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राजेश भटनागर

राजेश भटनागर
हाँ, मैं तैयार हूँ

हाँ, रामायण में लिखा है
कि सीता की अग्नि परीक्षा हुई थी
द्रोपदी का चीर हरण कर अपमान
यहाँ तक कि माँ पार्वती तक
अपने ही पिता दक्ष द्वारा अपमानित हुई
और अग्नि कुण्ड में कूद पडी
तो कभी अस्मिता की रक्षा में
जौहर करना पडा
तो कभी नैना साहनी की भाँति
तंदूर में जलाया गया
मगर फिर भी
गार्गी, मैत्रेयी बनकर
शास्त्रार्थ कर पुरुष का दंभ
तोडती रहीं
कभी लक्ष्मीबाई बन,
कभी हाडी रानी बनकर
पुरुष को
राह दिखाई
पन्नाधाय तुम ही हो
तुम ही जीवन की
पौध उगाती हो
तुम ही चमन में
फूल खिलाती हो
तुमसे ही है रौशन जहाँ
मगर तुमने कभी
चमन से कुछ नहीं माँगा
बस आँख मीचकर
समर्पित हो
सदैव दिया ही है


कोरोना की हकीकत है..
एक छींक या
खाँसी के एक ठसके पर
खडे हो जाते हैं
रोंगटे ।
दिमाग मे संदेह के
तार झनझनाने लगते हैं
किससे मिले थे
कहाँ-कहाँ गए थे
हिसाब लगाने लगता है
दिमाग ।
डर-डरकर साँस लेना
नियति बन गई है ।
हरदम ख्याल आता है
कोरोना आइसोलेशन वार्ड
या वेंटीलेटर पर
दम तोडती साँसों वाला
कोरोना मरीज़
जो रह जाता है संसार में
निपट अकेला ...
साथ होती है
अस्पताल की बदबूदार हवा
बीमार सीली दीवारें
दवाइयों की गंध
दर्द से कराहते, खाँसते
कोरोना मरीज़....।
तब याद आते हैं
अपना घर, गली, मोहल्ला
बाजार की रौनकें
बेटा-बेटी, नाते-रिश्तेदार
उसे घेरे रहने वाले
दोस्त यार...।
वो याद करता है-
गमलों में खिले फूल
बलखाती बेलें
छायादार नीम के पेड
सैर पर जाने वाले उसके साथी
अखबार, दूधवाला
अपने घर की छत से टपकती
बरसात की बूँदे
उसकी आँखों में तैरता है-
बादलों में सफर करता चाँद
भोर की पहली किरण
और कभी
पत्नी की चूडी, कंगन
माथे की बिंदिया...।
मगर निराशा के अँधेरे
उसे घेर लेते हैं
फिर उसे दिखने लगता है
पत्नी का सूना माथा
नंगे हाथ
माथे से पुछा सिंदूर
सफेद साडी और
रोते-बिलखते परिजन ।
फिर नीला प्लास्टिक बैग
म्युनिसिपल की गाडी
और उसे दफनाते
सिर्फ तीन-चार लोग ।
और आँसू बहाते
उसके अपने...।
हाँ, यह कविता नहीं
कोरोना की हकीकत है।

माँ
माँ आप भी क्या खूब हो
रोज़ चीखती-चिल्लाती थीं
परेशान हो आठ-आठ
आँसू बहाती थीं
कहती थीं खीजकर
दिन भर मेरा खून पीते हो
कहीं बाहर जाकर
मरो ना ।
मगर अब बच्चों को
सीने से लगाती हो
बार-बार उनके हाथ
धुलाती हो
प्यार से सिर पर हाथ फेर
उन्हें समझाती हो -
कोरोना...
पैर बाहर बिल्कुल
धरो ना ...।

घर के कामों में
दिन-रात खटती हो ।
वहाँ भी पहुँच जाती हो
जहाँ कोरोना की दवाई
बँटती हो ।
मंदिर से धागा भी
ले आती हो ।
सारे देवता धोक
बच्चों की खैर
मनाती हो।
अपनी जान की परवाह
कभी नहीं करती हो।
बस पति, बच्चे, परिवार के लिए ही
मरती हो।
बाजार बंद हों या खुले
जहाँ से भी जो मिले
परिवार की खुशहाली का सामान
ले आती हो ।
हे भगवान मेरे पति, बच्चे सलामत रहें
ये ही दुआ दिन-रात
मनाती हो ।
माँ !
तुम भी क्या खूब हो ।
कभी पत्नी, कभी बहन, कभी बेटी
और कभी किसी की महबूब हो ।

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सम्पर्क- एल-27, विवेकानंद कॉलोनी,
भगवानगंज, अजयनगर, अजमेर
मो. 8949415256/9413227987