है कि हम सभी प्रकार के द्वंद्वों, मोह, विरक्तियों से ऊपर उठकर आज भी अस्तित्व के विविध आयामों का निरन्तर अन्वेषण कर रहे हैं। अस्तित्व के निरन्तर अन्वेषण की इस सतत् प्रक्रिया के कारण ही हमने अखिल विश्व पटल पर ज्ञान की एकता का अभूतपूर्व उदाहरण संसार के सम्मुख रखा है। हमारी संस्कृति ने अध्यात्म, कला और विज्ञान को परस्पर विरोधी और भिन्न नहीं माना वरन् इनकी मौलिक एकता पर काम करने की असरदार कोशिशें निरन्तर जारी रखीं हैं। हमारी संस्कृति का शिल्प सौन्दर्य और वैशिष्ट्य इसी आन्तरिक सूत्र से अपना तेज पाता है।
भारतीय संस्कृति अपनी बहुरंगी बहुलता के स्वभाव के कारण ही अनेक राग-रागिनियों की अन्तर्ध्वनियों का अद्वितीय कोश है। ये अन्तर्ध्वनियाँ अपनी संरचना में सर्व-स्वागत और उत्साह के भावबोध से भरी ही नहीं है वरन् विवेक, तर्क और चैतन्य की त्रैयी से निबद्ध भी हैं। स्थानीय स्वायत्तता और अलिप्तता के साथ विराटता और विकेन्द्रीकरण इसका आभूषण बनकर उभरे हैं। इसलिए विश्व के अधिकांश विचारक इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि भारत बहुवचनीयता में ही जन्मा, पला, बढा और आज भी उसी में साँस लेता एक जीवन्त संस्कृति पिण्ड है। हमारी देशज परम्परा से प्राप्त अंतःप्रज्ञा, स्वानुभूति और आत्मश्रम से अर्जित अन्तर्दृष्टि ने ही सदैव हमारी पथ बाधाओं और विचलनों को दूर किया है। आरम्भ से ही हमारी संस्कृति में व्याप्त अलग-अलग मान्यताएँ, विचार, पूजा-पद्धतियाँ, दृष्टिकोण, चयन एवं वरण की स्वतंत्रता इसी का परिणाम है। इसीलिए इतिहास में ढूँढने पर से भी यह प्राप्त करना मुश्किल है कि इतिहास के किसी भी कालखण्ड में इस बहुधर्मी देश की सांस्कृतिक संरचना ने किसी एक धर्म, विचार या सम्प्रदाय को अतिरिक्त महत्त्व दिया है। इसीलिए वाद-विवाद-संवाद की त्रयी वैदिक साहित्य से लेकर अब तक के रचे जा रहे समस्त साहित्य में आसानी से दृष्टिगत की जा सकती है।
वैचारिक विविधता से बनी-सजी हमारी सर्वस्वीकृत परम्पराएँ हमें न केवल एक-दूसरे से जोडती ही है, साथ ही हमारी विचार स्वतंत्रता, संवादधर्मिता और तर्कशील चेतना को संस्कारित भी करती है।
आज के हमारे लोकतांत्रिक ढाँचे और धर्मनिरपेक्षिता की जडे इसलिए मजबूत हैं कि उनका मूल वैचारिकता बहुलता के केन्द्र से जुडा है। हमारी धर्मनिरपेक्षता पर आए दिन बहस-विवाद उठते रहते हैं, पर लोग यह भूल जाते हैं कि भारत की धर्मनिरपेक्षता पश्चिम की धर्मनिरपेक्षता से नितान्त भिन्न है। हमारी धर्मनिरपेक्षता की जडे भी देशज परम्परा से रस ग्रहण कर रही है, वह उदारता और विशालता के विलयन से बनी है। यह हमारी ही संस्कृति की खूबसूरती है कि जिसके एक छोर पर संशय, अनीश्वरता और नास्तिकता की वेगवान धाराएँ निरन्तर बह रही है, वहीं दूसरी और विश्वास, ईश्वर और आस्तिकता का सैलाब भी उमग-उमग कर हिलोरे ले रहा है।
भारत ने अपनी गोद में पल रही विविधवर्णी संस्कृतियों के प्रति समर्पण का भाव समस्त विश्व के सम्मुख आदर्श रूप में रखा है। विकल्पों से भरे जीवन में मान्यताएँ और विचार प्रणालियाँ अपने स्वरूप में चयन हेतु उपलब्ध हैं। यह हमारे दर्शन का ही अवदान कहा जाना चाहिए कि हमने प्रत्येक संस्कृति की मनोहरता का संरक्षण किया। हमने हर संस्कृति के सांस्कृतिक ढाँचे को पवित्रभाव से मान्यता दी। यानी भारतीय चित्त आरम्भ से ही अपने तमाम अन्तरविरोधों से दो-दो हाथ करते इस तथ्य को नहीं भूला कि मनुष्यता ही सर्वोपरि गुण है और हमें हर हाल में उसकी रक्षा करनी है। हम अगर गौर करेंगे, तो पाएँगे कि पश्चिमी घृणा और हमारी संस्कृति में व्याप्त अराजकता में पर्याप्त भेद है। हमारी संस्कृति में व्याप्त अराजकता के असंतुलन को साधने में हमारी विविध दर्शन प्रणालियों की भूमिका अहम रही है। क्योंकि सहकार की भावना के चलते हमने विभिन्न संस्कृतियों के सहयोग से राष्ट्र का नहीं देश का निर्माण किया। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय अस्मिता एक नहीं है, दोनों में पर्याप्त भेद है। हमारा सांस्कृतिक वैविध्य हमारी थाती है। देश के मुकाबले राष्ट्र (जो कि मूल में एक यूरोपीय संकल्पना है) एक कृत्रिम विचार है। भारत की अपनी देशी राष्ट्रीयता है, जो कि विभिन्न दर्शनों, मूल्यप्रणालियों, विश्वासों, परम्पराओं की बुनियाद पर स्थित है। जिसकी जडों को भक्तिकाल के साहित्य ने सींचा था। हमारे कवि कुलगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर तो राष्ट्र को न्याय से च्युत संस्था के रूप में देखते हैं। उन्होंने राष्ट्रवाद की तीखी आलोचना करते हुए एक पूरी पुस्तक लिखी। हमारी अपनी परम्परा हमें मानवीयता और सहिष्णुता का बीज विचार देती है जिसके तले संस्कृति का उपवन अपनी हरिताभा और सुगन्ध बिखेरता है। भारतीय विचार संकल्पना में बहिष्कार जैसा भाव ही विद्यमान नहीं है जिसकी ओर शिकागो के विश्वप्रसिद्ध भाषण में स्वामी विवेकानन्द ने दुनिया का ध्यान खींचा था। हमारे यहाँ तो साझा, सहकार, शान्ति और समता के साथ न्याय की गूँज है जो निरन्तर हमारी संस्कृति के स्पन्दन से निसृत होती रहती है।
आज के हमारे विचार विश्व में राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जैसे पद सत्रहवीं सदी में वेस्टफेलियाई संधि के बाद से चलन में आए हैं। कालान्तर में हम देखते हैं कि अपनी कृत्रिमता के चलते इसमें हिंसा का भाव उत्तरोतर विकसित होता गया।
आज जरूरत है हमें उस नवराष्ट्रीयता के विचार की कि जिसकी जडें स्वदेशी और बहुलता के केन्द्र से जुडी हों। क्योंकि आज हम जिस जीवन शैली और पथ पर आगे बढ रहे हैं, उसमें सबकुछ बिकाऊ है, टिकाऊ नहीं। समाज में जो नए-नए केन्द्र विकसित हो रहे हैं उनके मूल में हमें गाँधी दृष्टि की व्याप्ति को देखना, जाँचना और परखा होगा कि क्या वे समाज के अंतिम व्यक्ति के हक और न्याय की गुँजाईश लिए हैं या नहीं। अगर वह हमारे समाज के उपेक्षित, वंचित और अस्मिता के साथ अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे वर्गों और विचारों के लिए फलदायी नहीं है, तो हमें उन्हें केन्द्र से अपदस्थ करना होगा।
तेजी से बदलते जा रहे समाज और संस्कृति के सामने आज कईं विकट चुनौतियाँ हैं। हमें कट्टरता, नव-औपनिवेशिक मानसिकता के संकुचित दायरे से बाहर आकर अपनी संस्कृति के मूल सत्त्व और श्रेष्ठ को आत्मसात करने की कवायदें तेज करनी होगी। अन्तरदेशीय संवाद के माध्यम से हमें अतीत के घाव भरने होंगे। हमें अपनी भावी पीढी का ध्यान इस ओर आकर्षित करना होगा कि संस्कृति का विकास मनुष्य-मनुष्य के बीच संघर्ष से नहीं, सहकार से हुआ है। क्योंकि बहुत पहले से ही हमने यह जान लिया था कि दूसरे के बिना हमारे होने का कोई अर्थ ही नहीं है। हमें अपनी अन्वेषी प्रवृत्ति को गति देकर समय-समय पर अपनी परम्पराओं और विश्वासों की पडताल करते हुए आगे बढना है।
औद्योगिकीकरण की बर्बर प्रवृत्ति ने हमारे स्थानीय भूगोल के मूल स्वरूप को क्षत-विक्षत किया है। स्वदेशी के भावबोध से भरकर बर्बरीकरण की इस अविराम प्रक्रिया को रोकना होगा और आधुनिकता की कोख में पली वैचारिक संतान राष्ट्रवाद को अपनी संस्कृति के नवकेन्द्रों से अपदस्थ करना होगा। वसुधैव कुटुम्बकम् हमारी नवराष्ट्रीयता का उद्घोष होगा। सादगी, शांति और प्रतिशोध रहित आग्रहशीलता से संयुक्त होकर संस्कृति के स्थापत्य में धर्म, भाषा, जाति, वर्ग आदि के खतरों को पहचानते हुए हमें अपने देश की आत्मप्रतिमा को संरक्षित करना होगा। बहुलता और समानता के साथ अहिंसा, प्रेम और स्वीकृति की संस्कृति का विस्तार लक्ष्य रखते हुए भविष्य के पथ पर आगे बढना होगा।
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विगत अक्टूबर 2020 में मधुमती ने साठ साल के इतिहास में पहली बार राष्ट्रपिता पर अपना अंक गाँधी आज एकाग्र किया था। हमें आपसे यह जानकारी साझा करते हुए प्रसन्नता है कि मधुमती के इस अंक को देश के समस्त वर्गों और विचारधाराओं का सम्यक सहयोग मिला। इसी क्रम में हमने इस वर्ष के इस अंक को भारतीयता और बहुलता : विरासत से वर्तमान विषय पर केन्द्रित रखा है। इस अंक में आपको विभिन्न विचारकों की भिन्न-भिन्न संकल्पनाओं, व्याख्याओं व नवीन अनुसंधान के साथ इनकी व्याप्ति और प्रभाव को जानने का अवसर मिलेगा।
अंक के माध्यम से हमें क्रमशः आनन्दकुमार स्वामी, जवाहरलाल नेहरु, अम्बेडकर, वासुदेवशरण अग्रवाल, डी.डी.कोसांबी, भगवतशरण उपाध्याय और राममनोहर लोहिया के विचारों का मर्म भी जानने-समझने को मिलेगा।
हमें बेहद अफसोस है कि बीते दिनों हमने अपने साहित्य परिवार के अत्यन्त सक्रिय, सजग और निष्ठावान सदस्य ईशमधु तलवार को खो दिया है। मधुमती परिवार उन्हें हृदय से याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करता है। इस अंक में कुल पन्द्रह लेख, एक कहानी, तीन कवियों की कविताएँ और तीन महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की सुचिन्तित समीक्षाएँ भी हैं।
हमारा पूरा प्रयास रहता है कि हमारा हर अंक आफ विश्वास की कसौटी पर खरा उतरे। हमने अपनी सर्वसमावेशी परम्परा और उदारता से अपनी ग्रहणशीलता को विकसित करने की हरसंभव कोशिश की है। भविष्य में भी यह कोशिश निरन्तर जारी रहेगी।
आनेवाला समय दीपपर्व का है। दीपपर्व आप सब के लिए शुभ और मंगलमय हो। कोविड महामारी से बचाव के लिए अपने-अपने प्रयास जारी रखें। अंक पर आपकी विश्लेषणात्मक राय का इंतिजार रहेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ-
- ब्रजरतन जोशी