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मनोविज्ञान के आईने में कामायनी और अग्निसागर

एजाज अहमद कादरी
भारतीय साहित्य में मन का वर्णन बहुत प्राचीन काल से मिलता है। ऋग्वेद में मन की उत्पत्ति काम से मानी गई है। यहाँ काम को मन को रेतस् या मूल बीज कहा है। ब्राह्मण ग्रन्थों में काम संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, घृति, अघृति, लज्जा, बुद्धि, भय इन सभी को मन के अन्दर ही माना गया है।
डॉ. द्वारिकाप्रसाद ने लिखा है कि योग वशिष्ठ में मन को संसार का उत्पादक, अत्यन्त बलशाली एवं संकल्प-विकल्प करने वला बतलाया है। न्याय एवं वैशेषिक दर्शन में मन को सुख-सुखादि का अनुभव करने वाली साधन इन्द्रिय माना है और उसे प्रत्येक आत्मा में विषत् रहने के कारण अनन्तः परमाणु रूप तथा नित्य बतलाया हैं
वेदान्त में अन्तःकरण की चार वृत्तियाँ मानी गई है। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त ये चार भेद कार्यपरक हैं। इसमें लिखा है कि मन प्राणियों के अन्तःकरण का वह अंश है जिससे वे अनुभव, इच्छा, बोध, विचार और संकल्प-विकल्प करते हैं।
भारतीय विद्वानों की तरह ही पाश्चात्य विद्वानों व मनोवैज्ञानिकों ने भी मन के बारे में अपने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। डॉ. द्वारिकाप्रसाद ने लिखा है कि यह मन ही समस्त भावों का उद्गम स्थान है, यही संसार के परिवर्तन का कारण है और इसी की प्रेरणा से हल्के पदार्थ परिधि में घूमा करते हैं तथा भारी पदार्थ केन्द्र की ओर गिरा करते हैं। इसके उपरान्त प्लेटों ने भी मन को सर्वोपरि सिद्ध किया है। उसका मत है कि समस्त कार्यों के दो प्रकार के कारण होते हैं-(1) बुद्धिगत या स्वतन्त्र तथा (2) परतन्त्र या पर-चालिता प्रथम का संबंध मन से हैं और यह मन ही संसार में अच्छे और भले का निर्माण करता है।
इनके अलावा अरस्तू ने मन को विचार करने की शक्ति माना है और इसे आत्मा से बिल्कुल अलग माना है। जॉर्ज बर्कले ने मन को सबका ज्ञाता माना है तथा संसार को उसका विचार मात्र माना है। स्टाडर ने मन तथा जड पदार्थ संबंधों विवाद पर विचार करते हुए उसके तीन सिद्धान्तों की ओर संकेत किया है-(1) परस्पर क्रियावाद (2) समानान्तर वाद (3) जडवाद। इसके अलावा फ्रायड ने मन के चेतन ओर अचेतन दो रूपों को माना है। चेतन मन की तुलना में अचेतन मन को अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। लिखा है कि अचेतन मन में काम या इच्छाएँ दमित रूप में मौजूद रहती हैं और वे स्वप्नों, दिवास्वप्नों, भूलों, हास्य, कला, धर्म अन्य मानसिक उपद्रवों आदि के रूप में प्रकट होती रहती हैं।
अतः पाश्चात्य दार्शनिकों ने पहले तो मन को एक आध्यात्मिक सत्ता के रूप में माना था और उसे एक ऐसी स्वतन्त्र इकाई मानते थे जो निर्माण धारणा, अनुभव, विचार आदि कार्यों को करती थी। आगे चलकर उनकी धारणा में परिवर्तन हुआ और लिखा कि मन एक स्वतन्त्र एवं पूर्ण इकाई नहीं है, अपितु वह विभिन्न इकाईयों का मिश्रित रूप है।
प्रसादजी ने अपनी मानस कविता में मन की तुलना सरोवर से की है तथा मन की सरोवर की भाँति विशाल बताया है क्योंकि जिस प्रकार सरोवर में बहुत-सी तरंगें उठती रहती हैं, उसी प्रकार मन में भी हमेशा तरंगें हिलोरे लेती रहती है। मन सरोवर के किनारे बैठकर मनुष्य उसकी अद्भुत तरंगों की मीठी मान सुना करता है। प्रसादजी ने चिन्ता, हर्ष, विषाद, क्रोध, निर्वेद, लोभ, मोह, आनन्द आदि को इस मन सरोवर के मकर-समुदाय व महान मत्स्य कहा है तथा आशा को रत्न और मुक्ता की सानी बतलाया है। चित्राधार में लिखा है कभी-कभी कल्पना को उक्त महान मत्स्य निगल जाते हैं, जिससे यह मन अनजाने ही दुःख से व्यथित हो उठता है। यद्यपि मनरूपी सरोवर में उत्पन्न कमल का तन्तु अत्यन्त सूक्ष्म है, फिर भी उसमें बडे-बडे भयानक जन्तु फँस जाते हैं। इस मनरूपी सरोवर की तरंगें असीम हैं। जिनमें चित्तरूपी हंस बडे सुखपूर्वक क्रीडा करता रहता है। इसी प्रकार प्रसादजी ने मानस कविता में चिन्ता से लेकर आनन्द तल की स्थिति मन बतलाई है।
चिन्ता, हर्ष, विसाद, क्रोध, निर्वेद।
लोभ, मोह, आनन्द आदि बहुत भेद।।
डॉ. द्वारिकाप्रसाद ने लिखा है कि वह मन सौन्दर्य, लोभी होकर कभी सराल रहना अच्छा नहीं समझता और अधिकाधिक आडम्बरमय जीवन व्यतीत करता हुआ, अनेकानेक विकारों में लीन हो जाता है जिससे सुख की मृग मरीचिका में कुरंगवत् चक्कर काटना पडता है। इसी कारण प्रसादजी भी मन में निग्रह को आवश्यक समझते हैं तथा इसे महापुरुषों का स्वभाव बतलाते हैं। यह मन सद्बुद्धि और हृदय के साथ मिलकर ही आनन्द मार्ग का अनुगामी हो जाता है।
डॉ. श्याम सिंह ने अपनी मन संबंधी धारणा को अग्नि-सागर में प्रकट की है। उनका कहना है कि श्रेष्ठ मन वही है जो धैर्य रखे, शीर्य सिंह की भाँति, भीख मांगना भी उसको शोभा नहीं देता, मन किसी के अधीन नहीं रहता, मन हमेशा भटकता ही रहता है। उनका निवास कभी स्थाई नहीं रहता, मनु को उन्होंनें एक मन के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया है।
शशिजी ने मन संबंधी बातें अपने काव्य में यत्र-तत्र प्रकट की है। उन्होंनें मन को मकडियों के जाल की भांति बताया है, वह हमेशा भोग के घेरे में फँसा रहता है। अगर मन को विश्राम मिल जाए, तो जीवन का सन्तुलन ही बदल जाएगा। मन तो ऐसी शक्ति है जो काम, क्रोध, लोभ व मोह से भी नहीं हिल सकती। क्योंकि इसके भीतर हमेशा काम-वासनाएँ शान्तरूप में निवास करती हैं।
कामायनी के आमुख में लिखा है कि मनु अर्थात् मन के दोनों पक्ष, हृदय और मस्तिष्क का संबंध क्रमशः श्रद्धा और इडा से भी सरलता से लग जाता है। कामायनी का पहला सर्ग चिन्ता है। प्रसादजी ने अधिकतर सर्गों के नाम मनोवृत्तयो का चित्रण करके आपने भारतीय ग्रन्थों से सहमत होकर यह सूचित किया है कि चिन्तन या मनन मन का मूल व्यापार है।
पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि प्रायः प्रेरकों की पूर्ति में परिवेशगत बाधाएँ उत्पन्न होने के कारण मानसिक हलचल उत्पन्न हो जाती है। परिवेशगत बाधाओं में अकाल, तूफान, बाढ आदि भौतिक घटनाएँ होती हैं।
कामायनी के अन्तर्गत भी प्रलय कारिणी भंयकर बाढ का उल्लेख आता है। इसलिए उसके कारण जो मन के प्रेरकों की पूर्ति में परिवेशगत बाधाएँ पैदा हुई है। उसके कारण मन में चिन्ता, उद्वेग आदि का उठाना स्वाभाविक है।
चिन्ता सर्ग के बाद आशा सर्ग के आता है। जिसमें प्रलय-जन्च उत्पादों के शान्त होते ही सुबह उषा का स्वर्णिम प्रकाश नजर आता है। प्रकृति में चारों ओर नयी चेतना फैल जाती है और सुप्त वनस्पतियों द्वारा जाग जाती हैं। लेकिन एक रात को प्रकृति के चन्द्र ज्योत्सना पूर्ण वैभव का दर्शन करते ही उसमें अनादि वासना पैदा हो जाती है। गौरव एक प्रकार की मूल प्रवृत्ति है, उल्लास या गर्व नाम संवेग के रूप में प्रकट होती है।
हमारे भारतीय शास्त्रों में इसे रति भाव कहा है, शीतल पवन का स्पर्श, चन्द्र ज्योत्स्ना, उद्यान, वर्षा आदि के कारण इसकेा उद्दीप्त होते हुए बतलाया है। इसके संयोग और वियोग दो भेद किए गए हैं।
श्रद्धा सर्ग अन्तरमन तथा श्रद्धा का आपसी संबंध बताया गया है। इससे पहले आशा सर्ग में मन के अन्दर रागात्मक भाव या अनादि वासना का उत्पन्न होना बतलाया है। पतंजलि योग सूत्र के टीकाकर श्री हरिहरानन्द आरण्य में लिखा है कि शानि और गुरु से लब्ध ज्ञान बहुत व्यक्तियों की औत्सुका निवृत्ति करता है। ऐसे औत्सुक्यवंश होकर जो जाना जाता है वह श्रद्धा नहीं होती। जिसे जानने के साथ चित्र का सम्प्रमाद रहता है, वही श्रद्धा होती है और श्रद्धा भाव के रहने से लगातार श्रद्धेय विषयों के गुण समूह के आविष्कार द्वारा प्रीति और आसक्ति बढती रहती है।
श्रद्धा के बाद मन में काम की भावना को उत्पन्न होना बतलाया है। न्याय दर्शन में इच्छा को ही काम बताया है। हृदय या श्रद्धा से संबंध होते ही मन में भविष्य-निर्माण करने की अभिलाषा उत्पन्न हुई है। डॉ. द्वारिका प्रसाद ने लिखा है कि निराश और निरूपाय रहने की अपेक्षा आशामय होकर भविष्य-निर्माण करने के लिए प्रयत्नशील बनना चाहिए।
पाश्चात्य विद्वानों का मत है कि मानव जीवन का अत्यधिक प्रेरणा देने वाला काम ही है। यह काम की प्रवृत्ति जब दबा दी जाती है तब वह स्वप्नों, द्विस्वप्नों, भूलों, हास्य, कला, धर्म और मानसिक उपद्रवों के रूप में प्रकट होती है। प्रसादजी ने भी मन की स्वप्नावस्था में ही काम का परिचय कराया है और इस काम-मूल प्रवृत्ति के दबाने के कारण ही स्वप्न के रूप में उस समय प्रकट हुआ है हृदय (श्रद्धा) ने मन बार-बार इस मूल प्रवृत्ति के अपनाने का निवेदन किया है, प्रलोभन दिये हैं और प्रेरित भी किया है, लेकिन मन इस मूल प्रवृत्ति को दबाने में ही मग्न रहा है।
जो कुछ हो मैं न सम्भालूँगा, इस मधुर भार को जीवन के।
यही कहकर मनु श्रद्धा के समझाने व काम का निवेदन करने पर इस काम प्रवृत्ति को दबाते हैं।
डॉ. द्वारिकाप्रसाद लिखते हैं कि मन ने काम धर्माविरूद्ध सृजनात्मक रूप न अपनाकर केवल वासनामय रूप ही अपनाया है। जिसके कारण मन में मूल प्रवृत्ति के सृजनात्मक रूप की अपेक्षा वासनात्मक रूप की प्रबलता हो गई है और वह पार्थिव व सौन्दर्य की ओर आकृष्ट होकर आसक्तिपूर्ण बन जाता है। इसका उल्लेख वासना सर्ग में मिलता है-
छूटती चिनगारियाँ उत्तेजना उद्भ*ान्त।
धधकती ज्वाला मधुर, था वध विकल अशान्त।।
पाश्चात्य विद्वान मैंकडूगल ने काम को मूल प्रवृत्ति माना है और वासना को काम का एक संवेग कहा है, जो काम प्रवृत्ति के उदय होते ही मन में अपना स्थान बना लेता है, प्रत्येक संवेग का मूल प्रवृत्ति का कार्य है। यदि देखा जाए तो वासना काम का व्यक्त रूप है और लज्जा उस व्यक्त रूप के प्रसाद को रोकने वाला मनोभाव है। कामायनी में लिखा भी है कि -
मैं उसी चपल की धागी हूँ, गौरव महिमा हूँ सिखलाती,
ठोकर जो लगने वाली है, उसको धीरे से समझाती।।
साहित्य शास्त्र में लज्जा की क्रीडा के रूप में एक तरह का संचारी भाव कहा गया है। कामायनी में मनु आकूलि किलात द्वारा भ्रमित होकर हिंसा, मादकता, विलासिता आदि भ्रष्टकर्मों में मग्न हो जाते हैं और एकमात्र अपने सुख को ही सबकुछ समझते हुए कहते हैं-
तुच्छ नहीं है, अपना सुख भी श्रद्धे, वह भी कुछ है।
दो दिन के इस जीवन का तो वही चरम सुख कुछ है।।
इसलिए भारतीय दृष्टि से यह मन की पत्नीमुख स्थिति का वर्णन है। पाश्चात्य विद्वान मैकडूगल का मत है यह भी मन की एक मूल प्रवृत्ति है और स्वामित्व को इसका संवेग बतलाया है। इसमें लोभ अधिक बढ जाता है, स्वामी कहलाने की इच्छा तीव्र हो जाती है और सर्वत्र अधिकार स्थापित करने की लालसा जाग्रत हो जाती है।
आसुरीकर्मों में मग्न मन के अन्दर यहाँ पर ईर्ष्या उत्पन्न होती है। कामायनी में मन के अन्दर भी यह ईर्ष्या श्रद्धा की उन्नति को देखकर व प्रेम के मर जाने पर पैदा होता है।
यह मनोभाव जलन की वजह से उत्पन्न हुआ है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में अहं भाव प्रेरित कर रहा है। पाश्चात्य मनोविश्लेषक-शास्त्रियों ने इस ईर्ष्या मनोवृत्ति का कारण दूसरा बताया है। फ्रायड का मानना है कि इस ईर्ष्या के अन्तर्गत भी काम का हाथ है, क्योंकि एक लडके में और उसके पिता में परस्पर ठेस की भावना जन्म से ही होती है और माता के प्रति उस लडके का आकर्षण रहता है और इसे फ्रायड ने मातृग्रन्थि कहा है और बतलाया है कि यह ग्रन्थि प्रौढावस्था या किशोरावस्था से बहुत पहले ही बन जाती है।
इसलिए मनु का श्रद्धा के प्रति आकर्षण होते हुए भी जैसे ही श्रद्धा गर्भवती होती है और उसके उदर में एक पुरुष-शिशु पलने लगता है वैसे ही मनु में ईर्ष्या, द्वेष आदि जाग्रत होने लगते हैं जो मात्तृग्रन्थि की ओर इशारा करते हैं।
अब तक मन श्रद्धा (हृदय) के अन्दर ही घूम रहा था, लेकिन ईर्ष्या के कारण अब उसे हृदय के प्रति कोई लगाव नजर आता और वह उस क्षेत्र को छोडकर बुद्धि के क्षेत्र में घुस जाता है। डॉ. द्वारिकाप्रसाद ने लिखा है कि कामायनी के आमुख में प्रसादजी ने इडा को बुद्धि कहा है और श्रद्धा के साथ-साथ पूजा भी यौन सिद्धि में सहायक बतलाई गई है। प्रसादजी ने कामायनी में इसका उल्लेख किया है।
वक्षस्थल पर एकत्र धरे
संसृति के सब विज्ञान-ज्ञान
था एक हाथ में कर्म कलश
वसुधा जीवन रस सारा लिये।
पाश्चात्य विद्वान स्टर्न का मानना है कि बुद्धि जीवन को नई समस्याओं और स्थितियों से समायोजन करने की सामान्य मानसिक योग्यता है। कामायनी में मन भी जब अपनी वासना को तृप्त होता हुआ देखता और प्रेम एवं अधिकार को बँटा हुआ देखता है।
पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक फ्रायड का मानना है कि अधिकतर स्वप्न सत्य होते हैं, क्योंकि वे अतृप्त इच्छाओं के नग्न प्रकाशन होते हैं। प्रौढ जीवन में कुछ स्वप्न सीधे इच्छा की पूर्ति करते हैं, परन्तु प्रौढों के अधिकांश स्वप्न उनकी दबी हुई अचेतन काम-वासनाओं एवं काम के विरोध से उत्पन्न होने वाली द्वेष-भावनाओं का वेष बदलते हुए सांकेतिक रूप में प्रकाशन करते हैं। यहाँ पर भी श्रद्धा को जो मनु और इडा के प्रेम व काम वासना से संबंधित स्वप्न दिखाई दिया है। लेकिन सारस्वत प्रदेश में जो संघर्ष उत्पन्न हुआ है उसका मनोवैज्ञानिक दृष्टि से क्या समाधान है? कामायनी में वर्णित संघर्ष पर विचार करे तो मालूम पडता है कि यहाँ पर भी मन के सामने दोनों ही प्रकार की बाधाएँ पैदा होती हैं।
मन यहाँ पूर्णतः इष्ट एवं आनुश्रविक विषयों में वितृष्णा हो जाता है और इसी में निर्वेद भाव जाग्रत होता है, मनोविज्ञान की दृष्टि से निर्वेद भी एक प्रकार की मूल प्रवृत्ति है, जिसका संबंध मैकडूगल द्वारा प्रस्तावित विकर्षण से है क्योंकि विकर्षण में अरूचि या घृणा संवेग उत्पन्न होता है तथा इसके कारण व्यक्ति वस्तुओं या पदार्थों एवं मनुष्यों से दूर हटता है, उनसे घृणा करता है और उन्हें देखकर नाक-भौं सिकोडने लगता है। कामायनी का निर्वेद संबंधी वर्णन भी उक्त संवेगों से ओत-प्रोत है क्योंकि यहाँ पर भी मनु समस्त सांसारिक पदार्थों से घृणा करने लगते हैं।
साहित्यशास्त्रों में निर्वेद को शान्त रस का स्थायी भाव माना गया है और संसार से अत्यन्त निर्वेद होने पर तत्व ज्ञान द्वारा वैराग्य का उत्कर्ष होने पर शान्त रस की प्रतीति होना बतलाया गया है।
मनु के मन की भी यही स्थिति हो गई है। वह संसार की समस्त कामनाओं, अहंकार, ममता, स्पृहा आदि से दूर हो जाता है और उसमें केवल एक तत्वज्ञान के प्रति आस्था हो जाने के कारण भ्रक्ति, नम्रता, विराट शक्ति में विश्वास आदि उत्पन्न हो जाते हैं। इसके अलावा पाश्चात्य विद्वान भी मन की तीन प्रवृत्तियाँ मानते हैं जो क्रमशः ज्ञान, इच्छा और क्रिया कहलाती है। सम्भवतः प्रसादजी यहाँ मन का क्रमिक विकास दिखाना चाहते हैं। इसी वजह से उन्होंने पहले मन के सामने शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि विषयों व रागमय लाया-राज्य से परिपूर्ण भावलोक का दर्शन कराया है, जो मानस जीवन की भूमिका है और जिसे संसार का अत्यधिक निम्न भाग कह सकते हैं।
श्रद्धायुक्त, भक्ति, आस्तिव्य भाव, पवित्रता, संसार की वास्तविकता का ज्ञान आदि जाग्रत हो जाने पर मन को आखिर में आनन्द की प्राप्ति होती है। यह मन के क्रमिक विकास की अन्तिम अवस्था है। योगशास्त्र में पतंजलि ने लिखा है कि वैराग्य उत्पन्न होने के उपरान्त जब समस्त दोषों के बीच नष्ट हो जाते हैं, तब कैवल्य की प्राप्ति होती है और योगियों का यह कैवल्य ही मोक्ष या अखण्ड आनन्द धाम है। कामायनी में भी मन की आनन्दावस्था का उल्लेख मिलता है कि वह चेतन मन चिरमिलित प्रवृत्ति से पुलकायमान होता हुआ निज शक्ति में तरंगात्यित शोभाशाली आनन्द-अम्बुनिधि का स्वरूप मिलता है।
चिरिमिलित प्रकृति से पुलकित वह चेतन पुरूष पुरातन,
निजी शक्ति तरंगायित था आनन्द अम्बुनिधित शोभना।
कामायनी में मन को आनन्द की प्राप्ति उस वक्त होती है। जब वह श्रद्धायुक्त होकर इन्द्रियों पर विजय हासिल कर लेता है, काम-क्रोधादि से युक्त हो जाता है। इन समस्त बातों को ग्रहण करने के कारण ही मन में समरसता का संसार होता है, अपने-पराये की भावना तिरोहित होकर पूर्ण अद्वैत भाव जाग्रत होता है और वह जड-चेतन में सर्वत्र एक चेतनता का विलास देखता हुआ अखण्ड आनन्द में मग्न हो जाता है।
पाश्चात्य विद्वानों की नजर में आनन्द एक प्रकार की सुख की अनुभूति है। सभी विद्वानों के अलग-अलग मत मिलते हैं। वैन का मत है कि आनन्द रक्तसंचार, पाचन और श्वसन आदि सभी जीवन व्यापारों को उत्तेजित करता है और शौक इसके विपरीत प्रभाव उत्पन्न करता है। हर्वर्ट का मानना है कि मन में विचार अथवा विचार शक्तियाँ होती है जो चेतना की अन्तिम तत्त्व कहलाती हैं। सुख की उत्पत्ति विचारों की संगति से और दःख की उत्पत्ति विचारों के तनाव से होती है।
प्रसाद ने कामायनी में चिन्तित एवं न्याथित मन की भावनाओं, प्रकृतियों, मनोवृत्तियों आदि के विभिन्न क्षेत्रों में पर्यटन करते हुए अन्त में आनन्दलोक तक पहुँचाया है और इस यात्रा में मन के क्रमिक विकास का जो रूप अंकित किया है। वह भारतीय पाश्चात्य दार्शनिकों एवं मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से उपयुक्त एवं न्यायसंगत है।
अग्निसागर की हर दिशा में मन के विकास को दर्शाया गया है। उन्होंनें भी अपने काव्य में मन के आधार पर ही दिशाओं को नाम दिया गया है। प्रथम दिश में ब्राह्मण रात्रि के अन्तर्गत श्रद्धा का मन अब उस राजगृह में लगता ही नहीं है। वह मनु से कहती है कि मुझे तो यह राजगृह एक काल ग्रह की भाँति प्रतीत हो रही है। जलप्लावन के समर्थ मनु व श्रद्धा का मन दुःख के रूप में आया है।
देव व असुरों में बात-बात पर युद्ध छिड जाते हैं। इस युद्ध में मनु भी हार जाते हैं। तब ऋषि उन्हें समझाते हैं कि अच्छा शासक नहीं है जो हमेशा शौर्य का प्रदर्शन करे, शोर की भाँति कलेजा रखता हो, किसी से भी भीख नहीं माँगना चाहिए वे लोग कायर कहलाते हैं। अपने मन की शक्ति को दृढ रखो। उनको किसी के सामने नतमस्तष्क न होने दे। शशि ने इसमें यह उल्लेख करने का प्रयास किया है कि यह मन किसी वस्तु से उब जाता है तो न जाने यह उडकर कर किस नई दिशा में चला जाता है? मनु श्रद्धा के सरल साहचर्य से उब जाते हैं। उनका मन अभी भी तृप्त था। उनको श्रद्धा से संतोष न मिला, तो इडा के पास चले जाते हैं। वहाँ वह अपनी काम शक्ति का प्रयोग करना चाहते हैं।
इडा उनको अपनी आधुनिक नगरी से परिचित कराती है। उपनिषद् काल की घटना में हमें मन का चित्रण मिलता है। जहाँ पर बालक मन-मन कुछ सोच रहा है। वहाँ पर यज्ञशाला की तैयारी हो रही है। एक मुनि श्वेतकेतु की जननी का हाथ पकडकर केलिकुंज में ले जाते हैं। तब बालक बोलता है कि तुम कैसे पिता हो जो मेरी माँ को दूसरे पुरूष के साथ जाने दिया। यहाँ मन का अन्तर्द्वन्द्व मिलता है।
मन में इच्छाएँ तो बहुत होती हैं, लेकिन वह पूर्ण नहीं होती, क्योंकि एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। अब मनु अपनी भूल का अहसास होता हैं। श्रद्धा ग्राम में मनु वापस लौटकर अपनी भूल का प्रायश्चित श्रद्धा के सामने करते हैं। फिर भी श्रद्धा उनका साथ निभाती है।
उस खुबसूरत नगरी में अंधों की भाँति रास्तों पर चलता गया। मेरा मन तो उस समय मकडी के जाल की भाँति हो चुका था। जो चारों ओर से इडा के भोग से घिर गया था। लेकिन अन्त में इडा भी मनु व श्रद्धा के संग रहने लग जाती है। मनु इस मिलन को देखकर मन ही मन सोचते हैं कि यह मिलन मेघा के शिव सुन्दर के समान हैं।
मनु के वंश व मानव का जन्म होता है उस समय मनु पूर्ण मनुष्य बन चुके थे। अब मनु का एक सन्तुलन मिल गया था मन को विराम ही एक बहुत ही बडी उपलब्धि है। मन के भीतर काम, क्रोध, लोभ व मोह निवास करते हैं फिर भी वह संयम रखता है क्योंकि वासनाएँ कभी शान्त नहीं होती है। नवीं दिशा में युगधर्म में यह दर्शाया गया है कि मनु अपनी भूलों के कारण मुँह लटकाए बैठे हैं। जहाँ पर श्रद्धा, इडा व मानव भी मन ही मन सोच रहे हैं। इडा व श्रद्धा अपनी-अपनी श्रेष्ठता साबित करने का प्रयास करत है।
अन्तिम दिशा चरैवेति में मनु वापस प्रवासी हो जाते हैं। अब अपने मन का आत्मविश्लेषण करके उनको अनदेखा करते हैं। मनु कहते हैं मेरे मन को तुम छूकर देखों में उसमें तुम स्वयं को ही पाओगे क्योंकि मैं कभी भी खुद के लिए नहीं जिया, हमेशा दूसरों के लिए जिया हूँ।
अग्निसागर में शशिजी ने भारतीय व पाश्चात्य दोनों के विद्वानों की मनोवृत्तियों को अपनाया है। यहाँ तक की फ्रायड के सिद्धान्त का भी प्रतिपालन किया है। उन्होंने मैकडगल, अरस्तू जैसे पाश्चात्य विद्वानों के विचारों के समावेश करने का प्रयास किया है। जिसमें वे कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। वहीं भारतीय विद्वानों में पतंजलि के विचारों से भी प्रभावित लगते हैं।
मनोविज्ञान के क्षेत्र फ्रायड के अन्वेषणों का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। फ्रायड नेपेरिस के तंत्रिका शान्नीय शार्कों के निर्देशन में तन्त्रिका शास्त्र का अध्ययन किया तथा विचना में वापस आकर जोजक ब्रायर की सहायता से हिस्टिरिया के रोगियों का इलाज करने लगे। वहाँ पर उन्हें ज्ञात हुआ कि हिस्टिरिया के रोगियों के इलाज करने लगे। वहाँ पर उन्हें ज्ञात हुआ कि हिस्टिरिया का प्रमुख कारण दमित भावनाएँ हैं। दमित इच्छाओं या भावनाओं का अध्ययन करते समय फ्रायउ ने अचेतन मन के तथ्य की तलाश की और कहा कि अचेतन मन की प्रक्रियाओं के कारण ही स्वप्न, भूले, कला, धर्म आदि का सृजन होता है।
इस भंग करने की की क्रिया में सबसे बडा हाथ काम का रहता है। इस काम प्रवृत्ति का बचपन से ही अतृप्त रहने के कारण दमन होता रहता है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में फ्रायड के पाँच सिद्धान्त प्रसिद्ध हैं:- 1. स्वप्न सिद्धान्त, 2. काम सिद्धान्त, 3. भूल सिद्धान्त, 4. हास्य-विनोद सिद्धान्त, 5. अहं सिद्धान्त।
फ्रायड ने अचेतन जगत की वासनाओं को विशेष महत्त्व दिया है। फ्रायड ने इन वासनाओं में भी काम वासना और उससे संबंधित ईर्ष्या आदि भावनाओं को मुख्य स्थान दिया है। फ्रायड का मानना है कि चेतन मन के अतिरिक्त एक अचेतन मन भी होता है। जिसमें कि भावनाएँ जो सामाजिक बंधनों के कारण प्रकाश में नहीं आ सकती वे दबा दी जाती हैं।
कामायनी में हमें स्वप्न का उल्लेख दो स्थानों पर मिलता है। पहला तो काम सर्ग में मनु के स्वप्न का उल्लेख ही मनु को यह स्वप्न उस वक्त दिखाई देता है कि जब वे श्रद्धा के आत्मसमर्पण के बाद अत्यधिक सोच-विचार में पडे हुए हैं और यह निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि श्रद्धा को अपनाकर दोबारा सांसारिक जीवन बताना चाहिए या नहीं।
दूसरे स्वप्न का वर्ण हमें स्वप्न सर्ग में मिलता हैं वहाँ पर श्रद्धा के स्वप्न का वर्णन किया गया है। मनु श्रद्धा को अकेला छोडकर चले गए हैं। जब वे उसको छोडकर गये उस वक्त वह आसन्न गर्भा थी। अब श्रद्धा पुत्र को जन्म देती है। वह बडा भी हो गया है और अब खेलने भी लगा है। लेकिन श्रद्धा मनु के वियोग में अत्यधिक दुःखी है। वह रात को स्वप्न देखती है।
इन दोनों स्वप्नों का अध्ययन करने पर यही ज्ञात होता कि दोनों स्वप्नों के अन्दर काम-वासना मन के अचेतन स्तर में मौजूद है। प्रसादजी ने उन्हें सच्चा रूप दे दिया है इडा के साथ उसका संबंध जोडकर कथा को आगे बढाने का मौका खोज निकाला है। क्योंकि प्रसाद जी ने खुद भी श्रद्धा के स्वप्न का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि-
स्वप्न स्नेह में भय की
कितनी आशंकाएँ उठ आती।
फ्रायड के स्वप्न सिद्धान्त का उल्लेख हमें अग्निसागर में दो तीन स्थलों पर मिल जाता है। ब्रह्मात रात्रि दिशा में श्रद्धा को स्वप्न सत्य में सोते जागते आते हैं। लेकिन श्रद्धा कुछ भी नहीं कर पाती। आसमान बादलों से ढक गया और भयंकर वर्षा हो जाती है।
इडा एक स्थान पर कहती है कि
सुगति का नाम व सुविधाऐं
यह तो भ्रम है, छल, धोखा है।
यह सुख भी सपने जैसा है
देखा भी जो अनदेखा है।
फ्रायड का सिद्धान्त काम के नाम से विख्यात है। उनकी धारणा है कि काम अत्यन्त व्यापक है। वह प्रेम का पर्यायवाची है और उसके अन्तर्गत माता-पिता का प्रेम, कामुक व्यक्तियों का प्रेम, मित्रों का प्रेम, पशुओं का हमें आरम्भ से ही विषमलिंगीय कामुकता के दर्शन होते हैं। माँ, क्यों तू इतनी उदास, क्या मैं हूँ तेरे नहीं पास।
ल्ेकिन इस प्रेम में वासना के काम की गंध नहीं आती। लेकिन यह प्रेम विषमालिंगीय ही माना जाएगा और इससे मनु नाराज हो जाते हैं। शिशु से ईर्ष्या करने लगते हैं क्योंकि उनका प्रेम बँटता हुआ नजर आ रहा था।
यह जलन नहीं सह सकता, मैं चाहिए मुझे मेरा ययत्व
इस पंचभूत की रचना में मैं रमण करूँ एक तत्त्व।
शशिजी अग्नि सागर में उपलब्धि दिशा में काम का वर्णन किया है। मनु श्रद्धा के पास रहते हुए संतोष नहीं प्राप्त कर सके। उनकी तृप्त न मिटी श्रद्धा के पास काफी रस का यौवन मद-विह्वल को न था। इसी के अन्तर्गत इडा की कामुकता का वर्णन किया है।
काम के दिए हुए
ज्वालामुखी से दो
विकल वरदान थे
तन्वंगी तन की
अद्भुत रचना की
निर्वष्ट घटना थी।
एक स्थान पर मनु को बन कन्या कहती हैं कि इस नगर में सभी रास्ते चुने गए हैं। कोई भी प्यार से नहीं बतलाता। स्थान-स्थान पर हमें काम सिद्धान्त का उल्लेख मिल जाता है। फ्रायड महोदय ने अवचेतन मन पर विशेष बल दिया है। उन्होंनें अधिकांश भूलों का अवचेतन से संबंध बतलाकर प्रायः सभी भूलों को समझाया है और सौदेश्य माना है। भूल के मूल में कोई दमित वासना यो इच्छा छिपी रहती है। हम उसी नाम को भूल जाते हैं।
डॉ. द्वारिकाप्रसाद का मत है कि भूल के परिणामस्वरूप मनुष्य को अनेक विषाद एवं दुःख उठाने पडते हैं। इसी कारण यहाँ मनु की कितनी ही भूलों का चित्रण किया गया है।
अतः मनु की समस्त भूलें सुधार देती है और उनकी उस तृप्त सुख की लालसा शान्त कर देती है। इस प्रकार कामायनी के अन्दर फ्रायड के भूल सिद्धान्त के अनुकूल भी उल्लेख मिल जाता है। मनु जब श्रद्धा को छोडकर इडा नगर में चले जाते हैं, तो उन्हें कुछ समय ताकतों सुख का अनुभव होता है। लेकिन बाद में उन्हें अपनी भूल का अहसास होता है। फ्रायड का चौथा सिद्धान्त हास्य विनोद सिद्धान्त के नाम से विख्यात है। इस सिद्धान्त के आधार पर फ्रायड को वही धारणा है कि अचेतन मन के स्तर में दबी हुई वासनाएँ अकस्मात् हास्य या विनोद का धारण कर लेती है।
कामायनी में फ्रायड के इस सिद्धान्त का उल्लेख नहीं मिलता। इसका कारण है कि प्रसादजी की गंभीर प्रकृति कामायनी में कहीं भी हास्य रस को स्थान नहीं दे सकी है। इसलिए यहाँ पर हमें कछ भी हास्य विनोद की झलक नहीं मिलती है।
श्रद्धा ग्राम में श्रद्धा के पास आकर एक ग्रामवासी कहता है कि अभी तक तो कुँवारा ही हूँ, मैं बडा ही किस्मत का मारा हूँ। मेरी मंगेतर के पिता मुझ से कन्याशुल्क में पशु और कुछ धन माँगता है। यदि यह बात है तो मैं सारी जिन्दगी शादी नहीं करूँगा। फ्रायड का पाँचवाँ सिद्धान्त अहं सिद्धान्त के नाम से प्रसिद्ध है। फ्रायड की धारणा है कि मन का चेतन अंश जब परिवेश के सम्पर्क में रहता है। तब वह वास्तविकता के नियमों का पालन करता रहता है, किन्तु उसकी जो इच्छाएँ दबी रहती है क्योंकि अहं चेतन होता है और जो इच्छाएँ (काम) उसे स्वीकृत नहीं होती, उनका यह दमन करता है तथा प्रतिरोधपूर्णक उन्हें अचेतन में स्थित रखता है। इस प्रकार फ्रायड ने अहं सिद्धान्त के अन्दर मनु की तीन शक्तियों का उल्लेख किया है जो क्रमशः अहं, इड और उच्च अहं कहलाती है।
प्रसादजी ने फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धान्त की पूरी तरह हृदयगम करके फिर कामायनी की सृष्टि की है। यहाँ जो कुछ सिद्धान्त नजर आता है। डॉ. भव्य प्रकाश ने लिखा है कि छायावाद के श्रेष्ठ कवि जयशंकर प्रसाद रचित कामायनी एक मनोविश्लेषणवादी रचना है। काम की फ्रायडीन व्याख्या मनु में काम विकृति, उसका प्रत्यावर्तन प्रक्रिया द्वारा विरेचन मनु (अहं) व इडा (इड) के बीच संघर्ष पूर्ण अन्त द्वन्द्व तथा श्रद्धा (परम अहं) द्वारा उसका पर्यावसान मनोविश्लेषण प्रक्रिया का श्रेष्ठ प्रमाण है।
कवि ने यायवरी में कहा है कि मनु अनुभवों से हीन जिन्दगी में फँस गया था। अपने ही द्वारा निर्मित जाल में मात्र अहं की धनपरिधियों में सोच पर जो मकडियों के जाल की तरफ फँस गया था। कामायनी में जितना सुन्दर व सटीक फ्रायड का अन्वेषण मिलता है। उतना अग्निसागर में उसका अंशमात्र भी नहीं मिलता। फिर भी कवि ने सिद्धान्त कुछ तो अनुसरण तो किया ही है।

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