fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

सामाजिक नैतिकी की थाह

नरेश गोस्वामी
बर्ट्रेेण्ड रसेल के व्यक्तित्व और ज्ञान-मीमांसा के क्षेत्र में उनके योगदान का आकलन करना एक दुसाध्य काम है। इसकी दो वजहें हैं। एक, यह कि उनके चिंतन-मनन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा दर्शनशास्त्र के अकादमीय अध्ययन से वास्ता रखता है। और यह एक ऐसा क्षेत्र है जो आमतौर पर सामान्य पाठकों की रूचि व पहुँच से दूर रहा है। दूसरे, रसेल ने एक बेहद लंबा और सक्रिय जीवन जिया जिसमें वे निरंतर नये विचारों, परिप्रेक्ष्यों और प्रस्थापनाओं से मुखामुखम होते रहे। मसलन, अपने बौद्धिक जीवन के प्रारंभ में रसेल साम्राज्यवाद के उदार संस्करण में यकीन करते थे, लेकिन बीसवीं सदी की शुरुआत होते न होते वे साम्राज्यवाद का मुखर विरोध करने लगे थे। प्रथम विश्वयुद्ध में इंग्लैंड की भागीदारी को लेकर उनका रवैया इतना अडियल था कि अंततः अपने देश की विदेश-नीति का विरोध करने के कारण उन्हें जेल तक जाना पडा। इसी तरह व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता पर कोई समझौता न करने वाले रसेल यह लिखकर उदारतावादियों को सांसत में डाल देते थे कि जमीन और पूँजी पर निजी स्वामित्व का उन्मूलन किए बगैर दुनिया में स्थायी शांति कायम नहीं की जा सकती।
रसेल के यहाँ विचारों की यह परिवर्तनशीलता एकबारगी वैचारिक अप्रतिबद्धता या अंतर्विरोधों की परिचायक लग सकती है, लेकिन उनका मानना था कि ज्ञानार्जन की प्रक्रिया में हमारे प्रत्यक्ष अनुभवों की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण होती है। उनकी दृष्टि में मताग्रह एक ज्ञानविरोधी प्रवृत्ति है। इसलिए, ज़ाहिर है कि उनकी वैचारिक परिवर्तनशीलता को बौद्धिक ठहराव या मताग्रह के प्रति एक सजगता के रूप में देखा जाना चाहिए।
छह व्याख्यानों में विन्यस्त यह किताब सामाजिक साहचर्य, मानव-प्रकृति, तकनीकी और शासन; व्यक्ति पर सत्ता के नियंत्रण तथा उसकी पहलकदमी के दायरे तथा सामाजिक नैतिकी जैसे आधारभूत विषयों की थाह लेती है।
अपने पहले व्याख्यान में रसेल मानव-विकास का वैज्ञानिक निरूपण करते हुए उन विभिन्न अवस्थाओं की चर्चा करते हैं जिनसे गुजरकर वह वर्तमान स्थिति में पहुँचा है। मसलन, आदिम अवस्था के बाद युद्ध का उद्देश्य शत्रु का उन्मूलन करने के बजाय उस पर विजय प्राप्त करना हो गया। बाद में नस्लीय समरूपता का स्थान धार्मिक मत की एकात्मकता लेने लगी। सोलहवीं सदी में राष्ट्रीय निष्ठाओं पर धार्मिक निष्ठा हावी पती थी। लेकिन धीरे-धीरे समूहगत निष्ठा व शत्रुओं के भय से शुरू हुआ सामाजिक साहचर्य कुछ स्वाभाविक और कुछ विचारित प्रक्रियाओं से गुरता हुआ राष्ट्र में संघनित होता गया।
रसेल के इस विश्लेषण को पूरी तरह इतिहास की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसमें उन्होंने मुख्यतः कालक्रम का ध्यान रखकर मनुष्य की भौतिक नियति का विवेचन किया है। कालक्रम का यह बोध रसेल के चिंतन को भौतिक संदर्भों से असंपृक्त नहीं होने देता। मसलन, उनका यह वक्तव्य देखें कि सैंकडों हज़ार वर्षों के दौरान मानव ज्ञान, दक्षता और सामाजिक संगठन में विकसित हुआ है, लेकिन उसकी जन्मजात बौद्धिक क्षमता में विकास नहीं हुआ है। जाहिर है कि अगर इस वक्तव्य के पीछे इतिहास का भौतिक बोध नहीं होता तो यह बात निराधार और अपुष्ट हो जाती। इस क्रम में रसेल आगे यह कहते हैं कि मनुष्य की प्रारंभिक अवस्था से लेकर आज तक जो भी परिवर्तन हुए हैं उनकी चालक शक्ति आंतरिक मैत्री एवं बाह्य शत्रुता की आदिम अंतःप्रवृत्ति तथा सामूहिक स्वहित के सहज बोध पर निर्भर रही है।
रसेल को मनुष्य की यह आदिम प्रवृत्ति इतनी निर्णायक लगती है कि उन्हें विश्व-राज्य की कल्पना करते हुए यह खतरा सताता है कि शत्रु के भय की अनुपस्थिति में ऐसा राज्य में ससंजक शक्तियाँ पर्याप्त रूप से दृढ नहीं हो पाएँगी। उनका कहना है कि सामान्य मनुष्य प्रतिद्वंदिता के बगैर नहीं रह सकता क्योंकि वही क्रियाशीलता की प्रेरणा होती है, इसलिए हमें इस भावना का उन्मूलन करने के बजाय यह कोशिश करनी चाहिए कि वह कम हानिकारक दिशा में कैसे प्रवृत्त हो।
सामाजिक साहचर्य एवं शासन के अंतर्संबंधों पर विचार करते हुए रसेल कहते हैं कि मनुष्य की आदिम प्रजातियों में साहचर्य की भावना शासन जैसी बाहरी व्यवस्था के बजाय उसके व्यक्तिगत मनोविज्ञान पर ज्यादा आधारित थी। मसलन, प्रस्तर युग के कबीलों को आज के मुहावरे में बेशक अराजक कहा जा सकता है, परंतु उसे पुलिस या दण्ड-व्यवस्था जैसी संस्थाओं की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि इन संस्थाओं की जगह सामाजिक भावनाएँ ज्यादा प्रबल थीं। इसलिए रसेल के अनुसार सरकार जैसी संस्था तब अस्तित्व में आई जब कबीलाई संघर्षों के बाद एकीकरण आदि के ज़रिये सामाजिक इकाई का आकार इतना विशाल हो जाता था कि उसके सदस्यों के बीच परस्पर परिचय की संभावनाएं क्षीण पडने लगती थी।
सामाजिक साहचर्य के नये रूपों की सूक्ष्म तार्किक पताल करते हुए रसेल कयास लगाते हैं कि कबीलाई संघर्षों के फलस्वरूप होने वाले आपसी विलय या एकीकरण के बावजूद प्राचीन काल के विशाल राज्य स्थिर नहीं रह पाते थे क्योंकि कोई भी केंद्रीय शासन सीमावर्ती क्षेत्रों पर एकछत्र नियंत्रण नहीं कर सकता था। स्थिति यह थी कि मज़बूत से मज़बूत राज्य भी शासक की मृत्यु होते ही बिखरने लगता था। रसेल इसे विशाल साम्राज्यों की मनोवैज्ञानिक समस्या के रूप में चिह्नित करते हैं। उनका कहना है कि आधुनिक तकनीकी की अनुपस्थिति में साम्राज्य केवल साहचर्य की मनोवैज्ञानिक भावना के सहारे ही एकजुट रह सकता था। उल्लेखनीय है कि मनुष्य के सुदूर अतीत में शुरू हुए इस विकास-क्रम को रसेल वर्तमान समय तक लाकर यह स्पष्ट करते हैं कि पंद्रहवीं शताब्दी के बाद राज्य की शक्ति में लगातार इात हुई है। उन्हें लगता है कि अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दियों के बाद स्वतंत्रता के बजाय समानता की मनोवृत्ति ज्यादा प्रबल हुई है। उनका मानना है कि यह प्रवृत्ति शायद उद्योगपति वर्ग के उभार के कारण मबूत हुई है। इस संदर्भ में वे यह उल्लेख भी करते हैं कि तकनीकी उन्नयन भाप और टेलिग्राफ आदि तथा ज्ञान की युक्तियों सार्वभौम शिक्षा के ज़रिये आधुनिक राज्य और सरकार अत्यंत विशाल भूभाग पर भी प्रत्यक्ष नियंत्रण कर सकती हैं।
कहना न होगा कि आज से सात दशक पहले कही गयी उनकी यह बात मौजूदा वक्त में और भी प्रासंगिक नज़र नहीं आती है क्योंकि तकनीकी विकास के चलते इन वर्षों में सत्ता के केंद्रीकरण की यह प्रवृत्ति और मबूत होती गयी है। राज्य की बढती शक्तियों के क्रम में रसेल दैवी राजत्व के सिद्धांत की वापसी तथा औद्योगिक निगमों के चौतरफा प्रभुत्व का जिक्र करते हैं और शासन तंत्र के बढते दायरे को लोकतंत्र से विमुखता के अर्थ में देखते हैं। लेकिन जैसा कि हमने शुरू में इंगित किया था, रसेल मताग्रही नहीं हैं। इसलिए वे शासन तंत्र में केंद्रीकरण की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर दृष्टिपात करते हुए यह भी विचार करते हैं कि विशाल संगठनों के लाभों को अक्षुण्ण रखते हुए उनकी बुराइयों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है।
आदिम समाज के सामुदायिक संगठनों से लेकर आधुनिक और व्यवस्थित शासन की इस आवर्ती यात्रा में रसेल एक ऐसे विश्व-राज्य की कल्पना करते हैं जिसमें देशभक्ति, भय और घृणा के स्थान पर स्वहित और सदभावना जैसी शक्तियाँ केंद्र में होंगी। लेकिन इसके साथ वे युद्ध जैसी कुछ अवांछनीय संभावनाओं पर भी विचार करते हैं जिनके चलते राज्य और उद्योगों का समूचा ढाँचा तबाह हो सकता है। उन्हें यह भी लगता है कि आधुनिक तकनीकी के विनियोग से मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भी पहरा बिठाया जा सकता है। उनका कहना है कि विपर्यय की इस स्थिति में दासता, कट्टरता, असहिष्णुता और व्यापक गरीबी का दौर दुबारा लौट सकता है। इसलिए वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि लोगों को व्यक्ति की महत्ता के प्रति सावधान रहना चाहिए। अब इस संबंध में एक बार ठहर कर देखें कि रसेल आज से सात दशक पहले जिन स्याह आशंकाओं की महज कल्पना कर रहे थे, आज वे दुनिया के बडे भाग में अंध लोकवादी सरकारों के रूप में सिर उठाए खडी हैं। धीरे-धीरे संचार और संप्रेषण की आधुनिक तकनीकी ने अंधराष्ट्रवाद तथा अन्य के विरोध का ऐसा संकीर्ण माहौल रच दिया है जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता पर संकट खडा हो गया है।
समाज में व्यक्ति की स्थिति और भूमिका क्या होती है रसेल? इस प्रश्न को कई कोणों तथा उदाहरणों से परखते हैं। किताब में प्रस्तुत अन्य व्याख्यानों की तरह यहाँ भी वे सरल और आदिम समाज से प्रस्थान करते हैं। रसेल कहते हैं कि आदिम समाज में व्यक्ति की अंतःप्रवृत्तियों और आकांक्षाओं की भूमिका बेहद सीमित होती है। ऐसे समाज में सभी सदस्यों की सहभागिता का उद्देश्य एक जैसा होता है। लेकिन, जैसे-जैसे मानव समाज सभ्यता की ओर उन्मुख तथा जटिल होता जाता है, वैसे-वैसे दो व्यक्तियों की क्रियाशीलताओं में भिन्नता बने लगती है। वे इस भिन्नता को तमाम कलात्मक, नैतिक और बौद्धिक विकास का आधार मानते हैं। लेकिन, हमेशा की तरह यहाँ भी वे उचित नियंत्रण पर जोर देते हैं क्योंकि उनके अनुसार स्वतंत्रता के अभाव में जडता पैदा होती है और उसके अतिरेक से अव्यवस्था को बढावा मिलता है।
रसेल कहते हैं कि व्यक्ति की क्रियाशीलता को संस्थानीकृत करने की प्रवृत्ति इतिहास के आरंभ से ही मौजूद रही है। लेकिन आधुनिकता के विस्तार के साथ इस क्रियाशीलता का स्वरूप बदलता गया है। उदाहरण के लिए, आधुनिक काल में कलाकार की भूमिका अनिवार्य नहीं रह गयी है। निस्संदेह, लोगबाग आज भी कलाकार का सम्मान करते हैं, परंतु उसकी कला को अब समाज का सहजात अंग समझने के बजाय अलग चीज माना जाने लगा है। रसेल के मुताबिक इसकी वजह यह है कि जबसे मनुष्य उद्योगीकरण की तरफ झुकता गया है, तबसे वह उपस्थित क्षण के बजाय किसी आगामी योजना में व्यस्त रहने लगा है। यानी एक तरह से उसकी दुनियादारी और दूरदर्शिता ने कला का आस्वाद करने लायक छोडा ही नहीं है।
आधुनिकता के इस परिदृश्य में वैज्ञानिक की सामाजिक हैसियत में इज़ाफा हुआ है। प्राचीन और मध्य युग में वैज्ञानिक सम्मान का पात्र नहीं था क्योंकि उसकी स्थापनाएँ समाज की प्रचलित सोच के लिा जाती थी। लेकिन आज शासन-तंत्र के लिए वैज्ञानिक सबसे उपयोगी नागरिक बन गया है। और इसका कारण यह है कि वह अपने आविष्कारों द्वारा शासक-वर्ग के वर्चस्व को मबूत बनाने में मदद करता है। वैज्ञानिकों की इस सामाजिक स्थिति और भूमिका में आए बदलाव की शिनाख्त करते हुए रसेल गहरी दृष्टि का परिचय देते हैं। वे बताते हैं कि आधुनिक राज्य की स्थापना से पहले वैज्ञानिक स्वतंत्रता और स्वेच्छा से काम करते थे, जबकि अब उन्हें शासन के नियंत्रण व दिशा-निर्देशों के तहत काम करना पता है। इस तरह आधुनिक समय में वैज्ञानिक स्वतंत्र कर्ता न होकर किसी राजकीय या औद्योगिक संगठन का अंग बन गए हैं। रसेल इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं क्योंकि उनकी नज़र में दूसरों की सहायता लेकर किया जाने वाला काम कल्याणकारी नहीं हो सकता। इस संदर्भ में एक बार फिर ध्यान दें कि वैज्ञानिक शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में राज्य और पूँजी के बढते दखल को रसेल कितनी बारीकी से देख रहे थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह स्थिति और गंभीर होती गयी है। सच यह है कि हमारे दौर में शोध का कोई भी एजेंडा वैज्ञानिकों के बजाय पूँजी के हितों द्वारा तय किया जाता है।
इस व्याख्यान का उपसंहार करते हुए रसेल उसी विवेकशीलता का आग्रह करते हैं। वे कहते हैं कि इस स्थिति से निकलने का रास्ता यह नहीं है कि आधुनिक व्यवस्था को नष्ट कर दिया जाए। इसके उलट, वे इस बात पर बल देते हैं कि आधुनिक व्यवस्था को अपने भीतर स्थानीय स्वायत्तता, विकेंद्रीकरण और निर्वैयक्तिक विशालता के गुण विकसित करने होंगे ताकि मनुष्य उसके प्रकोप से सुरक्षित रह सके।
आधुनिक युग में तकनीकी विकास जैसे मानवीय प्रगति की एकमात्र कसौटी बन गया है। स्थिति यह हो गयी है किसी समाज और राष्ट्र का साभ्यतिक स्तर तक इस तथ्य से तय होने लगा है कि उसमें तकनीक के आधुनिकतम रूपों और उपकरणों के इस्तेमाल का सूचकांक क्या है। अपने चौथे व्याख्यान में रसेल ने तकनीकी और मानव-प्रकृति की अंतक्रिया के निहितार्थों की गहन विवेचना की है। वे कहते हैं कि उत्पादन का समग्र मशीनीकरण मनुष्य की दक्षता को गैर-ज़रूरी बना देता है। यही नहीं, बल्कि वह प्रबंधन तथा कर्मचारियों के आपसी संबंधों को भी विरूपित कर देता है। उनका कहना है कि मुद्रा के आविष्कार तथा सामूहिक उत्पादन का मनुष्य की क्रियाशीलता पर नकारात्मक प्रभाव पडा है। एक ओर जहाँ मुद्रा के कारण वस्तु की मूल्यवत्ता उसके अंतर्भूत गुणों के बजाय उसकी कीमत से तय होने लगी हैं, वहीं उत्पादन के मशीनीकरण और लाभ की दर को अधिकतम स्तर पर ले जाने के फेर में उत्पादक काम के आनंद से वंचित होता जा रहा है। इस व्याख्यान में रसेल आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था के निरंतर परोक्ष होते जाने के खतरों से भी आगाह करते हैं। वे कहते हैं कि उत्पादन में वृद्धि और निर्यात में विस्तार जैसे लक्ष्य लोगों को इसलिए प्रेरित नहीं कर पाते क्योंकि उनका लोगों के कल्याण से प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। रसेल का कहना है कि आधुनिक राज्य-तंत्र में अर्थव्यवस्था के अमूर्तिकरण की लोकतंत्र भी इतना परोक्ष होता गया है कि साधारण नागरिक के लिए उसकी उपयोगिता और उपलब्धता दोनों ही संदिग्ध हो गयी है। वे कहते हैं कि केवल करदाता होने से व्यक्ति की नागरिकता सशक्त नहीं हो जाती क्योंकि उसके कल्याण के नाम पर अधिकारी-तंत्र समेत जिन संस्थाओं का निर्माण किया जाता है, उन तक नागरिक की पहुँच नहीं हो पाती।
रसेल को मशीनीकरण और औद्योगिक समाज के इन आसन्न संकटों का हल लघु-औद्योगिक इकाइयों में दिखाई देता है। उनका तर्क है कि शुरुआती दौर के उद्योगवादियों को इन खतरों का भान नहीं था। लेकिन उद्योगों की बेलगाम रफ्तार से आज हम बखूबी वाकिफ हो चुके हैं। ऐसे में, पिछली गलतियों को दोहराते रहना मनुष्य की विवेकहीनता का परिचायक होगा।
इसलिए, अगले व्याख्यान में रसेल राज्य और व्यक्ति के अधिकारों व उनकी भूमिकाओं का दायरा तय करना चाहते हैं। उनका कहना है कि जीवन और संपत्ति की रक्षा राज्य का प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए। लेकिन अगर वह खुद ही नागरिक अधिकारों का हनन करने लगता हैं तो उसकी वैधता खत्म हो जाती है। उनका स्पष्ट मत हैं कि बडे उद्योगों और वित्त पर राज्य का नियंत्रण होना चाहिए। कहना न होगा कि सत्ता के तत्कालीन और मौजूदा प्रतिष्ठान को यह विचार तब भी असहज कर देता था और आज भी वह उतना ही त्याज्य है। किंतु यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि रसेल आज से सात दशक पहले ही पर्यावरण के संरक्षण को लेकर कितने सचेत थे। मिसाल के तौर पर वे कहते हैं कि पिछले डेढ सौ सालों से मनुष्य अपने उद्योग-धंधों के लिए कच्ची सामग्री और ज़मीन का इस्तेमाल करता आ रहा है। और यह एक तरह से प्राकृतिक पूँजी की ऐसी फिजूलखर्ची है जो हमेशा जारी नहीं रह सकती।
इस तरह जीवन की सुरक्षा, न्याय तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का दायित्व राज्य को सौंप कर रसेल केंद्रीय नियंत्रण की सीमा तय कर देते हैं। राज्य का इससे अधिक नियंत्रण उन्हें स्वीकार नहीं है। वे जोर देकर कहते हैं कि व्यक्ति का जीवन विशाल संगठनों के अधीन नहीं होना चाहिए।
कुल मिलाकर देखें, तो इन व्याख्यानों के समस्त विचार-सूत्र हमें इस निष्पत्ति तक ले जाते हैं कि मनुष्य द्वारा कल्पित कोई भी विचार-श्रेणी या अवधारणा अपने आप में साध्य नहीं होती। अंततः उसका औचित्य और वैधता इस तथ्य से तय होती है कि वह मुनष्य को स्वतंत्रता, बंधुत्व और सार्वभौम समझ की ओर ले जाती है या उसमें बाधक बनती है।
बर्ट्रेेण्ड रसेल पिछली शताब्दी के आरपार छाए रहे। उनके चिंतन और हस्तक्षेप का दायरा गणित और तर्कशास्त्र के अमूर्त प्रश्नों से लेकर मानवीय नियति के समकालीन सरोकारों तक फैला था।
जाहिर है कि उनकी आधारभूत मान्यताओं, उनमें होने वाले परिवर्तनों, उनके आनुभविक परिप्रेक्ष्य, विश्लेषण व तर्क-पद्धति आदि को समझने के लिए कोई एक किताब पर्याप्त नहीं हो सकती। इस संदर्भ में यह भी ौरतलब है कि 1950 में जब इस किताब का मूल अंग्रेजी संस्करण छपा था, तो रसेल 78 बरस के हो चुके थे। एक तरह से वे अनुभव, ख्याति, ज्ञान और मेधा के शिखर पर थे। ऐसे में उनकी इस रचना को एक लंबे जीवन में अर्जित किए गए ज्ञान का सार या परिपाक कहना गलत न होगा।
इस तरह, प्रस्तुत किताब की एक बडी उपलब्धि यह है कि वह हमें इस मूर्धन्य दार्शनिक और प्रतिबद्ध एक्टिविस्ट के मूल प्रश्नों और चिंताओं से एक बार में परिचित करा देती है। रसेल को हिंदी में समझने के लिए किताब का यह भाषांतर एक प्रस्थान-बिन्दू का काम करता है। नंदकिशोर आचार्य का अनुवाद सिर्फ एक अभाव की पूर्ति नहीं करता, बल्कि उनके गद्य की प्रांजलता के साथ हमें भाषायी दृष्टि से भी समृद्ध करता है।

पुस्तक : सत्ता और व्यक्ति
लेखक : बर्टेण्ड रसेल
अनुवाद : नन्दकिशोर आचार्य
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 110/-
संस्करण : 2020
विधा : व्याख्यान

सम्पर्क - 29, सीएसडीएस,
राजपुर रोड, सिविल लाइंस,
नयी दिल्ली-110053