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संस्कृति का बहुवचन

प्रवीण पण्ड्या
संस्कृति किसे कहा जाए, यह विचार किया जाता रहा है और अनेक तरह से उसका उत्तर प्राप्त होता है। यह तो अविवादित है कि संस्कृति मनुष्य के लिए स्पृहणीय है और वह सृष्टि को अधिक सुन्दर, अधिक समृद्ध बनाती है। मनुष्य की सबसे बडी रचना उसके द्वारा संस्कृति को जीवन के निकष के रूप में स्वीकारना है। संस्कृति, संस्कार और संस्कृत-इत्यादि में एक ही प्रकृति भिन्न भिन्न प्रत्ययों के साथ है। मैं यह समझता हूँ कि इनकी प्रकृति (मूलधातु) और प्रत्यय को तो हम जान सके हैं, किन्तु इन सबमें साधारण (कॉमन) उपसर्ग को हम नहीं जान सके हैं। सम् उपसर्ग का प्रायः सम्यक या अच्छा अर्थ करके आगे बढने की हमारी प्रवृत्ति है। वैदिक शब्दों पर विचार करते समय यह अर्थ घटित नहीं हो पाता है। संस्कृति वैदिक शब्द है और सम्भवतः, वह वैदिक दृष्टि भी है। यास्क प्राचीनतम उपलब्ध वैदिक विचारक हैं। वह सम् उपसर्ग का अर्थ देते हैं-समित्येकीभावमाचष्टे। बहुत कुछ मिल-मिलाकर एक हो जाए* तो वह सम् उपसर्ग के द्वारा कहा जाता है। ऋग्वेद के मौजूदा संस्करण का अन्तिम (जिसे परम्परा में परम भी कहा जाएगा) सूक्त संज्ञान सूक्त है। चार ऋचाओं के इस सूक्त के ऋषि संवनन हैं। ऋषि संवनन द्वारा साक्षात्कृत इस सूक्त की पहली ऋचा का देवता (वर्ण्य-विषय) अग्नि और शेष तीनों का देवता संज्ञान है-
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते।।
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मंत्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।
पहली ऋचा हमें संगति, संवाद, सामनस्य, संज्ञान-ये चार शब्द देतीं है। दूसरी और तीसरी ऋचाएँ पहली ऋचा का विस्तार है। ये चार शब्द किसी प्रजा (राष्ट्र) की संस्कृति की महाशाला की चार स्थूणाएँ हैं। यहाँ हमने भवन की जगह शाला और स्तम्भ की जगह स्थूणा शब्द का प्रयोग वैदिक भाषा से लिया है। संगति के लिए मुझे या आपको कदमों को एक- साथ उठाना और भूमि पर रखना है, तो या तो मुझे आपकी गति का अनुगमन करना है या आपको मेरा अनुसरण करना है। यह अनुगति है। संगति नहीं है। सौभाग्य से संगति शब्द संगीत में आज भी अपने मूलार्थ में प्रचलित है। किसी एक का अपने स्वभाव में पूरी ऊँचाई में प्रतिष्ठित होकर दूसरे को उसकी समग्र ऊँचाई में स्वीकार कर लेना, अपना बना लेना और स्वयं को उसमें विलीन कर देना संगति है। कौन क्या है, यह द्वैत मिटकर अद्वैत का अनुभव होना संगति है। यही यज्ञ की अवधारणा है। यज धातु के तीन अर्थों में सर्वोत्तम अर्थ सङ्गतिकरण है। संस्कृत धातुपाठ में किसी एक धातु के अनेक अर्थ युगान्तरों, कालान्तरों में उसके अर्थान्तरों को मान्यता देने की दृष्टि से देखेंगे, तो इस भाषा के संस्कृत होने को समझ सकेंगे। वैदिक चिन्तन का आधार यह है-मूलतः एक का अस्तित्व मानना। अनेकता को वह मूल में नहीं मानता है और विस्तार में अनेकता को स्वीकारता है। अनेक मिलकर एक नहीं होता है। एक ही अनेक में विस्तार पाता है। एक का अनेक होना-उसका रमण, क्रीडा, लीला या आनन्दभाव है। यह दृष्टि, सृष्टि के स्वभावतः बहुल, विविध और अनेक होने और उसका आधार एक होने की समझ देती है। वेद और ब्राह्मण (विधि, आरण्यक, उपनिषद्) में एक के अनेक होने और उस अनेक में आनन्दभाव की सैंकडों, सहस्रों उक्तियाँ हैं। वहाँ अद्वैत की मूलवर्तिता और द्वैत की सृष्टिवर्तिता मानी गई है-
एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे।
तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितस्तं माता रेढि स उ रेढि मातरम्।। (ऋ. 10.114.4)
समस्त वैदिक वादों में यह साधारण चेतना है कि सृष्टि विविधात्मक है, किन्तु है एकमूला। विश्व की एकमूलकता और विविधात्मकता को स्वीकार करने के बाद विभिन्न वाद इस बहस में उतरते हैं कि वह एक कौन हैं ! कहीं प्राण, कहीं आपः, कहीं वाक तो कहीं रस को इदं सर्वम् कहा गया। विविधताओं के होते हुए भी एकमूलकता की स्वीकार्यता में वैदिक अद्वैत है। एकमूलकता की दृष्टि अनेक को वैधानिकता प्रदान करती है। अनेक एक की विभूति है-यह वह दृष्टि है जो स्वातन्र्त्र्य की वास्तविक भूमि को प्रदान करती है। ऐतरेय महीदास जन्म से दासीपुत्र माने गए हैं और अपनी चिन्तनशीलता के कारण ऋषि बने हैं। किसी की दूसरी स्त्री ( इसे इतरा कहा जाता है) का बेटा वह ऋषि माँ के नाम से ऐतरेय कहलाया। उस ऐतरेय द्वारा किया गया ब्रह्म अर्थात् वेद का व्याख्यान ऐतरेय ब्राह्मण है। ऐतरेय ब्राह्मण की पहली कण्डिका है-? अग्निर्वै दैवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः। पश्चिमी चिन्तनपरम्परा इसे बहुदेववाद और एकेश्वरवाद की अपनी कसौटी पर कसेगी, किन्तु भारतीय चिन्तनपरम्परा के एकत्व-बहुत्व का अनुमान वह नहीं कर पाती है। जो बहुदेववाद उसके लिए जंगलीपना और बर्बरता है, वही भारतीय चिन्तनधारा की वैकल्पिकता, विविधता और बहुवचनीयता है, जहाँ स्वायत्तता, स्वतन्त्रता और मुक्ति है। वेद में जिस तरह का एकेश्वरवाद वह समझते हैं, वह भारतीय परम्परा के लिए हेय और त्याज्य है। यह एकेश्वरवाद वर्तमान विश्व की बहुलता को आत्मसात् नहीं करके अनेक विकृतियों के रूप में प्रकट हुआ है। समता, स्वतन्त्रता और मुक्ति की पश्चिमी और पूर्वी दृष्टियाँ भिन्न हैं। पश्चिम का काव्यशास्त्र ग्रीक दार्शनिकों के अनुकरण सिद्धान्त के आधार पर अपनी बहस करता है और पूर्वी काव्यशास्त्र प्रतिभा के सिद्धान्त पर अपना चिन्तन करता है। इन दोनों की परिणतियाँ सर्वथा विपरीत हैं। खैर, हम ऐतरेय पर चर्चा करें। यह ऐतरेय महाभारत युद्ध के बाद का ऋग्वेद का एक व्याख्यान है। देवताओं की शुरूआत में अग्नि है और उनके अन्तिम पडाव पर विष्णु हैं। बाकी सब देवता इन दोनों के बीच हैं। यह कहने के बाद, सभी देवताओं को स्वीकारने बाद ऐतरेय कहता है-अग्निर्वै सर्वा देवता विष्णुः सर्वा देवताः। किसी भी द्वैत पर टिके हुए विचारक के लिए यह प्रलाप ही होगा। अनेक पश्चिमी विद्वानों ने ऐसा कहा भी है और यह उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति का सच है। उन्होंने जानबूझकर ब्राह्मण ग्रन्थों को असंगत नहीं कहा है, अपितु यह उनका यथानुभूत अभिवचन है। देवताओं के आरम्भ में जो देवता है, ऐतरेय का ऋषि उसमें सभी देवताओं को देख रहा है और पराकाष्ठा का जो देवता है, उसमें भी वह सभी देवताओं को देखता है। सबसे अधिक कठिनाई पश्चिमी विचारकों के सामने तब आती है, जब अग्नि विष्णु और विष्णु अग्नि हो जाता है। ये दो हैं या एक हैं, इसका निर्धारण वे अपने मन की भूमि पर करने जाते हैं, जबकि यह सब किसी अन्य मन की भूमि पर चिन्तित है। विचार की ऐसी विकेन्द्रिता उनके लिए असहज है। यहाँ केन्द्र कभी अग्नि है, तो कभी विष्णु और कभी इन दोनों में से कोई नहीं। अग्निषोमात्मकं जगत् को आखिर कैसे समझा जाए, जबकि न तो आप अग्नि को सोम का अंश बता रहे हैं और सोम को अग्नि का। अग्नि भी बता रहे हैं और सोम भी, किन्तु अग्नि सोम बन जाता है और सोम अग्नि। न सोम है और न अग्नि है। कुछ है, जिसे आप एक कोण से सोम कहते हैं तो दूसरे कोण से अग्नि। वह है-सः। जो है, वह अनेक हो गया है। अनेक विजातीय नहीं, आत्मीय है। यह आत्मभाव ही संस्कृति का बहुवचनीयता है। संस्कृति सृष्टि में आत्मभाव से उत्पन्न होती है, अन्यथा नहीं। एक की अनेकरूपता का दूसरा नाम संस्कृति है। विविधता, बहुलता और अनेकता विरोध नहीं, अपितु एक की अपेक्षा है, इस मूलाधार के बिना संस्कृति नहीं बनती है। वैदिक वाङ्मय एकत्व और अनेकत्व को देखने की जो दृष्टि देता है, वह एक ऐसी मिली-जुली दृष्टि है, जिसमें आप किसी भी कोण से देख सकते हैं और उसका परिणाम अनेकता की स्वीकार्यता से उपजी एकता नहीं, अपितु एकता की स्वीकार्यता से उत्पन्न अनेकताबोध है। वैदिक दृष्टि में अद्वैत है, अतएव यहाँ मित्रावरुणौ, द्यावापृथिवी आदि द्वन्द्व हैं। संस्कृत भाषा का द्विवचन वास्तव में वैदिक दृष्टि का वह प्रतीक है, जो अद्वैत और अद्वन्द्व की व्याख्या करता है। आज हमें यह द्विवचन व्यर्थ लग सकता है और अनेक भाषाविदों को यह वैसा प्रतीत भी हुआ। वेद में कौनसी द्यौ कब पृथिवी बन जाए और कब कौनसी पृथिवी द्यौ बन जाए, यह निश्चित नहीं है। असुर वरुण देव मित्र बन जाता है और देव मित्र असुर वरुण बन जाता है और दोनों रहते हैं-देवता ही। स्वाभाविक है कि आधुनिकता को यहाँ बडी भारी अराजकता प्रतीत होगी।
इस दृष्टि में संस्कृति के सम् को अनेक को एक करने के लिए उन अनेकों को उनके विशेषों से रहित करने की हिंसकता नहीं अपनानी पडती है, अपितु अनेकों की अनेकभावता को लिए हुए उनके भीतर का एकत्व भाव प्रकट हो जाता है। शिल्प, शास्त्र, साहित्य और जीवन पर इस दृष्टि का प्रभाव हुआ है और उसकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। ये चारों विशाल क्षेत्र हैं, जहाँ इस दृष्टि के प्रतिफलन का अध्ययन किया जा सकता है। ऐतरेय शिल्प के बारे में कहते हैं-आत्मसंस्कृतिर्वाव शिल्पानि च्छन्दोमयं वा एतैर्यजमान आत्मानं संस्कुरुते। ( ऐ.ब्रा., 30.1) वेद के लिए यजमान दो तरह का है-एक, छन्दोमय। दूसरा, छन्दोमुक्त। छन्दोमुक्त परमात्मा है और छन्दोमय जीवात्मा। यहाँ यह प्रतिपादित करने की आवश्यकता नहीं है कि ये दो नहीं, एक हैं। जब यजमान छन्दोमय अपने को संस्कृत करता है, विविधता और अनेक से संयुत करता है तो यह यह उसका संस्करण (अनेकता और विविधता का आधान) शिल्प है और शिल्प आत्मसंस्कृति है। आत्मसंस्कृति का अर्थ यहाँ गवेषणीय है। लोम, त्वचा, माँस, अस्थि, मज्जा-इन अनेक (पाँच) से देह की संस्कृति है। समस्त विविधताएँ, अनेकताएँ जो संस्कृति बनाती हैं, शिल्प हैं। अनेकताओं और विविधताओं में सामञ्जस्य है, विरोध नहीं। अतएव ये पाँच नहीं हैं, अपितु एक ही पांक्त देह हैं। मानुषशिल्प देवशिल्प की अनुकृति होता है-देवशिल्प (अर्थात् हाथी आदि प्राणी की मिट्टी आदि की अनुकृति) । मानुषशिल्प देवशिल्प की अनुकृति होने से असत्य है, ऐसा ऐतरेय नहीं कहते हैं, जैसा प्लेटो ने कहा है। वेद को समझने में बडी समस्या तब हो जाती है, जब वह एकत्व की दृष्टि में पात्र, उस पात्र में गृहीत द्रव्य, उसके देवता और क्रिया-सबको एक ही नाम से कहता है। यजुर्वेद में इस तरह के बहुत-से प्रसंग हैं, जो उसे हमारे लिए जटिल बना देते हैं। मानुषशिल्प भी वेद के लिए उतना ही पूज्य है, जितना देवशिल्प। शिल्प की जब वैदिक व्याख्या होगी, तो अनेक और एक के बीच सारा विचार समा जाएगा और अन्ततः अद्वैत की स्थापना होगी। भारतीय समाज में चाहें, नाट्यशास्त्र हो या कामशास्त्र, अर्थशास्त्र हो या शब्दशास्त्र-सभी क्यों अद्वैत में विश्रान्त होते हैं, यह इस दृष्टि से चिन्तनीय है। कामशास्त्र के प्रणेता को ऋषि कहना संस्कृतभाषा के समाज के लिए ही सहज है, अन्य के लिए नहीं। पश्चिमी सभ्यताएँ ईश्वर और पैगम्बर का निषेध कर देगी, किन्तु कामशास्त्र के प्रणेताओं के ऋषित्व को शायद ही स्वीकार करें। जीवन को विविध कोणों से देखा जा सकता है, यह छूट मिली अवश्य है, किन्तु एक बडा संकोच वहाँ है। अनीश्वरवाद के भीतर जाकर आप सारा नकार देंगे, किन्तु ईश्वरवाद के भीतर वहाँ न तो काम का प्रतिपादन किया जा सकता है और न लोकजीवन की उदात्तता का। वहाँ लोक और परमलोक के बीच संस्कृति (मेल) नहीं, विभाजन (एकांगिता/विखण्डन) है। लोक और अलोक का पारमार्थिक भेद जहाँ स्वीकृत हो जाता है, वहाँ एकाधिपत्य, एकाधिकार और अन्य की गौणता स्वतः उत्पन्न हो जाती है। आधुनिकता की लोकतान्त्रिकता अभी अत्यन्त संकुचित है। आधुनिकता से मेरा तात्पर्य योरोपीय नवजागरण से जन्मा योरोपीय बोध है।
संस्कृति पर विचार करते हैं, तो उपनिवेशवाद को अनदेखा करके नहीं चल सकते। उपनिवेशवादी रणनीति अभिमन्यु को फाँसने के लिए बनाए चक्रव्यूह से बहुत अधिक दुर्भेद्य है। जो उसे काटने जाता है, उसे ही उसका प्रवक्ता बना दिया जाता है। उपनिवेशवाद की स्थापना थी कि भारत में दो जातियाँ रही हैं-एक, आर्य और दूसरी, द्रविड। एक आक्रामक हैं और दूसरी आक्रान्त। इस स्थापना पर विचार करते हुए हम आर्यों के आक्रान्ता होने या न होने पर और आक्रान्ता होने की सम्भावना में उनके मूल देश की खोज में जुटते हैं। वहाँ हम उपनिवेशवाद को पाँच मुख्य बातें नहीं बता पाते हैं। एक, भारतीय संस्कृति केवल आर्य और द्रविड दो जातियों के मेल से नहीं जन्मी है। भारतीय संस्कृति को बनाने में आर्यद्रविडेतर अन्य अनेक जातियों का योगदान है और उसे वह सीधे-सीधे नकार रहा है। दो, आर्य और द्रविड-दो जातियों के मेल से बनी संस्कृति कहकर उपनिवेशवाद भारतीय संस्कृति का उपहास कर रहा है किन्तु ऐसा करते हुए वह शुद्धतावाद का एक दम्भ पाल रहा है, जिसकी परिणति अलोकतान्त्रिक और अमानवीय ही नहीं, अपितु पाशविक अविवेक में होती है। तीन, उपनिवेशवाद की संस्कृति की परिभाषा ही दूषित है। गङ्गा-जमुनी संस्कृति कहने का अर्थ संस्कृति को एकदृष्टिपरक मानना है। इसी से पहली, दूसरी या तीसरी परम्परा मानने का विचार जन्मता है जो एक दृष्टिकोण के अन्त और दूसरे दृष्टिकोण के सत्तासीन होने की मीमांसा पर प्रतिपादित होता है। संस्कृति की बहुवचनीयता नहीं, अपितु बहुवचनीयता ही संस्कृति होती है। एकवचनीयता संस्कृति नहीं है, उसे अन्य कुछ भी कहा जाए। चार, मजहब से संस्कृति नहीं बनती है। मजहब में अपने क्षेत्र की संस्कृति का प्रभाव हो सकता है और वह बहुवचनीयता के प्रति आदरदृष्टि हो सकता है, किन्तु अपनी प्रकृति में वह एकवचन है। औपनिवेशिक संस्कृति मीमांसा मजहब मीमांसा पर टिकी हुई है। वह एक शास्त्र, एक दर्शन, एक भाषा और एकरस की भूमि पर खडी होकर विचार करती है, तो उसे भारत को राष्ट्र (राज्य) कहने में संकोच होता है। बहुवचनीयता का इससे बढकर अस्वीकार और क्या हो सकता है ! भारत एक राष्ट्र (राज्य) है, तो उसकी एक राष्ट्रीय (राज्य) भाषा, राज्य मजहब, राज्य पुष्प, राज्य पशु, राज्य गीत-आदि होने चाहिए। हमने गौ को राज्यपशु, हिन्दी को राज्यभाषा, कमल को राज्यपुष्प मान लिया। गीता को राज्य मजहब ग्रन्थ मानने के प्रस्ताव आते रहे हैं। गीता का महत्त्व अपनी जगह है, उस पर कोई संदेह नहीं, किन्तु एक ग्रन्थ और एक पुष्प, एक पशु, एक भाषा की दृष्टि से सोच भारतीय नहीं है। इससे जो विचार की दिशाएँ उठीं, वे सामञ्जस्य और सहवर्तिता की किसी सम्भावना तक को नहीं स्वीकार करती हैं और वैसा हों तो भारत को एक राष्ट्र क्यों रहना चाहिए। वह तो अनेक राष्ट्रीयताओं का एक राज्य ( राजनैतिक इकाई ) है, यह स्वतः प्रतिपादित हो जाता है। मजहबों/उपासना-पद्धतियों व भाषाओं की इकाई की अपनी संस्कृति नहीं होती है। वे पारस्परिक समञ्जस होती हैं, तो संस्कृति बनती है और नहीं बनने पर संस्कृतिराहित्य रहता है। भारतीय राजा किसी न किसी मजहब के उपासक होते थे, किन्तु उनकी महारानी या राजकुमार भी उसके इस मजहब से अनिवार्यतः बँधे नहीं थे। भले ही, एक- दो अपवाद आपको मिल जाएँगे किन्तु यह अपवाद भारतीय संस्कृति का स्वभाव नहीं है। पाँच, उपनिवेशवाद भारत राष्ट्र में आर्य और द्रविड-दो जातियाँ बताता है। भारत में दो नहीं, सैंकडों जातियाँ रही हैं। वह एक राष्ट्र में एक जाति के होने ( प्राधान्य) की जो बात करता है, वह स्वयं में बर्बरता और असभ्यता है। भारत में जो सैंकडों जातियाँ मानी हैं, उनमें आर्य और द्रविड नाम की कोई जाति नहीं रही। यह उसकी मानसिक ऊपज है। अनेक जातियों के अस्तित्व को नकार कर दो जातियों के संघर्ष को दर्शाने में उसका हित है। प्राचीन वाङमय से जिन जातियों की जानकारी मिलती हैं, उनमें ये नाम भारतीय लोक में बहुत प्रसिद्ध हैं-नर, वानर, देव, दानव, दैत्य, असुर, नाग, यक्ष, गन्धर्व। भारतीय संस्कृति को बनाने में नर, वानर, देव-असुर, यक्ष-असुर, दानव-दैत्य-गन्धर्वों महान् योगदान है। छन्दशास्त्र के मुनि पिङ्गल नाग हैं और इन्हें योगशास्त्र के मुनि पतञ्जलि का भाई माना जाता है। प्रत्येक जाति के आर्य (श्रेष्ठ / उदात्त) लोगों की स्वीकार्यता होने से भले ही भारतीय साहित्यकारों की जाति नहीं खोजी गयी और आज वह कठिन है, किन्तु विचार करने पर एक व्यापक दृष्टि का अनुभव होगा। संगीत के लिए उच्च स्वर में गन्धर्वों का योगदान स्वीकार किया जाता है। औपनिवेशिक अध्येताओं को कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि इस तरह का श्रेय द्रविड और आर्य को नहीं दिया गया। आर्य और द्रविड-इन दोनों में एक तो भाववाचक है और दूसरा स्थान वाचक। महर्षि दयानन्द सरस्वती जब अपने को आर्य घोषित करते हैं, तो वह आर्य और अनार्य के औपनिवेशिक अर्थ को नकारते हुए भी, समस्त भारत को आर्य मानते हुए भी आर्य के जाति होने के औपनिवेशिक रणनीतिक दाँव को अवसर प्रदान कर देते हैं। छह, संस्कृति के मुख्य आधार दो हैं-अनुभव का आदर और विचार की अवश्यंकरणीयता। अनुभव चेतना का विषय है। अनुभव को नकारा नहीं जा सकता। जो अनुभव है, वह प्रमाणित है। विचार अप्रमाणित है, किन्तु उसे अवश्य करणीय माना गया है। पाणिनि ने चर्धातु को दो गणों में पढा है। चुरादिगणीय चर्धातु का अर्थ है संशय। विचार संशय है। विचार अवश्य करणीय है और अनुभव स्वाभाविक है। विचार के ऊपर अनुभव को महत्त्व संस्कृति देती है। अनुभव सत्य होता है और विचार सत्यासत्य। चूँकि विचार में सत्य की दिशा अनिवार्यतः रहती है और वही अनुभव की ओर ले जाता है, अतएव वह अवश्य करणीय है। कविता या कवि विचार करती है, किन्तु बडी कविता तो तब होती है, जब उसमें अनुभव का प्रकाश होता है। अनुभव का विषय होने से काव्य प्रतिभा से माना गया, उसे शिल्प (कला) नहीं कहा गया। कला और कविता में भारतीय प्रज्ञा अन्तर करती है कि कविता छन्दोमुक्त होती है, जबकि शिल्प अनिवार्यतः छन्दोबद्ध होता है--यजमान छन्दोमय अपने को संस्कृत करता है। शिल्प आत्मसंस्कृति है। अनेक यहाँ आकर मिलता है, जुडता है। इससे भी आगे की स्थिति वह है, जब सारे छन्द से मुक्त होकर यजमान अपने को पहचानता है। यह यजमान कवि है और उसकी यह अनुभूति कविता है। अनुभव के परम होने का अर्थ विचार को नकारना नहीं है। वैदिक संस्कृति क्या है, यह जिज्ञासा करते ही हम वेदेतर संस्कृति या अवैदिक संस्कृति के होने की घोषणा करते है। वस्तुतः, संस्कृति की अवधारणा वेद की है, अन्यत्र वह उतनी मात्रा में नहीं है। जिसे हम वैदिक संस्कृति कहते हैं, वह कोई एकान्तिक कल्चर नहीं है। अनेक वैदिक वाद हैं और उनमें समन्वय उसका सिद्धान्त है। वैदिक संस्कृति शब्द का उच्चारण करते समय यदि किसी एक वाद के होने का भान हमें हो रहा हो तो यह सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय तत्त्वदृष्टि को निरन्तर खोते जाने का परिणाम है। दृष्टि की क्षीणता का अनिवार्य परिणाम यह होता है कि बहुत बडा दार्शनिक समाज भारतीय परिदृश्य में उस तत्त्वदृष्टि को अधिगत करने के लिए आता है और अपने विचार से अनुभव तक पहुँचने का प्रेरणा देता है। विचार की स्वतन्त्रता संस्कृति का अनिवार्य तत्त्व है। एक विचार द्वारा दूसरे विचार की आलोचना-प्रत्यालोचना की ही नहीं, आत्मालोचना की भी छूट होती है। पश्चिम अपने आधुनिक लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण में एक समुदाय से दूसरे समुदाय की स्वतन्त्रता पर तो गम्भीर विचार करता है, किन्तु मुझे संदेह है कि उत्तर आधुनिक चिन्तन के बावजूद वह समुदाय के भीतर स्वतन्त्रता का पक्षधर है। भारतीय संस्कृति में संघ तभी बनेगा, जब दो व्यक्ति के विचार भिन्न हों और वे परस्पर अविरोध से उनके पालन करने के लिए मिल जाए। जन्म से ऊँच-नीच जातियों की संसार की सबसे निंदनीय परिपाटी भारत में जन्मी, जिसका औचित्य नहीं है और वह अस्वीकार्य है, किन्तु जन्म से किसी के किसी उपासना पद्धति का बंदी बन जाने की कुरीति तो यहाँ नहीं रही है। एक परिवार का मुखिया शैव है तो यहीं देखने को मिलेगा कि पत्नी वैष्णव है। पुत्र सांख्य है तो बेटी श्रावक है। सबके अपने मत हैं और सब एक परिवार है। यह दृष्टि यहाँ तक फैलती है कि एक व्यक्ति कभी किसी उपासना पद्धति को अपनाता है तो कभी किसी अन्य को। समस्त उपासना पद्धतियों का स्वीकार संस्कृति को बनाता है।
इसे अब प्राचीन साहित्य के एक दो निदर्शन से समझ सकते हैं। तैत्तिरीय आरण्यक में पञ्चकोश का विवरण है। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश-आदि वैदिकों के विभिन्न विचार हैं। ये परस्पर भिन्न हैं, किन्तु इन सबकी साधारण मान्यता यह है कि सृष्टि एक से बनी है और बहुत्व एक का हुआ है। एकत्व अनुभूति का विषय है और अनेकत्व की भेददृष्टि अनुभवाभाव और विचार का विषय है। एक विचार और अनुभव की एकता दो भिन्न विषय है। अनुभवजन्य ऐक्य वरेण्य है, जबकि एक विचार हृदय की सिकुडन है। अनुभव की एकता को भारतीय दृष्टि स्वीकारती है, किन्तु विचार के क्षेत्र में वह एक को नहीं, बहुल को पुरस्कृत करती है। पश्चिमी चिन्तक व्याख्या, भाष्य और टीका को अनुवाद (अनुकथन) समझते हैं। इसका कारण है कि उनकी मौलिकता की अवधारणा एक विचार पर टिकी हुई है। व्याख्यान और भाष्य विचार को विचारान्तरों के आलोक में परखता है। ब्रह्मसूत्र के भाष्य उसके अनुकथन होतें, तो दार्शनिक सम्प्रदाय नहीं होते। ब्रह्मसूत्र को अनेक विचारों के आलोक में समझा गया है। तैत्तिरीय आरण्यक का उदाहरण देखें कि वहाँ अन्नमयादि पाँच कोश हैं। ये पाँच कोश वैदिक समाज की अनेक विचारधाराएँ हैं। विचार की स्वतन्त्रता यह है कि वह विचारान्तर के प्रतिपादन और आलोचना दोनों के लिए अवकाश देता है। सायण के भाष्यों में तैत्तिरीय आरण्यक का भाष्य महत्त्वपूर्ण है। यह सायण-माधवीय भाष्य है। यह भाष्य स्वयं माधवाचार्य विद्यारण्य स्वामी ने नहीं किया है तो भी इतना तो निश्चित है कि इसका समस्त व्याख्यान उनकी दृष्टि से हुआ है। तैत्तिरीय आरण्यक के इस भाष्य में पञ्च कोशों पर जो विचार हुआ है, वह स्वतन्त्र ग्रन्थ से अधिक मौलिक है। अन्नमय कोश के व्याख्यान में चार्वाक, आर्हत, बौद्ध, सांख्य, वैशेषिक काणाद, पाञ्चरात्र भागवत (वैष्णव) इत्यादि विचारधाराओं की चर्चा की गई है। आकाश, अम्भ आदि के सृष्टिमूल होने के वादों पर विचार किया गया है। विचार को विचार के स्तर पर तर्क से परखा जाता है और वैसा करते हुए कोई कसर नहीं छोडी जाती है। भागवतों के मत को सायण इस तरह उपन्यस्त करते हैं-
पाञ्चरात्रिका भागवता मन्यन्ते-भगवानेको वासुदेवो जगत उपादानं निमित्तं च।
तत्समाराधनज्ञानध्यानै-र्भवबन्धविच्छेदः। तस्माच्च वासुदेवात् संकर्षणाख्यो जीवो जायते। जीवाच्च प्रद्युम्नाख्यं मनः। मनसश्चानिरुद्धाख्योऽहङ्कारः।
(पाञ्चरात्रिक भागवत मानते हैं-भगवान् एक वासुदेव जगत् के उपादान और निमित्त दोनों है। उसके समाराधन , ज्ञान और ध्यान से संसार का बन्धन कट जाता है। उस वासुदेव से संकर्षण नामक जीव पैदा होता है और जीव प्रद्युम्न नामक मन पैदा होता है एवं मन से अनिरुद्ध नाम का अहङ्कार जन्मता है।)
भागवत-मत का उपन्यास करके वह इसे तर्क पर परखते हैं-
त एते वासुदेवादयश्चत्वारो व्यूहाः सर्वात्मका इति प्राप्ते ब्रूमः-तत्र वासुदेवं तत्समाराधनादिकं च श्रुत्यविरोधादभ्युपगच्छामः। यत्तु जीव उत्पद्यत इत्युक्तं तदसत्। कृतनाशाकृताभ्यागमप्रसङ्गात्। पूर्वसृष्टौ यो जीवस्तस्मिन्नुत्पत्तिमत्त्वेन प्रलयदशायां विनष्टे सति तत्कृतयोर्धर्माधर्मयोरफलप्रदत्वेन विनाशः प्रसज्यते। अस्मिंश्च कल्प उत्पद्यमानस्य नूतनजीवस्य धर्माधर्मयोः पूर्वमननुष्ठितयोः सतोरिह सुखदुः खप्राप्तिर्भवतीत्यकृता-भ्यागमः प्रसज्येत। तस्माज्जीवोत्पत्त्यादिकं न युक्तम्।
( वे ये वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध नामक चारों व्यूह सर्वात्मक *ब्रह्म, जीव, मन, अहङ्कार होने से* हैं, यह निष्कर्ष मिलने पर हम कहते हैं कि वासुदेव और उसके समाराधन को तो श्रुति विरुद्ध न होने से तो हम स्वीकारते हैं। जो यह कहा गया कि जीव उत्पन्न होता है, वह असत् है। इसे स्वीकारते हैं तो दो विप्रतिपत्तियाँ आती हैं-एक,कृत का नाश और दूसरी, अकृत का अभ्यागम। पूर्वसृष्टि में जो जीव था, उसमें उत्पत्तिमत्ता से प्रलयदशा में विनष्ट होने पर उसके किए धर्म-अधर्म का बिना फल दिए विनाश हो जाएगा और इस कल्प में उत्पन्न होने वाले नए जीव के पहले अननुष्ठित (न किए हुए ) धर्माधर्म के भी सुख और दुःख आते हैं, यह अकृत-अभ्यागम है। उससे जीवों की उत्पत्ति इत्यादि युक्तियुक्त नहीं है।)
अपना मत प्रतिपादन का स्वातन्त्र्य है तो उसको तर्क पर परखने का स्वातन्त्र्य है। आधुनिकता में जब बहुलता की पैरवी की जाती है तो कभी-कभी (सर्वदा नहीं) विभिन्न मतों को अनालोच्य स्थिति में स्वीकारने का आग्रह होता है। यह आग्रह अन्ततः एकाग्रह है, बहुलता नहीं। बहुवचनीयता और बहुआयामिता का अर्थ है- किसी भी एक की असमीक्ष्यता एवं अनालोच्यता को मान्य नहीं करना। हम कई बार बहुलता और एकता का प्रतिपादन इतने उथले आधार पर कर देते हैं कि वह मनुष्य की चेतना को बदल नहीं पाता है। योग दर्शन कहता है कि मनुष्य की चेतना वस्तुतः धारणाओं से बनी होती है, जो कि उसकी मूल चेतना या उसका स्वरूप नहीं है। वस्तुतः अनेक में एकता की साधना अपने आप में दोषपूर्ण विचार है। विविधता, बहुलता और विकल्पता की वैधता तो एक से अनेकता के जन्म होने की दृष्टि को अधिगत करने पर मिलेगी। एक विचित्र और अगंभीर कुलबुलाहट योरोपीय आधुनिकता से उत्पन्न विचारवादों में देखी जाती है कि वे इन समस्त मतभिन्नताओं, विविधताओं और विकल्पों को समाप्त करना चाहते हैं। साम्प्रदायिक विवादों, भाषायी विवादों, प्रान्तीय विवादों और क्षेत्रीय विवादों के उनके समाधान क्रमशः धर्मनिरेपक्षता, एक राष्ट्रभाषा, एकराज्य के इकहरेपन में है। सारा विकास मनुष्य की रुचियों और विविध जीवनदृष्टियों को एकमेक करने में नहीं, सब को मिटाकर किसी एक को स्थापित करने में देखा गया है। आचार्य सायण पाञ्चरात्रिक भागवतों के सिद्धान्त को दो भागों में बाँट देते हैं और एक भाग से सहमति जता देते हैं। ब्रह्म, जीव, मन, अहङ्कार को भागवत विचारक वासुदेव आदि संज्ञाओं से कह रहे हैं। कोई अन्य संज्ञाओं या किसी भी भाषा की संज्ञाओं- खुदा, अल्लाह, गॉड से भी अभिव्यक्ति दे सकता है। संज्ञाओं पर दार्शनिक नहीं ठहरते हैं। वह यह पूछते हैं कि आफ सिद्धान्त में जीव और ब्रह्म के बीच क्या सम्बन्ध बताया जा रहा है। शाङ्कर वेदान्त तो सम्बन्ध भी स्वीकार नहीं करता है, क्योंकि सम्बन्ध दो के बीच होता है और यहाँ द्वित्व वस्तुतः नहीं है। सभी भाषाओं में ईश्वर का नाम अलग-अलग है, जबकि ईश्वर एक है, यह कहना कहा तक उचित है, जबकि एक ही नाम का ईश्वर अलग- अलग अर्थ में होता है। उस ईश्वर की मीमांसा और तार्किक निष्पत्तियाँ जो बोध उत्पन्न करेगी, वह हमें साम्प्रदायिकता से मुक्त करेगी। तर्क की अप्रतिष्ठा कही गयी है और उस वाक्य की आड में किसी मान्यता को यथावत् मान लेने का आग्रह शास्त्र की जड समझ है। जहाँ तर्क को अप्रतिष्ठित और अयथार्थ बताया जाता है, वहाँ उसके सामने यथार्थानुभव होता है। अनुभव एक बडा शब्द है और उसमें भारतीय चिन्तन की अर्थवत्ता सम्पूर्णता में निहित है। समस्त विविधताओं और वैकल्पिकताओं का जन्म तर्क से होता है और सम्भवतः इसी लिए उसको ऋषि कहा गया है। स्वयं अपने सिद्धान्त की आलोचना और परिष्कार भारतीय दार्शनिकों का मुख्य गुण है। यह स्वभाव वैदिक साहित्य में अधिक प्रखरता से है। यजुर्वेद के ब्रह्म (मन्त्र) के दो व्याख्यान हैं-एक, तैत्तिरीय ब्राह्मण और दूसरा शतपथ ब्राह्मण। मन्त्र के व्याख्यानान्तर हो सकते हैं और एक व्याख्या को दूसरी व्याख्या की व्याख्या का अधिकार है, यह दृष्टि भारतीय समाज में सहज स्वीकार्य है। तैत्तिरीय और शतपथ के बीच बडा ब्रह्मोद्य ( शास्त्रार्थ) रहा है।
यहाँ हमें एक प्रश्न करना चाहिए कि वेद निन्दक को नास्तिक कहना क्या वैचारिक वैमत्य के प्रति असहिष्णुता नहीं है। बहुलता की दृष्टि परम्परा को बनाती है। एक साथ अनेक वादों की दृष्टि से कोई वाद निरस्त नहीं होता है, अपितु वह अपनी वैकल्पिकता में बना रहता है। भारत में परम्परा और संस्कृति है, अत एव यहाँ एक ही शब्द बहुवाचकता को लिए रहता है। वेद शब्द का स्वयं वेद और वैदिक साहित्य में जिन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है, वहाँ अधिवेदम् (वेद के भीतर ही रहने) के छन्द का अतिक्रम करके वेदान्त (वेद से परे जाने) की यात्रा है। यहाँ श्रमण वेदान्त को तो स्वीकारते हैं, किन्तु वेद को नहीं स्वीकारते हैं। वे वेद में श्रान्त होते हैं, आनन्द नहीं पाते हैं। यह वेद है लौकिक जीवन। लौकिक जीवन की दुःखमयता को स्वीकारना श्रमणत्व है। बुद्ध और महावीर इसी प्राचीन श्रमण परम्परा के निर्वाहक हैं, प्रवर्तक नहीं। बुद्ध दुःखवाद और आनन्दवाद के धु*वों की जगह बीच का रास्ता अपनाते हैं। बौद्ध ने आर्यधर्म/ आर्यसिद्धान्त का प्रतिपादन किया, जो न पूरा दुःखवाद है और न आनन्दवाद। नागार्जुन आदि विचारक बुद्ध के अनुभव को विचार के स्तर पर प्रस्तुत करते हैं। वेदवाद आनन्दवाद है, संसार में रम जाना है। संसार को दुःख मानने के अतिवाद और संसार में आनन्द मानने के अतिवाद के दोनों ध*ुवों में भगवान् बुद्ध को एकांगिता प्रतीत हुई और उस समन्विति का परिणाम माध्यमिकशास्त्र के रूप में हुआ। पश्चिमी चिन्तन दृष्टि उत्थान और पतन के दो सिरों में प्रत्येक विचार को रख देती है। बौद्ध दृष्टि के समन्वय में जो-जो अन्वित हुए थे, वे कालान्तर में महायान, वज्रयान और हीनयान के रूप में प्रकट हुए, उनका सर्वथा नाश नहीं हुआ। आज कहा जा रहा है कि भारत में से बौद्ध धर्म लुप्त हो गया। वस्तुतः, हिन्दू धर्म की दृष्टि, उपासना, प्रतीकों और लोककथाओं आदि में सर्वाधिक प्रभाव किसी का है तो वह बौद्धों का है। तीर्थ यात्रा, मन्दिरों का निर्माण आदि के पीछे वैदिक प्रेरणा उतनी नहीं है, जितनी बौद्ध प्रेरणा है। आचार्य शङ्कर को आधा बौद्ध कहा गया, क्योंकि वह अपने पूर्ववर्ती महान् दार्शनिक नागार्जुन की दृष्टि के साथ संवाद कर रहे थे। पौराणिक धर्म के प्रतिष्ठित होने के बाद शङ्कर लिख रहे थे। पौराणिक धर्म और पुराण बौद्ध चिन्तन के सन्दर्भ में ठीक से समझे जा सकते हैं। पुराणों की अपेक्षा रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र, चरकसंहिता, अष्टाध्यायी प्राचीन और प्रामाणिकतर हैं। पुराणों की वैदिकता नाममात्र की है और बौद्धत्व उसकी अपेक्षा अधिक है। वस्तुतः, परम्परा कभी इकहरी नहीं होती है। वह अनेक स्तरों में गुँथी हुई होती है। उसमें अनेक ध्वनियाँ एकमेक होकर आती है। उत्तररामचरितकार भवभूति जब लव को देखते हैं, तो उन्हें उसमें राम और सीता की मिली जुली आभ्यन्तर छवि दिखलायी पडती है, अतः उसे वह संवृत्ति कहते हैं-वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावस्मिन्नभिव्यज्यते। संवृत्तिः।। राम और सीता की वृतियाँ एकमेक होकर बच्चे में उतरी है। परम्परा में विभिन्न वाद एकमेक होकर उतरते हैं। परम्परा एकांगी और एकरस नहीं होती है। जिसे एक परम्परा कहा जाता है, उसमें भी अनेक स्वर होते हैं। जिसके न आगे हैं और न पीछे हैं, वह वाद-प्रवाद हो सकता है, किन्तु जब किसी वाद को उसके प्रस्तोता के बाद विचार के लिए स्वीकारा जाता है और उसमें परिष्कार (जोड-बाकी की) का सातत्य विकसित होता है तो वह परम्परा बन जाता है। यदि कोई रूढि को परम्परा कहें या परम्परा को रूढि समझें, तो यह ठीक नहीं है। परम्परा तब परम्परा नहीं रह पाती, जब उसमें उत्तरोत्तर विचार थम जाता है।
नाट्यशास्त्र की परम्परा किसी एक जाति, एक समाज, एक दृष्टि, एक क्षेत्र की परम्परा है, यह प्रश्न संस्कृत के साहित्य को देखने की दृष्टि को पुनर्निधारित करने के लिए उठाना चाहता हूँ। नाट्यशास्त्र कितनी बडी व्याप्ति से लिखा जा रहा है, यह हम केवल एक उद्धरण से समझ सकते हैं कि नटों को रंगों और वेषों से पात्रों का अनुकरण करना होता है-
किरातबर्बरान्ध्राश्च द्रविडाः काशिकोसलाः ।
पुलिन्दा दाक्षिणात्याश्च प्रायेण त्वसिताः स्मृताः।।
शकाश्च यवनाश्चैव पह्लवा वाह्लिकाश्च ये।
प्रायेण गौराः कर्तव्या उत्तरा ये श्रिता दिशम्
पाञ्चालाः शौरसेनाश्च माहिषाश्चौड्रमागधाः।
अङ्गा वङ्गाः कलिङ्गाश्च श्यामाः कार्यास्तु वर्णतः।।
21. 110-112 ।।
(किरात, बर्बर, आन्ध्र, द्रविड, काशी कोसल, पुलिन्द और दाक्षिणात्य प्रायः ( सब नहीं) काले कहे गए हैं। शक, यवन, पह्लव, वाह्लिक जो उत्तर दिशा में हैं, प्रायः गौर वर्ण के करने चाहिए। पाञ्चाल, शौरसेन, माहिष, औड्र मागध, अंग, बंग, कलिंग वर्ण से श्याम बनाने चाहिए। )
यहाँ भारत की समस्त क्षेत्रीयताएँ उपस्थित हैं और उन क्षेत्रों के लोगों के शरीर के प्राकृतिक वर्ण प्रायः क्या होते हैं, यह बताया गया है। क्रमशः उनके मूँछ-दाढी के प्रकारों की विविधता, वेशभूषा की अनेकता, भाषाओं की बहुलता को नाट्यशास्त्र बताता है। नाट्यशास्त्र और भारतीय साहित्य स्वीकारता है कि गानविद्या गन्धर्वों की देन है। वह वास्तुविद्या के लिए दानव मय के प्रति आदर व्यक्त करता है। ब्राह्मण (विधि, आरण्यक और उपनिषद्) में कितनी क्षेत्रीय, जातीय, भाषिक और वैचारिक भिन्नताओं का समावेश हुआ है, यह अध्ययन नहीं हुआ है। एक आरण्यक में दीमक के लिए वम्री शब्द है, तो दूसरी में उदीका। सायण किसी तीसरे शब्द (वल्मीक) से उनका अनुवाद करते हैं। विभिन्न भाषाएँ एकमेक हुई हैं, नष्ट नहीं। यहाँ न तो किसी की बोली छिनी जाती है और न आजीविका और न जीवनदृष्टि। कारण कि यहाँ प्रकृति (शुद्धतावाद) की अपेक्षा संस्कृति और संवाद पर दृष्टि केन्द्रित रही है। केन्द्रित कहने का अर्थ यही है कि केन्द्र इसका यहीं था, भले ही यहाँ भी इतिहास के अनेक कालखण्डों में एकांगी दृष्टियाँ उभरीं।
काव्यशास्त्रादि अनेक विद्याशाखाओं की बहुल, संवादी और संकुल परम्परा पर विचार दीर्घ हो जाएगा, अत एव ऐतरेय के एक प्रसंग इस चर्चा को विराम देना उचित होगा। वह प्रसंग इस प्रश्न का उत्तर हो सकता है कि ऐसा क्यों होता है कि भारतीय परम्परा अन्ततः संवाद में परिणत होती है। ऐतरेय कहता है कि सत्य और ऋत ये दो दीक्षा हैं- ऋतं वाव दीक्षा सत्यं दीक्षा तस्माद् दीक्षितेन सत्यमेव वदितव्यम्। आपको यहाँ विचार (संशय) करना होगा कि जब दोनों दीक्षा हैं, तो सत्य को ही बोलना चाहिए, ऐसा क्यों कहा गया, ऋत को बोलने की बात क्यों नहीं कही। ऋत बोलने की नहीं, देखने की, सोचने की वस्तु है। सायण भाष्य करते हैं कि कोई वस्तु जैसी है, उसका वैसा ही चिन्तन करना ऋत है और वस्तु जैसी है, उसे वैसा ही बताना ऋत है। ये दोनों दीक्षा हैं। ऋत मन का विषय है और सत्य वाणी का विषय- मनसा यथावस्तुचिन्तनम् ऋतशब्दाभिधेयम्, वाचा यथावस्तुकथनं सत्यशब्दाभिधेयम्। यह दीक्षा वैदिक है, इसके बाद बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णव इत्यादि सभी दीक्षाओं में बाहर बहुत कुछ बदला, किन्तु मूल दीक्षा की गूँज उनमें बनी रही। गूँज भले ही रही हो, दीक्षा शब्द होते हुए भी सभी दीक्षाएँ एकार्थ नहीं हैं और वे जीवन को विविध कोणों से देखती हैं और किसी भी व्यक्ति के लिए किसी भी कोण से विचार करने के लिए ये दीक्षाएँ उपलब्ध रही हैं, न कि किसी एक दीक्षा को अपदस्थ करके दूसरी दीक्षा पदस्थ हुई। अत एव मेरी समझ में भारत का मुख्य अलङ्कार अपह्ह्नुति है, जो उसकी जीवनधारा में जुडने वाले असत् का निषेध करते हुए सत् की प्रतिष्ठा करता है। सत् सनातन है और असत् कालिक। अपह्नुति में जो मौजूद का निषेध होता है, वह उस मौजूद अवास्तविक होता है। आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपह्ह्नुति का उचित लक्षण करते हैं कि वह निषेधमुख से वस्तुतत्त्व की स्थापना है। सांस्कृतिक क्षेत्र में निषेधमुख से कालान्तराल से छूटा जा रहा वस्तुतत्त्व यह समाज पुनः पुनः सहेजता है। ऋत और सत्य के द्वन्द्व की चर्चा तो होती है, किन्तु ऋत-सत्य के साथ तिकडी/ त्रयी बनाने वाले चक्षु की चर्चा उनके संदर्भ में नहीं होती है। ऐतरेय प्रश्न करता है कि कौन मनुष्य समग्र सच बोल सकता है अर्थात् किसी वस्तु को, जैसी है, वैसा कहने का सामर्थ्य किसमें हो सकता है ? यह सामर्थ्य मनुष्य में नहीं है। तब तो उसकी दीक्षा खण्डित हो जाएगी। अब क्या करें, इसका उत्तर ऐतरेय देता है-विचक्षणवतीं वाचं वदेत्। जो आँखिन देखी है, वह विचक्षणवती वाक है। कबीर को आप याद कर सकते हैं जो आँखों देखी कहने की परम्परा का प्रवचन करते हैं। यह वाक यथावस्तु-कथन हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती, किन्तु इसे बोलने से वस्तु को अन्यथा सोचने और अन्यथा कहने का दोष नहीं होता है। विचक्षण, विद्वान्, पण्डित आदि पर्याय हैं, एक शब्द नहीं। श्लेष में एकवर्णानुपूर्वी वाला शब्द भी अनेक होता है, ये तो भिन्न हैं ही। ऋत, सत्य और विचक्षणता की त्रयी है। विचक्षणता में किसी वस्तु को किसी एक कोण या एकाधिक कोणों से देखते हैं और उन उन कोणों से उस कथन को स्वीकृति दी जा सकती है। परन्तु प्राप्तव्य है वस्तु को उसके समस्त कोणों से सोच सकने वाले ऋत और कह सकने वाले सत्य की। इस प्राप्तव्य के लिए यान विचक्षणता है। यहाँ वैकल्पिक, विविध और बहुल के सूत्र संस्कृति को रचते हैं।
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