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अब्दुलरजाक गुरनाह को नोबेल के मायने

आदित्य कुमार गिरि
कहावत है प्यार भी तुम्हीं से है और घृणा भी तुम्हीं से। नोबेल पुरस्कार दुनिया का ऐसा ही एक पुरस्कार है जिसकी सभी आलोचना करते हैं, लेकिन भीतर गहरे कहीं तीव्र आकांक्षा से इसकी आस भी रखते हैं। कथाएँ तो ऐसी भी हैं कि नोबेल निर्णायकों का ध्यान खींचने के लिए किसी जमाने में लेखक उनके घरों के आगे घर लेकर रहते थे। वहीं ऐसे लेखक भी हुए हैं जिन्होंने इस पुरस्कार को लेने से इंकार भी कर दिया है और भारत की बात करें, तो यहाँ इस पुरस्कार की दो लोगों के संबंध में ऐसी चर्चा हुई है कि इन पुरस्कारों का इतिहास जबतक रहेगा यह दोनों ही व्यक्तित्वों के प्रकरण जरूर स्मरण किए जाते रहेंगे।
पहला है महात्मा गाँधी को नोबेल न दिए जाने का मसला और दूसरा है रवीन्द्रनाठ ठाकुर को नोबेल दिए जाने का मसला। जिस व्यक्ति की अहिंसा के आगे दुनिया नतमस्तक हुई, उस व्यक्ति को शांति पुरस्कार के योग्य नहीं समझा गया और यह एक नहीं, कईबार हुआ। आजतक नोबेल समीति से जुडे लोगों को इसपर जवाब देने में अडचन होती है। और दूसरी ओर बांग्ला के कवि श्री रवीन्द्रनाथ ने इस पुरस्कार को हँसते-हँसते पा लिया। बांग्ला में लिखी काव्य पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद करके उन्होंने वह पा लिया जिसकी चाहना में लोग निर्णायकों के आगे-पीछे घूमते रहे हैं, लॉबिंग करते रहे हैं, आलोचना और चिरौरी करते रहे हैं। भारत के कवि ने वह पुरस्कार बिना किसी प्रयास या वासना के पा लिया।
बहरहाल इसबार भी यह पुरस्कार चर्चा में है क्योंकि इसबार साहित्य के लिए जिस व्यक्ति को यह पुरस्कार दिया गया है उसे पुरस्कार मिलनेवाले दिन तक कोई नहीं जानता था। ट्विटर पर बमुश्किल ढाई तीन सौ लोग उसके फॉलोवर थे और पुरस्कार वाले दिन गूगल की सहायता से उसे खोजने-जानने की मुहिम-सी चल पडी। एक मजाक हुआ कि नोबेल निर्णायकों ने नशे में तो किसी को नहीं चुन लिया। लेकिन गुरनाह के उदाहरण ने दुनिया को यह बताया है कि शोर शराबे और बाहरी चमक से कहीं महत्त्वपूर्ण गहराई है, समझ की गंभीरता बाहरी दिखावे या जोडतोड से बहुत आगे की चीज है। गुरनाह दुनिया का बेहतरीन साहित्य रच रहे हैं और बाजार का ध्यान उनपर हो-न-हो नोबेल की जूरी ने उनके महत्त्व को सबसे आगे आकर समझा है।
आखिर वे ऐसा क्या कर रहे हैं जो उन्हें अपने समकालीनों से अलग बनाता है। गुरनाह अफ्रीकी मूल एक ब्लैक लेखक हैं, लेकिन उससे भी अधिक वे एक मुस्लिम और शरणार्थी हैं। उनका समूचा लेखन साम्राज्यवादी जहन्नुम के काउंटर पर विकसित हुआ है। वे पहली या दूसरी दुनिया के नैरेटिव में नहीं सोचते, बल्कि उनका लेखक सत्ता और दुनिया को अपनी जमीन से पलायन को विवश लोगों के नजरिये से देखने की कोशिश करता है।
अपने देश और समाज की स्वाभाविक सहजता जो शरणदाता देश में फिर कभी नहीं मिल सकेगी, गुरनाह उसी भावबोध के प्रकटीकरण के लेखक हैं।
अपने देश, अपनी जमीन से बिना किसी वजह काटकर फेंक दिए गए लोगों की पीडाओं और घुटन को जिसे वे शब्दों में कभी प्रकट नहीं कर सके, गुरनाह उन्हीं भावों को शब्दों में खोजनेवाले लेखक हैं।
सत्ता की, पैसे की, शक्ति की दौड में छोटो-छोटे देशों को ऋत की लय से अलग कर उपनिवेश बनानेवाले देशों की लूट मनोवृत्ति के खिलाफ गुरनाह एक सांस्कृतिक इतिहास लिखनेवाले लेखक हैं।
यह अचानक नहीं है कि उन्हें योरोप के इतिहास को सभ्यता प्रदान करनेवाला लेखक कहा जाता है। योरोप के उस पाप को शायद शब्दों में प्रकट करने की कला ने ही उन्हें यह उपाधि दी होगी।
गुरनाह उन तमाम पीडाओं को जो अनकहे रह गए, गुरनाह तमाम उन भावों जो अनजिए रह गए,गुरनाह तमाम उन अपराधबोधों जिन्होंने मातृभूमि से दूर हुए लोगों को घुटनभरी जिन्दगी दी-के लेखक हैं।
एक व्यक्ति की सहजता की हत्या असल में सत्ता की सहजता है। सत्ता एक तंत्र है जिसके लिए व्यक्ति की कोई महत्ता नहीं। शायद मुक्तिबोध ने ऐसे ही किसी समय को लक्षित कर कहा होगा ‘तुम्हारी प्रेरणाएँ, मेरी प्रेरणाओं से इतनी भिन्न हैं, कि तुम्हारे लिए जो विष है, मेरे लिए अन्न है।’
सत्ता भीड में सोचती है, और भीड के लिए जो सबसे कम जरूरी चीज है वह संवेदनाएँ ही हैं। लेकिन लेखक के लिए यही सबसे जरूरी चीज है। गुरनाह भी सत्ता के विलोम का पाठ बनाते हैं। एक तरह से समूचे अफ्रीका के सीने में दर्ज दर्द को अपने कथा साहित्य से डिकोड करते हैं। साम्राज्यवादी योरोप ने समूचे अफ्रीका को नोचकर उसे छलनी कर दिया है, और बल्कि ऐसे हालात कर दिए हैं कि वह अपने शोषण और अत्याचार के लिए खुद ही को अपराधी मानता है। द लास्ट गिफ्ट में अब्दुल का अपने अतीत से भागना असल में गहरे अपराधबोध के कारण है। लेकिन उस अपराधबोध की क्या वजह है, यह वह भी नहीं जानता। कहीं गहरे वह खुद को ही दोषी मानता है। उसके बच्चे और पत्नी को उसके अतीत के बारे में कुछ नहीं पता और पूछने पर भी वह उन्हें कुछ नहीं बताता, बल्कि कहना चाहिए नहीं बता पाता, लेकिन उसकी स्मृतियों में उसका अतीत बराबर मुठभेड करता रहता है। यानी वह खुद तो उन्हें जीता है लेकिन औरों को उससे अलग रखता है। यह असल में अपराधबोध के ही कारण है। एक व्यक्ति की सहजता की हत्या की यह घटना इतिहास की किसी किताब में दर्ज नहीं है इसे गुरनाह जैसे लोग ही चिन्हित करते हैं और तब पता चलता है कि सत्ता और विकास की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में कितनी ही संवेदनाओं को घुट-घुटकर मरने को अभिशप्त कर दिया गया है।
गुरनाह का लेखन पीडित का ऐसा पाठ तैयार करता है कि आप दंग रह जाएँगे। द लास्ट गिफ्ट में ही वे एक ऐसे पात्र की चर्चा करते हैं जो अपने देश की बुरी दशा को देखकर एकदिन बिना बताए चुपचाप चला जाता है और तैंतालिस वर्षों के बाद भी इंग्लैंड में अपनी मातृभूमि को याद करके घुटता रहता है। वह कैसी घुटन है, बताने की आवश्यकता नहीं है।
एडमायरिंग साइलेंस में एक ऐसे चरित्र का वर्णन है जो अपना भविष्य बनाने के लिए अपनी मातृभूमि जंजीबार से पलायन कर इंग्लैंड चला आता है, लेकिन इंग्लैण्ड की चकाचौंध में भी उसके भीतर की सारी स्मृतियाँ अतीत में कहीं अटकी पडी हैं। उसके भीतर एक अपराधबोध, एक घुटन का जन्म होता है जो जीवनभर उसे डसता रहता है।
पिलग्रिम्स वे का दाऊद अपनी निराशा का अनोखा उत्तर खोजता है। वह मित्रों और शत्रुओं के नाम व्यंग्यपूर्ण पत्र लिखता है और एक औपनिवेशिक अतीत की पुनर्रचना करता है। और अपने सबसे चर्चित उपन्यास पैराडाइज में तो अजनबीयत और अकेलेपन का सबसे दर्दनाक रूपक है। कहानी का मुख्यपात्र यूसुफ एक बारह साल का बच्चा है जिसे उसके पिता कर्ज न चुका सकने की सूरत में बेच देते हैं। गाँव की स्वाभाविक जिन्दगी को छोडकर उसे पूर्वी अफ्रीका के कोलोनियल परिवेश में ला पटका जाता है। उसके कोमल बचपन की मृत्यु और साम्राज्यवाद के साथ तालमेल बैठाने का गुरनाह ने ऐसा मार्मिक वर्णन किया है कि रौंगटे खडे हो जाते हैं। ऐसा लगता है युसुफ के बहाने गुरनाह स्वाभाविकता की मशीनी हत्या को चित्रित करना चाहते थे जिसकी जडें साम्राज्यवादी लिप्सा में हैं। यूसुफ को जल्द ही यह समझ में आ जाता है कि उसे और उसके जैसे लोगों को योरोप की ताकतों के साथ तालमेल बैठाना होगा क्योंकि मुक्ति कहीं नहीं है।
ग्रेवल हार्ट में सलीम नाम का एक बच्चा है जिसे बचपन से ऐसा लगता है कि उसके पिता उसे प्यार नहीं करते, लेकिन वह अपने चाचा के करीब है। लेकिन पिता की उपेक्षा ने उसके भीतर एक अकेला कोना विकसित कर दिया है जिसकी भरपाई में वह तमाम काम करता है। किताबें पढता है, कल्पनाएँ करता है और इसबीच उसकी स्वाभभाविक बालपन की मृत्यु हो जाती है और वह एक अनचाहे डर की गिरफ्त में आ जाता है। सालों बाद लंदन में रहते हुए भी सलीम को अपने परिवार का इतिहास शर्म और शोषण का पुंज लगता है।
सत्ता की भाषा में, शक्ति की दौड में, मुनाफे की भूख में ताकतवर कमजोरों को ऐसे ही पीसता है। महात्मा गाँधी के रामराज्य में सत्ता की तमाम सुविधाओं की अर्थवत्ता तभी थी जब वह समाज के आखिरी आदमी तक सरलता से पहुँच सके, लेकिन पश्चिमी शासन तंत्र के लिए सत्ता का मैकेनि*म मुट्ठीभर लोगों को, मुनाफे का तंत्र है। महात्मा गाँधी की व्यवस्था इन्हीं अर्थों में पश्चिम का विलोम बनाती थी। अगर गाँधी पश्चिम या पूरब किसी को नहीं भाए, तो जड में यही सहजता थी। जिन लोगों के पास भी शक्ति की वर्चस्ववादी परिभाषा है उन्हें न गाँधी अच्छे लगेंगे और न गुरनाह।
गुरनाह सत्ता की भाषा में नहीं सोचते, उनकी चिंता में जमीन से उखडे, दर-दर भटकते एलिनेशन के शिकार लोग हैं। उन्हें आपकी सत्ता से, देश से, सीमाओं से क्या लेना देना। जिस तरह स्त्री का कोई घर नहीं होता, वैसे ही ब्लैक या दलित भी वैसे ही क्यों न सोचें, उन्हीं की स्थिति कौन-सी बेहतर है। दलित तो फिर भी पहचाने नहीं जाते, लेकिन अपनी पहली प्रेजेंस से ही अलग से चिन्हित हो जानेवाले ब्लैक कैसा जहन्नुम जीते हैं यह बिना ब्लैक हुए नहीं जाना जा सकता और नहीं तो उस विपुल ब्लैक लेखन को पढकर ही उनके दर्द को समझा जा सकता है।
गुरनाह अफ्रीकी लोगों के विस्थापन और शरणार्थी बने जीवन के लेखक हैं। उन्होंने फैशनवादी लेखन के इतर बेहद छोटी संवेदनाओं को पकडा है और उसमें भी *यादातर अनकहे भावों को। गुरनाह को पढते वक्त आपको हैरानी होगी कि जिन भावों को उन्होंने लिखा है वैसे भावों से तो खुद व्यक्ति भी जी चुराता है। गुरनाह के लगभग सभी उपन्यासों के पात्र अफ्रीका से विस्थापित हैं और दूसरे ही छोर पर किसी विकसित देश के शरपणार्थी बनकर अतीत को भीतर कहीं दबाए सामान्य जीवन जीने की कोशिश में मिलते हैं। उनका उखडा रूप असल में स्मृतियों के सहारे अतीत के शोषण को तलाश रहा होता है, लेकिन वर्तमान में वह उनका कहीं जिक्र नहीं करता। लगभग सारे ही उपन्यास इसी ट्रिक से भरे पडे हैं। स्मृतियों का ऐसा यथार्थवादी प्रयोग मैंने दूसरा अबतक नहीं देखा। हिन्दी में स्मृतियों को टूल की तरह प्रयोग करनेवालों में निर्मल वर्मा का नाम अग्रणी है, लेकिन गुरनाह उनसे इस मयने में भिन्न हैं कि निर्मल की स्मृतियाँ रहस्यवादी, आध्यात्मवादी रास्तों से नियतीवाद की ओर ले जाती हैं, जबकि गुरनाह की हर यात्रा यथार्थ की ओर ले जाती है। उनके पास स्मृतियों का जो जत्था है वह बाहर की परिस्थितियों के कारण जन्मी भीतर की कुढन है।
गुरनाह का लेखन बडा अनोखा है।उनके कथा-शिल्प की एक और भारी विशेषता है जो उन्हें औरों से अलग करती है और वह है उनका वस्तुनिष्ठ रूप। वे पात्रों को परिस्थितियों में ऐसे चित्रित करते हैं जिसमें पात्र अपराधबोध और कुण्ठा से ग्रस्त दिखते हैं। वे ऐसे जटिल चरित्र होते हैं जो उपनिवेशवादी शोषण में जीने को अभिशप्त होते हैं। उनके पात्र अपने वर्तमान को जीते हुए अतीत को जीते हैं। वे अपने अतीत के उस दुख से कहीं भागते हैं, कहीं छुपाते हैं, कहीं उसे फिर से जीकर ठीक करना चाहते हैं। सत्ता की साम्राज्यवादी दौड ने गुरनाह के देश के लाखों लोगों को पलायन और फिर शरणार्थी बनने को विवश किया है। उन्हें भी मात्र अठारह वर्ष की उम्र में अपनी मातृभूमि जंजीबर से पलायन करना पडा। वे इंग्लैण्ड आकर बस गए और यहाँ अपनी मातृभूमि से कटकर उसकी स्मृतियों में जीने लगे। उनका मानस उनसे बारम्बार पूछता है कि उनकी गलती क्या है। वे किस जुर्म की सजा पा रहे हैं। आखिर उनके जीवन की सहजता की हत्या क्यों कर दी गई। उनके तमाम उपन्यास इसी तरह के सवालों से भरे पडे हैं। एक आम और कमजोर आदमी केवल सवाल ही तो कर सकता है क्योंकि बडी पूँजी,सत्ता और ताकत के कॉकटेल से बने राष्ट्रों की भूख के बरअक्स लडने की ताकत उनमें नहीं होती। गुरनाह ने अपनी इसी कमजोरी के बाबत साहित्य को शस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया है। वे अपने उपन्यासों में उन सवालों को, उन कुण्ठाओं, अपराधबोधों और जमीन से अपने लगावों को पूरी तीव्रता से रखते हैं। उनके पात्र एक मुसलसल तनाव, एक घुटनभरी पीड में रहते हैं। ऐसा लगता है उनके दुःख को वे किसी से बता नहीं सकते। गुरनाह का पूरा लेखन अफ्रीका की दयनीयता और उसे तहस नहस करनेवाले योरोप की गाथा कहता है लेकिन उनमें न कोई नस्लीय घृणा है ना ही कोई जातिवादी आग्रह। उनके पात्र भी मनुष्य हैं और शोषण तथा अत्याचार करनेवाले सत्ताधारी, आक्रमणकारी लालची शोषक हैं वे न ईसाई हैं और न ही कोई और जाति से संबंधित कुछ। उनके उपन्यास डिजर्शन में दो अलग ही नहीं, एकदम विपरीत संस्कृतियों के लोगों में प्रेम दिखाना उनकी कला की सबसे ऊँची चीज है। यह गुरनाह की जगह खुद को रखकर ही समझा जा सकता है कि घृणा और शोषण के वातावरण में सकारात्मक प्रेम की कल्पना कितना कठिन होता है। गुरनाह के पास योरोप के लोगों के लिए घृणा नहीं है बस वे उस भूख, उस दौड, उस शोषण को चिन्हित करते हैं जिसके कारण युद्ध होते हैं, छोटे कमजोर देश उपनिवेश बनते हैं और लाखों करोडों लोगों को खरीदा बेचा जाता है, उनका पलायन होता है, उनकी नारकीय दशा होती है। जिन संसाधनों का प्रयोग रोटी-कपडा और मकान की बुनियादी सुविधाओं के इंतजाम में किया जाना चाहिए उनसे हथियार खरीदे जाते हैं, हत्याएँ होती हैं और लाखों-लाखों लोगों की संवेदनाओं को मारकर एक उप-जीवन जीने को छोड दिया जाता है। अपने देश, अपनी मातृभूमि में व्यक्ति जिस सहजता जिस अधिकार भावना से जीता है शरणार्थी बननकर वह उसे कभी नहीं जी पाता या कहना चाहिए नहीं जी सकता। उसे हमेशा आउटसाइडर की तरह या कहें हिकारत से देखा जाता है। आफ्टर लाइव्स में जर्मनी द्वारा अफ्रीका की बर्बरतापूर्ण दमन की कथा है। उन्होंने अपने इस उपन्यास में जर्मनी के कूरतम रूप का सांस्कृतिक इतिहास प्रस्तुत किया है। जर्मनी ने लगभग पूरे अफ्रीका को गुलाम बनाकर रखा था। एक समय उसने नामिबिया, कैमरोन, टोगो, तंजानिया, केन्या, रवाण्डा और बुरुण्डी पर कब्जा कर रखा था। अफ्रीका के लिए जर्मनी एक बर्बर शासक रहा है।
आखिर हर उपन्यास में एक ही तरह की त्रासदी, एक ही तरह का दर्द, एक ही तरह का तनाव क्यों है। आखिर गुरनाह किन परिस्थितियों को स्मृतियों से खींचकर लाना चाहते हैं। दुनिया के विकास के इतिहास में ऐसी सारी घटनाएँ अचर्चित रही हैं, विकास के, ऐतिहासिक यात्रा के किसी भी इतिहास में इन या ऐसी घटनाओं का जिक्र नहीं है। गुरनाह का समूचा साहित्य, लेकिन ऐसी घटनाओं से भरा पडा है क्योंकि असल में उन्होंने कहीं-नकहीं या तो खुद वैसा जी. है या उनकी मातृभूमि के लोगों का वही सच है।
उनकी रचनाओं में आत्यांतिक रूप से बच्चे होते हैं। और कथा के प्रवाह में वे बडे भी होते हैं, और बूढे भी। ऐसा लगता है वे बच्चों से बूढों तक की यात्रा के बहाने साम्राज्यवाद के बीज से आजतक की स्थिति को पकडने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा इसलिए भी क्योंकि भूमण्डलीकरण की चकाचौंध में जब हर तरफ विकास, और मित्रता और भाईचारे के कृत्रिम नारे गुंजायमान हैं वैसे में इसी सुंदर चमचमाते नगरों में अपनी जमीन से कटे, स्वाभिवकता की लाश ढोए लाखों लोग घुटन और तनाव की जिन्दगी जी रहे हैं। गुरनाह आज की विकसित संस्कृतियों को बस यह याद दिलाना चाहते हैं कि इस विकास या शांति(?) की कुछ जातियों ने बडी कीमत चुकाई है। आज भी दुनियाभर में वर्चस्व की लडाई, तेल की लडाई, खदानों की लडाइयाँ हो रही हैं और दो हाथियों की आपसी रंजिश में न जाने कितने ही यूसुफों, सलीमों,दाऊदों, डॉटी,मरियमों के भीतर की संवेदनाएँ घुट-घुटकर मर रही हैं। आज भी लगभग समूचा योरोप, समूचा अमेरिका, समूचा केनेडा और अब भारत भी शरणार्थियों की आँखों में उम्मीद की किरण बन गया है। वे अपने जहन्नुम को भोगते हुए इन देशों से शरण की भीख माँगते हुए कैंपों में, देशों की सीमाओं के बाहर चडप रहे हैं। कुछ हजार भीड अपने नए शासन तंत्र से डरकर हवाइ जहाजों की छतों पर लदकर जान बचाने की नाकाम कोशिशें कर रहे हैं, कुछ लाख लोग चीन से, कुछ लाख म्यांमार से, कुछ इराक से, कुछ सीरिया से ऐसे ही अभिशप्त नारकीय जीवन लिए इधर-से-उधर डोल रहे हैं। ऐसे समय में अब्दुलरजाक गुरनाह की ओर ध्यान न जाता, तब *यादा आश्चर्य होता है कि नोबेल निर्णायकों का विश्व के इस नए संकट पर लगातार लेखन करने वाले को पुरस्कृत करना असल में अचानक नहीं है, बल्कि यह उस लेखक की साधना को सम्मान तो है ही, लेकिन साथ ही विश्व के सत्ता प्रतिष्ठानों को प्रतिकात्मक संदेश भी है कि वे अपनी वर्चस्ववादी अँधी दौड को बंद कर दें और जीवन को, दुनिया को उनकी स्वतंत्र वैयक्तिक चेतना के साथ जीने का वक्त और परिवेश दोनों मुहैया कराएँ।
नोबेल के आयोजकों ने उन्हें पुरस्कार देकर मानो दुनिया के सत्ताधीशों को यह संदेश दिया है कि उनकी सत्ता की भूख से ऋत टूट रहा है। सहज और सरल जीवन की लय बाधित हो रही है। एक बडी आबादी असहज और उपेक्षित जीवन जीने को अभिशप्त हो रही है। सीरिया, अफगानिस्तान, इराक,चीन,म्यांमार आदि देशों से इतने बडे पैमाने पर पलायन के लिए दोषी लोगों को मानो संदेश दे रहे हों कि वे अपनी शक्ति की दौड को बंद कर दें। गुरनाह पीडित वर्ग के प्रतिनिधि हैं और नोबेल आयोजकों के लिए साहित्य का एक मजबूत शस्त्र जो प्रतीकात्मक ढंग बनकर सत्ता के लिए नॉकिंग पोईंट है। योरोप-अमेरिका के सामने आज जो शरणार्थियों की भीड खडी है, वह किसी विस्फोट से कम नहीं है। अभी पिछले दिनों फ्रांसिस फुकुयामा ने इस निषय पर एक पुस्तक ही लिख दी है। योरोप और अमेरिका में शरणार्थियों का बडे पैमाने पर आगमन असल में एक नई अराजक स्थिति पैदा कर रहा है और आनेवाले दिनों में यह और भयंकर होने जा रहा है। दुनिया में जिन्हें फर्स्ट वर्ल्ड कहा जाता है और उन्हें और अधिक जिम्मेदार होने की जरूरत है, लेकिन हो इसके उलट रहा है। कहाँ तो उन्हें दुनिया के नियमों की सहजता को बचाना था और कहाँ वे ही उसे तोडने में लगे हुए हैं। इस अराजक स्थिति और भयावह परिवेश में गुरनाह एक चीत्कार हैं, एक पुकार हैं। आज वे इस पुरस्कार के सही हकदार हैं। यह पुरस्कार गुणवत्ता से अधिक प्रतीकात्मक है। नोबेल निर्णायक समूह के इस प्रतीकात्मक रूपक की सराहना की जानी चाहिए। इस घटना के बाद से पूरा योरोप, समूचा अमेरिका गुरनाह के बहाने शरणार्थियों पर चर्चा करेगा और इसीसे शायद उम्मीद की कोई किरण फूटे।
सम्फ- द्वारा श्री रामदुलार गिरि
जूनो इन्क्लेव, 118 डीपीजेएम रोड, पोस्ट बजबज, जिला - 24 परगना दक्षिण- 700137 (पश्चिम बंगाल)। मो. 9831615131