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दामोदर धर्मानंद कोसांबी और प्राचीन भारत इतिहास : कुछ संदर्भ

हितेन्द्र पटेल
भारत के अतीत के अतीत के विभ्रम और यथार्थ को लेकर चलने वाले किसी भी विमर्श में दामोदर धर्मानंद कोसांबी (31 जुलाई 1907 - 29 जून 1966) की चर्चा जरूरी है। इस महान विद्वान ने अपने कम से कम ज्ञान के पाँच क्षेत्रों - गणित, सांख्यिकी, फिलोलोजी, इतिहास और जेनेटिक्स में महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप किए।1 इन सभी क्षेत्रों में उनके अवदानों की चर्चा अलग-अलग करने की जरूरत है। इस लघु प्रबंध में उनके इतिहास के क्षेत्र में किए गए कुछ कामों को केंद्र में रखकर उनके विचारों को समझने की एक चेष्टा की गई है।
कोसांबी के जीवन के बारे में कुछ मोटी-मोटी बातों का उल्लेख करना जरूरी है। केंटिश आनंदकुमार स्वामी की तरह वे भारत के बारे में सोचने समझने की प्रक्रिया के साथ विदेश में रहने के बाद जुडे। बाईस बरस की उम्र तक वे अपने यशस्वी पिता- धर्मानंद कोसांबी2 (1876-1947) के साथ अधिकतर विदेश में रहकर ही पढे लिखे। जब उनके पिता कैम्ब्रिज में थे कोसांबी का परिचय नोरबर्ट वाइनर से हुआ। बाद में कोसांबी हारवर्ड में पढे। लेकिन अपनी पढाई जारी नहीं रख कर वे अपने पिता के साथ भारत आ गए जो अब गाँधी के निकट के लोगों में से हो गए थे। उसके बाद हारवर्ड ेफिर से गए, डेढ साल रहे और फिर बी.ए की डिग्री लेकर 1929 में भारत लौट आए। उनके कुछ करीबी चाहते थे कि वे गणित पर केन्द्रित होकर काम करें, लेकिन कोसांबी ने एक साथ ज्ञान के कई क्षेत्रों में रुचि बनाए रखी और लगभग हर क्षेत्र में अपनी विशेष योग्यता सिद्ध की।
उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में जर्मन और गणित पढाने के लिए प्रोफेसर की नौकरी मिली। यह दिलचस्प है कि उनका पहला शोध आलेख भौतिकी की शोध पत्रिका में 1930 में छपा। उसके बाद दो बरस तक उन्होंने अलीगढ में गणित पढाया। 1932 में पुणे के फर्ग्युशन कॉलेज में पढाना शुरू किया और यहाँ उन्होंने सोलह वर्ष तक अध्यापन किया। पहले सात वर्षों तक उन्होंने अपने को मुख्यतः गणित पर अपने को केन्द्रित रखा और उसके बाद समाज विज्ञान की अन्य विधाओं पर ध्यान दिया। उन्होंने संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया और भर्तृहरि पर विशेष रूप से 1945 से 1948 के बीच काम किया। भारत की स्वाधीनता प्राप्ति के आसपास उन्होंने राजनीतिक दिलचस्पी दिखलाई और कम्युनिस्टों के साथ उनकी घनिष्ठता बढी । इसके बाद उन्हें कम्युनिस्ट विद्वान के रूप में देखा जाने लगा। चालीस के दशक के इसी दौर में उन्हें होमी भाभा ने टाटा इन्स्टीच्युट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में काम करने का न्यौता दिया। वे पुणे में ही रहे और वहीं से बंबई के इस संस्थान में 1962 तक काम करते रहे। लंदन और अमरीका के अकादमिक जगत के बडे लोगों से उनका निकट का संबंध लगातार बना रहा। शीत युद्ध के इस दौर में वे विश्व शांति आंदोलन के साथ सक्रिय रूप से काम करते रहे। वे भारत में आणविक शोध के पक्षधर नहीं थे और इस मामले में उनके विचार तत्कालीन युग के बडे लोगों -नेहरू और उनके प्रिय होमी भाभा से नहीं मिलते थे। कई महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर उन्होंने नेहरू की आलोचना की और यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वे मानते थे कि नेहरू के समाजवाद में पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने का ही प्रयास होता रहा। वे बडे-बडे बाँध बनाने के विरुद्ध थे और चाहते थे कि भारत को सौर ऊर्जा पर ध्यान देना चाहिए। इसी दौर में वे प्राचीन भारत के इतिहास के अध्ययन पर अधिक गंभीर हुए जिसके कारण उन्होंने प्राचीन भारत को देखने समझने की एक नई दृष्टि का विकास किया। आज उनकी अधिक ख्याति इसी कारण से हैं। 1956 में उनका इतिहास ग्रंथ छपा जिसका एक ऐतिहासिक महत्त्व है। इस दौर में वे चीन में हो रहे परिवर्तनों को बहुत ध्यान से देख भी रहे थे और चीन जाकर इसके बारे में जान भी रहे थे। मोटे तौर पर उनके बारे में यह कहा जा सकता है कि भारत की तुलना में चीन में जिस तरह से प्रयास हो रहे थे उसे वे बेहतर मानते थे। तत्कालीन शासक वर्ग से वैचारिक दूरी के कारण ही उन्हीं 1962 में टाटा संस्थान से हटाया भी गया। इस तरह से हटाए जाने का लाभ इतिहास को हुआ। बाकी के बचे जीवन का अधिकतर हिस्सा उनके इतिहास और पुरातत्व लेखन को ही अधिक मिला।
कोसांबी ने एक इतिहासकार के रूप में विधिवत कार्य नहीं किया, लेकिन उन्होंने चार पुस्तकें और साठ आलेख इतिहास के लिए लिखे। रामशरण शर्मा के अनुसार उनके इतिहास लेखन ने भारत के इतिहास और इतिहास को देखने की दृष्टि को बदल दिया। सुमित सरकार ने उनके बारे में कहा है कि उनके साथ जो माक्र्सवादी इतिहास लेखन भारत में शुरू हुआ वह बहुत महत्त्व का है जिसकी तुलना विश्व के अन्य हिस्सों में लिखे गए इतिहास से की जा सकती है। इतिहास को राजा महाराजाओं के हिसाब से न देखकर उन्होंने सामाजिक आर्थिक आधार पर विश्लेषित करने की उनकी दृष्टि ने आम जन जीवन के सामाजिक आर्थिक जीवन के बदलाव को ध्यान में रखा। वे माक्र्सवादी लेखकों के बीच पितामह की-सी छवि रखते हैं। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि वे अपने समय के भारतीय माक्र्सवादी लेखकों से बहुत भिन्न थे और जहाँ जहाँ उनको लगता था कि माक्र्सवादी या माक्र्स के अपने विश्लेषण में सुधार किए जाने की जरूरत है उन्होंने किया। अपने समय के प्रभावशाली माक्र्सवादी स्वर श्रीपाद अमृत डाँगे की इतिहास पुस्तक की उनकी समीक्षा को याद किया जा सकता है जिसको पढकर यह विश्वास नहीं होता कि माक्र्सवादी समीक्षक ने एक माक्र्सवादी लेखक की समीक्षा की है। उनके बारे में यह कहा जाता था कि वे ओफिसियल सक्र्सिस्ट (ओम) से भिन्न थे।
एक ख्याति प्राप्त पत्रकार और विद्वान ने उनके बारे में कहा है कि कोसांबी सच्चे देशभक्त थे जो अपने माता-पिता के बाद सबसे ज्यादा इस देश से प्रेम करते थे। दोनों ही पवित्र थे- उनकी माता हिन्दू थी, पिता बौद्ध थे और वे खुद नास्तिक थे। उनकी दृष्टि कैसी थी और किस तरह से वे उदार होकर सोच सकते थे इसके बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा है कि यह सही है कि उन्होंने भागवतगीता की बहुत आलोचना की, लेकिन उसके साथ यह भी कहा कि इस पुस्तक ने किसी भी अन्य पुस्तक से अधिक आंतरिक तरीके से भारतीय चरित्र को सामने रखा है। वे राजनीतिक लाभ के लिए धर्म के दुरुपयोग की कडी आलोचना करते थे। उन्होंने भारत की अवधारणा का एक प्रेरणादायी स्वरूप अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
भारत को लेकर जो भिन्न भिन्न दृष्टियाँ हैं उसमें बुनियादी बातों में से एक यह है कि भारत एक देश या संस्कृति का विचार प्राचीन काल से है और समय के साथ परिवर्तन तो हुए हैं लेकिन मूलतः इस देश/सभ्यता की एकता प्राचीन काल से अब तक एक ही बनी रही है। इस देश और सभ्यता की मूलभूत एकता को ऐतिहासिक रूप से ध्यान में रखना और यह मानना कि इस एकता के मूल में शास्त्र हैं और वे लोक-मानस का प्रतिनिधित्व करते हैं एक दृष्टि के केंद्र में है। इसके साथ सांगोपांग जुडी हुई धारणा यह है कि एक विशिष्ट वर्ग-ब्राह्मण इस ज्ञान को प्राचीन काल से आज तक बढी निष्ठा और समर्पण से अक्षुण्ण रखने में सहायक रहा है। इस क्रम में संस्कृत भाषा का विशेष महत्त्व है। भारत की सभी भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं। इस प्रकार की दृष्टि में भारत की मूलभूत एकता की धारणा की प्रतिष्ठा में यह बात भी है कि वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत में जो मूल धारणाएँ हैं वे एक दर्शन के साथ हैं जो कालांतर में विभिन्न मतों, पंथों के बीच भी एकता को खो नहीं देतीं। आचार और व्यवहार में अंतर है, लेकिन धर्म सबका एक ही है, सभी हिन्दू हैं और उनके बीच कोई स्थाई विभेद नहीं है। बौद्ध, जैन और सभी प्रकार के पंथ हिन्दू धर्म के ही विविध रूप हैं। इस धर्म के ऊपर वास्तविक खतरा तब आया जब बाहर से आकर मुसलमान यहाँ शासन करने लगे। ये दूसरी सभ्यता और धर्म के लोग थे और उन्होंने हिंदुओं की सांस्कृतिक एकता को खत्म करने की कोशिशें लगातार जारी रखा। ये आक्रांता इस देश को मुसलमान नहीं बना पाए और जैसे ही हिंदुओं को अपनी गलती का एहसास हुआ वे संगठित हुए और धीरे-धीरे हिंदुओं ने मुसलमानों का मुकाबला करना शुरू किया। बाद में अंग्रेज़ आए और उसके काल में हिंदुओं ने अपनी एकता के लिए संघर्ष भी किया और साम्राज्यवादी अग्रेज़ी शासन के साथ मुकाबला भी किया। इस राष्ट्रीय आंदोलन में मुसलमानों का योगदान नगण्य था। वे पहले अपने मुसलमानी शासन के लिए लडे और जब सफल नहीं हुए तो या तो अंग्रेजों के साथ चलने लगे या फिर अपने सांप्रदायिक हितों की, अपने विशेषाधिकारों के लिए लडते रहे। वे हिंदुओं के साथ लडने के लिए तैयार तभी तक थे जब तक उनके विशेष अधिकार सुरक्षित रहें। वे अपने धार्मिक हितों को राष्ट्रीय हित से ऊपर रखते थे। उनके लिए हिन्दू ही शत्रु थे। इस श्रेणी के लोगों के लिए जाति व्यवस्था अपने मूल रूप में श्रम का विभाजन था और कालांतर में इसमें कई तरह के अंतर आते रहे। वर्ण व्यवस्था, जिस पर जाति व्यवस्था आधारित थी, समाज के विभाजन को बढाती नहीं थी बल्कि सांस्कृतिक एकता में सहायक ही सिद्ध हुई।
दूसरी ओर ऐसे लोग थे जो यह मानते थे कि भारत में सांस्कृतिक एकता मुसलमानों के आने से खंडित नहीं हुई। समाज में समय के साथ परिवर्तन होते रहे हैं और बुद्ध के समय से ही परंपरागत हिन्दू ढाँचे में लगातार परिवर्तन होते रहे हैं। अधिकतर मुसलमान जो बाहर से आए वे धीरे-धीरे यहाँ के समाज के साथ घुल मिल गए और हालाँकि उन्होंने अपना धर्म अलग रखा वे भी भारतीय हैं। नव्बे प्रतिशत से अधिक भारतीय मुसलमान भारतीय मूल के हैं और उन्होंने धर्म परिवर्तन जरूर किया, लेकिन इससे उनके भारतीय होने पर कोई असर नहीं पडता है। इस धारणा के लोगों के लिए सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे को प्रभावित करने का बहुत महत्त्व है। आक्रांता प्राचीन और मध्यकाल में बाहर से आकार इस देश के रंग में रंग गए और अधिकतर तो हिन्दू धर्म का हिस्सा भी हो गए। इस दृष्टि से विचार करने वालों के लिए जाति व्यवस्था के कारण समाज में विभाजन बढा और सवर्णों द्वारा निचली जातियों का लगातार शोषण हुआ। समय समय पर इस अन्याय का विरोध हुआ और बौद्ध धर्म ने इस तरह के प्रतिरोध की शुरुआत की। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने इसे और आगे बढाया। आधुनिक समय की यह माँग है कि देश की राजनीतिक एकता के लिए जाति व्यवस्था टूटे और हिन्दू और मुसलमान दोनों एक-दूसरे के साथ मिलकर देश की उन्नति के लिए सोचे।
कोसांबी को निश्चित रूप से दूसरी धारा के अंतर्गत रखना चाहिए। प्राचीन शास्त्रों के बीच उन्होंने बहुत अंतर पाया और उन्हें लगा कि संस्कृत और पालि के ग्रन्थों में ब्राह्मणों, बौद्धों और जैनियों के बीच बहुत अंतर है। इसको समझने के लिए उन्होंने मूल स्रोतों तक जाने का निश्चय किया। कोसांबी ने इस काम के लिए संस्कृत सीखी और हालाँकि वे अपने संस्कृत ज्ञान को कामचलाऊ मानते थे, डी.एन. झा ने लिखा है कि उनका संस्कृत ज्ञान बढिया था और उन्होंने संस्कृत ग्रन्थों का बहुत गहराई से अध्ययन किया।
कोसांबी ने प्राचीन काल के बारे में ही लिखा, लेकिन मध्ययुग के बारे में भी वे इस्लाम के प्रभाव के बारे में कैसे सोचते थे इसका अंदाजा उनकी एक उक्ति के आधार पर लगाया जा सकता है। मध्य युग में हिन्दू और मुसलमान दोनों ने आपस में मिलकर बहुत सारी चीजें साझा की थीं। इस बात के विरोध में दो इतिहासकारों- कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और रोमेश चन्द्र मजूमदार के विरोध करने पर एक तरह से चुटकी लेते हुए इन हिन्दू दृष्टि से देखने वाले इतिहासकारों के उपनाम- मुंशी और मजूमदार पर उन्होंने ध्यान दिलाते हुए यह कहना चाहा था कि दोनों ओर से काफी कुछ साझा हुआ था।
कोसांबी के इतिहास लेखन में जिसे सांस्कृतिक संवर्धन (acculturation) का महत्त्व बहुत अधिक है। इस अर्थ में वे माक्र्सवादी सीमा में नहीं रहते। दो संस्कृतियों के बीच देवी-देवता और पूजा-अर्चना और धार्मिक आचार व्यवहारों में काफी आदान प्रदान की ओर उन्होंने ध्यान दिया। वे एक सावधान इतिहासकार की तरह यह लक्षित करते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में ब्राह्मणों के वर्चस्व को स्वीकार किया गया और कबीलाई समाज से वर्गीय समाज में आने की प्रक्रिया में भिन्न भिन्न प्रकार के बदलाव हुए। प्रभात पटनायक ने कोसांबी की इस प्रसंग में प्रशंसा की है। वे लिखते हैं कि कबीलाई समाज से ग्रामीण समाज में आने में कबीले के प्रमुख के लिए पाने को कुछ था; अब वे शासक बन सकते थे और अधिक आय वाले बन सकते थे, लेकिन कबीलाई समाज के अन्य सदस्यों के लिए इस तरह से दूसरे प्रकार के समाज में बदलने में कोई लाभ नहीं था यदि उनकी आय में बढोतरी न होती। ब्राह्मणों की भूमिका को वे इस प्रसंग में इस रूप में देखते हैं कि वे बेहतर उत्पादन के लिए बडे बाज़ार से लेकर उन्नत तकनीक के विकास में सहायक सिद्ध हुई। कोसांबी के अनुसार ब्राह्मण इस भूमिका का पालन इसलिए कर सकते थे क्योंकि वे ही शिक्षित, संस्कृतिवान और ज्ञानी तो थे ही अपने जीविकोपार्जन के लिए अन्य श्रेणियों की तरह श्रम करने से मुक्त थे। उनके पास इस काम के लिए बहुत समय भी था। समाज द्वारा उनके लिए ऐसी व्यवस्था थी कि उन्हें देश में भ्रमण करने हेतु विशेष प्रकार की सुविधा भी थी। ब्राह्मणों की जरूरत राजा को होती थी क्योंकि ब्राह्मण ग्रामीण समाज के बसाने से लेकर उसके विकास में भी सहायक होते थे। यही कारण है कि राजा ब्राहमणों (विशेष कर गंगा तट के) को लाकर बसाते थे। कबीलाई समाज को ग्रामीण समाज के रूप में बदलने में ब्राह्मणों की भूमिका के कारण ही यह संवर्धन (acculturation) संभव हो सका।
मोटे तौर पर कोसांबी अतीत को अतीत के हिसाब से देखने की तुलना में वर्तमान से भविष्य की जरूरतों के अनुसार अतीत के विश्लेषण को सही मानते हैं। उस दौर में इस विषय पर चलने वाली बहस में वे ई.एच.कार की दृष्टि के साथ हैं जिसमें अतीत को वर्तमान से भविष्य के लिए विश्लेषित करने को इतिहास लेखन के केंद्र में रखा गया था।
कोसांबी के अन्य विचार- जाति को वर्ग के हिसाब से लेना भी उस समय के हिसाब से एक बडा हस्तक्षेप था। वे लगातार इस बात पर बल देते रहे कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज में बहुत गहराई से जमी हुई थी। अगर उसका आधार इतना मजबूत नहीं होता, तो बौद्ध धर्म की चुनौती और मुस्लिम आक्रमण के बाद भी शक्तिशाली रूप से जमी नहीं रह पाती। सामंतवादी समाज के बनने के बारे में उन्होंने प्रचलित माक्र्सवादी दृष्टि से थोडा अलग होकर सोचा। रोमिला थापर ने उनके बारे में जब यह कहा कि अगर वे मार्क ब्लाक, फेरनान्द ब्रादेल और कार्ल पोल्यानी के कामों से परिचित होते, तो वे इस संबंध में बेहतर ढंग से सोच पाते। रोमिला थापर की इस बात की कडी आलोचना डी.एन. झा ने की है।
कोसांबी ने इतिहास के केंद्र में जन को रखा , लोक को रखा और वे लगातार इस कोशिश में रहे कि विचार या शक्तिशाली श्रेणी (जैसे ब्राह्मण ) की तुलना में लोक जीवन के बदलावों को इतिहास की संचालन शक्ति के रूप में देखें। वे स्पष्ट हैं कि विचार (आइडिया) तभी शक्तिशाली हो सके जब इसने लोक में अपना प्रभाव बनाया। उन्होंने जन-इतिहास को लिखने पर बल दिया। वानीना ने यह कहा है कि जन इतिहास लिखने के लिए कोसांबी को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रेरित किया। डी. एन. झा ने इस संदर्भ में बिलकुल सही लक्षित किया है कि जन इतिहास के बारे में टैगोर से बहुत पहले (1869 में ही) लेव तोलस्तोय ने लिखा था।
कोसांबी के गीता विषयक विचारों और विभ्रम और यथार्थ के विश्लेषण में भी यह लक्षित किया जा सकता है कि वे जन जीवन के बदलाव के साथ ही ऐतिहासिक परिवर्तनों को देखने की कोशिश में हैं। गीता को वे उत्कृष्ट ग्रंथ मानते हैं, लेकिन वे इस बात पर बल देते हैं कि इसने परिणाम पर ध्यान न देने और किसी भी काम की अपने तरीके से सही मानने का ही संदेश दिया। वे कृष्ण के संदेश को विरोधाभासी मानते हैं। गुप्त काल को स्वर्ण युग मानने वाली इतिहास दृष्टि का वे स्पष्ट विरोध करते हैं और कहते हैं कि गुप्त काल ने राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित नहीं किया (जैसा कि हिन्दू राष्ट्रवादी इतिहासकारों का मत था) बल्कि राष्ट्रवाद ने ही गुप्त वंश को पुनर्जीवित किया। कोसांबी मानते हैं कि किसी भी घटना का वही महत्त्व इतिहास के दूसरे कालखंड में नहीं रहता। किसी भी गंभीर इतिहास चर्चा के लिए यह जरूरी है कि ऐतिहासिक घटना के पीछे के गहरे कारणों को सामने रखना जरूरी है। इतिहास इसलिए इतिहास है क्योंकि इसमें बुनियादी प्रश्नों को रखा जाता है और उसका विश्लेषण उसी के आलोक में होता है। अन्य किसी भी तरह का इतिहास सिर्फ सुपरस्ट्रकचर को लेकर चलता है। किसी के बाद कौन आया यह अलग किस्म का इतिहास है और यह यह देखना कि लोहा के आने के बाद समाज में, उसके उत्पादन सम्बन्धों में किस प्रकार का बदलाव आया यह दूसरे किस्म का। पहला असली इतिहास नहीं है, दूसरा है।
कोसांबी के अवदान पर लिखते हुए इरफान हबीब ने उनके इतिहास को वैश्विक दृष्टि से लिखने के समर्थक के रूप में देखा है। भारत के इतिहास लेखन के संदर्भ में यह महत्त्वपूर्ण सूत्र है। एक ऐसी दृष्टि है जिसके अनुसार हर संस्कृति के अपने अपने मूल्य होते हैं और वैश्विक दृष्टि से देखने पर उसकी सही समझ नहीं बनती। कोसांबी ने माक्र्सवाद की दृष्टि को लेकर लिखा, लेकिन वे इसमें जरूरी परिवर्तन के हामी थे। हबीब के अनुसार 1949 में डाँगे की किताब की समीक्षा में उन्होंने अपने को कठमुल्ला माक्र्सवादी इतिहास से अलग किया। 1956 में अपनी पुस्तक की भूमिका में कोसांबी ने लिखा था कि इतिहासकार को ऐतिहासिक तथ्यों की जाँच के आधार पर ही लिखना चाहिए न कि किसी पूर्वनिर्धारित ढाँचे में रखकर। हबीब ने उन लोगों की कोसांबी के सहारे आलोचना की है जो हर इतिहास को वैश्विक मानदंडों के आधार पर देखने का विरोध करते हैं। खास तौर पर उन्होंने लुई डूमों, एडवर्ड सईद और एन.आर.आई इतिहासकार रणजीत गुहा का उल्लेख करते हैं। सईद द्वारा कोसांबी की आलोचना को हबीब इस संदर्भ में खासतौर पर रेखांकित करते हैं।
उस काल की प्रक्रिया के प्रधान तत्वों के विश्लेषण के बाद ही इतिहास में ठीक से समझी जा सकती हैं। स्पष्ट है कि उनकी इतिहास दृष्टि में जन जीवन ही महत्त्वपूर्ण है, राजा महाराजे या महान संत आदि को केंद्र में रखकर नहीं देखा गया है। कोसांबी जवाहरलाल नेहरू और अन्य लोगों से एक अर्थ में भिन्न हैं। नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में प्राचीन भारत के बारे में बहुत सुंदर टिप्पणियाँ की हैं, लेकिन उन्होंने महान चिंतकों और राजाओं (यथा अशोक) को बहुत महत्त्व दिया। कोसांबी के लिए बुद्ध या अशोक केंद्र में नहीं हैं, उस समय के सामाजिक आर्थिक या टेक्नोलोजी में परिवर्तन हैं। रोमेश चंद्र मजूमदार की पुस्तक की समीक्षा करते हुए एक स्थान पर वे 1955 में दो महत्त्वपूर्ण वाक्य लिखते हैं। वे कहते हैं कि इतिहास की अवधारणा समय के साथ बदलती रहती है; यह इसपर निर्भर होती है कि सत्ता किस वर्ग के हाथ में है। दूसरी बात वे यह कहते हैं कि इतिहास वह है जिसमें धारावाहिक रूप में मीन्स ऑफ प्रॉडक्शन और रिलेशन्स ऑफ प्रॉडक्शन में मूलभूत परिवर्तन किस प्रकार के हुए। ये दो बातें इस बात को मानने के लिए यथेष्ठ हैं कि वे माक्र्सवादी पद्धति से ही प्राचीन भारत के इतिहास को समझने की कोशिश कर रहे थे।
ऐसे समय में जब बौद्धिक क्षेत्र में शोध और मूल्यों के प्रश्न को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिशें हो रही हैं, कोसांबी के जीवन और उनके शोध-मूल्य के बारे में सोचना बहुत जरूरी है। सी.के.राजू ने कोसांबी के इस पक्ष पर विस्तार से लिखते हुए इस बात को कहा है कि कोसांबी आजन्म अपने शोध-मूल्य को लेकर संघर्ष करते रहे। मूल्यों की टकराहटों के कारण उन्हें एक के बाद एक- हारवर्ड, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, फर्ग्युसन कॉलेज और फिर टाटा रिसर्च इन्स्टीच्युट को छोडना पडा। राज्य सत्ता और ज्ञान क्षेत्र के बीच के जटिल सम्बन्धों के मामले में कोसांबी का उदाहरण हमें सोचने के लिए प्रेरित करता है। कोसांबी थोडे-से समझौते के साथ इनमें से किसी भी जगह बने रह सकते थे। खासतौर से उनका नेहरू के साथ जो मतभेद हैं उसके बारे में सोचते हुए कोसांबी के प्रति हमारा सम्मान बढ जाता है। इस प्रसंग में सी.के. राजू और प्रभात पटनायक ने बहुत विस्तार से लिखा है। यहाँ उसके विस्तार में जाना संभव नहीं।
जिस समय कोसांबी लिख रहे थे उस समय भारत में नए प्रकार का इतिहास लिखे जाने की शुरुआत ही हुई थी। बहुत कम आयु उन्हें मिली। ज्ञान की इतनी दिशाओं में वे गए कि राहुल सांकृत्यायन की तरह उन्हें उस श्रेणी के विद्वानों में रखने की जरूरत है जो नेहरू युगीन भारत में अपने असाधारण पांडित्य से अपने देश को समझने में सहायक हो रहे थे और इस पूरी प्रक्रिया में प्रभु वर्ग की शर्तों पर काम करने के लिए तैयार नहीं हुए। जो उनको सही लगा उसे कहते रहे और इस क्रम में इस बात की बिलकुल परवाह नहीं कि सत्ता पर काबिज लोगों को क्या सही लगता है। कोसांबी की एक जीवनी चिंतामणि देशमुख ने मराठी में लिखी है। उसका अनुवाद हिन्दी या अग्रेजी में उपलब्ध हो सके, तो कोसांबी के बारे में और कुछ और बातें हिन्दी के पाठकों को पता चले। कोसांबी का जीवन जीना कठिन रहा होगा। उनका विरोध भी कम नहीं हुआ था। 1950 के दशक की शुरुआत में जब कोसांबी ने भारतीय इतिहास के बारे में अपने विचारों को कलकत्ता के एक प्रसिद्ध संस्थान में रखना शुरू किया उस समय के शायद सबसे सम्मानित इतिहास शिक्षक उठ कर चले गए और उनके पीछे अन्य लोग भी चल दिए। लेकिन कोसांबी में साहस बहुत था। उन्होंने उसी दौरान स्टालिन की उस धारणा का विरोध करना जरूरी समझा जिसमें पूरी दुनिया के समाजों के अध्ययन के लिए एक पीरियडाइजेशन की कोशिश थी। नेहरू की विज्ञान नीति का सीधा विरोध करने का साहस भी उन्हीं के बूते का काम था।
सब्यसाची भट्टाचार्य ने इस बहुआयामी विद्वान के बारे में एक बात और जोडी है जिससे कोसांबी के बारे में चर्चा को और आगे बढाया जा सकता है। उन्होंने कहा है कि उनका सबसे बडा योगदान भारत की सभ्यता के प्रति उनकी दृष्टि है। इस मामले में वे 1965 में प्रकाशित उनकी पुस्तक के संदर्भ में चर्चा करते हुए कहते हैं कि कोसांबी ने तीन हजार सालों तक बनी रही भारतीय सभ्यता की शक्ति के बारे में कोसांबी के विचारों को रखा है। वे उन्हें रवीन्द्रनाथ और गाँधी की उस चिंतन परंपरा में रखकर देखते हैं जिसके अनुसार भारत में राष्ट्रीय एकता नहीं साभ्यतिक एकता रही है जिसके कारण यह समाज एकता के सूत्र में बँधा रहा। इस एकता के पीछे अनेकता में एकता के राष्ट्रवादी आंदोलन के सिद्धान्त को भी कोसांबी से जोड कर देखने की कोशिश उन्होंने की है। लेकिन साभ्यतिक गुणगान में न जाकर कोसांबी कहते हैं कि इस भारतीय सभ्यता और संस्कृति की एकता के पीछे का असली आधार जनता से लिया गया सरप्लस ही है। इसी जन-धन से इस देश की साभ्यतिक एकता का भौतिक आधार तैयार होता रहा है। नेहरू का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा है कि वे भारतीय इतिहास में आए तनावों को दूर करने के लिए सामंजस्य बनाए रखने की (सिंक्रेटिक) प्रवृत्ति ने एकता को बनाए रखा। इस भारतीय सभ्यता की एकता के पीछे असली शक्ति जन धन है और समाज की सामंजस्य बनाने की (सिंक्रेटिक) प्रवृत्ति है, ऐसा कोसांबी का कथन है, यह सब्यसाची भट्टाचार्य का अभिमत है।
सन्दर्भ
1. वे इन क्षेत्रों के अलावा भी बहुत सारी चीजों में दिलचस्पी रखते थे। एक फिल्म निर्देशक ने बताया है कि उन्हें फिल्मों से लगाव था। जब वे हारवर्ड या प्रिंस्टन में रहे थे, वहाँ वे एक फिल्म रोज देखते थे। वे सचमुच फिल्मों से प्रेम करते थे और उन्होंने आपटिक्स पर कुछ काम भी किया था। ... आइजेन्स्टाइन की फिल्म देखने के बाद उन्होंने बताया कि इस फिल्मकार ने हरा फिल्टर 50 का इस्तेमाल किया है ताकि वह सफेदों को छोड सके। यह उन्होंने मुझे तब बता दिया था जब फिल्म संस्थान नहीं बता पाया था। वे फिल्म के कलारूप होने के बारे में बहुत संवेदनशील थे। वे सिनेमा के प्रति लगभग प्रतिबद्ध थे। (यह बातें एक बातचीत में फिल्मकार कुमार साहनी ने उदयन वाजपेयी से कही है।)
2. महान घुमक्कड विद्वान। संस्कृत के प्रकांड पंडित और बौद्ध धर्मावलम्बी। हारवर्ड (अमरीका), इंग्लैंड और और अन्य देशों में अध्यापन। अनायास ही उनके बारे में पढते हुए राहुल सांकृत्यायन का स्मरण होता है। माक्र्सवाद को मराठी में लाने वाले संभवतः वे पहले आदमी थे। राहुल की तरह गाँधी के आंदोलन से जुडे। वे सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल भी हुए। बाद में गाँधी के आश्रम में रहते हुए वहीं अपने प्राण त्यागे।
3. एस.ए.डांगे ने इंडिया फ्रम प्राइमिटिव कम्यूनिज्म टू स्लेवरी (1949) पुस्तक लिखी थी।
4. कोसांबी सांप्रदायिक दृष्टि से मध्यकाल के इतिहास को देखने का विरोध करते हैं। (देखें अनाल्स ऑफ द भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इन्स्टीच्युट, वाल्यूम 35 (1955), डी.एन.झा (संपादित) द मेनी कर्रिएर्स ऑफ डी.डी.कोसांबी, लेफ्ट वर्ल्ड, दिल्ली, 2011, में उद्धृत।
5. शाब्दिक अर्थ ग्रहण करने पर इसको हिन्दी में संस्कृति-संक्रमण के रूप में लिया जा सकता है। मराठी में इसको संवर्धन और बांग्ला में इसके लिए प्रचलित शब्द है- परिपूर्णता। ये तीनों ही इस प्रक्रिया को थोडे थोडे भिन्न रूप में समझने में सहायक हैं। मूल बात है एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति के साथ मिलकर एक ऐसी नई संस्कृति को जन्म देना जिसमें पूर्ववर्ती दोनों संस्कृतियों का समावेश हो।
6. इस विषय में विस्तृत चर्चा के लिए देखें प्रभात पटनायक, कोसांबी एंड द फ्रन्टीयर्स ऑफ हिस्टोरीकल मेटरियलिज्म, डी.एन.झा (संपादित) द मेनी कर्रिएर्स ऑफ डी.डी.कोसांबी, लेफ्ट वर्ल्ड, दिल्ली, 2011।
7. देखें : द इमरजेंस ऑफ नेशनल कैरेक्टर्सि्टक्स (1938-39 में प्रकाशित)। इस आलेख को ब्रजदुलाल चट्टोपाध्याय (स.) द आक्सफोर्ड इंडिया कोसांबीः कम्बाइन्ड मेथड्स इन इंडोलोजी एंड अदर राइटिंग्स, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (2009) में भी रखा गया है।
8. डी.एन.झा, ए स्कॉलर र्कस्ट्रओर्डिनाइर, डी.एन. झा (संपादित), उपरोक्त।
9. कोसांबी ने अपने इतिहास संबंधी विचारों को विभिन्न जगहों पर व्यक्त किया है, लेकिन एकदम स्पष्ट करने के लिए देखें-व्हाट कान्सटिचयूट्स हिस्ट्री (1955)। इसे ब्रजदुलाल चट्टोपाध्याय, उपरोक्त, में संग्रहीत किया गया है।
10. इरफान हबीब,व्हाट कोसांबी हैज गिवन उस। यह दिलचस्प आलेख डी एन झा , उपरोक्त, में संकलित है।
11. सी.के.राजू ने इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली में कोसांबी पर एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा था।
12. इन दोनों बातों का उल्लेख ब्रजदुलाल चट्टोपाध्याय संपादित पुस्तक, जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है, की भूमिका में किया गया है।
13. सब्यसाची भट्टाचार्य ने हिन्दू में एक छोटा-सा लेख लिखा है जिसमें उन्होंने यह उल्लेख किया है। विस्तार के लिए देखें उनकी पुस्तक ताकिंग बैक।
14. भट्टाचार्य ने कोसांबी द्वारा नेहरू के डिस्कवरी ऑफ इंडिया की समीक्षा की चर्चा की है। कोसांबी ने नेहरू को प्राचीन भारत का एक कमजोर (पुअर) इतिहासकार माना है लेकिन यह भी कहा है कि जेल में उनके पास पर्याप्त स्रोत उपलब्ध नहीं रहे होंगे।

सम्पर्क - ऐशिकी अपार्टमेन्ट, प्रथम तल, (बोरो पोल, बैरकपुर के पास) 36/71 ओल्ड कलकत्ता रोड, कोलकाता, मो. ९८३६४५००३३