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भारतीय परम्परा और बहुलता

राधावल्लभ त्रिपाठी
उपनिषद् कहते हैं - तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्। परमात्मा ने जगत् की सृष्टि की और उस जगत् के एक एक कण में अपने को अनुप्रविष्ट कर दिया। तब वह एक रहा ही नहीं वह अनेक या अनन्त हो गया। बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि परमात्मा अकेला था, अकेला वह रम नहीं पा रहा था, क्यों कि जो भी एक अकेला होता है वह रम नहीं पाता। इसलिए उसने अपने आप को दो कर लिया। आगे कहा है कि परम तत्त्व भीतर यह कामना जाग्रत हुई कि मैं एक हूँ, मुझे बहुत हो जाना चाहिये। एक के भीतर बहुत होने की कामना और उसकी चरितार्थता बहुली भवन है। इसी से बहुलता की हमारी संस्कृति का निर्माण हुआ, और यही हमारी संस्कृति की पहचान रही है।
बहुलता हमें विकल्प और स्वातन्त्र्य प्रदान करती है। वह एकाधिपत्य तथा एकतन्त्रीयता को तोड कर अनन्त की यात्रा पर ले जाती है।
बहुलता एक का अनेक होना है। एक अपने विस्तारित कर के अन्त हो जाता है। बहुल तभी हो सकता है जब पहले एक हो। एक अनेक बन कर अपने को बिखेर देता है। विविधता में एक के पूर्व अस्तित्व की अनिवार्यता नहीं है उसमें बिखराव ही सत्य है, उसे समेट कर एक करने का प्रयास किया जाता है। हम मानते हैं कि भारत में विविधता है , पर इस विविधता में एकता है। विविधता को हम विघटित या रिड्यूस करते हैं। इस तरह बहुलता और विविधता परस्पर विपरीत प्रक्रियाएँ हो जाती हैं।
बहुलता फूल की पंखुडियों की तरह है। पेड एक है, उसकी मूल एक है। उस मूल से अनेक शाखाएँ फूटती है। एक-एक शाखा में कई कई पत्तियाँ आती हैं। फूल आते हैं। हर फूल का एक वृन्त या बन्ध होता है। उसमें पंखुडियाँ फूटतीं हैं। पंखुडियाँ बाद में आती है, केन्द्र जहाँ से पंखुडियाँ फूटती हैं, पहले है। पंखुडियों का एक केन्द्र है। पंखुडियों से उसका सम्बन्ध दो तरह से बताया जा सकता है एक केन्द्रापसारी (centrifugal) दृष्टि है, दूसरी केन्द्राभिमुख (centripetal) दृष्टि। उपनिषद् एक से अनेक की सृष्टि मानते हैं। उन अनेक को वे उसी एक की ओर बढता हुआ ताकता हुआ पाते हैं। उस एक को उन्होंने आनन्द भी कहा है। आनन्द से ही सृष्टि के सारे प्राणी जन्म लेते हैं आनन्द के लिए जीवन में खटते हैं और आनन्द के अभिमुख रहते हैं। यह केन्द्राभिमुखी दृष्टि है। बहुलता के विचार के साथ हमारी परम्परा में यह दृष्टि बनी रही है। तब बहुलता में एकता का सन्धान करने की आवश्यकता नहीं होती, वह स्वतःसिद्ध और प्रत्यक्षगम्य होती है।
हमारी दर्शन और कला की परम्पराएँ एक से अनेक होने तथा अनेक के फिर एक को पाने को जीवन की अभीप्सा मानती आईं हैं।
संस्कृति मनुष्य के बहुलीभवन की उदात्त अभिव्यक्ति है। बहुलीभवन की प्रक्रिया ने हमारी संस्कृति को प्राणवान् और ऊर्जस्वी बनाए रखा है। उसके कारण एक संस्था से दूसरी संस्थाएँ निकल आतीं हैं। एक विद्या से अन्य कईं विद्याएँ निःसृत हो जाती है। संस्थाएँ बनती हैं, उनमें धीरे धीरे विकार आता जाता है, फिर वे टूटती हैं। एक संस्था के विघटन पर हम उसके विकल्प में अन्य संस्थाएँ रच सकते हैं।
अपनी सर्जनशीलता की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य अनेक माध्यम या मंच खोजता आया है। भारत में वैदिक काल में इस सर्जनशीलता की अभिव्यक्ति का एक माध्यम यज्ञ बना। आदिम युग में कुछ लोग अग्नि की वेदी या अलाव के आसपास बैठ कर अपनी सामाजिकता को समझने और अपने अस्तित्व को पहचाननेका प्रयास करते। इसी से यज्ञ की संस्था विकसित होती गई। यज्ञ धीरे-धीरे समूची जाति की रचनाशीलता और अस्मिता की पहचान एक एक गतिशील माध्यम बनता गया। सृष्टि की प्रवहमाण अखण्ड धारा में मनुष्य के समित व्यक्तित्व का विसर्जन यज्ञ है। यज्ञवेदिका के आसपास बैठे लोग अपने संकुचित अहं को विसर्जित कर के एक बडे विश्व की सृष्टि करते थे। यज्ञ की वैदिका से ही हमारी संस्कृति, साहित्य, कला के मानदण्ड निर्मित हुए। यह एक से अनेक होते जाने की-बहुलीभवन की प्रक्रिया की सर्जनात्मक परिणति थी।
इस प्रक्रिया में मनुष्य अपने सीमित अहं की आहुति दे कर विराट् से एकाकार हो जाता है। यज्ञीय आहुति इसी सीमित अहं के विसर्जन और समष्टि से जुडने की प्रतीक है।
यज्ञ मात्र एक कर्मकाण्ड या अनुष्ठान ही नहीं, अनेक रचनात्मक गतिविधियों के आयोजन का सक्रिय मंच था। ब्रह्मोद्य में उत्तम प्रस्तुति करने वाले पण्डितों को कवि तथा विप्र की उपाधि से सम्मानित किया जाता था। यज्ञ में हमारी सारी कलापरंपरा-विशेष रूप में नाट्यपरंपरा के उद्भव के लिए भी बीजवपन हुआ था। यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में बताया गया है कि यज्ञ में गायन के लिए शैलूष तथा नर्तन के लिए सूत को आमंत्रित किया जाना चाहिये। यहाँ सूत, शैलूष आदि के साथ वैणिक (वीणावादक), मार्दंगिक (मृदंगवादक), वांशिक (बाँसुरी बजाने वाला) आदि के उल्लेख से नटमंडली का स्वरूप उपस्थित हो जाता है। श्रौतसूत्रों के उल्लेखों से भी प्रमाणित होता है कि पितृमेध यज्ञ में नृत्त, गीत तथा वादन का आयोजन होता था। इन यज्ञों में बजाए जाने वाले वाद्य तथा गायन की विधियों के विवरण भी श्रौतसूत्रों में मिलते हैं। वीणावादन का अश्वमेध, वाजपेय आदि यज्ञों में अनिवार्य स्थान था। वीणावादन के साथ-साथ गाथाएँ भी इनमें गायी जाती थीं। इस तरह नाट्य, संगीत तथा नृत्त या नृत्य वैदिक यज्ञ के अनिवार्य अंग रहे हैं। वाजपेय यज्ञ में रथों की दौड की स्पर्धा होती थी, जिसका स्वरूप नाटकीय ही था। वैदिक यज्ञों में सभी वर्णों के लोगों की उपस्थिति अनिवार्य मानी गई थी। आपस्तंब धर्मसूत्र के अनुसार दर्शपौर्णमास यज्ञ में शूद्र का रहना आवश्यक था। शतपथ ब्राह्मण में भी पितृमेध यज्ञ में शूद्रों की उपस्थिति यज्ञ की आनुष्ठानिक पूर्णता के लिए अपेक्षित कही गई है। यज्ञ की संस्था से आख्यानों का विकास भी संभव हुआ। नाटक के विकास में आख्यान परंपरा का योगदान निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण है। अश्वमेध यज्ञ एक वर्ष तक चलता था। इसमें दिग्विजय के लिए अश्व को छोड देने के बाद यज्ञ जहाँ प्रारंभ किया जाता था, उस स्थान पर एक वर्ष तक आख्यान कहे व सुनाये जाते थे। इन आख्यानों को पारिप्लव आख्यान कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण के निर्देश के अनुसार अश्वमेध यज्ञ 360 दिनों में दस दस दिन के 36 आख्यानचक्र पूरे कर लिए जाते थे। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि राजसूय यज्ञ में शौनःशेप आख्यान की प्रस्तुति होता के द्वारा की जाती है। शौनःशेप आख्यान में शुनःशेप की कथा है, जिसकी विश्वामित्र ने बलि दिए जाने से रक्षा की। ऐतरेय ब्राह्मण में में ही आख्यानविद् लोगों की चर्चा आई है, जो सौपर्ण आख्यान सुनाते थे।
आगे चल कर वैदिक संस्कृति की धारा पौराणिक संस्कति के साथ संगमित हुई, तो देवालय या मंदिर की संस्था यज्ञ का स्थानापन्न बनती गई। मन्दिर की संरचना यज्ञमंडप की संरचना पर आधारित थी, यज्ञमंडप को यहाँ एक एक स्थायी और सुदृढ स्वरूप प्राप्त हुआ। मंदिरों की गतिविधियों में देवार्चा के अतिरिक्त में पुस्तकालय या हस्तलिखित ग्रन्थों का संग्रहालय, पाठशाला, साहित्य और कलाओं का अनुशीलन, यात्रा महोत्सव अनिवार्यतः सम्मिलित थे । हर मंदिर के साथ एक प्रेक्षागार या नाट्यशाला बनाई जाती थी। विष्णुधर्मोत्तरपुराण में इस प्रेक्षागार का वर्णन किया गया है। मंदिरों में होने वाले यात्रा महोत्सवों का भी वर्णन विधपु तथा अन्य पुराणों में मिलता है। भवभूति, मुरारि आदि श्रेष्ठ नाटककारों के नाटक मंदिरों के यात्रा महोत्सवों में खेले गए। यात्रा महोत्सवों में कई हजार लोगों की भीड जुटती थी।
इन समस्त सांस्कृतिक उपागमों को विविधता में एकता तथा एकता में विविधता - इन दो पद्धतियों से समझा जाता है। पहली बहिर्मुखी दृष्टि है, दूसरी अन्तर्मुखी। पहली की परिणति विभाजन और विघटन करने वाली शक्तियों को उकसाने में होती रही है। बहुलता के प्रत्यय के साथ अन्तर्मुखी हो जाने में इसका एक समाधान है।

सम्पर्क : 21, लैण्डमार्क सिटी, होशंगाबाद रोड,
निकट भे ल संगम सोसायटी,
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