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हिन्दू दृष्टि के अन्तर्विरोध

जगदीश गिरी
अकाल में उत्सव उपन्यास के जरिए देश में खेती - किसानी के समक्ष उपस्थित संकटों से रु-ब-रु कराने और किसानों के पक्ष को सहानुभूतिपूर्वक प्रस्तुत करने के बाद पंकज सुबीर ने अपने नवीनतम उपन्यास जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज था में साम्प्रदायिकता की समस्या को केन्द्रीय विषय बनाया है। यद्यपि धार्मिक असहिष्णुता और साम्प्रदायिकता से पूरा विश्व ही किसी - न- किसी रूप में ग्रसित है, परन्तु भारत जैसे बहुलतावादी देश इस समस्या से अधिक पीडित हैं । भारत की त्रासदी यह रही कि दुनिया के नक्शे पर एक आजाद मुल्क के रूप में जन्म लेने के साथ ही इसे धार्मिक आधार पर विभाजन झेलना पडा। इससे भी अधिक त्रासद यह कि जिस आपसी कटुता और हिंसा के समाधान के तौर पर विभाजन जैसा कठोर कदम दोनों पक्षों ने स्वीकार किया; इस उम्मीद के साथ कि इससे भविष्य तो निरापद रहेगा, वह उम्मीद भी विभाजन के साथ ही धराशायी हो गई । जैसे - जैसे देश की धरती पर विभाजक रेखा खिंचती गई वैसे - वैसे ही इस कृत्रिम रेखा के दोनों और की पवित्र धरती सांप्रदायिक उन्माद के चलते लाखों निर्दोष मनुष्यों के ताजा लहू से नहा गई । विभाजन और हिंसा के ये घाव इस उपमहाद्वीप की स्मृतियों में इस तरह से रिसते रहे हैं कि सात -आठ दशक बीतने के बाद भी समूचा राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श इन्ही के इर्द-गिर्द रचा जा रहा है । भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की राजनीति और सत्ता- विमर्श अभी भी प्रायः विभाजन की स्मृतियों से ही संचालित है ।
यही स्थिति साहित्य की है । भारत और पाकिस्तान के साहित्यकारों सहित दुनियाभर के अनेक साहित्यकार विभाजन के जिम्मेदार कारकों की तलाश तथा इसके दुष्परिणामों की भयावह तस्वीर अपने तईं प्रस्तुत करते रहे हैं । दरअसल किसी विदेशी शासन द्वारा अपने अधीन करोडों लोगों को भयानक हिंसा और मारकाट के लिए उत्प्रेरित कर भाग खडे होने का यह एकमात्र और कुत्सित उदाहरण था जिसकी जिम्मेदारी भी उसने अपने शासितों के सर मढकर पल्ला झाड लिया। साहित्यकारों और इतिहासकारों ने सप्रमाण इसे ब्रिटिश शासन के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का ही नतीजा बताया है। यदि वे चाहते तो विभाजन को टाला जा सकता था, लेकिन जैसा कि ब्रिटिशर्स का कहना था भारतीय समाज में इतने अन्तर्विरोध थे कि सभी लोगों को एक जाजम पर लाना मुश्किल ही नहीं असंभव था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा आदि दलों में किसी भी मसले पर सहमति बनाना आसान काम नहीं था और महात्मा गाँधी, डॉ. अम्बेडकर, मोहम्मद अली जिन्नाह, नेहरु, पटेल आदि नेताओं में भी अनेक मसलों पर मतभेद थे । जनता के विभिन्न वर्गों में परस्पर अविश्वास और घृणा इस कदर हावी थी कि महात्मा गाँधी जैसे सर्वमान्य और सम्माननीय नेताओं की शान्ति की अपील भी असरहीन होती जा रही थी । मारकाट और हिंसा में बेगुनाह लोग मारे जा रहे थे, ऐसे में विभाजन के सिवाय अन्य कोई विकल्प नहीं था। हालांकि यह तत्कालीन परिस्थियों का बहुत ही अतिरंजित वर्णन है फिर भी इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय जनता धार्मिक अथवा सांप्रदायिक आधार पर इतनी बंट चुकी थी कि गाँधीजी को भी, भले अधूरे मन से ही सही विभाजन के लिए सहमति देनी पडी । सांप्रदायिक हिंसा और खून -खराबे को रोकने के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं रह गया था । इसलिए यह बुनियादी सवाल अपनी जगह है कि हजारों बरसों से साथ - साथ रहने वाले दो बडे धार्मिक समूहों के आपसी प्रेम और भाईचारे को महज कुछ ही वर्षों में अंग्रेजों ने ही खत्म कर दिया? या इनके भीतर पहले से ही कोई ज्वाला धधक रही थी जिसे अंग्रेजों ने अपने स्वार्थवश हवा दे कर भडका दिया? दूसरे, कि यदि यह केवल अंग्रेजों की कारस्तानी थी कि दोनों धर्मों के लोग बरसों पुराने संग - साथ को भुलाकर एक - दूसरे के खून के प्यासे हो गए तो फिर आज भी तीनों देशों में अल्पसंख्यकों से दुर्व्यवहार क्यों हो रहा है? विभाजन और साम्प्रदायिकता पर लिखने वाले लेखकों ने इस सवाल को अपने - अपने उपकरणों से हल करने की कोशिश की है और जाहिर तौर पर निष्कर्ष भी भिन्न - भिन्न हैं ।
पंकज सुबीर ने इन्ही सवालों से टकराते हुए दुनिया भर में धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा के कारणों की शिनाख्त करने की कोशिश इस उपन्यास में की है । उन्होंने उत्तर भारत के एक कस्बे खैरपुर, जो कि जिला मुख्यालय भी है, को केंद्र में रखते हुए हिन्दुओं- मुसलमानों के बीच अक्सर होने वाली हिंसक झडपों, आगजनी और दंगे के कारणों से होते हुए, विभाजन के कारणों पर मुख्यतः फोकस किया है। उन्होंने मुख्य कस्बे में हुए सांप्रदायिक दंगों के इतिहास को खँगालते हुए, इन्हीं दंगों के परिणामस्वरूप कस्बे से लगभग एक किलोमीटर भर दूर बसी खैरपुर बस्ती के बहाने पुनः इसे आंतरिक विभाजन की तरह पेश किया है । यह बात एक हद तक ठीक भी है क्योंकि पाकिस्तान बन जाने के बाद भी अल्पसंख्यकों पर हमले की घटनाएँ रुकी नहीं है । हर दंगा दोनों धर्मों के बीच की खाई को और चौडा कर देता है । बाबरी मस्जिद पर होने वाले संगठित और सुनियोजित हमले और गुजरात दंगों ने तो मानो यह सिद्ध कर दिया कि इस देश में अल्पसंख्यकों का कोई खैरख्वाह नहीं है। वे अपने ही देश में पराये हैं । इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए खैरपुर बस्ती की तरह वे संगठित होकर छोटे-छोटे मोहल्लों में रहने लगे हैं, चाहे वहाँ बुनियादी सुविधाओं का कितना ही अभाव क्यों न हो? परन्तु इस दूरी का दुष्परिणाम यह हुआ कि दोनों धर्मों के अनुयायियों में अजनबीयत बढी है जिससे फिरकापरस्त ताकतों और निहित स्वार्थों को दोनों धर्मों के लोगों को एक - दूसरे के खिलाफ भडकाने का भरपूर अवसर मिल जाता है। अल्पसंख्यकों के मोहल्लों को व्यंग्य और घृणा से मिनी पाकिस्तान जैसे अपमानजनक मुहावरों से लांछित करने की प्रवृति बढी है । कहना चाहिए कि विभाजन की प्रत्रि*या आज भी जारी है । अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के अपने - अपने दर्द हैं और आरोप भी हैं । तो दंगों के लिए वास्तव में कौन जिम्मेदार है ?
उपन्यासकार की दिक्कत यह है कि वह या तो ठीक - ठीक तय नहीं कर पाता या उसके भीतर भी, अनजाने ही सही, वही इस्लामोफोबिया समस्या के तह में जाते - जाते उभर आता है, जो आजकल प्रत्येक समस्या के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहरा देने का बायस बन जाता है । वरना क्या कारण है कि जो लेखक उपन्यास के प्रमुख पात्र रामेश्वर (जो असल में लेखक का ही प्रतिनिधि है) से उपन्यास के आरम्भ में सांप्रदायिक दंगों व हिंसा के लिए भगतसिंह को उदधृत करते हुए धर्ममात्र को जिम्मेदार ठहराता है कि मानव जाति को सबसे ज्यादा नुकसान धर्म ने ही पहुँचाया है ।... मैं एक ऐसी दुनिया की कल्पना करता हूँ , जहाँ धर्म का कोई अस्तित्व ही नहीं होगा । जहाँ इन्सान केवल इन्सान के रूप में ही रहेगा। (पृ. 08) और वह अपना सरनेम हटाकर धर्म का चिह्न हटाने की कोशिश करता है रामेश्वर ने अपने नाम के आगे लगे सरनेम को हटाकर अपने आप को मुक्त कर लिया धर्म से। ( पृ. 21) लेकिन वही रामेश्वर आगे चलकर दंगों व खूनखराबे के पीछे धर्म और संप्रदाय का हाथ होने से ही इनकार कर देता है। उसकी स्थापना है कि कोई भी दंगा सांप्रदायिक दंगा होता ही नहीं है । उसके पीछे और दूसरे कारण होते हैं। ... हर दंगे के पीछे कहीं न कहीं, किसी न किसी का व्यक्तिगत स्वार्थ होता है। (पृ.140) जाहिर है कि यह कहते हुए लेखक दंगों के लिए समाज में निचले स्तर पर चुपचाप काम करने वाली सांप्रदायिक और फासीवादी शक्तियों को अनजाने ही बरी कर देता है। जबकि असल में अल्पसंख्यकों के विरुद्ध होने वाला प्रत्येक दंगा सांप्रदायिक ही होता है, जिसके लिए लम्बे समय से भूमिका तैयार की गई होती है । एक समुदाय विशेष के प्रति बहुसंख्यकों के मन में लगातार घृणा और अफवाहें फैलाई जाती है और किसी भी मामूली - सी कहा सुनी की आड में दंगा भडका दिया जाता है । अन्यथा एक ही धर्म के लोगों का आपसी झगडा दंगे में तब्दील क्यों नहीं होता?
जब बात हिन्दू - मुस्लिम अन्तर्विरोध की आती है तो उपन्यास में ऐसी चूक अनेक जगह दिखाई देती है जबकि अन्य धर्मों के आपसी संघर्षों पर बात करते हुए अपेक्षाकृत अधिक ईमानदारी दिखाई देती है । विभिन्न धर्मों की कट्टरता और हिंसा की चर्चा के दौरान जब रामेश्वर का शिष्य शाहनवाज उससे यह पूछता है कि क्या हिन्दू धर्म में कट्टरता नहीं है? तो रामेश्वर गोलमोल जवाब देकर निकल जाता है और मौलाना आजाद के बहाने आरएसएस की उसी विवादास्पद व्याख्या पर पहुँच जाता है कि हम सब जो इस उपमहाद्वीप में रह रहे हैं हम सब हिन्दू ही हैं। (पृ.18)
दरअसल यह उपन्यास लिखा ही इस हिंदूवादी दृष्टि से गया है जो मानकर चलती है कि हिन्दू तो बहुत उदार होते हैं इसलिए उनसे किसी को कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन अन्य धर्मावलम्बी इतने उदार नहीं होते। विशेषकर मुसलमान तो बहुत कट्टर होते हैं, वे अन्य धर्मों को मिटाकर सबको मुसलमान बनाना चाहते हैं। रामेश्वर का यह कथन द्रष्टव्य है- जो काम इस्लाम कर रहा है वही काम किसी समय यहूदियों ने भी किया और ईसाइयों ने भी किया । अपने से पहले के धर्म को समाप्त कर अपने आप को स्थापित करने की कोशिश । इस्लाम और इन दूसरे धर्मों में बस एक अंतर यह था कि यह दूसरे धर्म अपने आप को अंतिम नहीं मानते थे । इस्लाम अपने आप को अंतिम मानता है ।... यह जो स्थापना है बस यहीं से हिंसा होती है । यहीं से कुछ अधिक कट्टरता पैदा होती है। (पृ.1।) यह कहते हुए लेखक बहुत चतुराई से आर्य अथवा वैदिक धर्म, जिसे अब हिन्दू धर्म कहा जाने लगा है, की अपने विरोधियों के प्रति की गई हिंसा को छुपा जाता है। वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति की तर्ज पर ।
देखा जाए, तो इस उपन्यास की कथावस्तु का ताना-बाना ही कुछ इस तरह से बुना गया है कि इसमें मुस्लिम चरित्रों को सिर्फ हिन्दुओं की उदारता और सहिष्णुता को प्रमाणित करने के लिए ही लाया गया है। स्वयं रामेश्वर, जिला कलेक्टर वरुण कुमार, एसपी विनोद सिंह, एडीशनल एसपी भारत, विद्यार्थी विकास आदि सभी हिन्दू पात्र हैं जो मुसलमानों को बचाने के लिए जी-जान लगा देते हैं । शाहनवाज़ को तो रामेश्वर अपने घर में बेटे की तरह रखता है और यह सोचकर कि इसे इन्सान बनाना है बाकायदा एक प्रोजेक्ट की तरह चुनौती इस बात की थी कि यह जो मुसलमान लडका मन में बहुत सा अविश्वास और शायद बहुत-सी नफरत लेकर यहाँ आया है, इसके अंदर से इस सबको कैसे मिटाया जाए ?...रामेश्वर ने किसी प्रोजेक्ट की तरह शाहनवाज को लिया था। (पृ. 33) यही वह तथाकथित उदार हिन्दू दृष्टि है जो सदैव दूसरों को गलतियों और मूर्खताओं का अहसास करते हुए अपने को थोपना चाहती है, उन्हें सभ्य बनाना चाहती है । लेखक को संभवतः इस छद्म फासीवाद का आभास नहीं हो पाया कि दूसरे धर्मावलम्बियों को सभ्य बनाने का दंभ ही तो सांप्रदायिक हिंसा के मूल में है । उपन्यास में किसी मुसलमान चरित्र का व्यक्तित्व उभरकर नहीं आता, न ही उनके पारिवारिक - सामाजिक संवाद हैं जिससे यह पता चले कि किसी भी घटनाऋम के सम्बन्ध में वे क्या सोचते हैं । खैरपुर को घेर लेने वाली हिन्दू दंगाइयों की भीड और इसके साजिशकर्ताओं के भी संवाद भी नदारद हैं जो दंगाइयों की मानसिकता को प्रकट करने के लिए बहुत जरुरी होते । हैरत की बात है कि तमाम सरकारी मुलाजिम हिन्दू हैं, एक भी मुसलमान नहीं । पुलिस और प्रशासनिक अमले को जिस तरह मुस्तैद दिखाया है गया है वह भी उदार हिन्दू छवि को चमकाने की कोशिश नजर आती है वरना इस तरह के दंगों में पुलिस और प्रशासन किस तरह अपने राजनीतिक आकाओं का मुँह जोहता है, यह किसी से छुपा नहीं है। और यह दंगा बकौल लेखक इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्द्ध में हो रहा है और रामेश्वर ने महसूस किया है कि पिछले चार-पाँच सालों में लोग बहुत ज्यादा हिंसक होते जा रहे हैं... सोशल मीडिया के सारे प्लेटफॉर्म इन हिंसक पशुओं के कारण आक्रांत पडे हुए हैं । रामेश्वर को समझ में नहीं आता कि यह हिंसा कहाँ से आ रही है? (पृ.।।) जब शीशे की तरह साफ है कि जब से फासीवादी, सांप्रदायिक शक्तियां सत्तासीन हुई हैं तब से चहुँओर हिंसा का नंगा नाच हो रहा है तो लेखक को इस हिंसा का स्रोत नजर क्यों नहीं आता? क्यों वह यह दिखाना चाहता है कि प्रशासन न्याय के पक्ष में खडा है? हिंदी उपन्यास तो अपने प्राम्भिक दिनों से ही यथार्थवाद की राह पर चल रहा है तो इस तरह का आदर्शवाद किसके हित में है?
उपन्यास में मुसलमानों पर लगाये जाने वाले उन सभी आरोपों की पडताल की गई है जिनके आधार पर उन्हें सांप्रदायिक हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है जैसे कि वे विभाजन के समय पाकिस्तान क्यों नहीं चले गये? वे गाय क्यों काटते हैं? वे अयोध्या पर से अपना दावा त्याग क्यों नहीं देते? वे हिन्दुओं के त्योहारों से परहेज़ क्यों करते हैं? वे बहुत अधिक बच्चे पैदा क्यों करते हैं? वे पाकिस्तान की टीम जीतती है तो पटाखे क्यों चलाते हैं ? वे पाकिस्तानी क्रिकेटर्स के पोस्टर अपने घरों में क्यों लगाते हैं ? पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं की संख्या घट जाने का दण्ड भी भारत के मुसलमानों को क्यों नहीं मिलना चाहिए? आदि। हैरत की बात है कि लेखक ने अधिकतर इन बेबुनियाद आरोपों का खण्डन करने का प्रयास नहीं किया है बल्कि कुछ उदारता दिखाते हुए या तो उन्हें नज़रअंदाज़ करने की चेष्टा की है या उन्हें मुसलमानों की नासमझी बताया है। जबकि फासीवादी-सांप्रदायिक तत्त्वों की साजिश और झूठ को उजागर करने के लिए जिस वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टि का उपयोग राही मासूम रजा ने आधा गाँव तथा यशपाल ने झूठा सच उपन्यास में किया था, उसी तरह की गहरी दृष्टि की यहाँ जरुरत थी लेकिन पंकज सुबीर चूक जाते हैं। शाहनवाज से मुसलमानों के बारे में यह बचकाना सवाल कराना कि जो लोग सैंतालीस में इस देश को छोडकर पाकिस्तान नहीं गए, वे लोग फिर भी तो इसे अपना देश नहीं मान पाए...उनके सपनों में तो आज भी पाकिस्तान आता है। (पृ.43) यह आरोप ठीक वैसा ही है जैसे किसी विवाहिता स्त्री को लांछित करने के लिए उस पर किसी भी पर-पुरुष की इच्छा रखने का आरोप लगा दिया जाता है । इस तरह का आरोप किसी भी नागरिक के स्वाभिमान के प्रतिकूल ही होगा। लेकिन इससे भी खतरनाक है उपन्यास के प्रतिनिधि पात्र रामेश्वर का यह कहना कि यही तो मुसलमानों की असली समस्या है बेटे, असल में उनकी जन्मभूमि एक है, पुण्यभूमि दूसरी है, और अब उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद एक तीसरी भूमि और बन गई स्वप्न भूमि, जहाँ जाने का सपना सब देखते हैं, पाकिस्तान। (पृ.43)
इससे अधिक आपत्तिजनक बयान और क्या हो सकता है? यही है वह हिन्दुत्ववादी दृष्टि जो सारे भारतीय मुसलमानों को संदेह के घेरे में ला देती है, उनकी देशभक्ति का सुबूत चाहती है, जो विभाजन की स्मृतियों को धुँधला नहीं होने देती, जो उन्हें बात-बेबात पाकिस्तान चले जाने का ताना देती रहती है। एक सजग रचनाकार, जिसका दावा है कि उसे जुर्म-ए-इश्क-पे-नाज है, से ऐसे प्रमाद की अपेक्षा नहीं हो सकती। अन्यत्र भी लेखक हिन्दुओं के संस्कारों-त्योहारों जैसे-होली के रंगों, दीपावली के पटाखों, माथे पर तिलक, हाथ पर राखी बँधवाने को तो मुसलमानों के लिए भी औचित्यपूर्ण ठहरा देता है लेकिन मुसलमानों को उनकी जालीदार टोपी और ऊँचे पाजामे को लेकर दकियानूसी साबित कर देता है फिर भी तुर्रा यह कि मुसलमानों ने अपनी कट्टरता नहीं छोडी और धीरे -धीरे यह हुआ कि हिन्दू, जो दुनिया के दूसरे धर्मों के मुकाबले में कम कट्टर धर्म था, वह भी कट्टर होता चला गया। (पृ.93) ऐसी मासूमियत पर फिदा ही हुआ जा सकता है।
हालाँकि उपन्यास में जिस जटिल विषय को उठाया गया है उसके निष्कर्षों से सबका सहमत होना संभव भी नहीं है, फिर भी इतिहास के सबसे पेचीदा और वर्तमान के सबसे चुनौतीपूर्ण मसले को Ìæ畤ü•¤, वैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय प्रविधियों का इस्तेमाल किए बिना समझना नामुमकिन होना ही था । औपन्यासिक शिल्प की अपनी सीमाएँ भी हैं । इतिहास के इतने बडे फलक को किसी एक घटना के जरिये समझाने की कोशिश भी कठिन कार्य है । यह लेखकीय कौशल ही है कि विश्व के सभी बडे धर्मों के इतिहास, उनके आपसी संघर्ष, भारत विभाजन के कारण, सांप्रदायिक दंगों और मारकाट के इतिहास को महज एक रात के कथानक में समाविष्ट कर लिया है। इस हेतु फ्लेशबैक शैली के अलावा फोन, इन्टरसेप्ट और क्रॉस लिंकिंग टेक्नीक के बहाने नाथूराम गोडसे, मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गाँधी से बात करते हुए ऐतिहासिक पात्रों को अपना पक्ष रखने की नई डिवाईस ईज़ाद की गई है जो हिंदी उपन्यास में पहली बार है। इस तरह के प्रयोग उपन्यास को शिल्प के क्षेत्र में निश्चय ही आगे ले जाने में सहायक होंगे। लेखक की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने उपन्यास में बहुत ही रोचक तरीके से विश्व के सभी धर्मों के इतिहास को अपने पाठकों के लिए सुलभ कर दिया है। साम्प्रदायिकता के इस खतरनाक दौर में सभी धर्मों की आंतरिक एकता और उनके अनुयायियों के हिंसक होते जाने के कारणों की तह में जाने का लेखकीय प्रयास प्रशंसनीय है ।
पुस्तक : जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज था
लेखक : पंकज सुबीर
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर, मध्यप्रदेश
मूल्य : 200/-
संस्करण : 2019
विधा : उपन्यास

सम्पर्क : एल 09 बी,
राजस्थान विश्वविद्यालय परिसर,
जयपुर। ईमेल : dr.jagdishgiri@gmail.com