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निर्मल वर्मा का सांस्कृतिक चिंतन

मुकेश सैनी
संस्कृति शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द culture का हिंदी रूपांतरण है, वहीं अंग्रेजी शब्द culture लैटिन भाषा के शब्द कल्चुरा से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- सुधरी हुई दशा यानी संस्कृति मनुष्य द्वारा आत्मसात किए गए अच्छे अनुभवों की परिणति है। ये अनुभव वह अपने पुरखों से उनके प्रति आदर व सम्मान की भावना रखकर ग्रहण करता है। पुरातन युग से ही मनुष्य अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए प्रकृति के साथ सामंजस्य करता आया है। परिणामतः उसे तमाम प्रकार के सुख-साधन प्राप्त हुए, जिनकी सहजानुभूतियों के योग का नाम ही संस्कृति है। जो पीढी-दर-पीढी हस्तांतरित होती रहती है, इस प्रक्रिया में मनुष्य प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से अपने दोनों व्यवहारों को हस्तांतरित करता है और जीवन-निर्वाह के लिए एक कृत्रिम वातावरण तैयार करता है।
किसी देश की पहचान उसकी संस्कृति के द्वारा होती है, जो उसका प्रतिनिधित्व करती है और उसे भिन्न रूप में वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर स्थापित करती है। उस देश में बसे प्रत्येक नागरिक का व्यवहार अपने सांस्कृतिक मूल्यों द्वारा निर्धारित होता है, जो कि समूचे राष्ट्र के व्यक्तित्व का प्रदर्शन करते हैं। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन व महानतम संस्कृतियों में से एक है। विविधता से परिपूर्ण यहाँ की संस्कृति का मूलाधार यहाँ के शाश्वत एवं चिरंतन मूल्य है। भारतीय संस्कृति मनुष्य को समाज के साथ जोडने वाली एक सुव्यवस्थित आदर्श और मर्यादा की मजबूत कडी है, जो उसके बँधनों को स्वीकार न कर उसे कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती है।
भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रसार रामायण व महाभारत जैसे ग्रंथों से हुआ, ब्रिटिश शासन के दौरान स्वामी विवेकानन्द ने दुनिया के समक्ष भारतीय संस्कृति के आदर्श का उद्घोष किया और इसी काल में भारतीय राजनीति के पुरोधा पंडित जवाहरलाल नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया के माध्यम से भारतीय संस्कृति का दुनियाभर में परचम फहराया। आधुनिक साहित्यकारों ने भी भारत के सांस्कृतिक मूल्यों का उपस्थापन अपने साहित्य में किया है। इन्हीं में से एक नाम निर्मल वर्मा का भी है।
संस्कृति के आत्मबिंब नामक निबंध में निर्मलजी कहते हैं- संस्कृति का एक छोर यदि मानवीय सृजनात्मकता में निहित है, तो दूसरा छोर उन अज्ञात और अँधेरी शक्तियों में जिस पर मनुष्य का कोई अधिकार नहीं। मनुष्य की सृजनात्मकता और सृजित होते हुए मनुष्य की प्रकृति- दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ चलती हैं और किसी संस्कृति का रूपाकार इन दोनों प्रक्रियाओं के अंतर्गुंफित संबंध और तनाव द्वारा ही निर्मित होता है।1
भारतीय संस्कृति और कल्चर नाम से उपमित पाश्चात्य संस्कृति में पर्याप्त अंतर है। उनके कल्चर में मनुष्य द्वारा सृजित काव्य, नाटक, संगीतकला, चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला जैसे समस्त विषय आ जाते हैं। लेकिन प्रकृति नहीं, यूरोपीय संस्कृति का विकास प्रकृति से अपना पार्थक्य, अपना अलगाव, एक शब्द में कहें, तो उसमें अपनी स्वायत्तता प्रतिष्ठित करने के प्रयास में निहित है। संस्कृति की यह अवधारणा-स्पष्ट ही-उससे बहुत भिन्न है, जो हमने ऊपर दी थी, जहाँ मनुष्य की सृजनात्मक शक्ति प्रकृति के समकक्ष अथवा उसके विरोध में नहीं, उसके साथ जुडे अंतर्गुंफित संबंधों में अभिव्यक्त और उद्घाटित होती है।2 अतः एक में मनुष्य सृजनात्मक शक्ति का स्रोत है तो दूसरे में वह जरिया बनकर विभिन्न कलाओं का सृजन करता है। पर दोनों में एक समान तत्त्व है- मनुष्य व प्रकृति का अंतर्संबंध। इन दोनों ही संस्कृतियों में महाकाव्य व विभिन्न अत्याधुनिक कलाकृतियों के माध्यम से संस्कृति व जातीय साहित्य के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया जाता है। महाभारत भारतीय संस्कृति का ऐसा ही एक महाकाव्य है, उसी प्रकार पाश्चात्य संस्कृति में ईलियड का मुख्य स्थान है। इन दोनों ही महाकाव्यों में वे समस्त काव्योचित गुण व रस विद्यमान है, जिसे ग्रहण करने की उत्कट लालसा समाज के प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्मन में बराबर बनी रहती है।
प्राचीन विश्व में अनेक संस्कृतियाँ आयीं और गयीं, पर उन तमाम संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति अपने अस्तित्व को बरकरार रखती आयी है। इसका कारण है उसका समृद्शालिनी होना। आज हमारी इसी समृद्ध और गौरवमयी संस्कृति पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। आज यह संकट के कठिन दौर से गुजर रही है। इसका कारण रेडियो, टेलीविजन जैसे श्रव्य-दृश्य माध्यमों का प्रचलन नहीं है, वरन् मनुष्य के अंतर्मन पर आधुनिक औद्योगिकता का कडा प्रहार है। निर्मल वर्मा की राय में, आधुनिक औद्योगिकीकरण की चोट से उस संस्कृति का विश्रृंखलित हो जाना है, जो एक समय में समाज के आत्मबिंबों को संयोजित करती थी। ये आत्मबिंब कहना न होगा कि, मनुष्य के आंतरिक लगावों से अनुप्राणित होते थे। इनमें तीन लगाव प्रमुख थे-प्रकृति से लगाव, परम्परा से लगाव और अंत में अपने आत्म से लगाव। आज जब प्रकृति स्वयं उपभोग की वस्तु बनकर तहस-नहस हो चुकी है और परंपरा वर्तमान से खण्डित केवल अतीत की वस्तु, तो आश्चर्य नहीं कि व्यक्ति का आत्म भी केवल उसके अकेले और निराश्रित अहम् में सिकुडकर सीमित हो जाए।3 आज देश में हर तरफ हिंसा और आतंक का साया है, जिसने भारतीय संस्कृति, समाज व समूचे भौगोलिक परिवेश को छिन्न-भिन्न कर दिया है। इसकी एक मुख्य वजह यह है कि हर संस्कृति के मनुष्य के जीवन की लय प्रकृति के साथ गतिमान होती है, पर जब कोई तथाकथित औपनिवेशिक शक्ति उसके जीवन की लय पर आघात करती है, तब उस संस्कृति से संबंध रखने वाले मनुष्य का जीवन सदा-सदा के लिए खंडित हो जाता है। निर्मलजी शताब्दी के ढलते वर्षों में नामक निबंध में कहते हैं कि भारतीय संस्कृति का धर्म हमेशा से मनुष्य और सृष्टि के अखण्डित संबंध सार्वभौमिक संपूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है।4
भ्रमण और अध्ययन निर्मल वर्मा की अभिरुचि का अभिन्न अंग था। यही कारण है कि उनके यूरोप प्रवास के कारण उनकी कृतियों में पाश्चात्य संस्कृति का बोलबाला सहज ही देखा जा सकता है, पर ऐसा भी नहीं है कि वे अपने मार्ग से भटक गए हों। वे अपनी महान् भारतीय संस्कृति की जडों से जुडे हुए हैं। यहाँ के मर्यादा पुरुषोत्तम राम, कृष्ण और उनके द्वारा स्थापित उच्चतर जीवन-मूल्यों की छाप उनके हृदय पर सदा-सर्वदा विद्यमान रहती है। फिलहाल यह तो स्पष्ट है ही, कि वे इन दोनों संस्कृतियों में से किसी को भी कम नहीं आँकते हैं, पर उनके साहित्य में दोनों संस्कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट है कि संभवतया पाश्चात्य संस्कृति का विवेचन अधिक होने के कारण वह भारतीय संस्कृति पर हावी होती दिखायी देती है, पर कमोबेश निर्मल ऐसा नहीं मानते, यह सिर्फ भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के अतिरिक्त कुछ नहीं है। एक ऐसी संस्कृति जिसकी अच्छाइयों को स्वीकार कर लिया जाता है और बुराइयों को दरकिनार कर दिया जाता है। कुछ ऐसी ही है भारतीय संस्कृति, जो यूरोपीय लोगों की अच्छाइयों को स्वीकार कर बुराइयों से किनारा कर लेती है।
निर्मल जी के मानस में, उनके साहित्य में अनेक जगह पाश्चात्य लेखकों के प्रति आदर व सम्मान, संगीत व उदासी के मध्य बढता हुआ अपनत्व, पर्वतीय स्थलों के प्रति सहज आकर्षण व अतीत की थाती प्राचीन कलाकृतियों के प्रति अनुसंधान का भाव दिखाई देता है। उन्होंने अपने साहित्य और साक्षात्कारों में कई बार मिलान कुंदेरा, रिल्के, पास्तरनाक, अना आखमासोवा, ओम्सन, चेखव और तुर्गनेव के नाम लिए हैं। यही नहीं, कई जगह उनकी रचनाओं के उदाहरण भी दिए हैं। इन सभी लेखकों का निर्मल की डायरी में सतत स्मरण किया गया है। एक संदर्भ इस प्रकार है- मैं आंद्रे के जीवन के जर्नल्स के अंतिम पृष्ठ पढ रहा था। जो उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले लिखे थे।5
निर्मल वर्मा के कथा-साहित्य पर विचार करने पर उनका चिंतनपरक व्यक्तित्व उभरकर हमारे सामने आता है। पाश्चात्य कथा-साहित्य का घनिष्ठ और विशद अध्ययन करना स्वयं उनके लिए अपने साहित्य और संस्कृति को समझने की बडी चुनौती थी। यही कारण है कि उन्हें भारतीय संस्कृति के साथ-साथ पाश्चात्य संस्कृति से गहरा था। इस सिलसिले में वे स्वयं कहते हैं- विदेश जाकर एक बात जरूर होती है कि आदमी को परिवेश से बाहर जाकर देखने का मौका होता है। जातीय परंपराओं को तब वह तुलनात्मकता से आंक सकता है। अपनी आदतों से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से अपने देश-समाज को आँकने-समझने का उसे मौका मिलता है। मैं समझता हूँ कि यूरोप की समृद्ध सभ्यता है, सांस्कृतिक देन है। मैं स्वयं को कृतज्ञ मानता हूँ कि मैं उस सभ्यता और संस्कृति के सम्पर्क में आया। अगर मैं उस संस्कृति के परिचय में नहीं आता, तो मेरे जीवन के कई क्षेत्र सूखे पडे रहते।6 स्पष्ट है कि पाश्चात्य संस्कृति के वृहद स्वरूप को समझे बिना भारतीय संस्कृति को समझना वे खुद के लिए असंभव मानते थे और अपने-आप में अधूरापन महसूस करते थे।
वे दिन उपन्यास में निर्मल जी को भारतीय संस्कृति से जुडा हुआ बताया गया है। उपन्यास में लेखक स्वयं मैं के रूप में कथानक को गति प्रदान करते हैं। इस संबंध में दुर्गाप्रसाद गुप्त का कथन यहाँ उल्लेखनीय है- वे दिन का मैं प्रवासी भारतीय एक आउटसाइडर होते हुए, अपने अकेलेपन और रिक्तता के बावजूद भी अपने नेटिव स्मृतियों से जुडा हुआ है तो इसलिए कि उसमें भारतीय होने का बोध बचा हुआ है। वे दिन की रायना और मैं ने अपने-अपने अकेलेपन के साथ जिस स्मृति, सुख, समय को भोगा है, उससे मैं की नेटिव स्मृति भी जुडी है। रायना मैं के होस्टल के कमरे में है। एक-दूसरे को जीने के बाद वह बर्तनों को धोते हुए बहुत धीमे स्वर में कुछ गुनगुना रही थी... उस छोटे से शान्त स्वर में एक घरेलू लापरवाही-सी थी, जिसे किसी भी दुःख से जोड पाना असम्भव था। प्रवासी भारतीय मन कितना भी अकेला क्यों न हो, उसे घर की याद जोडे रखती है।7
निर्मलजी भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का समन्वय करते हुए भारतीय संस्कृति में पाश्चात्य संस्कृति का समावेश करते हैं। निर्मलजी के ही शब्दों में- प्राग में इन दिनों रहना उतना ही दिलचस्प कलात्मक अनुभव है, जितना योरप के किसी भी बडे शहर में - या शायद कुछ अधिक, क्योंकि दीवार के दोनों ओर जो पूर्वाग्रह हैं, वे यहाँ उतने शक्तिशाली नहीं है और प्राग धीरे-धीरे दो संस्कृतियों का एक ऐसा केन्द्र बनता जा रहा है, जैसा वह कभी युद्ध से पहले था, पूर्व और पश्चिम के बीच एक संगम-स्थल।8
इसी प्रकार आधुनिक बोध के रंग में रंगा उनका उपन्यास एक चिथडा सुख का परिवेश भी भारतीय पृष्ठभूमि के अंतर्गत विदेशी मानसिकता के समावेश को दर्शाता है। कुँवरनारायण का मत है- विदेशी प्रभाव भारतीयता को दबोच लेते हैं या उनकी वजह से भारतीयता को एक नया आयाम और प्रासंगिकता मिलती है? आमतौर पर विदेशी प्रभावों को लेकर भारतीय दृष्टि घुल-मिल गयी है, इसलिए शुद्ध भारतीयता जैसी किसी कट्टर अवधारणा को परिभाषित करना और पचा पाना मुश्किल हो जाता है।9
निर्मल वर्मा की सृजन-प्रक्रिया में आधुनिक जमाने के सभी प्रकार के सांस्कृतिक संबंधों का समावेश है- चाहे वह संस्कृति भारतीय हो या पाश्चात्य। रमेश दवे के मत में- निर्मलजी एक आधुनिक मनुष्य थे- यूरोप के किसी भी आधुनिक संस्करण से अधिक आधुनिक, क्योंकि यूरोप उनके लिए एक प्रकार का सहवास था आवास या निवास नहीं, जिसमें वे अपनी भारतीयता विलुप्त कर दें।10
उपन्यास साहित्य के साथ-ही-साथ निर्मल जी के कथा साहित्य में भी भारतीय व पाश्चात्य संस्कृति की झलक दिखायी देती है। परिंदे, लवर्स, अंधेरे में, धूप का एक टुकडा, अमालिया, कव्वे और काला पानी, एक दिन का मेहमान, अंतर, जलती झाडी, पहाड इत्यादि ऐसी ही कहानियाँ हैं। इन कहानियों में प्राकृतिक चीजें स्वतंत्र न होकर लेखक की भावनाओं के अनुरूप दिखाई देती हैं, जो एक विस्मय उपस्थित कर कहानी को उत्कृष्ट बनाती हैं- एक दफा तो यहाँ लगातार इतनी बर्फ गिरी थी कि भुवाली से लेकर डाक बंगले तक सारी-सारी सडकें जाम हो गयीं। इतनी बर्फ थी मेम साब कि पेडों की टहनियाँ तक सिकुडकर तनों से लिपट गयी थीं।11 संक्षेप में प्राकृतिक चीजों को कथानक के अंदर कुशलतापूर्वक प्रस्तुत करने की क्षमता निर्मल की ही देन है।
दूसरी दुनिया कहानी में बच्ची ग्रेता व कथावाचक के मध्य मैत्रीपन के साथ विदेशी आबोहवा का चित्रण भी है- गर्मियाँ काफी दूर थीं, बीच में पतझड और बर्फ के दिन आएँगे- तब तक मेरा झूठ भी पिघल जाएगा, मैंने सोचा।12 निर्मल के कथा साहित्य में वसंत, हेमंत, पतझड और शिशिर की ठिठुरता है, मार्च की धूप और हवा है, नवंबर की धुंध है और बीच-बीच की बारिश और बर्फ भी है।
संगीत मनुष्य की मानसिक थकावट को चकनाचूर कर उसे रसास्वादन की उच्चतम सीढी तक ले जाता है और उसे आनन्द प्रदान करता है। निर्मलजी के आंतरिक व बाह्य बुनावट के पात्रों में संगीत की यह छटा विद्यमान है। मानव सभ्यता को रसाप्लावित करने वाला यह संगीत काल के बंधनों को तोडकर पीढियों के मध्य सामंजस्य स्थापित करते हुए गतिमान है। वृद्ध, जवान, बच्चे सभी अपने स्वभावानुसार पाश्चात्य संगीत की स्वर-लहरी का आनंदपूर्वक उपभोग करते हैं। परिंदे कहानी की लतिका अपनी भावुक स्थिति से बचने के लिए मिस्टर ह्यूबर्ट के पियानो के सुर का सहारा लेती है- पियानो के क्षणिक पांज में लतिका को पत्तों का परिचित मर्मर कहीं दूर अंजानी दिशा से आता हुआ सुनाई दे जाता है।13
निर्मल वर्मा एक ओर जहाँ वस्तु-निरूपण में स्वप्नलोक का सहारा लेते हैं, वहीं उनकी रचनाओं में पहाडी धुंध और शहर के गिरजाघर, ढलानों पर उतरना जैसी स्थितियां बार-बार चित्रित हुई हैं। उनके अंतर्मन में भारतीय परिवेश, प्रकृति व परंपराओं की सघन सरणि अनुस्यूत है, वहीं यूरोपीय परिवेश, प्रकृति एवं परंपराओं का प्रभाव भी उतना ही सहज रूप में अपनी प्रभावान्विति दर्शाता है। यही कारण है कि उनके लेखन में हम समावेशी सांस्कृतिक मूल्यों का निरूपण देखते हैं, पर किसी भी एक संस्कृति को दूसरी पर हावी होते हुए नहीं देखते।
अस्तु, निर्मल वर्मा के साहित्य पर विहंगम दृष्टि डालने पर यह ज्ञात होता है कि उन्होंने भारतीय व पाश्चात्य संस्कृति के तत्त्वों, यथा- रीति-रिवाजों, परम्पराओं, रहन-सहन, आचार-विचार, खान-पान, वेशभूषा, जाति, धर्म इत्यादि का विस्तृत वर्णन करके दोनों को समावेशित कर दिया है, या कहें कि उन्होंने पाश्चात्य संस्कृति से सामंजस्य स्थापित करने के उपरांत ही अपनी संस्कृति को जाँचा-परखा है। उन्होंने अपने विराट व्यक्तित्व और बौद्धिक क्षमता के बल पर दोनों संस्कृतियों में तालमेल स्थापित करने का अभूतपूर्व प्रयास किया, जिसके लिए साहित्य-जगत सदैव उनका ऋणी रहेगा।
संदर्भ :
1. निर्मल वर्मा- भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के
क्षेत्र, पृ.67.
2. निर्मल वर्मा- भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के
क्षेत्र, पृ.68.
3. निर्मल वर्मा- भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के
क्षेत्र, पृ.73.
4. निर्मल वर्मा- ढलान से उतरते हुए, पृ.73.
5. निर्मल वर्मा- धुंध भरी सुर्खी, पृ.14.
6. निर्मल वर्मा- साहित्य का आत्मसत्य, पृ.118-
119.
7. संपा. विभूति नारायण राय : कथा साहित्य के सौ
बरस, पृ.243.
8. निर्मल वर्मा- हर बारिस में, पृ.53.
9. संपा. मधुकर उपाध्याय : निर्मल माया, पृ.221-
222.
10. संपा. मधुकर उपाध्याय : निर्मल माया, पृ.118.
11. निर्मल वर्मा : परिंदे, परिंदे, पृ.114.
12. निर्मल वर्मा : कव्वे और काला पानी, दूसरी दुनिया,
पृ.47.
13. निर्मल वर्मा : परिंदे, परिंदे, पृ.119.


सम्पर्क- चिमनाराम माली का कुआं, कालूबास, वार्ड नं. 28,
श्रीडूंगरगढ- 331803, ( बीकानेर) राजस्थान.
मो. नं.- 8559841982