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युवा लेखन की राह

-ब्रजरतन जोशी
युवा लेखन या कहें नवलेखन को लेकर कईं विचार प्रचलन में हैं। विचारकों के एक वर्ग का मानना है कि समकालीन नवलेखन वस्तुतः नकल लेखन है। वह अंधानुकरण का उत्तम उदाहरण है। विचारकों का दूसरा वर्ग मानता है कि नवलेखन अधिकांशतः प्रभाव प्रेरित लेखन है और वह प्रभाव पश्चिम का है। इसके बरअक्श विचारकों का एक तीसरा वर्ग भी है जो यह मानता है कि नवलेखन की जडें अपनी परम्परा में हैं और वह अपनी धरती, अपनी हवा,अपने प्रकाश और पानी के बल पर पुष्पित-पल्लिवत हो रहा है।

दरअसल ये सारे विचार हिन्दी अथवा किसी भी भाषा के नवलेखन के संदर्भ में बहुत सतही अथवा स्थूल विचार हैं। गहराई से देखें, तो ये हमारे देखने की दृष्टि की सीमा है कि प्रायः हम सतह के आगे सूक्ष्म पर्यवेक्षण की राह पर अधिक नहीं बढ पाते हैं। ध्यान रहे स्थूल सदैव पहचान की प्रथम सीढी है। हम जब तक मानस के अन्तरतम् या केन्द्र तक पहुँच कर नहीं देख पाएँगे, तब तक स्वयं को खाली और उथला-उथला महसूस करेंगे। परिणामस्वरूप हमारी दृष्टि सतह पर ही अटक जाएगी और हम भटक जाएँगे।

ऐसा नहीं है कि प्रभाव या अनुकरण आज की दुनिया की ईजाद है। ये प्रवृत्तियाँ संस्कृति के हर काल- खण्ड में विद्यमान रही हैं। सरलीकरण की हमारी प्रवृत्ति और अन्तरतम के पथ पर बढने में आने वाली विचलनों के चलते हम अक्सर आसान मार्ग का चयन करते हैं। इसके अलावा हम अपनी रूचि-वैविध्य, परस्पर ईर्ष्या या स्पर्धा के कारण भी ये स्वघोषित आप्तवचन उच्चरित करना आरम्भ कर देते हैं। हम भूल जाते हैं कि प्रभाव के मूल में भी निरन्तर चली आ रही परम्परा बीज है और प्रभाव उससे उत्पन्न वृक्ष है। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि संस्कृति का परिसर विविध परम्पराओं के सहचर्य से ही जगमग है। अब रही बात प्रभाव या अनुकरण की अथवा किसी विशेष सरणि में विकसित होने की। ऐसा तभी होगा जब हमारा अन्तरतम अपने अनुभव से रिक्त होगा और यह हमारा स्वभाव है कि हम अपने अभाव को पूरा करने के लिए किसी का प्रभाव ग्रहण कर के उसकी क्षतिपूर्ति करते हैं।

सृजन के विशेष संदर्भ में किसी भी अच्छे लेखक के लिए, विशेषकर नए लेखक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने यथार्थ को शाश्वत वर्तमान में कैसे स्थिर करे। यथार्थ को शाश्वत वर्तमान में स्थित करने के लिए नए लेखक को परम्परा से रस ग्रहण कर अपनी ग्रहणशीलता को विकसित करना होता है और अपने मैं का स्थगन करते हुए लेखकीय व्यक्तित्व की अद्वितीयता को हासिल करना होता है। ऐसे लेखक के लेखन से तादात्म्य स्थापित करने में पाठक को किसी भी असुविधा का सामना नहीं करना पडता। क्योंकि उसकी रचना में अभिव्यक्त अनुभव एक सार्वजनीन अनुभव में परिवर्तित हो जाएगा और उसकी सम्प्रेषणीयता भी बढ जाएगी।



प्रत्येक लेखक की अपनी अन्वेषण यात्रा होती है। अपने अन्वेषण में वह सदैव दो आधार बिन्दुओं पर अवश्य ही सजग रहता है। एक- वह अपने अनुभव की आकृति यानी शिल्प को जिस विधा विशेष में अधिक लयबद्ध और संगत पाता है, उसी में अपने सृजन को साकार करता है। दूसरे, वह अपने सृजन के समय अनुभूति की आवयिक एकता के साथ झलकने वाले श्रेष्ठ रूप को अभिव्यक्त करता है। एक श्रेष्ठ लेखक खासकर, युवा लेखक के पास कल्पनाओं का असीम भण्डार होता है और अभिव्यक्ति की अनन्त पगडण्डियाँ। वह अपने स्वअर्जित विवेक से यह तय करता है कि इन अनंत पगडण्डियों में से मुझे अपनी यात्रा किस पगडण्डी को अपना कर सम्पन्न करनी है और अपने अनुभव संसार के असंख्य अनुभवों में से किन अनुभवों को छोडना है और किन-किन का चयन करना है।

अतः जब भी परिपक्व युवा लेखक अपने पथ पर आगे बढेगा, तो वह जिस महत्त्वपूर्ण आयाम पर विशेष गौर करेगा, वह है रचना की मर्मस्पर्शिता। आज का अधिकांश युवा लेखन भाषा के अपने अजब-गजब संसार के समक्ष अपनी मर्मस्पर्शिता को आहत कर के आगे बढ रहा है। इसलिए आलोचकों को सरलीकरण में जरा सुविधा हो जाती है। लेकिन सजग और चौकन्ना युवा लेखक इस बात को सदैव प्राथमिकता में रखता है कि उसके लेखन पर वैचारिक आक्रामकता और चौकन्नापन हावी न हो। वह अपने पाठक के लिए एक जंगल के बरअक्स दूसरा जंगल कभी खडा नहीं करता। हमारी परम्परा का समूचा श्रेष्ठ साहित्य इसका उदाहरण है।

युवा लेखक के लिए अपनी भाषा और मुहावरा विकसित करना इस अर्थ में एक चुनौती होती है कि उसे अपनी हर रचना में स्वयं को तोडकर स्वयं को बनाना होता है। कह लें रोज नया कुँआ खोदना और रोज नया पानी पीना होता है। यह लेखकीय हुनर उसमें स्पष्ट दृष्टि, तार्किकता और गहन दर्शन क्षमता के कारण विकसित होता है। इसीलिए उस्ताद किस्म के बडे लेखक किसी नए लेखक की लेखकीय संभावनाओं को इन्हीं आधारों पर पहचानते हैं। उनकी उजली नजर रचना में गुम्फित संवेदनात्मक अन्वेषण के साथ समग्रता और आवयविक एकता पर रहती है।

एक अच्छा युवा रचनाकार इस तथ्य से भी भली-भाँति परिचित रहता है कि जेवर सौ फीसदी सोने से कभी नहीं बनते। उसमें कुछ खाद तो सुनार को मिलानी ही पडती है, तभी वह सोने को विभिन्न आभूषणों में परिवर्तित कर पाता है। यह खाद मिलाना ही साहित्य सृजन, कला है। क्योंकि वह जानता है कि जीवन साहित्य नहीं है, लेकिन जब जीवन भाषा के माध्यम से साहित्य में रूपान्तरित होता है, तो वह हमें एक अद्वितीय अनुभव से सम्पन्न कर देता है। इन्हीं अर्थों में कला कुछ जोडने के साथ-साथ सामानान्तर जीवन का निर्माण करती है। यहाँ यह भी ख्याल रखने की जरूरत है कि साहित्य का जीवन हमारे जीवन से अलग नहीं है। वह हमारे ही जीवन की अनन्त संभावनाओं से एक दृष्टि सम्पन्न चयन का मूर्त शब्दांकन है। इन अर्थों में एक श्रेष्ठ सृजक उस चिकित्साकर्मी की तरह है जो अपने यंत्रों से मरीज के रोग का अन्वेषण करता रहता है, पर स्वयं अपने स्वास्थ्य को उससे प्रभावित नहीं होने देता।

युवा लेखन के सम्बन्ध में हमारा मत सरलीकरण करने वालों के साथ नहीं है वरन् हमारा यह मानना है कि युवा लेखन में कुछ भी ग्राह्य नहीं है, ऐसा कहना सृजनशीलता का अपमान है। उन्हें आगे बढकर हमारे समय की युवा रचनाशीलता और अभिव्यक्ति के मार्गों का सहचर्य हासिल करना होगा, तभी वे स्वयं को सरलीकरण से मुक्त कर पाएँगे और हमारे समय के श्रेष्ठ सृजन से रू-ब-रू हो पाएँगे।

हमारी अपनी परम्परा में कहा भी गया है-

अमंत्र अक्षरं नास्ति-नास्तिमूलं अनौषधि।

अयोग्य पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः।।

अर्थात् हर अक्षर में मंत्र विद्यमान है, हर पादप में औषधि, सृष्टि में आया कोई मनुष्य अयोग्य नहीं। हाँ क्षमता और ऊर्जा की मात्रा का भेद तो हो सकता है, पर क्षमता और ऊर्जा तो सब में है ही। वास्तव में दुर्लभ है वह दृष्टि जो सबमें उनकी विद्यमान क्षमता और संभावनाओं के बोध को पहचान सकती है।

हमारी परम्परा में कविर्मनीषिः स्वयंभू ऐसे ही नहीं कहा गया है। क्योंकि एक सृजक अपने दृष्टिबोध से इस चर-अचर जगत के प्रति संवेदनशील होकर, मुक्त भाव से चिन्तन करता है। उसका निर्मल चित्त सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों से मुक्त होता है। हाँ, यह कहा जा सकता है कि आज के युवा लेखन में ऐसी परिपक्वता की मात्रा थोडी है। लेकिन यह कहना कि वे किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है, गलत होगा।

आज के युवा लेखन पर एक आरोप यह भी है कि वह एक प्रकार का यांत्रिक लेखन है। उसमें अनुभवजन्यता नहीं है। इस उत्तर आधुनिक और उत्तर सत्य के दौर में पुस्तकीय ज्ञान की मात्रा और वर्चस्व के साथ सूचना के उमगते सैलाब ने हमारी अनुभव क्षमता के हृतकेन्द्र को प्रभावित अवश्य किया है। युवा लेखक को चाहिए कि वे अपनी अनुभव और पर्यवेक्षण क्षमता को पर्याप्त समृद्ध करें, ताकि उनकी अनुभवगम्यता और प्रगाढ हो सके।

हमारे युवा लेखन को यह भी समझना होगा कि स्वभाव की साधना के अभाव में प्रभाव फलता-फूलता है। रचनाशीलता की राह में स्वभाव का महत्त्व अधिक है, प्रभाव का नहीं। उसे अपने प्रभावों को प्रेरणा में रूपान्तरित कर मूल स्वभाव तक की अपनी यात्रा को तय करना है और जब वह अपने मूल स्वभाव में होगा, तो वह भली-भाँति अनुभव और अनुभूति के भेद को समझ सकेगा और अनुभव की सूचना के बजाय वह अनुभव की संवेदना को व्यक्त करने के मार्ग पर अग्रसर हो जाएगा। वह अच्छी तरह से यह भी समझ पाएगा कि हर अनुभव ऐन्द्रिक और बोधपरक होता है, जबकि अनुभूति उसकी प्रक्रिया का उत्पाद होती है।

इस तेजी से बदलते जा रहे समय में युवा लेखन की राह कठिन अवश्य है, पर दुर्भेद्य नहीं। पर्याप्त मेहनत, समर्पण और प्रतिबद्धता के माध्यम से इस यात्रा को सुगम और आनन्दप्रदायी बनाया जा सकता है।

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हम मधुमती के हर अंक को आफ लिए श्रेष्ठ से श्रेष्ठ रूप में प्रस्तुत करने की हरसंभव कोशिश करते हैं। इसी क्रम में इस बार आपको मधुमती क विचार विश्व में नोबेल विजेजा अब्दुलरज्जाक गुरनाह, जवाहरलाल नेहरू से लेकर कैलाश वाजपेयी, गोविन्द मिश्र पर केन्द्रित लेखन के साथ पुरुषोत्तम अग्रवाल, कमलकिशोर गोयनका और ओम निश्चल के धारदार गद्य की बानगी देखने को मिलेगी। इस अंक के कवियों में आपको अविनाश मिश्र, अमिताभ चौधरी, आरती श्रीवास्तव और रेवतीरमण शर्मा की कविता और राजस्थानी के सुख्यात कहानीकार रामस्वरूप किसान की कहानी का चेतन स्वामी द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद भी पढने को मिलेगा। अम्बर पाण्डे का उपन्यास अंश भी आपको समृद्ध करेगा। इस अंक के संस्मरणों में चर्चित कथाकार जयशंकर पर लिखा ओमा शर्मा का संस्मरण और दियारा पर आशालता सिंह का लिखा संस्मरण आफ अनुभव में कुछ नया जोडेगा। श्रद्धा थवाईत की डायरी आपकी संवेदना के मर्म को हौले-से थपथपाएगी।

कौन हैं भारत माता हमारे समय की अपनी तरह की अनूठी पुस्तक है जो हमारे इतिहास के पन्नों को प्रामाणिक और मौलिक दृष्टि से देखने-दिखाने की गंभीर कोशिश है। नवम्बर का महीना हो और साहित्य प्रेमी राजनेता पण्डित जवाहरलाल नेहरू याद न आए, नेहरू याद आए और पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक कौन है भारत माता याद न आए यह तो संभव नहीं। इस अद्भुत पुस्तक के कुछ अंश आफ लिए इस अंक में प्रकाशित कर रहे हैं।

अपना ख्याल रखिएगा।

शुभकामनाओं के साथ --ब्रजरतन जोशी