fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

ईशमधु तलवार : बहुत याद आओगे दोस्त!

कृष्ण कल्पित
पत्रकार, कथाकार, सिनेमा-समीक्षक और राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव की असामयिक मृत्यु के बारे में जिसने भी सुना, स्तब्ध रह गया ।
तलवार के जाने से पत्रकारिता, साहित्य और समाज की तो गहरी क्षति हुई ही है, लेकिन यह मेरी व्यक्तिगत क्षति भी है । ईशमधु तलवार मेरा बहुत पुराना दोस्त था। 1974 में ईशमधु तलवार अपनी स्कूल के सांस्कृतिक/नाट्य दल के साथ हमारे गाँव बगड आया था, जब हमारी पहली मुलाकात हुई थी । तलवार मुझसे दो वर्ष बडा था और संयोग देखिए कि तलवार के गाँव का नाम भी बगड ही था । एक बगड झुंझुनू जिले में और एक अलवर में । तब से हमारी मित्रता चली आती है ।
तलवार की पत्रकारिता की शुरुआत अरानाद से हुई। यह अखबार दिवंगत अशोक शास्त्री, पंडित जगदीश शर्मा और अलवर के कुछ मित्रों ने मिलकर शुरू किया था। जगदीश शर्मा के अनुसार युवा तलवार विज्ञप्तियाँ लेकर आया करते थे। तलवार की भाषा और उनका हस्तलेख बहुत सुंदर था । जब तलवार को अरानाद में काम करने का प्रस्ताव दिया गया, तो अगले ही दिन से उन्होंने काम शुरू कर दिया।
इस तरह ईशमधु तलवार पत्रकार बने और जीवन भर बने रहे। पत्रकारिता के साथ तलवार अलवर के सांस्कृतिक जगत में भी सक्रिय थे। उसी समय उन्होंने पलाश नामक संस्था का गठन किया जिसके जरिये उन्होंने कई यादगार साहित्यिक कार्यक्रम किए, जिनमें हिंदी के मूर्धन्य लेखक जैनेन्द्र कुमार, मणि मधुकर, राजेन्द्र अवस्थी, बलराम इत्यादि ने शिरकत की। उसी समय अलवर के युवा रंगकर्मियों ने मराठी लेखक अनिल बर्वे के उपन्यास थैंक यू मिस्टर ग्लाड का मंचन भी किया जिसके जरिये अशोक राही और देवदीप मुखर्जी जैसे नाट्यकार सामने आए । यदि मैं भूल नहीं करता तो इसी समय के आसपास ईशमधु तलवार ने कहानियाँ लिखना भी शुरू कर दिया था। तलवार की कहानी लाल बजरी वाली सडक उन्हीं दिनों सारिका में प्रकाशित होकर चर्चित हुई थी। बाद में इसी नाम से ईशमधु तलवार का कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुआ जिसे प्रतिष्ठित अमर उजाला सम्मान से नवाज़ा गया।
अरानाद के बाद ईशमधु तलवार राजस्थान के प्रमुख अखबार राजस्थान पत्रिका के अलवर संवाददाता बने। इस दौरान उनके द्वारा की गई संवेदनशील पत्रकारिता पर पर सबकी नज़र पडी। पत्रिका के अलावा तलवार ने उन दिनों धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान और रविवार जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में भी लिखना शुरू किया। 1084,85 में जब नवभारत टाइम्स का जयपुर संस्करण शुरू हुआ, तो ईशमधु तलवार मुख्य संवाद्दाता बनकर जयपुर आ गए, मुख्यधारा की पत्रकारिता में आने के बाद भले ही तलवार साहित्य-कहानी-लेखन से दूर भले ही हो गए हों, लेकिन अब ईशमधु तलवार की गिनती प्रदेश के प्रमुख पत्रकारों में होने लगी ।
एक लंबे अरसे तक नवभारत टाइम्स में पत्रकारिता करने के बाद तलवार जनसत्ता में प्रमुख संवाददाता बनकर चण्डीगढ चले गए, जहाँ उनके साथ आज के मशहूर सिनेमा गीतकार इरशाद कामिल भी काम करते थे । इसके बाद कुछ दिन नवज्योति और महका भारत में भी ईशमधु तलवार ने काम किया और इसके बाद ईटीवी राजस्थान में बरसों सलाहकार रहे। इस तरह ईशमधु तलवार ने पत्रकारिता के मैदान में लंबी पारी खेली ।
पत्रकारिता ने तलवार को भले ही साहित्य से किंचित दूर कर दिया हो, लेकिन इस बीच भी पिंकसिटी प्रेस क्लब के अध्यक्ष रहते हुए कई यादगार कार्यक्रम करवाएँ। पहल का ऋतुराज सम्मान और लघु पत्रिका सम्मेलन याद आ रहे हैं। ईशमधु तलवार तीन बार पिंकसिटी प्रेस क्लब के अध्यक्ष रहे। तलवार ने प्रेस क्लब का विकास किया और बहुत सारे कार्यक्रम आयोजित किए। भारत और ब्रिटिश पत्रकारों के बीच क्रिकेट मैच हो या विख्यात कार्टूनिस्ट लक्ष्मण, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का व्याख्यान, किशन पटनायक का व्याख्यान इत्यादि। इस दौरान तलवार बेहद सक्रिय थे । प्रेस क्लब ही नहीं, श्रमजीवी पत्रकार संघ का भी ईशमधु तलवार ने कल्याण किया और उसे ऐसी जगह में बदल दिया जहाँ हर रोज़ ही कोई न कोई साहित्यिक कार्यक्रम होता था।
यह हम मित्रों के लिए बहुत राहत की बात थी कि पत्रकारिता से मुक्त होकर (पत्रकारिता से मुक्त होना मुश्किल है) पूरी तरह साहित्य की दुनिया में रम गए। उन्हें 2018 में सर्वसम्मति से राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव चुना गया । तलवार ने न केवल एक सुप्त संस्था को जगाया, बल्कि उसे इस तरह सक्रिय किया कि पूरे देश की नजरें राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ पर टिक गईं। राजस्थान प्रलेस ने 2018 में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल और साहित्य के कॉर्पोर्टिकरण के विरोध में समानांतर साहित्य उत्सव की शुरुआत की । इस एक कार्यक्रम ने साहित्य की दुनिया में हलचल मचा दी । समानांतर साहित्य उत्सव में ऋतुराजजी समेत बहुत से मित्रों का योगदान था, लेकिन उसके प्रमुख कर्ता-धर्ता ईशमधु तलवार ही थे। समानांतर साहित्य उत्सव के अभी तक तीन संस्करण हुए हैं । पिछली बार इसका नाम बदलकर जनसाहित्य उत्सव कर दिया गया।
इस बीच ईशमधु तलवार का एक व्यंग्य संकलन प्रकाशित हुआ। लेकिन ईशमधु तलवार की बॉलीवुड के भुला दिए गए संगीतकार दानसिंह पर लिखी और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित किताब वो तेरे प्यार का गम बहुत मशहूर हुई। इसके बाद तलवार ने सिनेमा पर लिखना शुरू किया और दैनिक भास्कर में भारतीय सिनेमा उद्योग से जुडे राजस्थानी कलाकारों पर एक सिरीज़ लिखी जिसे बहुत सराहा गया । यह किताब भी या अब प्रकाशनाधीन है ।
ईशमधु तलवार के साहित्यिक अवदान में सबसे चमकती हुई चीज़ उनका उपन्यास रिनाला खुर्द है जहाँ उन्होंने विभाजन की विभीषिका को एक दूसरे ढंग से व्यक्त किया है। अपनी चाइजी से सुनी पाकिस्तान की स्मृतियों से बुने हुए इस उपन्यास को लिखने के लिए तलवार ने पाकिस्तान की यात्रा की। हिंदी साहित्य जगत में इस उपन्यास का बेहद स्वागत हुआ। रिनाला खुर्द अब हिंदी साहित्य की धरोहर है।
मुख्यधारा की पत्रकारिता के अलावा ईशमधु तलवार का साहित्यिक पत्रकारिता में भी योगदान था। तलवार ने कुरजां सन्देश पत्रिका के सम्पादक थे और इस पत्रिका के निकले सभी छह-सात अंकों को यादगार कहा जा सकता है । इसी पत्रिका के एक अंक में कथाकार चरण सिंह पथिक ने रांगेय राघव की अमर कथा गदल के वारिसों की खोज की और इस बारे में एक अद्भुत रिपोर्ताज लिखा। इसके अलावा हमारे पुरोधा साहित्यकारों की जन्मशताब्दी पर भी कुरजां सन्देश ने यादगार अंक प्रकाशित किया । ईशमधु तलवार को इस कार्य के लिए राजस्थान साहित्य अकादमी ने साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से भी नवाज़ा।
तलवार के साथ मेरी असमाप्त यादें हैं। जब मैंने 1983 में आकाशवाणी, राँची में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कार्य शुरू किया था उसके कुछ दिन बाद तलवार अपने एक मित्र के साथ मुझसे मिलने राँची पहुँच गए। दूसरे दिन मैंने तलवार से कविताओं की रिकॉर्डिंग के लिए आग्रह किया और कहा कि कुछ पुरानी कविताएँ सुना देना । रात को दो बजे मेरी आँख खुली तो क्या देखता हूँ कि तलवार जागे हुए हैं और कुछ लिख रहे हैं। पता चला वे कविताएँ लिख रहे थे । कहा पुरानी नहीं, आकाशवाणी में नयी कविताएँ पढूँगा।
एक बार मैं अशोक शास्त्री और तलवार दिल्ली की यात्रा में निकले और दरियागंज की एक सस्ती होटल में ठहरे । हर दिन मित्रों का जमावडा जुटता और रसरंजन और बतरंजन कि महफिलें जुटतीं । एक दिन तीनों के सारे पैसे खत्म हो गए, तो हम चिंतित हुए । उस दिन हम तीनों पैसे जुटाने के अभियान में जुटे और दिनमान, नवभारत टाइम्स, सारिका इत्यादि पत्रों के दफ्तर में जाकर अपने पारश्रमिक की माँग करने लगे। हम तीनों की रचनाएँ इनमें प्रकाशित होती रहती थीं। बाकी जगह से तो चेक मिले, लेकिन तलवार मनोहर कहानियाँ के दिल्ली दफ्तर से अग्रिम के बतौर नकद रुपये ले आए जिससे हम निर्दयी और अनजान दिल्ली में कुछ दिन और रह सके।
और यह बात क्या भूलने वाली है कि मेरे जीवन का पहला एकल-कविता-पाठ मैंने अलवर के सूचना केंद्र में किया जिसके आयोजक ईशमधु तलवार थे । मैं तब 22 वर्ष का युवा था, लेकिन मुझे याद है कि यह कविता पाठ बहुत यादगार हुआ था, जिसे सुनने के लिए अलवर के सभी साहित्यकार एकत्र हुए थे । कवि शिव योगी ने इस कविता-पाठ पर संस्मरण भी लिखा है ।
1990 में हमने जब सांप्रदायिकता के विरुद्ध एक आंदोलन शुरू किया था। इसी आंदोलन के दौरान जब साम्प्रदायिक तत्त्वों ने मुझ पर हमला किया, तो अखबारों में बहुत हल्ला हुआ। उस समय नवनिर्मित मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत पूरे सरकारी लवाजमे के साथ जब मुझे देखने मेरे अशोक मार्ग के घर में आए तो देखा उनके साथ ईशमधु तलवार और पंडित श्रीप्रकाश भी थे। उन दिनों तलवार जयपुर नवभारत टाइम्स के मुख्य संवाददाता थे ।
तलवार को खाली बैठना पसन्द नहीं था । किसी न किसी काम में जुटा होता था। राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव बनने के बाद तलवार ने साहित्य को गाँवों तक ले जाने की मुहिम छेडी। इस कार्यक्रम के अंर्तगत हम लेखकों की टोली रौंसी, बैर, लूणा, सुजानगढ इत्यादि जगहों पर स्मरणीय कार्यक्रम हुए। इस तरह के कार्य करना केवल ईशमधु तलवार के बूते की ही बात थी ।
तलवार के खुशनुमा व्यक्तित्व में एक आकर्षण था। हर समय मित्रों से घिरे रहने वाले और हर समय किसी न किसी नए कार्यक्रम के बारे में सोचने वाला तलवार अचानक मित्रों को उदास करके चला जाएगा, किसने सोचा था ?
बहुत याद आओगे दोस्त !

सम्पर्क - के-701, महिमा पैनोरमा,
जगतपुरा,जयपुर 302017