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मधुमती की गौरवपूर्ण साहित्यिक यात्रा

हेतु भारद्वाज
मधुमती राजस्थान प्रदेश की एकमात्र ऐसी पत्रिका है जिसकी अखिल भारतीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान है। यह राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की मासिक पत्रिका है। इस पत्रिका ने छह दशक की काफी लम्बी यात्रा तय की है। अकादमी की स्थापना के बाद लम्बे अर्से तक जनार्दन राय नागर और उनके उपग्रहों का वर्चस्व रहा। मधुमती प्रारंभ में त्रैमासिक के रूप में निकलती थी तथा उसका संपादन नागर के उन शिष्यों के हाथ में रहा, जिनके पास न साहित्यिक समझ थी, न कोई स्पष्ट दृष्टि थी। कृपा-कटाक्ष से चाहे जिसको इस पत्रिका का संपादक बना दिया जाता था ताकि एक व्यक्ति उफत और लाभान्वित हो सके। धीरे-धीरे यह पत्रिका मासिक हो गई, पर इसके संपादन को लेकर कोई गंभीर नीति नहीं बन पाई। ऐसा भी समय आया जब एक व्यक्ति को एक वर्ष के लिए संपादक बनाया जाता था। इससे पत्रिका की कोई स्पष्ट छवि नहीं बन पाई।
कालान्तर में डॉ. प्रकाश आतुर जब राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पहली बार बने, तो उन्होंने इस संस्था को प्रजातांत्रिक बनाया तथा प्रदेश के समस्त लेखक समुदाय को अकादमी के साथ जोडा। संपादक के रूप में उन्होंने मधुमती को व्यापक फलक दिया। उनके कार्यकाल में प्रदेश तथा देश के अधिसंख्य लेखक इस पत्रिका से जुडे और उनके प्रयासों से मधुमती हिन्दी की प्रतिनिधि साहित्यि पत्रिका के रूप में प्रतिष्ठित हुई। अपने तीसरे कार्यकाल में उनका निधन हो गया। मैं उनके पहले कार्यकाल में मधुमती से जुडा था- उपाध्यक्ष के रूप में भी। उनके निधन के बाद दस अंक मेरे संपादन में निकले तथा इस पत्रिका की छवि निरन्तर निखरती गयी। डॉ. पूनम दईया के अध्यक्ष बनने पर कुछ ऐसी स्थितियाँ बनीं कि मधुमती का संपादन डॉ. नवलकिशोर, हेतु भारद्वाज और डॉ. फूलचंद पाठक आदि को करना पडा।
अध्यक्ष के रूप में जर्नादन राय नागर के बाद सबसे लम्बा कार्यकाल डॉ.प्रकाश आतुर का रहा। वे उदातदृष्टि के धनी थे। अतः उनके कार्यकाल में मधुमती का रंग-रूप निखरा। कालान्तर में सत्ता परिवर्तन के साथ दक्षिणपंथी विचार से प्रेरित होने के कारण पत्रिका का स्वरूप संकुचित होता गया।
साहित्य और साहित्यकार किसी भी पंथ का नहीं होता। वह तो सदैव प्रतिपक्षी होता है और वही उसका स्थान भी है।
इस समय सत्तासीन सरकार को आए लगभग तीन वर्ष बीत चुके हैं, पर अभी भी प्रदेश में अकादमियों की नियुक्तियाँ लम्बित है। क्योंकि अकादमी के विधान के अनुसार अध्यक्ष की नियुक्ति प्रदेश की निर्वाचित सरकार को करनी होती है। अतः अकादमियाँ इंतजाररत है।
पर हाँ, इस सरकार ने एक श्लाघनीय कार्य किया कि उन्होंने बीकानेर के हिन्दी प्राध्यापक और युवा लेखक ब्रजरतन जोशी को पत्रिका के संपादन का कार्यभार सौंपा। डॉ. जोशी ने इस सारस्वत कार्य को पूरी निष्ठा और साहित्यिक प्रतिभा के साथ सम्हाला है तथा उन्होंने हिन्दी की रचनाशील मनीषा से इस पत्रिका को जोड दिया है। डॉ. जोशी ने एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह किया जो रचनाकार रेखांकित होने से रह गए अथवा छूट गए अथवा लेखक समुदाय ने जिनके कृतित्व की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, उनका उचित मूल्यांकन करते हुए रेखांकित करने का प्रयास डॉ. जोशी ने किया है। उन्हीं के प्रयासों से यशदेव शल्य, मुकुन्द लाठ जैसे चिन्तक रचनाकारों के कृतित्व तथा योगदान को व्यापक परिदृश्य के सामने लाया जा सका। आज मधुमती हिन्दी की एक जरूरी पत्रिका बन गई है। यह हमारे लिए गौरव की बात है। डॉ. ब्रजरतन जोशी इस हेतु बधाई के पात्र हैं।
- हेतु भारद्वाज

* लेखक राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं संपादक के साथ देश के वरिष्ठ साहित्यकार भी है।