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जवाहरलाल नेहरु का भारतबोध

विश्वनाथ मिश्र
जिस वर्ष सर जॉन स्ट्रेची कैंब्रिज के स्नातकों को यह समझा रहे थे कि भारत नाम की कोई ऐतिहासिक हस्ती या देश इस धरती पर है ही नहीं1 ठीक उसके एक वर्ष पश्चात 1889 में भारत में जवाहरलाल नेहरु का जन्म हुआ। यह उस फ्रांसीसी क्रांति का शताब्दी वर्ष भी था जिसने राजाओं के देवीय अधिकार के सिद्धांत को अंतिम श्रद्धांजलि देने के बाद लोकप्रिय संप्रभुता के विचार को सार्वजानिक जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण स्तम्भ बना दिया था। तब शायद ही किसी ने अनुमान किया हो कि यही जवाहरलाल नेहरु एक दिन शीत युद्ध की विभीषिका से दुनिया को बचाने के लिए गुटनिरपेक्षता का सूत्रपात करेगा और संयुक्त राष्ट्र संघ के बाद दुनिया के सबसे बडे संगठन का सूत्रधार बनेगा। उस हिंसा के युग में यह गाँधी मार्गी मृदुभाषी व्यक्ति एक दिन भारत की अदम्य और दुर्दयनीय शक्ति का परिचय देते हुए गोवा की मुक्ति के लिए दुनिया के सबसे बडे और शक्तिशाली सैन्य संगठन नाटो के सदस्य पुर्तगाल से गोवा को मुक्त करा लेगा, यह भी अकल्पनीय था। खासकर उस जवाहरलाल नेहरु को देखते हुए जिसे हिटलर और मुसोलिनी ने मिलने का आमंत्रण भेजा हो और उस आमंत्रण को नेहरु ने ठुकरा दिया हो।2 वस्तुतः यह उन अनेक घटनाओं में से कुछ के चित्रण हैं जो नेहरु के भारतबोध को एक कैनवास देने के उपक्रम में सम्मिलित रहे हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने नेहरु के सन्दर्भ में लिखते हुए कहा है कि जिस स्वप्न के दृष्टा विवेकानंद हैं, उसी स्वप्न को साकार करने के अभियंता गाँधी और नेहरु हैं।3 दिनकर की इस उक्ति में नेहरु का समग्र भारतबोध समाहित है।
किसी भी नेता या विद्वान के भारतबोध को समझने के लिए और प्रसंगवश नेहरु के भारतबोध को समझने के लिए उनके अतीतबोध और भविष्य संधान की योजना को समझना आवश्यक है। यह तब सबसे अधिक आवश्यक और महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब बोध की इकाई दुनिया की सबसे प्राचीन और निरंतर जीवित सभ्यता से संदर्भित राष्ट्र हो। इस दृष्टि से जवाहरलाल नेहरु का भारतबोध अतीतदर्शिता और भविष्य दृष्टि से समन्वय पर आधारित है। इस तथ्य को स्वयं नेहरु ने अपनी आत्मकथा में रेखांकित किया है। वे लिखते हैं कि मैं जब भारत को पश्चिमी दृष्टि से देखता था, तब भारत को आधुनिकता से सराबोर कर देना चाहता था। यह एक समालोचनात्मक किन्तु मित्रतापूर्ण दृष्टि थी। किन्तु जैसे जैसे मैं भारत को समझता गया, मुझे भारत की आत्मा और इसकी विशिष्टता की अनुभूति हुई। वे आगे लिखते हैं कि भारत मेरे खून में है और जब भी मैं भारत के आधुनिकीकरण के बारे में सोचता हूँ तब यह विचार मुझे परेशान करता है कि आखिर मैं भारत को समझता भी हूँ या नहीं। क्योंकि, जो सभ्यता पाँच हजार साल से भी अधिक समय से अपने को अक्षुण्य रखी है उसकी कुछ तो विशिष्टता होगी।4 इस विशिष्टता को समझने, गढने और उसे नावोन्मेषी तरीके से स्वतंत्रता के बाद अद्यतन करने में नेहरु की योजना और भूमिका में नेहरु के भारतबोध का दिग्दर्शन होता है।
1.1 वैदिक धर्म, हिन्दू संस्कृति एवं सत्यान्वेशी प्रवृत्ति
जवाहरलाल नेहरु के भारतबोध का अतीतबोध या बेनेडिक्ट एंडरसन के शब्दों में कहें, तो imagined कम्युनिटीज5 की अवधारणा विवेकानंद की इस चेतावनी के अनुपालन पर अवस्थित है कि हमें अध्यात्मिक प्रतीकों एवं मिथकों के भौतिक सत्यापन की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।6 इस तथ्य को रेखांकित करते हुए विवेकानंद कहते हैं कि आर्यों ने जब वेदांत के तत्त्व दर्शन को वास्तविक प्रतीकों के साथ जोडकर समझने का प्रयास शुरू किया, तब उन्होंने सम्पूर्ण सनातन धर्म को विभाजित कर दिया और इस विभाजन ने एक-दूसरे के प्रति घृणा और आक्रोश को जन्म दिया।7 बृहद परिप्रेक्ष्य में देखने पर विवेकानंद से पूर्व शंकराचार्य ने भी गीता पर भाष्य लिखते हुए पौराणिक मिथकों के भौतिक सत्यापन की प्रवृत्ति का निषेध किया है। जहाँ, उन्होंने कौरव और पाण्डव को आज के हरियाणा, सोनीपत, या कुरुक्षेत्र के किसी भूभाग पर लड रहे सैन्य पक्षों की रूप में पहचान नहीं की है, बल्कि उन्हें मन की ही असद एवं सद प्रवृत्तियों के रूप में पहचाना है। अंबेडकर के चिंतन में विवेकानंद की वह प्रतिध्वनि तब परिलक्षित होती है जब वे विवेकानंद की ही भाँति यह मानते हैं कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे। जवाहरलाल नेहरु भी विवेकानंद की ही तरह यह स्वीकार करते हैं कि भारत में आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे, परंतु, सावरकर और ज्योतिबा फुले दोनों आर्यों को बाहर से आया हुआ बताते हैं। सावरकर जिन आर्य मिथकों का भौतिक सत्यापन करते हुए महिमामंडन करते हैं।8 फुले उन्हीं आर्य मिथकों का भौतिक सत्यापन करते हुए उन्हें मूल निवासियों के घनघोर शोषण के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं।9
वस्तुतः प्राच्यवादियों ने पूरे औपनिवेशिक शासन काल में जिस तरह से आर्यों की श्रेष्ठता के मिथक को अपने आर्य होने के दंभ के साथ प्रचारित-प्रसारित किया था10 वह तब के भारतबोध को और आज के भारतबोध को भी प्रभावित करता रहा हैं। सावरकर का भारतबोध प्राच्यवादियों को बिना यह विचार किए कि इसके क्या आंतरिक एवं भविष्यगत दुष्परिणाम हैं, उन्ही की भाषा में उनको जवाब देता है। यह पूर्व को और प्रश्नगत संदर्भ में भारत को उसी तरह से पौरुषपूर्ण अतीत दृष्टि से देखता है जिस दृष्टि से प्राच्यवादी अपने पश्चिम को उपस्थापित करते रहे हैं। पश्चिम के पौरुष में और सनातन परंपरा की पशुता में यदि कोई गुणात्मक अंतर हो तो पश्चिम की पौरुषता उपादेय हो सकती है, परंतु पश्चिम की पौरुषता और सनातन परंपरा की पशुता में यदि मात्रात्मक समानता ही अधिक हो तो वह किसी भी दृष्टि से वरेण्य नहीं हो सकती है। उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, उपभोक्तावाद, पर्यावरण विनाश और शस्त्रों की होड, लिंगभेदी हिंसा आदि पश्चिम के पौरुषपूर्णता में छुपी हुई पशुता के ही संकेतक हैं। यह वीनरमेन की अवधारणा की मनोग्रंथि का मनोविज्ञान है। जो पश्चिम के द्वारा ज्ञानोदय के बाद विकसित किया गया है। इस मनोग्रंथि का दार्शनिक आधार डार्विन के विकासवाद में सन्निहित है, जो ज्ञानोदय के बाद यूरोप का सबसे बडा पथ प्रदर्शक रहा है और जिसके आलोक में मानव उद्विकास की सम्पूर्ण पटकथा को पश्चिम ने तोड-मरोड कर रख दिया है।11 यदि मानवजाति की यही भवितव्यता है और हिंसा उसका मूल गुणधर्म है, तब सावरकर के भारतबोध का शायद ही कोई विकल्प हो।
भारतबोध का एक दूसरा प्रतिमान जो हमें ज्योतिबा फुले के चिंतन में मिलता है वह भी प्राच्यवादियों के द्वारा प्रचारित आर्य श्रेष्ठता के मिथक से जकडा हुआ है। वह आर्यों की प्राचीन कालीन शाखा जिसमे मत्स्य, कूर्म, वराह, परशुराम और वामन आते हैं, उन्हें भारत के मूल निवासियों के लिए प्राणघातक बताते हैं। परंतु अंग्रेजों के रूप में आने वाली आर्यों की अंतिम शाखा को मूल निवासियों के लिए दैवीय वरदान मानते हैं।12 यद्दपि आम्बेडकर आर्य आक्रमण के मिथक को न स्वीकार करके भारतबोध के एक तीसरे प्रतिमान का संकेत करते हुए जरुर दिखाई पडते हैं, परंतु जब वे पौराणिक आध्यात्मिक प्रतीकों एवं मिथकों का जाति व्यवस्था से संदर्भित करते हैं, तब वे भी शंकराचार्य और विवेकानंद की नसीहत को भुला देते हैं।
जवाहरलाल नेहरु ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखा है कि भारत में आर्य कैसे आए और कहाँ से आए इसको लेकर विद्वानों में अनेक मत प्रचलित हैं, परंतु उन्हें देशी लोगों और देशी संस्कृति के उन्नायकों के रूप में ही देखना अधिक उचित है। नेहरु के भारतबोध में आर्य मिथक की प्राच्यवादी संकल्पना का ग्रहण नहीं लगा हुआ हैं और न ही भारतवासियों के नामकरण की प्रक्रिया में इतिहासबोध को मनमाने तरीके से उलट पलट देने की कोशिश की गयी है। नेहरु की दृष्टि में भारत की विशिष्टता सत्यान्वेषण की प्रवृत्ति है और इसी कारण उन्होंने हिन्दू होने की पहचान को परिभाषित करते हुए अहिंसक सत्यान्वेषी होने को हिन्दू पहचान के रूप में परिभाषित किया है। वे यह भी कहते हैं कि हिन्दू पहचान को धर्म या जाति में संकुचित करना उचित नहीं है यह एक सांस्कृतिक पहचान है और यदि हिन्दू एक धर्म है भी तो यह सत्य का धर्म है।13 भारत को समझने की नेहरु की यह दृष्टि एक आधारभूत दृष्टि है और यह सनातन परम्परा के आर्ष मत एवं आर्ष ग्रन्थ सम्मत मत ही नहीं है, अपितु यह हिन्दू पहचान को एक व्यापक आधार प्रदान करता है और और अब्राह्मिक मतों के सामीकरण की प्रवृत्तियों की अधिनायकवादी धारा के विरुद्ध ब्राह्मिक परम्परा के सतत साभ्यतिक प्रतिरोध को भी प्रदर्शित करता है। एकं सद विप्राः बहुधा वदन्ति अथवा कस्मै देवा हविषा विधेम या कुतोहम कुतः अजानता जैसे मूल अस्तित्त्वात्मक प्रश्नों का वैदिक समाधान जब अहम ब्रह्मास्मि में होता है तब सत्य का ही उद्घाटन होता है। सनातन धर्म इसी सत्य पर आधारित धर्म है और हिन्दू संस्कृति अथवा डॉ. राधाकृष्णन के शब्दों में हिन्दू एक वे आफ लाइफ के रूप में उसी सत्य का संधान करने की जीवन शैली है । हमारी ऋषि परम्परा ने उस सत्य का संधान करने के लिए न तो तलवार का सहारा लिया और न ही कभी अपने मत को प्रोसीलिटाइज तरीके से प्रसारित करने का प्रयास किया । इस नाते जवाहरलाल नेहरु की यह उक्ति कि हिन्दू पहचान अहिंसक सत्यान्वेषी की पहचान है, पूरी की पूरी सनातन परम्परा के उत्स और विकास के मर्म को प्रकट करता है और अब्राह्मिक परम्पराओं की प्रोसीलिटाइज और मिलिट्राइज्ड धर्म एवं संस्कृति से ब्राह्मिक परम्परा की विशिष्टता को उजागर करता है। साहित्यिक साक्ष्यों और लोकमानस में व्याप्त तथ्यों के आधार पर भी जवाहरलाल नेहरु की मान्यता को ही पुष्टि मिलती है ।
नेहरु के द्वारा गाँधी के नेतृत्व में दुनिया के सबसे बडे अहिंसक उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन में सहभागी होने का आधार भी यही भारतबोध है । यदि अपने इतिहास में भारत ने कभी प्रोसीलिटाइज और मिलिट्राइज्ड तरीके से अपने मत को नहीं थोपा था और यदि यह उसकी एक आत्म पहचान है, तब भारत अपने इस पहचान को खोए बिना उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन में हिंसा का समावेश भी नहीं कर सकता था । भारत के अहिंसक उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोल को और उसमें गाँधी - नेहरु की भूमिका को प्राच्यवादियों के तर्ज पर भारत के नेताओं और कुछ विद्वानों जिनमें दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों शामिल हैं, रिपुभाव के आभाव और भीरुता का आरोप लगाते हैं। इनमें से कुछ दक्षिणपंथी ऐसे भी हैं जो प्राच्यवादियों को जवाब देने के क्रम में वीरभाव और रिपुभाव के आग्रह के साथ सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता की ऐसी पुनर्व्याख्या कर देना चाहते हैं जैसी व्याख्या अब्राह्मिक परम्पराओं के इतिहास लेखन में देखने को मिलता है ।
प्राच्यवादियों को जवाब देने के क्रम में वीरभाव और रिपुभाव के आग्रह के साथ सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता की अब्राह्मिक परम्पराओं पुनर्व्याख्या के क्रम में यह एक ऐसी स्वदेशी प्राच्यवादी प्रवृत्ति है जो बहार से दिखावा तो क्रान्तिकारियों का साथ देने का करती है, परन्तु इस क्रम में वह भारतीय क्रान्तिकारियों के मानवतावाद और साम्प्रदायिक सद्भाव के आग्रह का दूर तक बचाव भी नहीं कर सकती है । यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जो क्षणिक विकार को दूर करने के लिए सम्पूर्ण इतिहासबोध को ही खतरे में डाल देती है और चोर प्रवृत्ति से लडने के लिए चोर बन जाने का सुझाव देती है । वस्तुतः यह प्रवृत्ति अहिंसा की शक्ति को नहीं समझती है और शास्त्रों के मर्म को भी नहीं समझती है । सनातन भारतबोध शस्त्रबोध का भारत नहीं है, अपितु यह शस्त्रों पर शास्त्र और आत्मबोध के द्वारा नियंत्रण का भारतबोध है । इसीकारण भारत में अशस्त्रं को शस्त्रपानयः कहा जाता है । कृष्ण ने शस्त्रधारियों में अपने को राम कहा जिनकी शक्ति की चर्चा करते हुए तुलसीदास लिखते हैं कि- सौरज, धीरज,जेहि रथ चाका सत्यशील दृढ ध्वजा पताका । वस्तुतः सम्पूर्ण नागरिक समाज को सैन्य प्रवृत्ति से भर देना और उसे धर्म के साथ जोड देना एक पागलपन है । इस पागलपन से जब दुनिया आच्छादित थी तब गाँधी ने इस पागलपन के विरुद्ध मानवता की रक्षा के लिए जो शंखनाद किया नेहरु उसके वीर अहिंसक सत्याग्रही हैं और उनका भारतबोध भी उनकी इस सोच से प्रभावित है ।
नेहरु अहिंसक सत्याग्रही होने के बाद भी क्रान्तिकारियों का हर संभव पक्ष लेते थे और क्रान्तिकारियों में भी उनका ऊँचा सम्मान था। इस तथ्य को अनेक उदाहरणों के माध्यम से सिद्ध किया जा सकता है, परन्तु उनमें से तीन का उल्लेख इस सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य को उजागर करने के लिए आवश्यक है । भगतसिंह ने अपने एक लेख में नेहरु की प्रशंसा में लिखा है कि युवाओं को आज जिस बौद्धिक खुराक की जरुरत है वह नेहरु से मिलती है।15 दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आईएनए ट्रायल में नेहरु ने कोर्ट के समक्ष सैनिकों के बचाव के लिए फिर से अपने अधिवक्ता वस्त्रों को पहन लिया था और भगतसिंह के फाँसी को रुकवाने के लिए भी उन्होंने यह प्रस्ताव किया था । तीसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत में जो पहली योजना समिति बनी उसके लिए सुभाषचंद्र बोस ने नेहरु को एक मार्मिक पत्र लिखते हुए इस समिति की अध्यक्षता स्वीकार करने का निवेदन किया था ।
हिंसा के माध्यम से भारत को समझने की एक प्रवृत्ति ऐसी भी है जो जाने-अनजाने में मैक्सबेबर के द्वारा की गई उस व्याख्या का अन्धानुकरण करते हुए अपना भारतबोध बनाती है जो व्याख्या मैक्सबेबर ने पूँजीवाद से अनुकूलन के लिए प्रोटेस्टेंट इथिक्स की अपनी पुस्तक प्रोटेस्टेंट इथिक्स एंड द राइज ऑफ कैपिटलिज्म में की है । इस पुस्तक में प्रोटेस्टेंट मत की उन वैज्ञानिकताओं को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जो पूँजीवाद के विकास के लिए सहायक रही हैं। यह धर्म की कोई आध्यात्मिक, मानवीय या नैतिक व्याख्या नहीं है, न ही इसमें समग्र रूप से समग्र ईसाइयत का इतिहासबोध सम्मिलित है। यह व्याख्या उस डिसइनचिंमेंट के औचित्य को सिद्ध करने की व्याख्या है जो पश्चिमी ज्ञानोदय दिखाया था । किन्तु भारत में जब इस दृष्टि से भारतबोध की चर्चा होती है तब यदि आज के प्रसिद्ध नेताओं की शब्दावली में कहें, तो माता सीता क्लोन बेबी बन जाती हैं और संजय इन्टरनेट के माध्यम से कुरुक्षेत्र का हाल सुना रहे होते हैं तथा गणेश के धड पर हस्ती का शिर शल्यचिकित्सा द्वारा लगा दिया जाता है। वास्तव में इस तरह का भारतबोध वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता को एक ही तराजू के दो पलडे ही नहीं बनाता है, बल्कि आध्यात्मिकता को वैज्ञानिकता का अनुगामी बना देता है। नेहरु इस प्रवृत्ति के दोषों से वाकिफ ही नहीं थे, बल्कि इसे सही वैज्ञानिक चेतना भी नहीं मानते थे ।
1.2 धर्मनिरपेक्षता और नेहरु का भारतबोध
जवाहरलाल नेहरु विज्ञान की आवश्यकता और महत्त्व को खासकर विकासात्मक कार्यों में इसकी भूमिका को अपने अनेक समकालिकों की अपेक्षा बेहतर तरीके से समझते थे। परन्तु विज्ञान की सीमाओं और आध्यात्मिकता के महत्त्व को उन्होंने कभी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया था । वे साफ - साफ लिखते हैं कि धर्म का जिस तरह से, यहाँ तक कि चिंतनशील मनुष्यों के द्वारा भी व्यहार किया जाता है चाहे वह हिन्दू हो, मुस्लिम हो, इसाई हो या बौद्ध हो ; उन्हें आकर्षित नहीं करता है।16 आज सहसा ही नेहरु के इस विचार को इस तरह से प्रचारित करने का एक बडा जनमानस बना हुआ है जो इस कथन का उपयोग नेहरु को धर्म विरोधी साबित करने में आसानी से इस्तेमाल में ला सकता है । परन्तु अगली ही पंक्ति में नेहरु लिखते हैं कि अधिकांश लोग धर्म के नाम पर अंधविश्वास और रूढि का इस तरह से पालन करते हैं कि जैसे उनके जीवन की समस्याओं का अंत विज्ञान में न होकर किसी मैजिक में हो।17 उन परिस्थितियों में नेहरु के लिए अंधविश्वास और रूढीगत मान्यताओं के आधार पर देश का राजनितिक मन तैयार करना अधिक आसान था। परन्तु नेहरु एक राष्ट्रवादी थे और वे सदैव देश हित को पार्टी हित से ऊपर रखते थे। इसीलिए उन्होंने जोखिमभरा कदम उठाया और यह जानते हुए भी कि अंधविश्वास और रूढिगत मान्यताओं को तोडने से जनाधार कम हो सकता है, वे निरंतर वैज्ञानिक चेतना के प्रसार और संस्थाओं के निर्माण में लगे रहे।
डिस्कवरी ऑफ इण्डिया के अंत में नेहरू भारत के पराभव की प्राचीन समस्या के निदान हेतु आधुनिक दृष्टिकोण की चर्चा करते हैं। जहाँ वे मानवतावाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण में बढते हुए तालमेल को युगधर्म कहते हैं। वह युग धर्म वैज्ञानिक मानवतावाद का युगधर्म है और उसी युगधर्म में नेहरू भारत का नवनिर्माण करना चाहते हैं। प्रोफेसर अल्बर्ट आंइस्टीन को उद्धृत करते हुए नेहरू लिखते हैं कि आज के भौतिकवादी युग में गंभीर वैज्ञानिक खोजकर्ता ही असली धार्मिक लोग हैं।18 ठीक ऐसी ही उक्ति स्वामी विवेकानंद की भी है जिन्होनें डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखे जाने के लगभग 50 वर्ष पूर्व कहा था कि आधुनिक विज्ञान वास्तविक धार्मिक चेतना है।19 नेहरु की धर्मनिरपेक्षता को पश्चिम की धर्मनिरपेक्षता से अलग करके देखना आवश्यक है और इसके लिए भी हमें प्राचीन भारत का उद्धरण लेना आवश्यक है। भारत में धर्म की अंतिम व्याख्या का अधिकार मनुस्मृति, अर्थशास्त्र और कामंदक नीतिसार, शुक्रनीतिसार या शांतिपर्व में राजा को दिया गया है। नेहरु भी उसी परम्परा को भारतीय संविधान के माध्यम से जीवित रखते हैं । धर्मनिरपेक्षता की यह भी परिभाषा की जाती है कि धर्म की व्यख्या का अंतिम अधिकार राज्य को ही होना चाहिए और इस अर्थ में नेहरु का भारतबोध सनातन परम्परा की नीति का पालन करते हुए ही धर्मनिरपेक्ष कलेवर प्राप्त करता है । धर्मनिरपेक्षता की दूसरी मान्यता यह होती है कि राज्य को किसी धार्मिक मान्यता को इस तरह से प्रश्रय नहीं देना चाहिए कि इससे दूसरे धर्मावलम्बियों के धार्मिक विश्वास को नुकसान पहुँचे ।
सनातन परम्परा के इतिहास में किसी थियोक्रेटिक स्टेट का उल्लेख नहीं मिलता है जिसने किसी धर्म को राज्य धर्म के रूप में मान्यता दी हो । यहाँ हमेशा से सभी लोगों को अंतःकरण की स्वतंत्रता प्राप्त रही है और नेहरु ने इस भारतबोध को उस भारतीय संविधान के माध्यम से बचाए रखा जिसका उद्देश्य प्रस्ताव उन्होंने संविधानसभा में प्रस्तुत किया था। धर्मनिरपेक्षता की तीसरी मान्यता यह होती है कि किसी भी व्यक्ति या समूह को अंतरसांप्रदायिक और अंतरासांप्रदायिक शोषण का अधिकार नहीं होना चाहिए। वस्तुतः भारतवर्ष ने इस तरह के शोषण का सदैव विरोध ही नहीं किया है, बल्कि ऐसे शोषण से ग्रस्त लोगों का बचाव भी किया है। इसी कारण भारत में अनेक मतों को फलने-फूलने का अवसर मिला है, फिर चाहे वह देशी मत हों या विदेशी मत हों । भारत के इस पहचान पर शंकराचार्य को भी गर्व है और वे शिवमहिमन स्तोत्र में लिखते भी हैं कि - रुचिर्नामवैचित्र्यम दृजुकुटिलनाना पथजुषाम ।
नेहरु ने समझा कि भारत के इस थाती को एक हिन्दू राज्य बनकर हासिल नहीं किया जा सकता है इसीलिए वे एक हिन्दू राष्ट्र को हिन्दू राज्य बनाए जाने के समर्थक नहीं थे। नेहरु के इस नीति की हरसंभव आलोचना की जाती है। विशेषकर यह सवाल किए जाते हैं कि धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर देश का विभाजन हो जाने के बाद जब पाकिस्तान एक इस्लामिक राज्य बन गया तब भारत को भी हिन्दू राज्य न बनाकर नेहरु ने ऐतिहासिक भूल की । यह आक्षेप, इसकी भाषा और इस आक्षेप का समय कुछ इस प्रकृति के हैं कि सामान्य जनमानस को शीघ्रता से आकर्षित करते हैं । साथ ही इसका राजनीतिकरण कुछ ऐसे तरीके से कर देना बडा आसान होता है कि यह भारत के सभी समस्याओं की जड है और इनसे मुक्ति तभी संभव है जब भारत एक हिन्दू राज्य बन जाए। इस आक्षेप में अवधारणात्मक समझ, सनातन भारतबोध और समुचित विश्वदृष्टि का अभाव है । इस आक्षेप के मूल में यह तर्क होता है कि राष्ट्र और राज्य एक ही इकाई हैं और राज्य संगठन का आधार यदि समजातीय समाज हो तब राज्य शक्तिशाली होता है । इस तर्क के भीतर जिस तरह का राष्ट्रवाद काम कर रहा होता है वह एथनिक नेशनलिज्म होता है जो अपने को मिलिट्राइज्ड करने में रूचि रखती है। नेहरु नागरिक चरित्र को सैन्य चरित्र में बदलने के दुष्प्रभाव से परिचित थे। उन्हें पता था कि सुरक्षा का प्रश्न अब राज्य की क्षमता का प्रश्न है और इसमें सम्पूर्ण समाज को मध्ययुगीन भय दिखाकर उसे सुरक्षा डायलेमा में धकेल देने की जरुरत नहीं है। इसीकारण समाज का सैन्य चरित्र अब बीते दिनों की बात हो रही है और आने वाले समय में समाज का सैन्य चरित्र स्वयं राज्य के लिए ही घातक बनने वाला है। वे यह भी देख रहे थे कि सिविक नेशनलिज्म की धारा पर चलते हुए दुनिया के अनेक राष्ट्रों ने ऊँचे मुकाम ही हासिल नहीं किए हैं बल्कि यही धारा आने वाली कल की पटकथा भी लिखनेवाली है।
जवाहरलाल नेहरु यह भी समझते थे कि सनातन धर्म उस अर्थ में धर्म नहीं है जिस अर्थ में अब्राह्मिक परम्परा के धर्म गिने जाते हैं । ऐसी स्थिति में राज्य का धर्म किसी एक धार्मिक पुस्तक या एक पंथ में खोजने का विचार सनातन परम्परा के बहुलतावादी स्वरूप और लोकतांत्रिक स्वरुप को नष्ट कर देगा। क्योंकि यह विचार एकचालकानुवर्ती होने की माँग करता है और इसमें उसी तरह के तानाशाही के बीज छिपे हुए हैं जैसी तानाशाही का परिचय यूरोप में एंटीसेमेटिज्म20 की मुहीम में देखा गया था। नेहरु समझते थे कि भारत में सनातन परम्परा के अनुरूप राज्य का एक ही धर्म हो सकता है और वह है लोककल्याण। राज्य के इस धर्म की स्थापना नेहरु ने विधि के शासन, विधि के समक्ष समानता, अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता,जीवन का अधिकार और सबसे बढकर शोषण के विरुद्ध अधिकार को आम नागरिकों के लिए प्रत्याभूत करके किया। आज के समय में यह आश्चर्यजनक और हास्यास्पद लगता है कि राज्य के लोकतान्त्रिक चरित्र का गला घोटने में लगे लोग भी नेहरु की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि नेहरु ने राज्य के धर्म को सुनिश्चित नहीं करके अंग्रेजियत और यूरोपीय चरित्र का परिचय दिया । इस राजनीतिक रूप से दुराग्रही मत में धर्म की समझ और उसमें राज्य की भूमिका को ठीक से नहीं समझा गया है । वस्तुतः धर्म का राजनीतीकरण धर्म सापेक्षता नहीं है यह साम्प्रदायिकता है।
राज्य का वास्तविक धर्म प्रजा पालन है और नेहरु ने जिस राज्य व्यवस्था की स्थापना की वह इस दृष्टि से मनु,कौटिल्य, भीष्म की परम्परा के राजधर्म को पालन करने वाले राज्य के चरित्र ही उद्घाटित करता है । इन सनातन ऋषियों ने कभी यह सुझाव नहीं दिया है कि शत्रु से मुकाबला करने के लिए शत्रु के ही गुण-धर्म को अपना लिया जाए। पाकिस्तान के इस्लामिक राज्य बन जाने पर भारत भी एक हिन्दू राज्य बना दिया जाए यह तर्क जवाहरलाल नेहरु को इस नाते भी स्वीकार्य नहीं था कि तर्क में शत्रु से मुकाबला करने के लिए शत्रु के ही गुण-धर्म को अपना लेने की प्रतिध्वनि सन्निहित है । जबकि, गीता तक में यह कहा गया है कि - श्रेयान्स्वधर्मों विगुणः परधर्मों भयावहः। नेहरु ने इसी गीता के निर्देश का पालन किया और हिन्दू परम्परा के राजधर्म लोककल्याण को राज्य का धर्म बनाया, जिसमें धार्मिक सहस्तित्त्व का समावेश था । नेहरु भारत में सांप्रदायिक समस्या को हल करने के लिए न तो हिन्दुओं के भारत पर इनटाइटलमेंट को स्वीकार करते थे और न ही मुसलमानों के । वे इस समस्या को सामाजिक से अधिक आर्थिक स्वरुप का मानते थे और इसको बढाने में उपनिवेशवाद की भूमिका को भी रेखांकित करते थे।21 उनका विश्वास था कि आर्थिक समृद्धि और आधुनिकता से इस समस्या का हल संभव है। नेहरु की इस दृष्टि को भारत के सम्प्रदायवाद को समझने के लिए अति सरलीकृत विश्लेषण कहा जाता है। परन्तु, ऐसा करते हुए इस बात की उपेक्षा की जाती है कि हिन्दुओं के भारत पर इनटाइटलमेंट को स्वीकार करने के विचार में भी मूल निवासी हिन्दू और विदेशी आक्रान्ता हिन्दू के बीच क मतभेद आडे आता है जिसकी एक छोर पर सावरकर और दूसरे छोर पर फुले संवादहीन दशा में खडे मिलते हैं। वस्तुतः नेहरु अर्नेस्ट रैनन के इस कथन से सहमत दिखाई पडते हैं कि राष्ट्रवाद की उत्पत्ति अतीत को याद रखने से ही नहीं होती है, बल्कि इसके लिए अतीत को भूलना भी पडता है।22 आज भी नेहरु का यह मत उतना ही प्रासंगिक है जितना कि यह तब था और भारत में यह दोनों समुदायों के हित में है कि उन्हें अतीत के घावों को कुरेदने से बचाना जाना चाहिए ।
1.3 जन-गण की क्षमता में विश्वास
नेहरु ने जिस स्वतंत्र भारत का नेतृत्त्व किया उसका पहला बजट 400 करोड रूपये से भी कम था। परन्तु नेहरु ने एक दशक के भीतर ही भारत को दुनिया में सबसे तीव्र गति से विकसित हो रहे राष्ट्रों की श्रेणी में लाकर खडा कर दिया था। उन्हें विवेकानंद की तरह उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधात पर विश्वास था। यह विश्वास उनमें अपने नेतृत्त्व में दिव्यता का झूठा दिखावा करके नहीं आया था, बल्कि यह विश्वास जन-गण की क्षमता में विश्वास की वजह से प्रस्फुटित हुआ था । नेहरु के इस विश्वास की झलक 1857 के विद्रोह में जनता की सहभागिता पर उनकी टिप्पणियों, गाँधी के नेतृत्त्व में समूचे देश की जनता में उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन में निहत्थे संघर्ष और सुदूर अतीत की उपलब्धियों के वर्णन में मिलता है।23 एक औपनिवेशिक भारत को एक गणतंत्रीय भारत बनाने में नेहरु जनता के प्रति इस विश्वास के कारण ही अपने धुर विरोधियों को भी अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने से नहीं हिचकते थे और भारतीयों में व्याप्त जातिगत,भाषागत और क्षेत्रगत तथा पंथगत मतभेदों को कम से कम करने के हिमायती थे। राज्यसभा में उन्होंने कहा था कि पंचायती राज में जो चुनकर आएँगे संभव है कि वे आपस में लडें किन्तु यह एक क्रांतिकारी कदम है और इससे उनमें उतरदायित्व की भावना का भी विकास होगा और आम लोगों में इससे आत्मसम्मान बढेगा।24 उन्होंने यह भी कहा कि पंचायतों में या सदन में लोगों को उस तरह से व्यहार नहीं करना चाहिए जैसा कि वे अमूमन करते हैं, बल्कि उन्हें यह सोचकर व्यवहार करना चाहिए कि हजारों - लाखों आँखें उन्हें उम्मीद से देख रही हैं और उनका व्यवहार इस तरह से अनुशासित और शालीन होना चाहिए कि लोग उनका अनुकरण करें।25 पंचायती राज को लेकर नेहरु के जो विचार थे वे सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में आम जनता की भागीदारी और उनमें गाँवों को शामिल करने तक ही सीमित नहीं थे, अपितु इसमें एक भारतबोध भी था जो नेहरु के चिंतन में प्राचीन भारतीय गणराज्यों की कार्यपद्धति की विशिष्टता को समझकर विकसित हुआ था।26
1.4 साध्य - साधन विवेक और नेहरु का भारबोध
भारत की ऋषि परम्परा साध्य - साधन का विवेक का परिचय देती है और गाँधी ने इसी विवेक का परिचय देते हुए भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को मानव मुक्ति का आन्दोलन बना दिया था। एक सच्चे गाँधीवादी होने के नाते नेहरु का भारतबोध भी इस सनातन थाती को लेकर चलता है । राजनीतिक शुचिता भारत के सभी चक्रवर्ती सम्राटों की आधारभूत विशिष्टता रही है और नेहरु ने भी एक आधुनिक लोकतंत्र के निर्माण का प्रयत्न करते हुए इस विशिष्टता को बनाए रखा। आज के समय में सत्ता प्राप्ति के लिए सबकुछ जायज है का तर्क उपस्थित करने वाले जब अपने को राम का सच्चा वारिस भी कहते हैं, तब वे अवश्य ही राम के नाम को कलंकित भी कर रहे होते हैं । नेहरु भारत की पवित्र नदियों, त्यौहारों एवं ग्रंथों के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे किन्तु इन्हें वोट प्राप्ति के लिए साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं करते थे । नेहरु माओ के इस कथन से असहमत थे कि सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है । माओ जब कहते हैं कि राजनीति रक्त रहित युद्ध है और युद्ध रक्तयुक्त राजनीति है, तब वस्तुतः माओ राजनीति में शक्ति की अवधारणा को हिंसा के समर्थन में बदल देते हैं । राजनीति में भाग लेने के लिए सैन्य दक्षता का समर्थन करते हुए भी माओ ने युद्ध और राजनीति की एकता को स्थापित किया है।27 राजनीति का यह स्वरुप मैकियावेली की ही तरह राजनीति में साध्य- साधन विवेक का निषेध करता है और राजनीति में राजनीति में साध्य- साधन विवेक का निषेध करना तानाशाही को आमंत्रित करना है । नेहरु एक तानाशाही के खिलाफ अहिंसक लडाई लडते हुए अधिकाश जीवन बिता चुके थे, जिनमें वे लगभग नौ वर्ष जेल की सलाखों के पीछे भी रहे, किन्तु साध्य- साधन विवेक का परित्याग नहीं किया। नेहरु राजनीति की उस सनातन परिभाषा के संवाहक थे जिसे हन्ना आरेंट कर्म से जोडती हैं28 और जिसे आकशाट मित्र बनाने की कला कहते हैं।29 भारत में जिस कौटिल्य को बहुधा यथार्थवादी कहा जाता है उस कौटिल्य ने भी राजनीति का आदर्श यह कहते हुए प्रस्तुत किया है -
सर्वेषामहिंसासत्यंशौचमनसूयानृशंस्यंक्षमाच।30
नेहरु की राजनीति में साध्य- साधन विवेक का विचार इन सभी धाराओं से परिचित होने के साथ -साथ आधुनिकता के प्रति उनकी समालोचनातम्क समझ पर भी आधारित है । वे आधुनिकता के अंध समर्थक नहीं थे और पूँजीवाद, उपनिवेशवाद तथा आधुनिकता के अशुभ गठजोड को समझते थे जिसने मनुष्य का समाज से, प्रकृति से और स्वयं अपने आप से सार्थक संबंध को तोड दिया था । नेहरु अपनी रचनात्मक राजनीति के द्वारा उस संबंध को भारत में और पूरी दुनिया में फिर से स्थापित करना चाहते थे और उनकी यह सोच उनके सच्चे भारतबोध को प्रदर्शित करती है ।
सन्दर्भ
1. देखें, सर जॉन स्ट्रेची का 1888 में कैंब्रिज स्नातकों को दिया गया भाषण, सुमित सरकार (1989), मॉडर्न इंडिया 1885-1947, न्यू यॉर्क, पालग्रेव मैकमिलन, पृष्ठ,2.
2. जवाहरलाल नेहरु (1985), द डिस्कवरी ऑफ इंडिया, नई दिल्ली, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ,18-19.
3. रामधारी सिंह दिनकर (2009), संस्कृति के चार अध्याय, इलाहबाद, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ, 514.
4. जवाहरलाल नेहरु (1985), द डिस्कवरी ऑफ इंडिया, नई दिल्ली, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ, 50.
5. बेनेडिक्ट एंडरसन (2006), इमेजिंड कम्युनिटीज, रेफ्लेक्संस ओन ओरिजिन एंड स्प्रेड ऑफ नैस्नालिज्म, जयपुर, रावत पब्लिकेशन
6. विवेकानंद (2006), ओन हिमसेल्फ, नई दिल्ली, अद्वैत आश्रम, पृष्ठ, 45.
7. विनायक दामोदर सावरकर (1969), हिंदुत्व, मुंबई, वीर सावरकर प्रकाशन, पृष्ठ, 1-8.
8. ज्योतिबा फुले (1982), ज्योतिबा फुले समग्र वांग्मय (मराठी), संपादक धनञ्जय कीर एवं जी टी माशले, मुंबई, महाराष्ट्र सरकार, पृष्ठ, 154-57.
9. विस्तृत अध्ययन के लिए देखें, एडवर्ड सईद (2001), ओरिएंटलिज्मः वेस्टर्न कांसेपशंस ऑफ द ओरिएंट, नई दिल्ली, पेंगिन इण्डिया.
10. रुत्खेर बर्गमान (2021), ह्यूमनकाइंडः अ होफल हिस्ट्री, न्यूयार्क,ब्लूम्सबेरी पब्लिकेशन, पृष्ठ, 4-20.
11. ज्योतिबा फुले, पूर्वोक्त.
12. जवाहरलाल नेहरु (1985), द डिस्कवरी ऑफ इंडिया, नई दिल्ली, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ, 72.
13. जवाहरलाल नेहरु, वही, पृष्ठ, 75.
14. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (2018), हिन्दू वे ऑफ लाइफ, नई दिल्ली : हार्पर एण्ड कालिन्स पब्लिशर्स, पृष्ठ, 22.
15. भगतसिंह (1928), नए नेताओं के अलग-अलग विचार, कीर्ति, जुलाई, अंतर्गत इरफान हबीब (2016), लिगेसी ऑफ द फ्रीडम स्ट्रगलः नेहरुज साइन्टिफिक एंड कल्चरल विजन,सोशल साइन्टिस्ट, भाग-44,अंक,3-4, पृष्ठ,34.
16. जवाहरलाल नेहरु, वही, पृष्ठ, 26.
17. पूर्वोक्त 7
18. जवाहरलाल नेहरु, वही, पृष्ठ, 558.
19. पूर्वोक्त 7
20. इस विषय पर विस्तार से जानकारी के लिए देखें, अम्बिकादत्त शर्मा एवं विश्वनाथ मिश्र (2021), हन्ना आरेंटः हिंसा का उत्खनन, जयपुर, प्राकृत भारती अकादमी.
21. विपिन चन्द्र (2021), कम्युनलिज्म इन मॉडर्न इण्डिया, नई दिल्ली, हरआनंद पब्लिकेशन, पृष्ठ,271.
22. अतीत को भुलाने से राष्ट्रवाद की उत्पति होती है राष्ट्रवाद साथ रहने का प्रतिदिन का जनमत संग्रह है7 रैनन के इस विचार को देखें -https://www.humanityinaction.org/files/569-E.Renan-what is a nation.pdf 9 मई 2019 को देखा गया.
23. जवाहरलाल नेहरु, वही, पृष्ठ, 57.
24. सुदर्शन अग्रवाल, (1989), जवाहरलाल नेहरु एंड राज्य सभा, नई दिल्ली, प्रेन्टिसहाल ऑफ इण्डिया, पृष्ठ, 59,
25. पूर्वोक्त, पृष्ठ,23.
26. जवाहरलाल नेहरु, वही, पृष्ठ, 98-104.
27. माओत्से तुंग (1965), सेलेक्टेड वक्र्स, भाग-1, पेकिंग, फारेन लैंग्वेजेज प्रेस, पृष्ठ, 105-106.
28. हन्ना आरेंट (1998), द ह्युमन कंडीशन, शिकागो, द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो प्रेस, पृष्ठ, 6-7.
29. माइकल आकशाट (1962), रेशनलिज्म इन पॉलिटिक्स एंड अदर एशेज, लन्दन, मेथ्यू, पृष्ठ, 127.
30. कौटिल्य (2000), अर्थशास्त्रं, वाचस्पति गैरोला द्वारा संपादित, वाराणसी, चौखम्भा विद्या भवन, पृष्ठ, 11.

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