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भारतीय संस्कृति : एकात्मक अथवा सामाजिक

अम्बिकादत्त शर्मा
भारतीय संस्कृति अपनी आत्मप्रतिमा और मौलिक प्रतीक के गुण-सूत्रों के साथ एकात्मक है अथवा यह एक सामासिक (कम्पोजिट) संस्कृति है; इस प्रश्न पर विचार करने से पहले संक्षेप में सर्वप्रथम संस्कृति की अवधारणा पर विचार कर लेना उपयुक्त होगा। संस्कृति के सम्बन्ध में सामान्य तौर पर दो विपरीत धारणायें प्रचलित हैं। प्रथम के अनुसार एक क्षेत्र-विशेष के लोगों के रहन-सहन, रीति-रिवाज, दृष्टिकोण और रचनाओं में एक प्रकार की अनुरूपता पायी जाती है, इसी को संस्कृति कहते हैं। दूसरे के अनुसार बाहर से दिखाई पडने वाली यह क्षेत्रीय और कालक्रम में रूढ हो गई अनुरूपता एक अन्तर्गत तत्त्व की बाहरी अभिव्यक्ति होती है और वह अन्तर्गत सामरस्य ही संस्कृति है। यदि देखा जाए तो संस्कृति विषयक उपयुक्त दोनों अवधारणाएँ व्यापक दार्शनिक परिपे*क्ष्य में व्यक्ति विषयक दो दृष्टिकोणों में मूलित कही जा सकती हैं। उदाहरण के लिए एक दृष्टिकोण से व्यक्ति शरीर विशेष के ऐच्छिक-अनैच्छिक क्रिया-व्यापारों और भाषायी व्यवहार में दिखाई पडने वाली संगति या अनुरूपता है और दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार चेष्टाओं एवं व्यवहार की अनुरूपता किसी अन्तर्गत एकत्व में प्रतिष्ठित होती है और वही अन्तर्गत-एकत्व व्यक्ति का सार है। व्यक्ति का यह अन्तर्गत एकत्व दो तरीके से कार्य करता है। इसमें पहले को वैयक्तिक अनन्यता (पर्सनल आईडेंटिटी) कह सकते हैं जो प्रत्यभिज्ञा की ज्ञानमीमांसीय क्रिया को न केवल आधार देती है बल्कि उसके माध्यम से अभिव्यक्त भी होती है। एक लम्बे अन्तराल के बाद भी जब हम किसी व्यक्ति को वही व्यक्ति के रूप में पहचानते हैं, तो हमारी इस प्रत्यभिज्ञा के माध्यम से उस व्यक्ति की वैयक्तिक अनन्यता ही प्रमाणित होती है। पुनः व्यक्ति के अन्तर्गत एकत्व का एक वृहत्तर आयाम उसकी सांस्कृतिक अनन्यता में देखा जा सकता है। यह सांस्कृतिक अनन्यता साधारण तौर पर परस्पर व्यवहारों के आदान-प्रदान के मर्यादित प्रारूपों के माध्यम से अभिव्यक्ति पाती है। सांस्कृतिक अनन्यता के चलते ही व्यक्ति को किसी भिन्न परिवेश में बाहरीपन का, परायेपन का बोध होता है। पागल व्यक्ति में वैयक्तिक अनन्यता तो होती है लेकिन उसमें सांस्कृतिक अनन्यता सचेतन रूप से कार्य नहीं करती है। सांस्कृतिक अनन्यता के चलते ही व्यक्ति एकल सांस्कृतिक निष्ठा से परिभाषित होता है।
I
द्रष्टव्य है कि व्यक्ति और संस्कृति विषयक उपर्युक्त दो दृष्टिकोणों में उभय विषयक दूसरा दृष्टिकोण ही युक्ततर प्रतीत होता है। इसी दूसरे दृष्टिकोण के सन्दर्भ में व्यक्ति और संस्कृति को उसकी व्यापकता में समझा जा सकता है। मानव-चेतना अपने जैविक स्तर से ऊपर उठकर जब आत्म-चेतन होती है तभी अपने स्वरूप का आक्षेप करते हुए, अपने स्वरूप विषयक, मौलिक प्रतिमा को प्रतिष्ठापित करती है और उसके निहितार्थों को चरितार्थ करने के क्रम में अपने स्वरूप को सिद्ध करती है। वास्तव में कोई व्यक्ति इसी मौलिक प्रतिमा से परिभाषित होता है और इसी मौलिक प्रतिमा के साथ उस व्यक्ति में मौलिक सांस्कृतिक प्रत्यय का भी जन्म होता है। ऐसी बात भी नहीं है कि व्यक्ति के सभी कार्य उसकी स्वरूप विषयक प्रतिमा से ही निर्देशित होते हों, अर्थात् यह आवश्यक नहीं कि व्यक्ति अपने समस्त क्रिया-कलापों के द्वारा अपने स्वरूप की सिद्धि करता हो। व्यक्ति के बहुतेरे कार्य आत्मसिद्धि परक न होकर बाहरी और जैववासना मूलक होते हैं। परन्तु व्यक्ति के सृजनात्मक, रचनात्मक और सार्थकता-निरर्थकता तथा औचित्यानौचित्य से सम्बन्धित क्रिया-कलाप आवश्यक रूप से आत्मप्रतिष्ठापक और आत्मसिद्धि-कारक होते हैं। व्यक्ति की यही आत्मप्रतिमा जब सामूहिक आत्मप्रतिमा में रूपान्तरित होती है, तो एक संस्कृति-विशेष की आत्मप्रतिमा का आक्षेप होता है जो उस समूह में भाग लेने वाले व्यक्तियों के विचार, व्यवहार और भौतिक-चैतसिक निर्मितियों को अनुरूपता भी प्रदान करती है। जब हम किसी संस्कृति के धर्म, नीति, दर्शन, साहित्य, विज्ञान और कलाकृतियों की बात करते हैं तो वास्तव में उस अन्तर्गत एकत्व को ही लक्षित कर रहे होते हैं और उसके आधार में एक ऐसी आत्मप्रतिमा होती है जो विशेष न होकर सामान्य प्रकार की होती है। ऐसी सामान्य आत्मप्रतिमा जो विशेष-विशेष व्यक्तियों में व्याप्त रहते हुए उनके ही माध्यम से व्यंजित होती है।
अब यदि संस्कृति की अवधारणा विषयक उपर्युक्त टिप्पणी के सन्दर्भ में संस्कृति के सामान्य-लक्षण और विशेष-लक्षण को निर्धारित करने का प्रयास किया जाए, तो कहा जा सकता है कि संस्कृति अपने सारभूत अर्थ में चैत्त अर्थात् मनोमय स्तर का अस्तित्व और जातीय किस्म का व्यक्तित्व है। इसका अधिष्ठान, वास्तव में, भौगोलिक क्षेत्र न होकर लोकमानस होता है। ऐसा होने से ही संस्कृति को मनोमय सत्ता के रूप में समाज की अन्तरात्मा से अभिहित किया जा सकता है। यही संस्कृतात्मा जब देहधारी व्यक्ति समूह को अपने में अधिष्ठित कर उसके द्वारा एक भौतिक आयाम में अपने को प्रकट करती है, तो संस्कृति के विशिष्ट-विशिष्ट रूप अस्तित्व में आते हैं।1 इस तरह सांस्कृतिक जीवन के विशिष्ट रूपों को उनके स्वरूप एवं अभिव्यक्ति नामक दो पक्षों के माध्यम से समझा जा सकता है। किसी संस्कृति विशेष का स्वरूप पक्ष जहाँ उसकी आत्मप्रतिमा में मूलित तत्त्व दृष्टि और मूल्य दृष्टि से पहचानी जाती है, वहीं उसका अभिव्यक्ति पक्ष उस तत्त्व दृष्टि और मूल्य दृष्टि के क्रियान्वयन में जीवन जीने का संस्थानीकृत गतिशील इतिहास होता है।
किसी संस्कृति-विशेष का अभिव्यक्ति पक्ष अपने आप में एक गतिशील अवधारणा है। इसमें अन्यान्य कारणों से विभिन्न प्रकार के परिवर्तन घटित होते रहते हैं। कुछ परिवर्तन उस संस्कृति विशेष की आन्तरिक गतिशीलता में विकास रूप से तो कुछ विकार रूप से घटित हो सकते हैं लेकिन तब भी संस्कृतात्मा (स्वरूप) उन विकासात्मक अथवा वैकारिक परिवर्तनों से नहीं बल्कि उन परिवर्तनों के बीच उन्हें धारण करने वाले स्थायी मूल्यों से पहचानी जाती है। उदाहरण के लिए जाति-पाँति, छुआ-छूत के भेदभाव को भारतीय संस्कृति के अभिव्यक्ति पक्ष में उत्पन्न एक विकार ही कहा जा सकता है जिसे उसकी आत्मप्रतिमा और तदनुरूप स्थायी मूल्यों से संगत नहीं कहा जा सकता। किसी संस्कृति-विशेष के अभिव्यक्ति पक्ष में घटित होने वाले अधिकांश परिवर्तन उस संस्कृति को आमूलतः नहीं बदलते। आमूलतः तो केवल उसे स्वरूपगत परिवर्तन ही बदलते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब कोई जाति अपने कर्मों की सार्थकता का निर्धारण ही भिन्न मूल्यबोध के आधार पर करने लगती है, तो उसकी संस्कृति का स्वरूप-संस्थान ही बदल जाता है। यहाँ कर्मों की सार्थकता-निर्धारण के सम्बन्ध में कुछ स्पष्टीकरण अपेक्षित है। वह यह कि व्यक्ति के अधिकांश कर्म सांस्कृतिक प्रकार के नहीं अर्थात् सांस्कृतिक मूल्य के द्योतक नहीं होते। अधिकांश व्यक्ति अधिकांशतः अपने कर्मों के प्रति आत्मचेतन रूप से सजग नहीं होते, इसलिए उनकी सार्थकता पर ध्यान नहीं देते। उदाहरण के लिए भारतीय संस्कृति का मूल्य परमार्थ-साधन रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अधिकांश भारतीय अधिकांशतः परमार्थ-साधन में ही तल्लीन रहें। इस सन्दर्भ में कर्मों की सार्थकता के निर्धारण का अभिप्राय इतना ही है कि हम भारतीय उत्कृष्टता-अफष्टता का निर्धारण अपने सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर ही करते हैं और अपने जीवन को उसी अनुपात में सार्थक मानते हैं जिस अनुपात में वे अपने कर्मों के द्वारा सांस्कृतिक मूल्य को चरितार्थ करते हैं। आज भी भारत में ज्ञानी का मतलब आत्मज्ञानी से ही लिया जाता है। सी.बी.रमण कितने ही बडे वैज्ञानिक क्यों न हों, रमण महर्षि से महत्त्वपूर्ण नहीं माने जा सकते। वस्तुतः जातीय रूप में कोई भी समाज अपनी महत्तम उपलब्धियों का आकलन अपनी सांस्कृतिक आत्मप्रतिमा की अनुरूपता में ही करता है। यह आज भी एक निर्विवाद सत्य है कि हम सभी भारतीय दिन-रात क्यों न लोकसिद्धि और स्वार्थसिद्धि में रत रहें, लेकिन भारत की महान उपलब्धियों की गणना परमार्थ-सिद्धि के क्षेत्र में ही की जाती है। अतएव यहाँ केवल इतना ही समझना महत्त्वपूर्ण है कि कोई संस्कृति असंगत कार्यं से ही नहीं परिभाषित होती बल्कि उन प्रतीकों से परिभाषित होती है जिसके निकष पर कुछ कार्यों को आत्मसंगत और कुछ को आत्मविसंगत ठहराया जाता है।
II
अब यहाँ प्रसंग-प्राप्त रूप में इस प्रश्न पर भी विचार कर लेना समीचीन होगा कि जिस संस्कृति को भारतीय संस्कृति से अभिहित किया जाता है, उसकी आत्मप्रतिमा क्या है और वह किन मौलिक प्रतीकों से मूलगामी रूप में लक्षित होती है। इस प्रश्न के सम्बन्ध में प्रचलित धारणा यह है कि आश्रमव्यवस्था, पुरूषार्थ व्यवस्था और वर्णव्यवस्था की त्रयी ही भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्व या मौलिक प्रतीक हैं। परन्तु यह मान्यता समीचीन नहीं है, क्योंकि वास्तव में यह त्रयी भारतीय संस्कृति की आत्मप्रतिमा या उसके मौलिक प्रतीक न होकर उससे जन्य अनेक सम्भव व्यवस्थाओं में एक व्यवस्था मात्र है। अधिकांश संस्कृति दार्शनिक इस बात पर सहमति रखते हैं कि संयुक्त रूप से धर्म और मोक्ष को भारतीय संस्कृति का मौलिक प्रतीक कहा जा सकता है। इन्हीं दोनों से मिलकर उसकी आत्मप्रतिमा बनती है।2 वस्तुतः कोई भी संस्कृति त्रिविध पक्षों के माध्यम से सर्वांगता को प्राप्त होती है। इसमें प्रथम है मूलभूत सांस्कृतिक प्रतीक या कहें मौलिक सांस्कृतिक प्रत्यय का आविर्भाव। दूसरा है उसके अवधारण का रूप और तीसरा पक्ष है उस अवधारण का संस्थानबद्ध सामाजिक त्रि*यान्वयन। इस दृष्टि से धर्म और मोक्ष भारतीय संस्कृति के मूलभूत सांस्कृतिक प्रत्यय हैं। मूलभूत सांस्कृतिक प्रत्यय वह होता है जो हमारे समस्त सांस्कृतिक कर्मों पर समान रूप से लागू होता है। वास्तव में इसका अभिप्राय समस्त सांस्कृतिक कर्मों के नियोग से है। भारतीय संस्कृति के लिए धर्म और मोक्ष नियोग जैसे ही हैं, क्योंकि वैदिक जीवन दृष्टि के इतिहास की टेलियोलॉजी निरपवादरूप से इन्हीं दो से निर्देशित होती रही है। महाभारतकार ने धर्मार्थकाममोक्षनां इतिहास समन्वितम्... कहते हुए भारतीय संस्कृति के इसी टेलियोलॉजी को संकेतित किया है। पुनः भारतीय संस्कृति के इन द्विविध मौलिक प्रत्ययों का अवधारण और व्यवहार में निकटतम अनुवाद योग और यज्ञ के रूप में किया गया है। इसके अतिरिक्त पुरूषार्थ व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था, ऋणत्रय और पंचमहायज्ञ व्यवस्था इत्यादि भारतीय संस्कृति के संस्थानबद्ध सामाजिक स्वरूप हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का संयोजन एवं रूपायण धर्म और मोक्ष नामक दो मूलभूत प्रतीकों को केन्द्र में रख कर हुआ है। इन दोनों प्रतीकों ने सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय के काव्यों, कलाओं, धर्म, दर्शन और पुराकथाओं तथा वैयक्तिक एवं सामाजिक आचरण के विधानों को किस तरह प्रभावित किया है, यह खुली आँख से देखने की चीज है। ऐसे किसी भी सांस्कृतिक संयोजन के लिए यह स्वाभाविक ही है कि लोक-जीवन में उसके क्रियान्वयन के दौरान कुछ तत्त्व केन्द्र में हों और कुछ न्यूनाधिक रूप से दूर, लेकिन सबके सब अपनी निकटता और दूरी के तारतम्य में उस केन्द्रीय प्रतीक से ही अनुप्राणित होते हैं और उसी को प्रकट भी करते हैं।
अब यदि भारतीय संस्कृति की उपयुक्त संकेतित आत्मप्रतिमा और मूलभूत मौलिक प्रतीक को ध्यान में रखते हुए भारतीय संस्कृति के स्वरूप विषयक सामासिक अथवा समिश्र चरित्र पर विचार करें, तो एक दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि जिस भारतीय संस्कृति के मूलभूत प्रतीक को धर्म और मोक्ष निर्धारित किया जाता है वह वस्तुतः दो संस्कृतियों का संगम है। इसमें वैदिक संस्कृति का प्रतीक धर्म है जिसमें लोकभावना, जगद्भावना ही प्रधान रही है। मोक्ष द्राविड या आर्येत्तर किसी अन्य सांस्कृतिक धारा का प्रतीक है और उसमें वैदिक जीवन-विधि का निषेध, संयास का प्राधान्य तथा लोकातिऋमण पूर्वक स्वरूप-सिद्धि ही श्रेय है। इतिहास के गर्भ में छिपी यदि यह बात सही भी हो, तो इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि बाद में इन दोनों धाराओं के प्रतीक भारतीय संस्कृति में संयुक्त होकर उसके दो अवियोज्य अंग बन गए। इन दोनों की अवियोज्यता ही भारतीय संस्कृति की आत्मप्रतिमा है। इस आत्मप्रतिमा ने ही भारतीय संस्कृति को इतना समन्वयात्मक और आत्मसीमन क्षमता से युक्त बनाया है कि पक्ष-प्रतिपक्ष, प्रश्न-प्रतिप्रश्न भी इस संस्कृति के अंगभूत हो जाते हैं। प्राग्वैदिक मनुओं के द्वारा पुनः-पुनः प्रवर्तित यही सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा है।3 यही आर्य, आर्ष, हिन्दू अथवा व्यापक अर्थों में वैदिक संस्कृति के नाम से जानी जाती है।
III
भारतीय संस्कृति ने अपने सुदीर्घ जीवन के इतिहास में अनेक उतार-चढाव देखे हैं और वैजात्य प्रहारों को भी सहा है। प्राचीन काल से ही भारत में अनेक जातियों का आगमन होता रहा है और वे सभी जातियाँ भारतीय संस्कृति की गंगा में मिलकर उसी तरह एकमेव हो गईं जैसे अनेक छोटी-बडी नदियाँ गंगा में मिलकर गंगा ही हो जाती हैं। इस संस्कृति का सत्य के प्रति खुलेपन के आग्रह ने इसके अन्तर्गत वैचारिक विविधताओं को भी निर्बाध ढंग से पनपने का अवसर प्रदान किया है। चारों तरफ से सत्य का स्वागत, चाहे वह किसी भी दिशा से आये। रूचिनां वैचिष्याद् ऋजु-कुटिल नाना पथयुषां। नृणामेको गम्यो त्वमसिपयसामर्णव इव।।4 रूचि-प्रवृत्तियों की अनगिनत विभिन्नताओं को एक सर्वसमावेशी गन्तव्य में नियोजित करने की अद्भुत क्षमता इस संस्कृति में रही है। इस संस्कृतात्मा के इसी समन्वयात्मक चरित्र के चलते यहाँ कभी भी और किसी भी प्रति-संस्कृति का निर्माण नहीं हुआ। स्मार्त, वैष्णव, शैव-शाक्त, बौद्ध-जैन और लोकायत जैसी परस्पर विरोधी अथवा समानान्तर विचारों की यहाँ स्वस्थ और परस्पर समादृत परम्पराएँ रही हैं, फिर भी इन सबों ने अपनी-अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता का दावा नहीं किया और न ही सबों ने मिलकर किसी समिश्र संस्कृति का निर्माण ही किया है। इन सभी भारतमूलीय विचार-परम्पराओं को न अ-हिन्दू, न तो हिन्दुत्व-भ्रष्ट बल्कि हिन्दुत्वोपजीवी रूप में ही पुरस्कृत किया जा सकता है। द्रष्टव्य है कि कुछ लोग शैव-शाक्त और स्मार्त-वैष्णव परम्परा को तो नहीं, लेकिन लोकायत, बौद्ध और जैन परम्पराओं की सांस्कृतिक स्वायत्तता की बात अवश्य सोचते हैं; परन्तु वास्तविकता यह है कि ये सभी अभिमानी हिन्दू संस्कृति के अनुशयी मात्र हैं। अनुशयी कहने का तात्पर्य यह है कि एक शरीर में अनेक जीव निवास करते हैं और उनमें कोई एक जीव ही शरीर को स्वायत्त करने वाला अभिमानी जीव होता है। वस्तुतः वही शरीर के प्रति उत्तरदायी और शरीर उसी से परिभाषित होता है। शेष जीव अनुशयी मात्र ही होते हैं। भारतीय संस्कृति में दिखाई पडने वाली अनेकता एवं विभिन्नताओं की प्रस्थिति और भूमिका अनुशयीमात्र होने में है।
द्रष्टव्य है कि भारत भूमि पर वेदों की घोर निंदा करने वाले, ऋषियों को धूर्त, भाण्ड, निशाचर कहने वाले लोकयत दर्शन की परम्परा तो रही और आद्यन्त रूप से उसे पूर्वपक्ष के रूप में सम्मान भी मिलता रहा लेकिन लोकायतिक जैसी कोई सांस्कृतिक धारा भी इस देश में रही हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। जयन्त भट्ट5 ने इसी अभिप्राय से कटाक्ष करते हुए कहा है कि लोकायत कोई आगम नहीं है, क्योंकि उसमें कर्त्तव्याकर्त्तव्य के लिए सुविचारित विधान नहीं। कुल मिलाकर वह एक वैतण्डिक निषेधमात्रोपजीवी परम्परा रही है। देहात्मवाद पर आधारित यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत् की वासना कर्त्तव्याकर्त्तव्य की कोटि में नहीं आती। हाँ, बाद में लोकायत की ही नीलपट शाखा6 ने एक वीभत्स अपसंस्कृति विकसित कर ली थी। उसके दैहिक सुख-वासना का आदर्श यह था कि नीलपट तभी सुखी रह सकता है जब नदियाँ सुरावाहिनी हो जाएँ, पर्वत मांसमय और यह विश्व नवयौवना स्त्रियों से भर जाय। सुना जाता है कि इस सम्प्रदाय ने जब समाज की सारी मर्यादाओं को तोड डाला था, तो राजा भोजराज ने उसका उच्छेद कर डाला था। इस प्रकार भारतीय संस्कृति जिसमें काम भी एक पुरूषार्थ है और वह भी विभिन्न कलाओं से सुसंस्कृत होकर मोक्षगामी हो सकता है, उस संस्कृति में लोकायतिक काम-वासना-वुभुक्षा को एक भ्रष्ट संस्कृति का भी दर्जा नहीं दिया जा सकता। यदि कुछ कहना आवश्यक हो तो अधिक से अधिक इसे प्रतिसंस्कृति ही कहना उपयुक्त होगा। यह बात अलग है कि प्रतिसंस्कृति केवल मूल सांस्कृतिक परम्परा का क्षय ही करती है, स्वयं में कोई संस्कृति नहीं होती।
अब यदि जैन-दर्शन के सन्दर्भ में भारतीय संस्कृति की सामासिकता पर विचार करें, तो यह परम्परा ऋषभदेव से महावीर स्वामी पर्यन्त अपने घोर निवृत्तिवादी निहितार्थों के साथ वैदिक संस्कृति के साथ रची-बसी रही है। वास्तव में इसे मुनि बनने की प्रक्रिया में लोक-जीवन के विधि-निधेष से परे संस्कृति-निरपेक्ष ही कहा जा सकता है। जैन परम्परा में हिन्दू-संस्कृति से इतर किसी सांस्कृतिक अस्मिता के लिए सैद्धान्तिक और व्यावहारिक तौर पर कोई आग्रह भी नहीं दिखाई पडता है। सोमदेव सूरि7 ने इस अभिप्राय को स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा है कि सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधिः। यत्र सम्यकत्वहानिर्न यत्र न व्रतदूषणम् अर्थात् जैन कोई भी लौकिक मर्यादा स्वीकार कर सकते हैं, यदि सम्यक दृष्टि की हानि न हो और व्रत दूषण की प्रसक्ति न हो। पुनः जैन परम्परा में हिन्दू देवी-देवताओं का प्रवेश, श्राद्ध-तर्पण, जप-महिमा, अस्पृश्यता, गोमय-लेपन, शुद्धि का अतिरेक, माँस-दान, दानाष्टक और समन्वय दृष्टि इत्यादि ऐसे तत्त्व हैं जो जैन धर्म-दर्शन को हिन्दू संस्कृति के अंगभूत रूप में ही पुरस्कृत करते हैं। कुल मिलाकर हिन्दू संस्कृति और जैन परम्परा के अन्तःसम्बन्ध के प्रश्न पर इतना ही ध्यातव्य है कि दोनों की आत्मप्रतिमा एक दूसरे के विरूद्ध नहीं। निवृत्तिवादी चरित्र में जैन परम्परा मोक्षगामी है और प्रवृत्तिवादी चरित्र में वह धर्म की हिन्दू अवधारणा का विरोधी नहीं, बल्कि सुतरां उससे समंजस है।
IV
इसी तरह बौद्ध परम्परा भी अद्यन्त रूप से निवृत्तिवादी परम्परा ही रही है। इसमें भिक्षु, संघ और विनय इत्यादि सबके सब निर्वाणोन्मुखी अनुशासन हैं। यहाँ लोकसाधन और परमार्थ सिद्धि के लिए दोनों को सोपानऋम में अन्वित करने के लिए कोई पुरूषार्थ व्यवस्था स्वीकृत नहीं है। निर्वाण साधन के लिए संन्यास अथवा तप एक मात्र पुरूषार्थ है। इसलिए श्रामण्य और निर्वाण का लोकव्यवस्था से सीधे-सीधे कोई प्रवृत्तिमूलक सम्बन्ध बनता भी नहीं है। भिक्षु बनने की प्रक्रिया समाज और संस्कृति से निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया है। इसीलिए लोक जीवन के विधि निषेध, जाति-पाँति, शिखा-सूत्र के भेदभाव भिक्षु पर उसी तरह लागू नहीं होते जैसे हिन्दू परम्परा में ये सबकुछ संन्यासी अथवा ब्रह्म ज्ञानी पर लागू नहीं होते। बुद्ध ने विनयपिटक तो दिया, लेकिन कोई धर्मशास्त्र प्रस्तुत नहीं किया। स्वयं बुद्ध8 का कथन है कि लोको मया सार्धम विवदति, नाहम् लोकेन सार्धम विवदामि अर्थात् लोक से बुद्ध का विवाद नहीं, लोक ही उनसे विवाद करता है। इस सन्दर्भ में वाचस्पति मिश्र9 की यह टिप्पणी उचित ही है कि बौद्धों के पास लोक-व्यवस्था के लिए कोई विधान नहीं और न वैयक्तिक तथा सामाजिक जीवन के लिए आगम। अतः लोकयात्रा के निर्वाह हेतु उन्हें श्रुति-स्मृति, इतिहास-पुराण का ही अनुसरण करना पडता है। जयन्त भट्ट10 ने भी इसी प्रकार की टिप्पणी करते हुए कहा है कि वैदिक मर्यादा के प्रभाव में बौद्ध भी अस्पृश्यास्पृश्य का भेद करते ही हैं। यद्यपि ऐसे सभी उदाहरणों के स्वर आलोचनात्मक हैं, फिर भी आन्वीक्षिकी जैसी शुष्क विद्या के दो मूर्धन्य विद्वानों की उपर्युक्त टिप्पणी से इतना तो अवश्य संकेतित होता है कि वैदिक परम्परा और बौद्ध परम्परा के मध्य दार्शनिक विरोध कितना भी तर्क कर्कश क्यों न रहा हो, उस काल तक बौद्ध धर्म-दर्शन किसी प्रतिसंस्कृति का रूप अख्तियार नहीं ही किया था। वस्तुतः एक वृहद् परम्परा में जिस तरह लघु परम्पराएँ एकदेशीय परिष्कार को निजी पहचान बनाकर भी रच-बस जाती हैं, उसी तरह जैन-बौद्ध विचारधाराएँ भी भारतीय संस्कृति के अंगभूत रूप में रची-बसी परम्पराएँ हैं।
वास्तव में देखा जाए तो बौद्ध धर्म-दर्शन ने वैदिक संस्कृति की धार्मिक और दार्शनिक चेतना को बहुत व्यापक रूप से प्रभावित किया है। यद्यपि इस प्रभाव का स्वरूप स्वतंत्र सांस्कृतिक अस्मितापरक न हो कर संस्कृति निरपेक्ष ही था। बौद्ध धर्म-दर्शन की संस्कृति निरपेक्षता का अर्थ यह है कि इसका किसी सामाजिक सांस्कृतिक आचार-संहिता से कोई विरोध नहीं। यदि बौद्ध वाङ्मय में अवान्तर रूप से हिन्दू सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था की यत्र-तत्र आलोचनाएँ मिलती हैं तो उसका मुख्य स्वर परिष्कार है न कि समानान्तर विकल्प की प्रतिस्थापना। वास्तविकता यह है कि बौद्ध धर्म-दर्शन अपने मूलगामी स्वरूप में एक पटिसोतगामी मार्ग-व्यवस्था प्रस्तुत करता है। पटिसोतगामी मार्गव्यवस्था के लिए यह प्रश्न उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है कि मनुष्य को कैसे नैतिक बनाया जाय और उसके लिए कौन-सी आचार-संहिता सर्वाधिक उपयुक्त होगी। इसके लिए मूलगामी प्रश्न यह है कि मनुष्य नैतिक क्यों नहीं है? अपने मार्ग को पटिसोतगामी कह कर भगवान् बुद्ध ने इसी प्रश्न का उत्तर दिया है। संक्षेप में इसका अभिप्राय यह है कि सर्वप्रथम मानवीय चेतना के प्राकृतिक प्रवाह, पाशविक अभिवृत्तियों और अभिमुखता का आत्यन्तिक निरोध होना चाहिए। मनुष्य की चेतना जब अपनी प्राकृतिकता और जैव बुभुक्षाओं से ऊपर उठती है, तभी उसमें अपने होने के अर्थ और गंतव्य की आत्मचेतना जागती है। अन्यथा वह राग, द्वेष, मान, मोह, मद्-मत्सरादि में ही उलझे रहने को अपने होने का सत्य समझती है। बौद्ध चिन्तन में यह बात देखने लायक है कि बुद्ध की सत्काय दृष्टि से लेकर नागार्जुन की सर्वदृष्टि प्रहाण तक की समस्त सैद्धान्तिक और मूल्यात्मक संरचनाएँ किस प्रकार मानवी-चेतना की प्राकृतिकता के प्रतिपक्ष में खडी की गई हैं। ऐसी सभी संरचनाएँ मनुष्य को कर्त्तव्याकर्त्तव्य के लिए कोई सामाजिक आचार-संहिता न प्रदान कर उसे पहले पहल नैतिक होने की मूलभूत पात्रता प्रदान करती हैं। यह पटिसोतगामी बौद्ध दृष्टि जिस रूप में मनुष्य को नैतिक होने की पात्रता प्रदान करती है उससे वह किसी भी आचारसंहिताबद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को उसके आदर्श स्परूप में आत्मसात् कर निर्वाणोन्मुखी हो सकता है। बौद्ध दृष्टि इसी अर्थ में आर्य मार्ग है और उसके आर्यत्व की यही पहचान है। ध्यातव्य है कि इसी मूलगामी दृष्टि के साथ बौद्ध धर्म-दर्शन इस देश से बाहर जहाँ भी गया वहाँ की पूर्वप्रचलित सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का प्रतिरोधी नहीं बना।
V
अब यदि भारतीय संस्कृति की सामासिकता का विचार इस्लाम की धार्मिक संस्कृति के सन्दर्भ में करें, तो इस देश में विचारकों की कई एक टोलियाँ हैं और उनके कई एक खेमें हैं जो इस बात का प्रबल समर्थन करते हैं कि भारत में इस्लाम के आगमन के पश्चात् यहाँ एक गंगा-जमुनी संस्कृति का विकास हुआ है। वस्तुतः भारतीय संस्कृति की सामासिकता का प्रश्न भी प्रमुखता से इस्लाम के सन्दर्भ में ही उठाया जाता है। पुनः इस्लाम के पूर्व भी भारत में सांस्कृतिक समिश्रता के गुण-सूत्रों को जबरन खोजना इसी अन्ध दृष्टि का विस्तार है। यहाँ यह सम्भव नहीं कि गंगा-जमुनी संस्कृति के पक्षकारों को सर्वांशतः सन्दर्भित किया जाये परन्तु समवेत रूप से उनकी दृष्टिहीनता के प्रति इतना ही कहा जाना पर्याप्त होगा कि सांस्कृतिक साझेदारी महज एक भौगोलिक साझेदारी नहीं है, जो केवल दो संस्कृतियों की दैशिक सन्निकटता से निरूपित होती हो। सांस्कृतिक साझेदारी वास्तव में तात्त्विक साझेदारी होती है जो दो संस्कतियों की वैचारिक सगोत्रीयता से निरूपित होती है। भारतीय संस्कृति और इस्लाम संस्कृति के बीच तात्त्विक साझेदारी सम्भव ही नहीं है। ऐसा इसलिए कि इस्लाम की धार्मिक चेतना का निसर्ग परमार्थ की ओर नहीं है और इस कारण वह समाज की ओर साम्प्रदायिक समूहन में प्रवर्तित होती है। साम्प्रदायिक समूहन में प्रवर्तित धार्मिक चेतना का स्व इतना कट्टर होता है कि वह किसी भी पर को उसके स्वत्व में स्वीकार ही नहीं कर सकता। यह बात इस्लाम के पूरे इतिहास में चरितार्थ होते देखी जा सकती है। वे सभी लोग जो इस बात का दम्भ भरते हैं कि इस्लामी योगदान से भारत में एक मिली-जुली संस्कृति बनी है, वे इस ऐतिहासिक तथ्य पर क्यों नहीं विचार करते कि ऐसा भारत में ही क्यों सम्भव हुआ और अन्यत्र नहीं हुआ जहाँ इस्लाम इससे पहले ही पहुँचा था। उदाहरण के लिए तुर्किस्तान, मिश्र, सीरिया, ईरान, ईराक, अफगानिस्तान और इण्डोनेशिया में इस्लामी सत्ता से पूर्व समृद्ध संस्कृतियाँ विद्यमान थीं, लेकिन वह सब कहाँ लुप्त हो गईं और वहाँ-वहाँ मिश्रित संस्कृति क्यों नहीं बनी। फिर यह भी उन्हें सोचना चाहिए कि भारत से महज 1947 में अलग हुए पाकिस्तान में मिश्रित संस्कृति कहाँ गुम हो गई। वह विशुद्ध इस्लामिक संस्कृति अर्थात् फारस और गान्धार वाली धार्मिक संस्कृति में अविलम्ब क्यों रूपान्तरित हो गया। अतः इस सन्दर्भ में इतना ही गौरतलब है कि स्पेन से लेकर मध्य एशिया तक जहाँ भी इस्लाम का प्रसार हुआ वहाँ समिश्र संस्कृति का कोई इतिहास नहीं हैं। भारत में यदि कुछ सौ वर्षों में तथाकथित गंगा-जमुनी संस्कृति बनी भी तो इसका निहितार्थ इस्लामी विश्व विजय का भारत में पराभव ही है। यहाँ यह भी अवधेय है कि बडे पैमाने पर धर्मान्तरण के बावजूद भी भारतीय मुसलमान वह नहीं बन पाए जो इस्लाम का आदेश था। इसीलिए बीसवीं सदी में यहाँ तबलीगी आन्दोलन चलाया गया ताकि भारतीय मुसलमान पुनः भारत से विमुख होकर अरबमुखी हो सकें।
द्रष्टव्य है कि लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू तथा बी.डी. पाण्डेय और इतिहासकार ताराचंद जैसे अनेक अन्य भी इस बात की हामी भरते कभी थकते नहीं कि भारत में मुस्लिम शासन वास्तव में विदेशी शासन था ही नहीं। इस्लामी शासकों ने यहाँ की हिन्दू स्त्रियों से विवाह रचाए और उसके बाद यहाँ न कोई विजेता रहा और न ही विजित, सब के सब घुल मिल गए। परन्तु इसके पलट के परिदृश्य पर उनका ध्यान नहीं जाता कि किसी हिन्दू शासक ने भी मुस्लिम स्त्री से विवाह किया हो और उसे स्वीकृति मिली हो। पुनः ऐसे विचारकों का ध्यान अमीर खुसरों11 के इस प्रकार के वक्तव्यों पर क्यों नहीं जाता कि संसार की अनादि काल से यह रीति चली आ रही है कि हिन्दू सदा तुर्कों का शिकार बना है। हिन्दुओं का अस्तित्व ही केवल तुर्कों के लिए है। तुर्कों से ये सदा विजित होते रहे हैं। जो जब चाहता है इन्हें पकडता है, खरीदता है और बेचता है। वह तो यहाँ तक कह जाता है कि यदि हिन्दुओं से जजिया लेकर उन्हें बख्शा न गया होता, तो हिन्दूओं का नामोनिशान ही मिट जाता।
गंगा-जमुनी संस्कृति की वकालत करते हुए कुछ लोगों का यह मानना है कि भारत में उर्दू भाषा और साहित्य का विकास हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के मिश्रण का ही परिणाम है। परन्तु इकबाल12 जैसा व्यक्ति जब यह कहता है कि- मेरा मटका अजमी है तो क्या, मेरी शराब तो हिजाजी है। मेरा गाना अजमी है तो क्या, मेरी लय तो हिजाजी है।- तो बात कुछ और ही बनती दिखती है। इस प्रकार के अनेकों सन्दर्भों को देखने से विदित होता है कि उर्दू भाषा और साहित्य की प्रेरणा इस्लामी संस्कृति ही रही। इसे अधिक से अधिक इस्लामी स्वर का भारतीय परिधान मात्र ही कहा जा सकता है। हाँ, इस्लाम की सूफी धारा अपेक्षाकृत उदार मानी जाती है। इस धारा की फकीरी में एक ओर द्रोही विचारों के गुण-सूत्र उस तरह से नहीं देखे जाते, तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति के उत्पाटन की आक्रामक कट्टरता भी देखने को नहीं मिलती। परन्तु इतिहास में सूफी संतों के कुछ कारनामें ऐसे हैं जो उनकी उदारमना साधुता पर सवालिया निशान छोड देते हैं। उदाहरण के लिए ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने तो मुहम्मद गोरी को भारत पर आक्रमण के लिए आहूत ही किया था। ऐसे ही सैयिद नूरूद्दीन मुबारक जब गजनबी सुहरावर्दी सुल्तान ईल्तुतमिश के धर्माचार्य नियुक्त गए, तो उन्होंने उलामाओं का एक प्रतिनिधिमण्डल लेकर सुल्तान से फरियाद करने गए कि हिन्दुओं को इस्लाम या मृत्यु में से एक के वरण करने की अन्तिम चेतावनी दे दी जाए। सौभाग्य से धर्माचार्य की इस फरियाद पर अमल न कर टाल दिया गया था। इसी तरह कुछ एक सूफी संतों द्वारा खुलेआम आऋामक युद्धों में भाग लेने के ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं और उसके उपलक्ष्य में उन्हें कत्ताल और कुफार-भंजन की उपाधि से नवाजा गया था।13
भारत में हिन्दू-मुस्लिम इतिहास का चित्रपट इतना विशाल है कि हाशिये पर दोनों के बीच अपनेपन और नितान्त परायेपन के बहुतेरे सन्दर्भ प्राप्त होते हैं, लेकिन सत्य जो केन्द्र में है वह यह कि अपनेपन का प्रस्ताव हिन्दू पक्षीय और हिन्दू हेतुक है तथा नितान्त परायेपन का प्रस्ताव इस्लाम पक्षीय और इस्लाम हेतुक है। हिन्दू-मुस्लिम इतिहास की यही वह सच्चाई है जिसके आधार पर यह कहा जाता है कि भारत में इस्लाम के राजनीतिक विजय अभियान को पूरे तौर से सांस्कृतिक पराजय का सामना करना पडा। दूसरे शब्दों में कहें, तो इस्लाम की धार्मिक संस्कृति और साम्राज्य विस्तारवादी राजनीतिक सैन्यशक्ति पर हिन्दू संस्कृति का सहिष्णु स्वभाव भारी पडा और इस कारण इस्लाम के योगदान से भारत में कोई गंगा-जमुनी सामासिक संस्कृति नहीं बनी। इस्लाम यहाँ आद्यन्त रूप से एक प्रति संस्कृति की भूमिका और प्रस्थिति को ही अख्तियार किए रहा है। भारतीय संस्कृति का एक विलक्षण वैशिष्ट्य इस बात में निहित है कि इस संस्कृति में अनेक धार्मिक आस्थाएँ सहावस्थानी हो सकती हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति में इस्लाम की ही नहीं, बल्कि किसी भी धार्मिक आस्था को उसके संस्कृति वियुक्त रूप में स्वीकरण प्राप्त हो सकता है। भारतीय संस्कृति में आत्मसीमन और आत्मसातीकरण की अद्भुत सामर्थ्य का यही रहस्य है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी धर्मावलम्बी अपनी धार्मिक आस्था में अक्षत रहते हुए भी भारतीय संस्कृति का अंगभूत हो सकता है। परन्तु इस्लाम या अन्य सामी परम्परा की धार्मिक संस्कृति में किसी दूसरी धार्मिक आस्था के स्वीकार्य होने के लिए कोई अवकाश नहीं। अतः उनका किसी भी धर्म अथवा संस्कृति से इसप्रकार का ताल-मेल सम्भव ही नहीं कि अन्तर्धार्मिकता अथवा सांस्कृतिक सामासिकता को सुदृढ आधार प्राप्त हो सके।
VI
भारतीय संस्कृति की ऐसी सहिष्णुता को ब्रह्मवादी तत्त्वदृष्टि की कसौटी पर सर्ववादानवसर और नानावादानुरोधिनी की संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है।14 सहिष्णु जीवन दृष्टि का इतना व्यापक आधार किसी दूसरी सभ्यता और संस्कृति के लिए दुर्लभप्राय है। भारतीय संस्कृति की स्वभावगत इसी उदारता के चलते इसके लम्बे इतिहास में अनेक सजातीय- विजातीय विचार और भाव धारायें इसके द्वारा आत्मासातीकृत होती रही हैं। महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने हिन्दू संस्कृति के इस अमृतनाभ को बहुत ही अन्तरंग रूप से पहचाना था। तभी उनके कवि हृदय से यह सच्चाई बेवाक फूट पडी थी कि - हेथाय आर्य हेथा अनार्य हेथाय द्राविड-चीन। शक-हूण- दल पाठान-मोगल एक देहे होलो लीन। इसी सच्चाई को बहुत पहले ही भागवत में उद्घोषित किया गया था- किरातहूणान्द्रपुलिन्दपुक्कसः आभीर रवंरवः यवनः खसादयः ... शुद्धन्ति तस्मैः प्रभविष्णवेनमः। द्रष्टव्य है कि इसी सच्चाई को हाली मुसद्दस15 ने स्वकीय अस्मिता भीति के साथ उजागर किया है - किए पै सिपर जिसने सातो समुन्दर , वो डूबा दहाने में गंगा के आकर।... रहा शिर्क बाकी न वह्मोगुमाँ में, वो बदला गया आ के हिन्दोस्ताँ में। इस्लाम की इसी अस्मिता भीति का प्रतिफलन इकबाल के पैन इस्लामिक राष्ट्रवाद में हुआ और उसकी अन्तिम परिणति भारत विभाजन की त्रासदी एवं धर्माधारित राष्ट्र पाकिस्तान के वजूद में आने तक देखी जा सकती है। परन्तु यहाँ भी ध्यान देने की गहरी बात यह है कि इस त्रासदपूर्ण विषम परिस्थिति में भी हिन्दू संस्कृति ने धार्मिक-राजनीतिक इस्लाम की प्रतिक्रिया में अपने को परिभाषित नहीं किया और शेष भारत को सम्पूर्ण भारत के रूप में स्वीकार कर हिन्दू संस्कृति ने वसुधैव कुटुम्बकम् की अपनी सनातन महानता को ही दुहराया। सभ्यता और संस्कृतियों के विश्व इतिहास में हिन्दुत्व का यह हिन्दु निर्णय उसकी महानता की बेमिसाल मिसाल है।
हिन्दू संस्कृति की ऐसी सहिष्णुता और उदारता सांस्कृतिक सामासिकता के तथाकथित आधुनिक आदर्श से कहीं अधिक और आगे का सत्य है। इस सत्य को उजागर करने के लिए हम यहाँ एक अत्यन्त ही संवेदनशील मुद्दे को एक नवीन प्रकाश में विश्लेषित करना चाहेंगे। भारत के लिए एक मिथक के समान इस संवेदनशील मुद्दे का प्रस्तुत यथार्थ यह है कि हिन्दुओं के सब प्रयत्नों के बावजूद मुसलमानों ने हिन्दुओं से अलग रहने का निर्णय किया और परिणाम स्वरूप 1947 में भारत का विभाजन हुआ तथा मुसलमानों के रहने के लिए एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान बना। हम और आप सभी जानते हैं कि यह विभाजन धर्माधारित द्विराष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर घटित हुआ था। ऐसी परिस्थिति में शेष भारत की भावी प्रतिष्ठा हिन्दू राष्ट्रवाद की आधारशिला पर की जा सकती थी। पाकिस्तान के वजूद में आने से हिन्दुओं को यह अधिकार नैतिक रूप से अपने आप ही प्राप्त हो जाता है। परन्तु हिन्दुओं ने वैसा नहीं किया अर्थात् राजनीतिक-धार्मिक इस्लाम की प्रतिक्रिया में अपने को परिभाषित करना उन्हें अपने सांस्कृतिक चरित्र के प्रतिकूल लगा। इस तरह शेष भारत को ही संम्पूर्ण भारत के रूप म स्वीकार किया गया।
अब यहाँ जो सत्य छिपा हुआ है वह यह कि 1974 की विपरीत परिस्थितियों में लिया गया यह निर्णय कि शेष भारत इस्लामधर्मी पाकिस्तान की प्रतिक्रिया में हिन्दुराष्ट्र नहीं होगा, यह निर्णय किसका था? वास्तव में देखा जाए तो यह हिन्दुत्व का ही ऐतिहासिक हिन्दू-निर्णय था। उस समय की जनसांख्यिकी के आधार पर इसे सत्यापित करते हुए कहा जा सकता है कि उस शेष भारत में बचे-खुचे मुस्लिम इस ऐतिहासिक निर्णय में सहभागी होने का नैतिक अधिकार ही खो चुके थे। ईसाई आदि की जनसंख्या नगण्य थी और बौद्ध, जैन एवं सिख सांस्कृति परम्परा से ही भारतमूलीय होने के कारण हिन्दुत्व के अन्तर्गत वैसे ही आते हैं जैसे शैव, वैष्णव और शाक्त। अतः स्पष्ट है कि यह ऐतिहासिक निर्णय महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू या किसी राजनीतिक दल का न हो कर हिन्दुत्व का हिन्दू निर्णय उसका महाविमर्श था। इस निर्णय के माध्यम से स्वयं उस भारत में अपने को सम्पूर्ण जातीय अनुभवों के साथ प्रकट किया था जिसके चलते सभ्यता और सांस्कृतियों के विश्व इतिहास में उसे महान् कहा जाता है। यदि थोडी देर के लिए भारत को उसके महान् अतीत से काट भी दिया जाए तो 1947 के केवल इस निर्णय के आधार पर उसे उतना ही महान् ठहराया जा सकता है। हिन्दुत्व के इस हिन्दू निर्णय के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आजाद लेकिन विभाजित भारत की नींव और प्रतिष्ठा भी हिन्दुत्व की सांस्कृतिक भावभूमि पर हुई है। यह वर्तमान भारत का एक ऐसा सांस्कृतिक सत्य है जो धार्मिक बहुलता का कभी भी विरोधी नहीं रहा है। परन्तु ऐसी धार्मिक बहुलता का सह-अस्तित्वपूर्ण अभियोजन सम-सांस्कृतिक भूमि पर ही सम्भव है।
सन्दर्भ एवं पाद टिप्पणी
1. द्रष्टव्य - यशदेव शल्य, संस्कृतिः मानव कर्तृत्व की व्याख्या, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, इस पुस्तक के प्रथम और द्वितीय अध्याय में शल्यजी ने संस्कृति के अस्तित्व, व्यक्तित्व और अधिष्ठान के प्रश्न पर मौलिक रूप से सविस्तार विवेचन किया है।
2. भारतीय परम्परा में मीमांसक और पौराणिक अभिमत में धर्म अपने आप में भारतीय संस्कृति की सम्पूर्ण आत्मप्रतिमा का प्रतिनिधित्व करता है। इस दृष्टि से धर्मपक्षीय स्वर्ग की संकल्पना मोक्षस्थानीय होकर लोक और परलोक दोनों को समाहित कर लेता है।
3. यजुर्वेद, 9-14
4. शिव महिम्न् - 17
5. जयन्त भट्ट, न्यायमंजरी, प्रमाण प्रकरण, न हि लोकायते किंचित् कर्त्तव्यमुपदिश्यते। वैतण्डिकं कथैवासौ न पुनः कश्चिदागमः।।
6. पुरातन प्रबन्ध संग्रह पृ. 19, न नद्यो मदवाहिन्यो, न च मांसमया नगा। न च नारीमयं विश्वं, कथं नीलपटः सुखी।।
7. उद्धृत, मुनिनाथमल टाटिया, अहिंसातत्त्वदर्शन, पृ. 175
8. सुत्तनिपात, अगं्जेय सुत्त
9. न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका, 2-1-68 (चैरवम्भा संस्करण), न चैतेषामागमा वर्णाश्रमाचार व्यवस्था हेतवो, नो खलु निषेकाद्या क्रियाः श्मशानान्ताः प्रजानामेते विदधति। न हि प्रमाणीकृत बौद्धाद्यागमा अपि लोकयात्रायां श्रुति-स्मृति इतिहास- पुराण निरपेक्षागममात्रेण प्रवर्तन्ते। अपितु तेऽपि सांवृतमेतदिति ब्रुवाणा लोकयात्रायां श्रुत्यादीनेवानुसरन्ति।
10. न्यायमंजरी, प्रमाण प्रकरण- बौद्धादयोऽपि दुरात्मानो वेदप्रामाण्यनियमिता एव चाण्डालादिस्पर्श परिहरन्ति।
11. मस्नवी ए नुह... , कलकत्ता बैपटिस्ट मीशन प्रेस, 1948 पृ. 89 और 131
12. इकबाल - अजमी खुम है तो क्या, मै तो हिजाजी है मेरी। नग्म हिन्दी है तो क्या, लय तो हिजाजी है मेरी।।
13. द्रष्टव्य, उन्मीलन, अंक 3 वर्ष 1-2 जनवरी- जुलाई- 1987, पृ. 47-48, प्रो. हर्षनारायण जी का आलेख।
14. महाप्रभु वल्लभाचार्य, शास्त्रार्थ प्रकरण,
सर्ववादानवसरं नानावादानुरोधितद्।
अनन्तमूर्ति तद् ब्रह्म ह्यविभक्तं विभक्तिमद्।।
सम्पर्क - दर्शनशास्त्र विभाग
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)