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अकथनीय गाँधी और नया भारत

चन्द्रकुमार
हमारे युग का एक भयानक रूप से दुखद तथ्य इस बात का प्रमाण है कि दुनिया, अपने अस्तित्व के मर्म में ही वाकई, अकथनीय की उपस्थिति से आक्रान्त है।
थॉमस मर्टन (रेड्स ऑन द अनस्पीकेबल)
यह विज्ञान की कोई नयी जानकारी नहीं है, लेकिन फिर भी यह जानना बहुत आवश्यक है कि हमारी आँखें सब कुछ देख नहीं सकती और हमारे कान सब कुछ सुन नहीं सकते। हमारे लिए सत्य वही है जो हम देख-सुन-महसूस कर सकते हैं। सत्य का फलक तो लेकिन असीमित है, भले ही वह हमारी इन्द्रियों की पकड से बाहर हो। तो फिर क्या वह, जिसे हम सत्य मानते रहे हैं, आधा-अधूरा है? वह अगर पूर्ण नहीं है तो क्या उसे सत्य माना जाना चाहिए? जो हमारी दृष्टि से ओझल हो या हमारी श्रवण क्षमताओं से परे हो अथवा हमें ज्ञात न हो - घटित तो वह भी होता होगा। क्या हम उसे इस तरह अस्वीकार कर, सत्य की पूर्णता और अन्ततर् सत्य को ही नकार नहीं रहे हैं? क्या यह अविश्वसनीय नहीं कि सत्य को ईश्वर और ईश्वर को सत्य मानने वाले, अहिंसा के उपासक महात्मा गाँधी की हत्या के संपूर्ण सत्य को सामने लाने में राज्यसत्ता किसी अकथनीय (शक्ति, विवशता या राजनैतिक अनिवार्यता- कुछ भी नाम दें) के सामने बेबस नज़र आती है।
गाँधी की हत्या एक पेचीदा मामला है जो जितना हमें दिखाया-बताया गया है, उससे कहीं गहरे उसका षड्यंत्र फैला हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाए कि स्वाधीन भारत में उनकी हत्या हुई, उन्हीं के प्रिय शिष्यों में शुमार नेहरू-पटेल सरकार चला रहे थे और तब भी, राज्यसत्ता की भयावह (अनचाही या जानबूझकर कारित) भूलों के चलते तीस जनवरी 1948 शाम पाँच बज कर तेरह मिनट पर बिडला भवन में प्रार्थना सभा के दौरान गाँधीजी पर गोलियाँ दागने वाले तो सजा पा गए, लेकिन उन गोलियों में बारूद और हत्यारों में यह दुःसाहस भरने वाला शख्स इस जघन्य अपराध से बरी कर दिया गया। प्रारंभिक सतही जाँच और हत्यारों को जल्द-से-जल्द सजा देने के पश्चाताप में दो दशक बाद तत्कालीन सरकार ने एक न्यायिक आयोग का गठन कर दुबारा इस पर सिरे से जाँच की, और तब बहुत सी परतें खुली जो गाँधी की हत्या के एक बहुत बडे षड्यंत्र को कुछ उजागर करने में सफल हुई। लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
साजिशों की दुनिया रहस्यमयी होती है, बहुधा हम तक वह नहीं पहुँचता जो पूर्ण सत्य है; हमें वही बताया-दिखाया-सुनाया जाता है जो वह चाहते हैं कि हम विश्वास कर लें। गाँधी और अकथनीय में जे डब्ल्यू डगलस ने सिलसिलेवार उन सब घटनाओं और संभावित षड्यंत्रों से पर्दा हटाने का प्रयास किया है जिसे हर भारतीय को बहुत पहले जान लेना चाहिए था। अगर संजीदगी से घटनाओं के सिरे जोडे जाते और उचित छानबीन जारी रहती तो शायद गाँधी की हत्या को टाला जा सकता था। लेकिन यह षड्यंत्र गाँधी की महज दैहिक हत्या का न हो कर उनके समूचे जीवन-दर्शन, सत्याग्रह, अहिंसा व सत्य के उनके सफल प्रयोगों को मलिन करने के साथ उग्रपंथी हिन्दुत्ववादी विचारधारा को भारतीय राजनीतिक-सामाजिक विमर्श में केन्द्र में स्थापित करने, और भारत को हिन्दु राष्ट्र बनाने का वृहद् षड्यंत्र था। यह उस षड्यंत्र को ठीक से न समझ पाने और मुख्य षड्यंत्रकारी को सजा न देने का ही परिणाम है कि आज देश के सत्ता-संस्थानों पर उसी षड्यंत्रकारी विचारधारा से सिंचित-पोषित दल का शासन है और वह गाँधी के हर उस नियम-व्यवहार-सिद्धान्त को समूल उखाडने की कोशिश में जुटा है जो देश को अहिंसा और सत्याग्रह में वैश्विक पहचान दिलाता है।
यह लेकिन गाँधी पर पहला हमला नहीं था! उनकी हत्या से दस दिन पहले भी इसी समूह ने उनकी हत्या करने की असफल कोशिश की थी। उससे पहले भी गाँधी पर, दक्षिण अफ्रीका से ले कर भारत में उनके आन्दोलन के कई मौकों पर, हमला कर मारने का प्रयास किया गया। गाँधी के जीवन में नैतिक या आत्मबल - जिसे हम सत्याग्रह के नाम से जानते हैं - का विस्मयकारी प्रभाव था। यह उनका सबसे मारक और अचूक हथियार था जिसे वे दमनकारी ताकतों और साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपने आन्दोलनों में इस्तेमाल करते थे। मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है कहने वाले गाँधी दरअसल अपने समय के सबसे बडे कम्यूनिकेटर माने गए हैं जिनके भाषणों/ प्रवचनों को सुनने लाखों लोग इकठ्ठा होते थे। दक्षिण अफ्रीका से वापस आने पर, एक लगभग सुप्तप्राय पड रहे आन्दोलन में जनसहभागिता और नागरिकों में नैतिक बल के संचार से उन्होंने आजादी की लडाई में नयी जान फूँक दी थी। साम्राज्यवादी ताकतों के पास हिंसक भीड या आन्दोलन को काबू करने के बलात् उपाय तो थे लेकिन एक निहत्थे, अहिंसक सत्याग्रही के सामने पूरा साम्राज्य बेबस नजर आने लगा। गाँधी भारत की वह उम्मीद थी जिसके बूते स्वाधीन भारत संसदीय लोकतन्त्र के रास्ते से अन्ततः स्वराज की राह पर चलने को तैयार हो सकता था। वह सांप्रदायिक सद्भाव और विभिन्न धर्मों के अनुयायियों में एकता के सबसे बडे पक्षधर थे। वे स्वराज्य के सबसे बडे हिमायती थे। इसीलिए वे उग्रपंथी हिन्दु राष्ट्रवादियों की आँख में खटकते थे।
लेकिन कोई गाँधी जैसे अहिंसक व्यक्ति की हत्या क्यों करना चाहता था? इसका जवाब गाँधी की दक्षिण अफ्रीका रहते हुए उनकी लन्दन यात्रा में ढूँढा जा सकता है, जहाँ के अपने अनुभवों और आशंकाओं के चलते, वापिस दक्षिण अफ्रीका लौटते समय जहाज पर ही हिन्द स्वराज की रचना करते हुए गाँधी ने अपने आगामी आन्दोलन और जीवन उद्देश्य का खाका तैयार कर लिया था। हिन्द स्वराज एक पाठक और संपादक के काल्पनिक संवाद के जरिये, पश्चिमी सभ्यता के बहाने पूरी मानवता की सभ्यता समीक्षा है। हिन्द स्वराज में वर्णित गाँधी की आधारभूत मान्यताएँ, सिद्धान्त और जीवन-दर्शन समय के साथ बदले नहीं, बल्कि बलवत ही हुए। गाँधी की तमाम मान्यताएँ कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादियों के एजेंडे से कदाचित् मेल नहीं खाती थी, बल्कि वे परस्पर विरोधी विचारधारा के पथ पर थी। गाँधी की भारतीय जनमानस में स्वीकार्यता और उपस्थिति, दोनों कट्टरवादी हिन्दुत्व के विचार को भारतीय समाज में पनपने से रोकने का माद्दा रखती थी। क्या यह काफी नहीं था कि गाँधी और उनके जीवन-दर्शन को खत्म करना ही तब हिन्दूवादी ताकतों का सर्वोपरि कृत्य होता? सत्याग्रह दरअसल आत्मबल का वह स्वरूप है जिसमें डर पर विजय पाने का साहस जुटता है। अपने भीतर के भय को परास्त करने की क्षमता अन्ततः किसी को निडर बना देती है जहाँ वह भीतरी और बाहरी डर पर बिना किसी हिंसा के विजय प्राप्त करता है। गाँधी की यही निडरता उनके विरोधियों/ प्रतिपक्षियों की आँख में किरकिरी जैसी थी।
इस दौरान बीस जनवरी 1948 को गाँधी की हत्या के पहले प्रयास में हत्यारे दल के दो लोग जिन्हें गाँधी पर गोली दागनी थी, वे किसी कारण यह साहस जुटा न सके। अपने हथियार बाहर रिक्शे में रख कर वे प्रार्थना सभा में गाँधी के समक्ष निहत्थे ही पहुँचे। बाकी के हत्यारों ने योजना मुताबिक कार्य (गोली दागना) न होता देख बम विस्फोट वाली दूसरी वैकल्पिक योजना को अन्जाम दिया जिससे वहाँ अफरातफरी मच गयी। यह समझ से परे है कि उस दिन जिन्हें गोली दागने की जम्मिेदारी दी गयी, वे योजना से क्यों भटके। क्या वे गाँधी के सामने यह साहस नहीं जुटा पाए? यह पुस्तक एक और खास बात की ओर इंगित करती है कि भले ही हत्यारों ने गाँधी को मार दिया, लेकिन गाँधी के प्रति थोडी श्रद्धा तो गोडसे के मन में भी शायद बाकी रही थी और मुकदमे की सुनवाई में अपने आग उगलते बयानों में, जहाँ वह गाँधी की हत्या को जायज ठहराने का प्रयास कर रहा था, उसने जब-जब गाँधी का जिक्र किया, वह उन्हे गाँधीजी कह कर सम्बोधित कर रहा था। यानी उनके सभी हमलावरों के मन में भी गाँधी के प्रति श्रद्धा जरूर बची थी।
गाँधी की हत्या वे लोग कर ही नहीं सकते जो उनके प्रति श्रद्धा रखते हों! यह निश्चित रूप से किसी और की साजशि थी जिसने उन्हें उन्माद की उस हद तक बरगलाया कि वे अपनी सुध-बुध खो चुके थे। यानी हत्यारे तो महज प्यादों की तरह इस्तेमाल किए गए, यह षड्यंत्र किसी और ने रचा था। महज प्यादों को सजा दे मामला खत्म कर देना गाँधी के साथ कदाचित् न्याय नहीं कहा जा सकता! और दुखद यह है कि यह सब गाँधी के प्रखर और प्रिय शिष्यों नेहरू-पटेल के नाक के नीचे हो रहा था। पुस्तक इंगित करती है कि सरकार भले ही नेहरू-पटेल चला रहे थे, व्यवस्था (शासन) में सावरकर गिरोह की तगडी पकड इस मामले से साफ दिखाई देती है। अगर यह नहीं होता तो क्या कारण है कि बीस जनवरी के बम विस्फोट और तीस जनवरी को उनकी हत्या के बीच दस दिनों में, बम विस्फोट वाले दिन पकडे गए हमलावर और उसके साथी की स्पष्ट चेतावनी कि वे फिर आएँगे, पुलिस और खुफिया तन्त्र हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। क्या हमने लापरवाही में ही सही, जानबूझकर गाँधी को हत्यारे को सुपुर्द नहीं कर दिया था?
बीस जनवरी को प्रार्थना सभा में किये गए बम विस्फोट के बाद थोडी सुरक्षा बढायी गयी। लेकिन प्रार्थना सभा में आगन्तुकों की तलाशी के बाद प्रवेश का तरीका गाँधी कभी स्वीकार नहीं करते, यह जान कर भी उनसे सहमति लेने का प्रयास किया गया, वह क्या इसलिए कि बाद में कहा जा सके कि बापू ने स्वयं वह करने से मना कर दिया था! हमले के संदिग्धों की पहचान के बावजूद न उन्हें गिरफ्तार किया गया और न ही उन पर कडी नजर रखी गयी। इसी दौरान वे दिल्ली से बम्बई और फिर योजना बना कर वापस दिल्ली आने में सफल रहे! सार्वजनिक स्थानों, होटल-धर्मशालाओं और कहीं पर भी कोई खुफिया तन्त्र मौजूद रहा हो जो गाँधी पर संभावित हमले को टाल सकता था, कहीं दिखाई नहीं देता। हत्यारों की अपने मानस गुरु सावरकर से इस दौरान लगातार मुलाकातों की पुख्ता जानकारी के बावजूद हत्यारों और सावरकर को हिरासत में नहीं लिया गया। सावरकर की गिरफ्तारी नहीं करने के पीछे कारण बताया गया कि उससे राजनीतिक उथल-पुथल व हिंसा भडक सकती थी।
क्या शासन इतना नाकारा और लाचार था कि वह संज्ञान में आने के बाद भी कानून-व्यवस्था की स्थिति सँभालने में असहाय महसूस कर रहा था? क्या यह सब गाँधी के जीवन और उस पर मंडरा रहे खतरों से *यादा महत्त्वपूर्ण था? पुलिस, खुफिया तन्त्र व शासन का निकम्मापन दरअसल किसी अकथनीय की ओर इशारा करता है जिसके कारण न केवल गाँधी की हत्या हुई बल्कि उसकी साजिश पर भी पर्दा डाल दिया गया। व्यवस्था (न्याय और शासन) में वे कौन ताकतें थी जो यह सब होने दे रही थी? हत्यारों के हिमायती कौन थे जिन्होंने गोडसे को लगभग नौ घन्टे अपनी सफाई में विष-वमन करने का खुला मौका दिया जो आज भी दक्षिणपंथी उसकी वसीयत मान इतराते हैं? हिन्द स्वराज के प्रकाशन के समय गाँधी ने कहा था कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को सडन से बचाने में उनका वह कार्य सफल रहा। उन्हें क्या यह अंदाजा था कि वह सडन उनकी मातृभूमि में इस कदर फैल जाएगी कि खुद उनको - मरणोपरांत भी- न्याय नहीं मिलेगा, जिसे वे ताउम्र सत्याग्रह और अहिंसा के दम पर बडी-बडी ताकतों को झुका कर प्राप्त करते रहे थे!
इस प्रकरण से पूर्व भी यह हत्यारा एक असफल प्रयास कर चुका था जिसके बाद गाँधी ने उसे अपने साथ समय बिताने का निमंत्रण दिया था। इससे पहले दक्षिण अफ्रीका में गाँधी को बुरी तरह पीट कर, मरा समझ छोड भागे। एक समूह का मुखिया पठान बाद में गाँधी की हिफाजत के लिए सरेआम नंगी तलवार लहरा कर संभावित हमलावरों से गाँधी की रक्षा करने के लिए मंच पर उनके साथ खडा था। एक और मामले में अँधेरे में छिपा एक हमलावर जिसे गाँधी ने अपने साथ लिया और कुछ देर बाद वही हमलावर गाँधी को अपना चाकू सौंप कर वहाँ से चला गया। इन सब घटनाओं का जिक्र बहुत जगहों पर मिलता है, लेकिन यहाँ यह बताने के लिए कहा गया है कि गाँधी में एक अचूक सम्मोहन था जिससे वह अपने संभावित हत्यारों तक को अपने साथ कर लेते थे। गाँधी न केवल अपने हत्यारों को पहचानते थे बल्कि वे खुद को आत्म-बलिदान के लिए बहुत पहले से तैयार कर रहे थे, इसके इशारे भी पुस्तक में मिलते हैं।
अपने घोर विरोधी/प्रतिपक्षी के प्रति भी दया, करुणा और प्रेम का भाव रखने वाले गाँधी का यह मानना था कि उन में भी ईश्वर का रूप है, किन्ही कारणों से उन्होंने वह मार्ग अपना लिया है जो अहिंसा और सत्याग्रह से विमुख है। गाँधी किसी भी स्थिति में संवाद छोडने के हामी नहीं थे। यह संवाद के प्रति उनकी आस्था ही थी कि उनके बहुत से घोर विरोधी भी उनका पक्ष -सत्य का पक्ष - जान कर उनसे सहमत हो जाते। गाँधी का जीवन-दर्शन, उनके विचार, भारतीय सामाजिक-राजनीतिक-आध्यात्मिक मामलों में उनकी गहन अन्तर्दृष्टि और उनका विवेक कहीं-न-कहीं वे कारण रहे होंगे कि उनसे उलट विचारधारात्मक कुनबा उनकी उपस्थिति से हमेशा खौफ खाता था। एक अहिंसक, शारीरिक दुर्बल और वृद्ध होते मनुष्य के समक्ष भी अगर कोई खौफजदा हो, तो फिर कमजोर किसे मानना चाहिए? इसीलिए गाँधी मानते थे कि हिंसा कायरों का काम है, अहिंसा और सत्याग्रह वे ही अपनाते हैं जो भीतर से मजबूत हैं। दृढ आत्मबल के बूते स्वयं गाँधी कहीं भी अपने मार्ग से डिगे नहीं, भले ही कितना ही आक्रान्त और मजबूत प्रतिपक्षी सामने हो। गाँधी की इन्हीं क्षमताओं के कारण उग्रपंथी उनसे हमेशा घबराये रहते थे। गाँधी उनके मार्ग का सबसे बडा अवरोध थे। उन्हें समूल हटाये बिना उनका हिन्दू राष्ट्र का सपना पूरा हो ही नहीं सकता था। अतः उनके लिए यह आवश्यक था कि गाँधी दैहिक और विचार, दोनों रूपों में नष्ट हो जाएँ! इस पुस्तक में इस अवश्यंभावी हत्या के कारणों को एक लम्बे बीज अध्याय के रूप में व्यक्त किया गया है।
यह पुस्तक गाँधी हत्या का महज सिलसिलेवार ब्यौरा ही पेश नहीं करती, बल्कि षड्यन्त्र के बहुत-से आयामों को तब के सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में थोडा-सा खोलते हुए हमें आगाह करती है कि किस तरह दुनिया में तमाम प्रमुख सुधारकों (या तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक नेतृत्व) को किसी अकथनीय (राजनीतिक अनिवार्यता) के कारण मरना ही पडता है। अमेरिका में साठ के दशक में हुई चार हत्याओं और गाँधी हत्या में अविश्वसनीय समानता देखती यह पुस्तक दरअसल गाँधी के सत्य के प्रयोग की ही तरह बिना किसी पूर्वानुमान और पूर्वाग्रह के, परत-दर-परत अपने सामने आए विभिन्न साक्ष्यों के ज़रिये गाँधी की हत्या के षड्यंत्र के पीछे की मानसिकता को समझने का प्रयास करती है। आधिकारिक दस्तावेज़ों, अनगिनत सन्दर्भ ग्रंथों, स्मृति लेखों और साक्षात्कारों से प्राप्त जानकारी को सुरुचिपूर्ण और सहज भाषा में पाठकों के सामने रखती यह पुस्तक इस रूप में भी विशेष है कि यह कहीं किसी पर आरोप नहीं लगाती- तब की अक्षम सरकार और न्याय व्यवस्था पर भी कोई आरोप नहीं मढती - ठीक उसी तरह जैसे गाँधी कभी किसी पूर्वाग्रह से कोई कार्य नहीं करते थे।
लेकिन यह पुस्तक थॉमस मर्टन के अकथनीय की धारणा को इन सब हत्याओं की जड में घटित होनी पाती है। यहाँ जेम्स डब्ल्यू डगलस पटेल के हवाले से तुषार गाँधी की बात में खुद को शामिल करते हुए यह कहने को बाध्य हो जाते हैं कि सावरकर को एक अकथनीय राजनैतिक अनिवार्यता की वजह से निर्दोष ठहरा दिया गया था। सरकार शायद यह स्वीकार कर चुकी थी कि अगर सावरकर को दोषी करार दे कर सजा सुनाई गयी तो इसका परिणाम उग्र हिन्दूवादी संगठनों की भीषण प्रतित्रि*याओं के रूप में होता जिससे भयभीत हो कर, तमाम सबूतों के उपलब्ध होने के बावजूद, षड्यंत्र में सावरकर की भागीदारी और सक्रियता को स्थापित करने हेतु कोई गंभीर प्रयास ही नहीं किया गया जबकि सारे सबूत इसी तरफ इशारा कर रहे थे! जॉन एफ कैनेडी की सरेआम हत्या के बावजूद हत्यारे तो पकड में आये (जिन्हें महज बलि का बकरा कहा गया) लेकिन साजिशकर्ताओं पर पर्दा पडा रहा। थॉमस मर्टन के हवाले से जेम्स डब्ल्यू डगलस कहते हैं कि हम अकथनीय के समक्ष एकदम बर्फ की तरह जम कर रह गए थे। ठीक वैसे ही गाँधी की हत्या करने वाले तो फाँसी के फँदे तक पहुँचा दिये गए, साजिशकर्ता को बरी कर दिया गया। एक अकथनीय राजनैतिक विवशता या अनिवार्यता के पर्दे के पीछे साजिशकर्ता ने पनाह पायी और अदालत से बरी हुआ।
पुस्तक सावरकर और उसकी विचारधारा की एक बहुधा अलक्षित लेकिन महत्त्वपूर्ण वृत्ति की तरफ ध्यान खींचती है। इसे सीआईए की शब्दावली में सत्याभाषी अस्वीकार या खण्डन कहा गया है। सावरकर पर इससे पहले इंग्लैण्ड में लॉर्ड कर्जन की मदनलाल धींगरा द्वारा गोली मार कर की गयी हत्या की साजिश के रूप में भी उँगलियाँ उठी थी। एक अन्य अंग्रेज अधिकारी की एक नौजवान द्वारा की गयी हत्या में भी यह तथ्य सामने आया कि जिस पिस्तौल से हत्या की गयी, वह सावरकर ने इंग्लैण्ड से मँगवायीं थी। गाँधी हत्या पर जाँच आयोग ने भी पाया कि सावरकर और हत्यारों के मेलजोल और क्रियाकलापों को षड्यन्त्र के अलावा कुछ भी मानना भूल होगी। लेकिन ऐसे हर मामले में सावरकर अपनी चिर-परिचित सत्याभाषी अस्वीकार मुद्रा में रहा। बल्कि गाँधी हत्या के अदालती मामले में तो वह खुद को गाँधी का प्रशंसक तक कहता रहा।
दरअसल सावरकर और उसका विचारधारात्मक समूह हत्याओं को अंग्रेजों से आजादी का साध्य मानता रहा और गाँधी की हत्या उनके मंसूबों की पूर्णता के लिये अपरिहार्य बन गयी थी। जब तक गाँधी रहते, सावरकर अपने सपनों का हिन्दुस्तान नहीं बना पाते। लेकिन अपने हिंसक कृत्यों के बावजूद वह सत्याभाषी अस्वीकार या खंडन करने में निपुण हो गया था। यह निपुणता उसे बाद के वर्षों में अकथनीय राजनैतिक अनिवार्यता के कारण हिन्दुवादी ताकतों का प्रमुख चेहरा बनाने में कामयाब रही। भले ही गोडसे यह इच्छा अपने दिल में ले कर फाँसी के फंदे पर झूल गया कि वह सावरकर के हाथ के एक स्पर्श, सहानुभूति के एक शब्द, या कम-से-कम करुणा से भरी निगाह के लिये तरसता रहा। लेकिन सावरकर गाँधी की हत्या के साजशिकर्ता के रूप में नहीं बल्कि किसी और रूप में ही इतिहास में दर्ज होना चाहता था।
जीते जी किंवदंती बन चुके गाँधी पर, संभवतः ईसा मसीह के बाद सर्वाधिक लिखा गया है। विश्वभर में हर सभ्यता-परंपरा के विद्वानों ने गाँधी को अपने तरीकों से व्याख्यायित किया है। जैसा अपनी आत्मकथा लिखने के विचार आने पर वे खुद मानते थे कि उनका सामाजिक-राजनीतिक जीवन तो एकदम खुली किताब है, वह हर कोई जानता है, लेकिन वे अपने आध्यात्मिक जीवन को अपनी जीवनी में शामिल करना चाहते थे ताकि सत्य के साथ उनके प्रयोगों की प्रविधि और परिणीति दुनिया समझ सके। हिन्दी में गाँधी पर यह एक और पुस्तक न हो कर इस मायने में विशिष्ट है कि यह इतिहास की उस स्याह घटना की, बिना किसी भावातिरेक के सन्दर्भो सहित परतें उघाडती है जो ऐसी अन्य पुस्तकों में महज दस्तावेजी तथ्यों का समग्र बन कर रह जाता है। लेखक (और साथ ही हिन्दी अनुवादक ने) इस पुस्तक के कथ्य को बोझिल नहीं होने दिया है, बल्कि पढते हुए, अवसाद की मनःस्थिति में भी यह रोचकता इसे पढते रहने को बाध्य करती है। लेखक-अनुवादक को इस बात के लिए बधाई देनी चाहिए कि यह पुस्तक हमें अपने विगत से इस तरह जोडे रखने में सफल होती है जैसे हम उसके साक्षी हैं। सवाल जरूर मन में कौंधता है कि हमारे तब के नीति-नियन्ता क्या सचमुच बौरा गए थे जो इतने स्पष्ट तन्तुओं को वे जोड न पाए? गाँधी की तरह आखरिकार हमें भी उनके प्रति करुणा और प्रेम बनाते हुए उन्हें भी षड्यन्त्रकर्ता की तरह बाइ*जत बरी करना होगा। यही गाँधी-दर्शन है और यही उनका सन्देश।
पुस्तक से गाँधी हत्या के षड्यन्त्र और उन परिस्थितियों पर गंभीर चिन्तन के साथ बातें सामने रखी गयी है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि देश-विदेश में गाँधी विचार से आत्मसात् रखने वाले वृहद् जनसमुदाय तक यह पुस्तक पहुँचे, तभी इस पुस्तक के अनुवाद का प्रयोजन सफल होगा। आज नाथूराम गोडसे की पूजा और सावरकर को संसद में स्थान देने के साथ ही भारतीय जनमानस में गाँधी की छवि मलिन करने का कोई भी मौका छोडा नहीं जा रहा है। गाँधी की यह सतत चरित्र हत्या निर्बाध रूप से जारी है, लोग उन्हें राष्ट्रपिता किसने बनाया, इस पर भी सवाल करने लगे हैं। अपने जीते जी गाँधी ने कभी कहा था कि मैं जानता हूँ कि मुझे अभी बडा मुश्किल रास्ता तय करना है। मुझे अपनी हस्ती को बिल्कुल मिटा देना होगा। अहिंसा विनम्रता की चरम सीमा है। उन्हें नहीं पता था कि उनके शरीर के बाद आजाद भारत उनके विचार और दर्शन तक को मिटाने को आमादा हो जाएगा!
इस पुस्तक में, जिसका बहुत प्रभावी और रोचक अनुवाद श्री मदन सोनी ने किया है, एक बात बहुत अखरती है। यह मेरी अल्पज्ञता हो, लेकिन गाँधी हत्या के लिए इसमें कई जगह -हिन्दी पाठकों के लिए भूमिका सहित - गाँधी वध का इस्तेमाल किया गया है। भारतीय सामाजिक-राजनीतिक और उससे अधिक धार्मिक-आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में वध और हत्या में जो अन्तर समझा हूँ, उसके मद्देनजर इसे वध कहना सर्वथा अनुचित होगा। यह सरेआम हत्या कही जाएगी, भले ही कानूनी भाषा में दोनों का अन्तिम परिणाम किसी की मृत्यु कारित करना ही हो। राम ने रावण का वध किया, हम यही सुनते-बोलते आए हैं। वध दरअसल नैतिक रूप से एक मान्य कृत्य है जिसे किसी हित के कारण कारित करना स्वीकार कर लिया जाता है। खुद गोडसे बन्धु (और उनके आज के अनुयायी भी!) हमेशा गाँधी वध कहते-लिखते रहे हैं। यह एक शब्द पूरी पुस्तक में बहुत अखरता है। हिन्द स्वराज पर पश्चिमी विद्वानों की महत्त्वपूर्ण टीकाएँ आर्यन पाथ के 1938 में एक विशेषांक- रिफ्लेक्शंन्स ऑन गाँधीजी’ज हिन्द स्वराज- के रूप में प्रकाशित हुई। जाहिर सहमति-असहमतियों के साथ ही कुछ विद्वानों ने कुछ बेहद जरूरी मुद्दों पर गाँधी की दृष्टि से असहमति होने के उपरान्त भी मूल भाषा में उनके मंतव्य को समझे बिना उन पर, उनके गहरे विरोध के बावजूद कोई तीक्ष्ण टीका नहीं की। सन्देह का यही लाभ, हम भी लेखक-अनुवादक को यहाँ हत्या बनाम वध के प्रयोग के मामले में दे सकते हैं।
अपनी बात, किताब के अन्त में वर्णित मार्टिन लूथर किंग के उस कथन के साथ करना चाहूँगा कि आज विकल्प हिंसा और अहिंसा के बीच चुनाव का नहीं है। विकल्प एक ही है - अहिंसा या अस्तित्व की समाप्ति। गाँधी को खो कर क्या हम अपने अस्तित्व की समाप्ति की ओर अग्रसर नहीं हैं? सवाल बहुत है, जवाब देने वाला एक महात्मा ही नहीं है।
ठाँय। ठाँय। ठाँय। हे राम! राम राम।

पुस्तक : गाँधी और अकथनीयः सत्य के साथ उनका
अन्तिम प्रयोग (2020)
लेखक : जेम्स डब्ल्यू डगलस
अनुवाद : मदन सोनी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 250/-
विधा : निबन्ध

सम्पर्क : 505, एमरल्ड-यूडीबी,
नंदपुरी अंडर पास, मालवीय नगर,
जयपुर-३०२०१७. मो. ९९२८८६१४७०