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आभे में पसरा दुःख

माधव राठौड
पूरब का आसमान लाल हो रखा था। उसने बाहर निकल देखा गुमने जाट की ढाणी से अलसाया सूरज निकलने की अभी तैयारी कर रहा है। उसे आज जल्दी निकलना होगा। रेगिस्तान में गर्मियों में दिन जल्द तपने लगते हैं। शहर से उसे पाँच चक्कर करने होते हैं, पर आज दस नहीं तो कम से कम आठ चक्कर तो करने ही होंगे। एक तो वैशाख की गर्मी और ऊपर से शादियों का मौसम। हर घर में मीठे पानी की माँग रहती है।
मुडकर देखा तो 3 साल की बेटी बाहर आँगन में भोर की नींद में मुळक रही है। शायद कोई सपना देख रही होगी। इस रेगिस्तान में सिर्फ सपनें देखने की ही आजादी है।
पत्नी बकरियों के बाडे से दूध दुह कर ला रही है। सुबह की चमक से उसके चेहरे पर ताजगी। देर रात घर को लौटेगा तो यही चेहरा जून की आँधियों और लू से झुलस जाएगा।
माँ गाय को चारा डाल रही है। माँ के चेहरे पर झुर्रियाँ हैं। दुःखों की निशानी। माँ को कभी उसने खलखल हँसते हुए नहीं देखा। कहने को तो 71 में वे पाकिस्तान के डाहली गाँव से हिंदुस्तान आ गए थे, पर माँ आज भी वही अटकी हुई है। हर बात पर डाहली में यह, डाहली में वो। सिंध की अपणायत।
शायद पिता के जाने के बाद माँ की स्मृति में गाँव की याद घनी हो गई।
पिता की याद से उसके सामने वो चेहरा याद आया - सिर पर खाकी साफा, सफेद झक्क मूँछे और सफेद दाँत। पिता ने जीवन भर दुःख ही देखा। 71 से पहले पिता ने अपने पिता को धर्मांध झडप में खोया। फिर कुटुम्ब के लोगों ने शादी करवाई तो घर में कुछ खुशियाँ आई। पर यह सुख मंजूर नहीं था। 71 में युद्ध छिड गया। पाकिस्तान में बचे उसके कुटुम्ब भी भारत लौटने लगे - अपने भरे पूरे घर, खेत-खलिहान, गायों-ऊँटों का टोला छोड।
सबसे बडा दुख अपनी मातभौम को छोडना। उन खिडकियों और दरवाजों के घर को छोडना जिनको खोलने से खुलता था उनके संसार का आकाश। वो गुवाडी छोडना जिसमें बिछे खाटों पर सोते हुए दादी सुनाती थी मूमल-मेहन्द्रा और ससि-पन्नू की कहानियाँ, जिसे सुनने उतर आते थे चाँद-तारें उस आसमाँ से।
दो दिन बाद आखातीज है। थार के लोगों के लिए होली दीवाली से भी ज्यादा हरख और उच्छब का त्योहार होता था आखातीज। पिता आखातीज को सुगन देखते थे। वे आखातीज से ठीक चार दिन पहले ही सवेरे उठ खेत में चल देते थे। सुगन चिडिया का इंतजार करते । जितने कदम दूर से वह बोलती उतने कदम गिन बारिश का हिसाब लगाते कि इस बरस बारिश कैसी रहेगी, किस फसल में कितनी तेजी रहेगी ।
आखातीज के अबूझ सावों में गाँव में धूम रहती है। शादियों में मीठे पानी का जिम्मा उसका ही होता है। आखातीज में खाने को गुड की बनी गुलवानी और बाजरे का खीच मिलता है, लेकिन पिछले दस बरसों में गाँव खाली हो गए, त्योहार सूने हो गए। अधिकांश बाहर कमाने वाला युवा अब वार-त्योहार गाँव नहीं लौटता । गाँव की चौपाल, हथाई को टीवी और मोबाइल ने खा लिया। वह भी पिता की तरह गम्भीर होकर सोचता इस तरह तो गाँव खाली हो जाएँगे।
वह ट्रैक्टर स्टार्ट करता है। पत्नी चाय बनाकर लाती है। वह गाँव में शहर से मीठे पानी की टंकी भरकर लाता है। वैसे गाँव में खारे पानी का तला है। पानी इतना खारा कि चाय फट जाती है, बालों में साबुन लगाओ, तो बाल चिपक जाते हैं।
पिता कहते थे इसे राजा सगर के बेटो ने अपने पिता को रोज नए कुएँ का जल पिलाने के नियम की कडी में बनाया था। 1992 से पहले यहाँ चडस और रहट से पानी निकालते थे। इसका पानी आसपास के गाँवों के लोग पशुओं को पिलाने और बर्तन-बासण धोने के लिए काम में लिया जाता है। इस तले के नाम पर कागजों में गाँव का नाम रख दिया - खारिया तला।
पिता यह भी बताते थे कि 71 के युद्ध में सबसे पहले वे मेंणाऊ आए थे,उसके बाद इस गाँव में। 65 के समय उस गाँव में कुछ परिवार पहले आ गए थे, इसलिए ज्यादातर घरों पर पहले सी ही कब्जा हो गया था, जबकि यह गाँव मुजाहिदों का था,। रातोंरात पूरा का पूरा गाँव खाली हो गया। नाम चले गए, जात चली गई, धर्म चले गए पर घर जैसे थे वैसे ही छोड गए- दरवाजे, खिडकियाँ, बिस्तर,सोने के लिए बडी बडी लकडी की खाटें, गायों-ऊँटो के चारे के ठाण, बाजरी रखने के कोठिये तो घी-दूध रखने के कोठे भी। इस तरफ के मुसलमान उस देश में गए तो उन्हें मुजाहिद कह कर हिंदुओं के खाली घर दिये, उस तरफ के हिन्दुओं को शरणार्थी कह कर ये घर। पर घर कभी हिंदुस्तान पाकिस्तान नहीं हुए । जिस शरणार्थी को जो घर पसन्द आया वो उसका हुआ।
पिता के मित्र थे, वे थरपारकर में पटवारी हुआ करते थे। उन्होंने घर के अलावा आते ही सबसे अच्छी जमीन भी दबाई। पिता को भी यह जमीन दिलाई थी, जिसे बाद में सरकार ने अलॉट कर दी, तो ढाणी बनाई।
उसका जन्म पिता के हिंदुस्तान आने के कई सालों बाद हुआ था। पिता बताते थे उस साल सिखों को खूब मारा गया था। पूरे देश में भय का माहौल था।
उसने बारहवीं तक पढाई की। कॉलेज में एडमिशन लिया पर पिता चल बसे। पढाई बीच में छूट गई। उसने घर सँभाल लिया। कहने को तो बारिश में ही खेती होती थी। बाकी बचे साल में वह भेड-बकरियों को चराता । साल में दो बार बकरों और भेडों को बेचता तो अच्छे खासे पैसे मिल जाते। घर ठीक हुआ तो शादी भी हो गई। अणूती फूटरी लुगाई मिली। माँ सोवणी बिंदणी पाकर खुश, वो मनमोहण लुगाई पाकर। छोटा परिवार, सुखी परिवार । मिलकर सबने छोटे-छोटे सपने देखे।
गाँव में हवा शुद्ध, पीने का बरसाती पाळर टाँके का पानी, खाने को खेत की देशी बाजरी,काचर और ग्वार फली का साग और गौरी गाय का घी। सब सुख पर एक ही दुःख - संतान का।
माँ और पत्नी के साथ उसने हर देव -देवरे के यहाँ मन्नत माँगी। भोपे के कहने पर कई बकरे चढाए। एक दिन पास के हॉस्पिटल में दिखाया, तो थायराइड वजह बताई। कुछ साल बाद में थायराइड ठीक हुआ, तो पत्नी ने प्यारी बच्ची को जन्म दिया।
ढाणी में खुशियां फैल गई। लछमी आ गई। लछमी के आने पर उसी बरस एक ट्रैक्टर और टंकी खरीद ली। पूरे गाँव में शहर से मीठे पानी की सप्लाई करता। साँझ को लौटता, तो जी करता बच्ची को खिलाने का पर गाँव में अपने बच्चों को खिलाने का रिवाज नही था। बडे लोग मजाक उडाते। कभी कभी माँ से छिप बच्ची को टुकर-टुकर देखता, छू लेता उसके नरम नरम गुलाबी पाँवो को। रात को दोनों घडी भर बीच में सुलाते, दुलारते। सो जाती तो उसे लकडी के हिंडोले में सुला देते।
यही उसका रोज का नेम था, यही धर्म।
वह रोज पहली टंकी स्कूल में खाली कर दूसरी टंकी के लिए शहर जाने से पहले बस टेशन पर बैठे लोगों के साथ हथाई करता । इस समय शहर से पहली बस आती है, इसमें अखबार आता है । गाँव के लोग अखबार पढते है, देश दुनिया की बात करते हैं ,फिर गाँव की बात करते है। राम सिंह बा बताते कि जब हम 71 में इस गाँव में आए थे तब इस ओरण में इतनी बोरडियाँ थी हम लोग ताली देकर छुप जाते थे तो मिलते नहीं थे, चरती हुई गायें दिखाई नहीं देती थी, पर जब से यह विदेशी बबूल आए है तब से ओरण में बोरडी गायब हो गई अब इसके मात्र दो पेड बचे हैं । इस चर्चा में राम सिंह बा न जाने कितनी चीजों के गाँव से गायब होने की बात करते हुए बीडी बुझा कर पता नहीं कहाँ खो जाते । वह धीरे से उठ शहर की तरफ चल देता। ट्रेक्टर पर पिता के पसन्द के सिंध के लोक गीत बजाता। कभी हैदर रिन्द का डोरो सुनता, तो कभी माई भागी की आवाज में मुहंजां पंखी परदेशी सुनता ।
रात को अंतिम फेरे के समय सुनता ससिई-पुन्नू -
ओ मेरे पुन्नू! मैं केवल तुम्हारे लिए बिस्तर सजाऊँ
मुझे तुम्हारे अलावा कुछ भी अच्छा नही लग रहा
आग लगाऊँ इस भम्भोर शहर को, यहाँ से मेरा दिलबर जो चला गया है।
आग लगे इस भम्भोर शहर को यह पंक्ति सुन वो दीवाना हो उठता, ट्रेक्टर की स्पीड अपने आप बढ जाती।
ये अप्रेल के बीच के दिन है पर तापमान का पारा अभी से 40 डिग्री तक चढा गया है। अभी तो मई-जून के दिन बाकी है। तपते रेगिस्तान में सायं-सायं करती, बलबलती लू में कुछ भी साबूत नहीं बचता। आँकडे तक सूख जाते हैं । खेजडी की तीतर छाया भी गाय को घडी भर रोक नहीं सकती । नाडी का पैंदा सूख कर धरती को चीर जाता है। प्यासे हिरण थक कर कुत्तों के आगे घुटने टेक देते हैं पर इन सबके बीच में उसे खुद को फोग की तरह हरियाय रखना होगा। उसे पता है रेगिस्तान वो खेत है जहाँ जेठ-आषाढ के महीनों में सिर्फ उम्मीदें बोई जाती है इसलिए अपने भीतर उम्मीद के बीजों को बचा कर रखना होगा बारिश के होने तक।
दोपहर से पहले एक टंकी गाँव की नाडी पर काम कर रहे नरेगा मजदूर लोगों के लिए डालनी होती है।
बन्तुलिये के लपेटे से उठती लू और नाडी किनारे बैठे नरेगा मजदूर , बोरडी की डाल पर चुनडी से बने झूले में झूलते शिशु, उनकी माताएँ खेजडी के तितर छाँव में बैठ कर हाथ से डिजाइन बना कर चमकीले मोती और काँच की कपडे पर सुंदर कढाई कर रही है । इन दिनों नरेगा मेट उसका पडोसी ही है,इसलिए टंकी में उसके ट्रेक्टर का नाम चढा रखा है । आज चेकिंग आने वाली हैं, इसलिए मजदूरों को रोक कर रखा है फर्जी नाम के बदले कई लोगों को बिठा रखा है। सामान्य दिनों में 11 बजे हाजिरी लगा कर निकल जाते हैं। नाडी खोदने के नाम पर दो चार तगारी धूल फेंक देते हैं।
शाम को गाँव में जोगमाया के मन्दिर में जागरण है।
वो जल्द घर लौटता है।थका हुआ है ।आज दिनभर में आठ फेरे किये हैं। वह टंकी को ट्रेक्टर से छुडा कर खडी करता है। बच्ची दौड कर उसके पास आती है। वह रोज बच्ची को एक चक्कर देता है गाँव की दुकान तक। खट्टी-मिट्टी गोलियाँ दिलाकर तो कभी बिस्किट दिलाकर वापस आता है। आज उसे खाना खा कर जागरण के लिए मन्दिर में जाना है, वैसे भी लेट हो रखा है। बच्ची मुँह उतार कर अंदर चली जाती है। उसका अंदर कुछ टूट जाता है। दरक जाता है। वो थका हुआ था पर बच्ची की उदासी देख वो ज्यादा थका महसूस करने लगा।
वह खाना खाकर गाँव के मंदिर की तरफ चल देता है। गाँव पहुँचने पर ट्रेक्टर मन्दिर की बजाय दुकान की तरफ मोड देता है। मन्दिर के लिए प्रसाद और अगरबती पैकेट खरीदता है बाकी बचे पैसों की खट्टी मीठी गोलियाँ और एक बिस्किट पैकेट खरीद कर ट्रेक्टर के टूल बॉक्स में रखता है।
जागरण शुरू हो चुका है। भजन गायक तन्दूरे के तार और मंजीरे की रस्सियाँ कस रहे हैं। चाय बन रही है। मन्दिर से नारियल की खुशबू उठ रही है। वो भी जोगमाया को प्रसाद चढा कर अरदास करता है कि इस बरस गाँव के सारे टाँके बरसाती पालर पानी से भर जाए।
यहाँ सुख-दुःख व्यक्तिगत न होकर सामूहिक होते है- चाहे विवाह हो, मरण हो या फिर उत्सव हो, सब एक साथ उमड पडते है।
जागरण भी सामूहिक है, सभी ने मिलकर चंदा किया है। पिछले बरस बारिश नहीं हुई थी। रेगिस्तान में बारिश न होने का मतलब साल भर पीने के पानी और ढोर-डंगर के चारे से वंचित होना । यहाँ जागरण सामूहिक प्रार्थनाएँ हैं जो यहाँ के लोगों को जिजीविषु बनाती है कि अगले जेठ में बरसेगा बादल और उग आएगी सेवण घास और खडीन वाले खेत होगी बारह महीने खाने लायक बाजरी ।
जागरण जम चुका है । भजनी गवरी पुत्र को आह्वान करते हुए अपने भजनों को उठाते हैं।
साधु मरणो अंत समय, जीवण कहे सो झूठ
गिरधारी लख गोरधन,वो चले गए सब उठ
रात ज्यों ज्यों ढलती है भजनी इंद्र, गोरख और राजा भर्तहरि से होते हुए आत्मा की ऊँचाई तक पहुँचते है । दिन उगने से एक पहर पहले तक कबीर की हेली गाते हैं -
हेली म्हारी बाहर भटके काई
थारे सब सुख है घर माही।
वह 5 बजे घर लौटता है। पत्नी बच्ची के साथ सो रही है। उसके तकिये के नीचे बिस्किट और गोलियाँ रख कर वह सो जाता है। वह देर तक सोता रहता है। 7 बजे के आसपास माँ जगाती है - आज शहर नहीं जाना क्या?
वह हडबडा कर उठता है। तैयार होकर ट्रेक्टर स्टार्ट करता है। नींद नहीं लेने से सर भारी हो रखा है पर आज उसे जाना ही होगा। सावों का मौसम है ,उसने कई लोगों को वादा कर रखा है । ट्रेक्टर को टंकी से जोडने के लिए बैक करता है। जोर भचिड की आवाज के साथ टायर के नीचे कुछ आता है। टायर ऊपर से निकल जाता है। माँ और पत्नी दौड कर आते हैं। उसे समझ नहीं आया हुआ क्या। उसने अंदाज लगाया कि बकरी या भेड का बच्चा नीचे आ गया। वह बन्द करके नीचे उतरता है। उसकी धरती खिसक गई। आँखों के आगे अँधेरा छा गया। पछाड खा कर गिर गया। उसकी बच्ची। प्यारी फूलों। ट्रेक्टर के पिछले बडे टायर से चिपकी हुई।
रेगिस्तानी ढाणी की सुबह का चेहरा दुख से लिथडा हुआ। दुख की लालिमा पूरब के आभे पर फैल गई। जिसने भी सुना, जो कर रहा था, छोड कर दौडा आया। उसको रोना नहीं आ रहा था।भीतर जम गया था। आँखों में आँसू ठस गए, वे पथरा गई। गाँव के बडे बुजुर्गों ने रुलाने का उपक्रम किया ताकि दुख गळ सके पर उसके हियाँ पत्थर हो गया।
बच्ची छोटी थी, हरिद्वार जाना स्थगित रखा। सारे क्रियाकर्म संक्षिप्त में ही निपटाए।
वैसे भी रेगिस्तान में शोक ज्यादा लम्बा नहीं चलता। रिश्तेदार जल्दी शोक तुडवाने घर पहुँच जाते है क्योंकि लम्बा शोक मनाना भीतर से टूटना होता है और रेगिस्तान में उम्मीद और सपने कभी टूटते नहीं है ।
वह सामान्य होने की उम्मीद में अपने को खेत में खटाता, थक कर चूर होता तब लौटता,पर आँख लगते ही वही उदास चेहरा, वही खट्टी- मीठी गोलियाँ। पसीने से तरबतर उठता।
सो जाओ, इसमें आपका क्या दोष, सब विधना के हाथ है। पत्नी दिलासा देती।
पर मेरे हाथों से अपनी प्यारी बेटी की.. वह जोर से दहाड मार कर रोना चाहता है पर छाती में सब जम गया। गले मे फाँस बन चुभ रहा है, अटक रहा हो जैसे।
वैर माता जो अंक लिख देती है ,वो कष्ट तो काया को भुगतना ही होता है, आप अपने को दोषी मत मानो। पत्नी पानी का गिलास पकडाती है।
ट्रेक्टर उस दिन से वहीं खडा है। वो उसकी तरफ देखता है पर उसकी हिम्मत नहीं होती उस पर बैठने की।
जिया जूण ने जीवण वास्ते कुछ तो करना होगा, इस तरह बैठे कैसे काम चलेगा? माँ दिलासा देती।
बाप के हाथों बेटी का मरण। वह पछतावे से भर गया। उसे लगता है वह पागल हो जाएगा।
माँ गाँव से काका को बुला ले आती है। काका समझाते हुए रस्ता निकालते हैं - गंगाजी में तरपण करके आ जा, उसकी आत्मा को मुगती मिलेगी, तेरे भी पाप धुलेंगे।
यह ट्रेन उन लोगों से भरी हुई है जो हरिद्वार जाने की चाह में चढे है। गले में मालाएँ पहने खाने पीने और पहनने का सामान लिये हुए पूरे परिवार के साथ गंगा नहाने की उम्मीद लिए बाडमेर से चढते हैं। अधिकांश लोगों की भाषा थाट की है, वह अनुमान लगाता है ये भी पाक विस्थापित है। जोधपुर संभाग के अधिकांश गाँवों में पाक विस्थापित डेरा डाले हुए हैं।
इस और उस देश के लोगों की अंतिम चाह रहती है गंगा में अंतिम अस्थियों का प्रवाह । सब पाप धुल जाए इसी चाह से विदा होना चाहते है। लम्बा सफर है, इस ट्रेन का भी लोगों की तरह। इस ट्रेन का सफर बाडमेर के रेगिस्तान से होता हुआ जोधपुर, नागौर और बीकानेर को काटते हुए हरे प्रदेश में प्रवेश करेगा, फिर पहाडो से गुजरती हुई यह गंगा किनारे लगाएगी ।
दो दिन के सफर में खाना साथ ले लिया है, जिसके खोलने पर पूरे डिब्बे में भर जाती है थार की महक, बाजरे की रोटी, पंचकूटा और सांगरी की सब्जी । वो एक कौर मुँह में डालता है। गले से नीचे नहीं उतरता।वह बन्द कर पानी पी कर डिब्बे में नजर डालता है।
डिब्बे में कभी कभी मूँगफली और चने और कुल्फी वालों के आने पर लोग बच्चों की जिद पूरी करने में लगे हुए हैं। औरतें सिकुडी हुई बैठी है कुछ रोमांचित-सी कुछ भयभीत सी...मिश्रित-सा भाव लिए। भागते शहर, गाँव और पेडों को देख रही है। कभी घूँघट ऊपर उठा कर तो कभी उसके पार से ही।
रेगिस्तान के लोगों के लिए नदी में उतरना कितना रोमांच भरा रहता है। जहाँ घडो में वर्ष भर सहेज कर रखा जाता है मीठा पानी
और दूसरी और बहती है साल भर गंगा की अविरल धारा।
वह फिर ट्रैन के बाहर देखता है।
ट्रैन बीकानेर स्टेशन पर खडी है। बाहर ठेले वाला आवाज लगा रहा है- बाबूजी बच्चों के लिए रसगुल्ले, बिस्किट, चॉकलेट, चिप्स ले लो।
उसकी रुलाई फूट पडती है, वह जोर जोर से रोने लगता है ।
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