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‘‘शुरू ही में बहुत देर हो चुकी थी’’

तेजी ग्रोवर
- अब मैं अपनी माँ को भूल चुकी हूँ। अब मैं उसके
बारे में लिख सकती हूँ।
- शुरू ही में बहुत देर हो चुकी थी। जब मैं अठारह की
हुई तभी बहुत देर हो चुकी थी।
- दुनिया को भाड में चले जाने दो। यही सबसे अच्छी
युक्ति है।
- लेखन का अर्थ है बात न करना। चुप रहना। आवाज़
के बिना चिल्लाना।
- यहाँ त्रूवील ही में मैं समुद्र को तब तक घूरती रहा
करती थी, जब तक कुछ भी शेष नहीं बचता।
- मैं हमेशा तुम्हारी समझ के अभाव से मुखातिब होती
हूँ। ऐसा नहीं होता, तो सोचो, इस सबका क्या अर्थ
होता भला?
फ्रेंच लेखक मार्ग्रीत ड्यूरास के इन वाक्यों को तब तक देखते रहने की जरूरत है जब तक ये हाथ खींचकर हमें ऐसी जगह नहीं ले जाते, जहाँ हम इनके अर्थों को ग्रहण कर पाएँ। हो सकता है वह जगह हमें जीवन के अन्त तक न मिले, हो सकता है हम बहुत पहले ही से वहाँ खडे हुए हों। मुझे याद है कि अपनी उम्र के पैंतीसवें वर्ष में किताबों को पढने के बारे में एक मामूली-सी बात मुझे समझ में आयी। इस बात को मैं धीरे-धीरे साझा करूँगी। एक दिन केश धोकर अपने लम्बे बालों को धूप में सुखाते समय मैंने अपने एक अज़ीज़ का दिया हुआ मार्ग्रीत ड्यूरास का उपन्यास द लवर (प्रेमी) पढना शुरू किया। पहले ही पन्ने के अन्त तक आते-आते मेरे दिल की धडकन इतनी तेज़ हो चुकी थी कि पन्ना पलटने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। अब सोचने पर याद आता है कि मुझे सोलह या सत्रह की उम्र में रूसी उपन्यासकार दोस्तोएव्स्की के उपन्यास क्राइम एंड पनिशमेंट (अपराध और दण्ड) को पहली बार छूने पर भी कुछ-कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था। यह बात मुझे उसी नाजुक उम्र में समझ में आ गयी थी कि दोस्तोएव्स्की मेरे जीवन और मेरे अन्तस को गढना, तराशना और मथना शुरू कर चुके हैं....कि मैं उन्हें कभी रोक नहीं पाऊँगी, और न ही उनका लेखन मेरे लिए शेल्फ में धरी हुई किताब भर होगा। वह वही जीवन होगा जो मुझे हर दिन और बार-बार जन्म देगा ताकि सबसे पहले मैं स्वयं को आजीवन पढती रह सकूँ।
लेकिन जो मैं आज पढ रही हूँ, ज़रूरी नहीं कि आज ही के दिन ही उसे ग्रहण कर सकूँ। दोस्तोएव्स्की के उपन्यास द ब्रदर्स कारामाजोव में एक पात्र है फादर ज़ोसिमा। वे अपना एक प्रवचन इस प्रश्न से शुरू करते हैं- नरक क्या है?। फिर उसका जवाब भी वही देते हैं- मेरा मानना है कि वह प्रेम न कर पाने की यातना है। उस वक्त मेरा प्रिय किरदार नेकदिल अल्योशा उस प्रवचन को सुन रहा था। इस बात को वह भी शायद वैसे ही ज*ब नहीं कर पाया होगा जैसे मैं उसे ग्रहण नहीं कर पा रही थी। प्रेम न कर पाने की यातना? मैं इस वाक्य से कुछ घबरा-सी गयी थी। प्रेम न कर पाने की यातना की कल्पना करना मेरे लिए नामुमकिन था। इस नासमझी का कोई सम्बन्ध मेरी उम्र से रहा हो, मैं नहीं जानती। लेकिन अठारह की उम्र में अब्बू की मृत्यु के एक वर्ष बाद मैं इस किताब को पहली बार उनके एक शेल्फ से उठा रही थी। इस किताब को वे इतनी बार पढ चुके थे कि उसे उठाते ही मैं समझ गयी कि उनका इस किताब से क्या सम्बन्ध रहा होगा। फादर ज़ोसिमा की उपरोक्त पंक्तियों के नीचे अब्बू के हाथ से खींची लकीर थी। उन्होंने जहाँ-जहाँ पंक्तियों को रेखांकित किया था वहाँ मुझे अब्बू की धडकन बेहतर सुनने लगती। वे कई बार मुझे इस उपन्यास के प्रसंग सुना चुके थे। शायद वे उम्मीद कर रहे थे मैं भी इसे पढने लगूँगी। अब्बू की प्यारी-सी छब की रोशनी ही में मैंने इस उपन्यास को पढना शुरू किया। मेरा जीवन की निर्मिति भी ऐसे ही शुरू हुई होगी क्योंकि इस उपन्यास को अब्बू के जीवन-मरण से अलगाया नहीं जा सकता था।
उनकी मृत्यु मेरे जीवन की बीज घटना थी। और वे इस उपन्यास में हमेशा मुझे जीवित मिल जाया करते थे। कभी नेकदिल अल्योशा कारामाजोव की आँखों में, कभी उन्मादी दमित्री कारामाज़ोव की बीहड मनस्थितियों में जिसके सर पर पितृ-वध का झूठा इलजाम लगा है। जमींदार पिता (फ्योडोर कारामाजोव) का असली हत्यारा (स्मिरद्याकोव) जोकि सौतेला बेटा है वह भाई इवान कारामाजोव को हकीकत बताने के बाद आत्महत्या कर लेता है। उसके मरने के बाद किसी के पास कोई सबूत नहीं कि हत्यारा स्मिरद्याकोव है। और चूँकि दमित्री कारामाजोव और उसके पिता दोनों बला की दिलकश और जिन्दादिल ग्रुशेंका से प्रेम करते हैं, सन्देह दमित्री पर ही किया जाता है। बाकी सभी सुराग भी दमित्री की और संकेत करते हैं। दमित्री को दिलो-जान से चाहने वाली नेकदिल केटरीना भी अदालत में दमित्री के खिलाफ एक और सबूत पेश कर देती है- दमित्री द्वारा उसे लिखा गया एक पत्र जिसमे वह अपने पिता को जान से मार डालने की बात कर रहा है। स्मिरद्याकोव का बिना हत्या का राज खोले अपनी जान ले लेने की घटना दोस्तोएव्स्की के रचे संसार में एक अद्भुत स्थान रखती है।
जैसे उपन्यास में बडों की बेहद जटिल, सरल, कुटिल, निर्मल, मलिन और निश्छल दुनिया है, उसी तरह बच्चों की भी। नौ वर्ष का इल्युशा जो तपेदिक का मरीज है वह अपने कुत्ते को ब्रेड का टुकडा खिलाने से पहले उस में एक पिन छिपा देता है। उसका दोस्त कोल्या घायल कुत्ते की सेवा में कोई कसर नहीं छोडता और उसे ठीक कर इल्युशा को लौटा देता है। इल्युशा के पिता को एक बार दमित्री ने पीट दिया था। इल्युशा पर इस घटना का ऐसा मारक असर है कि वह उसके भाई अल्योशा से बदला लेने उसे पत्थर से मारता है और उसकी हाथ की उंगली काट खाता है। दोस्तोएव्स्की ने अपने इस उपन्यास को अपने तीन वर्षीय बेटे अल्योशा की मृत्यु के बाद लिखना शुरू किया था। बच्चों की यातना को लेकर इस उपन्यास में अविस्मरणीय प्रसंग और तात्त्विक चिन्तन है लेकिन उपन्यास की लय अक्षत बनी रहती है। दमित्री अपने पिता की हत्या सम्बन्धी निर्मम पूछताछ के दौरान थक-टूट कर सो जाता है। फिर स्वप्न में क्षीणकायी किसान औरतों के हुजूम को सडक के किनारे खडे देखता है। एक मरियल-सी माँ से चिपका भूखा बच्चा जार जार रो रहा है। उसकी माँ के स्तन सूख चुके हैं और पीछे के मंज़र में एक जला हुआ गाँव और झोंपडियों के काले पड चुके शहतीर तने हुए हैं। दमित्री के सपनाते देहात्म में बेहद विचलन पैदा होता है। भाव-विह्वल दमित्री उन ग्रामीणों की मुफ्लिसी को लेकर हृदय विदारक प्रश्नों की झडी लगाता हुआ पाता है* कि मन में उमडी करुणा के सागर में उसकी प्रिय ग्रुशेंका भी उसके साथ है। दमित्री करुणा और प्रेम के असह्य उजास में आँखें खोलता है और पाता है कि इस बीच उसके सर के नीचे किसी ने तकिया रख दिया है। वह इस बात से अभिभूत और अपने स्वप्न के आलोक में इतना द्रवित हो उठता है कि बिना पढे कानूनी कागजों पर दस्तखत कर बैठता है। हालाँकि उसने अपने पिता की हत्या नहीं की, इस स्वप्न से उठकर वह इस हत्या की नैतिक जिम्मेदारी और सजा भुगतने को तैयार है।
फिर किसी अन्य प्रसंग में दमित्री का विचलित भाई इवान उससे एक प्रश्न पूछता हैः अगर तुम ऐसी दुनिया की सृष्टि करने की छूट हो जिसमें सब मनुष्य सुखी हैं, लेकिन एक ऐसे बच्चे की कीमत पर जिसे भयानक यातना दी जा रही है तो तुम क्या करोगे? मेरी समझ में शायद ही कोई और ऐसा लेखक होगा जो ऐसे प्रश्न पूछते और उन्हें औपन्यासिक शर्तों की बारीक धार पर निभाते हुए लिखने लगा हो। सत्य के प्रति दोस्तोएव्स्की का ऐसा तपस्वी आग्रह ही द ब्रदरर्ज कारामाजोव को सम्भवतः ऐसी कृति बनाता है जिसने इस पृथ्वी पर असंख्य पाठकों की आत्मा की निर्मिति की होगी। दोस्तोएव्स्की मानवीय चरित्र और अन्तस के सम्पूर्ण सत्य की खोज में मुब्तिला लेखक हैं। वे सत्य की दहलीज पर ठिठके हुए कलाकार नहीं हैं। सत्य की खोज के लिए उन्होंने सन्ताप (तप की अग्नि) का वरण किया होगा। उनकी युवा पत्नी लिखती हैं कि उन्होंने अपने विवाहित जीवन में दोस्तोएव्स्की को एक बार भी मुस्कराते हुए नहीं देखा!
इस उपन्यास को पहली बार पढने के तेरह वर्ष बाद जब मैं अपनी परिचित जगहों और चेहरों को छोडकर एक अजनबी प्रदेश में चली आयी, मुझे धीरे-धीरे फादर जोसिमा के पूछे गए प्रश्न और उसके उत्तर ने घेरना शुरू किया। मैं शायद प्रेम न कर पाने की यातना को अनुभव करने के कगार पर पहुँच चुकी थी। और तब फिर इस उपन्यास को खोलकर इसमें प्रविष्ट हो जाने के सिवा कोई चारा न था। इन तेरह वर्षों के दौरान भी में मैंने कम से कम आठ या दस बार द ब्रदरर्ज कारामाजोव की पनाह ली होगी। लेकिन दोस्तोएव्स्की को पढते समय शायद मुझे पहली बार अपनी आत्मा के वुजूद में आने का एहसास हुआ, ऐसा मुझे अब लगता है। मैंने बचपन ही से आत्मा के बारे में सुन रखा था। लेकिन उसकी प्रतीति मुझे तभी हुई होगी जब मैंने सोन्या, नास्तास्या, रास्कोलनिकोव और दमित्री कारामाजोव जैसे किरदारों के साथ मन ही मन गहरे प्रेम का सम्बन्ध बनाया होगा। अपने आसपास के लोगों और अजनबियों में मुझे ये किरदार झिलमिलाते हुए दिख जाते थे। अजीब बात यह थी कि मैंने दोस्तोएव्स्की के उन्नीसवीं सदी के रूस में एक घोंसला बना लिया जिसके लिए मुझे अपने जीवन से तिनके बीन-बीनकर लाते रहना था। यह उन्नीसवीं सदी के रूस में घर बना लेने का ही सदका था कि मैं अपने जीवन को बडी शिद्दत से महसूस करने लगी थी।
*
उस दोपहर मार्ग्रीत ड्यूरास के लिखे द लवर को पहली बार पढते हुए जो मामूली-सी बात मुझे समझ में आयी वह यह थी- वे लेखक जिन्हें हमें आजीवन पढते रहना होता है, और जिनकी किताबें सम्भवतः हमारी मृत्यु-शैया के पास भी धरी होंगी, वे हमारे भीतर पहले से ही मौजूद होते हैं। जब तक किसी संयोग से उनकी किताबें हमें नसीब नहीं हो जातीं, हम एक ऐसी बेचैनी और शून्यता महसूस करते रहते हैं जो दुनिया की किसी भी शै से पूरी नहीं जा सकतीं। यही वह मामूली-सी बात है जो उस दोपहर मुझे पहली बार समझ में आयी। और यह भी कि कोई ऐसा रोमांच नहीं, कठिन से कठिन कोई प्रेम, किसी बीहड जंगल में दहशत-भरी अपनी देह के कम्पन का कोई ऐसा अनुभव नहीं जिसमें उन किताबों का उजास या उजास भरा अन्धकार पसरा न हुआ हो।
इस तन्वंगी उपन्यास द लवर को मैंने कितनी बार छुआ होगा, मुझे याद नहीं। लेकिन हर बार वह किताब शब्दों में नहीं, पंक्तियों के बीच की खाली जगहों में लिखी हुई महसूस होती। उन खाली जगहों को पढने के लिए खिडकी से बाहर देखने की जरूरत होती। कभी मधु-मालती की लताओं के पीछे से झाँकती हुई एक खाली-सी नदी, और कभी गुलमोहर, कभी पलाश तो कभी यमद्रुम सेमल के दहकते हुए फूल। उन्हीं के बीच में कभी खिडकी के दृश्य में घुलती हुई किसी गरीब फ्रांसीसी परिवार में साइगॉन में पैदा हुई एक लडकी जो एक रईस चीनी लडके से प्रेम सम्बन्ध बनाकर अपने परिवार के लिए उससे पैसा और सुविधाएँ बटोरती है। अपने देश से दूर फ्रांस के उपनिवेश विएतनाम (उस वकत इंडो-चाइना) में हिंसा, प्रेम, घृणा और गरीबी को शिद्दत से जीते इस परिवार की कोई कहानी नहीं है। परिवार गरीब है, और भोजन की जगह कचरा खाने को मजबूर है। लेकिन वह कचरा उन्हें बडे सलीके से परोसा जाता है। मार्ग्रीत ड्यूरास कोई कहानीकार नहीं हैं। वे सलीके से परोसना जानती हैं। बस वे एक बीज घटना से भावजगत में ऐसी हिलोरें छेड देती हैं कि आप उनके लेखन में शामिल होकर खाली जगहों में खुद लिखने लग जाते हैं। जब आप किसी किताब को पढते समय प्रवाह को रोके बिना खिडकी से बाहर देखने लगते हैं, तब उस समय क्या आप खुद भी लिख रहे होते हैं? तभी शायद मार्ग्रीत ड्यूरास कहा करती थी, मैं अपनी मृत्यु में भी लिखती रहूँगी। वे अनकहे और अकथ की साधक हैं, और निश्चित ही वे अपनी मृत्यु में भी लिखने में सक्षम होंगी। दरअसल वे एक बीज घटना से एक कृति नहीं अनेक कृतियाँ रचती हैं। इस उपन्यास के बहुत वर्ष बाद जब उन्हें पता चला कि उनके युवा दिनों का प्रेमी मर चुका है, तो उन्होंने एक और उपन्यास लिखा। बीज घटना वही थी- वह अनाडी, अल्हड और युवा प्रेम। लेकिन अब कुछ और किरदार, कुछ और घटनाएँ प्रकाश में आ रही थीं- छोटे भाई के प्रति बडे भाई की असह्य हिंसा। हिंसा के पक्ष में खडी हुई माँ। वे सम्भावनाएँ जो एक कलाकृति के भीतर छिपी रहती हैं, उनसे एक और किताब वे लिख रही थीं। चीनी प्रेमी की मृत्यु ने उन्हें फिर साइगॉन में जिये हुए अपने कमसिन दिनों के अन्धड में ला खडा किया था। द लवर में लडकी कभी मैं है, कभी वह। मुझे बीसियों बार उपन्यास को पढकर ऐसा महसूस हुआ कि मैं को वह में रूपान्तरित करने की यह युक्ति साक्षी भाव को जाग्रत करने की युक्ति भी होगी। इसमें स्वयं के साथ अन्य की पीडा की अनुभूति की लय भी आपको बाँध लेती है। मैं मैं भी हूँ और वह भी। या फिर यह भी कि मैं से जब पीडा सही नहीं जा रही, तो वह वह में बदल जाती है।
मार्ग्रीत ड्यूरास कहानी का दावा पेश नहीं करतीं। उनकी अपनी एक पगडण्डी रास्ता है जिसे वे उल्लास-भरे अवसाद का नाम देती हैं। तब तक समुद्र को देखती हुईं, जब तक कुछ भी शेष नहीं बचता।
सम्पर्क : एफ-88, फ्लेमिंगो इकोसिटी,
बावडियाकलां, भोपाल-४६२०३९

** वे रो क्यों रहे हैं? रफ्तार से पास से गुजरते समय मित्या ने पूछा। बच्चा रो रहा है, चालक ने कहा। पर क्यों रो रहा है? मित्या ने बेवकूफी से पूछा। उसकी नन्ही बाँहें नंगी क्यों हैं? वे उन्हें लपेटते क्यों नहीं? बच्चा ठण्ड से ठिठुर रहा है; उसके कपडे जम चुके हैं और उसे गरमाहट नहीं दे रहे, चालक ने जवाब दिया। पर ऐसा क्यों? क्यों भला? मित्या पूछता ही गया। इसलिए क्योंकि वे गरीब हैं, उनके घर जलाये जा चुके हैं। उनके पास खाने को रोटी नहीं है। वे भीख माँग रहे हैं, क्योंकि उनके घर जलाये जा चुके हैं।
नहीं, नहीं, मित्या कुछ यों बोला मानो वह समझ ही नहीं रहा हो। लोग गरीब क्यों हैं? बच्चा गरीब क्यों है? घास का यह मैदानी इलाका इतना बंजर क्यों है? वे एक-दूजे को गले क्यों नहीं लगाते? वे खुशी के गीत क्यों नहीं गाते? वे सब दुख से स्याह क्यों लग रहे हैं? वे बच्चे को कुछ खिलाते क्यों नहीं? उसे महसूस हुआ कि हालाँकि उसके सवाल बेतुके और बेमानी थे, उसे वे ही पूछने थे और ठीक इसी तरह ही पूछने थे। उसके दिल में रहम का ऐसा भाव उमडा जैसा उसने पहले कभी जाना ही न था। उसे लगा कि वह रोना चाहता है? कि वह सबके लिए कुछ करना चाहता है ताकि बच्चा और न बिलखे, ताकि बच्चे के भूरे चेहरे वाली सूखी-सिकुडी माँ न रोये, ताकि उस पल के बाद कोई एक भी बूँद आँसू न टपकाए। और यह वह तुरंत करना चाहता था, तमाम बाधाओं के बावजूद, कारमाजोवों की समूची लापरवाही के साथ।
*** यह वर्ष अप्रतिम लेखक दोस्तोएव्सकी का जन्मशती वर्ष है, ऊपर का अंश द ब्रदर्स करमाजोव से है।