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केले का पेड : भारत की बहुवचनीयता

रमाशंकर सिंह
वासुदेवशरण अग्रवाल और जवाहरलाल नेहरू
सत्य पर दावा करना प्रत्येक युग का महत्त्वपूर्ण झुकाव रहा है। शायद ही ऐसा कोई समय या संस्कृति रही हो जिसने सत्य पर अपना दावा न जताया हो। संस्कृतियाँ सत्य को विभिन्न रूपों में परिकल्पित करती रहती है। भारत में भी यह रहा है, और बिल्कुल आरंभ से ही। सत्य एक ही है और उसे विद्वान अलग-अलग नामों से जानते हैं- इस ऋग्वैदिक वाक्य ने भारत में वाद-विवाद की परम्पराओं को समझने का आधार दिया। इसने बताया कि देश1 और उसके लोग किसी एकरूप संरचना में नहीं बल्कि उसकी बहुवचनीयता में जीते हैं। किसी दिए गए समय और दायरे में बिल्कुल निकट की चीजें, बिल्कुल आदिम चीजें भी एक जैसी नहीं रहती हैं। इसलिए किसी एकल विचार संस्कृति तर्क प्रणाली और कल्पना की खोज करना बेमानी होगा। इस विचार को दो लोगों के चिंतन और कर्म से समझा जा सकता है। एक प्रशिक्षित इतिहासकार, निबंधकार और भारतीय संस्कृति का धुरंधर विद्वान है, तो दूसरा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शौकिया इतिहासकार और न केवल भारतीय संस्कृति का धुरंधर विद्वान है, बल्कि भारत का प्रधानमंत्री भी रहा है। एक समय के बारे में लिख रहा है, तो दूसरा समय को ही बदल देना चाहता है। पहले का नाम वासुदेवशरण अग्रवाल(1904-1966) है दूसरे का नाम जवाहरलाल नेहरू(1889-1964)। मैंने जानबूझकर वासुदेवशरण अग्रवाल का नाम पहले रखा है क्योंकि जवाहरलाल नेहरू के बारे में थोडा बहुत पढा लिखा व्यक्ति यह जानता है कि वे खुद उनका नाम पहले रखते क्योंकि वे उन चीजों का बहुत आदर करते थे जिनके बारे में अग्रवालजी लिख रहे थे। जिन चीजों के बारे में अग्रवालजी लिख रहे थे, उन्हें डिस्कवरी ऑफ इंडिया में नेहरू भी एक बनते हुए राष्ट्र के मुस्तकबिल से अलग करके नहीं देख रहे थे। यदि कोई भारत सावित्री और डिस्कवरी ऑफ इंडिया को अगल-बगल रखकर पढे तो यह बात ज्यादा स्पष्ट हो जाएगी। भारत सावित्री महाभारत पर वासुदेवशरण अग्रवाल के सुचिन्तित निबंधों का संग्रह है जिसे कोई भी साधारण पाठक बिना संस्कृत भाषा जाने हुए इस महाकाव्य की दिशा, उसके पात्रों और उसके नैतिक झुकावों के बारे में समझ सकता है। डिस्कवरी ऑफ इंडिया भारत का एक समावेशी इतिहास है जिसमें उस समय तक की ज्ञात राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विद्वत्ता को नेहरू ने समाहित करने का प्रयास किया था। उनका उद्देश्य भारतवर्ष को एक सुदीर्घ काल परियोजना में न केवल चिन्हित करना था, बल्कि भारत के भविष्य को, समय को बदलना भी था। यह वही सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समय था जिसका पुनरुत्पादन अंग्रेजी उपपनिवेश ने किया था। अंग्रेजी उपनिवेश से भारत के लोगों की लडाई इसी समय को बदलने की लडाई थी। नेहरू सहित भारत के विभिन्न लोग, समुदाय, दल और विचार प्रणालियाँ यही काम कर रहे थे।
महाभारत के शांति पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा था कि कालो वा कारणं राज्ञः राजा वा कालकारणम्/इति ते संशयो मा भूत् राजा कालस्यकारणम्।2 कहने का आशय है कि राजा ही काल की रचना करता है, इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए। संभवतः इसीलिए सयाने लोगों ने कहा होगा कि यथा राजा तथा प्रजा। सजग इतिहासकार राजा और प्रजा के इतिहास पर बराबर नजर रखते हैं, यहाँ तक प्रजा के इतिहास पर जोर देने वाले विद्वान भी राजा की निर्मिति पर आँख गडाए रहते हैं। जैसे शासक बनता है, वैसे ही वह समय निर्मित होता है। यहाँ यह कहने का आशय बिल्कुल नहीं है कि इस समय निर्मिति में जनता की भूमिका नहीं होती, उसकी कोई एजेंसी नहीं होती, बल्कि यही अर्थ है कि समय से शासक को अलगाकर नहीं देखा जा सकता है। जिसे हम नेहरुवादी समय कहते हैं, उसमें नेहरू की भारत के अतीत को लेकर वह समझ भी काम कर रही थी जिसे उस समय के लोगों ने आजादी की लडाई, देशवसियों के व्यवहार और अपनी भविष्य दृष्टि से सीखी थी। नेहरू सामूहिक रूप से इसे प्रकट कर रहे थे। जब नेहरू ने कहा था कि वे भारत को आधुनिकता का एक लबादा ओढा देना चाहते हैं, तो उनके दिमाग में अपने समय के चेहरे को बदल देने की यही अकुलाहट काम कर रही थी, लेकिन वह अतीत से कटी हुई नहीं थी जैसा नेहरू के आलोचक हमें बार-बार विश्वास दिलाने का प्रयास करते हैं।
प्रसिद्ध विद्वान धर्मपाल ने अपने एक भाषण में कहा कि जवाहरलाल नेहरू और रवीन्द्रनाथ टैगोर भारत को एक आत्मदैन्य वाली छवि के अधीन ही देख रहे थे। वे भारत को उसके स्वधर्म से दूर ले गए। उन्होंने कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसी सर्जनात्मक प्रतिभाओं ने एक विचित्र आत्मग्लानि, आत्मदैन्य और उसी के साथ योरपीय लक्ष्यों की पूर्ति में भारत का आत्मगौरव देखने का बौद्धिक परिवेश रचा और जवाहरलाल जैसे पश्चिमी व्यक्तित्वों का उभरना और प्रतिष्ठित होना सम्भव हुआ। इस तरह नेहरू के भारत के प्रधानमंत्री और नेता बनने की परिघटना को पश्चिमी व्यक्तित्व का उभार करार दे दिया जाता है, जबकि सच्चाई ठीक इसके उलट है। नेहरू का विकास वास्तव में भारतीय व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास है। केवल इस आधार पर कि वे पश्चिम से पढकर आए थे, उनको पश्चिमी कह देना उचित नहीं है। नेहरू के भारत संबंधी विचार पर दार्शनिक अम्बिकादत्त शर्मा ने विचार किया है। वे जिस भारतीय मानस की खोज में हैं, वह वास्तव में नेहरू से कोई जुदा बात नहीं है।4 भारत की संविधान सभा में दिया गया नेहरू का वह मशहूर भाषण याद कीजिए, जो उन्होंने भारत के झण्डे को राष्ट्रीय झण्डा घोषित किए जाते समय 22 जुलाई 1947 को दिया था। वास्तव में उस दिन दिए गए सभी भाषणों को पढना चाहिए जो इस बात की ताकीद करते हैं कि भारत बहुवचन में जीता है, वह आजादी के आंदोलन की मूल्य प्रणाली का एक सामूहिक और केंद्रीय मूल्य था। उस दिन नेहरू ने कहा -
हमारे दिमाग में अनेक चक्र आए, पर विशेषकर एक प्रसिद्ध चक्र जो कि अनेक स्थानों पर था और जिसको हम सब ने देखा है, उसने हमारा ध्यान खींचा है। वह है अशोक की प्रमुख लाट के सिरे पर स्थित चक्र और अन्य स्थानों का चक्र। वह चक्र भारत की प्राचीन सभ्यता का चिह्न है- वह और भी अनेक बातों का प्रतीक है जिसको इस काल में भारत ने अपनाया। अतः हमने सोचा कि इस चक्र का चिह्न वहाँ होना चाहिए और वही चक्र दिखाई देता है। मैं स्वयं तो बहुत प्रसन्न हूँ कि किस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से हमने इस झण्डे के साथ केवल उस प्रतीक को ही नहीं अपनाया, बल्कि एक प्रकार से अशोक के नाम पर भारत के ही नहीं वरन संसार के इतिहास के एक बडे महान नाम को भी अपनाया। अच्छी बात है कि झगडे फसाद और असहिष्णुता के समय हमारा विचार उस बात की ओर हुआ जिसका प्राचीन काल में भारत हामी था और मैं आशा तथा विश्वास करता हूँ कि भूल और त्रुटियाँ करने पर तथा समय-समय पर निराहत होने पर भी इस समस्त काल में प्रधान रूप से भारत इस विचार का हामी रहा। क्योंकि यदि भारत किसी महान लक्ष्य को न अपनाता, तो मेरे विचार से भारत जीवित भी न रहता और न इस दीर्घकाल तक अपनी सभ्यतामूलक परंपराओं को जारी रख सकता था। वह अपनी सभ्यतामूलक परंपरा को जारी रखने में न केवल रहा, बल्कि परिवर्तन भी करता रहा लेकिन उसके मुख्य सार उसने सदैव धारण किया है, नई प्रगति तथा नए प्रभाव के अनुसार अपने को ढालता रहा। भारत की यही परंपरागत प्रथा रही है : वह सदैव नई कलियाँ और पुष्प खिलाता रहा है- सदैव अच्छी बातों को ग्रहण करता रहा- जो उसे प्राप्त हुई-कभी-कभी बुरी बातें भी ग्रहण की परंतु अपनी प्राचीन सभ्यता के प्रति वह सच्चा रहा।5
जवाहरलाल नेहरू के इस भाषण को डिस्कवरी ऑफ इंडिया के साथ मिलाकर पढें6 या वासुदेवशरण अग्रवाल की कला-पुस्तकों के साथ, तो आपको पता चलेगा कि भारतीय समझ का एक सोता दोनों में अविकल रूप से बहता है जो भारत की बहुवचनीयता को किसी तात्कालिक आवश्यकता के अनुरूप जरूरी नहीं मानता था, बल्कि इसे भारत की सांस्कृतिक आत्मा का स्वाभाविक विकास मानता था। अशोक के प्रति उनका यह लगाव किसी चक्रवर्ती सम्राट से किसी आधुनिक शासक का लगाव नहीं था, बल्कि वह एक ऐसे पूर्वज से लगाव था जो भारत की श्रेष्ठ परम्पराओं को दो हजार वर्ष पहले पल्लवित-पुष्पित कर चुका था। जो जवाहरलाल नेहरू भारत की संविधान सभा में भारत के राष्ट्रीय ध्वज को आत्मर्पित करते समय यह कह रहे हों कि भारत प्राचीन सभ्यता के प्रति सदैव सच्चा रहा, उनको किसी तात्कालिक पश्चिमी आधुनिकता और मूल्यों का पैरोकार सिद्ध कर देना समझदारी की बात नहीं होगी। सम्राट अशोक के अभिलेख इस बात की गवाही देते हैं कि वह अपने समय को बदल देना चाहता था, हिंसा और तामझाम से भरे समाज को एक नैतिक भावबोध प्रदान करने की उसकी इच्छा थी। यह इतिहासकारों के बीच विवाद का विषय हो सकता है कि वह ऐसा करने में कितना कामयाब रहा, लेकिन इस पर कोई दो राय नहीं है कि उसने अपने समय को बदलने की पूरी कोशिश की। और यह बदलाव कोई एकरैखिक नहीं रहा था जिसमें किसी समरूप प्रजा का निर्माण किया गया हो। धम्म की शिक्षा देने के बावजूद लोगों के पूर्ववर्ती विश्वास बने रहे और सम्राट ने खुद कहा कि लोगों के अपने विचार विश्वास बने रहें और वे एक दूसरे की निंदा न करें। उसने वाक-संयम को बढावा दिया और कहा कि दूसरे पाषण्डों(संप्रदायों) को निंदित और हल्का करने के प्रयास नहीं किए जाने चाहिए।7
कोई राष्ट्र किन्हीं भौगोलिक इकाइयों का प्रकटीकरण भर नहीं होता है, बल्कि वह मूल्यों, विश्वासों, धार्मिक प्रणालियों, सामाजिक समझदारियों और आर्थिक संगठनों का एक सहयोगी प्रयास होता है। वह धीरे-धीरे विकसित होता है। पश्चिम में राष्ट्र निर्माण एक तात्कालिक आवश्यकता थी। उसे इसी प्रकार परिकल्पित किया गया। इसमें नृजातीयता और भाषा की भूमिका थी, लेकिन वह एक समरूप व्याख्या थी। यूरोप में देश बने थे तो वहाँ एक भाषा एक नृजाति का आधार खोजा गया था। कुछ देश धर्म और समान आदतों के अनुसार बने थे लेकिन बाद में यूरोपीय राष्ट्र-राज्य के अगुआ कई देशों ने अपने नागरिकों को समरूप होने के लिए बाध्य किया। जो इस धारणा में अँट नहीं पाते थे, उनका नरसंहार कर दिया गया। वहाँ संस्कृति, भाषा और जातीयता मृत्यु का कारण बन गयी। भारत ऐसा था ही नहीं। यहाँ बहुलता थी। भारत ऐसा राष्ट्र नहीं बन सकता था। इसलिए वह पश्चिम को अस्वाभाविक लगता था कि भला भारत भी कोई राष्ट्र है! यह तो एक अप्राकृतिक राष्ट्र है। जवाहरलाल नेहरू ने इसका तीखा प्रतिवाद अपनी लेखनी और विचार में लगातार किया। उन्होंने महाभारत से उद्धरण दिए और कहा कि भारतवर्ष की बुनियादी एकता पर इस महाकाव्य में जोर दिया गया है।9 इसे थोडा व्यापक रूप से समझना हो महाभारत पर अग्रवालजी को पढें। महाभारत के भुवनकोश पर्व के बहाने वे भारत की सांस्कृतिक एकता का वर्णन करते है।10 इसी प्रकार उन्होंने भारत की भाषाई विविधता अपने विभिन्न निबंधों में बार-बार की। उन्होंने भारत की कल्पना शब्दों के देश के रूप में की। उन्होंने लिखा कि कम से कम चार हजार वर्षों तक यहाँ जातीय जीवन के उतार-चढाव की हलचलों में शब्द बराबर बनते रहे। कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला हुआ लंबा-चौडा भू-प्रदेश भी शब्द विस्तार का कारण है।11 शब्दों के संसार और उसकी राष्ट्रीय व्याप्ति पर जवाहरलाल नेहरू कहीं और व्यापक स्तर पर सोच रहे थे। 10 मार्च 1959 को मुंबई में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा कि
कितनी करीब हैं, कितनी पास हैं एक-दूसरे के हमारी भाषाएँ, और वह भी भाषाएँ दक्खिन की; आप जानते हैं कि तेलुगु, मलयालम, कन्नड और तमिल, उनके भी कितने संस्कृत के शब्द हैं, बहुत हैं। वह भी(संस्कृत) उनको बाँध देती है। तो असल में हमारी भाषाओं का इतना अंतर देश में है नहीं, जितना लोग समझते हैं। पहले अंग्रेजी जमाने में हमसे कहा जाता था, दुनिया में कहते थे अंग्रेज लोग कि भारत तो एक देश है नहीं... इससे(मुंबई मराठी ग्रंथ संग्रहालय)और भारत की भाषाओं की सेवा हो, वो और भी अच्छा है क्योंकि इससे मराठी का भी लाभ होगा और दूसरी भाषाओं को जानने से औरों को भी लाभ होगा, और भारत की एकता को भी लाभ होगा।12
जिसे भारत की मूलभूत एकता कहते हैं, वह राधाकुमुद मुखर्जी(वासुदेवशरण अग्रवाल के गुरु), रवीन्द्रनाथ टैगोर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, वासुदेवशरण अग्रवाल और जवाहरलाल नेहरू के लेखन और विचार में लक्षित किया जा सकता है। इन सभी मनीषी-कवि-चिंतक-राजनेताओं ने सामूहिक रूप से कहा कि भारत का मूल स्वर बहुवचन का है। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने एक बहुत ही सुंदर रूपक देते हुए कहा कि भारतीय मनीषा ने कला, धर्म, दर्शन और साहित्य क्षेत्र में नाना भाव से महत्त्वपूर्ण फल पाए हैं और भविष्य में भी महत्त्वपूर्ण फल पाने की योग्यता का वह परिचय दे चुकी है। परंतु नाना कारणों से समूची जनता एक ही धरातल पर नहीं है और सबका मुख भी एक ओर नहीं है।13 भारत की जनता अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग मुखों से बोल रही थी। वासुदेवशरण अग्रवाल ने अर्थव्यवस्था, धर्म, संस्कृति और भाषा के आधार पर सिद्ध किया कि भारत एक सुर, एक राग में भले ही नहीं बोलता है, लेकिन एक राष्ट्र का अंतःसूत्र उसे आपस में जोडता है। एक राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान एक दूसरे पर चढी हुए केले के पेड के छिलकों की तरह है। उन्होंने कहा कि जैसे केले के पेड में एक के ऊपर एक चढे हुए परतों के भीतर उसका गाभा रहता है, वैसा ही कुछ भारतीय संस्कृति का रूप है।14 भारत की बहुवचनीयता और उसकी सामाजिक-भाषिकी को महत्त्व देते हुए उन्होंने लिखा है- सबर, मुंडा ,कोल, भिल्ल, संथाल आदि निषाद जातियों की मातृभूमि होने के कारण भारतीय भाषाओं को उनसे प्राप्त होनेवाले अनेक शब्दों का लाभ हुआ। फल, फूल, वनस्पति, औषधि, वृक्ष, नदी, पर्वतों के नामों की व्युत्पत्ति की जब पूरी छानबीन होगी, तब भौतिक जीवन से सम्बन्ध रखने वाले कितने ही शब्द निषाद भाषाओं से अपनाये हुए मिलेंगे।15 यहाँ वे टैगोर के उस प्रसिद्ध कथन के करीब हैं जहाँ उन्होंने भारत को विभिन्न संस्कृतियों का समुद्र कहा था।
चिंतन का पहला चरण देखना है। आप क्या सोचते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप देखते क्या हैं? इसी से तर्क प्रणालियाँ निःसृत होती हैं। चिंतन का पहला चरण देखना ही है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों को, जिसे अग्रवालजी ने जनपद कहा है, देखने के लिए उन्होंने बहुत ही संवेदनशील आँख विकसित की थी। उन्होंने भारतीय जन एवं जनपदों को उसकी संपूर्ण सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, धार्मिक अभिप्रेरणाओं, आर्थिक संरचनाओं और मनो-विनोद के परिप्रेक्ष्य में देखने पर जोर दिया। उन्होंने भारत की जनता के साहित्य, पुरातत्व और सांस्कृतिक जीवन के बीच ऐसे सेतु निर्मित किए जिनसे गुजरकर भारतीय समाज को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। अपने लेखन के द्वारा उन्होंने बताया कि एक देश के रूप में भारत की बहुभाषी- बहुधार्मिक जनता अपने को किस रूप में और किस प्रकार से प्रस्तुत करती रही है। यही बात उन्हें उस समय का प्रमुख चिंतक बनाती है। यह स्पष्ट होता जा रहा था कि भारत की आजादी अब बहुत दिन दूर नहीं है। उसे एक न एक दिन आजाद होना ही है। अपने एक भाषण में नेहरू ने पोलिश भाषा का उदाहरण देते हुए एक बार कहा कि रूस की जारशाही ने पोलिश भाषा को प्रतिबंधित कर दिया था लेकिन इससे पोलिश भाषा मर नहीं गयी। इसने महान लेखकों को जन्म दिया। एक जीवित भाषा अनष्टप्राय है, इससे कोई फर्क नहीं पडता है कि कोई सरकार इसके साथ क्या करती है।16 एक बन रहे राष्ट्र के एकीकरण में सबसे बडी समस्या भाषाओं की विविधता और धर्मों की बहुलता थी। उन सबकी अपनी विश्वदृष्टियाँ थीं और वे एक-दूसरे से टकरा जाती थीं। उनकी किसी भी विशिष्टता को खत्म किए बिना सुंदर देश बनाना एक सामूहिक चुनौती थी। इसे न केवल नेहरू बल्कि उनके कई समकालीन समझ रहे थे।
जो बात हिन्दी साहित्य के निबंधकारों ने नेहरू से बहुत पहले कही थी कि साहित्य जनता की स्वाभाविक चित्तवृत्ति का विकास है, वह विचार 1930 के बाद काफी चुनौतीपूर्ण होता गया था। 25 जुलाई 1937 को मोहम्मद अली जिन्ना को लिखे अपने पत्र में नेहरू ने कहा कि एक जीवित भाषा अपनी जीवनीशक्ति कायम रखती है, यह उन लोगों की भावनाओं को प्रकट करती है जो इसे बोलते हैं। इसकी जडें आम जनता में होती हैं भले ही इसका ऊपरी ढाँचा किसी खास अभिजात्य संस्कृति को प्रकट करे।17 इसके आगे उन्होंने जिन्ना को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि कांग्रेस अल्पसंख्यकों की संस्कृति, भाषा और लिपि की सुरक्षा करेगी।18 अभी 1940 का साल नहीं आया था और इसके बावजूद मुस्लिम लीग मुस्लिमों को, उनकी भाषा और संस्कृति खतरे में है, यह कहकर, एक काल्पनिक बहिष्करण और पीछे छूट जाने के खतरे की तरफ आगाह करके धार्मिक आधार पर गोलबंद कर रही थी। उसने धर्म को भाषा, राष्ट्र और नृजातीयता से जोड दिया था। दूसरी ओर धर्म, भाषा और राष्ट्र के जटिल यूरोपीय अनुभव नेहरू की निगाह से ओझल न थे, और वे भारत को बेहतर ढंग से समझ भी रहे थे, इसलिए वे इन जटिलताओं को एक सामूहिक भागीदारी से सुलझाने की लगातार कोशिश कर रहे थे। खैर, मुस्लिम लीग ने जब पाकिस्तान नामक एक देश बनवाने में सफलता प्राप्त कर ली, देश बन गया, तो उसने धर्म, भाषा और राष्ट्र को एक समरूप इकाई में ढाल देने का प्रयास लाठी के बल पर ही किया। इसके कारण पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों को एक सांस्कृतिक सदमे से गुजरना पडा और पाकिस्तान से निकलकर एक नया देश बना- बांग्लादेश। भाषा ने धर्म को पीछे धकेल दिया। इसी प्रकार वासुदेवशरण अग्रवाल की समस्त रचनओं को यदि आप पढें, तो पाएँगे कि उसमें शुरू से लेकर अंत तक एक भारत बसता है जो जितना शास्त्र में है, उतना ही लोक में। एक की कीमत पर उन्होंने दूसरे को ओझल न होने दिया है। कोई भी सत्ता एकवचन में रहना चाहती है। वह चाहती है कि लोग एक जैसी भाषा बोलें, एक जैसा सोचें और एक जैसे कपडे-लत्ते पहनें। सम्राट भले ही ऐसा चाहे लेकिन ऐसा जनता तो नहीं चाहेगी। किसी भी युग में ऐसा नहीं हुआ। इस विविधतता में उसकी पहचान और ताकत छिपी रहती है। वासुदेवशरण अग्रवाल का लेखन इसका गवाही देता है। भाषा, वस्त्र विन्यास, केश-सज्जा, चन्दन, भाव-भंगिमा- इन सभी के स्तर पर पर भारत एक विविधवर्णी देश है। वासुदेवशरण अग्रवाल अपने लेखन में इस पर बार-बार जोर देते रहे। आजाद भारत में जिस समय की रचना का प्रयास राजनेता और विद्वान कर रहे थे, उसे केवल किसी एकल या समरूप पहचान के आधार पर नहीं समझा जा सकता है। यही उसकी चुनौती है, उसकी खूबसूरती भी।
सन्दर्भ -
1. यहाँ देश का अथ उन अर्थों में राजनीति तक नहीं है जिन अर्थों में उसका विकास यूरोप और एशिया में हुआ बल्कि उसका आशय देश के बोध से है। आरंभिक भारत के राजकीय अभिलेख, महाकाव्य और लौकिक साहित्य में वह देश भाव देखा जा सकता है जिसकी उपनिवेशवाद से टक्कर हुई और जिससे बीसवीं शताब्दी में एक सुनियोजित भारत देश का विकास हुआ।
2. महाभारत, शांति पर्व, 66, 6. वासुदेवशरण अग्रवाल(1952), कला और संस्कृति, साहित्य भवन, इलाहाबाद - 33 पर उद्धृत
3. धर्मपाल(1994), भारत का स्वधर्म, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, पृष्ठ 26.
4. अम्बिकादत्त शर्मा(2020), भारतीय मानस का वि-औपनिवेशीकरण : प्रामाणिक संस्कृतात्मा के प्रत्यभिज्ञान की कार्ययोजना, सेतु प्रकाशन और रज़ा फाउंडेशनन द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित, दिल्ली : 51-52.
5. भारतीय संविधान सभा के वाद-विवाद की सरकारी रिपोर्ट(2014), लोकसभा सचिवालय, नई दिल्लीः 1-47. इस अनुवाद को लेखक द्वारा थोडा-सा सुधारा गया है।
6. जवाहरलाल नेहरू(2004) डिस्कवरी ऑफ इंडिया, पेंगुइन बुक्स, गुडगाँव 134-37
7. परमेश्वरीलाल गुप्त(2014), प्राचीन भारत के प्रमुख अभिलेख, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसीः 33.
8. रामचंद्र गुहा(2007), इंडिया आफ्टर गाँधीः द हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड’स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी, पिकाडोर, भारत के पूर्वकथन(प्रोलॉग) को देखें.
9. जवाहरलाल नेहरू(2004) डिस्कवरी ऑफ इंडिया, पेंगुइन बुक्स, गुडगाँव -106.
10. भारत सावित्री : महाभारत का एक नवीन एवं सारगर्भित अध्ययन, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नई दिल्ली : 442-468
11. कपिला वात्स्यायन (2012), वासुदेवशरण अग्रवाल रचना-संचयन, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली- 287
12. सेलेक्टेड वर्कस ऑफ जवाहरलाल नेहरू (2013), सम्पादक : माधवन के पलत, जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड, नई दिल्ली - 271-72
13. हजारी प्रसाद द्विवेदी(2011), अशोक के फूल, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद - 65
14. कपिला वात्स्यायन (2012), वासुदेव शरण अग्रवाल रचना-संचयन, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली : 528.
15. कपिला वात्स्यायन (2012) - 287.
16. सेलेक्टेड वर्कस ऑफ जवाहरलाल नेहरू (2000), सीरीज 2, वाल्यूम 27, 1 अक्टूबर 1954 से 31 जनवरी 1955, जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड, नई दिल्ली, पृष्ठ 398-400.
17. डोरोथी नॉर्मन(1965), नेहरू र् द फर्स्ट सिक्सटी इयर्स, वॉल्यूम 1, एशिया पब्लिशिंग हाउस, बम्बई, पृष्ठ 519-20

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