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विविधता - परंपरा में आधुनिकता में

पवन गुप्त
दुनिया एक भयंकर दौर से गुजर रही है। पिछले 220/250 वर्षों से जो पट्टी हमें पढाई गई है और जिन व्यवस्थाओं का निर्माण किया गया है वे मानव जाति को ही नष्ट करने की ताकत रखती हैं और अब यह साफ नजर भी आने लगा है। गाँधी इसे राक्षसी कहते थे। अब उसकी सच्चाई अलग अलग स्तर, जीवन के अलग अलग आयामों में साफ दिखाई देने लगी है। भारत की समस्या इससे भी अधिक विकट है। हमारा रोग एक पुराने रोग के साथ साथ इस आधुनिक रोग का अजीब मिश्रण है। इसे समझने की जरूरत है।
इसे कईं तरह से समझा जा सकता है। एक होलोग्राम की तरह, कहीं से भी एक सिरा पकड कर पूरी बीमारी समझी जा सकती है। और बीमारी को समझने की प्रक्रिया में ही उसका समाधान छुपा है। क्योंकि संपादकजी ने मुझे विविधता का सिरा पकडने को कहा, तो उसे ही पकड कर एक कोशिश की जा रही है।
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राग एक, अदायगी अनेक। पेड की प्रजाति एक, परंतु फिर भी उसी प्रजाति के दो पेड एक जैसे नहीं। सब अपनी अपनी छटा, अपनी विशिष्टता लिए हुए। पर मूल में एक, उसमें समानता। विविधता को परंपरा में, भारतीय दृष्टि में, संभवतः ऐसे ही देखा गया है। मूल में नियम बसे होते हैं, जो निराकार, अगोचर होते हैं, उनमें समानता होती है। जो दिखता है, जो करने और दिखने वाला पक्ष है उसमें विविधताएँ है, पर वह विविधता गहरे में किसी नियम (नैसर्गिक, शाश्वत अथवा परंपरा से/में बनाए गए) से बँधी रहती है, संयमित रहती है। यह धुरी, विविधता को खूबसूरती प्रदान करती है, उसे संयमित करती है। यह संयम-धुरी में एक, पर अदायगी में अलग, साधना है। साधना पडता है।
आधुनिकता को संयम स्वीकार नहीं। आधुनिकता संयम को बँधन मानती है और हर प्रकार के बँधन को अपनी स्वतन्त्रता में बाधा मानती है। परंपरा और आधुनिकता में यह एक बुनियादी भेद है। आज के आधुनिक मानव को कभी न कभी तय करना होगा कि जीवन के उत्कर्ष और श्रेष्ठता के लिए किन्ही मूलभूत नियमों को पहचान कर, संयमित हो कर, जीना है या हर प्रकार के बँधनों (नियमों) से मुक्त (अवहेलना कर के) हो कर जीने का प्रयास करना है।
संयम में रहते हुए ही मुक्त हुआ जा सकता है। यह सोच परंपरा में रही है। गहरे में, चिंतन करने पर इस निष्कर्ष पर हरेक पहुँच भी सकता है। संयमित होकर ही - भारत की सभ्यतागत दृष्टि में - स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है। संयम और स्वतन्त्रता एक दूसरे के विरोध में नहीं, वरन एक से हो कर, दूसरे तक पहुँचने का मार्ग है। एक तरफ गहरे में, मूलभूत नियमों की स्वीकार्यता और उससे अपने को संयमित करते हुए, करने और दिखने वाले, (इंद्रिय) सापेक्ष पक्षों में, प्रकटण में खुली छूट। इस दृष्टि में - स्वतंत्रता हमें प्राप्त होती है, जब हम उसके योग्य होते हैं, अपने को बनाते हैं, साधना के बल पर।
आधुनिकता के शब्दकोश में, संयम तो है ही नहीं। ऐसा मान लिया गया है कि संयम में बँधन है। और कोई भी बँधन आधुनिकता को स्वीकार्य नहीं। इस दृष्टि में स्वतंत्रता का अर्थ ही गायब है। इस दृष्टि में सिर्फ फ्रीडम है। फ्रीडम और स्वतन्त्रता एक दूसरे के पर्याय नहीं। फ्रीडम प्राप्त नहीं होता, उसे लगभग (किसी दूसरे से) छीन कर, माँग कर हासिल किया जाता है। कोई देता है और दूसरा लेता है। इसमें निहित है कि फ्रीडम लेने वाला एक तरफ और (फ्रीडम) देने वाला दूसरी तरफ। और निश्चित ही, देने वाला, लेने वाले से ज्यादा शक्तिशाली होगा, तो फ्रीडम में बराबरी ढूँढना अपने आप में विरोधाभास है, पर आधुनिकता इस प्रकार के गहरे विरोधाभासों को देखना नहीं चाहती।
वास्तविकता को दो पहलुओं में देखा समझा जाता है, ये एक-दूसरे से कुछ उसी तरह जुडे होते हैं, जैसे सिक्के के दो पहलू। एक पहलू अदृश्य, निराकार या इंद्रिय निरपेक्ष-होने वाला या है वाला-और दूसरा इंद्रिय सापेक्ष-करने और दिखने/दिखाने या लगने वाला पहलू। इसे स्थिति और गति का नाम भी दिया जा सकता है। हरेक वास्तविकता का अर्थ समझना पडता है, उसका अनुभव करना होता है। शिक्षा का यही उद्देश्य है। यहाँ वास्तविकता से सिर्फ भौतिक वास्तविकताओं से तात्पर्य नहीं है वरन उन वास्तविकताओं से भी है, जो निराकार और इंद्रिय निरपेक्ष होती हैं। उदाहरण के लिए सम्मान, विश्वास, करुणा, प्रेम, क्रोध, भय, लोभ, मोह इत्यादि का भाव या स्वतन्त्रता, स्वराज, जो अगोचर होते हुए भी, जिनकी वास्तविकता है। भले ही वास्तविकता का अर्थ समझा जाए या न जाए, उसे सही समझा जाए या गलत, उसका अनुभव हो या न हो, वास्ताविकता को उससे फर्क नहीं पडता। फर्क समझने/न समझने वाले को पडता है। वास्तविकता तो बस है। वास्तविकताओं का अर्थ, उसका अगोचर पहलू है। वास्तविकता है, अर्थ है, शब्द या नामकरण, किया जाता है - उसे बोला, लिखा, सुना और पढा जाता है। एक ही अर्थ के अलग अलग भाषा-बोलियों में अलग अलग शब्द होते हैं। एक ही भाषा में भी एक से अधिक शब्द हो सकते हैं। इस प्रकार अर्थ, भाषातीत होते हैं और शब्द, भाषा में होते हैं। अर्थ एक, और शब्दों की/में विविधता होती है। इस विविधता में सौंदर्य है। साथ ही अलग अलग (पर्यायवाची) शब्द, अर्थ की अनेकांगी विशेषताओं को उजागर करते हैं। उनकी अपनी विशेषता होती है। यहीं सौंदर्य है, भाषा का सौंदर्य। साथ ही शब्दों का इस्तेमाल जब सिर्फ दिखावे के लिए होने लगता है तो उसमें विकृति और भौंडापन आता है।
जीवन दृष्टि, सिद्धान्त, शाश्वत नियम, शाश्वत सत्य, इत्यादि भी, अर्थ जैसे ही, अगोचर होते हैं- स्थिति की कोटि में आते हैं। ये हैं और इन्हे समझना पडता है, अनुभव (करना) होता है। यह होने या है वाला संसार है। करने या/ और दिखने वाला संसार, प्रत्यक्ष/ व्यक्त संसार, इस है वाले संसार पर आधारित हो सकता है और भ्रम या असत्य पर भी हो सकता है। जैसे सम्मान के भाव (स्थिति) को, अनेक प्रकार से, समय और स्थान को ध्यान में रख कर, अभिव्यक्त किया (गति) जा सकता है। विविधता इसी करने और दिखने वाले संसार में होती है। जब यह करने वाला संसार सत्य (शाश्वत) की बुनियाद पर खडा होता है, तो गति (अभिव्यक्ति) में सहजता होती है, यह नैसर्गिक होता है, प्राकृतिक होता है। यही इसका सौंदर्य है। यह मनुष्य के अंदर उर्द्धगामी भावों को प्रोत्साहित करते हैं। स्थिति और गति में लय, सामंजस्य सहजता को जन्म देते है। यही असली और गहरी ईमानदारी (authenticity) है।
इसके विपरीत, असत्य या भ्रम पर आधारित दिखने/ करने वाला संसार अपने आप में भ्रम फैलाने और बढाने का काम ही कर सकता है इसलिए वैसी विविधता का कोई अर्थ नहीं, वह कृत्रिम, भ्रामक और बदसूरत होती है जो मनुष्य में ईर्ष्या, द्वेष, होड, इत्यादि विकारों को प्रोत्साहित करती हैं। जैसे सम्मान का प्रदर्शन (गति), सहज रूप से, सम्मान के भाव (स्थिति) से निकले जरूरी नहीं। सम्मान का (गति में) दिखावा भी हो सकता है जिसका उसके भाव से या स्थिति से कोई लेना देना नहीं। यह गति कृत्रिम, बे-मानी और धोखा देने वाली होती है। इसकी बुनियाद (सम्मान के) भाव से नियंत्रित नहीं। इस प्रदर्शन या गति में विविधता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यहाँ प्रदर्शन खोखला है, बगैर धुरी के। आधुनिकता में स्थिति की अनदेखी करते हुए इसी प्रकार की गति को प्रोत्साहित किया जा रहा है और उसे विविधता कहा जा रहा। इस विविधतता ने नयेपन की बीमारी को जन्म दिया है। यहाँ नये को मौलिकता मान लिया गया है। पर मौलिकता तो मूल (धुरी) से जुडे हुए बगैर हो ही नहीं सकती!
आज की आधुनिकता की बुनियाद शाश्वत सत्य पर नहीं खडी है। इतना ही नहीं आज की आधुनिकता में तो सत्य की शाश्वतता को ही नकार दिया गया है। सब का अपना अपना सत्य होता है को शाश्वत सत्य की तरह स्थापित कर दिया गया है। सब की अपनी-अपनी पसंद/ना-पसंद होती है, सबका अपना-अपना विचार होता है, सबकी अपनी अपनी कल्पना होती है। पर सत्य? वह कैसे अपना, व्यक्तिगत हो सकता है। अगर सत्य है, तो वह तो सार्वजनिन और सार्वकालिक ही होगा। पर आधुनिकता ने अपने प्रचार के बल पर एक असत्य को सत्य पर आरोपित कर दिया है।
इसे और खोला जाए तो आधुनिकता ने (पढे-लिखे) मनुष्य का समस्त ध्यान सिर्फ गति पर केन्द्रित कर दिया है। गति और स्थिति के बीच, स्थिति की प्राथमिकता को भूला दिया गया है। 1) स्थिति की समझ, उसकी वरीयता और 2) स्थिति का गति से सहज संबंध, इन दोनों सबसे महत्त्वपूर्ण बातों को, मुख्यतः (आधुनिक) शिक्षा के जरिये और फिर मीडिया और आधुनिक तंत्र के जरिये मनुष्य के ध्यान से लगभग ओझल कर दिया है। पर फिर भी स्थिति की वास्तविकता तो है ही। उस पर से ध्यान हटा दिया गया है, परंतु वे लुप्त नहीं हो गई हैं। मनुष्य में भाव तो उत्पन्न होते ही हैं, होते भी रहेंगे, बावजूद artificial intelligence और robots के। गति का सहज संबंध जो स्थिति से होना चाहिए; गति, स्थिति से सहज निकले पर प्राथमिकता स्थिति की होनी चाहिए-वहाँ गडबड कर दी गई है/हो गई है। निर्णय करने का निर्णायक बिन्दु स्थिति से हट कर गति पर केन्द्रित हो गया है। सम्मान, विश्वास, कृतज्ञता, प्रेम, इत्यादि जो मनुष्य की मूलभूत चाहना में हैं, उनको प्राप्त करने के लिए उन्हे गति में - करने में, दिखने/दिखाने में ढूँढा जाने लगा है। यह प्रवृत्ति एक तरफ व्यक्तिवाद, होड, प्रतिस्पर्धा और द्वेष को प्रोत्साहित करती है और दूसरी तरफ हर तरह के बाजार को दृ सिर्फ भौतिक वस्तुओं का बाजार ही नहीं, शिक्षा का बाजार, मीडिया का बाजार और सबसे बढ कर विचारों का बाजार - प्रोत्साहित करती है।
तथ्य (fact) और सत्य, जो सनातन होता है, में भेद है। तथ्य सामयिक होता है और स्थान विशेष का होता है, परंतु आधुनिकता ने इस महत्त्वपूर्ण भेद को धूमिल कर दिया है। बल्कि तथ्य ही, सत्य पर आरोपित हो गया है। उसी तरह जानकारी या सूचना (information), ज्ञान पर आरोपित हो गई है। इसका सबसे जबरदस्त और मजेदार उदाहरण general knowledge या सामान्य ज्ञान की किताबें हैं। इनमे पहले पन्ने से लेकर आखिर के पन्ने तक जानकारी ही जानकारी रहती है, पर कहा जाता है- सामान्य ज्ञान! इस तरह के प्रकरण और प्रक्रियाओं की भरमार है, जिन्हे गंभीरता से देखने समझने की जरूरत है। इसमे जानकारी, जो एक ऐसी चीज है जिसे याद रखना होता है, जो सामयिक है उसे ज्ञान, जो एक बार हो जाए तो अपना हो जाता है और जिसे याद रखने की जरूरत नहीं रहती, पर हावी कर दिया गया है। यहाँ तक कहा जाने लगा है कि जानकारी ही ज्ञान है। यह हास्यास्पद तो है, पर अत्यंत खतरनाक भी है।
खतरनाक इसलिए है कि इसने आधुनिक मानव की सोचने-समझने की क्षमता को ही कुन्द कर दिया है। एक तरफ उसे अपने पढे-लिखे और तर्कसंगत ढंग (rationally) से सोचने के भयंकर अहंकार से भर दिया गया है और दूसरी तरफ उसे स्वयं की गहरे में बनी हुई मान्यताओं का पता ही नहीं है। वह मान कर चल रहा है पर इस भुलावे में रहता है कि वह जानता है। वह इस भुलावे में है कि वह स्वतंत्र रूप से सोच सकता है, परंतु असलियत इससे बिलकुल भिन्न है। वह उतना ही सोच पाता है जितना आधुनिकता उसे सोचने को बाध्य करती है। कम्प्यूटर और मशीनों को चला लेना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह स्वतंत्र रूप से सोच सकता है। जो लोग आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से मुक्त हैं उन्हे कम से कम जानने और मानने का भेद स्पष्ट प्रायः होता है, पर आधुनिकता के प्रभाव में जी रहे अधिकांश लोग मानते हुए भी इस भ्रम में रहते हैं कि वे जान रहे हैं। और उनका अहंकार, एक कवच की तरह, इस भेद को स्पष्ट भी नहीं होने देता।
आधुनिक मानव लगभग पूरी तरह आधुनिकता की गिरफ्त में है। वह बुरी तरह परतंत्र है। भौतिक वस्तुओं और जीवन के प्रत्येक आयाम (शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि) में तो है ही, परंतु अपने सोचने-समझने में भी वह स्वतंत्र नहीं रह गया है। वह अपने को विचारशील मानता है, पर असलियत यह है कि उसके विचारों की गहराई उतनी ही है जितनी उसके कपडों की। दोनों ही सामयिक फैशन से प्रभावित होते रहते हैं। उनमें मौलिकता प्रायः नहीं है।
यह सब तो वैश्विक स्तर पर हो रहा है परंतु हम भारतियों की हालत और भी नाजुक है। वह इसलिए कि भारतीय रोग का संबंध सिर्फ आधुनिकता से ही नहीं। हमने तो पहले इस्लाम के राज्य में भयंकर हिंसा, आतंक और भय को झेला और फिर अंग्रेजों के युग में इन सब के साथ साथ आत्म-संकोच, अपने प्रति शर्मिंदगी और हीनता के भाव को भी झेलना पडा। ये घाव गहरे हैं, पुराने हैं। आज का मनोविज्ञान भी इस तरह के सामूहिक घावों का असर 7 से 12 पीढियों तक मानता है। तो एक तरफ आधुनिकता की मार और दूसरी तरफ पुराने रिसते हुए, पर किसी तरह मरहम-पट्टी करके छुपा कर रखे हुए गहरे घाव, इन दोनों से हमारा समाज ग्रसित है। इसका इलाज इन दोनों बीमारियों को समझे बिना संभव नहीं। पुराने घावों को ईमानदारी से देख और समझने भर की देर है। घावों को छुपा कर उनका इलाज नहीं किया जा सकता। उन्हे हिम्मत से देख कर खुली हवा और धूप ही उनका इलाज है। और आधुनिकता का इलाज उसके मोहजाल और माया जाल को उजागर करके उससे मुक्त होने में है। भ्रम मुक्ति और मोह भंग। उसके बाद भारत की पैठ में वह शक्ति अभी भी है कि वह अपनी जडों पर अपनी आधुनिकता को प्रस्फुटित कर देगा।

सम्पर्क - सिद्ध, हेजलवुड,
लन्धौर, कैंट, मसूरी-२४८१७९
मो. 9760049414
pawansidh@gmail?com