fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

नेहरू क्यों?

पुरुषोत्तम अग्रवाल
(यहाँ हम पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा संपादित पुस्तक कौन हैं भारत माता-राजकमल प्रकाशन, 2021 की भूमिका के कुछ अंश प्रकाशित कर रहे हैं। यह पुस्तक इतिहास, संस्कृति और भारत-संकल्पना पर नेहरू के विचारों का संकलन है, साथ ही इसमें नेहरू के बारे में गाँधीजी, सरदार पटेल, भगत सिंह, मौलाना आजाद, मार्टिन लूथर किंग, यान टिनबर्जन, ली कुआन यू, रामधारी सिंह दिनकर और अटल बिहारी वाजपेयी की टिप्पणियाँ भी संकलित हैं। साथ ही, नेहरू द्वारा आर.के. करंजिया को दिये गये विस्तृत इंटरव्यू के अंश भी। इसका हवाला आप यहाँ प्रस्तुत अंश में देखेंगे।

पुरुषोत्तमजी ने पुस्तक की विस्तृत, विचारो-त्तेजक भूमिका भी लिखी है। यह पुस्तक मूलतः अंग्रेजी में तैयार की गयी थी। इसके हिन्दी अनुवाद के लिए पुरुषोत्तमजी ने अलग से एक भूमिका लिखी। यहाँ आप इसी भमिका के अंश पढने जा रहे हैं। इन अंशों में आप गाँधी-नेहरू संवाद, राष्ट्रवाद पर नेहरू के विचारों और कश्मीर-प्रश्न पर उनकी भूमिका के बारे में पढेंगे।)

ऐसा क्यों हो रहा है कि आम लोगों से लेकर विद्वानों, बुद्धिजीवियों तक की चेतना में नेहरू की स्मृति धुँधलाती जा रही है? नेहरू की अपनी पार्टी और उसकी सरकारों ने उनका नाम जरूर कितनी ही इमारतों, संस्थाओं से जोड दिया है, लेकिन क्या स्वयं को नेहरू की वैचारिकी से भी जोडे रखा है? उनसे असहमत होने के लिए भी, आखरिकार नेहरू के विचारों को तो याद करना होगा, उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता का रेखांकन तो करना होगा।

विद्वान लोग शायद गाँधी में ही नेहरू को समाहित मान लेते हैं। दलील में कहा जा सकता है कि यह बात तो खुद नेहरू ने कई बार कही कि हम तो बस गाँधीजी के सिखाए पर अमल करने की कोशिश कर रहे हैं। इस पुस्तक में संकलित आर.के. करंजिया के साथ बातचीत में भी आप उनका यही रुख देखेंगे। करंजिया के लाख जोर देने पर भी नेहरू किसी नेहरु-लाइन, नेहरू -नीति या नेहरू-युग का अस्तित्व पुरजोर ढंग से नकारते हैं; जिन बातों के कारण करंजिया इन शब्दों के प्रयोग का आग्रह कर रहे हैं, नेहरू उन सबको भारतीय एप्रोच में समाहित करते हैं, गाँधीजी को उस एप्रोच का प्रतिनिधि कहते हैं।

गाँधीजी कहते थे कि सत्य और अहिंसा शाश्वत हैं, उनकी बात करके मैंने कोई नया काम नहीं किया है, लेकिन क्या हम इस बात को शब्दशः स्वीकार कर सकते हैं? गाँधीजी से पहले अहिंसा की बात करते समय पवित्र हिंसा यानी अपने पक्ष की हिंसा को जायज ही ठहराया जाता रहा था। गाँधी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने हिंसा मात्र को प्रश्नविद्ध किया, अहिंसा को व्यक्तिगत गुण मात्र नहीं, बल्कि सामूहिक और संस्थाबद्ध करुणा और संयम के संगम के रूप में परिभाषित किया।

इस बात पर मैंने अपने गाँधी शांति प्रतिष्ठान व्याख्यान मजबूती का नाम महात्मा गाँधी (2005) में विस्तार से विचार किया है।1

इसी तरह, तुलसीदासजी का कथन है, कवित विवेक एक नहीं मोरे...

क्या कवि के इस विनम्र वक्तव्य को शुद्ध तथ्यात्मक तौर से पढना उचित है? तुलसीदास की चार कविताएँ पढना काफी हैं, जानने के लिए कि उनके पास कवित विवेक कितना था, कितना नहीं। कहने वाले का बडप्पन दिखाने वाले ऐसे विनम्र वक्तव्यों को वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन का आधार नहीं बनाया जा सकता। नेहरू के नेहरूवियन वैचारिकी से इंकार को भी वैसे ही पढना चाहिए जैसे सत्य और अहिंसा के प्रसंग में अपने अभूतपूर्व चिंतन के प्रति गाँधीजी की विनम्रता को और तुलसीदासजी की काव्य-विवेक से वंचित होने की घोषणा को, यानी बडप्पन के प्रमाण की तरह, तथ्यकथन की तरह नहीं। उनके योगदान की मौलिकता और महत्त्व का मूल्यांकन उनके अपने वक्तव्यों के आधार पर नहीं, वस्तुनिष्ठ ढंग से ही करना चाहिए।

बहुत से लोग गाँधी-नेहरू मतभेदों पर बहुत जोर देते हैं। कुछ लोग तो घुमा-फिरा कर नेहरू पर गाँधीजी को छलने का भी आरोप लगाते हैं, कुछ लोग गाँधीजी की समझदारी पर ही संदेह करने लगते हैं कि उन्होंने जोर देकर राजाजी नहीं, सरदार (पटेल) नहीं, जवाहर को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

नेहरू यदि गाँधीजी की हर बात की ताईद करने वाले ही होते, अपने सवालों और शंकाओं को छिपा लेने वाले होते, तो मुझे नहीं लगता कि गाँधीजी इतने आग्रह के साथ उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित करते। मेरे जाने के बाद जवाहर मेरी ही जबान बोलेगा-गाँधीजी को यह विश्वास इसी कारण था कि वे जानते थे कि जवाहर के पास अपनी भी जबान है, मेरे प्रभाव से मुक्त होकर सोचने, असहमतियों को खुल कर व्यक्त करने का साहस है।

अक्तूबर, 1945 में इन दोनों के बीच हिन्द-स्वराज (1909) में गाँधीजी द्वारा प्रस्तावित शासन-पद्धति को लेकर हुए साफ-साफ, बल्कि तीखे पत्र-व्यवहार में नेहरू ने गाँधीजी को दो-टूक शब्दों में याद दिलाया, आप जानते ही हैं कि कांग्रेस ने इस तस्वीर (हिन्द स्वराज में प्रस्तावित शासन-व्यवस्था) पर कभी विचार तक नहीं किया है, उसे अपनाने की बात तो दूर की है। खुद आपने भी, इसके कुछ साधारण पहलुओं के अलावा, इसे (कांग्रेस कार्यक्रम के तौर पर) अपनाने का आग्रह कभी नहीं किया।आप खुद ही सोचिए कि कांग्रेस के लिए इतनी बुनियादी बातों पर, जिनमें कई दार्शनिक दृष्टियों के सवाल शामिल हैं, विचार करना कहाँ तक उचित होगा।

हिन्द-स्वराज में दी गयी तस्वीर उचित है या अनुचित, व्यावहारिक है या हवाई, यह सवाल अपनी जगह; लेकिन नेहरू याद दिला रहे हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन हिन्द-स्वराज में दी गयी तस्वीर को वास्तविक बनाने के वादे के साथ नहीं चलाया गया था। वह जिस सपने के साथ चलाया जा रहा था, वह गाँधीजी के मूल सरोकारों के तो अनुरुप था, लेकिन हिन्द-स्वराज में प्रस्तावित आर्थिक-राजनीतिक पद्धति के अनुरूप नहीं। यह बात स्वयं गाँधीजी द्वारा कराची कांग्रेस में पेश किये गये नीतिगत प्रस्ताव से साफ हो जाती है। नेहरू का सवाल है-क्या यह नैतिक रूप से सही होगा कि स्वाधीन भारत में कांग्रेस एक ऐसे कायक्रम को लागू करने में लग जाए, जिसके लिए उसने जनता से स्वीकृति हासिल नहीं की है?

12 नवंबर, 1945 को गाँधीजी और नेहरू के बीच आमने -सामने लंबी बातचीत हुई। इस बातचीत में बनी सहमति को गाँधीजी ने 13 नवंबर के दिन नेहरू को लिखे पत्र में इन शब्दों में नोट किया-

1. तुम्हारे अनुसार, सबसे बडा सवाल यह है कि मनुष्य का मानसिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक विकास कैसे सुनिश्चित किया जाए। मैं भी यही मानता हूँ।

2. और ऐसा करने के क्रम में हर व्यक्ति को एक सा अधिकार और अवसर मिलना चाहिए।

सहमति के ये दो बुनियादी, सैद्धांतिक बिंदु नोट करने के बाद, गाँधीजी ग्राम-स्वराज पर बल देते हैं। उनके अनुसार यह स्वराज आदर्श समूह या ग्राम को इकाई मान कर ही संभव है। ऐसे स्वराज में हरेक ग्राम द्वारा अपने भोजन और आवास की व्यवस्था करने तक ही सीमित न रह कर अपनी जरूरत के मुताबिक बिजली और पेयजल का स्वयं उत्पादन करने तक जाना चाहिए।2

इस पत्राचार और अन्य गाँधी-नेहरू संवादों से यह भी जाहिर होता है कि जवाहर ही मेरा उत्तराधिकारी होगा-यह घोषणा करते समय गाँधीजी के मन में समावेशी, उदारचित्त राष्ट्रवाद के प्रति नेहरू की असंदिग्ध निष्ठा, सभी सामाजिक तबकों, भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों में नेहरू की व्यापक लोक-स्वीकृति, अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर नेहरू की गहरी नजर ये सब बातें तो थीं ही, नितांत निजी स्तर पर भी गाँधीजी को वैचारिक चुनौतियाँ देने वाले शिष्य-संवादी की तलाश थी, अंधभक्त की नही। बाकी सब पर नेहरू को वरीयता देने का कारण यही था।

इस पत्राचार में नेहरू सभ्यता में पनप रहे बुराई के बीज को स्पष्ट रूप से स्वीकारते हैं, लेकिन वर्तमान औद्योगिक सभ्यता में केवल बुराई ही बुराई देखने का पुरजोर प्रतिवाद करते हुए। औद्योगिक सभ्यता में पनपने वाली आध्यात्मिक रिक्ति के प्रति उनकी संवेदनशीलता लगातार बढती चली गयी थी। गंभीर आध्यात्मिक साधकों के साथ नेहरू अपने पद और साधक की साधना दोनों का सम्मान करते हुए संवाद करते थे। चूँकि वे जानते थे कि ऐसी जिज्ञासा नितांत व्यक्तिगत मामला है, इसलिए अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा का सार्वजनिक प्रदर्शन करने से बचते थे।

करंजिया से बात करते समय भी नेहरू ने इस आध्यात्मिक रिक्ति को दूर करने के उपाय खोजने पर बल दिया था। उनका प्रबुद्ध चित्त इस रिक्ति का समाधान मानवीय सर्जनात्मकता में देखता था, किसी तथाकथित सद्गुरु या डबल श्री के चमत्कारों में नहीं। आध्यात्मिक रिक्ति के संदर्भ में मानवीय सर्जनात्मकता पर विश्वास के कारण ही नेहरू साहित्य और कला के सम्मान और संरक्षण पर इतना बल देते थे।

असल में वह दौर ही ऐसा था। सामाजिक पहचान से अधिक व्यक्ति-सत्ता को महत्त्व देने वाली, स्वाधीनता, समता, न्याय और विवेक को सार्वभौमिक मूल्य मानने वाली प्रबोधनपरक, आधुनिक सोच के आत्मविश्वास का दौर। उन दिनों यह दुनिया भर में अटपटा लगने लगा था कि परंपरा के नाम पर औरतों पर दस तरह की पाबंदियाँ लगा दी जाएँ, प्रतिक्रियावादी रिवाजों को सामाजिक पहचान का प्रतीक मानकर उनके गुण गाये जाएँ या भावना के नाम पर किसी भी तरह की रचनात्मक अभिव्यक्ति को असंभव बना दिया जाए। आज हिजाब को मुस्लिम पहचान का प्रतीक बना दिया गया है, उस दौर में मिस्र के नेता नासर और उनके हजारों श्रोता ठहाका लगा कर हँस सकते थे कि काहिरा के मुख्य मुफ्ती साहब चाहते हैं कि हर औरत बुर्का नहीं तो हिजाब तो जरूर ही धारण करे। आचार्य रजनीश हजारों स्त्रियों, पुरुषों की सभा में संभोग से समाधि की ओर विषय पर अनेक भाषण दे सकते थे। कुछ भावनाएँ आहत तब भी होतीं थीं, लेकिन विवेक का लिहाज करके *यादा शोर नहीं मचातीं थीं। आजकल जलवा आहत भावना का है; विवेक का लिहाज करना अब आउट ऑफ फैशन है।

आधुनिक मूल्यों में आस्था के साथ ही नेहरू को यह विश्वास भी था कि समाज के आधुनिकीकरण का प्रवाह अबाध रूप से चलता ही रहेगा। वे ही क्या, उनके निधन के समय तक, दुनिया में शायद ही किसी ने यह सोचा हो कि कुछ ही दशकों बाद, आधुनिकता के सार्वभौम मूल्य इतने संदिग्ध बना दिये जाएँगे। उन दिनों का एक फिल्मी गीत इस आत्मविश्वास की लोक-व्याप्ति की सूचना देता है-तू न हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा।

कोई नहीं सोच सकता था कि कुछ ही बरसों बाद इंसानी पहचान पर धार्मिक सांस्कृतिक पहचान हावी हो जाएगी, वह भी इस तरह कि हिजाब पहनना आइडेंटिटी ऐसर्शन का तरीका माने जाने लगेगा, जौहर प्रथा को जायज ठहराने के लिए तर्क जुटाए जाने लगेंगे।

नेहरू की, और उनके समय की सीमाओं का बोध उनकी राजनीतिक और बौद्धिक विरासत के दावेदारों को होना चाहिए था। उन्हें नेहरू के सोच की समस्याओं से टकराना चाहिए था। उनके समय की सीमाओं को जान-बूझ कर अपनी खुद की भी सीमाएँ बना लेने के बजाय उन्हें अतिक्रांत करना चाहिए था। ठीक वैसे ही जैसे स्वयं नेहरू ने गाँधीजी की सोच के साथ किया था।

मौलिकता हवा में से पैदा नहीं होती, कोई मौलिक विचारक ऐसा नहीं होता जो उपलब्ध विचार-परंपरा से मुखामुखम किये बिना ही विचार करने लगे। नेहरू की मौलिकता इसमें थी कि गाँधीजी से जो कुछ उन्होंने सीखा, अपने स्वार्जित विवेक की कसौटी पर कस कर सीखा। उन्होंने वह तरीका अपनाया जो कोई भी विवेकी व्यक्ति अपनाता है-संग्रह त्याग न बिनु पहचाने....

लेकिन नेहरू के उत्तराधिकारियों ने ऐसा नहीं किया। नेहरू से सीखते हुए, उनकी और उनके समय की सीमाओं से आगे जाकर मुस्लिम समुदाय को सामाजिक-आर्थिक-वैचारिक विकास से जोडने के बजाय, उनके बीच आधुनिक मूल्यों, मान्यताओं का प्रचार-प्रसार करने के बजाय उन्हें निहित स्वार्थी नेताओं के भरोसे ही छोड दिया गया। राजनीति को केवल दो-चार वर्षों के परिप्रेक्ष्य में देखने वाले कांग्रेसी, गैर-कांग्रेसी नेताओं और बौद्धिकों ने अनजाने, अनचाहे ही मुस्लिम तुष्टीकरण के उस प्रचार को बल प्रदान किया जो बहुसंख्यक समुदाय के बीच बरसों से किया जाता रहा है। आज, अपने देश में आक्रामक हिन्दुत्व का जो उभार है, सेकुलर शब्द तक की जो पतली हालत है, उसकी रचना में इस बौद्धिक आलस्य और नैतिक लापरवाही का योगदान कम नहीं है। मान लिया गया कि अपन चाहे जो करते रहें, देश के मानस में सहिष्णुता और खुलेपन का संस्कार तो बना ही रहेगा।

ऐसा होता नहीं है, हुआ भी नहीं। समाज में जिन मूल्यों को आप प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, उनके लिए सतत प्रयत्न करना होता है। लोकतंत्र को यदि केवल संख्याओं के खेल में, बहुसंख्यकवाद में बदलने से बचाना हो, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान और मर्यादाओं का पालन निरंतर करना होता है। देश के सभी समुदायों के भीतर आधुनिक, सेकुलर मूल्यों की स्वीकृति के लिए सरकारी, गैरसरकारी धरातल पर कोशिश करनी होती है। इस प्रसंग में अपने किये-अनकिये की सच्ची समीक्षा से ही वह प्रामाणिकता हासिल होगी जो आज लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संस्थाओं पर निरंतर किये जा रहे हमलों का प्रतिरोध करने के लिए जरूरी है।

ऐसी समीक्षा यह याद रखे बिना नहीं की जा सकती कि कांग्रेस और दूसरे लोकतांत्रिक, सेकुलर दलों ने सामाजिक मान्यताओं और कॉमनसेंस को प्रगतिशील दिशा में ले जाने का काम औपचारिक शिक्षा के भरोसे छोड कर छुट्टी पा ली; बल्कि शिक्षातंत्र में भी प्रगतिशील मूल्यों के रेखांकन का काम गंभीरता और निरंतरता से नहीं किया गया। किसी भी समाज में लोकमत को प्रभावित करने में सरकारी शिक्षातंत्र के बराबर ही, बल्कि कई बार उससे भी *यादा महत्त्वपूर्ण होती है अनौपचारिक संप्रेषण की भूमिका। भारत जैसे जटिल समाज में तो यह बेहद नाजुक थी और है। राजनीतिक हिन्दुत्व की विचारधारा को मिली सफलता में पिछली एक सदी से चले आ रहे, सोशल मीडिया के जमाने में और भी सघन हो गये अनौपचारिक, गैरसरकारी प्रचार और संप्रेषण की भूमिका कौन नकार सकता है? गोडसे के महिमामंडन और नेहरू के विरुद्ध कुत्सित प्रचार को स्वीकृति एकाएक नहीं मिलने लगी है। ऐसे में जब हिन्दू-सभा गाँधी-हत्या का पुनः नाट्य करे या गोडसे ज्ञानशाला स्थापित करे, तो तिलमिलाने से क्या होने वाला है? लोकतांत्रिक दलों को, बौद्धिकों को अपने आप से पूछना यह चाहिए कि स्वयं उन्हने लोक-शिक्षण पर कितना ध्यान दिया? हिन्दू राष्ट्रवादी सोच के फैलाव से चिंतित होते वक्त सोचना चाहिए कि समावेशी, लोकतांत्रिक भारतीय राष्ट्रवाद को लोगों के संस्कार में गहराई से पैठाने के लिए कितना प्रयत्न किया गया है? सोचना चाहिए कि क्या वजह थी कि नेहरू हिन्दू या मुस्लिम सांप्रदायिकता का विरोध भारतीय राष्ट्रवाद के प्रस्थान बिंदु से करते थे, कोरे लिबरल वैल्यूज के नाम पर नहीं।

राष्ट्रवाद की अवधारणा की सैद्धांतिक समस्याएँ अपनी जगह, लेकिन जो विश्व-व्यवस्था संचालित ही होती है राष्ट्र-राज्यों के जरिए, उसमें रहते हुए आप राष्ट्र और राष्ट्रवाद की उपेक्षा तो नहीं कर सकते। यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि औपनिवेशिक विश्व-व्यवस्था की समाप्ति में राष्ट्रवाद की अवधारणा का कितना योगदान रहा है। वास्तविकता यह है कि जहाँ यूरोपीय राष्ट्रवाद साम्राज्यवादी होड और औपनिवेशिक लूट का जरिया बना, वहीं एशिया और अफ्रीका में राष्ट्रवाद ने उपनिवेशवाद-विरोधी भूमिका निभाई। भारत में ही नहीं, अन्य समाजों में भी देशभक्ति की स्वाभाविक भावना को कुछ लोगों ने संकीर्ण और आक्रामक राष्ट्रवाद में ढाला तो कुछ ने देशभक्ति को सार्वभौम मानवीय मूल्यों पर आधारित समावेशी राष्ट्रवाद का रूप दिया। हिन्दू-सभा, आरएसएस, मुस्लिम लीग के हिन्दू या मुस्लिम राष्ट्रवाद और कांग्रेस के भारतीय राष्ट्रवाद में बुनियादी फर्क यही था।

इस समावेशी राष्ट्रीय भावना को दादा धर्माधिकारी ने बहुत सटीक नाम दिया था-मानवनिष्ठ भारतीयता।

जिन लोकतांत्रिक मर्यादाओं, मूल्यों, न्याय और विवेकपरक चित्त को यह मानवनिष्ठ भारतीयता धारण करती थी और करती है उनके पक्ष में लिए संघर्ष करना इस वक्त बेहद जरूरी होने के साथ ही बहुत कठिन भी है। हमारा वक्त ऐसा है जबकि सामाजिक मानस प्रबोधन की नहीं, उसकी उलट दिशा में चल रहा है। यह तर्क और भावना के संवाद पर आधारित मानवीय विवेक के कमजोर पडने का समय है। यह ऐसा समय है जब नाच-नाच कर खबरें देते, त्यौहारों की बधाई देते टीवी रिपोर्टर और एंकर; माँ बहन की गाली देते, बल्कि हाथ में तलवारें भाँजते पेनलिस्ट किसी को अजीब नहीं लगते। करेंसी नोटों में इलेक्ट्रानिक चिप देख लेने और गाय की छोडी साँस में ऑक्सीजन सूँघ लेने वाले एंकर भी किसी को अजीब नहीं लगते।

यह भुला ही दिया गया है कि समाज के नेता की भूमिका लोगों को अज्ञान से, भ्रांतियों से बाहर निकालने की होनी चाहिए, स्वयं उस अज्ञान में शामिल हो जाने, उसका उत्सव मनाने की नहीं। नेहरू इस अर्थ में नेता ही नहीं, फ्रेंच साहित्यकार और कूटनीतिज्ञ आंद्रे मॉलरो के शब्दों में राष्ट्र के गुरु भी थे।

इस सचाई से मुँह चुराना व्यर्थ है कि मीडिया, सोशल मीडिया, वाट्सएप के जरिये, हिन्दुओं के बडे हिस्से ( इसमें केवल सवर्ण नहीं हैं. केवल सवर्ण वोट के बूते न यूपी-बिहार में चुनाव जीते जाते हैं, न कहीं और) को यकीन दिला दिया गया है कि अब तक चली आई भारत-संकल्पना-आइडिया ऑफ इंडिया-में बुनियादी खोट है, यह हिन्दू-विरोधी है। मोदीजी इसकी जगह हिन्दू हितों और भावनाओं का सम्मान करने वाला राष्ट्रवाद स्थापित कर रहे हैं। राष्ट्रनिर्माण चल रहा है, न्यू इंडिया बन रहा है। नोटबंदी जैसे तुगलकी फैसले, कोविड-19 के प्रति घोर अंसवेदनशीलता, प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा और रोजमर्रा की दीगर तकलीफें-ये सब झेल लेना राष्ट्रहित में जरूरी है, जो इन तकलीफों के लिए सरकार की आलोचना करें वे एंटी नेशनल हैं।

इसी समझ के नतीजे समाज में बढती नफरत, बात बात में मुसलमानों को टार्गेट करने के रूप में दिखते हैं। इसी स्थिति का लाभ औवैसी जैसे नेता उठाने की कोशिश कर रहे हैं। औवैसी की आलोचना जरूर करें, साथ ही उनपर भी जरा ध्यान दें, जो कांग्रेस और बीजेपी को एक ही थैले के चट्टे-बटटे के रूप में देखते हैं। अगर वास्तव में ऐसा है तो एनडीए की बढती से परेशान क्यों होना? यदि अन्ना हजारे का आंदोलन सचमुच इतना डेमोक्रेटिक था कि उस आंदोलन के मंच पर जाने में लेफ्ट नेताओं, लिबरल बुद्धिजीवियों, क्रांतिप्रेमी लेखकों, अध्यापकों और छात्रों को भी परेशानी नहीं थी, तो उसके नतीजों का दोष किसी और के माथे क्यों मढना? बबूल के बीज बो कर आम खाने की उम्मीद क्यों करना?

उस तथाकथित आंदोलन के विरोध में दो टूक पोजीशन केवल लालू यादव और शिवसेना ने ली थी।

तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सफलता का पहला कदम था-कांग्रेस की जबरदस्त पराजय। दूसरा है-न्यू इंडिया का निर्माण। जो आंदोलन का समर्थन और संचालन कर रहे थे, उन्हें तो अपने आप को बधाई देनी चाहिए कि चट्टा ( कांग्रेस) तो निबट गया, बट्टा (भाजपा) भी निबट ही जाएगा यह और बात है कि बट्टा इतना भोला नहीं कि लिबरलों को खुश करने के लिए लोकपालजी को जन्म देने वाली टीम में उन्हें शामिल कर ले।

भाजपा में पिछले कुछ वर्षों में आए सारे बदलाव के बावजूद एक चीज नहीं बदली है, वह है-राजनीतिक हिन्दुत्व का नैरेटिव, और उसे हर हाल में लागू करने का कमिटमेंट। इस तथाकथित राष्ट्रवाद की आड में दोस्त पूँजीपतियों की पौ बारह है, और जनता का मरण, लेकिन मीडिया से परोसे जा रहे ज्ञान और भाजपा के विरोधियों की वैचारिक दरिद्रता का कमाल है कि लोग खुशी से अपने गले में फंदा डाल कर राजी हैं।

लिबरल बौद्धिक समझ नहीं पाते कि आम लोग भी केवल रोजी-रोटी के सवालों पर अपनी राजनीति तय नहीं करते। रोजी-रोटी से आगे, मूल्यों और कल्पनाओं के आधार पर सोचना केवल इंटेलेक्चुअलों तक सीमित गतिविधि नहीं है। नितांत साधारण व्यक्ति के लिए भी देशहित दूर की कौडी नही, बुनियादी सरोकारों में से एक है।

सच यह है कि गरीब के बारे में यह मान लेना कि वह दो जून की रोजी-रोटी से आगे कुछ सोचता ही नहीं, उसके जीवन में धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक संवेदना और राजनीतिक विचार की कैसी भी, कोई भी भूमिका नहीं होती, उसकी बुनियादी मानवता का घोर अपमान है।

नेहरू ने 1922 की जनवरी में, अवध के किसान आंदोलन के संदर्भ में लिखा था-आम जनता नहीं, बल्कि, हम लोग, जो पश्चिमी वातावरण में पले-बढे हैं, शांतिपूर्ण तरीकों की अपर्याप्तता का रोना रोते हुए बडी-बडी बातें करते हैं। आम जनता अहिंसा की ताकत समझती है। अकेले नेहरू ही नहीं, राष्ट्रीय आंदोलन का सारा नेतृत्व यह जानता था कि रोजी-रोटी से आगे मानवीय गरिमा और अधिकारों के प्रति संवेदनशील होना केवल उच्च या मध्यवर्ग का, केवल अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों का विशेषाधिकार नहीं है। भले ही बहुत परिष्कृत रूप में न हो, भले ही हमेशा प्रगतिशील दिशा में न हो, साधारण से साधारण मनुष्य भी रोजी-रोटी से आगे की, यहाँ और अभी से आगे की चिंता करता जरूर है। चुनौती इस चिंता को व्यापक मानवीय मूल्यों से जोडने की है। व्यावहारिक राजनीति के धरातल पर कहें, तो चुनौती लोगों के स्वाभाविक देशप्रेम को लोकतांत्रिक, समावेशी, न्यायपरक राष्ट्रवाद में ढालने की है।

कौन हैं भारत माता?-यह प्रश्न करते और उत्तर में यह बताते कि सारे मुल्क में फैले करोडों हिन्दुस्तानी, भारत माता दरअसल यही करोडों लोग हैं, इन्हीं की जय है भारत माता की जय नेहरू आम हिन्दुस्तानी की चेतना का सम्मान करते हुए, उसके साथ संवाद करते हुए, उसकी देशभक्ति को सही दिशा में ले जाने की कोशिश ही तो आजीवन करते रहे। डिस्कवरी ऑफ इंडिया में उन्होंने नोट किया (यह अंश आप इस संकलन में पढेंगे), राष्ट्रीयता असल में पिछली तरक्की, परंपरा और अनुभवों की एक समाज के लिए सामूहिक याद है समाजवाद ने, जिसकी पृष्ठभूमि में सर्वहारा वर्ग है, कौमी संस्कृति का मजाक उडाया है, क्योंकि उसकी समझ से इस संस्कृति का ताल्लुक उस मध्यवर्ग से है जिसका जमाना अब खत्म हो गया है। नेहरू ने समाजवादियों और कम्युनिस्टों को, दूसरे विश्वयुद्ध की यह वास्तविकता याद दिलाई कि, जब कोई संकट आया है, राष्ट्रीयता उठ खडी हुई है, और उसी का बोलबाला रहा है। और लोगों ने पुरानी परंपराओं में ही ताकत और आराम को ढूँढा है। मजूदा जमाने की एक अहम घटना यह है कि गुजरे हुए जमाने की दोबारा खोज हुई है और उसका एक नया रूप सामने आया है। राष्ट्रीय परंपराओं में वापस लौटने की बात मजदूरों की जमात में और मेहनत का काम करनेवालों में खासतौर से दिखाई दी है।

काश, लोकतांत्रिक नेताओं और लिबरल बौद्धिकों ने नेहरू के ऊपर उद्धृत तथा ऐसे और अनेक कथन ध्यान से पढे-गुने होते। काश, वे अपने कल्पना-लोक से बाहर निकल कर देख सके होते कि जब कोई संकट आया है, राष्ट्रीयता उठ खडी हुई और उसी का बोलबाला रहा है। काश, उन्होंने राष्ट्रवाद की सामाजिक गतिकी पर ध्यान दिया होता, और संकट-काल में समावेशी, लोकतांत्रिक, सेकुलर भारतीय राष्ट्र के विचार को मजबूत करने पर विचार दिया होता। काश, उन्होंने समझा होता कि गरीब से गरीब इंसान भी, बुनियादी जरूरतों के साथ ही कुछ मानवीय मूल्यों और सामाजिक-राजनैतिक भावनाओं के लिए भी जीता-मरता और संघर्ष करता है।

गाँधी-नेहरू संवाद अपने आप में अध्ययन और विश्लेषण का बेहद विचारोत्तेजक और विस्तार की माँग करने वाला विषय है। गाँधी को सपाट ढंग से भारतीय परंपरा का अनुयायी और नेहरू को उस परंपरा से उदासीन मानना हद दर्जे का सरलीकरण है, जैसा कि आप अतियों के मोह से मुक्त, प्रबुद्ध मध्यमार्ग की ओर में देखेंगे। असल में यह पूरा संकलन ही इस बात का प्रबल रेखांकन करता है कि भारतीय परंपरा की विभिन्न धाराओं से नेहरू का परिचय और लगाव कितना गहरा था। जिस व्यक्ति के विचारों और कामों से आप प्रभावित हों, उसका अंधानुकरण नहीं, सही दिशा में उन विचारों का समयानुकूल विस्तार ही श्रेयस्कर है, यह भारत की, असल में किसी भी समृद्ध बौद्धिक परंपरा के बुनियादी उसूलों में से एक है। नेहरू ने गाँधी-विचार के साथ यही करने की कोशिश की। उनकी कोशिश का मूल भावनात्मक और नैतिक संदर्भ भारत के भविष्य का वही सपना वही नियति-बोध था, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का मूल प्रेरक तत्त्व था-दुनिया के रंगमंच पर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की नियति। यही नियति-बोध नेहरू-नीति, नेहरू-लाइन को तय करता था।

गाँधी-नेहरू को पक्ष-प्रतिपक्ष में बाँट कर किसी एक की तरफ खडे होने से पहले यह जरूर सोचना चाहिए कि जिस दुनिया में यह आदर्श ग्राम-स्वराज बनना है, वह बँटी हुई है एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते राष्ट्र-राज्यों में। औपनिवेशिक काल के प्रभाव अभी तक बाकी हैं, उस वक्त तो औपनिवेशिक ताकतें अपना राज फिर से स्थापित कायम करने के स्वप्न देख रहीं थीं। ऐसी स्थिति में भारत के सामने एक मजबूत राष्ट्र-राज्य के रूप में उभरने की कोशिश करने का विकल्प क्या था? औद्योगीकरण और सशक्त केन्द्रीय सत्ता के अलावा इस तरह की कोशिश करने का तरीका क्या था? दूसरे महायुद्ध के बाद, परमाणु बम के बाद, दुनिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने का इच्छुक देश क्या भारी उद्योगों की उपेक्षा कर सकता था? व्यापक औद्योगीकरण और उस वकत दूर की कौडी, कुछ लोगों को तो फिजूलखर्ची तक दिख रही परमाणु रिसर्च के बिना क्या भारत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में सम्मानजनक स्थान पाने की कल्पना कर सकता था? क्या ग्रामोद्योगों पर आधारित अर्थव्यवस्था देश के लिए जरूरी आधारभूत ढाँचा उपलब्ध करा सकती थी?

सीखना चाहिए हिन्द-स्वराज में दी गयी आदर्श समाज की तस्वीर के ब्यौरों से नहीं, बल्कि उसमें निहित अंतर्दृष्टि से, औद्योगिक सभ्यता की निर्मम आलोचना में निहित नैतिक सरोकार से। नवस्वाधीन भारत के नेतृत्व ने उससे जितना सीखा, निस्संदेह उससे अधिक सीखा जा सकता था, अभी भी सीखा जा सकता है, लेकिन उस पर हर्फ ब हर्फ अमल करने की बात सोचना खामख्याली के सिवाय कुछ नहीं।

इस भयानक समय में हमारा सौभाग्य यह है कि हमें गाँधी और नेहरू का वाद- विवाद-संवाद विरासत में मिला है। यह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि भारत की अपनी देशभाषागत आधुनिकता और नेहरू यूरोपीय आधुनिकता, प्रबोधन का संवाद है। इससे न केवल भारत बल्कि सारा विश्व सीख सकता है। सीखने की संभावना बहुत है, लेकिन याद रखें, वक्त बहुत कम। क्योंकि...



हमारा समय उत्तर-आधुनिक ( पोस्ट-मॉडर्न) होने के साथ ही सत्यातीत (पोस्ट-ट्रुथ) भी हो गया है। दूसरा महायुद्ध शुरु होने के पहले ही नेहरू इंदिरा प्रियदर्शिनी के नाम लिखे पत्रों में उन्हें नात्शीवाद की उस विचित्र विचारधारा के बारे में बता रहे थे, जो मानती है कि शुद्ध तर्क और पूर्वग्रह रहित विज्ञान का जमाना लद चुका है। लेकिन, अपने इस उत्तर-आधुनिक समय में तो, डोनाल्ड ट्रंप और उनके समर्थक ही वैकल्पिक तथ्यों आल्टरनेटिव फैक्ट्स) की बात नहीं कर रहे, बडे-बडे प्रगतिशील बौद्धिक भी बरसों से कहते रहे हैं कि सार्वभौम सत्य और मूल्यों की भ्रामक धारणा का अंत हो चुका है। अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के नाम पर सार्वभौम मानवीय मूल्यों और साझी ज्ञानपद्धति और परंपरा का नकार संकीर्ण राष्ट्रवाद की विशेषता तो रही ही है; उत्तर-आधुनिकतावाद द्वारा प्रचारित नैतिक सापेक्षतावाद और आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के प्रगतिशील समर्थक भी मानने सभी सामाजिक अस्मिताओं और सांस्कृतिक परंपराओं के अपने अपने सत्य हैं, तर्क के किसी साझे पैमाने की, पूर्वग्रह रहित ज्ञान-विज्ञान की कोई संभावना है ही नहीं।

इस टुकडे-टुकडे संवेदना का नतीजा यह है कि यदि आप नारीवादी लेखन करती हैं, तो जेंडर जस्टिस पर लिखें, सेक्सुअलिटी एक्स्प्लोरेशन करें, प्रगतिशील हलकों में गद्गद प्रशंसा पाएँगी, भले ही आप अल्पसंख्यकों, दलितों, किसानों-मजदूरों के विरुद्ध कितना ही जहर उगलें, उनके आंदोलनों के कठोर दमन की सराहना ही नहीं, बाकायदा सरकार से माँग भी करें कि इन्हें ठोक दिया जाए। इसी तरह आप दलित विचारक हो जाएँ, और स्त्रियों के बारे में हिटलर को भी पीछे छोड देने वाली बात करें, उन्हें औकात में रखने की तजवीजें सुझाएँ, फिर भी बडे-बडे जनवादी आफ गुण गाएँगे। नाम लेने की जरूरत नहीं, हिन्दी के सजग पाठक जानते हैं, आप भी थोडा सोचें, जान जाएँगे।



सार्वभौम मूल्यों के प्रति संदेह का निस्संदेह ऐतिहासिक आधार है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के अधिकांश में यूरोपीय आधुनिकता को ही एकमात्र आधुनिकता माना जाता रहा, किसी भी गैर-यूरोपीय समाज के आधुनिक हो जाने का पैमाना यही माना और मनवाया जाता रहा कि वह अपनी खुद की परंपरा और सांस्कृतिक अनुभवों के अधिकांश को खारिज कर दे और जल्दी से जल्दी पश्चिम की कार्बन कॉपी बन जाए। स्वयं यूरोपीय सांस्कृतिक अनुभव को बस श्वेतांग पुरुष की नजर से देखा जा रहा था। यहाँ तक कि भयानक उपनिवेशवाद को भी वस्तुनिष्ठ तौर पर इतिहास में प्रगतिशील भूमिका निभाने वाला घोषित किया गया।

गैर-यूरोपीय परंपराओं के प्रसंग में भी यह सचाई है कि नस्ल, जाति और जेंडर के आधार पर चले आ रहे अन्याय को स्मृति-विलोपन के हवाले किया जाता रहा।

समस्या का समाधान व्यवस्था और सामाजिक कॉमनसेंस में बदलाव के जरिए ही संभव है। ऐसे बदलाव के लिए बुनियादी मानवीय मूल्यों और तर्क-विवेक की सार्वभौमिकता में आस्था अनिवार्य है। चूँकि सार्वभौमिकता की धारण का दुरुपयोग हुआ है, इसलिए उस धारणा को ही त्याग देना, अंग्रेजी मुहाविरे का सहारा लेकर कहें तो, वैसा ही है, जैसे नहलाने के बाद गंदे पानी के साथ बच्चे को भी फेंक देना।

मैंने बीस बरस पहले लिखा था, किसी एक सांस्कृतिक परंपरा को, किसी ऐतिहासिक बिन्दु-विशेष पर जन्मे संस्कृति-बोध को मनमाने ढंग से बाकी सभी संस्कृतियों पर थोप देना निश्चय ही तानाशाही है। लेकिन मनुष्य के सरोकारों की व्यापकता और सार्वभौमिकता की संभावना मात्र को नकार देना गहरी नैतिक असमर्थता में स्वयं को धँसा लेना है। यह तय जानिये कि इस नैतिक असमर्थता की गिरफ्त में आकर विवेक और तर्क की जैसी अवहेलना हम करने लगे हैं; अस्मिता, आस्था और भावना को ही किसी बात या कर्म के मूल्यांकन का आधार मानने वाली व्यवस्था की दिशा में, जिस तेज रफ्तार से हम जा रहे हैं, उसके फलस्वरूप मेरे उपन्यास नाकोहस ( राजकमल प्रकाशन, 2016) की फैंटेसी-राष्ट्रीय आहत भावना आयोग- के यथार्थ बनने में अधिक समय नहीं लगेगा। अभी ही, यथार्थ के कुछ साक्षात्कारों के सामने तो वह फैंटेसी भी कमजोर लगने लगी है।

इस समय की एक विशेषता यह भी है कि अपने देश के महत्त्वाकांक्षी मध्यवर्ग (एसपिरेशनल मिडिल क्लास) के बीच लोकतंत्र के प्रति घृणा बहुत *यादा बढ गयी है। वैसे तो इस तबके के कुछ लोग हमेशा से ही भारत में कडे, बल्कि मिलिटरी शासन की फैंटेसी पालते रहे हैं, लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में ऐसे लोगों की तादाद ही नहीं ताकत में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई हैं। लोकतंत्र को देश के विकास में बाधक मानने की सोच तेजी से फैली है। जैसा कि अज्ञान और मूर्खता से उत्पन्न आत्मविश्वास के हर संस्करण के साथ होता है, ऐसी सोच भी सचाइयों से सुविधानुसार आँखें मूँदे रहती है। इसके कई निजी अनुभव हैं, मुझे। (आपको भी हगे ही)।

इनमें से एक मजेदार अनुभव उस नौजवान से संबंधित है, जो विकास की दौड में चीन से पिछड जाने का दोष लोकतंत्र और नेहरू के सोशलिस्ट ऑबसेशन को दे रहा था। वह नौजवान यह कर रहा था सिविल सर्विस के इंटरव्यू के दौरान। मैंने उसे याद दिलाया कि नेहरू के जीवनकाल में तो चीन का सोशलिस्ट ऑबसेशन उनसे कहीं *यादा था, भारत के विपरीत चीन में तो प्राइवेट सेक्टर का अता-पता तक नहीं था। यह सुनकर वह थोडा-सा लडखडाया, लेकिन फिर उसने माओ के बाद के चीन से नेहरू के बाद के भारत से तुलना करते हुए निष्कर्ष निकाला कि असल दोष तो टू मच डेमोक्रेसी में है, जो कि जाहिर है कि नेहरू की ही गलती थी। इसी टू मच डेमोक्रेसी का नतीजा है कि डॉ. मनमोहनसिंह की सरकार इकॉनॉमिक रिफार्म की दिशा में अभी भी बोल्ड कदम नहीं उठा पा रही, डॉ. बाई नेचर थोडे सबमिसिव भी हैं।

बोर्ड के एक सदस्य, भारत सरकार के निवर्तमान सचिव से रहा नहीं गया। उन्होंने कहा, अच्छा, जरा कल्पना करें कि यह इंटरव्यू दिल्ली में नहीं, बीजिंग में हो रहा है...

बहुतों की तरह यह सिविल सर्विस एसपिरेंट भी स्मार्ट तो था, लेकिन सोचने में *यादा वक्त शायद बर्बाद नहीं करता था। सदस्य महोदय की बात सुनकर हम लोगों का मुँह देखने लगा। मैंने उससे निवेदन किया, यह इंटरव्यू चाइनीज सिविल सर्विस के लिए हो रहा होता और आप इसी लहजे में माओ की और वर्तमान शासक हु जिन ताओ की खिंचाई कर रहे होते तो इंटरव्यू खत्म होने के बाद, आफ ही नहीं, मेरे और साथ बैठे चार आदरणीय बोर्ड मेंबर्स के घर वाले भी हम लोगों को ढूँढते ही रह जाते। बरसों तक पता नहीं चलता कि कौन कहाँ किस जेल में है, धराधाम पर है भी या नहीं। आप देश के पहले और वर्तमान प्रधानमंत्री की आलोचना को अपना सहज अधिकार मानते हैं, यह उसी डेमोक्रेसी का कमाल है जिसके लिए आप नेहरू को कोस रहे हैं।

यह केवल संयोग नहीं है कि लोकतंत्र से परेशान लोग नेहरू से भी परेशान रहते हैं। वे अपने लिये लोकतंत्र से प्राप्य सभी सुविधाएँ और अधिकार चाहते हैं, बल्कि इन्हें अपना विशेषाधिकार मानते हैं। लोकतंत्र तभी टू मच होता है जब दूसरे भी इस से प्राप्य अधिकारों और शासनतंत्र में अपनी भूमिका की बात करने लगें। याद करें, पिछले कुछ बरसों में शासक दल और उसके समर्थकों द्वारा एंटी-नेशनल शब्द का प्रयोग कितना आम हो गया है। छात्र हों, या किसान, बुद्धिजीवी हों या मजदूर-आपने सरकार के किसी फैसले, उसकी विचारधारा के विरुद्ध जरा भी आवाज उठाई, और आप हुए एंटी नेशनल, राष्ट्रविरोधी, देशद्रोही...

पिछले दिनों, मोदी सरकार द्वारा लाये गये कृषि-कानूनों के किसानों द्वारा विरोध के प्रसंग में भी यही हो रहा है। मोर लॉयल देन दि किंग का प्रमाण देते हुए, नीति-आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारीजी ने किसान आंदोलन की आलोचना करते हुए फरमाया कि टू मच डेमोक्रेसी की वजह से इंडिया में इकॉनॉमिक रिफॉर्म मुश्किल हो गया है। याद करें के नीति आयोग नेहरू द्वारा स्थापित योजना आयोग का ही नया नाम है, इससे फर्क यह है कि नीति आयोग की हैसियत बस एक थिंक-टैंक की है, योजना या किसी अन्य तरह की नीति निर्धारित करने की नहीं; और थिंकिंग आपको पता ही है-डेमोक्रेसी समस्या है समाधान नहीं।

जिस सिविल सर्विस एसपिरेंट को ऊपर याद किया, जरूरी नहीं कि उसकी सहानुभूति किसी तरह की सांप्रदायिक राजनीति के साथ रही हो। लोकतंत्र का तिरस्कार हमारे एसपिरेशनल मिडिल क्लास के एक बडे तबके का संस्कार बन चुका है। बहुत-से लोग लोकतंत्र और बहुसंख्यकवाद में फर्क अज्ञान या परम ज्ञान के कारण भूल भी जाते हैं।

दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण में राष्ट्रीय आंदोलन को कितनी सफलता मिली, कितनी और मिल सकती थी, इस बात पर निस्संदेह बहस हो सकती है, लेकिन यह उस आंदोलन के केंद्रीय सरोकारों में से था-इस बात को नकारना असंभव है। इस सरोकार का ही नतीजा था, देश आजाद होने के साथ ही एक व्यक्ति-एक वोट के सिद्धांत की बिना किसी तत्तो-थंभो के स्वीकृति।

सार्वभौम वयस्क मताधिकार पर आधारित पहले आम चुनाव का क्या ऐतिहासिक महत्त्व है, यह समझने में, अत्यंत सभ्य और प्रगतिशील देशों में स्त्रियों को मताधिकार-प्राप्ति की यह समय-तालिका कुछ सहायता कर सकती है-संसदीय लोकतंत्र का जन्मदाता होने के गौरव से संपन्न ब्रिटेन-1928, ( मैग्नाकार्टा के कोई सात सौ साल बाद। इसी समय मताधिकार को संपत्ति से अलग किया गया, यानी गरीबों, मजदूरों को वोट देने का अधिकार पहली बार मिला), अत्यंत गर्वीला, ताकतवर लोकतंत्र अमेरिका-1920, ( स्वाधीनता की घोषणा के डेढ सौ साल बाद) और यूरोपीय समझ के अनुसार, प्राचीन इतिहास का अकेला लोकतंत्र यूनान-1952.

जो भारतीय नागरिक लोकतंत्र के कारण प्राप्त अपने खुद के मताधिकार तथा अन्य अधिकारों को भगवान की देन या पुश्तैनी विरासत मानते हैं, लेकिन दूसरों के अधिकारों को टू मच डेमोक्रेसी- वे थोडी खोजबीन करके इस समय-तालिका को और लंबी तथा ज्ञानवर्धक बना सकते हैं।

नेहरू मानते थे कि लोकतंत्र का मूल मंत्र है-हर व्यक्ति का सम्मान करना और ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना जिसमें साधारण से साधारण आदमी भी अपनी बात कहने का मौका पाए। वे यह भी जानते थे कि घर हो या देश उसे चलाने के फैसले यथासंभव आम राय से या फिर *यादातर लोगों की राय के हिसाब से लेने चाहिए। यह राय आक्रामकता, हिंसा और मूर्खता पर नहीं, बल्कि सोच-विचार पर आधारित भी होनी चाहिए, वरना लोकतंत्र आत्ममुग्ध तानाशाहों की हरकतों को जायज ठहराने का जरिया बनाया जा सकता है। इसीलिए नेहरू अपने शब्दों और आचरण में लोकतांत्रिक संस्कारों के निर्माण की कोशिश लगतार करते थे। उनके द्वारा रेडियो पर, आम सभाओं में दिये जाने वाले लगभग हर भाषण में यह कोशिश दिखती है।

नेहरू के सामने तानाशाह बन जाने के ढेरों प्रलोभन थे। चर्चिल जैसे नस्लवादी भारत-निंदक मानते थे कि भारतीय लोग कुछ ही बरसों में हम अंग्रेजों के पास गिडगिडाते हुए वापस आएँगे कि हुजूर हम पर हुकूमत करने फिर से आ जाइए। भारत के हितचिंतक मानते थे कि इतने बडे, विविधतापूर्ण, लेकिन व्यापक दरिद्रता और निरक्षरता की चुनौतियों के साथ ही विभाजन से जुडी भयानक हिंसा की चपेट में फँसे हुए देश में लोकतंत्र व्यवहारिक विकल्प नहीं हो सकता। नेहरू को मुस्तफा कमाल पाशा की तरह प्रबुद्ध तानाशाह की भूमिका अपनानी चाहिए, यह न भी करें सभी वयस्क नागरिकों को हासिल मताधिकार लागू करने की बजाय पढे लिखे, जिम्मेदार लोगों तक सीमित मताधिकार तो अपना ही लेना चाहिए।

नेहरू अपनी लोकप्रियता से वाकिफ थे, उस पर गर्व भी करते थे, लेकिन ऐसी लोकप्रियता और ऐसे गर्व के खतरों को भी भली-भाँति जानते थे। नेहरू ने नहीं चाहिए कोई तानाशाह लेख चाणक्य छद्मनाम धारण केवल साथी देशवासियों को ही नहीं, खुद को भी इन खतरों से आगाह करने के लिए ही लिखा था।

उनके लिए लोकतंत्र केवल शासन-व्यवस्था नहीं, एक संस्कार था, जिसे शासन से लेकर सामाजिक मानस तक में स्थापित होना चाहिए। वे स्वयं को सचमुच देश का प्रधान सेवक मानते थे। नियमित पत्रकार वार्ताओं के साथ ही, नेहरू हर महीने मुख्यमंत्रियों को चिट्ठियाँ लिखा करते थे, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम के साथ इन चिट्ठियों में संस्कृति और कला के बारे में सरकार की जिम्मेदारी जैसे विषयों पर भी विचार-विमर्श करते थे। उनके बाद मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री द्वारा नियमित पत्र लिखने का सिलसिला समाप्त हो गया। पिछले सातेक वर्षों में तो भारतीय प्रधानमंत्री की पत्रकार वार्ता अकल्पनीय हो गयी है। उनके इंटरव्यू तीखे प्रश्नों के सटीक उत्तरों के लिए नहीं, आम चूस कर खाये जाएँ या काट कर? जेब में बटुआ रखते हैं या नहीं? न थकने के लिए टॉनिक लेते हैं क्या? सरीखे मार्मिक प्रश्नों के सुंदर उत्तरों के लिए चर्चित होते हैं।

यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि यह स्थिति अपने आप नहीं पैदा हो गयी है, व्यवस्थित प्रयत्न के जरिये बनाई गयी है कि टीवी पर होने वाली बहसें मुहल्ले के चौराहे पर होने वाले झगडों और स्टैंड-अप कामेडी बल्कि हॉरर शो से होड ले रही हैं। सरकार से जबावदेही की उम्मीद करना लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, महापाप मान लिया गया है।इस बात को भुला देने की पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं कि लोकतंत्र केवल संख्याओं का खेल नहीं, बल्कि संस्थाओं, मर्यादाओं और परंपराओं के आधार पर चलने वाली व्यवस्था है; यह अल्पमत के साथ सम्मानपूर्वक संवाद करने वाली व्यवस्था है, बहुमत को मनमानी की छूट देने वाली व्यवस्था या साधनसंपन्न लोगों के मनोरंजनार्थ चलने वाली डिबेटिंग सोसायटी नहीं।

विडंबना यह है कि लोकतंत्र को बोझ या बस संख्याओं का खेल समझने वाले एसपिरेशनल मिडिल क्लास का इतनी तेजी से विस्तार कांग्रेस सरकार द्वारा अपनाई गयी उदारीकरण, निजीकरण की विकासपरक नीतियों के फलस्वरूप ही हुआ है। उदारीकरण निस्संदेह जरूरी भी था। लेकिन क्या निजीकरण, उदारीकरण के साथ ही लोकतंत्र का महत्त्व समझने वाले; भारतीय समाज की बहुलता, विविधता में एकता का सम्मान करने वाले सामाजिक मानस को बनाए रखना, इन चीजों को नयी पीढी का संस्कार बनाना भी उतना ही जरूरी नहीं था?

पिछले कुछ बरसों के घटनाक्रम ने इस यकीन की सीमाएँ उजागर कर दीं हैं। दिखा दिया है कि संविधान-निर्माताओं और स्वाधीनता के तुरंत बाद के शासकों के सारे नेक इरादों के बावजूद हमारे लोकतंत्र के सांस्थानिक आधार जितने होने चाहिएँ उतने मजबूत अभी हैं नहीं। सत्ता में कोई भी हो, लोकतंत्र तो चलता ही रहेगा, इतनी परिपक्वता हमारे लोकतंत्र में अभी नहीं आई है।

चीन के साथ युद्ध में पराजय नेहरू के राजनैतिक जीवन की सबसे बडी दुर्घटना थी। देश में सरकार के विरुद्ध स्वाभाविक क्रोध था; कुछ विरोधी दल ऐन उस समय जबकि संसद में इस बारे में बात चल रही थी, संसद के बाहर सरकार के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। अखबार नेहरू की आलोचना से भरे पडे थे। भारतीय सेना के सत्ता-प्रतिष्ठान और रक्षामंत्री कृष्ण मेनन पर तो और भी तीखी बौछारें पड रहीं थीं। देश की सीमा रोती है, बेशर्म हुकूमत सोती है सरीखे तीखे नारे वातावरण में गूँज रहे थे।

जरा पता लगाइए कि सरकार के विरोधियों के लिए एंटी नेशनल और देशद्रोही जैसे शब्द भी क्या उस वातावरण में इसी इफरात से गूँज रहे थे, जैसे आजकल गूँजते हैं। क्या उस समय भी सरकार के मंत्रीगण गोली मारो सालो को जैसे हिंसक नारे लगाती भीडों में शामिल हो रहे थे? क्या उस समय भी भारतीय सीमा में चीन के बढाव को जनता से छुपाने की कोशिश की जा रही थी?

यह पता लगाते लगाते यह भी याद कीजिए कि जून 2020 में चीन द्वारा लद्दाख में अतिक्रमण के बाद क्या हुआ? देश को चीन का नाम लिए बिना बताया गया कि देश की सीमा में कोई घुस नहीं आया; लेकिन यह नहीं समझाया गया कि फिर बीस भारतीय सैनिक शहीद कैसे हो गये? यह बताया गया कि चीन के अडियल रुख के बावजूद वार्ता चल रही है, लेकिन यह नहीं समझाया गया कि जब कोई घुस ही नहीं आया है, तो वार्ता किसलिए चल रही है, चीन का रुख अडियल किस बात पर है? ये सवाल मीडिया के अधिकांश तबके के लिए जरूरी ही नहीं रहे। टू मच डेमोक्रेसी अच्छी चीज नहीं है ना! जिन लोगों ने ये सवालात पूछे, उन्हें एंटी नेशनल तो कहा ही गया, भारतीय सेना के पराऋम पर संदेह करने का अपराधी भी ठहराया गया।

1962 की पराजय के बाद, आज तक सेनाधिकारियों से लेकर राजनीतिक नेतृत्व पर सवाल उठाये जा सकते हैं, उठाये ही जाने चाहिएँ; लेकिन 2020 और 2021 में लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में चीन क्या कर रहा है, और भारत सरकार क्या कर रही है, यह पूछने वाले एंटी-नेशनल हैं।

सोचें कि ऐसा क्यों हुआ कि इस सीमा-विवाद के दौरान भी सन बासठ की पराजय बहुतों ने याद की, लेकिन नेहरू का लोकतांत्रिक प्रत्रि*या और संस्थाओं के प्रति सम्मान शायद ही किसी को याद आया हो।

वैसे हर्ज यह सोचने में भी नहीं कि यदि नेहरू ने सचमुच प्रबुद्ध या अप्रबुद्ध तानाशाह की भूमिका अपना ली होती, तो टू मच डेमोक्रेसी से परेशान पवित्रात्माओं का क्या होता।

नेहरू-निंदकों के लिए सबसे रसभरे विषय हैं-चीन और कश्मीर। तरह तरह के आरोप नेहरू पर लगाए गये हैं, अनर्गल प्रचार किये गये हैं। ऐसा जताने की कोशिश की गयी है जैसे कि नेहरू जो चाहते थे, कर लेते थे, उनके केबिनेट में किसी की मजाल नहीं थी कि उनका विरोध कर सके। ऐसा मानने और मनवाने लोग समझते हैं कि नेहरू के मंत्रियों की भी उनके सामने वही हैसियत थी, जैसी आज के मंत्रियों की प्रधानमंत्री के सामने है। मजे की बात यह है कि ऐसा प्रचार करने वाले अपने अज्ञानजनित अदम्य आत्मविश्वास में उन्हीं का अपमान कर रहे होते हैं जिनकी पूजा का दिखावा करते हैं।

यदि नेहरू की कश्मीर-नीति ऐसी ही देश-विरोधी थी, यदि नेहरू ने प्लेबिसाइट की बात केबिनेट को विश्वास में लिए बिना ही कर दी थी, तो उनके केबिनेट के किसी भी सदस्य ने विरोधस्वरूप इस्तीफा क्यों नहीं दिया? यह तो संसदीय लोकतंत्र की स्थापित परंपरा है कि प्रधानमंत्री से गहरा मतभेद होने पर या स्वयं को उपेक्षित महसूस करने पर मंत्री इस्तीफा दे देते हैं। मोरारजी देसाई ने 1969 में इंदिरा गाँधी की सरकार से इस्तीफा दिया था। रामविलास पासवान ने 2002 में वाजपेयी सरकार से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि उनके अनुसार वाजपेयीजी गुजरात में भयानक सांप्रदायिक हिंसा के संदर्भ में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने में विफल रहे थे।

कश्मीर पर नेहरू द्वारा देशविरोधी काम करने के विरोध में किस मंत्री ने इस्तीफा दिया? पटेल उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे, अंबेडकर कानून मंत्री। क्या इन दोनों के बारे में माना जा सकता है कि ये प्रधानमंत्री की मनमानी के आगे चुप रहते? अंबेडकर ने आगे चल कर हिन्दू कोड बिल के सवाल पर नेहरू सरकार से इस्तीफा दे भी दिया था, लेकिन कश्मीर के सवाल पर नहीं। और तो और, हिन्दू सभा के नेता और आगे चलकर भारतीय जनसंघ (जो बाद में चल कर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुई) के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भी कश्मीर के सवाल पर, प्लेबिसाइट के सवाल पर, मामले के संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुँचने के सवाल पर नेहरू सरकार से इस्तीफा नहीं दिया था।

जिस फैसले में आपकी भी हिस्सेदारी हो, जिसे आप इतना आपत्तिजनक न मानते हों कि उसे लेने वाली सरकार से अलग हो जाएँ, उसी फैसले को लेकर बाद में ऐसा जताने लगना कि वह तो देशविरोधी फैसला है और आप उसके घोर विरोध में हैं, राजनैतिक नैतिकता का प्रमाण नहीं देता।

डॉ. मुखर्जी ने नेहरू केबिनेट से इस्तीफा दिया जरूर लेकिन 1950 में। नेहरू-लियाकत पैक्ट के विरोध में। उस पैक्ट के विरोध में जिस पर नेहरू ने पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष रूप से सैनिक कार्रवाई की धमकी देकर मजबूर किया था। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हो रहे हमलों के संदर्भ में नेहरू ने दो टूक शब्दों में कहा था-पाकिस्तान सरकार को गंभीरता से विचार लेना चाहिए कि यदि वह अपने ही नागरिकों को सुरक्षा देने में असमर्थ रहती है, तो नतीजे क्या हो सकते हैं। इस असुरक्षा के नतीजे भारत पर भी पडने लगे है। हम उदासीन नहीं रह सकते हमारे सुझाए उपायों पर पाकिस्तान सहमत नहीं हुआ तो हम दूसरी तरह के कदम भी उठा सकते हैं।

इन शब्दों का आशय समझने में पाकिस्तान को देर नहीं लगी। पाक प्रधानमंत्री लियाकत अली 8 अप्रैल 1950 को नयी दिल्ली पहुँचे और दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी देने के लिए सरकारों को प्रतिबद्ध करने वाला यह समझौता हुआ। इसी के विरोध में डॉ. मुखर्जी ने नेहरू सरकार से इस्तीफा दिया था, वे ट्रांसफर ऑफ पापुलेशन पर अडे हुए थे, यानी सारे मुसलमान पाकिस्तान जाएँ और सारे हिन्दू भारत आएँ। जाहिर है कि यह घोर सांप्रदायिक माँग भारतीय राष्ट्र की मूल धारणा के ही विपरीत थी, इसे माने जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता था।

एक प्रचार यह भी किया गया है कि यदि कश्मीर पटेल के हाथ में होता, तो सब ठीक हो गया होता। नेहरू की वजह से ही कश्मीर का एक हिस्सा हाथ से निकल गया, और एक समस्या देश के सामने खडी हो गयी।

वास्तविकता यह है कि पटेल को कश्मीर के पाकिस्तान में जाने से कोई एतराज नहीं था, यदि बदले में पाकिस्तान हैदराबाद के निजाम को उकसाना बंद कर दे। पटेल की चिंता निराधार नहीं थी। पूर्व और पश्चिम में पाकिस्तान के साथ ही, दक्षिण में एक और सिरदर्द मोल लेना भारत कैसे बर्दाश्त कर सकता था? उनसे सहमति लेकर ही माउंटबैटन ने कश्मीर के राजा से कहा था कि यदि कश्मीर पाकिस्तान में शामिल हो जाए, तो भारत इसे शत्रुतापूर्ण कार्रवाई नहीं मानेगा।

नेहरू कश्मीर के सवाल को केवल स्वयं कश्मीरी हने की भावुकता से नहीं देख रहे थे। इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और भू-राजनीति की गहरी पकड के नाते वे कश्मीर के सामरिक महत्त्व की उपेक्षा करने को घातक मानते थे। कश्मीर राज्य की सीमाएँ भारत, पाकिस्तान और चीन के अलावा सोवियत संघ और अफगानिस्तान से भी मिलती थी। इसके अलावा कश्मीर में चल रहे राजशाही विरोधी जन-आंदोलन से नेहरू की सहानुभूति थी। नेहरू कश्मीर का सामरिक महत्त्व पटेल को समझाने में अंततः कामयाब हुए। पटेल के रुख में बदलाव लाने में गाँधीजी की कश्मीर यात्रा की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

उस वक्त शेष भारत के साथ कश्मीर के जो भी सडक या रेल संफ थे, वे उन्हीं इलाकों के जरिए थे, जो विभाजन की स्थिति में पाकिस्तान को मिलने वाले थे। सारा व्यापार और आवागमन इन्हीं से होता था। सडक के जरिए कश्मीर पहुँचने का रास्ता वाया रावलपिण्डी था और रेल के जरिए वाया स्यालकोट। जो हिस्से भारत को मिलने की संभावना थी, उनके साथ कश्मीर का संफ केवल जिला गुरदासपुर होकर जाने वाली कच्ची सडक से था। यदि सारा गुरदासपुर जिला पाकिस्तान को चला जाता तो शेष भारत से कश्मीर का केवल हवा के जरिए संफ संभव था, न सडक और न रेल। यह तथ्य सभी इतिहासकारों ने नोट किया है कि यदि गुरदासपुर भारत को न मिला होता तो कश्मीर पर कबाइली हमले के समय भारतीय फौजों का कश्मीर पहुँचना असंभव था।

रोचक यह है कि 17 अगस्त, 1947 तक यानी रेडक्लिफ एवाड के औपचारिक रूप से घोषित हने तक यही माना जा रहा था कि गुरदासपुर जिला पाकिस्तान को ही जाएगा।

रेडक्लिफ एवार्ड में गुरदासपुर का पूर्वी हिस्सा भारत को मिलना पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान और इतिहासकारों को बहुत खटकता रहा है, वे इसे माउंटबैटन द्वारा नेहरू के प्रभाव में किये गये भारत के प्रति पक्षपात का परिणाम मानते हैं। नेहरू की कश्मीर-नीति के पाकिस्तान-परस्त और इस मामले में पटेल की सख्ती की जैसी धारणा फैलाई गयी है, उसके अनुसार तो कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान को, उसके समर्थक कश्मीर-अध्येताओं को नेहरू के प्रति नरम और पटेल के प्रति कठोर होना चाहिए।

किन्तु वास्तविकता है सर्वथा विपरीत। कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान शुरु से ही पटेल के यथार्थवादी रुख की सराहना करते हुए, नेहरू से बहुत कुपित रहा है।

विभाजन में कौन-सा नगर किस देश को दिया जाएगा, यह तय करने के दो आधार माने गये थे-भौगोलिक समीपता और आबादी की संरचना। गुरदासपुर की आबादी में, 1941 की जनगणना के अनुसार, 50.4 मुस्लिम थे, और 49.4 हिन्दू और सिख। संख्या में मुसलमान केवल 43,000 अधिक थे। मुस्लिम लीग का तर्क था-भौगोलिक समीपता के आधार पर गुरदासपुर पाकिस्तान को ही मिलना चाहिए, आबादी में भी गैर-मुस्लिम प्रतिशत इतना अधिक नहीं कि इसे भारत को दे दिया जाए। उसे विश्वास था कि ऐसा ही होगा भी, हालाँकि वैवेल ने 1946 में ही सिफारिश कर दी थी कि गुरदासपुर के रावी नदी के पूर्व में पडने वाले हिस्से भारत को मिलने चाहिएँ। लेकिन मुस्लिम लीग वाले लंदन तक लॉबिंग कर रहे थे, और उन्हें पक्की उम्मीद थी कि अंत-पंत पूरा का पूरा गुरदासपुर पाकिस्तान को ही मिलेगा। इसके लिए वे सिखों को मनाने की भी भरपूर कोशिश कर रहे थे। उस समय के दस्तावेजों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि गुरदासपुर हासिल करने पर इतना जोर देने के पीछे कश्मीर पर पाकिस्तानी निगाह ही थी।

क्या भारतीय पक्ष में भी कोई इतनी दूर की सोच रहा था?

इतिहासकार द्वय एस. एम. बर्क और सलीम अल-दिन कुरैशी की पुस्तक-दि ब्रिटिश राज इन इंडियाः एन हिस्टॉरिकल रिव्यू (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1995, कराची) भारत में अंग्रेजी राज और की स्थापना से लेकर विभाजन तक के इतिहास के बारे में पाकिस्तानी दृष्टिकोण का परिष्कृत पाठ पेश करती है। ये विद्वान बिना किसी तीखेपन के, तथ्यों की अपने ढंग से व्याख्या करते हुए भारत -विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण का वृत्तांत प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए गुरदासपुर का महत्त्व इससे जाहिर है कि इस बारे में, उन्होंने पुस्तक के अंत में नहीं, बीच में ही, तेईसवें अध्याय के साथ एक परिशिष्ट दिया है, जिसमें कुछ ही समय पहले हासिल हुए दस्तावेज रखे गये हैं। इनके आधार पर बर्क और कुरैशी का कहना है कि रेडक्लिफ ने तो पहले पूरा ही गुरदासपुर पाकिस्तान को दिया था, लेकिन माउंटबैटन के दबाव में वे ऐन आखिरी पल पलटी खा गये और गुरदासपुर की पूर्वी तहसीलें भारत को दे दीं। इन दस्तावेजों मे सेऋेटरी ऑफ स्टेट नोएल-बेकर का प्रधानमंत्री ऐटली को 25 फरवरी, 1948 के दिन लिखा नोट है। वे ऐटली को बताते हैं- ऐसा सोचने के आधार तो निश्चय ही हैं कि सर सिरिल रेडक्लिफ ने गुरदासपुर को पश्चिमी पंजाब के बजाय पूर्वी पंजाब को दे देने वाला बदलाव ऐन आखिरी पल में किया, लेकिन ऐसा उन्होंने क्या माउंटबैटन की सलाह पर किया? हम नहीं जानते। (पृ. 554).

बर्क-कुरैशी इस सिलसिले में चौधरी मुहम्मद अली का क्रोध और दुख उद्धृत करते हैं-यदि रेडक्लिफ ने केवल गैर-मुस्लिम बहुल तहसील पठानकोट ही भारत को दी होती, तो भी भारत के लिए जम्मू-कश्मीर तक पहुँच पाना संभव नहीं होता क्योंकि दो मुस्लिम बहुल तहसीलें-गुरदासपुर और फाजिल्का-बीच में पडतीं। इन दो मुस्लिम बहुल तहसीलों को भी भारत को देकर रेडक्लिफ ने भारत का जम्मू-कश्मीर पहुँचने के लिए रास्ता दे दिया और इस तरह भारत-पाकिस्तान के बीच कटुतम विवाद का बीज बो दिया। ( पृ. 552)

जाहिर है, चौधरी साहब के हिसाब से कटुतम विवाद की जड यही थी कि कबायलियों को खदेडने के लिए भारतीय सेना कश्मीर पहुँच गयी, वरना तो सारा ही कश्मीर पाकिस्तान के हाथ होता और विवाद खडा ही न हो पाता।

बर्क-कुरैशी दस्तावेजों और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर आरोप लगाते हैं कि रेडक्लिफ ने माउंटबैटन के दबाव में ऐसा किया। ऐसे दबाव लिखित रूप में तो डाले नहीं जाते। यह तो दस्तावेजों से ही जाहिर है कि रेडक्लिफ ने गुरदासपुर के बारे में अपना फैसला आखिरी पल बदला। इस बदलाव के पीछे माउंटबैटन का हाथ होने का बर्क-कुरैशी का अनुमान भी काफी तर्कसंगत लगता है। वे इस बात का भी संकेत कर देते हैं कि माउंटबैटन की इस दिलचस्पी के पीछे किसका हाथ था। वे बताते हैं कि 4 अगस्त, 1947 को माउंटबैटन ने भोपाल के नवाब और इंदौर के महाराजा से कहा, कश्मीर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह भारत या पाकिस्तान दोनों में से किसी में भी शामिल हो सकता है, बशर्ते सीमा-आयोग ( रेडक्लिफ) गुरदासपुर को पूर्वी पंजाब में रख दे। यह सूचित करने के बाद बर्क-कुरैशी सवाल उठाते हैं-क्या यह संभव नहीं कि ठीक यही बात जवाहरलाल नेहरू के मन में भी रही हो? ( पृ. 555).

प्रसंगवश, लेखक द्वय अंदमान-नीकोबार द्वीप समूह भारत को मिलने का श्रेय भी माउंटबैटन की इस शरारत को ही देते हैं कि उन्होंने इंडिपेंडेंस बिल से यह उल्लेख हटवा दिया कि यह द्वीपसमूह 15 अगस्त,1947 के बाद भारत का अंग नहीं रहेंगे। इस तरह आई अस्पष्टता के चलते अंदमान-नीकोबार स्वतः ही भारत को प्राप्त हो गये।

बर्क-कुरैशी कश्मीर को भारत में शामिल करने के नेहरू के भावुक, अयथार्थवादी रुख के विपरीत पटेल के यथार्थवादी रुख की सराहना भी करते हैं, पटेल पाकिस्तान के दोस्त नहीं थे, लेकिन जानते थे कि मुस्लिम बहुल कश्मीर भारत में अस्थिरता ही पैदा करेगा। (पृ. 588)

कैसी रोचक बात है कि एडविना माउंटबैटन के साथ नेहरू की जिस मित्रता में नेहरू-निंदक न केवल अश्लील रस लेते हैं, बल्कि उसके कारण देशहित की उपेक्षा करने का आरोप नेहरू पर लगाते हैं, पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान कश्मीर से भारत को सडक-संफ प्राप्त होने और अंदमान-नीकोबार भारत के हिस्से आने के लिए उसी घनिष्ठता को कोसता है।

कश्मीर की विशेष भौगोलिक स्थिति, भारतीय सुरक्षा की दृष्टि से कश्मीर का महत्त्व, वहाँ की जनसंख्या की संरचना और राजा हरिसिंह की अदूरदर्शिता, अपरिपक्वता इन सब चीजों से वाकिफ नेहरू के दिमाग में गुरदासपुर का सामरिक महत्त्व पहले से ही स्पष्ट था।

गुरदासपुर के जरिए भारत को कश्मीर से सडक-संफ प्राप्त हो गया, और वह भी इस तरह कि रेडक्लिफ एवार्ड के बदले जाने की संभावना में औपचारिक रूप से नेहरू तो क्या माउंटबैटन का भी सीधे-सीधे नाम लेना मुश्किल है। नोएल-बेकर हों, या पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान- माउंटबैटन पर पक्षपात या अनफेयर प्ले का सीधा, दो टूक आरोप नहीं लगा सकते। अधिक से अधिक यही कर सकते हैं कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का हवाला देते हुए, अनुमान लगाएँ कि माउंटबैटन ने नेहरू की इच्छा के अनुरूप, भारत के हित में रेडक्लिफ को प्रभावित किया।

चाणक्य नीति इसे कहते हैं।

सन्दर्भ -

1. देखें, किया अनकिया, सं. ओम थानवी, आनंद पांडेय, राजकमल प्रकाशन, 2015,, पृ. 85-102.

2. यह पत्राचार संपूर्ण गाँधी वांगमय और नेहरू के लेखन के संकलनों के अलावा, ‘टुगेदर दे फॉट र् गाँधी-नेहरू कारेस्पांडेस’ सं. उमा आयंगर, ललिता जकारिया, नयी दिल्ली, ऑक्सोफोर्ड यूनिवर्सटी प्रेस, 2011 में भी देखा जा सकता है। पृ. 449-457.

3. हिन्दुस्तान की कहानी, अनुवाद रामचंद्र टंडन, नयी दिल्ली, सस्ता साहित्य मंडल, 2016, पृ. 598-99.

4. विचार का अनंत, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, तीसरा संस्करण, 2020, पृ. 19.

5. श्रीनाथ राधवन द्वारा उद्धृत, वार एंड पीस इन मॉडर्न इंडिया ः ए स्टैटिजिक हिस्ट्री ऑफ नेहरू ईयर्स, रानीखेत, परमानेंट ब्लैक, 2010, पृ. 162.



सम्पर्क - बी-5/ए, ग्राऊण्ड फ्लोर,

कैलाश कॉलोनी, नई दिल्ली-११००४८