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रामविलास शर्मा का इतिहास-दर्शन और देशाभिमान

प्रकाश मनु
रामविलास शर्मा हिंदी के उन बडे आलोचकों में से हैं, जिनके भीतर देशप्रेम की भावना इस कदर ठाठें मार रही है कि बिना इसके वे भारत की आम जनता से जुडे किसी प्रश्न पर विचार ही नहीं कर सकते। वे माक्र्सवादी थे, पर अपने जीवन के अंतिम चरण में वे बडी शिद्दत से इस बात पर जोर देते थे कि माक्र्सवाद को आज भारत की धरती, यहाँ की संस्कृति और लोगों की बुनियादी जरूरतों के संदर्भ में व्याख्यायित करने की जरूरत है। तभी वह भारत में सफल हो पाएगा।
इसी तरह हिंदी का प्रश्न उनके लिए भारतीय अस्मिता का प्रश्न था। उनका कहना था कि हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीयता का प्रतीक है। यही कारण है कि हिंदी को लेकर वे बडे बेबाक ढंग से बोलते थे और मानते थे कि हिंदी को अपनाए बिना इस देश का विकास नहीं हो सकता। हिंदी और उससे जुडी समस्याओं को लेकर रामविलासजी से मेरी एक लंबी बातचीत हुई थी। उसमें उन्होंने निर्भज़ंत शब्दों में कहा कि हिंदी इस देश की जनता की आवाज है, जिसके जरिये उसके सुख-दुख, पीडा और संघर्षों को जाना जा सकता है। इसलिए हिंदी के बिना इस देश में न कोई परिवर्तन आ सकता है और न कोई बडा आंदोलन किया जा सकता है। यहाँ तक कि हिंदी के बिना इस देश के विकास और समृद्धि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर हिंदी इस देश को जोडकर रखने वाली सांस्कृतिक धुरी भी है। इसलिए हिंदी की अवहेलना करके देश आगे नहीं बढ सकता।
ऐसे ही तुलसी, सूर, कबीर, रैदास, मीरा और अन्य संत कवियों को लेकर भी जो उन्होंने कहा, उसमें जातीय गौरव के साथ-साथ उनका गहरा देशाभिमान बार-बार बोलता दिखाई पडता है। वे बार-बार यह बात दोहराते हैं कि ये केवल संत नहीं, बल्कि देश के सांस्कृतिक आंदोलन के महानायक हैं, जिनके कद तक कोई और नहीं पहुँच पाया।...यहाँ रामविलास शर्मा के शब्दों में एक सच्चे भारतीय की तेजस्विता है। इसीलिए उनकी बातों का मन पर इतना गहरा असर पडता है। और शायद इसीलिए खुद रामविलास शर्मा हिंदी-प्रेम और भारतीय गौरव के प्रतीक हो गए, जिन्हें देश की जनता का अपार प्रेम हासिल हुआ। वे सिर्फ एक दिग्गज आलोचक के तौर पर ही नहीं जाने गए, बल्कि भारत और भारतीयता की बडी प्रखर आवाज बन गए।
रामविलासजी का पूरा लेखन उनके सतेज इतिहास-दर्शन और देशाभिमान की गवाही देता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ, स्वाधीनता और राष्ट्रीय साहित्य, सन् सत्तावन की राज्यक्रांति, भारत की भाषा समस्या, भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा, भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, भारत के प्राचीन भाषा-परिवार और हिंदी, भारत में अंग्रेजी राज और माक्र्सवाद सरीखी उनकी पुस्तकें उनके देशप्रेम और गहरी सांस्कृतिक चेतना के ताने-बाने से बुनी लगती हैं। उनके चिंतन का एक सिरा देश की आजादी और भारतीय जनता की समस्याओं से जुडता है, तो दूसरा हिंदी जाति के गौरव और स्वाभिमान से। मानो वे नवजागरण की चेतना से पूरे देश को जगाना चाहते हों।
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रामविलासजी में यह देशराग उनके बचपन और किशोर अवस्था से ही नजर आता है, और जीवन के आखिरी चरण तक यह निरंतर उत्तरोत्तर बढता ही गया। देश और जनता की सांस्कृतिक चेतना की बात हो, या भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गौरवपूर्ण इतिहास की, वे बिना किंतु-परंतु के, हमेशा बडी दृढता से अपनी बात कहते हैं।
रामविलासजी के जीवन और लेखन से जुडे ऐसे बहुत प्रसंग हैं, जिनसे पता चलता है कि वे कोरे आलोचक नहीं, बल्कि एक बडे सांस्कृतिक युगचेता थे। लिहाजा अपनी अलग लीक बनाकर चलने में उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता था। सन् 1957 की एक घटना है, जब रामविलासजी युवा थे और आलोचना जगत में उनकी काफी ख्याति हो चुकी थी। उन्हीं दिनों 1857 के स्वाधीनता संग्राम की शतवार्षिकी मनाई जा रही थी। उस समय अनेक इतिहासकार इसे स्वाधीनता संग्राम नहीं मानते थे। अंग्रेजों ने उसे गदर या सिपाही विद्रोह के रूप में प्रचारित किया। बहुत-से भारतीय बुद्धिजीवियों ने, जिन्हें उधार के विचारों पर पलने की आदत है, इसे अंग्रेजी ढंग से ही व्याख्यायित किया।
रामविलासजी को यह देखकर गहरा दुख हुआ। उन्होंने जितना भी देखा-सुना, पढा और अनुभव किया, उससे 1857 में भारतीय जनता की वीरता और बलिदान का तेजस्वितापूर्ण कथानक ही उभरकर सामने आया। फिर तो वे और भी गहरे अध्ययन में डूब गए। सच को कहने और पूरे दमखम से कहने की चुनौती उनके सामने थी। लिहाजा लंबे श्रम और अध्यवसाय के बाद रामविलासजी ने एक पुस्तक लिखी, सन् 57 की राज्यक्रांति। उनका संकल्प था कि यह पुस्तक सन् 1957 में ही आनी चाहिए। अपने एक साहित्यिक मित्र से उन्होंने इसका जिक्र किया, तो उसका कहना था कि इतनी जल्दी पुस्तक का आ पाना असंभव है। लेकिन सच ही, सन् 1957 के आखिरी दिन यानी 31 दिसंबर को वह किताब छपी। रामविलासजी ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है कि 31 दिसंबर 1957 को यह किताब छापकर आई थी और वे रात में ही इसे अपने उस मित्र को भेंट करने गए थे।
इस पूरे प्रसंग की चर्चा करते हुए रामविलासजी कहते हैं, उस मित्र ने कहा था कि पुस्तक इस साल छप नहीं सकती और मेरा कहना था कि जरूर छप जाएगी। इसलिए 31 दिसंबर की रात को मैं उसे यह किताब भेंट करने गया था।...खैर, तो मेरा कहना था, यह संघर्ष स्वाधीनता संग्राम तो है ही, लेकिन एक बहुत बडी राजनीतिक क्रांति भी है। इसलिए कि अभी तक जितने संग्राम हुए, उनका नेतृत्व सामंतों ने किया था, जबकि इसके नेता फौज के सिपाही थे। एक वर्ग की जगह दूसरा वर्ग नेतृत्व सँभालने के लिए आगे आए, इसे राज्यक्रांति ही कहेंगे।
जिस समय रामविलासजी ने यह पुस्तक लिखी थी, उस समय तक माक्र्स ने जो कुछ 1857 पर लिखा था, वह उनके पास नहीं था, बाद में प्राप्त हुआ। रामविलासजी को लगा कि इस पुस्तक में माक्र्स के विचारों को भी शामिल किया जाना चाहिए, जिनका अपना ऐतिहासिक महत्त्व है। इसलिए उन्होंने पुस्तक को संशोधित करके दूसरा संस्करण तैयार किया और इसका नाम रखा, सन् 57 की राज्यक्रांति और माक्र्सवाद। इस पुस्तक को लिखते समय उनकी मानसिकता क्या थी, इसे स्पष्ट करते हुए रामविलासजी कहते हैं-
खास बात यह है कि माक्र्स ने स्वयं 1857 के आसपास भारत के बारे में अपनी धारणाएँ बदली थीं। एक अखबार में माक्र्स और ऐंगल्स प्रति सप्ताह भारत की घटनाओं पर लिखते थे। उनका संकलन 1959 में मास्को से इंडियाज फर्स्ट वार आफ इंडिपेंडेंस नाम से छपा है। 1957 के बाद प्रगतिशील लेखक संघ और कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर भारतीय इतिहास, भारतीय समाज-व्यवस्था और माक्र्सवाद को लेकर अनेक समस्याएँ प्रचलित थीं। इन पर बहस चलती थी। मैं प्रगतिशील लेखक संघ से औपचारिक रूप से अलग हो गया था, पर अनौपचारिक रूप से सभी लेखकों के साथ मेरा संबंध था। और कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से भी मेरा संफ बना रहा। इस समय मैंने इतिहास और माक्र्सवाद पर विशेष काम किया। इसका परिणाम है दो मुख्य पुस्तकें - भारत में अंग्रेजी राज और माक्र्सवाद तथा माक्र्स और पिछडे हुए समाज।
रामविलासजी राष्ट्रीयता और माक्र्सवाद में कोई विरोध नहीं देखते। उनके यहाँ भारतीयता और माक्र्सवाद दोनों साथ-साथ चलते हैं। राष्ट्र, जाति और माक्र्सवाद से जुडे प्रश्नों पर विचार करते हुए वे थोडे रोष के साथ कहते हैं, कुछ ऐसे भी विद्वान इस देश में हैं जो कहते हैं कि भारत राष्ट्र नहीं है। उनके विचार से वह उपमहाद्वीप है। अंग्रेजों के आने से कुछ एकता उत्पन्न हो गई थी, अंग्रेज गए तो साथ में एकता भी ले गए।
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अपने देश में ही ऐसे बहुत-से चिंतक हैं जो भारत को एक राष्ट्र न मानकर उपमहाद्वीप कहते हैं। उनका कहना है कि भारत में इतनी भाषाएँ और भिन्न-भिन्न संस्कृतियाँ हैं कि यह एक राष्ट्र तो हो ही नहीं सकता। इनमें रमेशचंद्र मजूमदार प्रमुख हैं। पर खुद मजूमदार अपने अंतर्विरोधों में घिरे हुए हैं। मौर्य काल पर लिखी पुस्तक में उन्होंने संस्कृत के आधार पर इस देश की राजनीतिक एकता की बात की थी। इसकी चर्चा करते हुए रामविलासजी लिखते हैं-
1957 में जब लोग अठारह सौ सत्तावन की शताब्दी मना रहे थे, तब अनेक इतिहासकारों ने यह सिद्ध कर दिया कि उस समय न राष्ट्र था, न राष्ट्रीय चेतना। फिर यह राष्ट्रीय स्वाधीनता संगाम कैसे होता? इस कार्य में श्री रमेशचंद्र मजूमदार ने विशेष प्रसिद्धि पाई। लेकिन इन्हीं श्रद्धेय इतिहासकार ने द क्लासिक एज नामक पुस्तक में मौर्यों के विशाल राज्य और उससे उत्पन्न राजनीतिक एकता की चर्चा की थी। लिखा था कि एक शताब्दी तक गुप्त सामाज्य आर्यावर्त की एकता और स्वाधीनता का प्रतीक बना रहा। संस्कृत के आधार पर जो सांस्कृतिक एकता कायम हुई, उसके बारे में लिखा था कि विदेशी सत्ता और अनेक परिवर्तनों के बावजूद वह आज भी भारतीय जनतंत्र की एकता और राष्ट्टीयता का एकमात्र सुदृढ आधार है।
खुद को बुद्धिजीवी कहने वाले बहुत से विचारक कहते हैं कि नेशन उसे कहते हैं जिसकी भाषा एक हो। यूनान में मिलती-जुलती बोलियाँ बोली जाती थीं, इसलिए उसे एक राष्ट्र माना गया। लेकिन यहाँ तो आर्य और द्रविड एकदम भिन्न भाषा-परिवार थे। फिर भारत राष्ट्र कैसे हुआ? इसका जवाब देते हुए रामविलासजी कहते हैं कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद संस्कृत समूचे भारत राष्ट्र को जोडे हुए थी, और उसी से इतनी भिन्नताओं में एकता भी कायम होती थी-
प्राचीन भारत में अनेक भाषाएँ थीं, किंतु शिक्षितजन संस्कृत द्वारा आखिर भारतीय स्तर पर आपस में संफ बनाए हुए थे। आर्यावर्त से सबसे ज्यादा दूर बंगाल और केरल थे, फिर भी इनकी भाषाओं में संस्कृत के शब्द अपेक्षाकृत अधिक हैं। इससे संस्कृत के देशव्यापी प्रभाव का पता चलता है। प्रकांड पंडित शंकराचार्य केरल ही के थे। बंगाल के न्यायशास्त्री दूर-दूर तक विख्यात हुए। फिर भी प्रश्न बना रहता है कि क्या एक से अधिक भाषाएँ बोलने वालों को राष्ट्र की संज्ञा दी जा सकती है?
राष्ट्र शब्द के लिए अंग्रेजी के नेशन के प्रयोग को रामविलासजी ठीक नहीं मानते। उनका कहना है कि नेशन राष्ट्र के बजाय जाति के अर्थ को ध्वनित करता है और राष्ट्र उससे कहीं बडी अस्मिता है। एक राष्ट्र में कई जातियाँ हो सकती हैं, जिनकी भाषाएँ भिन्न-भिन्न हों।
इस संबंध में बहुत से अंग्रेजीदाँ किस्म के विचारकों की भ्रांति को दूर करते हुए रामविलासजी बडे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं-
अंग्रेजी का नेशन बडा भ्रामक है। भारतीय भाषाओं में दो शब्द हैं, राष्ट्र और जाति। भारत राष्ट्र, हिंदीभाषी जाति। ब्रिटेन राष्ट्र में एक ही भाषा है, भारत में अनेक भाषाएँ हैं। जाति की भाषा एक ही होती है, राष्ट्र में एक जाति, एक भाषा तथा अनेक जातियाँ, अनेक भाषाएँ हो सकती हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जातीय संगीत में जाति शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया है।
पर रामविलासजी इस बात को लेकर सचेत हैं कि पराई भाषा के जरिए कोई राष्ट्र नहीं टिका रह सकता। इसीलिए वे अंग्रेजी के मोह को जल्दी से जल्दी छोडने और हिंदी अपनाने पर जोर देते हैं, क्योंकि सच्चा देशानुराग अपनी भाषा से प्रेम के बगैर नहीं हो सकता। यहाँ रामविलासजी की भाषा का तेवर देखने लायक है-
भारत राष्ट्र से प्रेम है तो अंग्रेजी से मोह छोडना होगा। अंग्रेजी का प्रभुत्व राष्ट्र के लिए अपमानजनक है। विदेशी भाषाओं के साथ अंग्रेजी का अध्ययन भी किया जाएगा, किंतु वह भारतीय भाषाओं के हक मारकर यहाँ नहीं रह सकती। सभी प्रदेशों की जनता को अंग्रेजी हटाने के लिए मिलकर प्रयत्न करना चाहिए। जो लोग हिंदी साम्राज्यवाद का भय दिखाते हैं, वे अंग्रेजी का साम्राज्यवाद सुरक्षित रखते हैं।
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इसी तरह रामविलासजी ने सन् सत्तावन की राज्यक्रांति पर बहुत गंभीरता से अध्ययन और चिंतन करने के बाद पुस्तक लिखी है। वे भारतीय जनता की सन् अठारह सौ सत्तावन की राज्यक्रांति को विश्व स्तर पर हो रही व्यापक हलचलों के साथ जोडकर देखते हैं। लिहाजा उनका मानना है कि सन सत्तावन की राज्यक्रांति 19वीं सदी में यूरोप के आतताइयों के विरुद्ध एशिया-अफ्रीका प्रशांत महासागर के द्वीपों आदि की जनता के संघर्ष का अभिन्न अंग है।
रामविलासजी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि सन् सत्तावन की राज्यक्रांति ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों के विरोध में थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहाँ आकर भारत के परंपरागत उद्योग-धंधे, न्याय-व्यवस्था, शिक्षापद्धति सभी को नुकसान पहुँचाया। यह एक तरह से देश और जनता को तबाही की ओर ले जाना था। इससे चोट खाई भारतीय जनता में जबरदस्त आक्रोश था। भारतीय जन-मानस भीतर-भीतर सुलग रहा था। इसी का यह नतीजा था कि सन् अठारह सौ सत्तावन में भारतीय जनता ने अभूतपूर्व एकता का परिचय दिया-
ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार का काम बंद करके, जब यहाँ की मालगुजारी वसूल करने वाली जमींदार बन गई थी, उसने यहाँ की समाज-व्यवस्था में कोई क्रांति न की थी, न जान-बूझकर न अनजाने में। यहाँ के प्रतिकियावादी सामंतों से मिलकर उसने यहाँ की अभ्युदयशील पूँजी और उद्योग-धंधों को अवश्य क्षति पहुँचाई थी। अठारहवीं सदी में यहाँ का औद्योगिक विकास बंद न हो गया था, वरन अंग्रेज उद्योगपति यहाँ के व्यापारियों से होड में परास्त हुए थे। अंग्रेजों ने यहाँ के सामंती विघटन को बढावा दिया और उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में यहाँ अराजकता फैलाने वालों में वे सबसे आगे थे। उन्होंने यहाँ की न्याय-व्यवस्था, शिक्षा-पद्धति, उद्योग-धंधे सभी को क्षति पहुँचाई। इनके विरुद्ध यहाँ के अनेक देशभक्त सामंतों ने सारे देश की शक्तियों में एक करने और अंग्रेजों को निकालने के महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किए।
सन् 1857 में भारतीय जनता की अभूतपूर्व एकता और संगठन कौशल तथा फौज के सिपाहियों की सच्ची वीरता भी खुद में एक मिसाल थी। रामविलासजी भारतीय इतिहास के इस गौरवपूर्ण अध्याय से हमें परिचित कराते हुए, स्पष्ट शब्दों में कहते हैं-
यहाँ की जनता ने अंग्रेजों के विरुद्ध बराबर संघर्ष जारी रखा। उसने संगठन के जातिवादी तरीके अपनाए। एक प्रदेश के बाहर की जनता से भी एका कायम करना सीखा। अंग्रेजों के अन्यत्र युद्धों में उलझने से लाभ उठाया और इस पकार अपने स्वाधीनता-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना का परिचय दिया। फौज के सैनिकों ने विशेषकर बंगाल सेना के सिपाहियों ने अंग्रेजों की वर्ण-भेद, धर्म-भेद की नीति को अपने अनुभव से जाना। अपने संघर्षों से अंग्रेजी राज का सच्चा रूप पहचाना। देश के चारों ओर फैले होने से अंग्रेजों की विश्वासघातक कूटनीति को समझा और 1857 के अंग्रेज विरोधी संघर्ष में सबसे आगे बढकर भाग लिया।
ऐसे ही सन् अठारह सौ सत्तावन की राज्यक्रांति की व्याख्या करते हुए रामविलासजी इस बात को बार-बार रेखांकित करते हैं कि इस क्रांति में कोई एक वर्ग नहीं, बल्कि पूरी भारतीय जनता शामिल थी। लोग हर तरह के भेदभाव से उठकर इसका विरोध कर रहे थे-
इस क्रांति में जनता के सभी वर्गों के लोगों ने भाग लिया। उसका नेतृत्व सेना के हाथ में था। सैनिक और किसान उसके मूलाधार थे। क्रांति अनेक स्थानों में तीव्र सामंत-विरोधी रूप में विकसित हुई। ब्रिटेन के सचेत मजदूरों ने, रूस, इटली और फ्रांस के क्रांतिकारी जनवादियों ने इस संघर्ष को भारतीय जनता का स्वाधीनता संग्राम कहकर उसका समर्थन किया। इंग्लैंड में अर्नेस्ट जोन्स ने उसके लिए लोकमत संग्रह करने में स्तुत्य प्रयास किया। भारत में अनेक यूरोपियन यहाँ की जनता की ओर से लडे और उन्होंने अपने रक्त से संसार के स्वाधीनता प्रेमियों का अंतराष्ट्रीय भाईचारा दृढ किया। क्रांति के समय चीन की जनता भी अंगेजों से लड रही थी। वह भारतीय संघर्ष के समाचार बडी रुचि से सुनती थी और अंग्रेजों की हार से प्रसन्न होती थी।
कहना न होगा कि रामविलासजी ने सन् 1857 की राज्यक्रांति पर लिखते हुए, न केवल भारतीय जनता को उसके गौरवपूर्ण इतिहास की एक झलक दिखाई है, बल्कि साथ ही उन अंग्रेजीदाँ विचारकों को भी मुँहतोड जवाब दिया है, जो भारतीयता का मतलब सिर्फ हीनता ही समझते हैं, और उधार के आयातित विचारों को ओढकर, अपने आधुनिक होने का आडंबर रचते हैं।
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रामविलासजी का यह देशानुराग इतना गहरा है कि वे किसी भी विषय की चर्चा कर रहे हों, उसमें यहाँ की धरती, यहाँ की सांस्कृतिक परंपराओं और भारतीय जनता के सुख-दुख और समस्याओं की चर्चा तो आती ही थी। दिल्ली आने के बाद मेरा उनसे बार-बार मिलना होता था और मैंने बहुत बार उनसे लंबी बातचीत की। मुझे यह देखकर अच्छा लगता था, कि रामविलासजी चाहे किसी भी विषय पर बोल रहे हों, उसमें भारत के इतिहास, संस्कृति और यहाँ के लोगों की मुश्किलों और समस्याओं का जिक्र जरूर होता था। इस देश और धरती से तथा इसकी गौरवपूर्ण सांस्कृतिक परंपराओं से इतना गहरा लगाव उनके भीतर था, कि वह उनके शब्दों में व्यक्त होने के लिए विकल हो उठता था। और कोई आश्चर्य नहीं कि तीन खंडों में छपी अपनी आत्मकथा का शीर्षक भी उन्होंने अपनी धरती अपने लोग ही रखा। यह ऐसी आत्मकथा है जिसका हर पन्ना मानो रामविलासजी के देशानुराग की एक आत्मीय छवि सामने रखता है।
रामविलासजी के बचपन और किशोरावस्था में ही उनके गहरे देशराग की झलक मिल जाती है। उनकी आत्मकथा पढकर पता चलता है कि उनका बचपन और कैशौर्य काल झाँसी में बीता। उनके लिए झाँसी भावनाओं से आप्लावित झाँसी थी, जिसका कण-कण रानी झाँसीबाई की वीरता और बलिदान की याद दिलाता था। उन्होंने जिक्र किया है कि उन दिनों वे प्रायः झाँसी का किला देखने जाते थे। उसे देखते हुए मानो वे समय की हदें फँलागते हुए, उस पुराने इतिहास में पहुँच जाते थे और कल्पना करते थे कि यहीं झाँसी की रानी की तोपें गरजती होंगी। कैसे उन्होंने जान हथेली पर रखकर, इतनी बडी अंग्रेजी सेना का सामना किया होगा। सोचकर वे रोमांच सा महसूस करते थे।
झाँसी के मैकडनल हाईस्कूल में रामविलासजी पढते थे, उसमें अंग्रेजी पढाते थे चटर्जी मास्टर जी। वे और अध्यापकों जैसे नहीं थे, और न पढाई का अर्थ उनके लिए छात्रों को केवल विषय का ज्ञान करा देना था। बल्कि देश की गुलामी को देख, एक गहरी वेदना और कचोट उनके भीतर उपजती थी। और यही वे अपने विद्यार्थियों के दिलों में भी उतार देते थे। रामविलासजी चटर्जी मास्साब से बहुत प्रभावित थे। चटर्जी मास्साब बताया करते थे कि अंग्रेजों ने धोखे से इस देश पर गुलामी थोप दी। भारत के लोग वीर हैं, हिम्मती हैं, पर अंग्रेजों की धूर्तता और चालाकी को नहीं समझ पाए।
अपने देशभक्त अध्यापक की बातों का बालक रामविलास पर गहरा असर पडता था। इसी तरह चक्रवर्ती मास्टरजी देश के स्वाधीनता सेनानियों के त्याग, बलिदान और देशभक्ति की बातें बताया करते थे। सुनकर रामविलासजी के मन में अपने देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की ललक पैदा हुई। यही दौर था, जब बालक रामविलास शर्मा ने अंग्रेजों का दिया मैडल फेंक दिया था। ऐसे ही विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के आंदोलन के समय अपनी टोपी जलती आग में फेंककर, उन्होंने अंग्रेजी शासन के प्रति अपना गुस्सा प्रकट किया था।
उन्हीं दिनों रामविलासजी ने नाटक लिखा। उसे वे कक्षा में पढकर सुनाते थे। साथ ही देशभक्ति की कविताएँ उन्हें अच्छी लगती थीं। चंद्रशेखर आजाद के साथी वैशंपायनजी वहाँ थे। उनकी बातें भी कम रोमांचित नहीं करती थीं। चटर्जी मास्टरजी का जज्बा और वैशंपायन जी की भावपूर्ण स्मृति कथाएँ, दोनों रामविलासजी के बचपन को कुछ नए ढंग से गढ रही थीं। उनके मन में देश के स्वाधीनता सेनानियों और क्रांतिकारियों के लिए बडा आदर का भाव था।
साथ ही तिलक, गोखले और गाँधीजी के नेतृत्व में चल रहा स्वाधीनता संग्राम भी उनके हृदय पर गहरी छाप छोड रहा था। बाद में गाँधीजी आजादी की लडाई के एक करिश्माई नायक के रूप में उभरे तो रामविलासजी के मन पर भी उनके व्यक्तित्व और विचारों की गहरी छाप पडी। पूरे देश की जनता के मानस को समझने और उससे गहरा जुडाव रखने वाले गाँधीजी के लिए रामविलासजी के मन में शुरू से ही बडा आदर का भाव था। बाद में यह और बढता ही गया।
बहुत से माक्र्सवादी चिंतक स्वाधीनता संग्राम में गाँधीजी की भूमिका को संदेह की नजरों से देखते हैं। पर रामविलासजी आजादी की लडाई में गाँधी के योगदान की मुक्त भाव से सराहना करते हैं। उनके स्वदेशी आंदोलन को वे आजादी की लडाई का सबसे शक्तिशाली और कारगर औजार मानते हैं। गाँधीजी के व्यक्तित्व की असली ताकत की ओर इंगित करते हुए, वे बडे भावनात्मक लहजे में कहते हैं-
गाँधीजी ने अपने समय में साम्राज्यवाद का जो विश्लेषण किया था, उससे अच्छा साम्राज्यवाद का विश्लेषण शायद ही किसी ने किया हो। इसी तरह गाँधीजी का जो स्वदेशी आंदोलन था, वह इस साम्राज्यवाद के विरोध का सबसे कारगर तरीका था। गाँधीजी ने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया था कि विदेशी पूँजी की हमारे देश में खतरनाक भूमिका है। स्वदेशी आंदोलन के जरिए गाँव-गाँव में उन्होंने आजादी की लडाई को पहुँचा दिया था और लोगों में यह भावना पैदा की थी कि अपनी जरूरतों के लिए उत्पादन स्वयं करो, तभी साम्राज्यवाद से लडा जा सकता है। और तभी सच्ची आजादी प्राप्त हो सकती है। इस तरह साम्राज्यवाद की षड्यंत्रकारी भूमिका को उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया था और सत्याग्रह के रूप में उसका जवाब भी खोज दिया था।
इतना ही नहीं, बल्कि रामविलासजी का यह भी मानना है कि भारत के सभी धर्मों और भाषाओं को निकट लाने में गाँधीजी की बडी और ऐतिहासक भूमिका रही है। गाँधीजी की शख्सियत और विचारों की व्यापकता ने इस देश को बहुत गहराई से प्रभावित किया है। बहुत सटीक शब्दों में इसकी चर्चा करते हुए वे कहते हैं-
उनकी एक विशेषता यह भी है कि उन्होंने विभिन्न धर्मों को एक साथ लाकर दिखा दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू और मुसलमान अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि गुजराती बोलने वाले हिंदू हों या मुसलमान हों, वे एक जाति हैं। इसी तरह बंगाली एक जाति है। यह सोच का एक सही तरीका था। इसी तरह उनका कहना था कि अंग्रेजी नहीं, बल्कि उसकी जगह भारतीय भाषाओं को लाओ। संफ भाषा के रूप में हिंदी के महत्त्व को उन्होंने तभी जान लिया था और उसके कारण ही इतना बडा काम कर दिखाया। इसके अलावा धार्मिक अंधविश्वासों को खत्म करने में उन्होंने इतना बडा काम किया, जैसा पहले कभी दयानंद ने किया था। कोई ऐसा तीर्थस्थान नहीं है, जहाँ वे गए हों और वहाँ की गंदगी और लोगों की बदहाली के बारे मे उन्होंने न लिखा हो। चाहे प्रयाग हो या जगन्नाथपुरी, उन्होंने हर जगह धार्मिक पाखंडों के खिलाफ लिखा।
इसी तरह रामविलास शर्मा गाँधीजी के इतिहास के अध्ययन को भी बेजोड मानते हैं। कहीं कोई बडा और जमीनी काम करना हो, तो वहाँ के इतिहास को वस्तुनिष्ठ ढंग से जानना जरूरी है, और गाँधीजी ने यही किया। इस दृष्टि से मानो भावमुग्ध होकर गाँधीजी की सराहना करते हुए रामविलास शर्मा कहते हैं-
ऐसे ही इतिहास का ज्ञान उन्हें इतना अधिक था कि नेहरू, तिलक और अंबेडकर के बाद इतिहास की ऐसी समझ और जानकारी किसी को नहीं थी। इतिहास के बारे में वे इस तरह बात करते थे, जैसे पूरा इतिहास उनकी जबान पर हो। दक्षिण अफ्रीका से काम करने के लिए वे गए, तो वहाँ के गिरमिटियों के हालात और दक्षिण अफ्रीका के इतिहास पर उन्होंने इतने अच्छे ढंग से लिखा कि वह इतिहास की एक श्रेष्ठ पुस्तक है। दक्षिण अफ्रीका के बारे में ऐसी आधिकारिक जानकारी देने वाली कोई दूसरी पुस्तक शायद ही हो। यही नहीं, बल्कि प्राचीन ग्रंथों का उनका अध्ययन भी विलक्षण है। दक्षिण अफ्रीका में जब अश्वेतों को इस आधार पर वोट न देने की बात की जा रही थी कि ये अशिक्षित हैं, तब उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का तो जन्म ही हमारे यहाँ हुआ है। और इस संदर्भ में उन्होंने पाणिनी के व्याकरणशास्त्र का उल्लेख किया था।
गाँधीजी सत्य और अहिंसा पर सबसे अधिक जोर देते थे। इस सत्य और अहिंसा की प्रेरणा उन्हें कहाँ से मिली? इस पर भी रामविलासजी ने बडी गंभीरता से विचार किया है। उनका कहना है, गाँधीजी की जिस सत्य और अहिंसा की बात की जाती है, उसका विचार उन्होंने भारतीय दर्शन से नहीं लिया था। बाद में भारतीय दर्शन पढने के बाद उनका यह विचार और पुख्ता हुआ, यह बात अलग है। शुरू में तीन विदेशी विद्वानों का प्रभाव उन पर ज्यादा था-टॉलस्टॉय, रस्किन और हेनरीमैन। टॉलस्टॉय से उन्होंने अहिंसा का सिद्धांत लिया। रस्किन से ट्रस्टी शब्द लेकर ट्रस्टीशिप की अपनी अवधारणा पेश की तथा हेनरीमैन से उन्होंने यह विचार लिया कि भारत ग्राम्य समाजों का देश है और बडे उद्योगों से नहीं, बल्कि घर-घर चरखा चलाए जाने से वह ज्यादा समृद्ध हो सकता है। और इस चरखे को गाँधीजी ने आजादी की लडाई का एक प्रतीक चिह्न ही बना दिया।
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देश के स्वाधीनता संग्राम की रामविलासजी के मानस पर अमिट छाप थी, और उन्होंने बहुत गहराई से इस पर विचार किया है। अपनी कईं पुस्तकों में रामविलासजी ने आजादी की लडाई के विशद आयामों की चर्चा की है। स्वाधीनता सेनानियों के त्याग, बलिदान और आजादी की लडाई में भारतीय जनता की भागीदारी पर भी उन्होंने खुलकर बात की है। यहाँ उनके भावों का उत्ताप, देशभक्ति का सच्चा आवेश और भाषा का तेवर देखने लायक है।
रामविलासजी की पुस्तक स्वाधीनता संग्राम के बदलते परिप्रेक्ष्य इस लिहाज से पढने लायक है। पुस्तक में भारत के स्वाधीनता संग्राम और उसमें जन भावना के उभार पर रामविलासजी ने जमकर लिखा है। साथ ही देश की आजादी की लडाई में संन्यासियों के संघर्ष को लेकर पूरा एक अध्याय है। रामविलासजी का मानना है कि आनंदमठ कोई कल्पित कृति नहीं। इसके पीछे सच्ची घटना है। वे कहते हैं, संन्यासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियारबंद लडाई लडी थी और यह लडाई काफी लंबी चली थी। उसी परंपरा पर बंकिम ने आनंदमठ की रचना की। उसी में वंदेमातरम् गीत है, जिस पर अंग्रेजों ने पाबंदी लगा दी थी।
इसी तरह अपने एक साक्षात्कार में, सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दयानंद के गुरु विरजानंद की भूमिका का भी रामविलासजी ने बहुत विस्तार से जिक्र किया है। वे इतिहास के कुछ अल्पज्ञात पन्नों को टटोलते हुए, उस कालखंड की प्रखर देशानुराग की भावना से हमें परिचित कराते हुए कहते हैं-
कहा जाता है कि 1857 में स्वामी दयानंद ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में भाग लिया। एक विद्वान की पुस्तक है, सन् 1857 में स्वामी विरजानंद। विरजानंद दयानंद के गुरु थे। इनके बारे में आपको पता होगा, ये मथुरा के थे और अद्भुत आदमी थे। उनके पेट में भयानक दर्द रहता था। आँखों से दिखाई नहीं देता था। लेकिन 1857 में विद्रोहियों की एक सभा हुई थी, उसमें उन्होंने व्याख्यान दिया था, किसी मुसलमान ने उसे नोट कर लिया और उसके द्वारा नोट किया गया भाषण बाद में छापा गया।
अपने गुरु विरजानंद की तरह स्वामी दयानंद में भी राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। उसकी प्रशंसा करते हुए रामविलास शर्मा कहते हैं, फिर जहाँ तक दयानंद की बात है, सत्यार्थ प्रकाश में मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए उन्होंने गुजरात के आदिवासियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आपकी मूर्ति तो मक्खी की टाँग भी नहीं तोड सकी, जबकि उन लोगों ने अंग्रेजों के छक्के छुडा दिए। इतना तो सत्यार्थ प्रकाश में लिखा हुआ प्रमाण मिलता है, जिससे अंग्रेजों के प्रति उनकी विद्रोही भावना पता चलती है। वैसे ऐसा बहुत लोगों का मानना है कि 1857-58 में स्वामी दयानंद गुप्त रूप से कहीं काम कर रहे थे। वे कहाँ थे, इसका कुछ ठीक-ठीक पता नहीं है। लेकिन बहुत लोगों का मानना है कि 1857 के स्वाधीनता संग्राम में उनका योगदान रहा है और उसमें भाग लेने के लिए ही वे कहीं छिप गए थे।
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रामविलासजी साहित्य या संस्कृति के प्रश्नों पर विचार कर रहे हों या फिर सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं पर, देश और देशराग की चर्चा तो वहाँ विस्तार से होगी ही। यह रामविलासजी का यह देशराग ही था कि वे बार-बार कोरे साहित्यिक विषयों की परिधि को उलाँघकर उन प्रश्नों से टकराते रहे जिनका संबंध समूची भारतीय जनता के सुख-दुख और संवेदना से था।
अपनी आत्मकथा में रामविलासजी ने इस बात का जिक्र किया है कि वे आलोचना की ओर कैसे आए। उन दिनों लखनऊ में हिंदी साहित्य का एक बडा सम्मेलन था, जिसकी अध्यक्षता निराला कर रहे थे। उसमें निरालाजी के आग्रह पर रामविलास शर्मा ने हिंदी भाषा की अस्मिता को लेकर एक लेख पढा, जिसमें हिंदी के विरोधियों के तर्कों का मुँह तोड जवाब दिया गया था। श्रोताओं ने इसे बेहद पसंद किया था और बार-बार तालियाँ बजाकर अपनी खुशी प्रकट की थी। इसलिए कि यह हिंदी का प्रश्न तो था ही, साथ ही भारत और भारतीयों की अस्मिता का प्रश्न भी था, जिसमें हिंदी की केन्द्रीय भूमिका है। फिर हिंदी देश के स्वाधीनता संग्राम की तो प्रेरक शक्ति थी ही, जिसके जरिए भारतीय जनता की विराट ऊर्जा आजादी की लडाई से जुड गई थी।
हिंदी को लेकर लिखा गया यही लेख मानो रामविलासजी के आलोचक व्यक्तित्व की केंद्रीय धुरी बन गया। इसके बाद एक-एक कर उन्होंने वे मुद्दे उठाए जो पूरे देश और भारतीय जनता की अस्मिता से जुडे थे। इसीलिए भाषा, संस्कृति और हिंदी जाति के नवजागरण पर रामविलासजी ने अपने मौलिक चिंतन से एक से एक सुंदर पुस्तकें लिखीं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि हिंदी में भी मूलभूत चिंतन की ऐसी गंभीर और गुरुत्वपूर्ण पुस्तकें हैं, जिन्हें पढने के लिए अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के लोगों को हिंदी सीखनी होगी। तभी वे उन चिंतन-सरणियों और विचारों को पूरी तरह समझ पाएँगे, जिनमें यह पूरा देश और राष्ट्रीय अस्मिता अपनी अभिव्यक्ति पाती है।
ऐसे ही हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों प्रेमचंद, निराला, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और महावीरप्रसाद दिवेदी पर काफी तैयारी के साथ लिखी गई रामविलासजी की पुस्तकें सिर्फ इन लेखकों का साहित्यिक मूल्यांकन ही नहीं हैं, बल्कि इनमेंउन्होंने देश और जनता की महान सांस्कृतिक परंपराओं और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रश्न भी उठाए हैं। महावीरप्रसाद द्विवेदी और नवजागरण पुस्तक में रामविलासजी ने नवजागण शब्द का प्रयोग किया, तो पूरे साहित्य जगत का ध्यान उस ओर गया। इसलिए कि हिंदी में एक विशिष्ट और सुनिश्चित अर्थ में नवजागरण शब्द का प्रयोग सबसे पहले रामविलासजी ने ही किया था। नवजागरण यहाँ केवल एक शब्द ही नहीं है, बल्कि एक गंभीर विचार है, जिसके पीछे एक ऐसे देशाभिमानी आलोचक का विशद चिंतन हैं, जो साहित्य, संस्कृति और इतिहास को साथ लेकर चलता है, तथा भारतीय जनता के हालात पर जिसकी गहरी नजर है। इसीलिए उसके शब्दों में पूरे भारत और भारतीयता की गहरी गूँज-अनुगूँज सुनाई देती है।
सच तो यह है कि शुरू से ही रामविलासजी ने देश और समाज को विचलित करने वाले प्रश्नों पर योजना बनाकर लिखना शुरू किया। वे कोरा साहित्य चिंतन ही नहीं, बल्कि भाषा, साहित्य, समाज, संस्कृति, दर्शन और इतिहास सभी को साथ लेकर चलना चाहते थे। यह एक मुश्किल रास्ता था तथा बहुत अधिक मध्ययन और अथक श्रम की माँग करता था। पर रामविलासजी निरंतर अपने काम में लीन रहने वाले लेखकों में से थे, जो साहित्य को जीवन के यथार्थ और परिस्थितियों के साथ रखकर देखते थे। और इसके लिए रात-दिन एक करके, मानो साहित्य चिंतन की एक नई इबारत गढ रहे थे।
इस दृष्टि से रामविलासजी की साहित्य-यात्रा एक कठिन तप से कम नहीं है, जो आज भी हमारे सामने मानो एक बडी मिसाल की तरह है। एक के बाद एक आने वाली उनकी पुस्तकें, केवल एक आलोचक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक बडे कद के संस्कृति चिंतक के रूप में उनकी छवि को सामने रखती हैं। स्वाधीनता और राष्ट्रीय साहित्य, सन् सत्तावन की राज्यक्रांति, भारत की भाषा समस्या, भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा, भारत के प्राचीन भाषा-परिवार और हिंदी, भारत में अंग्रेजी राज और माक्र्सवाद, स्वाधीनता संग्राम और बदलते परिप्रेक्ष्य, भारतीय इतिहास और ऐतिहासिक भौतिकवाद, भारतीय नवजागरण और यूरोप तथा भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश जैसी पुस्तकें कितने श्रम और गहरे अध्यवसाय के साथ लिखी गई होंगी, सोचकर हैरानी होती है। निरंतर काम में डूबे रहने वाले रामविलासजी का पूरा जीवन ही मानो साहित्य तप की एक मिसाल है। उनके सामने अपना लक्ष्य स्पष्ट था, इसीलिए वे इतना काम कर पाए।
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अपनी लेखन-यात्रा के आखिरी चरण में रामविलासजी ने प्राचीन भारतीय वाङमय का गंभीर अध्ययन करते हुए, भारतीय दर्शन और सांस्कृतिक परंपरा पर काफी काम किया। एक तरह से यह देश के सांस्कृतिक इतिहास का लेखा-जोखा करना था। उन्हें लगा कि इस देश के प्राचीन वाङमय, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं को गहराई से समझना चाहिए, जिसका किसी न किसी रूप में आज भी भारतीय जनमानस पर गहरा प्रभाव है। इसके बिना भारत और भारतीय जनता के लोकमानस को नहीं समझा जा सकता।
पर क्या रामविलासजी के जीवन में कोई ऐसा विशेष प्रसंग या घटना हुई थी कि अचानक उनका ध्यान वेदों और पुराणों की तरफ गया? उनसे हुई एक आत्मीय मुलाकात में मैंने यह जानना चाहा, तो रामविलासजी ने अपनी उस मनःस्थिति के बारे में बहुत विस्तार से बताया, जो उन्हें प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अध्ययन के लिए विकल कर रही थी। उन्होंने मुसकराते हुए कहा-
नहीं, ऐसी कोई घटना तो नहीं हुई, पर हाँ, ऋग्वेद का अध्ययन मैंने एक विशेष उद्देश्य से किया था। यूरोप के ज्यादातर दर्शन यूनान से निकले हैं और यूनानी पहले वहाँ रहते थे, जहाँ आज तुर्की है और जिसे एशिया माइनर’ कहा जाता है। चौदहवीं सदी में तुर्कों ने इन्हें वहाँ से भगाया। तो यूरोप के दर्शन का अध्ययन करते हुए मुझे लगा कि सुकरात और उससे भी पहले के यूनानी दार्शनिकों का परिचय उपनिषदों के रचनाकारों से था। यानी उपनिषदों की कई चिंतन-धाराएँ यहाँ मिलती हैं। जैसे उदाहरण के लिए वहाँ एक खोज यह है कि संसार का मूल तत्त्व क्या है? जल है, हवा है या कुछ और? यही बात उपनिषदों में पंचतत्त्वों के रूप में कही गई है।...रानाडे ने, जो ग्रीक और संस्कृत के विद्वान थे-सबसे पहले यह बात कही थी।...
आगे अपनी बात को स्पष्ट करते हुए रामविलासजी कहते हैं, उपनिषदों में एक ईश्वर की बात कही गई है और यही यूनानी दर्शन में भी है। तो मुझे लगा, भारतीय और यूरोपीय दर्शन का अध्ययन ऋग्वेद के बिना संभव नहीं है। तब ऋग्वेद पर मैंने बाकायदा काम करना शुरू किया। इधर की मेरी पाँच-छह पुस्तकों में ऋग्वेद पर एक अध्याय जरूर रहता है। उसका इतिहास-पक्ष पश्चिम एशिया और ऋग्वेद पुस्तक में है, काव्य-पक्ष भारतीय साहित्य की भूमिका में है।...अनेक दृष्टियों से मैंने उसका अध्ययन किया है। ऋग्वेद का दार्शनिक पक्ष भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश पुस्तक में है।
रामविलासजी अपनी साहित्य यात्रा के आखिरी चरण में भारतीय सौंदर्यबोध और तुलसीदास पुस्तक पर काम कर रहे थे। यहाँ भी वे वैदिक कवियों के सौंदर्यबोध की चर्चा करना नहीं भूले। बल्कि भारतीय सौंदर्यबोध और तुलसीदास पुस्तक की शुरुआत ही वैदिक कवियों के सौंदर्यबोध से होती है। यही परंपरा तुलसीदास से होती हुई, आगे निराला तक जाती है। इसीलिए रामविलासजी की तुलसीदास पर केंद्रित पुस्तक का पहला अध्याय ही है, वैदिक कवियों को सौंदर्यबोध। इसमें खासकर ऋग्वेद के सौंदर्यबोध का चित्रण है।
रामविलासजी का मानना है कि ऋग्वेद ही मूल स्रोत है। फिर वह सबसे प्राचीन ग्रंथ तो है ही। बाकी सभी वेद उससे प्रभावित हैं तथा उससे सामग्री उधार लेते हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि प्रारंभ में वेद एक ही था, व्यास ने चार वेद बनाए। तुलसीदास को पढते हुए रामविलासजी ने लक्षित किया कि उनके काव्य पर इस प्राचीन भारतीय परंपरा का बहुत गहरा प्रभाव था। तुलसीदास पर लिखी जा रही पुस्तक में रामविलासजी बडी प्रमुखता से इसकी चर्चा करते हैं। यही कारण है कि भारतीय सौंदर्यबोध और तुलसीदास पुस्तक में दूसरा अध्याय भारतीय दर्शन और सौंदर्यशास्त्र को लेकर है।
रामविलासजी दृढता से यह बात कहते हैं कि कलाओं के पारस्परिक संबंध और उनके विकास के अध्ययन के लिए भारतीय दर्शन जितना ठोस आधार प्रदान करता है, उतना तो यूरोप के दर्शन में भी नहीं है। इसीलिए भारतीय सौंदर्यबोध और तुलसीदास पुस्तक का तीसरा अध्याय उन्होंने रखा, नगर सभ्यता और कलाओं का विकास । इसमें बडी-बडी इमारतों के स्थापत्य और भित्तिचित्रों वगैरह का अध्ययन है। और तुलसी, जो हिंदी के सबसे बडे कद के कवि हैं, इसमें निष्णात थे। भारतीय काव्य, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं का जितना गहरा अध्ययन तुलसीदास जी ने किया था, वैसा कम ही कवियों ने किया होगा। इसीलिए तुलसी के काव्य में इतनी व्यापकता और गहराई है कि जितना उसमें डूबते जाओ, उतना ही आनंद आता है।
यहीं रामविलासजी भारत के प्राचीन इतिहास की एक बडी भ्रांति को दूर करते हुए कहते हैं-
भारत के बारे में अकसर यह कहा गया है कि भारत ग्राम्य सभ्यता का देश है, यहाँ नगरों का विकास नहीं हुआ। मेरा कहना यह है कि यह एकदम हवाई बात है। तुलसीदास के समय तक जो कलाओं का विकास हुआ, भारतीय स्थापत्य तथा चित्रकला का जो विकास हुआ, उसका अध्ययन करने के बाद जब मैं तुलसी के कलापक्ष की ओर आया, तो यह मेरे लिए एक चकित कर देने वाला अनुभव था इसलिए कि मुझे लगा, तुलसी को न सिर्फ इन सबका ज्ञान था, बल्कि इनका बहुत अच्छा प्रयोग उन्होंने अपने काव्य में किया।...इस लिहाज से तुलसी हिंदी के बहुत बडे कवि, बहुत सचेत और मेधासंपन्न कवि ठहरते हैं। उन्हें संस्कृत और हिंदी की समूची काव्य परंपरा की बहुत अच्छी जानकारी थी जिससे उनकी कविता में एक प्रकार की परिपक्वता आई। अपने से पहले के किसी भी कवि से वे घटकर नहीं हैं।...
रामविलासजी बार-बार इस बात को रेखांकित करते हैं कि प्राचीन काल में भारत औद्योगिक रूप से काफी संपन्न देश था और मुख्य रूप से यहाँ कपडे का उद्योग था। वे बताते हैं कि प्राचीन काल में हमारे यहाँ काम करने वाले जो लोग हैं, उन्हें शिल्पी कहा जाता है, जैसे बढई, बुनकर, कुम्हार वगैरह। एक तरह से वे मजदूर और कारीगर ही थे, पर उन्हें बाकायदा पगार दी जाती थी। एक तरह से प्राचीन भारत का जो पूरा कपडा उद्योग था, वह मुख्य रूप से इन कारीगरों के श्रम पर टिका था, जिन्हें उनके काम के बदले अच्छी पगार मिलती थी। यानी प्राचीन भारत में उद्योग धंधों की पूरी एक व्यवस्था थी। यही कारण है कि यहाँ के कपडे और दूसरी चीजों की गुणवत्ता पूरी दुनिया को मुग्ध करती थी। रामविलासजी के शब्दों में, भारत का कपडा उद्योग इतना अधिक विकसित था कि पूरी दुनिया में कहीं और इतना अच्छा कपडा नहीं बनता था।
इसी तरह भारत की प्राचीन नाट्यकला की प्रशंसा करते हुए रामविलासजी ने नाटक के आदि आचार्य भरतमुनि के बारे में बहुत-सी नई और रोमांचक बातें लिखी हैं। शुरू में नाटक और नाटक में काम करने वाले अभिनेताओं को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। भरतमुनि ब्राह्मण थे, फिर भी नाटक करवाते थे। खुले प्रेक्षागृहों में ये नाटक होते थे, जिन्हें सैकडों लोग देखने आते थे। इस बात पर उनका काफी विरोध हुआ। पर भरतमुनि ने अपनी लीक नहीं छोडी। वे नाटक को एक अलौकिक कला मानते थे, जो जीवन की अनेक छवियों को सजीव रूप में आँखों के आगे प्रस्तुत कर देती है। आखिर कोई अच्छा नाटक स्वयं जीवन की सुंदर प्रतिकृति ही तो है, फिर भला उसे क्यों न अपनाया जाए? इसलिए कई तरह के विरोध के बावजूद भरतमुनि लगातार नाटक करवाते रहे। फिर तो आगे चलकर भरतमुनि की परंपरा चल निकली, और वह काफी समृद्ध भी हुई। संस्कृत के बहुत से कवियों ने बडे अद्भुत नाटक लिखे हैं, जिन्हें रंगमंच पर बडे सुंदर और प्रभावशाली ढंग से मंचित किया जाता था। उनमें हृदय की भावना और करुणा थी, तो हास्य भी, जिससे राजा से लेकर साधारण जनता तक, सभी उसके कद्रदान थे।
नाटकों की इस प्राचीन परंपरा की खूबियों की चर्चा करते हुए रामविलासजी कहते हैं, उस समय जो नाटक होते थे, वे आज के ओपेरा की तरह थे। इसलिए कि उनमें नृत्य-संगीत की प्रधानता थी।...भरत नाटकों में काम करते थे, तो नाचना, गाना और बजाना वे कैसे छोड सकते थे? प्राचीन ग्रंथों में ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिनसे प्राचीन काल की समाज व्यवस्था ही नहीं, बल्कि और भी बहुत सी चीजों पर प्रकाश पडता है। कौटिल्य ने एक मजेदार बात लिखी है कि नट लोग नगर में ही अपना नाटक दिखाएँ, गाँव में नहीं। इसके पीछे उनकी दृष्टि शायद यह रही होगी कि गाँव के लोग नाटक देखेंगे, तो उनके काम का नुकसान होगा। तब खेती कौन करेगा? जबकि नगर के लोगों के पास तो काफी समय होता ही है। दूसरी बात यह कही गई कि नट लोग जब खेल दिखाने आएँ, तो वे बाहर से कोई सामान अपने साथ न लाएँ। राजा स्वयं उनके लिए आवश्यक सामान की व्यवस्था करेगा। शायद इसलिए कि नटों के साथ यह भय जुडा हुआ था कि वे खेल-खेल में कुछ और न कर दें।...
सच तो यह है कि प्राचीन भारत की गौरवपूर्ण संस्कृति, दर्शन और इतिहास की चर्चा रामविलासजी जब भी करते हैं, उनके शब्दों में एक अलग-सा भावावेग आ जाता है। उनकी निर्बंध बहती भाषा का यह सौंदर्य देखने लायक है। मानो एक सच्चे भारतीय का देशाभिमान ही उन्हें जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर भारतीय कला, संस्कृति, दर्शन, जीवन-पद्धति और वाङ्मय की भव्य छवियाँ सामने लाने के लिए व्याकुल कर रहा हो। यहाँ उनका कद एक आलोचक से बहुत ऊपर उठकर, एक सच्चे संस्कृति-पुरुष की तरह तेजोमय हो उठता है।
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यह रामविलासजी का देशानुराग ही है कि उनकी सोच और चिंतन में देश पहले आता है, बाकी चीजें बाद में। वे इस बात को लेकर बहुत सचेत नजर आते हैं कि कौन इस देश को एकता के सूत्र में बाँधना चाहता है और किसकी रुचि इस देश को खंडित करने में है। अंग्रेजों की हिंदुओं और मुसलमानों को बाँटने की कपट-नीति पर चोट करते हुए, वे भारत की जातीय समस्या पर अपनी स्पष्ट राय देते हैं-
आप इसे इस तरह दखिए कि जो बंगाल का मुसलमान है और जो हिंदी प्रदेश का मुसलमान है, उनमें आपस में समानता ज्यादा है या भिन्नता? मेरा कहना है कि जो बंगाल का मुसलमान है, उसकी संस्कृति बंगाल के हिंदुओं से ज्यादा मिलती है। इसी तरह हिंदी प्रदेश के हिंदू और मुसलमान की संस्कृति एक है। तो भारत में हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग संस्कृतियाँ हैं, यह स्थापना तो अंग्रेजों की है। अंग्रेजों की यह स्थापना है कि भारत में धर्म तो हैं, दर्शन नहीं है। कुल मिलाकर उन्होंने कहा कि भारत में हिंदू और मुसलमान दो धर्मों की प्रधानता है। और आगे चलकर यही देश-विभाजन का थीसिस बना।...
विगत इतिहास के पन्ने पटलते हुए रामविलासजी अंग्रेजों की कपट नीति का एक और उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जब उन्होंने बंगाल के विभाजन की चाल चली थी। हालाँकि भारतीय जनता के जज्बे ने उनकी इस चाल को नाकाम कर दिया-
इससे पहले 1905 में उन्होंने बंगाल का विभाजन किया, ताकि बंगाल का जो क्रांतिकारी आंदोलन है, वह दब जाए। तब उन्हें बंगाल के क्रांतिकारी उभार को दबाने का एक यही रास्ता समझ में आया कि बँटवारा कर दो। लेकिन उनकी कोशिशों के बावजूद सारा बंगाल भावनात्मक रूप से एक ही रहा। आखिर 1911 में अंग्रेज हार गए, 1947 में जीत गए। और इसके लिए षड्यंत्र वे बहुत पहले से रच रहे थे।...जब अंग्रेज कमजोर पडे और हम आजादी की ओर बढ रहे थे, तो अंग्रेजों ने विभाजन का शगूफा छोड दिया।...
सच तो यह है कि रामविलासजी के समूचे लेखन में एक सच्चे देशाभिमानी का जज्बा और आवेश नजर आता है। वे किसी साहित्यिक कृति को देख रहे हों, इतिहास की किसी घटना को या फिर देश की किसी बडी और चर्चित शख्सियत को, उनकी पहली कसौटी यही रहती है कि देश और देश की जनता के उत्थान में उसकी भूमिका क्या है? बाद में और चीजों पर भी उनका ध्यान जाता है। पर किसी कलावादी की तरह कला को कला के लिए मानना उन्हें स्वीकार्य नहीं। उनके लिए जीवन पहले है, देश और देश की जनता का हित पहले हैं, बाकी चीजें बाद में आती हैं। इसीलिए रामविलासजी की निगाह बार-बार साहित्य के घेरे से बाहर निकलकर, भारत की महान संस्कृति, गौरवपूर्ण इतिहास और अनूठे प्राचीन वाङ्मय की ओर जाती है, और उसमें बहुत कुछ ऐसा खोज लाती है, जिस पर हर भारतीय को अभिमान हो। रामविलासजी का यह देशराग ही उनका कद इतना ऊँचा कर देता है कि हर भारतीय उन्हें एक आदर्श नायक की तरह देखता, और दिल से सम्मान करता है।
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