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राममनोहर लोहिया : भारतीयता और बहुलता

रघु ठाकुर
भारतीयता और बहुलता आदि शब्दों का इस्तेमाल आजकल देश में बहुत आम है। और एक प्रकार से पिछले लगभग तीन दशक से भारतीय राजनीति और कुछ हद तक साहित्यिक गिरोह बंदियाँ इन के शब्दों के इर्द-गिर्द घूम रही है। स्वाभाविक है, जब कईं शब्द राजनीतिक मुहावरे या हथियार बन जाते हैं, तो उनका प्रचार भी ज्यादा होता है।
अब तो वर्तमान में युद्धरत राजनीतिक समूहों के घात-प्रतिघात के लिए ये दोनों शब्द कुछ-कुछ देश में हिन्दू और मुसलमान के पर्याय जैसे बन रहे हैं। और आज कल ज्यादातर इसी रूप में इनका प्रयोग राजनीतिक योद्धाओं द्वारा किया जा रहा है।
अगर हम भारतीय संविधान को आधार मानें, तो भारतीय संविधान ने धर्म निरपेक्षता को मूल प्रस्तावना में शामिल किया है। और धर्म निरपेक्षता से तात्पर्य है कि राज्य किसी भी व्यक्ति से धर्म के आधार पर कोई पक्षपात न करे। संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समानता वर्णित है। जिसमें कहा गया है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून में समानता और कानूनों की समान सुरक्षा देने से इंकार नहीं कर सकता। इसी प्रकार अनुच्छेद 15 में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म के स्थान के आधार पर राज्य किसी भी प्रकार का भेद भाव नहीं करेगा यह भी वर्णित है।
अनुच्छेद 15(2) में यह स्पष्ट है कि इन आधारों पर कोई व्यक्ति किसी भी सार्वजनिक स्थान कुँआ, तालाब आदि के प्रयोग से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार अनुच्छेद 16 में राज्य की नियुक्ति में उपरोक्त धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर सभी भारतीय नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं। इसी अनुच्छेद में पिछडे वर्गों-कमजोर वर्गों और अनुसूचित जाति-जन जाति के नागरिकों को विशेष आरक्षण व अन्य विशेष प्रकार के उपाय बराबरी पर लाने के लिए बनाने का अधिकार राज्य को दिएा गया है।
अतः हम संविधान के प्रावधान के आधार पर विचार करें, तो उसमें प्रत्यक्ष तौर पर बहुलतावाद या अल्पसंख्यकवाद जैसी कोई कल्पना नहीं है। इन दिनों जो अल्पसंख्यक और बहुलतावाद की बहस चल रही है, वह संविधान, गाँधी और लोहिया के दृष्टिकोण से कुछ अलग है। निसंदेह भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों और धार्मिक अल्पसंख्यकों की संरक्षा के लिए उपाय किए गए हैं। अनुच्छेद 26 में धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की आजादी सुरक्षित की गई है। और इस संबंध में राज्य को जनसुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के आधार पर कानून बनाने का अधिकार दिएा गया है। भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाओं को बनाने और चुनने का अधिकार भी सुरक्षित किया गया है। तथा इन आधारों पर राज्य किसी संस्था को मदद देने में भेदभाव या इंकार नहीं कर सकती कि इसका संचालन किसी अल्पसंख्यक जमात के संगठन कर रहे हैं।
धार्मिक आधार पर अगर संख्यात्मक दृष्टिकोण से देखें, तो मुस्लिम, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध, इसाई और अनेकों धर्म अल्पसंख्यक की परिभाषा में आते हैं। इसी प्रकार भाषाई अल्पसंख्यकों को देखा जाए, तो अनेकों क्षेत्रीय भाषाएँ भी अल्पसंख्यकों में मानी जा सकती है। और जन्मना भाषा या मातृ भाषा के आधार पर गणना की जाएगी, तो फिर तो अंग्रेजी महारानी भी अल्पसंख्यक की परिधी में आ जाएगी। परन्तु देश में यह लगभग एक मतेन सोच या विचार है जो कि तथ्य है कि अंग्रेजी भारतीय भाषा नहीं है। भले ही वह देश में रह रहे कुछेक अंग्रेजों की भाषा है। भाषाई आधार पर अल्पसंख्यक और बहुलतावाद का विभाजन भी कम से कम अभी देश के आम मानस में नहीं है, यद्यपि कई क्षत्रप अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए ऐसी भावनाओं को उभारने का प्रयास करते रहते हैं। जो शिक्षण संस्थाएँ धर्म की अल्पसंख्यकता के आधार पर चलती हैं, उसके लिए सरकारों से समान सुविधाएँ प्राप्त करना उनका अधिकार है।
भारतीयता को लेकर भी एक प्रकार की गैर जरूरी बहस राजनीतिक समूहों के योद्धाओं ने शुरू की है। और जिसका दुष्परिणाम अनेक रूपों में सामने आ रहा है। कुछ लोग अपनी सुविधा और जरूरत के अनुसार किसी को भी भारतीय या राष्ट्रभक्त या गद्दार भारतीय या अभारतीय घोषित करते रहते हैं, और ऐसे प्रयास देश को मानसिक रूप विभाजित कर अनेकों प्रकार के तनाव पैदा कर रहे हैं।
लोहिया की दृष्टि में वे सभी लोग भारतीय हैं, चाहे वह किसी भी धर्म के मानने वाले हो जो भारतीय नागरिकता कानून के अंतर्गत भारतीय नागरिकता प्राप्त हैं। नागरिकता और भारतीयता में कुछ बारीक फर्क भी है। नागरिकता संवैधानिक अधिकार प्रदान करती है। भारतीयता इसके साथ-साथ नैतिक व राष्ट्रीय दायित्व भी निर्धारित करती है।
शायद इसीलिए लोहिया यह भी चाहते थे कि हम भारतीय स्वदेशी उत्पादनों का इस्तेमाल करें और वे अपने जीवन में स्वदेशी वस्तुओं का ही प्रयोग करते थे। यानी उनकी भारतीयता की कल्पना नागरिकता से एक कदम आगे जाती है।
नागरिकता एक तरह से तकनीकी तौर एक नागरिक होने का अधिकार और वैधानिक संरक्षण देती है। भारतीयता नागरिकता से कुछ आगे जाकर संवेदनशीलता, प्रेम, अपनत्व और कुछ स्व निर्धारित मूल्यों के पालन की अपेक्षा करती है। भारतीयता नागरिक से भारतीय सभ्यता-जीवनशैली-स्वदेशी के उपयोग की अपेक्षा करती है। इसलिए लोहिया भारत के नागरिक भी थे और सम्पूर्ण भारतीय थे। वे तो अपने आपको विश्व नागरिक भी कहते थे। लोहिया ने लोगों से यह अपेक्षा की और उन्हें प्रेरित भी करने के प्रयास किए कि हमें भाषा-भूषा-भवन के प्रयोग में भी भारतीय होना चाहिए। इसलिए उनके काल में हमारा नारा होता था, अंग्रेजी में काम न होगा, फिर देश गुलाम न होगा। यानी भाषा भी भारतीयता की एक अपरिहार्य कसौटी है। लोहिया अंग्रेजी के ज्ञान के खिलाफ नहीं थे। बल्कि अंग्रजी की सत्ता और साम्राज्यवाद के खिलाफ थे। वे स्वतः जर्मनी में पढे थे। अंग्रेजी भाषा का गहरा अध्ययन और उस पर अधिकार था। परन्तु वे देश के राजकाज में बोलचाल में अंग्रेजी नहीं चाहते थे। बल्कि वे तो हिंदी और सभी भारतीय भाषाओं को एक साथ चलाना चाहते थे। तमिलनाडु में तमिल गुजरात में गुजराती, महाराष्ट्र में मराठी और केन्द्र में अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी चले यह उनकी भारतीयता थी। वस्त्र और भवन भी उनकी भारतीयता की कसौटी थे। इसलिए कि अंग्रजी बोलने वालों की एक अलग विशेष जमात बन गई थी। जिनका आमतौर पर पहनावा भी अंग्रेजों का था। और भवन भी लुटियन्स जोन जैसे बन रहे थे। जो देश के आम आदमी के लिए विस्मृत करने वाले थे। देश का सामान्य आदमी या अंग्रेजी को न जानने वाला व्यक्ति अंग्रेजी बोलेने वाले को शासक जैसा महसूस करता था क्योंकि उनकी भेष-भूषा भी अंग्रेज शासकों वाली थी- जो अलग पहचानी जा सकती थी। इसी प्रकार भवन निर्माण के मामले में भी भारतीय भवन शैली एक अलग प्रकार की थी। दरअसल लोहिया उन सब प्रतीकों और वस्तुओं के खिलाफ थे। जो व्यक्ति - व्यक्ति के बीच छोटे-बडे का भेद पैदा करती है। भाषा और वस्त्र के आधार पर एक को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन बनाती है, तथा उनके मन में हीन भाव की कुण्ठा पैदा करती है।
लोहिया स्वदेशी के किस सीमा तक पक्षधर थे यह इस एक घटना से समझा जा सकता है। जब वे अमेरिका यात्रा पर जा रहे थे, उस समय स्व. लाडली मोहन निगम उनके सहायक सहयोगी और उनके आने जाने के सामान आदि की व्यवस्था भी देखते थे। डॉक्टर लोहिया के सामान में उन्होंने दाढी बनाने के लिए उस जमाने का प्रचलित सेवन ओ क्लॉक ब्लेड (दाढी बनाने का) रखा था। यह विदेशी निर्मित ब्लैड था। जब लोहिया ने उसे देखा, तो वे लाडलीजी पर जोर से बिगडे और कहा कि अमेरिका और विदेशों में लोग क्या सोचेंगे कि हिन्दुस्तानी एक ब्लेड भी नहीं बना सकते। उसकी जगह उन्होंने देशी निर्मित ब्लैड मँगवाया। यह लोहिया की भारतीयता थी।
उन्होंने देश की शीर्ष अदालतों में अपनी याचिकाओं और मुकदमों की सुनवाई के लिए हिन्दी के प्रयोग की अनुमति माँगी और प्रयोग किया। वे जानते थे कि अदालतों में अंग्रेजी के प्रयोग से न केवल देश के आम आदमी का शोषण होता है, बल्कि वह लुटने को लाचार होता है। न्याय के मंदिरों में समता के बजाए विषमता की दीवार भाषा और भूषा खडी करती है।
लोहिया यह मानते थे कि बाबर विदेशी हमलावर है। वे कहते थे कि हिन्दू-मुसलमान में लडाई नहीं है न ही समस्या है। समस्या तो देशी-परदेशी की है। लोहिया का हैदराबाद में 3 अक्टूबर 1963 को दिएा गया भाषण लोहिया की भारतीयता और बहुलतावाद या अल्पसंख्यकवार के सवालों का सबसे बेहतर उत्तर देता है। (हिन्दू-मुसलमान, पुस्तिका में प्रकाशित)। लोहिया ने अपने भाषण में अल्पसंख्यकवाद और बहुलतावाद की चर्चा नहीं की और न ही उसे आधार बताया। एक तो यह भी समझना होगा की जब हम एक समूह को अल्पसंख्यक के नाम से एकजुट करते हैं, तो एक अर्थ में उनके भावनात्मक शोषण का काम करते हैं, तथा यह भी याद रखना होगा कि ऐसे संबोधन से आप स्वतः भी बहुसंख्यावाद की भावना पैदा कर उनमें एकजुटता पैदा करते हैं, तथा कटघरे बनाकर उन्हें मजबूत करते हैं। दूसरे पक्ष को लोहिया ने व्यक्ति को संख्या के आधार पर नहीं, एक मानव के आधार पर देखने का प्रयास किया। उन्होंने हिन्दू और मुसलमान के सवाल को मानवीय चश्मे से देखा उन्होंने कहा, हिन्दू, मुसलमान और हिन्दुस्तान, पाकिस्तान इन दो सवालों को लेकर अगर दिमाग सुधर पाए तो गजब हो सकता है। दिमाग सुधारने के लिए जो सबसे बडी चीज है। वह है नजर जिसस इतिहास की तरफ देखा जाता है।
वैसे तो हिन्दू मुसलमान में फर्क धर्म का है, लेकिन मैं उस पर कुछ नहीं कहूँगा। हिन्दू कितना भी उदार हो जाए वह राम-कृष्ण को मोहम्मद से कुछ अच्छा समझेगा। मुसलमान भी कितना ही उदार हो जाए वह अपने मोहम्मद को राम-कृष्ण से अधिक कुछ अच्छा समझेगा।
लेकिन 19-20 प्रतिशत से ज्यादा का फर्क न रहे तो दोनेां का मन ठीक हो सकता। वह आगे कहते है। इतिहास पर कौन-सी नजर रखें, यह असली चीज है। आखिर जब हम हिन्दू-मुसलमान की बात करते हैं, तो अरब के मुसलमान की नहीं, हिन्दुस्तान के मुसलमान की और हिन्दुस्तान का मुसलमान तो हिन्दू का भाई है। यह अरब के मुसलमानों का भाई नहीं है। हिन्दू सोच कि है कि पिछले 700/800 वर्षों तक मुसलमानों का राज रहा है। मुसलमानों ने जुल्म किया है, और अत्याचार किया। मुसलमान सोचता है, चाहे वह गरीब से गरीब क्यों न हो कि 700/800 साल तक हमारा राज रहा अब हमें बुरे दिन देखने पड रहे हैं।
लोहिया ने आगे कहा कि मुसलमान ने मुसलमान को मारा है। तैमूरलंग ने भारत म जो चार/ पाँच लाख लोग मारे उनमें लगभग 3 लाख पठान मुसलमान थे। यह सिलसिला भारत में ही नहीं, दुनिया के अनेकों देशों में हुआ है। मसला हिन्दू-मुसलमान का नहीं। बल्कि देशी परदेशी का है। पिछले 700/800 वर्षों में देशी रहा है, नपुंसक और परदेशी रहा है, लुटेरा। इसलिए लोहिया कहते थे हर स्कूल घर में बच्चों को सिखाया जाए चाहे वह बच्चे हिन्दू हो मुसलमान कि रजिया शेरशाह और जाएसी हमारे पुरखे थे। और इसी प्रकार हिन्दू और मुसलमान दोनों यह कहना भी सीख जाए कि गजनी, गौरी और बाबर लुटेरे थे। (हिन्दू और मुसलमान पुस्तिका) यानी लोहिया अल्पसंख्यकवाद और बहुलतावाद के थोपे विभाजन को नहीं बल्कि हिन्दू और मुसलमान की नजर में फर्क को देखकर दुरूस्त करना चाहते थे। अल्पसंख्यकवाद व आजकल बहुलतावाद की छाती पीठ-पीठ कर रोने वालों ने स्वतः जाति विभाजित समाज को एक हिन्दू बना दिएा। उन्हें खुद ही एकजुट करने का तर्क व मसाला दे दिएा है।
लोहिया ने कहा था कि कोई भी देश जब तक सुखी नहीं हो सकता, जबतक उसके सभी अल्पसंख्यक सुखी नहीं हो जाते। मेरा मतलब सिर्फ मुसलमानों से नहीं है। वैसे तो सच पूछो तो मैं मुसलमानों को अलग से अहमियत नहीं देता। मुसलमानों के अंदर जो, ज्यादातर पिछडे लोग हैं, जैसे जुलाहे, धुतिनया आदि उनको मैं अहमियत देता हूँ। ये पाँच करोड मुसलमानों में से लगभग साढे चार करोड है। और इसी प्रकार हिन्दू में भी अधिकांश लोग ऐसे हैं, जो पढाई लिखाई में गरीबी में हर मामले में पीछे हैं, उसी तरह जैसे हरिजन आदिवासी वगैरा। जब तक यह सुखी नहीं होते, तब तक देश सुखी नहीं हो सकता। बारीकी से पढे, तो एक अर्थ में लोहिया का यही विश्लेषण और भाव संविधान ने भी अंगीकार किया था और पिछडों को विशेष प्रावधान का इंतजाम किया था।
लोहिया यह मानते थे कि हिन्दुस्तान पाकिस्तान का बँटवारा कोई हमेशा के लिए नहीं है। किसी भले आदमी को यह बात नहीं माननी चाहिए। हिन्दू-मुसलमान के मन को जोड पाएँ, तो हिन्दुसतान-पाकिस्तान को जोडने का सिलसिला शुरू हो सकेगा। लोहिया चाहते थे कि शक नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जितना ज्यादा हिंदू मुसलमानों के प्रति शक करेंगे, मुसलमान उतना खतरनाक बनेगा, और हिन्दू जितना सद्भावना प्रेम के साथ बर्ताव करेंगे, उतना मुसलमान कम खतरनाक होगा। कुछ लोग पाकिस्तान से आए हुए लोगों को लेकर जासूसी का शक करते हैं। क्योंकि वे लोग वीजा नहीं बढवा सकते। लोहिया ने इनके बारे में कहा हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की सरकारों को इन बेपढे मामूली लोगों पर रहम करनी चाहिए। और इन्हें जासूस बता कर तंग नहीं करना चाहिए।
यहाँ एक घटना का उल्लेख समीचीन होगा। उत्तर प्रदेश के समाजवादी नेता स्वर्गीय केप्टिन अब्बास अली की पत्नी विभाजन के समय पाकिस्तान में थी और विभाजन हो जाने के कारण वापिस नहीं आ पायी। बाद में जब उन्होंने वापस आने के लिए आवेदन किया, तो भारत सरकार ने उनहें स्वीकृति नहीं दी। क्योंकि वे तकनीकी रूप से भारतीय नहीं रहीं। केप्टन साहब ने अपनी समस्या को डॉक्टर लोहिया को बताया। डॉक्टर लोहिया ने तत्कालीन विदेश मंत्री को फोन कर कहा आपका यह कैसा कानून है? मियाँ देशी और बीवी विदेशी। लोहिया के हस्तक्षेप के बाद मरहूम केप्टिन अब्बास अली की पत्नी को भारत की नागरिकता मिली। ऐसे और भी बहुत से प्रकरण मेरी जानकारी में हैं। मैं स्वतः जब 1973 में भोपाल जेल में मीसा मे बंद था, तो मेरे बाजू की बैरेक के एक मुस्लिम भाई रात में बहुत जोर-जोर से रोते थे। एक दिन मैंने उनसे पूछा कि आपको क्या पीडा है? उन्होंने बताया कि मैं बँटवारे के समय छोटा बच्चा था। मेरे बहनोई आज के पाकिस्तान में थे। मैं अपनी बहन के साथ वहाँ गया था। और विभाजन से पाकिस्तानी हो गया। मेरी माँ परिवार सब यहीं था। मैं वीसा लेकर भारत आया तथा यहीं रह गया। शादी हो गई बच्चे हो गए, अब सरकार ने मुझे पाकिस्तानी नागरिक कहकर जेल में बंद कर दिएा है। न नागरिकता देते हैं न रिहा करते हैं। मैंने जेल से स्व. मधुलिमयेजी को, जो उस समय सांसद थे, पत्र लिखा तथा उन्होंने इसे मजबूती से उठाया व तब वे रिहा होकर भारतीय हुए। ऐसी कईं घटनाएँ और भी होंगी।
लोहिया इस बात से दुखी थे कि हिन्दुस्तान के राजनीतिक दल व हिन्दुस्तान के राजनीतिक नेता हिन्दू मुसलमान को बदलने की बात नहीं कहते हैं। वे गलतफहमियों के आधार पर वोट लेने का प्रयास करते हैं। इससे दोनों का मन खराब रह जाता है, बदल नहीं पाता। हमारे राजनीतिक जीवन की सबसे बडी खराबी है कि हम लोग वोट के लोभ में विशेषतः नेता लोग सच कहने से घबराते हैं। साफ-सी बात है कि मुसलमान जैसी चीज नहीं रहना चाहिये राजनीति में, टूटना चाहिये जैसे हिन्दू टूटते हैं अलग-अलग पार्टियों में। लेकिन यह बात कुछ मानी हुई-सी है कि मुसलमान जाएगा तो एक साथ जाएगा। वे आगे कहते हैं सबके सब मुसलमान आमतौर पर एक टुकडी बनकर चले हैं। यह ठीक नहीं है। इसका नतीजा तो यह भी हो सकता है कि हिन्दू लोग सबके सब एक टुकडी में चलने लगे। लोहिया ने जो आशंका 3 अक्टूबर 1963 को व्यक्त की थी, वह आज सामने है। काश, देश के हिन्दू मुसलमान ने गाँधी को समझा होता। लोहिया का सुझाव माना होता, तो देश का राजनीतिक मानचित्र भिन्न होता। इसीलिए लोहिया ने कहा था कि वह मेल तब हो सकता है, जब लोग हिन्दू और मुसलमान की दृष्टि से इकठ्ठा नहीं होंगे, बल्कि अपनी नजर से कि हमको कौन-सी राजनीति करनी है। उसको लेकर इकठ्ठा होंगे। आज हम देख रहे हैं कि इस को कुछ लोगों ने संतुष्टीकरण शब्द का नाम किया है। यह सही है कि ऐसे काम से कट्टरता बढी है, दिमागी बँटवारा बढा है। अगर लोहिया की यह इच्छा साकार हुई होती, तो देश का राजनीतिक भूगोल बिल्कुल अलग होता। परन्तु इस मजहबी एकता और मजहबी विभाजन ने सारे बुनियादी सवालों को पीछे छोड दिएा है। और आज रोजी-रोटी पेट बराबरी सबको नीचे दबाकर ऊपर से हिन्दू मुसलमान के नाम का चादर ढक दिएा जा रहा है।
लोहिया यह मानते थे कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के मसले को हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की सरकारें स्वतः हवा देती है। और विशेषतः तब जब वे अपने देश की आंतरिक समस्याओं को हल नहीं कर पाती, तो हिन्दू और मुसलमान चलाते हैं। हिन्दुस्तान-पाक को अपना सुरक्षा कवच मानता है। आजकल तो मुसलमान और इस्लाम के नाम से ही कुछ जमाते अपना राजनीतिक खेल खेलती है। और एक-दूसरे के कट्टरपंथ को जोर-शोर से परोस कर एक जमात का समर्थन हासिल करती हैं।
लोहिया समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे। और उन्होंने कभी इसे छिपाया नहीं, बल्कि जब वे लोकसभा का चुनाव लड रहे थे। तब उनकी आखिरी सभा जो मुस्लिम बहुल इलाके में थी, को जब वे सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे तो रास्ते में कार में उनके शुभचिंतक साथीयों ने उन्हें सुझाव दिया कि वे इस सभा में कॉमन सिविल कोड पर न बोलें। क्योंकि इससे मुस्लिम वोट कट सकते हैं। लोहिया उनकी बात सुनते रहे, परन्तु उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया और जब वे सभा में बोलने खडे हुए, तो उन्होंने अपनी बात यहीं से शुरू की कुछ साथियों ने मुझे इस सभा में कामन सिविल कोड पर नहीं बोलने की सलाह दी है, क्योंकि इससे आप नाराज हो जाएँगे। मेरी राय में अपने विचारों को छिपाना सबसे बडी बेईमानी है इसलिए मैं यहीं से बात शुरू करूँगा। मैं समान नागरिक संहिता के पक्ष में हूँ और क्यों हूँ। यह उन्होंने समझाया।
लोहिया ने चुनाव जीतने के लिए मुस्लिम जमात के कट्टरपंथी मन का अपने राजनीतिक और वोट के स्वार्थ के लिए इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि कट्टरपंथ को तार्किक चुनौती देकर मनों को बदलने का प्रयास किया। हिन्दू हो या मुसलमान या कोई भी धर्मावलंबी उन्हें धर्म और परंपराओं के फर्क को समझना चाहिए। परंपराएँ युगानुकूल होती है, जो तात्कालिक परिस्थितियों और जरूरतों के आधार पर बनती है। इन्हें धर्म मानना एक भूल है। और उनकी कट्टरताओं से चिफ रहना भी एक प्रकार से भयभीत मानसिकता है, तथा यह साम्प्रादायिक सोच भी हो जाता है। अगर पाकिस्तान या सऊदी अरब में वहाँ की सरकारें कोई बदल करते हैं तो वहाँ के मुस्लिम भाई उन्हें आसानी से मान लेते हैं, और हजम कर लेते हैं। इसी प्रकार अगर भारत में हिन्दू परंपराओं के विरूद्ध कोई नियम कायदा सरकार बनाए, तो भारत का हिंदू समाज उसका विरोध नहीं करेगा। जब सुप्रीम कोर्ट ने व अनेकों हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया था कि सडकों पर या अतिक्रमण कर बनाए गए धार्मिक स्थल हटाए जाए, तो हिंदू समाज ने आमतौर पर इसका विरोध नहीं किया, बल्कि अपवाद छोडकर समर्थन ही किया। कुछ जगह ऐसे मंदिर आदि हटाए भी गए। परन्तु अगर उसी आधार पर मस्जिद को हटाना हो, तो अपवाद छोडकर भले ही मुस्लिम भाई भयवश कुछ खुलकर प्रतिक्रिया व्यक्त न करें, परन्तु उसे मन से स्वीकार नहीं करते और उसमें साम्प्रादायिक दृष्टिकोण खोजने का प्रयास करते हैं। दरअसल यही वह शक है, जिसने हिंदू और मुसलमान के मनों को बिगाडा है जिसका संकेत लोहिया ने दिएा है।
कालांतर में भय मजहबी गिरोहबंदी में बदलता है। फिर वह भय घृणा में तब्दील होता है, और फिर घृणा कलह और संघर्ष में। सऊदी अरब में वहाँ हाकिम ने आदेश दिए, मक्का-मदीना के ध्वनि विस्तारकों की ध्वनि कम की जाए, तो सऊदी अरब के धर्म गुरूओं ने इसे सहर्ष स्वीकार किया। परन्तु जब मैंने ऐसी एक अपील जैन, हिन्दू, बौद्ध, मुसलमान सभी धर्मालंबीयों से की तो कई मुस्लिम मित्रों के विरोध और शक का मुकाबला करना पडा। क्या भजन, प्रार्थना और अजान स्पीकरों पर की जाना चाहिए? निःसंदेह भजन, नमाज, प्रार्थना यह हर धर्मावलंबी का निजी अधिकार है, परन्तु उसे स्पीकरों से कनफोड ध्वनि से दहाडना क्या वास्तव में कोई भक्ति भाव है? कितना अच्छा हो सभी धर्मगुरू एक मतेन यह निर्णय करें, कि मंदिर, मठ या मस्जिद में स्पीकर का प्रयोग नहीं किया जाएगा और कम से कम दीवारों के बाहर तो चुंगे नहीं लगाए जाएँगे। चौंगे पर चिल्लाना कोई धर्म नहीं है। मुझे कबीर की याद आती हे। जब कबीर मुसलमान से कहते है, चढ मुल्ला जो बांग दे क्या बहरो भयो खुदाय और पलटकर हिन्दू से कहते है। बार-बार के मुँडते भेड न बैकुण्ठ जाए। यह तो मैंने एक ही घटना का उल्लेख किया है। ऐसी और भी अनेक परंपराएँ हैं, जिनका उपयोग साम्प्रादायिक मानस एक- दूसरे के खिलाफ औजार के रूप में प्रयोग करता है। आजकल लव जेहाद की बडी चर्चा है। अब प्रेम में धर्म को क्यों आडे आना चाहिए? और न जेहाद को प्रेम के। प्रेम-विवाह या विवाह दो व्यक्तियों के बीच की रजामंदी है। इसमें धर्म कहाँ बीच में आता है? अगर एक बार यह फैसला धर्म गुरू करते की शादी विवाह के लिए धर्म कोई कसौटी नहीं है, उसे बदलना जरूरी नहीं है, तो यह आग की चिंगारी जो करोडों मनो को दिलों को जला रही है, समाप्त हो जाएगी। मैंने अपने एक मित्र जो एक मस्जिद में इमाम है, से पूछा की अकबर और हीराबाई की शादी हुई- रूपमति-राजबहादुर, नरगिस-सुनील दत्त की शादी हुई जिनमें हिंदू को मुसलमान बनने की शादी के लिए धर्म परिवर्तन की बाध्यता नहीं हुई, तो इसे सुधारने में क्या हर्ज है? तो उन्होंने बडे प्रेम से कहा कि वे तो बादशाह हीरो हीरोईन थे।
मैंने उनसे प्रति प्रश्न किया कि क्या बादशाहों के लिए इस्लाम में अलग नियम है? तब वे चुप हो गए फिर बोले कि अगर मैं यह कहूँगा तो मुझे ही यहाँ से भगा दिएा जाएगा।
भारत ने क्रिमिनल लॉ तो एक ही स्वीकार किया है। और 1947 के पहले आज के हिन्दुस्तान पाकिस्तान बांगलादेश सभी में एक ही क्रिमिनल लॉ था। पाकिस्तान और बांगलादेश तो इस्लामिक देश 1947 के बाद ही बने। इन देशों ने धार्मिक परंपराओं के आधार पर शरिया कानून तो विभाजन के बाद स्वीकार किया गया। हिन्दुस्तान में हिन्दुओं ने अपनी कुछ परंपराओं को बदला है। एक उदाहरण मैं यहाँ प्रस्तुत करना चाहूँगा। जब भगवान राम ने बाली को मारा तथा बाली ने उनसे पूछा कि आपने मुझे क्यों मारा? तो राम ने उत्तर दिया-
अनुज बधू भगिनी सुतनारी सुनु सठ ये कन्या सम चारी इन्हंई कुदृष्टि बिलोके जोई। तासु वधे कुछ पाप न होई।
अब यह कानून या पंरपरा जो राम के जमाने की थी अगर आप आज इसका अनुसरण करें, तो हत्या के अपराधी होंगे तथा दण्ड के भागीदार होंगे। अभियोजन और निर्णय धर्म गुरूओं को नहीं करना चाहिये। यह तो शासन व न्यायपालिका का काम है। इसी प्रकार भारत में शरिया कानून अपराधों पर मान्य नहीं है। भारतीय दण्ड संहिता लागू है। अगर मुस्लिम भाई स्वतः उन अप्रासंगिक या गैर जरूरी शरिया कानूनों को बदलने की पहल करें, तो यह बडी घटना होगी। जो मनों को भी बदलेगी तथा साम्प्रदायिकता के तर्क रूपी बाणों को भौंथरा करेगी।
इस्लामिक देशों को छोडकर अन्य कईं देशों के मुसलमान भाई भी लोकतंत्र के तरीके से निर्मित दण्ड संहिता को मान रहे है और यहाँ तक कि वे मन से भी कई शरिया कानूनों के निर्मित प्रावधानों के पक्ष में नहीं है। इन घटनाओं से साम्प्रदायिक मनों और उनकी राजनीति को खुराक मिलती है। पूँजीवादी मीडिया इन बातों का प्रयोग कर दूसरे पक्ष को प्रभावित करता है। शक का यह सिलसिला बढता ही जाता है।
आजकल राजनीतिक शिकारियों ने यह कहना शुरू किया है कि मुसलमान बदल ही नहीं सकता क्योंकि कुरान में कुछ ऐसी बातें हैं, जो मुस्लिम व गैर-मुस्लिम के बीच फर्क व हिंसा को जाएज ठहरती हैं। मैं कुरान के पक्ष-विपक्ष की बहस में न पढकर इतना ही कहूँगा कि सभ्यता का एक अर्थ जड परंपराओं को छोडना या हटा देना होता है। दुनिया के सभी धर्मों ने अपनी कट्टरताओं से छोडकर बदलने का प्रयास किया है। इसाइयों में केथोलिक के सामने प्रोटेस्टेंट आए। हिन्दू में बौद्ध, जैन, सिक्ख, आर्य समाज और ऐसे कितने ही सुधार के प्रयोग हुए। जिन्हें आमतौर पर लोगों ने स्वीकारा, लोहिया ने राम, कृष्ण, शिव की व्याख्या अलग ढंग से की तथा कहा कि नीरक्षीर विवेक का इस्तेमाल किया जाना चाहिये। महात्मा गाँधी ने कहा कि मुझे गीता के 30 श्लोक ही काफी है। उन्होंने गीता को स्वीकारा पर युद्ध को नहीं। तो क्या मुस्लिम भाई ऐसे प्रयोग नहीं कर सकते? कहीं कहीं मुस्लिम भाईयों ने भी अपने अनुकूल सुविधा के अर्थ निकाले हैं। अगर कुछ आगे आए और कट्टरताओं के खिलाफ खडे हों, तो शक की ऊँगलियाँ नीचे हो जाएँगी।
लोहिया की दृष्टि में संघर्ष हिन्दू-मुसलमान का नहीं, वरन कट्टरपंथ नाम उदारपंथ का है। जिस दिन हिन्दू की आक्रामकता का मुकाबला हिन्दू करने लगेंगे - मुसलमान की कट्टरता या मुकाबला मुसलमान करने लगेंगे, उस दिन यह विवाद ही नहीं रहेंगे। जो धर्म जितना उदार व परिवर्तनशील होगा वह उतना ही मानवीय व स्वीकार्य भी होगा। कट्टरताएँ इंसान के मन को समाज को देश को और अंततः धर्मों को भी विभाजित करती हैं। और करती रहेंगी। अगर अच्छी बेहतर व एक दुनिया बनाना है, तो सभी को छोडकर मानवता का रास्ता अपनाना होगा।
लोहिया की दृष्टि में आदमी आदमी है हिंदू- मुसलमान बाद में। वे जाति उत्पीडन - सामाजिक - आर्थिक विषमता, को मिटाने में ही हिन्दू मुसलमान की समस्या का हल देखते थे।
लोहिया ने धार्मिक भय के नाम पर किसी प्रकार के मानसिक सोच या समस्या को स्थान नहीं दिएा। हिन्दुस्तान पाकिस्तान की समस्या का हल लोहिया युद्ध में नहीं, बल्कि भारत-पाक महासंघ और विश्व संसद में देखते थे। वे चाहते थे कि फौरी तौर पर हिन्दुस्तान पाकिस्तान का ढीला-ढीला महासंघ बने जो सुरक्षा विदेश नीति विदेश व्यापार जैसे विषयों पर एक नीति पर चले। इससे हिन्दू मुसलमान - कश्मीर समस्या व हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच के तनाव समाप्त हो सकते है। लोहिया ने कहा इस्लाम हिन्दुस्तान में विजयी बनकर आया था और ऐसे (यानी अलगाववादी या कट्टरपंथी हिन्दू) हिन्दुओं में अभी तक इतना पौरूष नहीं आया कि वे उन दिनों की याद भुला सकें। वे मुस्लिम विरोधी है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जो मुस्लिम विरोधी हैं, वे पाकिस्तान के समर्थक हैं। और जो कोई भी पाकिस्तान का अंत देखने चाहता है, उनको मुसलमानों का हमदर्द बनाना जरूरी है। वे शायद सोचते है कि शक्तिशाली हिन्दू राज्य जो मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानेगा, एक दिन पाकिस्तान को जीतकर गुलाम बना लगा। और इसलिए मुमकिन है कि उन्हें पाकिस्तान का दोस्त कहने पर वे बुरा मानें, लेकिन वह दिन शायद कभी नहीं आएगा। कम से कम जीत और गुलामी के जरिये त नहीं ही आयेगा (संदर्भ-हिन्दुस्तान-पाकिस्तान-लोहिया रचनावली) अब हम इस कथन का गहरा विश्लेषण करें ओर जमीनी सच्चाई देखें। 1971 में पाकिस्तान से बांगलादेश अलग हुआ, पर क्या वह भारत का हिस्सा बन सका? क्या वह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बन सका? आज भी बांगलादेश इस्लामिक देश है जहाँ मुजीर्बुरहमान की बर्बर हत्या की गई थी। कट्टरपंथ आज भी जिंदा है और असंहिष्णुता चरम पर है। आज भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु संपन्न देश हैं। अमेरिका, भारत का दोस्त भी बनेगा और पाकिस्तान का पोषक भी, क्योंकि, वैश्विक पूँजीवाद को युद्ध और हथियार जरूरी है, तथा इसके लिए वैश्विक तनाव। पाकिस्तान का विभाजन तात्कालिक खुशी दे सकता है और शायद दी भी थी, पर बुनियादी समस्यायें यह हल नहीं कर सकता। बुनियादी हल तो लोहिया की दृष्टि से ही निकल सकता है।
यद्यपि लोहिया की दृष्टि में मजहबी या देशी सीमाओं आदि का वैश्विक हल विश्व संसद में ही है। वे चाहते थे कि दुनिया की बालिग मताधिकार के आधार पर निर्वाचित विश्व संसद बने। वे इसके लिए प्रयत्नशील भी थे, तथा विश्व संसद फाउण्डेशन की भारत में स्थापना व उसके काम को आगे बढाना चाहते थे। यद्यपि इस काम के लिए उनके पास धन का अभाव था और उन्होंने कहा भी कि अगर केाई मुझे इसके लिए, धन दे दे तो मैं इस काम को बढाने का प्रयास करूँ। (डॉ. राममनोहर लोहिया रचनावली खण्ड-4 विश्व सरकार विश्व सरकार फाउंडेशन पेज-372) लोहिया सही अर्थों में भारतीय नागरिक थे भारतीय थे, और विश्व संसद के महान सपने को लेकर जीने वाले विश्व नागरिक थे।
सम्पर्क - लोहिया सदन, जहाँगीराबाद, भोपाल
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