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विश्व वैचारिकी और कवि-चिंतक कैलाश वाजपेयी

ओम निश्चल
कैलाश वाजपेयी चिंतक एवं मनस्वी कवि थे। वे जहाँ अपनी परंपरा में गहरे धँसे थे, वहीं पर आधुनिकता की पगडण्डियों के भी अभ्यासी थे। नया से नया चिंतन जो पश्चिम की आबोहवा से उठता था, उसे ग्रहण करने में वे सकुचाते न थे। यही कारण है कि उनकी कविताएँ साठोत्तर मोहभंग के साथ विश्व वैचारिकी से प्रेरित कवित्व रते हैं। अपनी पुस्तकों के प्रारंभ में विभिन्न आकर ग्रंथों से वे श्लोक प्रस्तुत करते हैं । इससे उनकी भारतीय वाङमय में पैठ नजका परिचायक हैं। वे पग-पग पर संस्कृत वांङ्मय में प्रवेश कर आती है। तीसरा अँधेरा के प्रारंभ में वे योग वासिष्ठ से एक श्लोक उद्धृत करते हैंः
कास्ता दृशो यासु न सनित दोषः
कास्ता दिशो यासु न दुःखदाहः।
कास्तु प्रजायासु न भड्गरत्वम् कास्ताः
क्रिया यासुन नाम माया।।
देहांत से हट कर संग्रह की शुरुआत वे माण्डूक्योप-निषद् के इस श्लोक से करते हैं ः
स्वतो वा परतो वापि न किंचिद्वस्तु जायते
सदसत्सदसद्वापि न किंचिद्वस्तु जायते ।
महास्वप्न का मध्यान्तर का प्रारंभ वे महाभारत के इस श्लोक से करते हैं ः
जानामि धर्मं न च मे प्रवृतितः
जानाम्यधर्मं न च मे निवृतितः
केनापि देवेन हृदि सिथतेन,
यथा नियुक्तोसिम तथा करोमि।
विवेकानंद पर आधारित जीवनवृत्त नाटिका युवा सन्यासी के दृश्य एक के प्रारंभ में भी भुवनेश्वरी आँगन के शिव मंदिर के पास बैठ कर शिव स्तुति का पाठ कर रही है। इस तरह संस्कृत के श्लोकों, मंत्रों, सूक्तों के प्रति उनकी अनुरक्ति सुविदित है। यह प्राच्यविद्या के प्रति उनका अनुराग था जो प्रारंभ से ही उनके भीतर विकसित हुआ था। वे संभवतः जान गए थे कि बिना प्राच्य परंपरा में गहरे धँसे आधुनिकता की जमीन पर पाँव नहीं टिकाए जा सकते। उनके सामने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, पं. विद्यानिवास मिश्र, भगवतशरण उपाध्याय व वासुदेवशरण अग्रवाल सरीखे समुज्ज्वल उदाहरण थे। यही कारण था कि उन्होंने भारतीय चिंतन पर आधारित अनहद है कुछ, दीखे और के निबंध लिखे, तो शब्द संसार में विश्व साहित्य एवं चिंतन की कृतियों का सार विवेचित किया और आधुनिकता का उत्तरोत्तर लिख कर साहित्य चिंतन में उत्तर आधुनिकता की आती हुई आहट पहचानी। वे इस बात से बेपरवाह थे कि परंपरा से अपने इस अनुराग के चलते वे समकालीन साहित्य और साहित्यकारों से थोडा कटते जा रहे हैं किन्तु वे जानते थे कि ज्ञान-विज्ञान और चिंतन के साथ आधुनिकता से जुडने के लिए परंपरा का अन्वेषण भी आवश्यक है।

आधुनिकता का उत्तरोत्तर, उत्तर आधुनिकता पर लिखा एक विस्तृत निबंध है जिसमें विस्तार से उन्होंने उत्तर आधुनिकता के प्रादुर्भाव, उसकी परिणति एवं व्यापित की चर्चा की है। वे इस चिंतनपरक कृति में फ्रांस के नये साहित्यांदोलन ः त्यलकल की चर्चा करते हैं। नास्तित्त्व की खोखल और युगीन आशंका पर प्रकाश डालते हैं तथा इस बात की पडताल करते हैं कि क्या हम साहित्य के खात्मे के युग में जी रहे हैं। या हमारे बीच एक बेपहचान-सी सभ्यता जन्म ले रही है। वे शब्द की सत्ता और उसके अर्थबोध के अन्तरतम उतरते हैं और ब्रह्माण्ड की बंद कोठरी की रहस्यात्मकता में सेंध लगाते हैं। वे नियोग, मिथुनेतर सृष्टि, यांत्रिकता और मानविकी, माक्र्सवाद की परिणति, पूँजीवाद के संध्या काल इत्यादि पर विचार करते हैं। वे ऐसे ऐसे प्रश्नों से टकराते हैं जो आदिकाल से अनुत्तरित हैं मसलन, क्या हम सिर्फ नक्षत्रों की धूल हैं? कैसी होगी इक्कीसवीं सदी या ब्रह्माण्ड का भविष्य क्या होगा? मनुष्य के भीतर पनपते प्रदूषण और स्वयं ईश्वर हो जाने की मानवीय महत्त्वाकांक्षा को वे विवेचित करते हैं। यहाँ वे उत्तर आधुनिकतावादी चिंतन की परख के लिए केवल विश्व वैचारिकी के पास नहीं जाते, बल्कि भारतीय चिंतन की सरणियों से भी गुजरते हैं।
उत्तर आधुनिकता की व्याधि भारत में पश्चिम से आई। ठीक से आधुनिक न हो सके भारत में उत्तर आधुनिकता के विमर्श होने लगे। कैलाश वाजपेयी कहते हैं, उत्तर आधुनिकता एक ही दिन में घटी घटना नहीं है। वह एक तरह की परिणति है, चाहें तो इसे दुर्गति भी कह सकते हैं, ऐसी दुर्गति जिसके बीच आदमी की तथाकथित प्रगति में ही विद्यमान थे। उत्तर आधुनिकता हर तरह के उपकरण विस्फोट से जन्मी वह अपघटना है, जिसे गरीबी के बावजूद हम सबको भुगतना है। वे उत्तर आधुनिकता और आधुनिकता की प्रवृत्तियों के आकलन के लिए माक्र्सवाद और पूँजीवाद के पारस्परिक द्वंद्व की स्थितियों तक जाते हैं और इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि आधुनिकता जब पतनोन्मुख होती है तो या तो सनकी हो जाती है या फिर दंभी। पूँजी ने मनुष्य को लोभी बना दिया। वह ईश्वरीय सत्ता को भी ठेंगा दिखा कर हिंसक रास्तों पर चल पडी। हिटलर के पोलैण्ड पर आक्रमण और उसके विरुद्ध रूस, अमरीका, जापान और ब्रिटेन के एकजुट होने तथा हिरोशिमा नागासाकी के जल कर राख होने के पीछे यही पूँजी के सर्वभक्षी तंत्र हैं। औद्योगिक क्रांति व विज्ञान की खोजों ने गर्भनिरोधक गोलियों के आविष्कार के साथ मनुष्य की मर्यादाओं एवं मूल्य को निरस्त कर दिया। वे कहते हैं इससे पाप निर्भीक हो गया। पेट्रो शक्तियाँ विश्व को अनुकूलित करने लगीं। यह शक्ति और ऊर्जा का नया खेल था। पैसे की ताकत ने विलासिता के नए नए द्वार खोले। विज्ञापनों का अनैतिक दौर शुरु हुआ। चीजों की गुणवत्ता की बजाय विज्ञापन की आकर्षक पटकथा केंद्र में आ गयी। उपभोक्तावाद और विज्ञापन कला की जुगलबंदी ने सब कुछ पण्य बना दिया। कैलाश वाजपेयी कहते हैं कि अध्यात्म, ध्यान अथवा प्रार्थना पद्धतियाँ भी कमोडिटी या चीजों की तरह बिकने लगी हैं। उत्तर आधुनिकता की ही परिणित है कि संसाधनों की पवित्रता के बजाय किसी भी तरीके से पाई गयी उपलबिधयाँ प्रमुख होती गयीं। यह मनुष्य की चेतना को अनूकूलित करने और संवेदना को भोथरा बना देने के दुष्परिणाम के रूप में सामने आया। औद्योगिक सभ्यता ने आदमी को उत्तरोत्तर ठस बनाने का काम किया है। वे कहते हैं, औद्योगिक युग में आदमी के सभी आयाम गायब हो जाते हैं और अंत में एक ही आयाम शेष रह जाता है, यह आयाम है आज के आदमी में मशीन के प्रति पाया जाने वाला मनोनिवेश। (आधुनिकता का उत्तरोत्तर, पृष्ठ 15)
कैलाश वाजपेयी ने लिखा है कि मारकूज ने औद्योगिक सभ्यता के जिन विकारों को लक्षित किया है उनमें यौन स्वच्छंदता, भडकीले वस्त्र और अंग प्रदर्शन इत्यादि है और यह सब उत्तर आधुनिकता के दौर में उत्तरोत्तर पनपता गया है। कैलाश वाजपेयी मानते हैं कि अमरीका में कविता का वातावरण नहीं है। वहाँ सिर्फ एक बनिया-समझ है जो विश्व राजनीति को जमा और उधार के चश्मे से परखा करती है। शायद इसीलिए अमरीका ने अच्छे कवि कम पैदा किए हैं। उनका कहना है कि वालेस स्टीवेंस की मृत्यु के बाद द्वितीय युद्धोत्तर लेखन से एक गिंसबर्ग ऐसे हैं जिनका नाम उनके हाउल के कारण बारम्बार लिया जाता रहा है। अक्सर हम भारतीय अपने साहित्य व संस्कृति को लेकर बहुत संवेदनशील रहे हैं। पर अमरीका के लेखक भारतीय अंग्रेजी लेखकों को किस रूप में देखते हैं, पूछने पर कथालोचक लेजली फील्डर का कहना था, भारत के पहले और अंतिम एक ही लेखक हैं जिनसे अमरीकी परिचित हैं और वे हैं टैगोर। असल में भारत के लेखक हमारे लिए न प्रासंगिक हैं और न महत्त्वपूर्ण। (आधुनिकता का उत्तरोत्तर, पृष्ठ 58)
आधुनिकता का उत्तरोत्तर में कैलाश वाजपेयी ने साहित्य के खात्मे, बेपहचान सभ्यता का जन्म, ब्रह्माण्ड की बंद कोठरी ः वैज्ञानिकों की रहस्य भाषा पर भी विचार किया है। कैलाश वाजपेयी केवल कविता की रचना में ही निमग्न नहीं रहते थे, बल्कि खगोल, ब्रह्माण्ड, वैशिवक परिवर्तनों, विचारधाराओं के परिणतियों, पूँजी के वर्चस्व और उसकी विकृतियों, युद्धोन्मादी संस्कृति पर भी उनका सतत अध्ययन था। वे भारतीय वाङ्मय के गहरे अध्येता थे, संतों की परंपरा को गहरे से जिया था। अनहद और है कुछ, दीखे और के निबंध गवाह हैं कि वे भारतीय प्राचीन वाङमय में रमे हुए व्यक्ति थे। इसकी आभा उनके काव्य डूबा- सा अनडूबा तारा व पृथ्वी का कृष्ण पक्ष में देखने को मिलती है। महास्वप्न का मध्यान्तर या सूफीनामा ही लें जो कि सर्वोत्कृष्ट काव्य के उदाहरण हैं, इनमें महाभारत, मिथक या भारतीय संस्कृति का पारस्परिक सहकार देखने को मिलता है। एक नैतिक किस्म की उदात्तता उन्हें मथती रहती थी। उनके भीतर एक कृष्णमयता थी जो उनके भीतर के लीला पुरुष को भक्ति और रस में डुबोए रखती थी। अनेक ऐसी शखिसयतों- साहित्यकारों, संत-दार्शनिकों- कबीर, स्वामी हरिदास, सूरदास, जे कृष्णमूर्ति, बुद्ध व रामकृष्ण परमहंस पर फिल्म बना कर उन्होंने उनके प्रति न केवल अपनी प्रणति व्यक्त की, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि ऐसे लोग ही धरती पर अवतारी पुरुष कहे जा सकते हैं। भारत के निर्माण में ऐसे लोगों का सम्यक सहकार है।
उन्होंने लिखा भी है, मैं अगर अपने विद्यार्थी जीवन से अब तक की अपनी जीवन यात्रा के पृष्ठ पलटूँ तो लगता है मुझे संन्यासी हमेशा से आकर्षित करते रहे। प्रारंभिक वर्षों में मेरे नानाजी खासे समृद्ध होने के बावजूद तपस्वी जैसा जीवन जीते थे, मेरा आदर्श रहे। (युवा संन्यासी, प्राक्कथन) उनके अध्ययन की कोई सीमा न थी। वात्स्यायन, विवेकानंद, गोर्की और प्रेमचंद के साथ ही खलील जिब्रान, माक्र्स, महावीर, धम्मपद, शंकरवेदांत और तमाम भारतीय विदेशी दार्शनिकों को उन्होंने किशोर वय से ही पढना प्रारंभ कर दिया था। अक्सर वे जिस पर फिल्म या वृत्तचित्र बनाते, उसमें खो जाते। रामकृष्ण परमहंस पर वृत्तचित्र बनाने के लिए दक्षिणेश्वर गए, तो उनका जीवन चरित पढते हुए अक्सर समाधि के अनुभवों के प्रति उत्सुकता पनपती। नींद पता है, जागृति पता है, पर यह समाधि क्या है, जानने की उत्सुकता रहती। दक्षिणेश्वर रह कर ही यह भी मन में ठाना कि कभी विवेकानंद पर भी लिखना है, सो बाद में युवा संन्यासी नामक नाटक लिख डाला। उन्हें विवेकानंद के भीतर साधक, चिंतक, योगी, परिव्राजक, वेदांती सबका समामेलन लगा। मानव मंदिर में प्रतिषिठत आत्मा को पूजा की इकाई मानने वाले विवेकानंद ने उनके स्वत्व को जगा दिया। उनका यह कहना उन्हें हमेशा रोशनी देता रहा कि मैं उसी को महात्मा मानता हूँ जिसका हृदय गरीबों के लिए रोता है, अन्यथा वह दुरात्मा है ।
वे जब विवेकानंद के जीवन की तमाम बातों को पढते हैं, तो उनके भीतर से कोई सवाल करता हुआ मिलता है कि आखिर इस तमाम भागदौड, समृद्धि, या ज्ञान का अर्थ क्या है? एक संसार हमें मिला है, स्वयंभू सृषिट, इसी के समानांतर एक और दुनिया है जो आदमी ने बनाई है.....पंख पहियों और तारो पर भागती, भोग के लिए उकसाती, परिचय को निर्वैयक्तिक करती, एक आयाम वाले लोगों को जन्म देती, खाली और खोखली। वे कहते हैं, पूर्व हो या पश्चिम, दुख लगातार बढ रहा है। ऐसे में उन्हें विवेकांनद जैसे संत योगी एवं महामानव कहीं अधिक विश्वसनीय लगते हैं। वे उन्हें खींचते रहे हैं। उनके कवि व्यक्तित्व की परख तब तक अधूरी रहेगी, यदि उनके भीतर के चिंतक दार्शनिक व संत सरीखे व्यक्तित्व की खूबियों और चिंतन पर बात न की जाए। उनके विचारों की श्ाृंखला की कडियाँ तब खुलती हैं जब वे विवेकानंद सरीखे संत योगी के जीवन क्रम को अपने नाटक युवा सन्यासी में दुहराते हैं। पर क्या केवल दुहराते हैं या उनके समानांतर एक वैचारिक यात्रा करते हैं। देखत तुमहिं तुमहिं होइ जाई वाले भाव से। युवा संन्यासी नाट्य कृति के बहाने वे वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक, सृषिट, द्वैत, अद्वैत, आसितक- नासितक, आत्मा, ब्रह्म, संन्यास, मोक्ष, साधना, अपरिग्रह, अस्तेय, भारतीय दर्शन एवं चिंतन, पूजा, समाधि, ईश्वर,अनीश्वर, विद्या- अविद्या की प्रतीतियों में उतरते हैं। कन्याकुमारी में समुद्रतट पर स्वामी विवेकानंद के ये विचार उनके अपने विचार-से लगते हैं जिसमें वे कहते हैं -
यह मेरा देश है, सदियों से गुलाम, भूख, महामारी और तरह तरह की रुढियोंसे ग्रस्त। एक ओर अधिकार मद वाले लोग हैं, दूसरी ओर लाखों अभावग्रस्त लोग। एक ओर मेरे देश के लोग वसुधैव कुटुम्बकम् का नारा लगाते हैं दूसरी ओर अपने भाई की चिता पर खिचडी पकाते हैं। जो शिक्षित हैं, वे पाश्चात्य प्रभाव में आकर स्वेच्छाचारी बन गए हैं । वे रहते इसी भूमि पर हैं, अन्न यहाँ की मिट्टी का खाते हैं, मगर मन से कहीं किसी विदेशी उद्यान में हवा खाते हैं, क्या यह सचमुच अवतारी पुरुषों की लीलाभूमि है ओ माँ । मुझे शक्ति दे कि मैं शरीर रहते कुछ कर पाऊँ, इस सोये देश की निद्रा तोड पाऊँ! (युवा संन्यासी, पृष्ठ, 67) विवेकानंद के भीतर से उभरे इस चिंतन से कहीं न कहीं कैलाश वाजपेयी का भी अपनापा रहा है। उनके भीतर के चिंतक और दार्शनिक ने विचारों की ऐसी ही साधु संगत से दीक्षा पाई थी।
पारिस्थितिकी को लेकर कैलाश वाजपेयी का चिंतन सदैव क्षीण हो रही प्रकृति को बचाने के लिए प्रतिश्रुत रहा है। उत्तरोत्तर औद्योगिक क्रांति और पूँजीवादी वैचारिकी के चलते दुनिया बाह्य प्रदूषण के साथ-साथ मानवीय रूप से कहीं अधिक प्रदूषित होती गयी है । वे पृथ्वी को प्रदूषित करने वाली महाशक्तियों के पृथ्वी सम्मेलन में चिंता प्रदर्शित करने को लेकर चिंता करते हैं। वे इस संबंध में विचार करते हुए पाते हैं कि लम्बे समय तक मनुष्य ने जीवन जिया, फिर पहला मोड उसके जीवन में तब आया, जब उसनेआग पैदा की। दूसरे मोड पर उसने अन्न को जाना और तत्पश्चात व खेतिहर बना। पर इसके बाद के आदमी की प्रगति का सारांश यह कि वह सृषिट का सबसे ज्यादा खतरनाक और घातक जीव बन गया है या फिर माना जाने लगा है। (आधुनिकता का उत्तरोत्तर, पृष्ठ 158) वे इस बात से चिंतित दिखते हैं कि पहले प्रकृति को नष्ट करो, फिर उसे बचाने के लिए मुहिम चलाओ। वे इस बात पर हैरत करते हैं कि उत्तरोत्तर माँसाहारियों की संख्या बढ रही है। मनुष्य जीव और वनस्पतियों दोनों को मारे डाल रहा है बिना इस बात की परवाह किए कि वन और वृक्ष ही उसके लिए प्राणवायु बनाते हैं। (वही, पृष्ठ 16॰) इसीलिए एक कविता में उन्होंने तरु देवो भव का आहवान किया और धरती माँ से प्रार्थना की है कि मैं गिरता पडता आदमी पस्त हो चुका हूँ/ जन जीवन की कडवाहट झेलते/ ओ धरती माँ/ मुझे वृक्ष बनाना अगली बार/ जैसे ही बंद बंद-सी आँख बंद हो। (हवा में हस्ताक्षर, पृष्ठ 31)
ऐसे पृथ्वी सम्मेलनों ने ही शायद उनके भीतर के कवि को सचेत किया और उससे नवक्रांति जैसी कविता लिखवाई जिसमें उन्होने साफ कहा, तुम अगर परिवर्तन के पक्षधर हो/ मिट्टी से शुरू करना/ जो बाँझ हो रही है/ वृक्षों से शुरु करना जिनका वध हो रहा है बेरहमी से/ वायु से शुरु करना जिसका दम घुटा जा रहा है/ नदियों से शुरु करना जिनका यौवन रोज लुट रहा। (वहीं, पृष्ठ 13) कैलाशजी ने लिखा है कि धन्वंतरि ने तो वृक्षों का एक शास्त्र ही रच डाला था। एक पत्ता तोडने के लिए भी नियम होता था, कोई पत्ता या फल तोडने के बाद पौधे से क्षमा माँगनी होती थी। पर आज क्या हो गया है। किन्तु हरीतिमा को लगातार नष्ट करने वाले उपकरणों के सृजन के बाद जंगल के जंगल उजाडे जा रहे हैं। पशु पक्षियों के आश्रय स्थल नष्ट किए जा रहे हैं। शहरीकरण पृथ्वी की सुंदरता को नष्ट कर रही है। तमाम वनस्पतियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं जैसे अनेक पशु प्रजातियाँ। उन्होंने यहीं उपनिषदों के कवि को याद किया है जिसने कहा था, जो व्यक्ति वृक्ष काटता है, नदी का जल दूषित करता है, वह आत्महत्या करता है।
कैलाश वाजपेयी ने इस बात पर भी विचार किया है कि कैसी होगी इक्कीसवीं सदी। उन्होंने भविष्यवादियों की इस बात को सामने रखा कि उद्भिज, स्वेदज, अण्डज और पिण्डज -प्रकृति के जीवों केअलावा आदमी स्वयं यंत्रज जीव की रचना करेगा जिसकी मदद से हम सबका जीवन संचालित है। भविष्यवादियों का अनुमान था कि इस पाँचवीं प्रकृति के जीव की जनसंख्या में भारी बढोतरी होगी और उससे एक नए वातावरण का सृजन होगा। लोग नपुंसकता को प्राप्त होते जाएँगे। पुरुषों के भीतर शुक्राणुओं की संख्या घटेगी। ज्यादातर संबंध व्यापरिक बनेंगे, देशभक्तिया राष्ट्रीयता जैसे शब्दों का अवमूल्यन होगा। यह सूचना के सैलाब का युग होगा। उन्होंने भविष्यवादियों के इस भविष्यवाणी का हवाला भी दिया कि इक्कीसवीं सदी का समाज अकेलोंका समाज होगा। विवाह संस्था ढहती जाएगी, दुनिया की सैकडों भाषाओं को कम्प्यूटर खा जाएगा। जैविक उत्पत्ति विज्ञान में इतने आमूलचूल परिवर्तन होंगे कि इस सदी में मुर्दे भी संतान पैदा कर सकेंगे। कुमारी माँ होना आम बात होती जाएगी। थोडे-से व्यक्ति तब हजारों बच्चों के पिता हो सकेंगे। स्त्रियाँ दूसरों के वास्ते अपनी कोख किराए के लिए दे सकेंगी।
कैलाशजी ने पृथ्वी पर बढती धार्मिकता के बावजूद इस बात पर हैरत जताई है कि पूरी पृथ्वी पर इतने गिरिजाघर, इतनी मस्जिदें और दूसरी तरह के प्रार्थनाघर हैं जहाँ रोज सुबह घंटियाँ बज रही हैं, अजान हो रही है, रविवारी उपदेश दिए जा रहे हैं, मगर फिर भी सब तरफ अशांति है, घृणा है, हिंसा है। प्रतीक्षा आदमी के स्वयं ईश्वर हो जाने की- उस ईश्वरत्व पर व्यंग्य भी है जिसके कारण धरती पर इतने रक्तपात हुए हैं। उनका मानना है कि ईसा को इल्हाम हुआ, उनमें दिव्यगुण पाकर लोगों ने उन्हें मसीहा कहना प्रारंभ कर दिया। ऐसी ही घटना मुहम्मद के साथ घटी। इन दोनों महापुरुषोंके कारण ईसाइयत और इस्लाम का जन्म हुआ। वे कहते हैं इन दोनो महापुरुषों ने सोचा नहीं होगा कि इन दोनों के गुणों के कारण दुनिया में इतना रक्तपात होगा। इतने पुस्तकालय जलाए जाएँगे। उन्होंने पाया कि ऐसा केवल दो महापुरुषों के कारण ही नहीं, उन तमाम लोगों के कारण हुआ जिन्होंने यह दावा किया कि दिव्यत्व उनके माध्यम से आस्फालित हुआ है,केवल बुद्ध को छोड कर। इस विडंबना पर उन्होंने लेंसलॉट को उद्धृत किया है जो यह कहते हैं कि क्या दुनिया भर में पसरे टूटे व जीर्ण कब्रिस्तान आदमी को आहलादित करने में सक्षम हैं। इसी तरह आइंस्टीन को उद्धृत करते हुए कहा कि वह कहा करता था कि आध्यात्मिक भलाई के लिए, धर्म गुरुओं को चाहिए कि वे वैयक्तिक ईश्वर को तिलांजलि दे दें और सत्यं शिवं सुंदरम् की ओर उन्मुख हों। (आधुनिकता का उत्तरोत्तर, पृष्ठ 149 )
कैलाश वाजपेयीजी ने दुनिया भर के विचारों का अध्ययन किया था। वे माक्र्सवादी न थे। क्योंकि माक्र्सवाद की भीतरी कमजोरियों से वाकिफ थे। उन्होंने पाया कि कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के बीच पोलित ब्यूरो पिरामिड जैसा खडा हो गया, जहाँ यह तय था कि आदेश नीचे से ऊपर की ओर बहेंगे, पर हुआ उल्टा यानी आदेश ऊपर से नीचे की ओर निर्गत होने लगे। लेनिन की मृत्यु के बाद जब स्तालिन पार्टी के महासचिव बने तो उसने पोलित ब्यूरो के सदस्यों का एक-एक करके सफाया करवा दिया। त्रात्स्की ने स्तालिन के भय से सोवियत संघ छोड दिया। स्तालिन ने बुखारिन सहित तमाम विद्रोहियों की बर्बरतापूर्वक हत्या करवाई। पोलित ब्यूरो धीरे-धीरे तानाशाही का शिकार होता गया। मास्को के सबसे बढिया मकानों में इनकी रिहाइश थी। माक्र्स की आत्मा इस घटाटोप तंत्र के बीच पता नहीं कहाँ बिला चुकी थी। वे अपने निबंध माक्र्सवाद का शिकार माक्र्स में लिखते हैं, वह माक्र्स जिसने अन्न को देवता का दर्जा दिया,वह माक्र्स जिसकी पीडा का केंद्र मनुष्य और मनुष्य के बीच की दीवार थी, वह माक्र्स जिसने यूरोप में लंदन से लेकर इटली तक फैले सामंतों की हरामखोरी का विधिवत अध्ययन किया था, वह माक्र्स जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी की करतूतों की सम्यक जानकारी थी कि कैसे कोई देश किसी दूरस्थ देश को व्यापारी का मुखौटा पहनकर गुलाम बनाता है और फिर इन गुलामों को मारीशस, ट्रिनीडाड, फिजी, सूरीनाम और ब्रिटिश गयाना में ले जाकर बेच देता है, फांस, हालैंड, इंग्लैंड और स्पेन ने किस तरह अपने उपनिवेशों को लूटा और किस तरह ईश्वरपुत्र का विशेषण देकर ईसा से बाइबिल में अंग्रेजी बुलवाई जो कि ईसा की भाषा ही नहीं थी और इस तरह गुलाम देशों में ईसाइयत का प्रचार किया, माक्र्स के ये सारे आदर्श कम्युनिस्ट पार्टी के भँवरजाल में डूब गए। आगे वे इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि माक्र्स ने शायद यह कल्पना नहीं की होगी कि पार्टी का सदस्य बनकर तमाम औसत लोग भयंकर रूप से स्वार्थी अथवा खुदगर्ज हो जाएँगे। माक्र्स ने यह कभी सोचा ही नहीं होगा कि उसके चिंतन के कई अंशों को पूँजीवादी अर्थ प्रणाली अपने में समोकर और अधिक समृद्ध होती चली जाएगी। संक्षेप में कहें तो माक्र्सवाद का शिकार माक्र्स माक्र्सवादियों के कारनामों की परिणतियों का एक जायजा है। कितनी चिंता से भर कर वे कहते हैं, हर आदर्शवादी के साथ जो होता है, वही माक्र्स के साथ भी हुआ। (आधुनिकता का उत्तरोत्तर, पृष्ठ 118)
इस तरह उनकी पुस्तक आधुनिकता का उत्तरोत्तर इस बात का साक्ष्य है कि वे किस हद तक साहित्य और समाज के अंतस्संबधों और अन्तर्द्वन्द्वों का अध्ययन कर रहे थे। उनके इस चिंतन और अध्ययन-अनुशीलन में ईसाइयत, ईस्ट इंडिया कंपनी, उपभोक्तावाद, एंगेल्स, औद्योगीकरण, कामू, काफ्का, सार्त्र, हीडेगर, कीर्केगार्द, गिंसबर्ग, जरथुस्त्र, जार्ज आरवेल, डेनियल बेल, त्रिपिटक,फ्रांस का साहित्यिक आंदोलन त्यलक्यल, पूँजीवाद, बोर्खेस,भारतीय दर्शन, यंत्र संस्कृति, सांख्य, सापेक्षता-वाद, समाजवाद, न्यूटन, आइंस्टीन, अभिनव- गुप्त, राब्बग्रिए, यास्पर्स आदि सभी शामिल हैं जो उन्हें एक स्वतंत्र लेखक की हैसियत से विचार के लिए उद्वेलित करते हैं। कहना न होगा कि मानवीय सभ्यता, विचारधारा, साहित्य, समाज, नास्तित्त्व, महासम्मिति सिद्धांत, यांत्रिकता और मानविकी इन सभी प्रश्नों पर उन्होंने यहाँ खुल कर विचार किया है । विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में आए परिवर्तनों, आधुनिकता, अस्तित्त्ववादी चिंतन, क्वांटम फिजिक्स व संचार माध्यमों के कायम होते वर्चस्व और सूचना विस्फोट के इस युग को उन्होंने उत्तर आधुनिकवादी विमर्श के आईने में समझने की कोशिश की है।
1995 में उनकी एक गद्यकृति आई थी- समाज दर्शन और आदमी। समाज का शब्द से, दर्शन से और मनुष्य से क्या रिश्ता है, इसे लेकर ब्लर्ब में बताया गया है कि शब्द से अभिप्राय सुनियोंजित भाषा से है और भाषा सामाज की देन है। मनुष्य की जीवन शैली कैसी हो यह दायित्व संस्कारों और विचारों का है। विचार ही समाज और समाज ही दर्शन को जन्म देता है और यही दर्शन नए मनुष्य को सभ्यता की अगली सीढी चढने की प्रेरणा देते हुए नए क्षितिजों की ओर अग्रसर करता है।
इस पुस्तक में कुछ निबंध ऐसे हैं जो बाद में आधुनिकता का उत्तरोत्तर में भी शामिल हुए हैं। किन्तु निसर्ग चिंतन, अप्प दीपो, हिंसा का शल्य, बुद्धिजीवी की स्वतंत्रता, गीता की गूँज, स्व-वादी दर्शन, नौकरशाही के शैतानी पंजे, युद्धः एक निष्कृति,भारत की असिमता, व निष्कासित मनुष्य की नियति आदि विषयों पर उनके विचार एक चिंतक की अद्वितीयता के साथ सामने आते हैं। कहना न होगा कि वे निसर्ग के हामी हैं। मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति को वे भौतिक उन्नति से ज्यादा अहमियत देते हैं। प्रकृति का नैसर्गिक बोध उनके लिए काम्य है। पश्चिम ने प्रकृति पर विजय पानी चाही, पर भारत में आदिकाल से प्रकृति उपासना का केंद्र रही। हमारे यहाँ भक्ति को विनय का पर्याय माना गया। भक्ति में मनुष्य का चित्त पिघल कर तरल हो जाता है। उसके अहं का संपूर्ण विलयन हो जाता है। भारत में धर्मपरायण मानस ने प्रकृति में ही भगवत्ता का रूप देखा । उसने स्प्रिचुअल में विश्वास किया, रिचुअल में नहीं और सदैव स्प्रिचुअल व रिचुअल में फर्क भी करता रहा। कैलाश वाजपेयी बुद्ध से भी प्रभावित दीखते हैं। उनके अप्प दीपो को आत्मप्रकाशन का ध्येय वाक्य मानते हैं। बुद्ध की कहानी कहते हुए वे बुद्ध के कहे में अपना स्वर मिलाते हैं कि मुझ पर भरोसा नहीं करना, जो कह रहा हूँ उसे परखना, तब अपनाना और निर्णय की राह पर अगर मैं भी बाधा बनूँ, तो मुझे भी भूल जाना। रोशनी उधार माँगने नहीं जाना। क्योंकि तुम ही प्रकाश हो। (समाज, दर्शन और आदमी, पृष्ठ 9) यह उनके भीतर कोई बुद्ध ही है जो कविता में इस तरह बोलता हुआ दृष्टिगत होता है ः
हर कोई मरता नहीं दुख की पीडा से
सतत सुख शांति भी
मार देती है लोगों को।
(हवा में हस्ताक्षर, पृष्ठ 27)
अन्यत्र वे यह भी कह चुके हैं- अपनी जडों की पडताल के बिना क्रांति कहाँ। यह भी अप्पदीपो की ही प्रतीति है। कहा जाता है बुद्धिजीवियों से भरा समाज कहीं अधिक उन्नत होता है किन्तु भारत के बुद्धिजीवियों की पैंतरा बदलने की प्रवृत्ति ने उन्हें क्षुब्ध किया होगा कि इस बारे में उन्हें एक निबंध ही लिखना पडा। कैलाश वाजपेयी जी गहरे अध्यवसायी थे। देश-विदेश के चिंतकों की नई से नई किताबें उनके बुक शेल्फ में देखी जा सकती थीं। उन्होंने शेल्डन बी.कॉप की विचारोत्तेजक पुस्तक एन एंड आफ इन्नोसेंस पर कोई गुरु नहीं निबंध लिखते हुए शेल्डन की स्थापनाएँ रखीं कि बीसवीं सदी एक अदृश्य दुर्घटना यह घटेगी कि आदमी की बुद्ध कुटिल हो जाएगी। मशीनी संफ उसे भावजगत को जड बना देगा कि वह कम्प्यूटर एवं टीवी को ज्यादा विश्वसनीय मानेगा। वे बुद्धत्व के बारे में भी यह मानती हैं कि हम सबमें बुद्धत्व है, बस उसकी पहचान नहीं है। (समाज दर्शन और आदमी, पृष्ठ 87)
एक चिंतक के रूप में कैलाश वाजपेयी भारत की अस्मिता की पहचान कराने वाले लेखक हैं। दुनिया के अनेक देशों की यात्रा करके जो अनुभव मानवीय नियति व त्रासदी का उन्होंने अनुभव किया वह उनकी कविताओं व विचारों का हिस्सा बना। उन्होंने भारत की अस्मिता में विविधता की एकता को अहमियत दी । यही वह तत्त्व है जिसे सामासिक संस्कृति कहा जाता है। उन्होंने अपनत्व व एकता के विभिन्न स्वरूपों को निर्धारित करने में संगीत, एवं चित्रकला की भूमिका स्वीकार की है। पर्वों त्योहारों की भूमिका स्वीकारी है। नदियों का प्रवाह भी भारत की संस्कृति को जोडने का कारक रहा है। उन्होंने भारत की अस्मिता नामक लेख में नदियों के लिए एक मंगलाचरण प्रस्तुत किया है जिसे पिता विवाह संस्कार में मंगल गान के रूप में ग्रहण करता है। आज जहाँ विश्व में इतनी विविधताएँ और संकीर्णताएँ व्याप्त हैं, वे कहते हैं यह देश हठीला नहीं,लचीला है। तोडने नहीं, जोडने का पक्षपाती है। विविधता में एकता ही इसकी रीढ है। लगभग बीस भाषाएँ बोलता है यह देश और सैकडों बोलियाँ, छप्पन तरह के स्वाद हैं यहाँ और चौंसठ प्रकार की कलाएँ सैकडों तरह की पोशाकें पहनता है और हजारों तरह के खेल खेलता है, फिर ध्यान, धारणा, आसन, प्रत्याहार करता हुआ योग साधता है..... इसके साथ ही अनेक बातें बताते हुए इसके वैशिष्ट्य को बारंबार सराहते हैं। यह सच्चे अर्थों में दुनिया घूम कर आए व्यक्ति का साक्ष्य है। यह अचरज नहीं की भारत की अस्मिता के बहाने जो बातें कैलाश वाजपेयी ने कही है, ओशो रजनीश ने अपनी पुस्तक इंडिया माई लव में भारत देश के असली निर्माताओं को इसी जज्बे के साथ याद किया है। इस तरह वे अपने व्यक्तित्व को केवल कवि के रूप में रिड्यूस कर देखे जाने के नहीं, बल्कि एक चिंतक की भूमिका में नजर आते हैं जहाँ पाश्चात्य और भारतीय विचार दोनों अपनी अपनी तार्किकता के साथ जगह बनाते हैं।

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