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अम्बेडकर की नजर में भारतीय विविधता और विरोधाभास

संजय जोठे
प्रस्तावना :
भारतीय समाज के में रची-बसी विविधता और इसके विविध आयामों में रचे बसे विरोधाभासों को समझना इतिहास, समाजशास्त्र, भाषाशास्त्र और प्राच्य विद्या सहित दर्शन, राजनीति और प्रबंधन के अध्येताओं के लिए भी एक दुरूह कार्य है। यह दुरूहता नये शोधों के आलोक में नए तथ्यों के उद्घाटन के साथ कम होती प्रतीत नहीं होती, बल्कि परस्पर विरोधी व्याख्याओं का भण्डार और अधिक बढता जा रहा है। इस बढते उलझाव के बीच वर्तमान और भविष्य को समझ पाने के लिए इतिहास की सुसंगत व्याख्या करने का भारी प्रयास जारी है जो भारत को समझने समझाने में रूचि रखने वाले ज्ञान के सभी आयामों के अध्येताओं के लिए एक पसंदीदा प्रोजेक्ट बन चुका है। इस उलझाव को बढाने वाली विभिन्न विचार सरणियों की अंतःक्रियाओं को समझना और उनके बीच चल रहे संघर्ष और संवाद को जानना एक अन्य महत्त्वपूर्ण आयाम है जो प्राच्यविद्या के आधुनिक अध्येताओं ने बहुत सावधानी से विकसित किया है। वर्तमान भारत में प्रचलित धार्मिक दार्शनिक या सामाजिक सांस्कृतिक विचारधाराओं के स्त्रोत या मूल चरित्र सहित उनके संभावित भविष्य का अनुमान करने के लिए अब उन परिस्थितियों का आकलन कहीं अधिक सावधानी से किया जा रहा है जिन परिस्थितियों में विभिन्न विचारधाराओं का जन्म और विकास हुआ था।
विचारधाराओं के उद्गम एवं इतिहास के किसी विशेष बिंदु पर उनके स्वरूप विशेष के प्रति सही जानकारी होने का दावा करने की सुविधा न पहले थी न ही आज है और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना है। यही इतिहास, धर्म, दर्शन और समाज जैसे विषयों में ज्ञान की खोज के प्रयासों की विशेषता है और विवशता भी है। इस विवशता का सम्मान करना सभी ज्ञान पिपासुओं का कर्त्तव्य है और इसी स्वीकार से नवीन विमर्शों और खोजों की संभावना निर्मित होती है। इस प्रतीति को आधार बनाते हुए अगर हम भारत के ज्ञात इतिहास में विभिन्न कालखण्डों में परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच चल रहे संघर्ष और संवाद का अध्ययन करते हैं, तो हमें भारत के एतिहासिक क्रमविकास का अनुमान स्पष्ट होता है। भारत को एक विचारधारा या एक संस्कृति विशेष के नजरिये से देखने की भूल अक्सर की जाती रही है और इसके अपने राजनीतिक कारण और परिणाम रहे हैं। ऐसे में विशेष रूप से आज जबकि सूचना क्रान्ति के दौर में प्रत्येक सूचना एक आग्रह बन सकती है और प्रत्येक आग्रह एक सूचना बन सकती है,परस्पर विरोधी विचारधाराओं को एकसाथ संगत पृष्ठभूमि में रखकर देखने की आवश्यकता बढती जा रही है।
भारत के ऐतिहासिक क्रमविकास की बात करते हुए अक्सर कोलोनियल पीरियड की बारीक जाँच पडताल की जाती है। चूँकि इसके लिए पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं इसलिए यह आसान भी है। वर्तमान के दक्षिणपंथ से सहानुभूति रखने वालों के लिए एवं सहानुभूति न रखने वालों के लिए भी यह यह खोज अधिकाधिक महत्त्वपूर्ण बनती जा रही है। इस दौर में पश्चिमी आधुनिकता और भारतीय पारम्परिक जीवन व्यवस्था के संघर्षों और आंशिक सहकार से के बीच जो नवीन रचनाएँ उभर रही थीं उनका उनकी संगत पृष्ठभूमियों में अध्ययन करना आवश्यक भी है। एक तरफ सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध जैसी कुरीतियों पर भारतीय मूल के विचारक और सुधारक प्रहार कर रहे थे, वहीँ दूसरी तरफ इस्लाम और इसाइयत के प्रभाव में आकर सदा से अस्पृश्य एवं अपमानित बनाई गई भारतीय जातियों में सामाजिक गतिशीलता बढ रही थी। इस गतिशीलता से रुढिवादी वर्णाश्रम-वादी तबका बहुत आतंकित और भयभीत था। यह वर्णाश्रम धर्म की मान्यताओं और व्यवस्था के लिए एक भयानक काल था(taneti 2013)।
इस समय में पारम्परिक वर्णाश्रम-वादी चिन्तक एक अन्य कारण से भी चिंतित और भयभीत थे। चूँकि इसी समय में वर्तमान में प्रचलित हिन्दू धर्म का जन्म हो रहा था इस नए और असुरक्षित धर्म को इसके पूर्ववर्ती अवतार वर्णाश्रम धर्म की गलतियों से मुक्त करने के लिए किसी अन्य पर सभी दोष थोपने जरूरी था। इन कारणों से कोलोनियल पीरियड का विश्लेषण ज्ञान के सभी आयामों में एक पसंदीदा प्रोजेक्ट बन गया है। इसी के साथ तुर्क और मुगल आक्रमणों से उपजे बदलाव और उनके सामाजिक आर्थिक धार्मिक परिणाम भी पसंदीदा विषय रहे हैं। इन विश्लेषणों में भी आजकल जो प्रवृत्ति नजर आ रही है वह यह है कि वर्तमान भारतीय समाज मे जो खराबियाँ आई हैं वे तुर्क, मुगल और ब्रिटिश काल की देन हैं। यह बात बहुत दूर तक सही भी है। हर नई सत्ता समाज मे भारी बदलाव लाती है और ये बदलाव अच्छे और बुरे दोनो तरह के हो सकते हैं।
समस्या वहाँ खडी होती है जब हम ब्राह्मणों द्वारा किए गए बदलावों को अपने सामाजिक धार्मिक राजनीतिक विश्लेषण का विषय बनाने से झिझकते हैं। यह झिझक इसलिए भी आश्चर्यचकित और निराश करती है कि प्राचीन भाषाओं के अध्ययन और प्राच्यविद्या के अधिकांश अध्ययन आर्य ब्राह्मण संस्कृति के भारत में प्रवेश के बाद आए कई सारे बदलावों का लेखा-जोखा देते हैं (Bronkhorst 2011)। तुर्कों और मुगलों सहित ब्रिटिशों ने जिस तरह का बदलाव आधुनिक भारत मे किया है उसी तरह का या उससे भी बडा बदलाव ब्राह्मणों ने प्राचीन और मध्यकालीन भारत मे किया है। जब हम इस तरह की बात करते हैं तो यह प्रतीत होता है कि हम आर्य आक्रमण या आर्य माइग्रेशन की बात कर रहे हैं। आक्रमण या माइग्रेशन में क्या सही था यह एक ऐसा विषय है जिस पर आधुनिक जेनेटिक्स ने कुछ निर्णायक उत्तर दिए हैं। इन उत्तरों के प्रकाश में हम प्राचीन भारत मे ब्राह्मणों द्वारा अपने भीतर रक्तशुद्धि को नियंत्रित करने के लिए जाति आधारित विवाहों की व्यवस्था को समझ सकते हैं। यही व्यवस्था फिर अन्य वर्णों और जातियों द्वारा अपना ली जाती है और भारत के समाज की सबसे दुर्निवार और पैशाचिक सामाजिक धार्मिक व्यवस्था का जन्म होता है।
उपनिवेशकालीन भारत और तुर्क-मुगल कालीन भारत में हुए सामाजिक धार्मिक बदलावों से भी पीछे जाते हुए अगर उस युग में प्रवेश करें जहाँ ब्राह्मण संस्कृति पहली बार भारत की मूल श्रमण संस्कृति की तरफ बढ रही थी तो हमें हमारे ज्ञात इतिहास को ही नहीं वर्तमान को भी समझने में मदद मिल सकती है। बीती दो तीन शताब्दियों में प्राच्य-विद्या विशेषज्ञों ने भाषाशास्त्रीय, भूगर्भ शास्त्रीय, ऐतिहासिक और धर्मशास्त्रीय अध्ययनों से जिस तरह के तथ्यों और रुझानों को प्रकाशित किया है उनके आलोक में भारत की एतिहासिक विकास यात्रा के कुछ अनछुए पहलू सामने आते हैं। इन उद्घाटनों को समझा जाए तो हम देखते हैं कि हमारे वर्तमान की व्याख्या की जा सकती है। एक खास किस्म के राजसत्ता, ईश्वर सत्ता और पुरुष सत्ता प्रधान समाज के रूप में उभर रहे भारत का मूल चरित्र समझने के लिए हमें इन तीनों कालखण्डों की प्रतिनिधि विशेषताओं में झाँकना होगा। इन कालखण्डों में झाँकने से पहले हमारे लिए यह जानना भी उचित होगा कि इन तीनों कालखण्डों में प्रवाहित होती आई प्रवृत्तियों के परिणाम में आज जो भारत निर्मित हुआ है, उस भारत में आज के समय में उन्ही प्राचीन प्रवृत्तियों के अनुकूल बुने जा रहे राष्ट्रवाद के प्रस्तोता और समर्थक क्या सोच रहे हैं।
आधुनिक भारत के सामाजिक सांस्कृतिक विरोधाभास :
आधुनिक भारत मे पर्दा प्रथा, दहेज, बेगार, कन्या भ*ूण हत्या आदि समस्याओं की व्याख्या खोजते हुए कई विद्वान तुर्क मुगल और ब्रिटिश काल मे जाते हैं और कई सारे ऐतिहासिक कारण भी खोज लेते हैं। कुछ आधुनिक विद्वान् जो आजकल भारत की संस्कृति और धर्म सहित ज्ञान-विज्ञान और इतिहास की व्याख्या को आमूल चूल रूप से बदलने में लगे हुए हैं वे इस ज्ञात इतिहास में जन्मी कई सारी प्रवृत्तियों को ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेस का नाम भी देते हैं (Malhotra 2011)। ऐसे विद्वान् इस दौर की प्रवृत्तियों को एक विशेष ढंग से देखने-दिखाने का आग्रह करते हुए राष्ट्र, राष्ट्रवाद और धार्मिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नवीन प्रस्तावनाएँ भी निर्मित कर रहे हैं। इतिहास में इस तरह से खोजना और विश्लेषण करना समाजशास्त्रीय खोज के अर्थों में उचित भी हो सकता है। हर दौर की हर सत्ता का एक खास चरित्र होता है उसकी विशिष्ट जीवन दृष्टि और रुझान होते हैं जो तत्कालीन समाज व्यवस्था को ही नहीं, बल्कि उस समाज की नैतिकता को भी परिभाषित करती है।
उदाहरण के लिए आदि शंकर के दौर में जब इस्लाम का भारत मे प्रवेश भी नहीं हुआ था और जब यूरोप बर्बर अवस्था मे था, तब भारत के वर्णाश्रम धर्म ने चाण्डालों और शूद्रों के लिए शिक्षा वर्जित कर दी थी। तत्कालीन समाज की नैतिकता जो कि वेदों पर आधारित थी, उस नैतिकता की दृष्टि से एक चाण्डाल के सामने आ जाने पर उसे मार्ग से हटा देना या अपमानित करके भगा देना सर्वथा नीतिसम्मत और धर्मसम्मत कार्य था क्योंकि यही उस समाज की नीति और धर्म था। इसी तरह दक्षिण में हजारों शूद्र और अतिशूद्र स्त्रियों के स्तन ढँकने के अधिकार छीन लेना या लाखों शूद्रों के सडक पर चलने का अधिकार न देना भी तत्कालीन धर्म और नैतिकता की दृष्टि से एकदम वैध ठहराया गया था।
निश्चित ही आज के भारत मे जबकि संविधान और कानून का प्रभाव है और चूँकि ये संविधान भी मूलतः यूरोपीय पुनर्जागरण के बाद आई आधुनिकता की प्रेरणा से निर्मित हुआ है इस कारण आज के भारत की नैतिक समझ प्राचीन भारत या मध्यकालीन भारत से भिन्न है। इस भिन्नता को कई लोग कई तरह से देखते हैं। कईं लिबरल और प्रोग्रेसिव लोग इसे विकास की ??? देखते हैं कि भारत अपना स्वयं का मौलिक पुनर्जागरण निर्मित न कर सका, लेकिन कम से कम पश्चिमी आधुनिकता ने इसे काफी हद तक बदलकर कई अर्थों में सभ्य बना दिया है। आज शूद्रातिशूद्रों को सडकों पर चलने का अधिकार माँगने के लिये या किसी ताल से पानी पीने का अधिकार माँगने के लिए या फिर स्त्रियों को अपने स्तन ढँकने का अधिकार माँगने के लिए आंदोलन करने की जरूरत नहीं पडती है। अब भारत इतना सभ्य हो चुका है कि वर्णाश्रम धर्म के द्वारा दी गयी व्यवस्थाओं की तुलना में यूरोपीय आधुनिकता को चुनकर उस पर अमल कर सकता है। गौर से देखा जाए, तो इसी सुविधा का लाभ लेने के लिए हिन्दू धर्म ने अवतार लिया है। वर्णाश्रम धर्म या ब्राह्मण धर्म की व्यवस्थाओं या शास्त्रों में कोई मौलिक बदलाव किए बिना उसे एक नए अवतार में पेश कर देना जिसमें कि मध्यकालीन और आधुनिक श्रेष्ठताओं को एकसाथ समाविष्ट करके दिखाया जा सके और आज के समाज की कुरीतियों समस्याओं की जिम्मेदारी तुर्कों मुगलों और ब्रिटिशों पर डाली जा सके-यह उपनिवेशकालीन भारतीय सिद्धान्त-कारों का सबसे पसंदीदा एवं सबसे बडा प्रयास रहा है। बाद में हम देखते हैं कि यह प्रयास काफी हद तक सफल रहा है और इस विशाल देश की आबादी पिछली दो शताब्दियों से इस नवीन रचना के साथ एवं इस नवीन व्याख्या के प्रभाव में जीवन गुजार रही है। इस सफलता ने निश्चित ही भारत को एक तरह का स्थायित्व भी दिया है जिसकी प्रशंसा भी की जा सकती है।
इसी के साथ एक अन्य तबका भी है जो आधुनिकता के साथ आए बदलावों को आत्मसात करते हुए और वर्णाश्रम धर्म के नए अवतार हिन्दू धर्म का पालन करते हुए इस नये धर्म के नए व्याख्याकारों की व्याख्या की मौलिकता से इतना सहमत एवं सम्मोहित हो चुका है कि वह अब हिन्दू धर्म से वापस वर्णाश्रम धर्म की तरफ लौट जाना चाहता है। इस तरह की पीछे लौट जाने की प्रवृत्ति भारत ही नहीं पूरी दुनिया मे नजर आ रही है। यूरोप अमेरिका में भी आधुनिकता के नए दानों को नकारते हुए एक यूनिवर्सल तर्क और यूनिवर्सल शुभ या यूनिवर्सल नैरेटिव को नकारते हुए एक खास तरह की व्यक्तिवादी और बहुकेन्द्रीय तार्किकता की तरफ जो रुझान बन गया है, उस रुझान में जीने वाले युवा लंबे ऐतिहासिक संघर्षों से निर्मित समाज और व्यवस्था की श्रेष्ठताओं को अपने तात्कालिक असंतोषों के दबाव में दाँव पर लगा देने को तत्पर खडे हैं (Harari 2018)। इसी क्रम में दुनिया भर के समुदाय विभिन्न देशों और महाद्वीपों में अपनी विशिष्ठ अस्मिता की तलाश करते हुए एवं पिछली सदी के सभी अनुमानों को गलत साबित करते हुए आश्चर्यजनक तेजी के साथ प्राचीन धर्मों की तरफ लौट रहे हैं और पूरी दुनिया मे दक्षिणपंथ का उभार हो रहा है। यही अब हमारे सामने भारत मे भी आरंभ हो चुका है।
आधुनिक भारत मे विशेष रूप से उदारीकरण के बाद जन्मी पीढी जो अब युवा वोटर्स का सबसे बडा प्रतिशत निर्मित करती है, उसकी अपने समाज और इतिहास की समझ पर सब कुछ निर्भर हो गया है। ना केवल राजनीतिक परिणाम बल्कि सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक भविष्य भी अब उन्हीं की पसंद-नापसन्द पर निर्भर करता है ऐसे में इस पसन्द-नापसन्द को सूचना क्रांति के उपकरणों और रणनीतियों के द्वारा नियंत्रित करने वाली सत्ताओं की भूमिका इन नौजवानों की भूमिका से भी लाखों गुना अधिक महत्त्वपूर्ण हो गयी है। हमारे सामने घट रही घटनाओं, उछाले जा रहे नारों और जुमलों में हम कई शब्द खोज पा रहे हैं जिनमे लव जिहाद, गौ रक्षा, वंदे मातरम, घरवापसी, शुद्धि आदि कई नए शब्द शामिल हैं। ये शब्द सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वर्तमान में प्रचलित प्रस्तावनाओं के साथ उसी स्त्रोत से आ रहे हैं जिससे वर्णाश्रम धर्म की प्राचीन व्यवस्थाओं को पुनः लागू करने का आग्रह जन्म लेता रहा है। सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यहाँ यह है कि इस स्त्रोत को निर्मित और नियंत्रित करने वाला वर्ग असल मे एक वर्ण विशेष है और एक जाति विशेष है जिसने प्राचीन इतिहास में वर्णाश्रम धर्म को जन्म दिया था और जिसने वर्णाश्रम धर्म के आधुनिक अवतार हिन्दू धर्म को नई पहचान दिलाने का सफल प्रोजेक्ट लागू किया है (White 2014)। इतिहास को ठीक से समझे तो ज्ञात होता है कि इसी प्रोजेक्ट में व्यस्तता के कारण यह तबका भारत के स्वतंत्रता संघर्ष से स्वयं को दूर रखता आया है और आज जब साम्प्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि में एक विशेष तरह का धांर्मिक धुवीकरण हो चुका है तब दुनिया के इस सबसे नए और सबसे कमजोर धर्म में जन्मे विशिष्ट राष्ट्रवाद की चर्चा छेडने का समय आ गया प्रतीत होता है।
लोकतंत्र और तकनीक के आने की वजह से शोषित वंचित वर्ग को-जो संस्कृति, कला और समाज का प्रथम निर्माता रहा है- उसे स्वयं को अभिव्यक्त करने की और किसी तरह का चुनाव करने की स्वतंत्रता पहली बार मिली है। इस स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए वह तथाकथित मुख्यधारा द्वारा उस पर थोपी गयी अस्मिताओं से परे जाकर अपनी मूल परम्पराओं की खोज करने निकल पडा है। खोज की यह यात्रा स्वतःस्फूर्त भी रही है और अपमान और अस्वीकार से प्रेरित भी रही है। मध्यकालीन भारत में तथाकथित मुख्य धारा के धर्म और कलाओं द्वारा इस बडे तबके को उपेक्षित और अस्पृश्य बनाने की भरसक कोशिश का परिणाम भी इस अर्थ में आया है कि पृथक अस्मिताओं की खोज ने नए धर्मों और नई संस्कृतियों का वरण करना शुरू किया (Lorenzen and Muño5* 2011)। ठीक इसी समय भारत की आजादी के संघर्ष के दौरान इन पृथक अस्मिताओं ने एक खास किस्म की राजनीतिक असुरक्षाओं का निर्माण करते हुए तत्कालीन बौद्धिक अभिजात्य और शासक वर्ग के मन मे भय पैदा कर दिया।
द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में मिल रही आजादी के तुरंत बाद यह मुल्क किसके द्वारा और कैसे संचालित होगा इस चिंता ने तत्कालीन धर्मसत्ताधीशों को एक नए धर्म की रचना हेतु विवश किया। एक ऐसे धर्म की रचना हुई जिसमें अभी तक उसी धर्म द्वारा शोषित और तिरस्कृत बहुसंख्यकों को अपनी खोल के भीतर रोके रहने का प्रयास सबसे बडी प्राथमिकता बन गया था। हालाँकि यह रोके रखना और एकोमोडेट करना सिर्फ वर्णाश्रम-वादियों की राजनीतिक मजबूरी थी वे इन तिरस्कृत बहुसंख्यकों को वास्तव में किसी भी तरह का धार्मिक या कर्मकाण्डीय अधिकार नहीं देना चाहते थे। चूँकि वर्णाश्रम धर्म के सिद्धांतों को मानने वाले एवं हिन्दू कहे जाने वाले भारतीयों में सेक्ट या पंथ की परिभाषा तय करना एक दुष्कर कार्य है (Lorenzen 1972) इसे किसी इसाई सेक्ट की तरह सुधारना या सुधार का विषय बनाना भी एक कठिन काम है। इस दौर में पुराने समय की ही भाँति कुछ नए गुरुओं और उनकी समावेश का आग्रह करने वाली प्रगतिशील व्याख्याओं का जन्म हुआ। ऐसे में इन शोषित बहुसंख्यकों या बहुजनों को किसी भी प्रकार अन्य धर्मों की तरफ जाने से रोकने के लिए कल्ट गुरुओं की बाढ आ गयी। ये कल्ट गुरु वर्णाश्रम धर्म या ब्राह्मण धर्म को हिन्दू धर्म मे तेजी से रूपांतरित करने लगे। वर्णाश्रम धर्म के पास एक किताब एक प्रोफेट न होने के कारण यह स्वयं को पूरी तरह संगठित नही कर सका है इसी कारण यह इतिहास में स्वयं को पुनर्जागरण द्वारा एकमुश्त पुनराविष्कृत नहीं कर सका है यह इसकी ऐतिहासिक कमजोरी रही है, लेकिन यही कमजोरी अब इसकी ताकत बन गयी है। अब विवेकानंद, अरबिंदो घोष, ओशो रजनीश, रविशंकर और जग्गी वासुदेव जैसे कल्ट गुरु अनेकों अनेक तरह की व्याख्याएँ करते हुए वर्णाश्रम धर्म या ब्राह्मण धर्म को हिन्दू धर्म की शक्ल में निर्मित करते हुए समावेशी बनने के प्रयास में लगे हुए हैं (ङ्गद्धद्बह्लद्ग 2014)। हालाँकि सुदूर अतीत में भी यही प्रवृत्ति अन्य रूपों में देखी जा सकती है। वेदों या स्मृतियों की नवीन व्याख्या करते हुए नए संप्रदायों को जन्म देते हुए प्राचीन आचार्य भी ब्राह्मण धर्म को नवीन परिस्थितियों के अनुकूल बनाते रहे हैं और इन आचार्यों की शिक्षाओं के प्रभाव में जन्मे पुराण भारत में ठीक वही काम कर रहे हैं जो बडे बदलावों और धार्मिक क्रांतियों का सपना दिखाने वाले नायक पश्चिम में करते आए हैं।
यह रणनीति बहुत सफल रही है, आज भी भविष्य पुराण के अध्ययन से हम इस रणनीति की सफलता का प्रभाव साफ देख सकते हैं। इस पुराण में देख सकते हैं कि इस पुराण का रचयिता कोई एसा व्यक्ति है जो ब्रिटिश भारत की वास्तविकता का एक भविष्य के रूप में वर्णन करते हुए इतिहास वर्तमान और भविष्य का एक एसा सुविधाजनक नेरेटिव दे रहा है जो ब्राह्मण धर्म के आधुनिक अवतार हिन्दू धर्म को मानने वाली जनता को प्राचीन महा-आख्यानों (ग्रेंड-नेरेटिव्स) से बाँधे रखता है। आधुनिक भारत में विशेष रूप से आर्थिक उदारीकरण और शहरीकरण की बाढ में शहरी मिडिल क्लास की असुरक्षाओं को उत्तर देते हुए इस नए हिन्दू धर्म ने या फिर धर्म मात्र ने राजनीति और व्यापार से बहुत ताकतवर गठजोड बनाकर धर्म के प्रभाव को कहीं अधिक स्थाई और दूरगामी बना दिया है और भारत का आम जन पहले से कहीं अधिक हिन्दू बनता जा रहा है (Nanda 2011)। यह सफलता असल में बहुत आरंभ से ही नजर आने लगी थी, जबकि कल्ट गुरुओं ने कोलोनियल पीरियड में जन्म ले रहे साहित्यिक और धार्मिक विमर्श से प्रेरणाएँ चुनते हुए अपनी अस्मिता की तलाश करती हुई असुरक्षित जातियों और समुदायों को यह धर्म परोसना शुरू किया था। इसी कारण आजादी के बाद के भारत में ब्राह्मण धर्म के प्राचीन रूप के समर्थक सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक संगठन भी इन कल्ट गुरुओं को बहुत तरह से समर्थन देते और मदद करते आए हैं।
इस क्रम में आगे बढते हुए अगर हम उपनिवेशिक और मुगल काल के काफी पहले प्राचीन भारत में घटे ब्राह्मण और श्रमण संघर्ष की बात करें, तो हमें एक नए ही इतिहास और नए ही भारत का पता चलता है।
उपनिवेश काल और नियो वेदान्त/नियो हिन्दुइज्मः
ब्रिटिश आधिपत्य ने एक तरफ जहाँ हिन्दू कहे जाने वाले समुदायों में जाति और जातियों की परस्पर अंतःक्रियाओं को नवीन अर्थ में परिभाषित किया (Dirks 2001) वहीं दूसरी तरफ हिन्दू और मुसलमान अस्मिताओं को भी दो स्पष्ट एवं विपरीत धुवों की तरह खडा कर दिया था। यह काम ब्रिटिश राज की शासन प्रशासन की नीतियों के जरिये ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश ज्ञान और विज्ञान के जरिये भी बखूबी किया गया है (Gottschalk 2013)। ऐसी परिस्थितियों में निश्चित ही राजनीति और सामाजिक समीकरणों के स्तर पर भी नयी अनिश्चितताओं और रणनीतियों का जन्म हुआ जिनके अनुकूल धार्मिक एवं आध्यात्मिक अनुशासनों का निर्माण या पुनर्व्याख्या आवश्यक हो चली थी। इस समय में इन दोनों अतियों पर खडे इन धर्मों के सिद्धान्तकारों के कन्धों पर अपनी अपनी ऐतिहासिक एवं धार्मिक दार्शनिक परम्पराओं की खोज करते हुए उसमें से नए युग के अनुकूल एक नवीन रचना का निर्माण करने की जिम्मेदारी आ गयी थी। इससे भी बडी जिम्मेदारी इस अर्थ में थी कि उन्हें इन नवीन रचनाओं को अपने अपने धर्म के सबसे प्राचीन रूप के साथ तालमेल रखती रचना के रूप में भी प्रस्तुत करना था ताकि यह नवीन रचना इतनी भी नवीन न हो जिसका एतिहासिक प्रवाह से संबंध ही विच्छेद हो जाए। इस तरह के प्रयास हम मुस्लिम सिद्धान्तकारों सहित इस्लामिक समाज की ब्रिटिश सत्ता से हो रही अंतः क्रियाओं में देखते हैं। इस दौर में इस्लामिक समाज सुधार का जो प्रयास जिस त्वरा और शैली में हम देखते हैं वो पहले किसी भी अन्य दौर में हुए प्रयासों से एकदम भिन्न है, इन सुधार प्रयासों पर ब्रिटिश आधुनिकता कि स्पष्ट छाप नजर आती है (Abraham 2014)।
इस दौर में इस्लामिक एवं हिन्दू समुदायों के बीच अपने अपने स्तर पर भिन्न-भिन्न तरह के सुधार आन्दोलन चल रहे थे और इन सुधारों से सहमत या असहमत होने के लिए सुधारकों में ही नहीं बल्कि आम जनता में भी ज्ञात इतिहास या सुदूर अतीत से धार्मिक दार्शनिक परम्पराओं से प्रमाण व संदर्भ खोज लाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। ऐसे में एक किताब एक पैगंबर और एक ईश्वर वाले धर्म इस्लाम के साथ एक विशेष सुविधा यह थी कि प्राचीन परम्पराओं और उनकी धार्मिक दार्शनिक व्याख्याओं का स्वरूप बहुत हद तक स्पष्ट था। किन्तु वर्णाश्रम धर्म और जाति व्यवस्था के कारण भयानक विभाजनों में जीने वाले एवं हिन्दू कहलाने वाले भारतीय समुदायों के पास यह सुविधा नहीं थी। इसी कारण हिन्दू कहे जाने वाले समुदायों के भीतर एक दर्शन एक सिद्धांत और एक साझे अतीत की रचना का काम सबसे बडी आवश्यकता के रूप में उभरने लगा। इसी दौर में हम देखते हैं कि प्राचीन आख्यानों में परस्पर विरोधी एवं असंबद्ध-सी अनेक चीजों को आधुनिक आवश्यकताओं को उत्तर देने क्रम में बहुत सावधानी से मिलाया जा रहा है एवं ब्रिटिश आधुनिकता के प्रभाव में जन्म रहे एक नए भारतीय समाज को स्वयं पर गर्व करने के लिए एक नये धर्म की रचना हो रही है(Pennington 2005)। इस नवीन रचना को नियो-वेदान्त या नियो-हिन्दुइज्म कहा गया है (White 2014)।
इस प्रकार उपनिवेश काल में जहाँ नियो वेदान्त की रचना धार्मिक एवं धार्मिक-दार्शनिक आयाम में एकदम से नयी स्थापनाओं के निर्माण और महिमामंडन के जरिये हो रही है, वहीं साहित्य के जगत में भी ठीक यही कार्य होता हुआ नजर आता है। इस काल में एक तरफ आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिन्दू कहे जाने वाले लोगों को एक जाति के रूप में निरुपित कर रहे हैं और उनके प्रचलित धर्म को अर्थात लोक धर्म को उजागर कर रहे हैं (Lorenzen and Muñoz 2011) वहीँ दूसरी तरफ केशवचंद्र सेन और रामकृष्ण परमहंस जैसे दो परस्पर विरोधी आचार्यों सहित थियोसोफिकल सोसाइटी की व्याख्याओं में जन्म ले रहे विचारों के बीच संश्लेषण करते हुए स्वामी विवेकानंद नियो वेदान्त की रचना कर रहे हैं (White 2014)। यह सब उपनिवेशिक काल में अंग्रेजी हुकूमत के प्रभाव में एवं इसाई धर्म के बढते प्रभाव का सामना करते हुए एक खास किस्म के यूनिवर्सलिज्म की रचना करने का प्रोजेक्ट था जिसे धर्मदर्शन, साहित्य और कल्ट गुरुओं ने एकसाथ अपनाकर आरंभ किया।
इसी समय यूरोप में पले-बढे एवं शिक्षित हुए अरबिंदो घोष जो स्वतंत्रता संग्राम से अवकाश लेकर (जैसा कि उनकी आध्यात्मिक सहयोगिनी श्री माँ बताती हैं) अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य अर्थात हिन्दू जाति के धार्मिक उत्थान में लग जाते हैं। राजनीतिक लेखन एवं स्वतंत्रता संघर्ष के बीच जब उन्हें अलीपुर जेल में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन होते हैं तो वे भारत की आध्यात्मिक और धार्मिक विरासत को विकसित करने के लिए समर्पित हो जाते हैं (Ghosh 1997)।
हम यहाँ देख सकते हैं कि तत्कालीन समय में किस तरह का तनाव राजनीतिक, धार्मिक और साहित्यिक जगत में बना हुआ है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि लगातार अस्थिर हो रहे यूरोप के पंजे से आजाद होने का इंतजार करते हुए यूरोप में या यूरोपीय अनुशासन में भारत ही में शिक्षित हुए भारतीय बौद्धिक आभिजात्य में किस तरह की अभीप्साओं का जन्म हो रहा है। बाद के अध्ययन बताते हैं कि अपनी प्राचीन विरासत पर गर्व करते हुए उस गर्वीले समय को पुनः लौटाने की कामना से भर चुके अनेकानेक सिध्दांतकार प्राचीन स्थापनाओं में यूरोपीय ज्ञान की श्रेष्ठताओं का प्रक्षेपण कर रहे हैं। अरबिंदो घोष जैसे स्वघोषित योगी जो किसी पारम्परिक अखाडे या आश्रम में कभी शिक्षित न हुए एवं जिन्होंने बाल्यकाल से ही यूरोप में शिक्षा हासिल की, वे यूरोप की तत्कालीन आधुनिकता के श्रेष्ठतम तत्त्वों के अपने अध्ययन का लाभ लेते हुए डार्विन के क्रमविकास एवं नीत्शे के अतिमानव का संश्लेषण करके उसे अतिमानस के अवतरण के सिद्धांत में पिरो रहे हैं।
इस संश्लेषण तक पहुँचने के क्रम में अरबिंदो घोष पूरे भारतीय दर्शन को लाइफ डिवाइन (Ghosh 1991) नामक किताब में एक नयी व्याख्या से सज्ज कर रहे हैं जिसमे वेद उपनिषद्, गीता और योग का अत्यधिक प्रभाव है एवं तांत्रिक और शैव दर्शन का स्थान बहुत ही कम है, इसी के समानांतर योग की परम्परा को भारतीय अध्यात्म का मुख्य स्वर बताते हुए अपने विशाल ग्रन्थ सिंथेसिस ऑफ योगा (Ghosh 1999) में विवेकानन्द द्वारा पश्चिम में प्रचारित योग को विकसित करते हुए पूर्ण योग के रूप में पेश कर रहे हैं। विवेकानन्द और अरबिंदो घोष जैसे नए दार्शनिक एक तरफ जहाँ थियोसोफिकल सोसाइटी की व्याख्याओं में जन्म ले रहे नियो वेदान्त को पारम्परिक भारतीय रूपकों और बिंबों से महिमामंडित करते हुए लोकप्रिय बना रहे थे वहीँ दूसरी तरफ वे पश्चिमी ज्ञान में शिक्षित थियोसोफिस्ट अध्येताओं और योगियों द्वारा सृजित ज्ञान को भारत के प्राचीन शास्त्रों में प्रक्षेपित भी कर रहे थे।
लेकिन हम देखते हैं कि इससे कुछ अधिक करने के प्रयास भी वहाँ चल रहे थे, ठीक इसी समय कुछ ऐसे प्रयास भी चल रहे हैं जो एक भयानक किस्म की कुटिलता और तत्कालीन राजनीतिक समीकरण से लाभ उठाने की अवसरवादी समझ से भी संचालित रहे हैं। ऐसा ही एक प्रयास हम बालगंगाधर तिलक के लेखन में देखते हैं जब वे यूरेशियन आर्यों से ब्राह्मण आर्यों का भाईचारा सिद्ध करने के क्रम में आर्यों के उद्गम स्थल की खोज करते हुए मिडिल ईस्ट और यूरेशिया को पीछे छोडकर अन्टार्कटिक तक जा पहुँचते हैं (Tilak 1903)। एसा करते हुए तिलक न केवल प्राचीन भारतीय ज्ञान की श्रेष्ठता सिद्ध कर रहे हैं, बल्कि प्राचीन भारतीय ब्राह्मण मनीषियों को उपनिवेश काल के नये आकाओं का निकट संबंधी भी बना देते हैं।
भक्तिकाल और नाथपंथी मनीषा :
शंकराचार्य के आगमन के बाद एवं भारत से बौद्ध धर्म के लगभग लुप्त हो जाने के बाद भी सिद्धों की परम्परा में जिस तरह की अनीश्वर-वादी सहज साधना आठवीं-नवी विक्रमी सदी में चल रही है उसका बाद के नाथों पर गहरा प्रभाव है (Barthwal 1950)। इसके बाद इस्लामिक आक्रमण के बाद मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन के दौरान विशेष रूप से सिद्धों नाथों की परम्परा में जन्मी निर्गुण भक्ति धारा का सगुण धारा से जो तनाव एवं संवाद चल रहा है वह भी महत्त्वपूर्ण है। इस दौर में भी हम देख पाते हैं कि इस्लामिक शासन के दौरान नवीन राजनीतिक परिस्थितियों में वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले भारतीय समुदाय में अछूत व शूद्र कहलाने वाले समुदाय तेजी से इस्लाम ग्रहण कर रहे हैं। इस बात से चिंतित होकर वर्णाश्रम धर्म के रामानन्द जैसे सिद्धांतकार तन्त्र की बजाए योग से प्रेरणा ले रही वैष्णवी भक्ति पर जोर देते हुए दक्षिण से उत्तर की तरफ आते हैं और भक्ति की नयी परम्पराओं को आरंभ करके इस धर्मांतरण की लहर को शिथिल करने का प्रयास करते हैं। यह प्रयास स्वामी विवेकानन्द तक जारी रहता है जबकि वे स्वयं योग को पतंजलि के योगसूत्रों से नहीं, बल्कि कूर्म पुराण एवं गीता के आख्यानों के अनुकूल बनाने का प्रयास कर रहे हैं(White 2014)। इस भाँति हठ योग और वैष्णव परम्परा के अनुशासन एवं शुचिताओं के आग्रह से भरे राजयोग का जन्म होता है जो बाद में श्री अरबिंदो और ओशो (रजनीश) जैसे योगियों एवं कल्ट गुरुओं में भी नजर आता है।
उपनिवेश काल में जिस तरह से भारत के इतिहास, संस्कृति, भाषा और धर्म दर्शन की खोज आरम्भ हुई उसे भक्तिकालीन आन्दोलन द्वारा निर्मित भारत की सफलता की पृष्ठभूमि में देखना होगा, और भक्तिकाल के आन्दोलनों का विशिष्ठ चरित्र और क्रांतिकारी प्रस्तावनाओं की प्रेरणा जानने के लिए हमें इससे भी पहले साधे जा रहे उस महान संश्लेषण को देखना होगा जो कि सुदूर उत्तर भारत सहित तिब्बत की ऊँचाइयों में आकार ले रहा है। ये प्रेरणाएं और प्रवृत्तियाँ हमें बौद्ध श्रमण दर्शन की उन धाराओं में देखने को मिलती हैं जहाँ मनुष्य के जीवन, मनुष्य की चेतना और मनुष्य की चेतना के विविध आयामों को श्रमसाध्य विधियों के माध्यम से खोजने की सबसे बडी खोज आरंभ हुई थी। भारत से बौद्ध दार्शनिकों के तिब्बत की तरफ जाने के बाद बौद्ध दर्शन की तीन प्रमुख धाराओं- महायान, हीनयान और वज्रयान की सभी श्रेष्ठताओं का संश्लेषण करते हुए तिब्बती बौद्ध धर्म ने आकार लिया है (Thondup 1982)। इसी के प्रवाह में आध्यात्मिक प्रच्छा को उत्तर देने वाले उन समावेशी और संश्लेषणवादी नवीन अनुशासनों का जन्म हो रहा है जो कालान्तर में न सिर्फ प्रार्थना, प्रेम और योग के बीच कोई प्रयोगसिद्ध मार्ग खोज रहे हैं, बल्कि इस्लाम के भारत आगमन के पश्चात बदलती राजनीतिक सामाजिक परिस्थितियों में एकेश्वरवाद, बहुदेववाद और योग के बीच भी संश्लेषण का मार्ग बना रहे हैं (Gupta 1970)। इस समय भारत की बौद्ध श्रमण धारा में जन्मे तीन महान दार्शनिक अनुशासनों का निर्माण करते हुए बौद्ध आचार्यों ने तिब्बत पहुँचकर नयी परिस्थितियों में जिस संश्लेषण को जन्म दिया वही हिमालय की ऊँचाइयों से भारत के मैदानी इलाकों सहित पूरे उत्तर में भक्ति आन्दोलन में कई अर्थों में प्रवाहित हो रहा है। इस प्रवाह में भी बौद्ध मत से प्रेरित सहज साधना और वज्रयान की परम्पराओं का प्रभाव विशेष उल्लेखनीय है (Singh 1963).
उत्तर भारत में विशेष रूप से गोरखनाथ के बाद जिस तरह की आध्यात्मिक चेतना जन्म ले रही है वह उसे समझने के बहुत प्रयास साहित्य और धर्म दर्शन के जगत में हुए हैं, जिन्हें सगुण-निर्गुण भक्ति धाराओं के अध्ययन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अगर हम भक्ति आन्दोलन के दौर में हो रहे सगुण-निर्गुण संवाद को नहीं समझते हैं, तो हमें इस बात का अनुमान लगाना कठिन होगा कि बाद की शताब्दियों में अपने यूरोपीय शासकों अधिकारियों को प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का अर्थ समझाते हुए ब्राह्मण मनीषियों ने किस तरह के साहित्य की रचना की और कार्रवाई है। यह देखना हमारे लिए जरुरी है कि नाथ पंथ की तंत्र-प्रधान शिक्षाओं का एवं निर्गुण की महिमा का जो प्रभाव तत्कालीन आम जन मानस में बना हुआ था उससे प्रतिद्वंद्विता करते हुए एक वैष्णव रुझान के एवं योग प्रधान सगुण के उपासक कवियों और साहित्यकारों ने किस तरह से भारत में धर्म और धार्मिकता को समझने और समझाने का प्रयास किया है। नवीन शोध यह बताते हैं कि शंकराचार्य के दौर में भी तंत्र और योग की परम्पराओं के बीच एक संघर्ष बना हुआ था एवं बाद की शताब्दियों में शैव तंत्र के दो महत्त्वपूर्ण सम्प्रदायों-कापालिक एवं कालमुख का लोप हो जाता है(Lorenzen 1972)। यहाँ यह स्पष्ट हो रहा है कि किस तरह तंत्रोक्त अनुशासनों की बजाय यौगिक अनुशासन अधिकाधिक शक्ति और स्वीकृति हासिल करते जा रहे हैं।
इसके बहुत बाद मुगल शासन के दौरान जब इस्लाम के एकेश्वरवाद और हिन्दू बहुदेववाद के बीच एक दार्शनिक धार्मिक संवाद और संघर्ष हो रहा था, उस समय इन दो अतियों के बीच इन दोनों का सृजनात्मक संश्लेषण करते हुए भी कुछ नवीन रचनाएँ उभरी थीं जिसमे दोनों धाराओं के श्रेष्ठ का समावेश किया गया था। ऐसी एक रचना सिख पंथ था जिसकी दार्शनिक भित्ति इस्लाम के एकेश्वरवाद और वैदिक धर्म के प्रचलित सिद्धांतों से मिलकर बनी थी। इस नवीन रचना में तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था की चुनौतियों का समाधान करते हुए जाति व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव पर कडा प्रहार किया गया था। इस एक विशेष अर्थ में यह पन्थ तत्कालीन भारत में सबसे अधिक क्रांतिकारी विचार के रूप में उभरा था। इस पंथ के उभार के पहले इस पंथ के लिए दार्शनिक धार्मिक आधारों का निर्माण करने वाले जिन भक्ति कवियों और योगियों मनीषियों का उल्लेख आता है उनमे गोरखनाथ, कबीर, रैदास, फरीद, बुल्लेशाह, दादू, पीपा इत्यादि अनेक कवियों मनीषियों का नाम लिया जा सकता है।
इनमे से गैर-मुस्लिम संत कवियों की बात करें तो इनकी रचनाओं में एक खास तरह का संश्लेषण आकार ले चुका था। इस तरह के रुझान हमें कबीर, नाथपंथी कवियों और बाद के सिख गुरुओं में भी नजर आते हैं जहाँ उल्लेखनीय रूप से गोरखनाथ एक ऐसी अस्मिता की बुनाई कर रहे हैं जिसमे इस्लाम, हिन्दू धर्म और योग के बीच एक खास तरह का समन्वय हो रहा है (Lorenzen and Muño5 2011)। ये मनीषी और कवि वास्तव में निर्गुण के प्रशंसक थे और इनकी शिक्षाओं में एक तरह के धार्मिक दार्शनिक एकीकरण का स्वर था जो सामाजिक जीवन में भी जाति-वर्ण भेद के परे जाकर एक नए किस्म की विकसित नैतिकता और आधुनिकता की बात करते थे (Hess 2016)। इस आधुनिकता को हमारे समकालीन विद्वानों ने उचित ही बहुत मूल्य दिया है और इसे देशज आधुनिकता निरुपित किया है जो बाद के ब्रिटिश आधिपत्य के समय में कमजोर हो जाती है और अपना श्रेष्ठतम नहीं दे पाती है (Agrawal 2009)। इस दौर में कबीर के संबंध में जो लेखन हम पाते हैं उसमे पिछली शताब्दी के भारतीय लेखकों में अधिकाँश में कबीर को रामानन्द का शिष्य बताने की प्रवृत्ति मिलती है। हालाँकि पश्चिमी एवं इंग्लिश भाषा में लिखने वाले अधिकाँश विद्वान् इस मान्यता से सहमत नहीं होते हैं (Hawley 2016)
प्राचीन भारत में ब्राह्मण संस्कृति का आगमन :
प्राचीन भारत में जबकि गंगा यमुना के मैदानों से पूर्व की तरफ आर्य ब्राह्मणों का कारवां आगे बढ रहा था, तब वर्तमान उत्तर प्रदेश बिहार बंगाल एवं मध्य एवं दक्षिण भारत में श्रमण संस्कृति का वर्चस्व था। इस दौर में श्रमण धर्म के तीन प्रमुख रूपों - जैन, आजीवक एवं बौद्ध धर्मों में आपस में एक तरह का संघर्ष एवं संवाद चल रहा था और आर्य ब्राह्मणों के आगमन के बाद विशेष रूप से सिकंदर के आक्रमण के बाद की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में श्रमण संस्कृति एवं ब्राह्मण संस्कृति के बीच तनाव एवं संवाद एक नये स्तर पर पहुँच जाता है (Bronkhorst 2007)। इस दौरान जिस तरह का संश्लेषण हो रहा है वह न केवल नयी परिस्थितियों में वैदिक धर्म या वर्णाश्रम धर्म के जन्म और विकास को समझाता है, बल्कि बौद्ध धर्म के पतन और लोप के कारणों की व्याख्या करते हुए बौद्ध धर्म में ब्राह्मणी सिद्धांतों की मिलावट सहित एक ब्राह्मणीकृत बौद्ध धर्म के उभार का अनुमान भी देता है (Bronkhorst 2011)। इस काल में आर्य ब्राह्मण विजेता असुरों या अनार्यों की विकसित संस्कृति को विजित कर उसे अपने नियंत्रण में लाते हुए तीनों प्रमुख वेदों की रचना कर रहे हैं। इस दौर में यद्यपि आर्य ब्राह्मण सिद्धान्तकारों ने श्रमण परम्परा के देवताओं सहित उनके सिद्धांतों की अपने लेखन में उपेक्षा की है, किन्तु आम जन के स्तर पर संवाद के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। आर्यों के चौथे वेद की रचना तक यह संवाद अपने शिखर तक पहुँच रहा था इसीलिए चौथे वेद में हमें नवीन प्रवृत्तियाँ और संश्लेषण देखने को मिलता है (Singh 1963)।
इस समय से संबंध रखने वाले प्राचीन लेखन में हम आर्यावर्त और आर्यभूमि के बारे में काफी रोचक जानकारी प्राप्त होती है। प्राचीन भारत के संस्कृत वैयाकरणिक पतंजली के लेखन में हमें प्राचीन आर्यावर्त और असुरों की भूमि के सम्बन्ध में संकेत मिलता है जहाँ पतंजलि हमें ब्राह्मणवाद की हृदयभूमि के बारे में कुछ रोचक जानकारी देते हुए बताते हैं कि आर्यों की भूमि (आर्यावर्त),अनिवार्य रूप से गंगा के मैदान में स्थित है, पश्चिम में थार रेगिस्तान और गंगा-यमुना के संगम के बीच पूर्व में यह स्थित है। ठीक इसी तरह की सूचना हम मानव धर्मशास्त्र अर्थात मनुस्मृति में भी पाते हैं। यहाँ स्मरण रहे कि पतंजलि व्याकरण और मानव धर्म शास्त्र की रचना का काल ईसापूर्व दो शताब्दी से दूसरी ईस्वी सदी के बीच का है(Singh 2009)। इन दो शास्त्रों के वक्तव्यों को तथ्यों को आधार बनाकर कहा जा सकता है कि पतंजलि एवं मनु के काल तक अर्थात बुद्ध के बाद चार से आठ शताब्दियों के बीच के काल तक गंगा यमुना के संगम के पार की भूमि आर्यावर्त नहीं थी, बल्कि यह श्रमण परम्परा को मानने वाले लोगों के अधीन थी। इन लोगों को शतपथ ब्राह्मण के उन पैशाचिक लोगों की तरह बतलाया गया है जो वेदोक्त चतुष्कोणीय वेदियों एवं भवनों की नहीं, बल्कि गोल गुंबद वाले बडे बडे स्तूपों की रचना करते थे। (Bronkhorst 2007)।
इसी समय राजसत्ताओं और राजतंत्रों से इन दोनों परम्पराओं के संबंधों के विषय में भी संकेत मिलते हैं मगध के तीन प्रतापी राजाओं- वर्णिका, बिंबिसार और अजातशत्रु का उल्लेख असल में दो प्रमुख श्रमण धर्मों अर्थात बौद्ध एवं जैन धर्म के ग्रंथों में अपने अपने खेमे में बताकर किया है। संभवतः नन्द राजा जो 350 ईसापूर्व हुए हैं वे जैन धर्म के संरक्षक थे (Bronkhorst 2007)। इसी समय हमें एक तीसरे धर्म आजीवक धर्म के प्रभाव एवं राजसत्ताओं से उनके संबंधों के बारे में भी पता चलता है। आजीवक संप्रदाय बाद की शताब्दियों के दौरान भी प्रभावशाली रहा है। महावंश ग्रन्थ से चलता है कि इसका प्रभाव श्रीलंका में दक्षिण तक फैल गया था। दिव्यवदान की एक कहानी कहती है कि मौर्य राजा बिन्दुसार के दरबार में आजीवक ज्योतिष ने अशोक के सम्राट के रूप में उज्ज्वल भविष्य के बारे में भविष्यवाणी की थी। बाराबर पहाडियों के शिलालेखों में अशोक द्वारा कुछ गुफाएँ आजीवकों को दान देने का वर्णन आता है और इन्ही गुफाओं के निकट नागार्जुनी पहाडियों में मिले शिलालेख भी अशोक द्वारा द्वारा आजिवकों को तीन गुफाये दान में देने का उल्लेख मिलता है (Singh 2009)।
प्राचीन भारत के इसी दौर में बौद्ध जैन एवं आजीवक धर्म के बीच घट रहे संघर्ष और संवाद का कुछ अनुमान हमें जैन एवं बौद्ध ग्रंथों से मिलता है जहाँ विशेष रूप से जैन ग्रन्थ भगवती सूत्र में एवं बौद्ध ग्रन्थ समनफलसुत्त जो कि दीर्घ निकाय के अंतर्गत आता है, से आजीवक संप्रदाय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धांतकार एवं गुरु मक्खली गोसाल के हीन कुल में जन्म का विवरण मिलता है। चूँकि आजीवक धर्म का कोई मानक ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं है और अधिकांश सूचनाएँ बौद्ध जैन एवं ब्राह्मण ग्रंथों से प्राप्त होती हैं इसलिए इन सूचनाओं में आजीवक संप्रदाय की उत्पत्ति और इसके मूल सिद्धांतों की मानक व्याख्याओं का अभाव है। इसपर जो शोध अभी तक हुआ है उससे इस धर्म के सिद्धांतों एवं संगठन संचालन सहित लोक मानस में एवं तत्कालीन राजसत्ताओं से इसके सम्बन्धों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती है। यद्यपि हाल ही के कुछ शोध ये दावा करते हैं कि मक्ख्ली गोसाल का धर्म पुनर्जन्म एवं भाग्यवाद को नकारते हुए तत्कालीन परिस्थितियों में बौद्ध एवं जैन धर्म को चुनौती दे रहा था एवं कबीर एवं रैदास को मक्खली गोसाल की परम्परा में गिना जाना चाहिए (Dharmavir 2017)।
ब्राह्मण धर्म के आगमन के साथ गंगा के मैदानों में जिस तरह का श्रमण-ब्राह्मण संघर्ष एवं संवाद चल रहा है उससे कुछ महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त होते हैं। ये निष्कर्ष न केवल वैदिक काल या उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण धर्म कि विशित्ष्ठ प्रवृत्तियों को समझाते हैं, बल्कि इस संघर्ष से समृद्ध या कमजोर हो रहे धर्मों के बीच एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखते रहने की प्रक्रिया को भी उजागर करते हैं।
भारत की एतिहासिक क्रमविकास यात्रा में प्राचीन भारत में बौद्ध धर्म के विकसित रूप के आने के भी पूर्व स्वयं जैन धर्म में एक विशेष तरह के समन्वय और सामंजस्य के प्रयास का स्वर नजर आता है। सप्त नयों के आधार पर सप्तभंगी न्याय की रचना और अनेकान्तवाद और स्यात-वाद से प्रेरित परवर्ती साहित्य में हम तत्कालीन अतियों के बीच सामंजस्य बनाकर एक नवीन दार्शनिक रचना को जन्म देने कि प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। बाद में बौद्ध धर्म के उदय के बाद बुद्ध की शिक्षाओं में जैन धर्म के सामंजस्य और समन्वय को भी एक अति के रूप में देखा जाता है और वैराग्य, कायाक्लेश, कायोत्सर्ग सहित संथारा या सल्लेखना मरण के योगिक अभ्यासों को ही नहीं, बल्कि दैनंदिन में शाकाहार या अणु-व्रत जैसे अभ्यासों को भी एक तरह की अति की भाँति निरूपित किया जा रहा है। बुद्ध के आगमन के साथ एवं तत्काल बाद राजनीतिक परिस्थितियों में तेजी से हो रहे बदलाव का अनुमान स्पष्ट होता है इसी प्रष्ठभूमि में जबकि बडे राज्यों का उदय हो रहा है एवं धर्मसत्ता और राजसत्ता के बीच सीधा संवाद आरंभ हो रहा है, तब धार्मिक दार्शनिक प्रस्तावनाएँ अपने राजनीतिक निहितार्थों और संभावनाओं के प्रति अधिकाधिक मुखर एवं उत्तरदायी होने लगती हैं।
इसी क्रम में बाद में आर्य ब्राह्मणों के आगमन के साथ पश्चिमी भारत एवं वर्तमान पाकिस्तान अफगानिस्तान में राजनीतिक सामाजिक समीकरण तेजी से बदलने लगते हैं एवं बुद्ध के अवसान के तीन शताब्दियों बाद सिकंदर के आक्रमण के साथ तत्कालीन भारत में राजनीतिक उलटफेर का भयानक दौर आरंभ होता है जहाँ बौद्ध एवं जैन धर्म के सिद्धांतकार बदलती हुई राजनीतिक परिस्थितियों के अनुकूल या नयी सत्ताओं के अनुकूल ईश्वर एवं ईश्वरवाद सहित सामाजिक विभेदों और दण्ड-व्यवस्था की रचना करने में रूचि नहीं लेते हैं। बौद्धों और जैनों की व्यवस्था में ईश्वर एवं अवतार की व्यवस्था न होने के कारण एवं मुक्ति और मोक्ष की व्यक्तिवादी धारणा होने के कारण श्रमण सिद्धांतकार राजनीतिक सत्ता के लिए बेहतर मार्गदर्शक एवं सलाहकार नहीं बन सके।
इसी अवसर का लाभ उठाते हुए आर्य ब्राह्मण सिद्धान्तकारों ने तत्कालीन समय में उभर रही राजसत्ताओं को ईश्वर एवं ईश्वरवाद की रचना करके राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि बनाना आरंभ किया एवं आम जनता में फैले मोक्ष अध्यात्म परलोक आदि के श्रमण सिद्धांतों की बजाय राजसत्ता की उभर रही माँगों के अनुकूल स्मृतियों आगमों एवं पुराणों की रचना की। इन नवीन रचनाओं ने राजसत्ताओं को स्वयं को पीढी दर पीढी बनाये रखने के एवं आम जनमानस को श्रमण धर्मों द्वारा निर्मित व्यक्तिवादी मोक्ष एवं आत्मशुद्धि या आत्मज्ञान जैसे विश्वासों में उलझे रहने में मदद की। इस तरह उस दौर में उभर रही राजसत्ताओं ने इन आर्य ब्राह्मण सलाहकारों को राजगुरु बनाकर निमंत्रित करने की प्रेरणा बढती गयी, ये गुरु एक तरफ प्रजा के लिए श्रमण संस्कृति द्वारा निर्मित विचारों एवं विश्वासों को अंधविश्वास की तरह प्रचारित करके जनता को अपनी ही प्राचीन मान्यताओं के अधीन रखने का उपाय कर रहे थे वहीं ईश्वर एवं अवतार जैसे गैर-श्रमण विचारों की रचना करते हुए राजा को एवं राजा एवं राजपुत्रों को ईश्वर का प्रतिनिधि बताकर नवीन राजसत्ताओं को उनकी प्रजाओं की दृष्टी में वैध बना रहे थे।
इस तरह दोहरे लाभ देने वाले ब्राह्मण विचार को श्रमण राजाओं ने भी तेजी से स्वीकार करना शुरू किया और इस तरह श्रमण परम्पराएँ नवीन राजनीतिक परिस्थितियों में राजसत्ताओं के हितसाधन हेतु अनुपयोगी होती गयीं और धीरे-धीरे इनका लोप हो गया। यद्यपि इसी बौद्ध धर्म ने भारत में अपनी पराजय के बाद ब्राह्मणवादी हथकण्डों को सीखकर इन्हें तिब्बत एवं चीन सहित सुदूर पूर्व में इनका प्रयोग करना आरंभ किया और वे इस काम में ब्राह्मणों से अधिक सफल हुए। आदि शंकराचार्य के बाद की शताब्दियों में हम देखते हैं कि जिस तरह श्रमण-ब्राह्मण संघर्ष के दौर में ब्राह्मण आचार्यों को राजाओं ने निमंत्रण दिया था उसी तरह बौद्ध आचार्यों एवं भिक्षुओं को तिब्बती एवं चीनी राजाओं से निमंत्रण मिलने लगा। इस दौर में बौद्ध आचार्य तिब्बत या चीन की तरफ पलायन करते हुए ब्राह्मण धर्म से पराजय का अपना सबक भी अपने साथ लिए जा रहे थे और उन्होंने पुनर्जन्म, मोक्ष एवं परलोक सहित अन्य ऐसे तमाम विश्वासों को ठीक उसी तरह प्रजा पर नियंत्रण करने के लिए प्रयोग करना आरंभ किया जिस तरह तत्कालीन मगध में ब्राह्मणों ने आरंभ किया था। इसी कारण प्राचीन बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में एवं तिब्बती या चीनी बौद्ध ग्रंथों में एक स्पष्ट अंतर नजर आता है। बाद के बौद्ध ग्रन्थ ब्राह्मण धर्म से पराजय के बाद स्वयं बौद्ध धर्म और बुद्ध का ब्राह्मणीकरण करते हुए लिखे गए हैं इस विशेष बिंदु पर अश्वघोष रचित बुद्धचरित का उल्लेख किया जा सकता है।
बाद में बौद्धों के लोप के बाद सिद्धों और नाथों की प्रस्तावनाओं में बची तांत्रिक एवं निरीश्वरवादी शिक्षाओं में वैष्णव एवं हठ योगिक शिक्षाओं का तेजी से प्रवेश हो रहा है। सरहपा, तिलोपा आदि की प्रस्तावनाओं में वज्रयान एवं सहज साधना की जो प्रेरणाएँ हैं वे तिब्बत एवं हिमालय से उतरते हुए जब उत्तर के मैदानों में पहुँचती हैं, तो इस्लाम के आगमन के बाद के भारत में दो शक्तिशाली धर्म दर्शनों के बीच स्वयं को पुनराविष्कृत करती है और स्वयं को तांत्रिक पद्धतियों से दूर करते हुए यौगिक पद्धतियों की तरफ ले जाने लगती हैं। यह संक्रमण हम मत्स्येन्द्रनाथ एवं उनके शिष्य गोरखनाथ के बीच घट रहे संवादों में ही नहीं, बल्कि इस परम्परा से प्रभावित कबीर एवं रैदास की रचनाओं में भी देखते हैं। बाद के आचार्य एक ब्राह्मण गुरु रामानन्द की के आभामंडल को बहुत तरह से विरत से विराटतर बनाते जाते हैं और कबीर सहित रैदास को भी रामानंद की परम्परा में दिखाने लगते हैं। इसके बाद के काल में प्रक्षिप्तों एवं किंवदंतियों की रचना का एक नया दौर आता है जिसमे न केवल धार्मिक आचार्य, बल्कि साहित्यिक आचार्य भी कबीर एवं रैदास की रचनाओं में वैष्णव भक्ति धारा का प्रभाव होने का दावा करने लगते हैं। इसी दौर में तुलसी एवं सूर की सगुण भक्ति धारा से इसकी तुलना आरंभ होती है, इस तुलना और विमर्श में भटककर तत्कालीन अकादमिक मनीषा लगभग यह स्वीकार ही कर लेती है कि कबीर और रैदास संभवतः वैष्णव परम्परा के भक्ति संत हैं।
इसके बाद उपनिवेशी अधीनता के काल में इसाई धर्म और यूरोपीय आधुनिकता का प्रभाव भारत के वर्णाश्रम धर्म पर पडता है। इस्लाम के प्रभाव में जन्मे नए विमर्शों के आगमन के बाद यूरोप से हुए इस आधुनिक आक्रमण ने एक बार फिर से वर्णाश्रम धर्म या ब्राह्मण धर्म को भयानक रूप से असुरक्षित बना दिया। इसका उपाय खोजा गया और जिस तरह सिकंदर के आक्रमण के बाद ब्राह्मण धर्म ने स्वयं को पुनः आविष्कृत करके प्रजा में श्रमण धर्म के मोक्ष मुक्ति परलोक और पुनर्जन्म के विश्वासों को अंधविश्वासों की तरह फैलाकर एवं राजसत्ताओं को स्मृतियों और आगमों से राजकाज के परामर्श देकर स्वयं को पुनः सुरक्षित बनाना आरंभ किया। तुर्क एवं मुगल काल सहित उपनिवेशी शासकों एवं विद्वानों के सम्मुख प्राचीन भारत के ग्रंथों का अनुवाद करते हुए इस बात की पर्याप्त सावधानी रखी गयी कि नए शासक इस देश में सामाजिक संरचना को एवं स्मृति ग्रंथों द्वारा बताई गयी व्यवस्था को बनाए रखते हुए ब्राह्मणों को राजकाज में महत्त्वपूर्ण स्थान देते रहें। यह व्यवस्था इस्लामिक शासन के साथ बहुत अच्छे ढंग से लंबे समय तक जारी भी रही, लेकिन ब्रिटिश आधुनिकता ने भारत की गैर ब्राह्मण जातियों को शिक्षा एवं प्रशासन के अवसर देकर वर्णाश्रम धर्म की प्राचीन व्यवस्था को तोड दिया। इस तोडफोड से असुरक्षित ब्राह्मण धर्म ने उपनिवेश काल में स्वयं को नियो वेदान्त और निओ हिन्दुइज्म की तरह पुनः आविष्कृत किया जिसमे वर्णाश्रम धर्म के भेदभावपूर्ण सिद्धांतों एवं यूरोपीय आधिनिकता सहित इस्लाम के एकेश्वरवाद को वैष्णव अर्थ के यौगिक अनुशासनों के साथ मिलाकर एक नए धर्म की रचना की गयी।
उपसंहार :
इस सबसे गुजरते हुए एक महत्त्वपूर्ण बात जो हमें नोट करनी चाहिए कि भारत के प्राचीन मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास में परस्पर प्रतियोगिता कर रही धार्मिक दार्शनिक परम्पराओं के बीच जो घट रहा है उसे समझना एक दुरूह कार्य है। सभी विचारधाराएँ अनिवार्य रूप से नए दौर की राजनीतिक परिस्थितयों के अनुकूल स्वयं को पुनः आविष्कृत करने का प्रयास कर रही हैं और प्राचीन भारत की वे श्रमण विचारधाराएँ जो नवीन परिस्थितियों में राजसत्ताओं को प्रजा पर बेहतर नियंत्रण का आश्वासन नहीं दे पा रही हैं वे कमजोर होकर नष्ट होती जा रही हैं। भारत में बौद्ध धर्म का पतन एवं लोप इसी दृष्टी से समझा जा सकता है, बौद्ध धर्म के साथ ही जैन धर्म की शुचिता एवं सदाचार की कठोर धारणाएँ बदलती परिस्थितियों में राजसत्ताओं को एवं आम जनों को भी अनुकूल नहीं जान पडीं। साथ ही इनके आचार्यों एवं सिद्धान्तकारों ने बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपने मूल सिद्धांतों को किसी भी राजनीतिक लाभ के लिए बदलना स्वीकार नहीं किया. इस तरह इन दो धर्मों के पतन के कारण इनके अपने ही भीतर रहे हैं, ईश्वर एवं अवतार सहित कर्म के विस्तारित सिद्धांत के न होने के कारण एवं राजसत्ताओं की आवश्यकताओं के अनुकूल धर्म दर्शन सहित सामाजिक अनुशासनों की रचना न कर पाने के कारण ये धर्म ब्राह्मण धर्म से पराजित हुए।
इस दौर के प्राचीन साहित्य का अनुशीलन यह भी बताता है कि बदलती राजनीतिक सत्ताओं का विश्वास एवं संरक्षण प्राप्त करके स्वयं को पुनराविष्कृत करने की क्षमता ब्राह्मण धर्म में सर्वाधिक रही है। यह आज से नहीं बल्कि श्रमण-ब्राह्मण संघर्ष के दौरान सिकंदर के आऋमण के समय से ही बनी हुई है और निरंतर विकसित होती जा रही है। प्राचीन विश्वासों को जनसामान्य हेतु सम्मोहक बूटी की भाँति उपयोग करते हुए उन्हें सत्ता की समझ और शिक्षा के प्रकाश से दूर रखने की वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था भारत के सम्पूर्ण ज्ञात इतिहास में समस्त राजसत्ताओं एवं आक्रमणकारियों के लिए एक वरदान साबित हुयी है। यह प्रक्रिया आज भी जारी है, ब्राह्मण धर्म के वर्तमान अवतार हिन्दू धर्म में विज्ञान एवं तकनीक के आगमन के बाद की परिस्थितियों में भी बहुत सफलता से तालमेल बैठाया है और इसके बाद वैश्वीकरण की आंधी के बीच भी कल्ट गुरुओं, डेरों और आश्रमों सहित गली-गली में कथा सुनाने वाले पण्डितों की मदद से जाति व्यवस्था सहित अपना प्रभाव एवं उपयोगिता भी बनाए रखी है।
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