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दिव्या सिंह मिश्रण

दिव्या सिंह मिश्रण
जिंदगी

बेदर्दी बेतकल्लुफ,
मुस्कुराहटें या कि कैफियत,
बेतरतीब, जायकों-सी,
बेजुबान कैसे बना रही फिर भी कविता तू जिन्दगी,
बेधडक फलकों पे,
बिंधे पंखों से
अधूरी उडानों में
अधूरी बिसातों में
अधूरे निशां लिए
चुभन-सी चिंदगी
तितर-बितर हरसू
फरयादों की सिगडी में
कोयला बनते परवाजों-सी जिन्दगी।

उम्मीदों की कतरन,
अटक पडी झुर्रियों में
नंगे कदम, नन्हें-नन्हें
पतंग हाथ भी आई
फुटपाथ किनारे
सिक्कों में उधारी-सी
उन हथेलियों पर टपकी कुछ पल तो जिन्दगी
कि जवानी की सेंध जलाती बचपन भी
तिल-तिल कर सिखाती
बेईमानी के उसूल भी
खामखां-सी जिन्दगी

हजारों हाथ हैं कुछ करने के लिए
फिर हाथ कहाँ कटवा लाई तू जिंदगी

सडकों पर गूजरे दहशत के पैमाने
पहुँचे नींदों में बच्चियों के सिरहाने,
पापाक सबसे प्रेम
दलीलें फीकी यहाँ
दीवारों की पैरवी में
दरारें बन रिसते मंजर पर,
पल रही शमशीरे,
यही.....बन रहीं कुर्सियाँ
दीमक से रिश्तों में दबी इज्जत की जंजीरें,
तोड देती है इक पल में
नाफरमान-सी,
कुदरती कायदों को
खेल ही तो है
तार-तार जमीर,
तर-बतर जमीन,
खामोश नीला आसमां,
दर्द से उकेरी हैं जो,
बन पडी खाईयाँ-सी,
कुछ लाशें देखो तो,
गिरती रहती है वहाँ
दरारें भरने को,
सूई धागे-सी,
आसमां के इश्क भी रिस पडे,
कि जर्रा-जर्रा,
हरफलक
पार के पार भी
तिनका-तिनका जमीर में
मर कर भी जिंदा है तू जिंदगी

रिहाई

लकीरों की बिसात में,
मजबूरियों की खुरचन ढकते सुनहरे गलीचे,
मखमली एहसासात में छिप नहीं पाती,
रुधे गलों की नज्में कभी
रिस पडती है खेल में जीतने वाली मोहरे भी कभी
खामोश चुभन की खिडी से
बिंधे पंखों की फडफडाहट-सा
वे रंज कुछ खास है,
रेशमी गलीचे फट पडते हैं जब
इंकलाब हमेशा चीखों से नहीं जाहिर
खेल खेल में यूं अनजाने ही
रिहा होती है शह और मात से जिंदगी
बिखरे चिथडों में भी आजाद
तो आबाद है जिन्दगी

रहगुजर

करीने से तह करके जमाए थे जज्बात
बडे अदब -ओ-सीलके से
कि कमबख्त किसी ओर से नहीं,
अपनी ही तलब-ए-आजादी से हुई,
बेसलीका उर्फ मासूम, बगावत उर्फ गुस्ताखी,
कुदरती एहसासात में नम वजूद की सिलवटें,
फर्क है भीगने और पिघलने में
तहें खुली भी इस कदर
कि ना होने के समा जाने में
उभरे रंग असल में होने के
रंज नहीं जो रंज हुए
फिर इस कदर हुए कि ना हुए
खोते खोते हुई खोजे कई

कतरा-कतरा यूं मिलते हुए
खुद-ब-खुद रास्ता हुए
बन रही है राह चलते-चलते,
ठहरी है राह चलते-चलते।

सम्पर्क : द्वारा अनुज पारीक,
क्वार्टर नं. ढ्ढढ्ढ-२४०, अम्बामाता,
ओटीसी स्कीम (महाकालेश्वर मंदिर के पास, एसबीआई बैंक) , उदयपुर- ३१३००१