fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

भगवतशरण उपाध्याय : बहुलतावादी भारतीय संस्कृति का अन्वेषी

अमरेन्द्र शर्मा
हो सकता है मैं तुम्हारे विचारों से सहमत न हो सकूँ, फिर भी मैं तुम्हारे विचार प्रकट करने के अधिकार की रक्षा करूँगा।
- वोल्तेयर
हेथाय आर्य, हेथा अनार्य, हेथाय द्राविड-चीन,
शक-हूण-दल,पठान- मोगल एके देहे होलो लीन।1
- रवीन्द्रनाथ टैगोर
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्य करवाव है।
तेजस्विनावषीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ओं शांतिः शांतिः शांतिः2 - तैतरीय उपनिषद (1।1।1)
संस्कृति समग्र है, अनवरत और सार्वभौमिक है, क्षैतिज और उर्ध्वाधर है। ...परिवर्तन संस्कृति के अवयवों का निर्माता-नियामक है। ...संस्कृति समान प्रयत्नों से उत्पन्न समान विरासत है, संयुक्त और समन्वित प्रयासों का प्रतिफलन है। - भगवतशरण उपाध्याय
भारतीय संस्कृति और उसकी बहुलता की बुनियाद नीति-बोध,जीवन-विवेक और ऐतिहासिक बोध की गतिशीलता पर टिकी हुई है। यह मनुष्य के गुणात्मक उत्कर्ष की प्रक्रिया है। सभ्यता-संस्कृति के साथ विज्ञान की गतिशीलता, मनुष्य के चिंतन की धाराओं को बहुलता के साथ स्पर्श करती है। संस्कृति की विशिष्टता उसकी अनिवार्य गतिशीलता में निहित है। सृजनशीलता संस्कृति का एक अनिवार्य लक्षण होता है। इसलिए संस्कृति जीवंत होती है, जीवाश्म नहीं।3 उपनिषद और रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपर्युक्त उद्धरण की संरचना और उसके दृष्टिकोण, हमें भारतीय चिंतन परम्परा की साझी दुनिया की यात्रा कराती है। इस यात्रा में हम सब, मिलजुल, हमारा, हम जैसे पदबंध और एके देहे होलो लीन बहुलतावादी दृष्टिकोण का स्वीकार और संस्कृति निर्माण में इन सबके संलयन की ऐतिहासिकता की ओर ले जाता है। संस्कृति अपने आप में कोई इतिहास नहीं होता, बल्कि संस्कृति की समझ और उसके अध्ययन की सुविधा के लिए उसके ऐतिहासिक दृष्टिकोणों को समझा जाता है। वोल्तेयर (1694-1778) के उपर्युक्त कथन से हम संस्कृति के परिसर में विभिन्न विचारों के प्रति सहिष्णुता और सम्मान के अनिवार्य भाव के तत्त्व को रेखांकित कर सकते हैं। वोल्तेयर के कथन से हम संस्कृति में/के लोकतंत्र के बने/बचे रहने के संदर्भ को समझ सकते हैं। संस्कृति में, दूसरों के विचार प्रकट करने के अधिकारों की रक्षा से ही हम संस्कृति को न केवल समृद्ध करते हैं, बल्कि उसके माध्यम से ही संस्कृति, बहुलता के तत्त्वों को स्पर्श करती है। बहुलतावादी दृष्टिकोण मनुष्य के चिंतन की महत्तम उपलब्धि कही जा सकती है। भगवतशरण उपाध्याय (1910-1982) मनुष्य की क्षमताओं के वैविध्य को उसकी ऐतिहासिकता में प्रस्तुत करने वाले एक संस्कृति चिंतक रहे हैं। मनुष्य की क्षमताओं के संदर्भ से संस्कृति के बारे में उन्होंने स्पष्ट मत प्रस्तुत किए हैं, जो प्रकृति सिद्ध नहीं, मानव निर्मित है और जिसे मनुष्य अपनी कायिक-मानसिक आवश्यकताओं के लिए बनाता या विकसित करता है, वही संस्कृति है।4 भगवतशरण उपाध्याय, संस्कृति सबंधी अपनी व्याख्याओं में एक लंबी यात्रा करते हैं। भगवतशरण उपाध्याय की इस यात्रा में रवीन्द्रनाथ टैगोर की उपर्युक्त काव्य-पंक्तियों का मर्म शामिल हुआ है। भगवतशरण उपाध्याय के संस्कृति संबंधी विश्लेष्ण में एके देहे होलो लीन की ऐतिहासिक व्याख्या मिलती है। हम यह नहीं जानते कि उन्होंने टैगोर की उपर्युक्त काव्य-पंक्तियाँ पढी थी या नहीं, लेकिन उनके संस्कृति-बोध में टैगोर की काव्य-पंक्तियाँ शामिल दीखती हैं। भगवतशरण उपाध्याय के इस संस्कृति-बोध को इस उद्धरण से समझा जा सकता है, प्रत्येक सांस्कृतिक संफ ने- आग्नेयी और आस्ट्रिक, सुमेरी और असूरी, आर्य और ईरानी, यूनानी और शक, कुषाण और आभीरी, गुर्जरी और हुण, इस्लामी और यूरोपीय, प्रायर् सभी ने भारत को विचारों का एक नवीन समुच्चय प्रदान किया, उसमें ऐसी फलप्रद उत्तेजक गतिविधि पैदा की जिसने अभूतपूर्ण सामाजिक शस्य संचय सुलभ कर दिया।5 यानी आज, जो हमारी सांस्कृतिक उपलब्धियाँ हैं, हमारी जो सांस्कृतिक विरासत है, वह समावेशी है न कि कोई एकल प्रयत्न। यदि हम इसकी एकल व्याख्या करते हैं तो इसका मतलब होगा कि हम अपनी पूरी की पूरी सांस्कृतिक विरासत को ध्वस्त कर रहे हैं। भगवतशरण उपाध्याय संस्कृति में संलयन की विराट प्रक्रिया को बार-बार रेखांकित करते चलते हैं। वे प्रागैतिहासिक मिस्र की छोटी दुनिया के बारे में कहते हैं कि कैसे वह सुमेरिया के बाजारों से ताँबा खरीदती थी। मोहनजोदडो की मुहरें ऊर और कीश में बिकती थी। अरारत और तारसुस के कारवाँ येरुसलम जाते थे और दमिश्क से चलने वाले कारवाँ हिन्दुकुश पर्वत श्रृंखलाओं को लाँघते हुए पाटलिपुत्र पहुँचते थे। स्पेन की मदिरा शंघाई पहुँचती थी। वे बताते हैं कि, किस तरह चीन की चाय, लातिनी अमेरिका की तम्बाकू, बेबिलोनिया के ग्रह-चिन्ह, कोंस्तान्तीन द्वारा आविष्कृत ग्रहनामी सप्ताह का कलेंडर सारी दुनिया में फैल गया था। भगवतशरण उपाध्याय, हमारी वर्णमाला के विकास के बारे में एक दिलचस्प तथ्य कि ओर इशारा करते हैं कि, प्राचीनतर चित्राक्षरों से उभरे सुमेरी प्रतीकाक्षर देश-काल की रगड से उभर कर हमारी आज की वर्णमाला के रूप में प्रस्फुटित हुए।6 संस्कृतियों के संलयन में वे सिंधु घाटी के नंदी को मिस्र के एपिस बैल में परिघतित हो जाने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं। इन्हीं सब आधारों पर वे यह मानते हैं कि, कोई भी इतिहास राष्ट्रीय नहीं हो सकता जैसे कि रसायन शास्त्र या गणित राष्ट्रीय नहीं होता। दरअसल, संस्कृति के सार्वभौम होने की बात का आधार इन्हीं बातों से होकर गुजरता है।
भारतीय संस्कृति असल में भारतीय प्रायद्वीप की विभिन्न जातीय इकाइयों के सुदीर्घ संलयन का प्रतिफलन है। यह संलयन कई शताब्दियों के बीच धीरे-धीरे घटित हुआ है। इस संलयन को सार रूप में समझने के लिए हम यहाँ कुछ संकेतों की तरफ ध्यान दिलाना चाहेंगे। शकों के माध्यम से हमने अपनी संस्कृति में शक संवत शामिल किया। खगोलीय चिन्हों और उसके आधार पर गणना और पंचाग निर्माण की पद्धति अरबों के माध्यम से जाना। भारतीय ज्योतिष में जिस होडाचक्र का उपयोग किया जाता है वह यूनानी शब्द होरस जिसे यूनानी लोग सूर्य देवता कहते थे, से चलकर आया है। संगीत में राग यमन, खमाज, तोडी जैसे राग भारतीय संस्कृति में इस्लाम से चलकर शामिल हुआ है। मनुष्य के जीवन के लिए अनिवार्य रोटी शब्द तुर्की और महात्मा गाँधी (1869-1948) के स्वराज, स्वावलंबन और आजादी के गौरव का प्रतीक चरखा फारसी भाषा से चलकर भारतीय संस्कृति में शामिल हुआ। भारतीय संस्कृति में शामिल तमाम वीरांगनाओं की गाथा में शामिल जौहर शब्द भी हिंदी के शब्द नहीं हैं। भारतीय संस्कृति में जल-प्रलय7 की कथा कही जाती रही है। यह कथा शतपथ ब्राह्मण में दर्ज है। जल-प्रलय की कथा बाइबल में भी दर्ज है और सुमेर की सभ्यता में भी दर्ज हुआ है। कथाओं का संलयन भी हमारी संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा रही है। भारतीय संस्कृति में शामिल ऐसे हजारों शब्दों और सैंकडों कथाओं की सूची बनाई जा सकती है, जिसका संलयन हमारी संस्कृति और भाषा में मौजूद है। भारतीय संस्कृति की बहुलता की संरचना को समझने के लिए इस प्रकार के संलयनों को न केवल सूक्ष्म और उदार तरीके से समझना चाहिए, बल्कि संस्कृति के उन्नतिशील उपलब्धियों के कारकों के प्रति सम्मान भाव का आदर भी होना चाहिए। भगवतशरण उपाध्याय भारतीय संस्कृति के उन्नतिशील उपलब्धियों के कारकों का विशद विवेचन अपनी तमाम रचनात्मकता में करते चलते हैं। भगवतशरण उपाध्याय की तमाम कृतियों में कहीं न कहीं भारतीय संस्कृति के उन्नतिशील उपलब्धियों के कारकों की ध्वनियाँ हमें सुनाई देती हैं। यह स्पष्ट है कि संस्कृति के संपूर्ण परिसर को ऐतिहासिक दृष्टिकोण के साथ ही समझा जा सकता है। भगवतशरण उपाध्याय के चिंतन में यह ऐतिहासिक दृष्टिकोण संस्कृति की सामासिकता को समझने में महत्त्वपूर्ण रहा है। हम यहाँ संस्कृति के बहुलतावादी दृष्टिकोण को समझने में भगवतशरण उपाध्याय के संस्कृति संबंधी विश्लेषणों पर स्वयं को केंद्रित रखेंगे और इन विश्लेषणों को पुष्ट करने करने वाले अन्य संदर्भों का भी उल्लेख करते चलेंगे।
भगवतशरण उपाध्याय एक पुरातत्त्ववेता, इतिहासवेत्ता, संस्कृति चिंतक और सामाजिक तथा ऐतिहासिक परिस्थितियों के संलयन के विचारक के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक छोटे-से गाँव उजियार में हुआ। भगवतशरण उपाध्याय के पिता का नाम पंडित रघुनंदन उपाध्याय और माँ का नाम महादेवी था। भगवतशरण उपाध्याय की प्रारंभिक शिक्षा बलिया में हुई। 1927 में बलिया से मैट्रिक पास करने के बाद, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और लखनऊ विश्वविद्यालय से इतिहास में उन्होंने स्नातकोत्तर किया। महात्मा गाँधी ने जब असहयोग आंदोलन शुरू किया था तब इस आंदोलन में भगवतशरण उपाध्याय भी शामिल हुए थे। इस आंदोलन के दौरान उनकी गिरफ्तारी हुई, आंदोलन में भाग लेने के कारण उनपर मुकद्दमा चला और फिर सजा भी हुई। रुसी क्रांति की सफलता और माक्र्सवादी विचार के बारे में तेज बहस भगवतशरण उपाध्याय के वैचारिक रुझानों में वामपंथी रुझान उत्पन्न कर दिया था, वे मानने लगे थे कि पूँजीवाद के रहते देश की समस्याओं का समस्या मुश्किल है। भगवतशरण उपाध्याय इतिहास का अध्ययन करते हुए इतिहास लेखन को धीरे-धीरे अपनी रचनात्मकता में शामिल करते चले गए। लखनऊ से इतिहास में स्नातकोत्तर करने के बाद वे पटना में प्रसिद्ध इतिहासकार काशीप्रसाद जयसवाल के साथ अपना इतिहास संबंधी शोधकार्य प्रारंभ किया। बाद में वे काशी विश्वविद्यालय की अनुसंधान पत्रिका का संपादन किया। नागरी प्रचारिणी सभा, काशी की ओर से प्रकाशित हिंदी विश्वकोश के संपादक रहे। 1940 में लखनऊ संग्रहालय के पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष बने। 1943 में पिलानी के बिडला कॉलेज में इतिहास के प्राध्यापक नियुक्त हुए। 1952 में चीन में होने वाले विश्व शांति सम्मेलन में भी भारत शिष्टमंडल के एक प्रमुख सदस्य के रूप में शामिल हुए। भगवतशरण उपाध्याय अमरीका, फ्रांस, जर्मनी, पेरिस, कैनबरा आदि स्थानों की भी यात्रा शिष्टमंडल के सदस्य के रूप में की। 1981 में भारत सरकार ने उन्हें मॉरीशस में भारत का राजदूत नियुक्त किया, और वहीं रहते हुए 12 अगस्त 1982 को हृदय गति रुकने से भगवतशरण उपध्याय की मृत्यु हुई। भगवतशरण उपाध्याय के रचना संसार का परिसर बेहद समृद्ध है। वे इतिहास, सामाजिक विज्ञान, भूगोल, कला और संस्कृति संबंधी चिंतन की विशद व्याख्या अपनी कृतियों में प्रस्तुत करते हैं। भगवतशरण उपाध्याय के प्रिय रचनाकार कालिदास रहे हैं। कालिदास पर विस्तार से उन्होंने दो खंडों में कालिदास का भारत और कालिदास पर एक स्वतंत्र किताब कालिदास और उनका युग भी लिखा है। गुप्तकालीन संस्कृति, भारतीय संस्कृति के स्रोत, सांस्कृतिक चिंतन, भारतीय कला और संस्कृति की भूमिका, भारतीय संस्कृति की कहानी, भारतीय नदियों की कहानी, भारतीय नगरों की कहानी, भारतीय भवनों की कहानी, भारतीय संगीत की कहानी, सभ्य मानव का इतिहास, इतिहास और संस्कृति, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भारतीय इतिहास के कुछ रेखाचित्र, दो खण्डों में भारतीय इतिहास के आलोक स्तंभ, तीन खण्डों में प्राचीन यात्री, इतिहास साक्षी है, खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर, अंग्रेजी इतिहास की रुपरेखा, विश्व साहित्य की रुपरेखा, विमेन इन ऋगवेद सहित कई उल्लेखनीय किताब भगवतशरण उपाध्याय की रचनात्मकता के वैविध्य का उदहारण है।
किसी भी सभ्यता-संस्कृति में किसी भी तरह के वर्चस्व की धारणा न केवल गैर-ऐतिहासिक है, बल्कि अवैज्ञानिक भी। क्योंकि सभ्यता और संस्कृति दोनों, मनुष्य की सामूहिक प्रेरणा और विजय के परिणाम हैं, दोनों मानव-जाति की सम्मिलित विरासत है।8 भगवतशरण उपाध्याय अपनी इसी बात को अपनी दूसरी किताब भारतीय संस्कृति के स्रोत में भिन्न ढंग से कहते हैं, ... संस्कृति समान प्रयत्नों से उत्पन्न समान विरासत है, संयुक्त और समन्वित प्रयासों का प्रतिफलन है।9 मनुष्य की सामूहिक प्रेरणा के दृष्टिकोण और समान विरासत की ऐतिहासिकता को सामने रखने के लिए भगवतशरण उपाध्याय अपनी किताब भारतीय संस्कृति के स्रोत में आर्य-अनार्य, द्रविड-असुर, शक-कुषाण और वेद-इस्लाम की चली आ रही सीमित संदर्भों की व्याख्या को एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। वे यह मानते हैं कि, संस्कृति समस्त के लिए समस्त का योगदान है।10 विगत कुछ वर्षों में विज्ञान ने मनुष्य सहित समस्त प्राणी जगत की जेनेटिक्स का न केवल विशद अध्ययन किया है, बल्कि बेहद जरुरी निष्कर्ष भी निकाले हैं। माइक्रोबायोलॉजी के अध्ययन ने मानव-कोशिकाओं, विशेष कर कोशिकाओं के जीन के सूक्ष्म अध्ययन से मानव-विज्ञान से जुडी कई गुत्थियों को सुलझा दिया है। असल में, दुनिया की निर्मिती के आरंभ से ही एक जैविक और सांस्कृतिक संलयन चल रहा है जिसमें कुछ भी स्थिर नहीं कहा जा सकता। जीवन से जुडी हर चीज, प्रतिपल परिवर्तित होती रहती है। इस परिवर्तन में रूप और उसके नाम भी शामिल हैं। ऐसे में संस्कृतियों की यात्रा में कोई जाति, कोई नस्ल, कोई रंग या इनसे जुडी कोई विशिष्टता स्थिर या तय कैसे रह सकती है। कहा जाता है कि प्राचीन समय के मूलनिवासी निग्रिटो थे। निग्रिटो के बाद प्रोटो-ऑस्ट्रेलियाई के आने की बात की जाती रही है। प्रोटो-ऑस्ट्रेलियाई के साथ द्रविड के आपसी संबंधों की बात भी कही जाती है। भूमध्यसागरीय इलाकों से आने वाले लोग और उत्तर-पूर्वी छोर के पर्वतीय तराई क्षेत्रों से आने वाले मंगोलियाई की भी एक दास्तान है। शक, हूण, पठान, तुर्क, अफगान, मंगोलियाई जैसे जाने कितने लोगों के आने-जाने और भारतीय प्रायद्वीप में बस जाने, घुल-मिल जाने की कई दास्तानें हैं। आर्यों के आने को लेकर कई तरह की बहसें रही हैं। जर्मन मूल के ब्रिटिश चिंतक मैक्समूलर (1823-1900) द्वारा भाषा-विज्ञान के संदर्भ से साइंस ऑफ लैंग्वेज नाम से 1861 ई। में एक महत्त्वपूर्ण व्याख्यान दिया गया। पहली बार इसी व्याख्यान में आर्यन शब्द का उल्लेख जनजातियों के एक विशिष्ट समूह के लिए मैक्स मूलर ने किया। इस समूह को पूर्व में इंडो-ईरानी कहा जाता था। मैक्स मूलर के बाद ब्रिटिश लेखक हर्बर्ट जौर्ज वेल्स (1866-1946) ने इस शब्द का इस्तेमाल अपनी किताब आउट लाइन ऑफ हिस्ट्री (1919) में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बनती और बदलती हुई दुनिया की संरचना के संदर्भ से किया था। फ्रेंच लेखक आर्थर द गोबिन्यू (1816-1882) भाषा-विज्ञान और मानव-विज्ञान के संदर्भों को मिलाते हुए आर्य को एक श्रेष्ठ नस्ल के रूप में प्रस्तुत किया। मैक्स मूलर ने आर्थर द गोबिन्यू की धारणा का तीखा विरोध किया, लेकिन आने वाले समय में वर्चस्व और श्रेष्ठता-बोध की राजनीति ने आर्थर द गोबिन्यू की धारणा को बार-बार प्रस्तुत किया गया। इन्हीं धारणाओं के आधार पर जर्मन पुरातत्त्ववेत्ता और एथनोहिस्टेरियन गुस्ताफ कोसिन्ना (1858-1931) जो सांस्कृतिक इतिहास को समझने में दिलचस्पी रखने वाला था ने यह घोषणा कि, आर्यों की मूल भूमि स्कैंडेनेविया का इलाका यानी प्राचीन जर्मनी है। संस्कृति चिंतन में बहुलता के विलोम में नस्लवादी राष्ट्रवाद का बीज यहीं से पडना आरंभ हो गया था। जर्मनी के नाजीवाद में जिसे फलने-फूलने का मौका मिला। रुसी लेखिका हेलेना ब्लावट्स्की (1831-1891) जो 1875 में थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापकों में से एक थीं। थियोसोफिकल आंदोलन के तहत यह माना गया कि आर्यन नस्ल के विकास में ही मानवता की भलाई शामिल है। भारत में दयानंद सरस्वती (1824-1883) भी इसी धारणा के मद्देनजर आर्यसमाज (1975) की स्थापना की और यह कहा कि, पूरी दुनिया को आर्य बनाओ। दयानंद सरस्वती द्वारा प्रस्तावित आर्य समाज सामाजिक सुधार के विभिन्न आंदोलनों से जुडकर धार्मिक कटटरता और पुरोहितवाद का विरोध करता था। दरअसल, दयानंद सरस्वती के चिंतन में आर्य न कोई नस्ल और न ही कोई एक संस्कृति थी, बल्कि यह एक पद्धति थी जिसे कोई भी ग्रहण कर सकता था।
भगवतशरण उपाध्याय, आर्य और द्रविड के संदर्भ के उल्लेख में संस्कृति निर्माण की चेतना के विकास की ऐतिहासिक यात्रा में ग्रहणशीलता की प्रक्रिया के महत्त्व को रेखांकित करते हैं। वे यह बताते हैं कि, आर्यों के सप्तसिंधु में आने से बहुत पहले ही आदि भारतीय अपनी आदिम अवस्था से ऊपर उठ चुके थे। वे तिथियों के प्रयोग की विधि सीख चुके थे। कृषि की विधियाँ, सिंचाई और बाँध निर्माण की जानकारी हो गई थी। वे यह जानने लगे थे कि सपाट धरती पर एक छोर से दूसरी छोर पर जाने के लिए गोल पहिया ही दौड सकता है। कुम्हार के चाक का विकास ने विज्ञान को सबसे बडे सिद्धांत डायनेमिक्स को विकसित करने की प्रेरणा दी। भगवतशरण उपाध्याय अपनी किताब संस्कृति की कहानी में लगभग यही बात कथा रस में डुबोकर प्रस्तुत करते हैं। वे इस कथा में, आदि मानव का उल्लेख करते हुए, शिकार-खेती-आग-औजारों का विकास-पहिये का विकास-पशु पालन- कबीला युद्ध और संघर्ष-सिचाईं के लिए बाँध का निर्माण- धरती की छाती से धातु निकालने की कला का विकास-परिवार की संरचना का विकास-प्रकृति की पूजा-व्यापार की शुरुआत-मुहरों का प्रचलन-मनोरंजन के साधनों का विकास-वेद,उपनिषदों की चर्चा-राजा के स्वरूप का विकास-जात-पात का आरंभ-कर्मकांड की शुरुआत-षड् दर्शन का विकास-व्याकरण और धर्मसूत्र का विकास-महावीर और गौतम बुद्ध का आगमन-भगवत धर्म का प्रचार-कला की उन्नति-शिक्षा केंद्रों की शुरुआत- चीनी यात्रियों का आगमन-इस्लाम का आगमन-संतों का आगमन-मुगलों के द्वारा कला की उन्नति-संगीत का विकास-अंग्रेजों का आगमन-साहित्य का विकास-दर्शन का विकास-नवजागरण का उदय-आधुनिक चिंतन का विकास और उसके मूल्य-बोध को सिलसिलेवार प्रस्तुत करते हैं। इस क्रम में वे आर्यों और द्रविडों के बीच सबंध के भूगोल का उल्लेख करते हैं। आर्य कहाँ से आये यह कहना तो कठिन है परंतु यह भी कहना सही है कि वे यहाँ की जनता में इतने घुल-मिल गए कि दोनों में भेद न रहा। पहले इंच-इंच जमीन लेकर जमकर लडाई हुई, पर बाद में मिलकर एक हो गए। कुछ ही काल बाद आपस में शादी-ब्याह के कारण कई अंशों में रंग का भेद भी मिट चला और दोनों ने मिलकर जिस संस्कृति का निर्माण किया, वह अत्यंत शक्तिशाली थी। वही अगली भारतीय संस्कृति की मजबूत नींव हुई। जिसपर बाद में आर्य सभ्यता के पाए रखे गए। घुल मिल जाने के कारण वही बाद की सभ्यता आर्यों और द्रविडों की सगी बपौती हुई। वह आज हमारी भी विरासत है।11 आर्य और द्रविड के संदर्भ में विचार करते हुए दोनों के बीच के अंतर और विशेषताओं के आधारों के भूगोल को प्रस्तुत करते हुए भगवतशरण उपाध्याय यह प्रतिपादित करते हैं, ....आर्यों के पहले जिन दो जातियों ने भारत में प्रवेश किया, उनमें से एक थी आदि-आस्ट्रिक, भूमध्यसागरीय काले लोगों की, जो फिलस्तीन समीपवर्ती क्षेत्रों से यानी पूर्वी भूमध्यसागरवर्ती क्षेत्रों से यहाँ आयी और दूसरी थी उसी क्षेत्र की साँवले रंग की अधिक सभ्य भूमध्यसागरीय प्रशाखा जो भारत में द्रविड कहलाई। इन दोनों जातियों ने आर्यों पर व्यापक प्रभाव डाला और उन्होंने कुल मिलाकर जो निर्माण किया वह आज हिंदू संस्कृति कहलाती है।12 ऐसा नहीं है कि भारतीय संस्कृति की बहुलता की यह दास्तान केवल भगवतशरण उपाध्याय के चिंतन में शामिल था, बल्कि अपने समय के हर भारतीय चिंतकों, मसलन, स्वामी विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गाँधी आदि ने भारतीय संस्कृति की बहुलता के तत्त्वों की परख की थी। भगवतशरण उपाध्याय की तरह ही हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी ख्यात पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में संस्कृति की बहुलता में संलयन की ऐतिहासिक प्रक्रिया का उल्लेख करते हैं। भगवतशरण उपाध्याय के उपर्युक्त उद्धरण के साथ रामधारी सिंह दिनकर के इस उद्धरण को मिलाकर पढने से कई बाते साफ हो जाती हैं। ...अगर ईसाइयों और मुसलमानों को छोड दें, तब भी, इस देश में एक के बाद एक, कम-से-कम, ग्यारह जातियों के आगमन और समागम का प्रमाण मिलता है, जिन्होंने इस देश को ही अपना देश मान लिया और जिनका एक-एक सदस्य यहाँ की संस्कृति और समाज में भली-भाँति पाच-खपकर आर्य अथवा हिंदू हो गया। नीग्रो, औष्ट्रिक, द्रविड,आर्य,यूनानी,यूची, शक, आभीर, हुण, मंगोल और मुस्लिम आऋमण के पूर्व आनेवाले तुर्क इन सभी जातियों के लोग कई झुंडों में इस देश में आये और हिंदू-समाज में दाखिल होकर सब-के-सब उसके अंग-अंग हो गए। असल में, हम जिसे हिंदू संस्कृति कहते हैं, वह किसी एक जाति की देन नहीं, बल्कि इन सभी जातियों की संस्कृतियों के मिश्रण का परिणाम है।13 असल में, आर्य और द्रविड के तमाम संदर्भों से गुजरते हुए यह लगता है कि, मान्यताओं, तर्कों और विचारों के वैविध्य के साथ संस्कृतियाँ भी अपनी यात्रा में विविधता के तत्त्व को स्पर्श करती हुई, अंगीकार करती हुई गतिशील रहती है। इसलिए संस्कृति की आवाज में हमेशा बहुलता की आवाज शामिल होती है। संस्कृति की ध्वनि में अनेक ध्वनियाँ शामिल हैं। संस्कृतियों का न कोई एक रंग (नस्ल) होता है न कोई एक धर्म और न ही कोई एक राष्ट्र। बहुलतावादी दृष्टिकोण को समझने के लिए इस सिरे को बार-बार देखना चाहिए की, ...हम द्रविड से आर्य हुए हैं, आर्य से हिन्दू और हिन्दू से हिन्दुस्तानी, और द्रविड तथा हिन्दुस्तानी के दोनों सिरों के बीच अनेक जातीय धाराओं का संगम है।14 इसलिए हमारा कोई एक रंग नहीं है। न ही कोई एक धर्म हमारा, होना बहुलता में होना है। हमारी इयत्ता ही बहुलतावादी है। हम अपनी पूरी जीवन प्रक्रिया में बहुरंगी होते हैं, होना चाहते हैं।
संस्कृतियों की समझ प्रायः किसी धर्म या किसी नस्ल या किसी राष्ट्र के साथ की जाती रही है। समझ की यह रवायत काफी प्राचीन है। वाल्तेयर ज्ञानोदय युग का एक फ्रेंच दार्शनिक और लेखक था। वाल्तेयर जब अपनी धारणा प्रकट कर रहे थे, ...धार्मिकता की भावना के लिए किसी भी तरह का धार्मिक संगठन अनावश्यक बल्कि बाधक है क्योंकि वह ऐसी औपचारिकताओं और रस्मों पर टिका होता है जो न केवल गैर जरुरी है बल्कि अन्धविश्वास पैदा करती है।15 तब वे धार्मिक संगठनों के साथ अनिवार्यतः अंधविश्वासों की दुनिया बन जाने के खतरे को देख रहे थे। असल में, धार्मिक संगठनों द्वारा जिस संस्कृति की प्रस्तावना की जाती है वह एकल विचार को बढावा देने वाली होती है, वे बहुलता का विलोम रचते हुए संकीर्ण धार्मिक राजनीति को प्रश्रय देने वाले होते हैं। आधुनिक समय में यह पहचान के साथ जुड कर सभ्यताओं/संस्कृतियों के वर्चस्व की राजनीति के साथ उभर कर हमारे सामने आती रही है। बीसवीं शताब्दी में सैमुहल हटिंगटन (1927-2008) सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान और वर्चस्व की राजनीति के संदर्भ से क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन (1996) लिख चुके थे। अपने समय के अधिकांश चिंतकों ने संस्कृति संबंधी चिंतन किया है। रेमंड विलियम्स (1921-1988) अपनी चर्चित किताब कल्चर एंड सोसायटी (1958) में संस्कृति को व्यापक सामाजिक संदर्भों से प्रस्तुत कर रहे थे। रेमंड विलियम्स द्वारा प्रस्तावित संस्कृति जीवन की समग्र पद्धति के बदले रेमंड विलियम्स से तीन साल छोटे ई.पी थोमसन संस्कृति को संघर्ष की समग्र पद्धति के रूप में प्रस्तुत करते हैं। संस्कृति सबंधी विश्लेषणों में रेमंड विलियम्स हमेशा वर्ग के स्थान पर समुदाय को महत्त्व देते हैं। वर्ग को वे एक वैचारिक धारणा मानते हैं और समुदाय को एक सहज रूप से विकसित मानव समुदाय। ... रेमंड विलियम्स की संस्कृति सबंधी चिंतन के इसी सिरे को पकडकर टेरी इग्लटन अपनी संस्कृति संबंधी चिंतन को एक व्यापक आयाम देते हुए कल्चर इंडस्ट्री पद आविष्कृत करते हैं।16 रेमंड विलियम्स, संस्कृति में विचार की जगह अनुभूति को महत्त्व देते हैं। अनुभूति के इसी नुक्ते से गाँधीवादी विचारक नंदकिशोर आचार्य, संस्कृति पर विचार करते हुए कहते हैं, संस्कृति केवल मूल्य-दृष्टि ही नहीं, मूल्य-निष्ठा भी है। यह केवल विचार नहीं, विश्वास और आचरण भी है। चेतना के विकास का अर्थ विचार का ही नहीं, अनुभूति का विकास भी है।17 इस तरह से संस्कृति मूल्य अर्जित करने की एक प्रक्रिया भी होती है। संस्कृति की बहुलतावादी दृष्टिकोण में मूल्य और अनुभूति के पक्ष का महत्त्वपूर्ण योग रहा है। बीसवीं सदी में संस्कृति, भारतीय उप-महाद्वीप में तीखे साम्प्रदायिक बहसों के साथ प्रस्तुत होती हुई अस्मिता की राजनीति की धुंध में भटकती रही है। कई बार, संस्कृति की बहुलतावादी दृष्टिकोणों को स्थगित कर उसकी एकल धार्मिक व्याख्या या राष्ट्रीय व्याख्या की जाती रही है। भारतीय संस्कृति चिंतक डॉ. देवराज ने एक महत्त्वपूर्ण किताब भारतीय संस्कृति लिखी है। इस पुस्तक की प्रस्तावना की शुरुआत में ही वे लिखते हैं, कि, इस पुस्तक में भारतीय संस्कृति को एक विशिष्ट दृष्टिकोण से देखने का प्रयत्न किया गया है। और फिर आगे भूमिका में वे लिखते हैं, इस पुस्तक में हम सिर्फ हिंदू संस्कृति के ही विकासमान या परिवर्तमान रूप का अध्ययन करेंगे।18 हालाँकि उन्होंने यह माना है कि, भारत में बहुत-सी विदेशी जातियाँ मसलन, यूनानी, कुषाण, शक, हुण, पठान और मुगल, पुर्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेज आदि आयीं हैं और भारतीय संस्कृति में सभी जातियों तथा उनके विभिन्न धर्मों से संबंधित सांस्कृतिक धाराओं का समावेश हो सकता है। आज, इक्कीसवीं सदी की शुरूआती दशक में यह हमारे सामने आक्रामक रूप अखित्यार कर चुकी है। जबकि, संस्कृति में किसी भी तरह की आक्रमकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। यदि संस्कृति की एक मूल्य-दृष्टि और इस कारण एक मूल्य-निष्ठा होती है, तो इस अर्थ में संस्कृति की प्रक्रिया एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में वह भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई बहुलतावादी गुणों को धारण करती हुई गतिशील रहती है। इसलिए ,यदि संस्कृति एक प्रक्रिया है तो वह एक सार्वभौम और सनातन प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया का बुनियादी प्रयोजन और लक्ष्य एक ही है।19 यह लक्ष्य है, संस्कृति में मानव की समानता का स्वीकार। कहना न होगा, इसी लक्ष्य की केंद्रीयता, संस्कृति में बहुलता के आयामों को जोडती है। भारतीय संस्कृति में सूफियों और संतों के विचार इसी बहुलता का स्वीकार है। भारतीय संत परम्परा के त्रिकोण में यदि विंध्य के दक्षिण से तुकाराम, गंगा के कछार से कबीर और बंगाल से चैतन्य के विचारों को यदि लिया जाए तो हमें भारतीय संस्कृति की एक परिवर्तनशील, लचीली और समृद्ध दृष्टिकोण दिखलाई देता है। यह दृष्टिकोण विवेकपूर्ण और मानववादी है, बहुलता की सतह को बार-बार समृद्ध करने वाली है। संस्कृति हमेशा शांति और सार्वभौम कल्याण को अपना ध्येय बनाती है।
संस्कृति की पहचान सामूहिक ही हो सकती है। इसे हम सभ्यता सबंधी दृष्टिकोण से मिलाकर देखते हैं। सभ्यता का मूल संबंध सभा से है। सभा में बैठने की समझ रखने वाला या उसमें बैठने वाला सभ्य कहलाता है, और सभ्य का उचित व्यवहार, सभा वाली समझ का व्यवहार, सभ्यता है।20 सभा समूहवाची संज्ञा है। समूह के अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। सभी दृष्टिकोणों का स्वागत ही सभ्यता है। सभी के स्वागत का भाग ही संस्कृति को बहुलतावादी बनाता है। भारतीय संस्कृति और राजनीति में बहुलतावादी दृष्टिकोण का बने/बचे रहना वर्तमान और आगामी पीढियों के लिए आवश्यक है। वह भी तब जब, 1946 से लगातार लंदन में स्थित द इकॉनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट प्रत्येक वर्ष विश्व के देशों में लोकतंत्र की स्थिति पर सूचकांक जारी करती रही है और जिसके लिए उसने पाँच मानक बना रखें हैं जिसमें से बहुलतावाद के अलावे चुनाव प्रक्रिया, सरकार की कार्य शैली, राजनीतिक भागीदारी, राजनीतिक संस्कृति और नागरिक आजादी शामिल है। 2021 में पिछले वर्ष की तुलना में भारत दो स्थान नीचे खिसक कर 53वें स्थान पर आ गया है। बहुलतावाद के नजरिये से यह कोई अच्छे संकेत नहीं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि संस्कृति बहुलताओं में ही साँस लेती है। बहुलताओं में ह्रास संस्कृतियों को कमजोर कर देगी। संस्कृति की बहुलता के लिए यह आवश्क है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को नमनीय होना चाहिए। चिंतक बर्गशां यह मानते थे कि, व्यक्ति गतिशील है, जबकि संस्थाएँ स्थिरता की और उन्मुख रहती हैं। ऐसी स्थिति में दोनों में संघर्ष स्वाभाविक है। अतः संस्थाओं को इतना लचीला होना चाहिए कि वे व्यक्ति की गतिशीलता का दमन न करें तथा उसकी सर्जनात्मकता के नए विस्फोट से स्वयं को जीवंत बनाए रखें। किसी भी देश की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि वह सर्जनात्मकता को कितना बढावा देती है और सत्ता संरचना से अलग विचार को संस्कृति की बहुलता के लिए कितना और किस तरह से उपयोग करती है। अगर वोल्तेयर, बर्गशां, रेमंड विलियम्स या भगवतशरण उपाध्याय की बात से परहेज हो तो भारतीय चिंतनधारा में स्नान की प्रक्रिया के माध्यम से संस्कृति के लिए बहुलता की आवश्यकता को समझ सकते हैं। भारतीय चिंतनधारा में स्नान करते हुए एक नदी का स्मरण नहीं किया जाता था- बल्कि एक ही साथ गंगा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदा सिंधु कावेरी जलेसिस्मन् सन्निधं कुरु। के माध्यम से कई नदियों को याद किया जाता था। भारतीय चिंतनधारा में शामिल बौद्ध दर्शन या पश्चिम का दर्शन भी इस बात पर यकीन करता है, कि मुक्ति समूह के साथ ही संभव है, मुक्ति अकेले में नहीं होती। भारतीय चिंतन परम्परा के ज्ञाता और व्याख्याकार स्वामी विवेकानंद ने आखिर यूँ नहीं कह दिया था कि, एक-दूसरे को समझो और स्वीकार करो।
संदर्भ और टिप्पणियाँ :
1. रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक लंबी कविता के इस अंश का भावार्थ है, यहाँ आर्य हैं, यहाँ अनार्य हैं, यहाँ द्रविड और चीनी वंश के लोग भी हैं, शक, हूण, पठान और मुगल न जाने कितनी ही जातियों के लोग इस देश में आये और सबके सब एक ही शरीर में समा कर एक हो गए।
2. हम सब एक साथ अपनी रक्षा करें, साथ ही मिलजुल का आहार करें, मिलजुल का परिश्रम, उद्योग और वीरता के कार्य करें ! हमारा ज्ञानोपार्जन तेज से भरा हो ! हम कभी एक दूसरे के प्रति द्वेष न करें, वैर-भाव न रखें ! शांति हो ! शांति हो ! शांति हो!
3. संस्कृति का व्याकरण (1997), नंदकिशोर आचार्य, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, पृष्ठ 128
4. सांस्कृतिक भारत (1955), भगवतशरण उपाध्याय, राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, पृष्ठ 09
5. भारतीय संस्कृति के स्रोत (2006, चतुर्थ संस्करण), भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस, नई दिल्ली, पृष्ठ 10
6. वही, पृष्ठ 02
7. जल प्रलय की कथाएँ अलग-अलग तरह से पूरी दुनिया में मिलती हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रागैतिहासिक काल में कोई विशाल जल प्रलय हुआ होगा, जिसकी स्मृति सारी मानवजाति के इतिहास-बोध में शामिल है। यह जल प्रलय कहाँ और कैसे हुआ होगा और वह कितना बडा था, इस विषय में कई विचार हैं और कई कथाएँ हैं। भारत में जल प्रलय की कथा शतपथ ब्रह्माण में मिलती है। जयशंकर प्रसाद का काव्य कामायनी जल प्रलय की घटना पर ही केंद्रित है। ईसाईयों के पवित्र ग्रंथ बाइबल में भी विशाल जल प्रलय की कथा है, जिसमें सारी पृथ्वी डूब गई थी और नोआह (हजरत नूह) ने एक बडी-सी नाव पर सारे प्राणियों के एक-एक जोडे को बचा लिया था, जिससे प्रलय के बाद फिर से दुनिया बसाई गई थी। एक विवादास्पद विचार यह भी रहा है कि आज से तकरीबन 7,600 वर्ष पहले भूमध्य सागर और काले सागर के बीच ऐसा जल प्रलय हुआ था। कुछ मानते हैं कि शायद लगभग 3,500 वर्ष पहले भूमध्य सागर में कोई सुनामी जैसा जल प्रलय आया था। एक विचार यह भी है कि 5,000 वर्ष पहले हिंद महासागर में कोई बडी उल्का गिरी थी, जिससे भारी बाढ आई थी। सिंधु-घाटी सभ्यता के नष्ट हो जाने का कारण इसी बाढ से जोडी जाती है। बरमिंघम विश्वविद्यालय के पुरातत्त्ववेत्ता जैफरी रोज और कुछ अन्य वैज्ञानिकों ने एक नया विचार हमारे सामने प्रस्तुत किया कि, कैनेडा की प्रागैतिहासिक विशाल झील एगासिज के तटबंध टूट गए थे और उससे जो पानी बहा, उससे हिंद महासागर में भारी बाढ आ गई और अरब प्रायद्वीप का एक बडा हिस्सा पानी के अंदर चला गया। भगवतशरण उपाध्याय अपनी किताब संस्कृति के स्रोत में, जल-प्रलय का उल्लेख करते हुए कुछ भिन्न तथ्य देते हैं, भारतीय जल प्रलय की कहानी असुरियाइयों के जरिए सुमेरी परम्परा से ली गई है। विराट बाढ की यह कथा दुनिया के सभी प्राचीन लोक-विश्वासों का अंग रही है। शतपथ ब्राहमण में इसका जिक्र बाबुली और आसूरी स्रोतों का सहारा लेकर किया गया। यह ऐतिहासिक जल प्रलय करीब 3200 वर्ष ई.पू. बेबिलोनिया में हुई थी और इसकी पहली कहानी ई.पू. 17 वीं शताब्दी के कूनीफार्म लिपी (कीलाक्षरों) में लिखित अभिलेखों में पाई जाती है। यह आलेख उस ब्राहमण (शतपथ ब्राहमण) के रचना काल से कम से कम एक हजार वर्ष पहले का है। पृष्ठ 18-19
8. सांस्कृतिक भारत (1955), भगवतशरण उपाध्याय, राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, पृष्ठ 12
9. भारतीय संस्कृति के स्रोत (2006, चतुर्थ संस्करण), भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस, नई दिल्ली, पृष्ठ 01
10. वही, पृष्ठ 01
11. भारतीय संस्कृति की कहानी (1955), भगवतशरण उपाध्याय, राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली पृष्ठ 37
12. भारतीय संस्कृति के स्रोत (2006, चतुर्थ संस्करण), भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस, नई दिल्ली, पृष्ठ 13
13. संस्कृति के चार अध्याय (2010 तीसरा संस्करण), रामधारी सिंह दिनकर, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ 26
14. साहित्य और कला (1960),भगवतशरण उपाध्याय, आत्मराम एंड सन्स, नई दिल्ली, पृष्ठ 76
15. आधुनिक विचार (1998), नन्दकिशोर आचार्य, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, पृष्ठ 32
16. रेमंड विलियम्स : साहित्य में जन संस्कृति (2021), अमरेन्द्र कुमार शर्मा, समयांतर (संपादक-पंकज
बिष्ट), अगस्त 2011, पृष्ठ 47
17. संस्कृति का व्याकरण (1997), नंदकिशोर आचार्य, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, पृष्ठ 127
18. भारतीय संस्कृति (1994, पंचम संस्करण), डॉ। देवराज, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, पृष्ठ 21
19. संस्कृति का व्याकरण (1997), नंदकिशोर आचार्य, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, पृष्ठ 25
20. सांस्कृतिक भारत (1955), भगवतशरण उपाध्याय, राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली, पृष्ठ 05
21. विवेकानंद की जीवनी (2018, उन्नीसवां पुनर्मुद्रण) रोमाँ रोलाँ, (द लाइफ ऑफ विवेकानंद एंड द
यूनिवर्सल गोस्पेल (1931) का हिंदी अनुवाद डॉ। रघुराज गुप्त ने किया है) अद्वैत प्रकाशन, कोलकाता,
पृष्ठ 32
नोटः आर्य पदबंध संबंधी विभिन्न धारणाओं की एक दूसरी समझ के लिए प्रेमकुमार मणि के लेख को https://www.forwardpress.in/2019/06/history-dravids-aryans-hindi/ पर 03 अक्टूबर 2021 को देखा गया। फॉरवर्ड प्रेस के प्रति आभार।

सम्पर्क - डी-12, शमशेर संकुल,
पोस्ट- हिन्दी विश्वविद्यालय,
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय,
वर्धा, महाराष्ट्र- ४४२००१
मो. ९४२२९०५७५५