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स्वर्णलता

स्वर्णलता
पहरा
दिल-दिमाग पर
जब
हो तम का पहरा-
चहुँ ओर
जडता का कोहरा
तब
कलरव करते पांखी भी
आल्हादित नहीं करते-
नृत्य-मगन-मयूर
देख बदरा।
क्यों
ठहरे है राजहंस के
यायावर कदम
सन्नाटे तोडती लहरें
दिखता नहीं तितली का
निसंग नर्तन।
पथरीली राहों पर
चलते हैं जो
लिये विश्वास-सम्बल
थमते नहीं उन के
कालान्त कदम
जी उठता है
कालिन्दी का कलकल
मधुर स्वर।
है व्यर्थ सोचना
खण्डहर रिश्तों की
हकीकत पर
तेज झोंके से
मिट जाते हैं
कदमों के निशां
रेत पर
थामना कामनाओं के
वाहक-
मन की भावनाओं को
जिन्दगी की हर
परीक्षा में-
न होना
विफल


चिनारों तले



आज भी
खो जाता है मन
चिानारों की नैसर्गिक
शीतलता-
डल-लेक की विशालता में
विचरता अतीत की
वादियों में
साक्षी रहे हैं
जो भाई-चारे की अपूर्व
मिसाल के
मगर आज
भय-शंका से त्रस्त है
जन-मन
नहीं चैतन्य-भाईचारा
न ही निर्भय प्रवाह
सरोवर का।
सूखने लगी है
पत्तियों चिनारों की
आतंकी माहौल में
बरसते नहीं है
नेह-बदरा
सूनी-सेनी है आँखें
बुझा दीप
मैत्री-प्रेम का
चहुँओर-दिखते
काले-साये
दबी-अधरों में
संवाद-धारा
थमती नहीं तूफानी
हवाएँ
हुई बाधित राहें
निः संग समय ने
बाँधे है हाथ
तूफानी चक्रव्यूह में
हुऐ बन्दी
तोरण/बैसाखी के
सतरंगी
एक टुकडा रोशनी



चहुँओर से अन्धेरे में
एक टुकडा रोशनी से
जगमगा उठते हैं
राहों के दिये
जो खेता है
जीवन की नाव
हौंसले की पतवार से
जीवन की जद्दोजहद् से
घबराता नहीं
अन्तर के सपनों से
कतराता नहीं
करता है साकार सपने।
जिन्दगी की किताब में
यादों की बारात है
ख्वाबों की बरसात है
बारिश में ढह जाते हैं
रेत के घर
हवाओं में रह जाती है
उन की गंध।
पलाशों की रंगों-गंध है
साँसों में बसी
मगर राहों में है
काँटों की चादर बिछी
फूलों तक पहुँचने की
है नहीं कोई पगडण्डी तक बची।
यदि बोझ काँधे से उतरे
तो आदमी
गम से उभरे।
शब्दों के विस्फोट से
धरती-आसमा हिल जाते हैं
बहरों में फूल खिल जाते हैं
मगर बिछडे हैं जो करीबी
उन के दर्द दिल से
नहीं मिटते
बन्दी रह जाती है ख्वाहिशें उजली
गम के कोहरे तले।

सम्पर्क - ई-24, भौजी कॉलोनी,
मालवीय नगर, जयपुर - ३०२०१७