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मन्नू भण्डारी : धुँधले जीवन की उजली तस्वीर

-ब्रजरतन जोशी
सरलता और सहजता मनुष्य जीवन को अंधकार से आच्छादित करने वाली परछाइयों से मुक्त करती है। खासकर तब जब हमारे जीवन पर बरर्बता, विवेकहीनता और मूर्खताओं का दबाव बढता ही जा रहा हो। गुटबन्दी, घृणा और भावनात्मक शोषण के बीज सहजता, सरलता का पनपना और केवल पनपना भर नहीं है, बल्कि पनपने के साथ खिल उठना एक अजूबे की तरह लगता है।
मन्नू भण्डारी का लेखन इस अजूबे का प्रत्यक्ष प्रमाण है। क्योंकि हमारी विवेकहीनता प्रायः हमें आदर्श को रौंदकर व्यवहार के मार्ग पर अग्रसर होने की ओर पूरे जोर से ठेलती है। मन्नू भण्डारी का लेखन इस जोर के प्रतिरोध में ठिठका खडा है जो अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं करना चाहता, पर शक्तिशाली को यह पाठ अवश्य ही पढा देना चाहता है कि आत्मवान होना अधिक सम्पन्न और प्रभावी होता है। मन्नूजी का लेखन इस तथ्य का प्रमाण है कि उनका रचनाकार किन्हीं विचारों, गुटों या व्यक्तित्त्वों के दबाव को मानकर नहीं वरन् जीवन को उसकी समग्रता में जाँचकर आगे बढने वाला है। यह जो जानना है यानी समझ के अनछुए पहलुओं को छूना, अलक्षित को लक्षित करना और बेबूझ को बूझना यही तो रचना प्रक्रिया का मूल है। किसी भी रचनाकार के सृजन में अभिव्यक्त हुए अनुभव की आकृति से ही उसका मूल स्वरूप बनता है।
मन्नू भण्डारी का रचनाकार अस्तित्त्व की तीन परिस्थितियों होना, करना और पाना के जरीये जीवन की अपनी तरह की व्याख्याएँ करता है। कहना चाहिए उनकी रचनाशीलता में यह क्रम उल्टे चलकर यानी पाने, करने और होने की राह से सम्पूर्ण को समझने की विरल चेष्टा करता है। इसलिए हम देखते हैं कि उनके पात्र/चरित्र स्वयं के अस्तित्व को पहचान देने या योग्य होने की अपेक्षा में दूसरों को उनके होने की गरिमा देना ज्यादा पसन्द करते हैं। उनके लिखे महाभोज और आपका बंटी हमारे मन को झकझोरने वाले प्रभावी साहित्य का उत्कृष्ट नमूना है। वे हिन्दी के उन गिने-चुने रचनाकारों में अग्रणी है कि जिनका लिखा हमें आत्त्मिक स्वतंत्रता की ओर अग्रसर करता है।
एक श्रेष्ठ रचनाकार जीवन के विस्तृत परिदृश्यों को न केवल देखता ही है बल्कि स्वतंत्रता पर होने वाले आघातों और बाधाओं से दो हाथ करते हुए, अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर निर्णय की राह पर आगे बढता है। मन्नूजी के पात्र इसकी जीवन्त मिसाल हैं। कभी डॉ. नामवरसिंह जैसे आलोचक ने उनकी भाषा को सपाट कहकर उनके रचनात्मक महत्त्व को कम आँका था, लेकिन यदि ध्यानपूर्वक देखें, तो उनकी प्रगाढ अनुभूति की अभिव्यक्ति उनकी इसी सपाट भाषा में हिन्दी में अपनी तरह की एक जगह ही नहीं बनाती वरन् प्रतिष्ठा भी हासिल करती है, वह भी ऐसे समय में जब हिन्दी के पटल पर आन्दोलनों, अक्रामक विचारधाराओं और नाना प्रकार के वर्चस्वों की असरदार उपस्थिति हो। ऊपर हमने जिस सहजता और सरलता से रसे-पगे अनुभव का जिक्र किया, वही अनुभव उन्हें मन्नू भण्डारी होने के गौरव से अभिसिक्त करता है। उनकी भाषा न तो किसी चंचल हिरणी की तरह कुलाँचें मारती है और न ही किसी जंगली पशु की तरह अक्रामक है। उनके पात्र आस-पास पसरे जीवन की अतल गहराइयों के राज को बेपर्दा करते हैं।
उनके लिखे अक्षर इन अर्थों में भरोसे के अखर हैं क्योंकि वे अपने लिखे से न तो किसी को मिटाती है, न घटाती है, न उठाती है, न पटकती है। बल्कि वे तो मन, आत्मा या शरीर पर बढ रहे दबावों से मुक्त होने की राह सुझाती है। उनका लिखा हमें अपनी ही बनाई जकडनों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। उनका लिखा इसलिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वे बार-बार विस्मृति और अवसाद में धँसते जीवन में हमें अपने होने के बोध का स्मरण कराती है। उनकी रचनाओं में इस अहसास को भली-भाँति महसूस किया जा सकता है। इसलिए हम देखते हैं कि उनके रचना संसार में उनके प्रमुख पात्र केवल प्रभाव बढाने, दिखाने में या बनाने में नहीं लगे होते, वरन वे व्यक्तिगत जिम्मेदारी को वरीयता देते हैं। विचारशीलता के इस अनोखे ढंग के कारण ही वे अपने समय के मूर्धन्यों के मध्य अपनी पहचान और जगह बना पाई।
उनके लेखन ने हिन्दी में बनी-बनाई धारणाओं को भी ध्वस्त किया। क्योंकि प्रायः देखा यह गया कि रचनाकार अपनी संवेदना के संतरण का वह उपयोग नहीं कर पाता जो उसे करना चाहिए। इसके बरअक्स वह भाषाई कौशल और विचारों की सघन उपस्थिति को पर्याप्त महत्त्व देता है।
मन्नू भण्डारी का लेखन अनुभव सिद्ध आत्मवान रचनाकार का लेखन है जिसे अपनी सघन, सान्द्र और सूक्ष्म अनुभूति पर अनन्य विश्वास है। इसलिए वे आन्दोलनों के दौर में भी आन्दोलनों से अलग अपनी एक गरिमामय उपस्थिति का अनूठा एकान्त रचती है। उनके पात्र भी बडे -बडे बोल नहीं बोलते। वे तो बस अपनी वेदना को अपनी आवाज देते हैं। उनकी आवाज की ध्वनियों और अर्न्तध्वनियों के नाद से जीवनकी धुँधली होती जा रही तस्वीर उजली हो उठती है। संत्रास, भय और भावात्मक शोषण के साथ कईं तरह के प्रभावों एवं दबावों ने जीवन के उजले पक्ष को प्रभावित किया है, पर कहते हैं कि अन्धेरा कितना ही घना हो प्रकार की एक अदद किरण उसका नाश कर आलोक से भर देती है। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, सम्बन्धों की परस्पर समस्यात्मकता और उनसे उठते कईं प्रश्नों के विचलन को उनकी मौलिक दीठ हमारी मनोदशा को संतुलित करते हुए साफ और स्पष्ट कर देती है। यह साफ एवं स्पष्ट करना सम्बन्धों के शास्त्र की एक नवीन, किन्तु दृष्टिपूर्ण व्याख्या है जिसे उनका रचनाकार बखूबी रचता है। सम्बन्धों के द्वन्द्वों को अपनी अनुभव और दृष्टि की गहराई से भाषा तल के पार जाकर देखना और फिर उसे भाषा के तल अभिव्यक्त करने को वे इस तरह करती है कि जैसे किसी सफेद कपडे को नील देकर उसके उजलेपन और मूल रंग को और अधिक स्वच्छ कर दिया गया हो।
श्रेष्ठ रचनाकार का एक लक्षण यह भी है कि वह जीवन को समग्रता से देखता और जानता है, साथ ही जीवन की असंख्य स्थितियों की एम.आर.आई करते हुए उसकी व्याधियों के केन्द्र तक जाता है, ताकि मूल रोग का निराकरण आसानी से किया जा सके। उनका लिखा जीवन की एमआर आई है जो करोडों-करोडों खट्टे-मीठे अनुभवों को एक साथ उनके मूल में न केवल देख, जान ही लेता है, बल्कि उनकी व्याप्ति के प्रभाव के चलते हो रही उथल-पुथल को ही हमारे सामने रख देता है। उनका रचनाकार जीवन के किसी एक पक्ष की तरफदारी नहीं करता। वह तो बस अपने पाठक को जगा देता है। आपका बंटी ने हजारों जीवनों को जगरूक बनाकर के साहित्य की आलोचना करने वालों के इस प्रश्न को करारा जबाब दिया कि साहित्य से जीवन के व्यावहारिक धरातल पर कुछ भी नहीं होता। ये किस्से-कहानियाँ तो केवल पढने में अच्छे लगते हैं। जो काम देश का प्रशासन, परिवार और अन्य संस्थाएँ नहीं कर पा रहे थे, उस काम को आपका बंटी ने अपनी आत्मीयता, सरलता और सहजता से सम्पन्न किया, यह अपने आप में एक मिसाल है।
वे मात्रा में कम लिखती रहीं, पर गुणवत्ता में उनका लिखा कईं पीढियों पर भारी पडता है। वे अपने समय एक त्रयी जिसमें कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा के साथ स्वयं भी थी। न किसी से कम न अधिक वे मन्नू भण्डारी थीं।
हिन्दी कहानी में जब मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा जैसे दिग्गज रचनाकारों का नेतृत्व हिन्दी कहानी को एक नए रास्ते पर ले जा रहा था, तब उनके रचनाकार ने कभी किसी सरणि को नहीं चुना। वे तो बस अन्तर से उठती आवाज का शाब्दिक जादू बिखेरती रही। उनकी आवाज का यह जादू तमाम आन्दोलनों, विमर्शों और अक्रामक वैचारिक चैकन्नेपन से बचते हुए अपने आनुभाविक सौन्दर्य, निष्ठा और होने की प्रबल उपस्थिति के साथ पाठकों के माथे चढकर बोलता है। महाभोज के सैकडों मंचन और आजतक उसकी लोकप्रियता अविश्वसनीय-सी जान पडती है। सचमुच, उनका लेखन एक बडी परिघटना है। आलोचकों की आलोचना की चिन्ता किए बगैर उन्होंने अपनी रचनाशीलता के सत्त्व को सुरक्षित एवं संरक्षित रखा। उनका लिखा परम्परा, पुरुषार्थ और संतुलन की संगम स्थली है। इसलिए वे एक साथ कईं तलों पर पाठक के साथ रू-ब-रू होती है और अपने पाठक को समझाती या दीक्षित नहीं करती वरन् झिंझोडकर आगे बढ जाती है। सम्मानों, अलंकरणों से दूर नितान्त मौन और एकान्त से सजा-सँवरा उनका व्यक्तित्व हमारी पीढी को उत्तेजना नहीं, प्रेरणा प्रदान करता है। ऐसी प्रेरणा जो जीवन को सात्त्विक रूप से देखती-परखती है और वह सात्त्विकता ही उनकी मूल पूँजी है जिसके कारण वे हिन्दी की अपनी तरह की विरल लेखिका मन्नू भण्डारी होने को सार्थक सिद्ध करती है।
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इस अंक में कुल छब्बीस रचनाएँ हैं जिनमें क्रमशः दो विशेष स्मरण, दस मन्नू भण्डारी पर केन्द्रित लेख, पाँच आलेख सहित अनुवाद, कहानियाँ, कविताएँ, समीक्षा शामिल है। मन्नू भण्डारी पर अत्यल्प समय में लेखकों ने जो प्रामाणिक सामग्री हमें उपलब्ध करवाई उसके लिए मधुमती परिवार अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है। मन्नूजी के विराट व्यक्तित्व को दस आलेखों में बाँधना निश्चय ही एक सीमा है, पर हमारा विश्वास है कि इसी ससीम से हम उनकी असीम अनुभव जगत की झलक और कौंध को देखने में समर्थ हो सकेंगे।
इस अंक के लिए हिन्दुस्तानी संगीत और महात्मा गाँधी विषय पर बहुत ही शोधपूर्ण सामग्री अन्वेषी पंकज पराशर के आलेख से हमें पढने को मिलेगी।
इस अंक के संवाद निरन्तर कॉलम में हमारे समय के मूर्धन्य अध्येता गोपाल प्रधान ने अपने विचार हमारे साथ साझा किए हैं।
मधुमती परिवार की यह सतत् चेष्टा रही है कि हम आफ लिए निरन्तर रचनात्मक उत्कर्ष की भावभूमि तैयार करें।
समय-समय पर राज्य एवं केन्द्र सरकार की ओर से कोविड-19 के लिए जारी किए गए निर्देशों की पालना सुनिश्चित करें।
अंक की आपकी प्रतिक्रियाओं का और विश्लेषणात्मक सुझावों का इंतजार रहेगा।
नववर्ष की अग्रिम शुभकामनाओं के साथ-
- ब्रजरतन जोशी