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भारतीयता, सांस्कृतिक बहुलवाद और हिन्दी साहित्य

राजाराम भादू
भारतीयता का आप कोई भी अर्थ ढूँढ कर देखें, उसमें सांस्कृतिक बहुलवाद को सन्निहित पाएँगे। मसलन, भारतीयता से तात्पर्य उस विचार या भाव से है जिसमें भारत से जुडने का बोध होता हो या भारतीय तत्त्वों की झलक हो अथवा जो भारतीय संस्कृति से सम्बंधित हो। भारतीयता का प्रयोग राष्ट्रीयता को व्यक्त करने के लिए भी होता है। भारतीयता के अनिवार्य तत्त्व है- भारतीय भूमि, जन ,संप्रभुता, भाषा एवं संस्कृति। बहुलवाद सिद्धान्ततः किसी व्यापक समाज में कई संस्कृतियों की एक साथ सक्रियता और साहचर्य को स्वीकार करता है। हम जानते हैं कि कोई संस्कृति भाषा, धर्म, रीति- रिवाज जैसे व्यावहारिक व दृष्टिगोचर घटकों के साथ आस्था- विश्वास तथा मूल्य- मान्यताओं जैसे अदृश्य तत्त्वों से निर्मित होती है। भारत को विविध धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों का देश माना जाता रहा है। भारतीयता की अवधारणा इसी वैविध्य, भिन्नता और इनके सहजीवन से मिलकर बनती और व्यक्त होती है।
हम जानते हैं कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता आधुनिक अवधारणाएँ हैं जिनका उद्भव यूरोप में हुआ था। भारतीय राष्ट्रव्यापी उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ विकसित हुआ। जाहिर है कि राष्ट्रीयता की भावना में भारतीयता भी घुलती- मिलती रही। ऐसा नहीं कि भारतीय राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को लेकर कोई एकमत रहा, इसे लेकर मत- भिन्नता तब भी रही और अभी भी है। धर्म को राष्ट्रीयता से जोडने के प्रयत्न थे, वीर सावरकर ने कहा था कि हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयता है। लेकिन इसे न तब स्वीकार किया गया और न ही अब स्वीकारा जाता है। हिन्दू धर्म के अध्येता मानते हैं कि यह एकाश्मिक नहीं है और अपनी प्रकृति और संरचना में ही बहुलवादी है। अनेक पंथ और मत- मतान्तर रहे हैं जो स्वायत्त हैं और साथ ही अपने को हिन्दू धर्म से सम्बद्ध मानते हैं। सर्वोच्च न्यायालय तक ने हिन्दू धर्म को संस्थागत धर्म से अलग करते हुए एक जीवन- शैली के रूप में व्याख्यायित किया है। तमाम धार्मिक सुधार और एकीकरण के प्रयासों के बाबजूद हिन्दू धर्म को संस्थागत रूप नहीं दिया जा सका। कई आदिवासी समुदाय अपने को हिन्दू धर्म के दायरे में लिए जाने का प्रतिकार करते मिलते हैं।
यह एक विडंबना है कि जो लोग धर्म अथवा नस्लीय पहचान को राष्ट्रीयता से जोडने के पक्षधर रहे हैं, वे राष्ट्रवाद के उग्र और आक्रामक संस्करण को प्रस्तावित करते हैं। दो विश्व- युद्दों में हम इसे देख चुके हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर इसे उसी समय देख रहे थे और राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद पर अपने व्याख्यानों के जरिए उन्होंने देश और दुनिया को इसके भयावह खतरे से आगाह किया था। हम पाते हैं कि ऐसे विचार से आने वाली सत्ताएँ अपने को कथित राष्ट्रीयता से ऐकबद्ध कर लेती हैं। तब उनका समर्थन देश- भक्ति का संकेतक बन जाता है। उनसे असहमति देशद्रोह और राष्ट्रविरोधी कृत्य हो जाता है।
जबकि विद्वानों ने देशभक्ति और राष्ट्रवाद में भी अंतर किया है। अंग्रेजी लेखक जार्ज आरवेल ने देश-भक्ति और राष्ट्रवाद के बीच अंतर को 1945 के अपने मशहूर निबंध में प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है- देश- भक्ति यानी एक विशेष स्थान और जीवन में एक विशेष तरीके के प्रति समर्पण है, जिसे कोई भी सबसे अच्छा मानता है। लेकिन उसे अन्य लोगों पर जबरदस्ती थोपना नहीं चाहता। दूसरी ओर, राष्ट्रवाद को सत्ता की इच्छा से अलग नहीं किया जा सकता। हर राष्ट्रवादी ज्यादा सत्ता और ज्यादा प्रतिष्ठा चाहता है। शशि थरूर ने द बैटल आफ बिलोंगिंग किताब में तर्क दिया है कि भारत में नागरिक राष्ट्रवाद हैं, जिसकी जडें संविधान और इसकी स्वतंत्र लोकतांत्रिक संस्थाओं में हैं। भारतीय राष्ट्रवाद को उसकी राजनीतिक वैधता जातीयता, धर्म, भाषा, संस्कृति आदि से नहीं, बल्कि नागरिकों की सहमति व लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी सत्रि*य भागीदारी से मिलती है।
भारतीयता और राष्ट्रीयता को परिभाषित और व्याख्यायित करने के लिए कई बार अतीत और इतिहास का संदर्भ लिया जाता है। सिद्धान्त रूप में इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इस प्रसंग में कुछ प्रश्न उभरते हैं। क्या भारतीयता की अवधारणा स्थिर और अपरिवर्तनशील है? क्या अतीत में सब कुछ स्वर्णिम था और यदि ऐसा था तो क्या हम
स्त्रियाँ और दलितों को उससे आश्वस्त कर सकते हैं? क्या अतीत की दूसरी व्याख्याओं की अनदेखी की जा सकती है ? जैसे कि कहा जाता है, भारत की आत्म- छवि एक राष्ट्र की न होकर एक सभ्यता की रही है। और आखिर में यह कि क्या भारतीयता और राष्ट्रीयता को अतीत में देखने के साथ भविष्य की रोशनी में भी नहीं देखना चाहिए?
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है, हम भारत के लोग...। यही लोग संविधान में अपनी आस्था जताते हैं और इसे अपने पर आयत्त करते हैं। यही लोग लोकतांत्रिक संरचनाओं और प्रक्रियाओं के जरिए संवैधानिक प्रावधानों की क्रियान्विति को सुनिश्चित करते हैं। आजादी के बाद लोकतंत्र के विकास- क्रम में हमारी कोशिश रही है कि व्यवस्था की तमाम संरचनाओं और प्रक्रियाओं में भारत के सभी नागरिक समूहों को उचित प्रतिनिधित्व मिले, उनकी सक्रिय सहभागिता रहे और विभिन्न मंचों व अवसरों पर वे अपने को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सकें। इस अभिव्यक्ति का सबसे बडा मापदंड अपनी असहमति को दर्ज करा सकने की क्षमता है।
यदि हम साहित्य में भारतीयता और सांस्कृतिक बहुलवाद का सही प्रतिबिम्बन देखना चाहते हैं, तो हमें यह इसी फ्रेमवर्क के जरिए देखना होगा। साथ ही इसे एक तरफ हमें साहित्य के परिदृश्य में देखना चाहिए और दूसरे स्तर पर साहित्यिक कृतियाँ की अन्तर्वस्तु में इसकी उपस्थिति की छानबीन करने की जरूरत है। साहित्य के पब्लिक स्फियर में पत्र- पत्रिकाएँ, प्रकाशन, संस्थाएँ व संगठन, अकादमी और संस्थान तथा इनके द्वारा आयोजित गोष्ठियाँ, सम्मेलन, संवाद जैसी अनेक गतिविधियाँ आती हैं। चूँकि हमारी चर्चा हिन्दी साहित्य के समकाल पर केन्द्रित है, तो हम उसी का आकलन करें। उसमें जहाँ तक हिन्दी साहित्य की पहुँच और प्रसार है, वहाँ के सामाजिक- सांस्कृतिक स्तरों से रचनाकारों के प्रतिनिधित्व, सहभागिता और अभिव्यक्ति की क्या स्थिति है- यह इस संदर्भ में मूल प्रश्न है। कला और साहित्य की दुनिया में लोग अपनी इच्छा से आते हैं और उसके लिए भिन्न तरह की अभिप्रेरणाएँ काम करती हैं। तथापि इस क्षेत्र में समाज के विभिन्न हिस्सों की उपस्थिति उन हिस्सों की सृजनात्मक अभिव्यक्ति का भी पता देती है। देश के विराट हिन्दी क्षेत्र के मद्देनजर पहला तथ्य तो यही है कि आज भी आनुपातिक रूप से रचनाकारों की संख्या बहुत न्यून है। बल्कि हिन्दी में साहित्य का परास ही बहुत सीमित है। सबसे ज्यादा बिकने वाली हिन्दी पत्रिका इंडिया टुडे की प्रसार संख्या 80 लाख बतायी जाती है, जबकि यह कोई साहित्यिक पत्रिका नहीं है। हिन्दी अखबारों का प्रसार जरूर बढ रहा है लेकिन हिन्दी अखबार और समाचार चैनलों से हिन्दी साहित्य की हालत का पता नहीं चलता।
हिन्दी में सबसे ज्यादा पढी जाने वाली पत्रिकाएँ- हंस और कथादेश- लगातार अर्थ- संकट का सामना कर रही हैं। हालाँकि साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं की संख्या काफी है पर उनका कोई व्यावसायिक आधार नहीं है। उनका प्रकाशन लगभग एक स्वतः स्फूर्त परिघटना है, हालाँकि सृजन- अभिव्यक्ति में इनकी मूल्यवान भूमिका है। हिन्दी साहित्य के प्रकाशक सामान्यतः 11 सौ प्रतियों से अधिक का संस्करण नहीं छापते। साहित्य के प्रकाशक सरकारी अथवा किसी किस्म की थोक- खरीद पर निर्भर है। विस्तृत हिन्दी क्षेत्र में आपको साहित्य की कोई दूकान ढूँढने पर मुश्किल से मिलेगी, ऐसे में किसी शोरूम का तो खयाल ही छोड दीजिए। लेखकों की कोई डाइरेक्टरी मेरी जानकारी में अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है, न ही किसी ने उनका कोई सर्वेक्षण किया है। जिससे उनकी संख्या का कुछ अनुमान हो सके। इन्हे लेकर हिन्दी परिदृश्य में दो धारणाएँ प्रचलित हैं। पहली यह कि हिन्दी साहित्य का अधिकतर कारोबार विश्वविद्यालय- महाविद्यालयों के हिन्दी भाषा और साहित्य विभागों तक सीमित है। प्रायः वहीं से इसके लेखक आते हैं और वहीं से पाठक। दूसरी धारणा यह है कि हिन्दी साहित्य में लेखक ही पाठक हैं, वे अक्सर एक- दूसरे की किताबें पढते रहते हैं। जाहिर है, ये भी सिर्फ धारणाएँ मात्र हैं जिनका कोई प्रामाणिक आधार नहीं है। लेकिन अतिरंजना के बाबजूद ये वस्तुस्थिति और वास्तविकता की टोह लेने में एक हद तक मददगार हैं। वैसे साहित्य के समारोह- आयोजनों में लेखक भले दिख जाते हों, पाठक अदृश्य ही रहते हैं। बेशक पुस्तक मेलों में वे नजर आते हैं पर वहाँ सिर्फ साहित्य की किताबें बी नहीं होतीं। विद्यार्थी पाठकों की बात नहीं की जा रही क्योंकि उनका पढना अहर्ता का मामला है।
इस तरह हिन्दी साहित्य में प्रतिनिधित्व का सवाल और भी चुनौतीपूर्ण है। स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दी और साहित्य में आने वाले लोगों की प्रेरणाएँ अलग थीं। उसके बाद एक तरफ हिन्दी की एक भाषा के रूप में समर्थ निर्मिति सामने आयी, तो दूसरी ओर उसमें आधुनिकता के विभिन्न रूपाकारों और आशयों ने जगह लेनी शुरू की। तब भी वहाँ लेखक मध्य वर्ग के ही दो संस्तरों से ज्यादा आ रहे थे। प्रगतिशील लेखक संगठन और इप्टा के साथ हिन्दी सम्मेलनों के बाबजूद किसान- मजदूरों में से रचनाकार नहीं आए। तब की तरह अभी भी श्रमिकों में असंगठित क्षेत्र के लोगों की बहुतायत है जिनमें लेखक के रूप में कोई नाम याद नहीं आता। यहाँ तक कि महिलाओं की संख्या लंबे समय तक नगण्य जैसी रही। दिलचस्प तथ्य है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने जहाँ पुस्तकालयों को सूना किया और साहित्यिक किताबों की बची- खुची दुकानें भी बंद हो गयीं, वहीं उसके बाद साहित्य में नये विमर्श आए। इनके चलते महिला, दलित और आदिवासी रचनाकारों की कतारें हिन्दी साहित्य में सक्रिय हुईं और जल्दी ही उनकी आवाज सुनी जाने लगी। किन्तु यह एक विडम्बना है कि वैसी प्रतिक्रिया हमें अल्पसंख्यकों के मामले में नहीं दिखती। कुछ लोगों का अवलोकन है कि समकालीन साहित्य में मुस्लिम जीवन के वृत्तान्त कम हुए हैं, ईसाई और पारसी वगैरह के तो पहले ही कम थे।
तो इस तरह हम भारत के लोग की तर्ज पर हम हिन्दी के लोगों की साहित्य में अभी समुचित हिस्सेदारी नहीं है। हिन्दी के समकालीन परिदृश्य का इस लिहाज से कोई वस्तुपरक आकलन भी नहीं हुआ है। कोई ऐसा करे तो अनेक रिक्तियाँ और अन्तराल नजर आ सकते हैं। विश्वविद्यालय- अकादमियों के प्रशासन में भले ही दलित- आदिवासियों के लिए जगहें सुरक्षित हैं लेकिन अन्यत्र वे अपने प्रतिनिधित्व और सहभागिता को लेकर शिकायत करते पाये जाते हैं। साहित्य के निजी क्षेत्रों- प्रकाशन, पत्रिकाओं व अन्य उपक्रमों में तो ऐसी किसी सहभागिता के विचार ने ही प्रवेश नहीं किया है। स्त्रियाँ विभिन्न मंचों पर विभेद के मसले उठाती है। अंग्रेजी में काली की तरह का हिन्दी में महिलाओं द्वारा प्रबंधित कोई प्रकाशन नहीं है। हाशिये के अनेक समूहों को रचनात्मक अभिव्यक्ति के तंत्र में अपनी जगह पाने की प्रतीक्षा है।
साहित्य का समाज कोई आदर्श समाज नहीं है। वहाँ भी पृथक समूह, अपनी तरह की खेमेबंदी, संकीर्णताएँ और क्षुद्रताएँ है। जैसे अधिकांशतः लेखकों की रचनाओं में व्यक्त मूल्य- मान्यताओं तथा उनके निजी जीवन- व्यवहार के बीच अन्तर्विरोध मिलता है, वही साहित्य के पब्लिक स्फियर में तमाम संरचनाओं और प्रक्रियाओं में प्रतिबिम्बित होता है। यह भले ही दुख. पहुँचाने वाली वास्तविकता है लेकिन हिन्दी ही नहीं, कई भाषाओं के साहित्यिक परिदृश्य की कठोर परिघटना है। भारतीयता के उदात्त दर्शन और बहुलवादी मान्यताओं के अनुप्रयोग की संभावना और जरूरत यहाँ सबसे ज्यादा है क्योंकि रचनाकारों को अभी भी समाज काफी सम्मान से देखता है और वे देश के बुद्धिजीवी वर्ग का हिस्सा हैं।
हिन्दी साहित्य की कई दशकों और विविध विधाओं में फैली अन्तर्वस्तु का कोई समग्र आकलन तो लगभग असंभव है। उस पर कोई बात सामान्यीकरणों का खतरा उठाए बिना नहीं कही जा सकती। इस पर यही किया जा सकता है कि हम साहित्य के इतिहासों को ध्यान में रखकर कुछ विचार करें और यह देखें कि उसमें क्या नहीं है क्योंकि जो है, उसकी तो सामान्य जानकारी हम सभी को है। पहली बात तो यही कि हमारे साहित्य में भारतीयता की उदात्त छवियाँ ही उद्घाटित होती है। उसमें सहजीवन, सहिष्णुता और समावेशन के मूल्यों को अहमियत प्राप्त है। चूँकि यथार्थवाद इस दौर की मुख्य प्रवृत्ति रही है, तो वहाँ जीवन की वास्तविकता के विद्रूप चित्र और असंगतियों की आलोचनाएँ हैं। लेकिन कृतियों में व्यक्त अभीप्सा भारतीयता के आदर्श की ओर प्रयाण है।
हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक बहुलवाद को ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व जैसे मूल्यों को व्यापक स्वीकृति और समर्थन मिला है। सृजनात्मक क्षेत्र में लोगों की संख्या भले ही न्यूनतम रही हो, उन्होंने अधिकतम के लिए आवाज उठायी है। साहित्य में गैर- बराबरी, किसी भी तरह के भेद- भाव और वर्चस्व को कभी स्वीकृति नहीं मिली।
लोकतांत्रिक मूल्यों और पद्धतियों के लिए एक तरह की सर्वसम्मति रही है। ऐसा नहीं है कि सब रचनाकार एक ही रंग में रंगे हों, वहाँ सतरंगी, बल्कि बहुरंगी बहुलता है। यदि वैचारिक भिन्नता है, तो मत- मतान्तर होंगे। साहित्य में गंभीर और दीर्घकालिक विमर्श और बहसें रही है। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि ये बहसें स्वस्थ और सार्थक रही हैं और कभी भी कटुता और वैमनस्य को संवाद में कोई जगह नहीं दी गयी।
साहित्य को सत्ता का प्रतिपक्ष भी माना जाता है। हिन्दी साहित्य ने अपने उद्भव से ही यह भूमिका निभायी है और स्वातंत्र्य संघर्ष की अपनी विरासत से प्रेरणा लेते हुए सामान्य जन के पक्ष में सदैव आवाज उठायी है। हमारे साहित्य में जीवन की ही आलोचना नहीं रही, बल्कि शक्ति की हर संरचना को यहाँ प्रश्नों के घेरे में रखा गया है। सातवें दशक में लगाए गये आपातकाल का शायद ही किसी लेखक ने समर्थन किया, जिन्होंने किया भी उन्होंने बाद में इसके लिए खेद जताया अथवा किसी ओर तरह अपने पश्चाताप को व्यक्त किय। जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, पिछले दशकों में स्त्री, दलित और आदिवासी साहित्य विमर्श उभरे हैं और उन्होंने मुखरता से अपनी वंचना और हकों के सवालों को अपनी रचनाओं में ढाला है। किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इससे पहले दूसरे लोग उनके लिए बोलते रहे हैं और इससे उनके लिए जमीन तैयार हुई है। ठीक उसी तरह इन विमर्शों ने ट्रांसजेन्डर और निःशक्त जन जैसे दूसरे उपेक्षित रहे समूगों के लिए धरातल बनाया है। ऐसी अनसुनी आवाजों के लिए कला और साहित्य में जगह सदैव होनी चाहिए। ऐसी आवाजें अपने साथ अदेखे जीवन का समूचा अनुभव संसार लेकर आती हैं, जैसे ओमप्रकाश वाल्मीकि जूठन में और बेबी हालदार अपने आत्म-वृत्तान्त में लेकर आए। अभी भी अनेक अचीन्हे क्षेत्र हैं जो साहित्य- सृजन की परिधि से बाहर हैं, सृजन के बहुलवादी परिक्षेत्र के अनवरत् विस्तार और अन- अभिव्यक्त आवाजों का समावेशन एक सतत् प्रक्रिया है।
भारतीयता, राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक बहुलवाद के मसले मुख्यतः संस्कृति के परिक्षेत्र से प्रत्यक्ष और परोक्ष संबंध रखते हैं, राजनीति में ऐजेंडा के बतौर आते हैं और कई बार इन्हें प्रभावित करने वाली रीति- नीतियों का निर्धारण भी वहीःसे होता है। संस्कृति में मतारोपण और अनुकूलन जैसी प्रक्रियाएँ संचालित की जाती हैं। वहाँ पर- संस्कृति- ग्रहण और पुनरोत्थानवादी प्रवृत्तियाँ रहती हैं, अप- संस्कृति और उपभोक्ता- करण है। कुछ मिलाकर वैश्वीकरण और उत्तर- आधुनिकता से आरंभ हुए इस दौर में संस्कृति संक्रमण का मुख्य क्षेत्र, या कुछ के शब्दों में रणभूमि है। साहित्य स्वयं में एक सृजनात्मक संस्कृति- रूप है। ऐसे में साहित्य को सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण को भी अपने में समाहित करना होगा। आज के समय की जटिल चुनौतियों को समझने और रचनात्मक रूप में बरतने के लिए भी हमारे नजरिये में यह मूल्य- सम्वर्धन लगभग अनिवार्य है।

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