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अधूरी यात्रा का पूरा जीवन

कमलकिशोर गोयनका
ऋग्वेद का एक प्रसिद्ध मंत्र है -एकं सत् विप्रा बहुधा वदंति, अर्थात् सत्य एक है और वेदज्ञ (विद्वान) उसकी अन्य-अन्य नामों से पुकारते हैं। साहित्य भी ऐसा ही है। साहित्य सृष्टि के सत्य का उद्घाटन करता है और साहित्य में यह सत्य मनुष्य की संवेदनशीलता तथा उसकी रागात्मकता से उत्पन्न होता है। साहित्य इसी मानवीय संवेदना की सत्यता का कर्म-क्षेत्र तथा धर्म-क्षेत्र है और वह दावा करता है कि वह मनुष्य के अंतर्बाह्य सत्य का ही चित्रण करता है। साहित्य की काव्य, कथा, नाटक आदि विधाएँ इस संवेदना के सत्य को आधार बनाती हैं, लेकिन इसमें एक ऐसी विधा है जो सर्वांगीण सत्य का दावा करने में हमेशा शर्माती रही है और वह विधा है आत्मकथा या उसे आप आत्मकथ्य कह सकते हैं। संभवतः इसी आशंका के कारण महात्मा गाँधी ने अपनी आत्मकथा को सत्य के प्रयोग कहा था और उन्होंने कुछ ऐसे सत्यों का भी उद्घाटन किया था जो प्रायः किसी भी लेखक के लिए असंभव भी कहा जा सकता है। इसी कारण डॉ नगेंद्र ने अपनी आत्मकथा को अर्ध-सत्य कहा था, क्योंकि वे अपनी आत्मकथा में गाँधीजी जैसे सत्य के प्रयोग नहीं कर रहे थे और उन्हें साहित्य का भी महात्मा बनना नहीं था। मैं डॉ. नगेंद्र का शिष्य रहा और मैं उनके परिवार के लोगों से भी खूब परिचित था। वे निश्चय ही अपने जीवन के अनेक अध्यायों, प्रसंगों और घटनाओं को अपनी आत्मकथा में नहीं लिख पाए और वह अर्ध-सत्य भी नहीं बन पाई। बच्चन की आत्मकथा क्या भूलूँ क्या याद करूँ इस दृष्टि से बडी चर्चित रही और उन्होंने कुछ गोपनीय संबंधों की जानकारी भी दी, लेकिन मैंने उनसे एक बार कहा था कि उनके कुछ गीत कुछ और कहानियाँ भी कहते हैं, तो उन्होंने इसे स्वीकार किया और कहा था कि मेरे कुछ गीत प्रेम-संबंधों की कहानी कहते हैं। असल में,यह मनुष्य की फितरत है कि वह केवल अपने ही सामने स्वयं को निर्वस्त्र कर सकता है, किसी दूसरे के सामने नहीं। प्रायः हर मनुष्य के जीवन में ऐसे प्रसंग आते हैं जो वह अकेले ही जीता है और अकेले ही उनका दण्ड भोगना चाहता है और अपने साथ ही उन्हें इस संसार से ले जाना चाहता है। इस संबंध में मुझे एक प्रसंग और याद आ रहा है। प्रेमचंद ने हंस का आत्मकथांक निकाला था। हिंदी साहित्य में आत्मकथा को देखने, खोजने और जानने का यह पहला प्रयास था, लेकिन जब जयशंकर प्रसाद ने अपनी आत्मकथा भेजी तो वह है केवल एक कविता के रूप में थी- उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ मधुर चाँदनी रातों की। यह केवल संकेत था,कहानी गायब थी। आत्मकथा की ऐसे ही नियति है, लेकिन प्रेमचंद ने मृत्यु के समय अपनी पत्नी से यह कंफेशन किया था कि मेरे एक और स्त्री से संबंध थे, पर वे इसे अपने आत्मकथ्य में नहीं लिख पाए। सत्य की सार्वजनिक स्वीकृति कई बार आत्मघाती होती है। यह ईश्वर की कृपा है या अकृपा,कह नहीं सकता कि मेरा जीवन न तो नगेंद्रजी अथवा बच्चन या जयशंकर प्रसाद की तरह था, वह छुटपुट कथाओं के अतिरिक्त ऐसे कोई प्रसंग नहीं हुए जिन्हें गोपनीय रखने की आवश्यकता हो। फिर भी, ऐसा कोई भी दावा नहीं कर सकता कि जो तथा जैसा जीवन जीया है, उसका पल-पल का वास्तविक रूप में लिखा जा सके, पर मैं यह अवश्य कहूँगा कि जो भी लिखूँगा सत्य लिखूँगा और केवल सत्य लिखूँगा।
मैं अब 11, अक्टूबर को 82 वर्ष का हो गया। मेरे माता-पिता ने 90 के आसपास की आयु पाई थी, परंतु मेरे दादाश्री बद्रीदास गोयनका, जो राजस्थान के मंडावा से चलकर बुलंदशहर स्थापित हुए, ने बहुत आयु नहीं पाई और इस कारण मैं उन्हें नहीं देख पाया। मेरे दादाश्री सेठ बद्रीदास गोयनका शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और म्युसिपैलिटी के चैयरमैन भी रहे। उस समय हिंदी के विख्यात लेखक डॉ.लक्ष्मणसिंह (जिन्होंने कालिदास के ग्रंथों का अनुवाद किया) बुलंदशहर के कलेक्टर थे और दादाश्री का उनसे सम्पर्क रहता था। मेरा जन्म उनके ही परिवार में बुलंदशहर के एक जमीदार परिवार में हुआ। मेरे पिताश्री चंद्रभान गोयनका और माँ इलायची देवी थीं। मेरी माँ पटना की कानोडिया परिवार(श्री बैजनाथ कानोडिया नानाजी, श्री काशीप्रसाद कानोडिया मामाजी) की थी और मैं अपनी नानी तथा मामी से मिल सका था। मैं वर्ष 1986 में कलकत्ता से राष्ट्रपति जैलसिंह से प्रेमचंद-विश्वकोश पर मिले पुरस्कार को लेकर लौटते समय पटना रुका था, तो श्री गोपीकृष्ण कानोडिया तथा प्रो. विश्वनाथ अग्रवाल(जो राँची विश्वविद्यालय के कुलपति बने) ने एक गोष्ठी आयोजित करके मेरा सम्मान किया था। श्री गोपीकृष्ण कानोडिया मेरी माँ के भतीजे थे और उनके पास पुरातत्व वस्तुओं एवं चित्रों का अद्भुत संग्रह था और वे मेरे पुरस्कृत होने से बडे प्रसन्न थे। मेरी एक मौसी थी जो गाजीपुर के प्रसिद्ध कोट में रहती थीं और उनके पुत्र कालीप्रसाद जी शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति रहे। मेरे पिताश्री गाँधीजी के भक्त थे और शुद्ध खादी भण्डार खोलकर मेरठ के बाद खादी का बडा व्यापार चलाते रहे। पिताश्री ने सारे जीवन खादी ही पहनी और जीवन-भर सादा जीवन जीया। मेरी दादीश्री कुँजकुँवरि गोयनका हाथरस की थी और बडी ही जीवट तथा साहसी महिला थीं। मेरे दादाश्री की असमय मृत्यु पर उन्होंने शहर के शीतलगंज मौहल्ले में, जहाँ हमारी पुरानी हवेली है, एक लाख रुपये से उनकी आत्मा की शांति के लिए श्री लक्ष्मीनारायण भगवान का भव्य मंदिर सन् 1916 में निर्मित कराया था और आज भी उसी भव्यता के साथ भक्तों की आराधना का केंद्र बना हुआ है। मैं उसका मैंनेजिंग ट्रस्टी हूँ और शहर के कई गणमान्य लोग इसके ट्रस्टी हैं जो मंदिर की व्यवस्था के लिए जिम्मेदार हैं। मेरी माताश्री भी धार्मिक रूचि की थीं, स्वाभिमानी, कर्मशील और कुशल गृहिणी और उन्होंने कई अंधविश्वास छोड दिए थे। उनका विवाह 13 वर्ष की आयु में हो गया था, लेकिन बहुत समझदार थीं। संसार की गतिविधियों में उनकी बडी रूचि थी और वे कुछ-न-कुछ जानने के लिए उत्सुक रहती थीं। मैं जब शायद 10 वर्ष का रहा होऊँगा, उन्होंने भगवद्गीता मेरे हाथ में दी और मुझे नियमित पाठ करने का आदेश दिया। इस प्रकार मुझ में जो धार्मिकता है तथा अपने हिंदू-धर्म पर जो गर्व है, वह मेरी दादीश्री द्वारा निर्मित मंदिर, उसमें पुस्तकालय के होने तथा माता-पिता की धार्मिक स्वभाव के कारण है। इसी कारण मंदिर के आयोजनों में मैं सदैव सक्रिय रहा हूँ और जन्माष्टमी हो या होली या गोवर्धन पूजा या मंदिर की वर्षगाँठ का उत्सव हो, सब में सक्रियता से हिस्सा लेता। जन्माष्टमी के अवसर पर तो हम भगवान कृष्ण की झाँकियाँ लगाते, बाग में जाकर फूल-पत्ती लाते और सारा दिन झाँकियाँ लगाने में लगा देते और उसे हजारों लोग देखने आते। रामलीला के अवसर पर मैं एक बार हनुमान की वानर सेना का सैनिक बना था। उस समय मेरी आयु 10-12 वर्ष रही होगी। रामलीला के कुछ आयोजन मंदिर में भी होते थे और पिताश्री और बाद में मेरे बडे भाई उसकी संचालन-समिति के सदस्य भी रहे। होली पर तो मंदिर में बडे-बडे ड्रमों में रंग घोला जाता, टेसू के फूल तथा चूना डाला जाता और घर- घर जाकर होली खेलते और होली जलाने के लिए घर-घर से लकडी इकट्ठी करते और सबसे ऊँची होली जलाने में गर्व का अनुभव करते। शहर में हमारा परिवार सेठजी का परिवार के रूप में प्रसिद्ध था। शहर में चार-पाँच परिवार ही मारवाडियों के थे और उनका सम्मान था। शहर में मंदिर तथा पुरानी हवेली होने तथा पिताश्री के सीधे-सरल स्वभाव के कारण सदैव सम्मान मिला और मुझे याद नहीं कि कभी इसके विपरीत मेरी ओर से कोई काम किया गया हो। मौहल्ले में बुजुर्ग चौपड खेलते तो मैं कभी-कभी बैठ जाता और चौपड खेलते-खेलते इतना सिद्धहस्त हो गया था कि कौडियाँ मेरे अनुसार ही पडती थीं। ये बुजुर्ग मेरे पिता के मित्र थे पर सभी ने हमेशा मुझे अपने साथ प्रेम से खेलने दिया और आरंभ में तो उन्होंने ही चौपड की शिक्षा दी थी। अपनी किशोरावस्था में मैंने खूब पतंग उडाई, घर में पतंगें बनाईं, माँझा तैयार किया, गोली-कंचे खेले, गिल्ली- डण्डा खेला और एक दो बार ताश भी खेला। एक बार शायद 1954-55 की बात है, बहुत ही तेज भूकंप आया, तो मैं और मेरा बडा भाई नवल, जो बाद में इंजीनियर बना तथा अपनी गृहस्थी छोडकर संन्यासी हो गया था, हम दोनों निकलकर मौहल्ले में लोगों की मदद के लिए पहुँचे। इसी प्रकार एक बार काली नदी में जबरदस्त बाढ आई, तो मैंने अपने दोस्तों के साथ अनेक लोगों को पानी से घिरे घरों से निकाल कर बाहर लाए। कहने का अभिप्राय यह है कि समाज के प्रति संवेदनशीलता किशोरावस्था से ही जन्म ले चुकी थी और सेवा करना अच्छा लगता था। इन सब प्रवृत्तियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है।
मुझे अपने बचपन की कुछ घटनाएँ एवं प्रसंग याद हैं, लेकिन बहुत बडी मात्रा में स्मृति से लुप्त हो गई हैं। मुझे पहली याद अपने बडे भाई के 1945 में हुए विवाह की है जब मैं 7 वर्ष का था। बडे भाई का विवाह कानपुर के भरतिया परिवार से हुआ था और बारात रेल से गई थी। बुलंदशहर से सीधी रेल कानपुर नहीं जाती थी। खुर्जा रेल स्टेशन से एक डिब्बा रिजर्व कराया गया था और उससे बारात कानपुर पहुँची थी। मुझे अपने बचपन के स्कूल की याद है। मैं ऊपरकोट स्थित पाठशाला में 1 और 2 कक्षा का छात्र था। स्कूल की घंटी चर्च जैसी थी जो रस्सी से खींचकर बजाई जाती थी और मुझे याद है कि मैं जल्दी पहुँचकर इस घण्टी को बजाने में गौरव का अनुभव करता था। कक्षा में बैठने, तख्ती-कलम का उपयोग करने तथा पाठ याद करने आदि की थोडी बहुत याद बनी हुई है। इसी समय मुझे अपनी बडी बहन के विवाह का स्मरण है। मेरे जीजाजी श्री नंदनप्रसाद सेकसरिया हाथी पर बैठकर विवाह-स्थल तक आए थे और उस समय शहर में बहुत से लोग उसे देखने आये थे । इसके बाद भारत के विभाजन की याद है। उस समय में 9-10 वर्ष का रहा था। हमारी हवेली से कुछ ही दूरी पर मुस्लिमों की सराय थी और वह अल्लाह हो अकबर के नारे लगा रहे थे। मौहल्ले के आसपास के काफी लोग हमारी हवेली में आ गए थे, क्योंकि वह पूरे मौहल्ले में सबसे सुरक्षित जगह थी। वह 100 साल पुरानी थी, पर उसकी बाहरी दीवारें 24 इंच की मजबूत थीं जो आज तक उसी रूप में खडी हैं। हवेली में एकत्र लोगों ने अपनी सुरक्षा के लिए छत पर ईंट-पत्थर-मिर्च आदि इकट्ठे कर लिये थे और एक ऐसी रस्सी बाँध दी गई थी जिससे कोई बचाव न होने पर उसका उपयोग किया जा सके, पर वैसा अवसर नहीं आया और कैप्टिन भगवान सिंह, जो जिले के कलेक्टर थे और जो बाद में फीजी में भारत के राजदूत बने, उन्होंने केवल दो सिपाहियों के साथ मुस्लिम नेता को गिरफ्तार कर लिया और नगर में शांति हुई। मुझे याद है कि कैप्टिन भगवान सिंह को शहर के लोग देवता की तरह पूजते रहे, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम दंगाइयों से शहर की रक्षा की थी। वे जब दिल्ली म्युनिसिपेलिटी के कमिश्नर बनकर आए, तब मेरा उनसे सम्पर्क बना रहा। उनके बाद उनका बेटा अजय सिंह भी फीजी में राजदूत बना जिसका अभी देहांत हुआ है। वैसे हमारे शहर में कभी कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ और उस घटना के बाद भी साम्प्रदायिक सद्भाव बना रहा जो आज तक बना हुआ है। एक और बात जो 1952 की है।उस समय भारतीय जनसंघ बन चुका था और एक चुनाव में मैं और मेरा एक मित्र उसके एजेंट बनकर के शहर के निकट के गाँव मैं चुनाव के समय गए थे और हमने पार्टी के लिए काम किया था। उस समय लौटने के लिए कोई सवारी नहीं मिली, तो हम मीलों पैदल चलकर रात को घर पहुँचे। मेरे परिवार में पिताश्री काँग्रेस से जुडे थे, गाँधी के भक्त थे और मेरे बडे भाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से और उनके कारण हम सभी भाई इसी विचारधारा से जुडते चले गए।
मेरी आरंभिक शिक्षा बुलंदशहर के डी. ए.वी. इंटर स्कूल में हुई। मेरा दाखिला कक्षा 3 में कराया गया। मैं और मेरा बडा भाई हम दोनों घर से पैदल स्कूल जाते और शुरू में साथ साथ लौटते। मैं कई बार अपने सहपाठियों के साथ घर लौटता और खेतों में से होकर,आम-अमरूद - मदर तोडते- खाते-शैतानी करते वापस आते। कभी-कभी किसानों की डाट भी खानी पडती, पर फिर वही बाद में चलता रहता। मैंने 1956 में इसी स्कूल से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की और स्कूल में सर्वाधिक अंक आये। इंटरमीडिएट कक्षा में मेरे पास एक विषय मिलिट्री साइंस था। इसमें अच्छे अंक आते थे तो छात्र इसे ले लेते थे। मेरी प्लटून में 30 छात्र थे और मैं उसका कमांडर था तथा 26 जनवरी के एक कार्यक्रम में मेरे कमांड में ही प्लटून ने सेल्यूट दिया था। उस आयु में बडा गौरव अनुभव किया। मैंने हाकी भी खेली पर एक मैच में एक खिलाडी की स्टिक से मेरी ठोडी पर चोट लगी, तो खेलना छोड दिया। मुझे अपने कुछ अध्यापकों की याद है जो बडी गंभीरता तथा आत्मीयता से पढाते थे और पिताश्री को बताते भी रहते थे। उनका ऋण मैं आज तक अनुभव करता हूँ। इंटरमीडिएट के बाद उस समय बुलंदशहर में बी.ए. के शिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी। अतः मैं अपनी बडी बहन के पास कानपुर गया और वहाँ के डी. ए. वी. कालेज में दाखिला ले लिया, लेकिन एक महीने बाद ही बुलंदशहर में ही डी.ए. वी. डिग्री कालेज खुला और मैंने कानपुर को छोडकर इसी कालेज में दाखिला ले लिया। इस कालेज का हमारा पहला बेच था, इस कारण कानपुर जैसी सुविधा, अनुभवी अध्यापक तथा पुस्तकालय तो न था, पर अपना शहर तो था और अपने पुराने सहपाठी थे और अध्यापक भी बहुत अच्छे थे। हिंदी में डा.हरीसिंह शास्त्री ने हमें हिंदी साहित्य पढाया और मैं कह सकता हूँ कि उन्होंने मेरे अंदर साहित्य के बीज बो दिए। मैं साहित्य परिषद् का सचिव रहा और एक बार जयशंकर प्रसाद बनकर कवि-गोष्ठी में उनकी आँसू कविता का पाठ किया। उस समय प्रसाद सबसे प्रिय लेखक थे और आँसू खण्डकाव्य मुझे पूरा याद था। हम कुछ दोस्तों का एक गुट बन गया था जो शहर में अपना रोब रखता था। मैं इसका हिस्सा जरूर रहा, पर मैं मर्यादा से बाहर कभी नहीं गया, लेकिन आज सोचता हूँ कि मुझे इससे दूर रहना चाहिए था। वह ऐसी उम्र थी जब तर्क की भाषा समझ में नहीं आती है। यह बहुत थोडा काल था और मैं बी.ए. करने के तुरंत बाद दिल्ली चला आया था। शहर छूटा, तो यारी-दोस्ती भी छूट गई और जीवन संघर्ष के रास्ते खुलते गए। मेरे लिए यह नई दुनिया थी, छोटे शहर से बडे शहर की, घर-बार छोडकर अकेले ही अनजान ठगर पर पथरीली- काँटेदार सडक पर चलते हुए एक मुकाम, एक झोंपडी बनाने की, जिसकी कल्पना भी कभी कल्पना में नहीं आई थी। अपनी जन्मभूमि छोडी, हवेली छोडी, मौहल्लेदारी छोडी, दोस्ती छोडी, तो नई दुनिया तो बसानी ही थी, पर यह सब भविष्य के अंधकार में समाया था।
मैंने बी.ए. करके दिल्ली की राह ली। मैंने तय किया कि एम. ए. करना है और वह बुलंदशहर में हो नहीं सकता तो मुझे दिल्ली ही सबसे आसान लगा। दिल्ली में मेरी एक और बडी बहन सावित्री देवी का विवाह हैदरकुली मौहल्ला, चाँदनी चौंक के व्यापारी पुत्र श्री सत्यनारायण पोद्दार से हुआ था। मेरे जीजाजी तथा बहन से मुझे अनुमति मिली, तो मैं जुलाई, 1958 में दिल्ली आ गया यह सोचकर कि जीवन का रथ हो या बैलगाडी, राजधानी की सडकों पर चलाकर ही लक्ष्य तक पहुँचना है। बहन-बहनोई का सहारा मिला, तो हिम्मत बँधी और एक दफ्तर में 90 रुपये महीने की नौकरी मिली, जो उस समय एक आदमी के लिए जीवन चलाने के लिए काफी होता था। मैंने कमलानगर में 30 रुपये महीने का एक कमरा किराये पर लिया और ढाबे में खाने का इंतजाम किया और शेष राशि महीने के लिए काफी थी। उस समय गर्मी में कई बार पार्क में सोता था। रात को कुत्ते भोंकते तो डर लगता था, पर मैं तो पढाई के लक्ष्य से आया था और तभी मुझे कैम्प कालेज में इकोनोमिक्स में दाखिला मिल गया। तब किसी ने सलाह दी कि इससे ही आगे बढा जा सकता है, पर पहली परीक्षा में 52 प्रतिशत अंक आए तो मैंने कॉलेज जाना छोड दिया, क्योंकि मैं समझता था कि प्रथम श्रेणी के बिना कुछ नहीं होगा। उस समय किसी ने समझाया होता कि इस विषय में इतने अंक ही काफी होते हैं, तो शायद में उसी ओर रहता और हिंदी का मुँह न देखता,पर नियति को कुछ और ही करना था। मेरे एकोनोमिक्स छोडने के निर्णय के पहले मुझे यह मालूम हो गया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय अगले वर्ष 1959 से ईवनिंग में एम. ए. हिंदी की कक्षा शुरू करेगी, तो मुझे कैम्प कालेज छोडने का आधार मिल गया और मैंने बीच में ही उसे छोड दिया। मेरा यह फैसला मेरी नियति तय करने वाला बन गया। इसी बीच में मुझे एक सरकारी नौकरी मिल गई और कुछ ऐसा संयोग था कि उसका दफ्तर दिल्ली विश्वविद्यालय के करीब था। दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय में एम. ए. हिंदी की कक्षा जुलाई, 1959 से शुरू हुई पर दाखिले के लिए डॉ. दशरथ ओझा ने मेरा इंटरव्यू लिया, क्योंकि मैं आनर्स करके नहीं आया था। नियति ने इस प्रतिकूलता को भी पराजित किया और दफ्तर में काम करने के साथ मैं दो साल तक पढता रहा तथा डॉ. नगेन्द्र, उदयभानु सिंह, सत्यदेव चौधरी, तारकनाथ बाली आदि से शिक्षा प्राप्त की। कुछ समय तक मोहन राकेश भी अध्यापक रहे, पर वे जल्दी ही छोड कर चले गए, लेकिन इस अध्ययन-काल में सर्वश्री रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, नंददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि बडे-बडे लेखकों से सम्पर्क में आने का मौका मिला। मैं साहित्य परिषद् का सचिव बना, तो साहित्य के कई कार्यक्रमों की आयोजना का अनुभव हुआ और साहित्य की समझ का भी विकास हुआ। एम. ए. में प्रथम श्रेणी लानी है, इसके लिए जी तोड मेहनत की और हम चार सहपाठी सवेरे 5 बजे दिल्ली विश्वविद्यालय के मैदान में बैठकर बिहारी का अध्ययन करते थे और डॉ. नगेन्द्र उस समय सवेरे की सैर पर निकलते थे और हमें इस तरह पढता देखकर आशीर्वाद देते थे। परीक्षा का परिणाम आया तो मुझे प्रथम श्रेणी मिली, पर मेरे अन्य तीन सहपाठी द्वितीय श्रेणी में रह गए। डॉ. नगेन्द्र की खूबी यह थी कि वे अपने प्रथम श्रेणी के छात्रों को सम्मान देते थे। मेरा लेक्चरार के लिए पहला इंटरव्यू कश्मीर विश्वविद्यालय के लिए श्रीनगर में था और नगेन्द्रजी एक्सपर्ट थे। कुलपति शायद पनिक्कर थे। उन्होंने कुछ सवाल किए और नगेन्द्रजी से पूछने को कहा, तो उन्होंने उत्तर दिया कि गोयनका मेरा विद्यार्थी रहा है, मैं उसकी क्षमता को जानता हूँ, अतः मुझे कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं है। मेरी नियुक्ति नहीं हुई पर उनके इस विश्वास ने मुझे बडी ताकत दी और जाना कि सच्चा गुरु कैसा होता है।बाद में उनके ही आशीर्वाद से मैं सितंबर,1962 में दिल्ली कालेज (ईवनिंग) मे हिंदी का प्राध्यापक नियुक्त हुआ। इस नौकरी से मेरी बैलगाडी पक्की सडक पर आ गयी थी, लेकिन ईवनिंग की नौकरी से मन दुःखी था। ईवनिंग कालेज दूसरी श्रेणी के माने जाते थे और वहाँ से उच्च पदों तक पहुँचना असंभव था, यद्यपि काफी बाद में मेरे साथी बने सुधीश पचौरी दिल्ली विश्वविद्यालय में सीधे प्रोफेसर बने। ऐसा चमत्कार केवल प्रगतिशीलों के साथ ही होता रहा है। मैंने हिंदू कॉलेज भी जाने का प्रयास किया, पर वहाँ ऐसा चक्र चलाया गया कि एक अध्यक्ष रहे दामाद की वहाँ नियुक्ति की गई। मुझे तो दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडर और बाद में प्रोफेसर बनने से भी रोका गया। प्रोफेसर के इंटरव्यू में मेरा चयन हो गया, तो उसमें बैठे प्रगतिशील अध्यक्ष ने कुलपति को धमकी दे दी कि गोयनका इमरजेंसी में जेल में रहा है और आप पोलिटिकल अपोइंटमेंट कर रहे हैं और इसके कारण फिर किसी की नियुक्ति नहीं की गई। उस समय इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री थे और शिक्षामंत्री एक प्रगतिशील महोदय थे। ऐसे ही एक और चमत्कार का उल्लेख जरूरी है जिससे विश्वविद्यालयों में होने वाले भ्रष्टाचार की कुछ झलक मिल जाएगी। एक बार मेरा चयन रीडर के पद पर हो गया, लेकिन नंबर एक पर डॉ उमाकांत गोयल को रखा गया जो न तो प्रत्याशी थे और न ही इंटरव्यू के लिए बुलाये गए थे। इंटरव्यू में बैठे हिंदी प्रोफेसरों की नैतिकता, ईमानदारी और ज्ञान के प्रति निष्ठा कितनी फिसलन भरी होती है और अपने स्वार्थों के लिए कैसे अयोग्य तथा अनधिकारी को उँचे पदों पर पहुँचा देते हैं। मेरे साथ ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें मेरे प्रगतिशील न होने के कारण मुझे दण्डित किया गया पर प्रतिकूलता मझधार में डूबो नहीं सकी और मेरी नाव झंझावातों को पार करती हुई निरंतर चलती रही और अब तक चल रही है, लेकिन यह भी सच है कि ऐसे प्रोफेसर मेरी प्रेमचंद पर 35 पुस्तकों को पढना तो क्या देखना भी नहीं चाहते। रिसर्च का, नये शोध की ऐसी उपेक्षा, ऐसा अपमान कहीं देखा है आपने?
मेरे प्राध्यापक होने के साथ एक साहित्यिक रूचि की नवयुवती से मेरा विवाह हो गया और साहित्य के कार्यों में अब और भी समय देना आसान हो गया। परिवार की चिंता से मुक्त हो गया। मेरी पत्नी कुसुम गोयनका ने अच्छी बाल कहानियाँ लिखी और वे धर्ययुग तक में भी छपी, साहित्य तो मुझसे ज्यादा ही पढती रहीं, लेकिन घर-गृहस्थी के लिए उन्होंने केवल अध्ययन तक सीमित कर लिया। एक स्त्री अपना बलिदान करती है तो पुरुष कुछ कर पाता है।
मुझे प्रेमचंद पर अपने शोधप्रबंध पर पीएच.डी. की उपाधि 1972 में मिली। डा. रघुवंश ने बहुत ही अच्छी रिपोर्ट लिखी थी। इसके बाद मुझे क्या करना है, यह विचार मथ रहा था कि एक रात को प्रेमचंद विश्वकोश की कल्पना उभरी, सवेरे उठकर कागज पर लिखी और अपने साथी गंगाप्रसाद विमल के साथ प्रेमचंद के बडे बेटे श्रीपतराय से मिलकर उनकी स्वीकृति प्राप्त की और उन्होंने विमल को इसके साथ जोड दिया। मैंने काम शुरू कर दिया और कुछ समय बाद गंगाप्रसाद विमल ने इस योजना से अपना नाम वापिस ले लिया, तो मैं भौंचक्का रह गया, क्योंकि यह तो बीच धार में छोडना था। विमल मेरे अच्छे मित्र और सहयोगी थे और मैं उनसे ऐसे व्यवहार की आशा नहीं कर सकता था। इसका रहस्य मुझे काफी बाद में मालूम हुआ। इसका कारण बना 1973 के आसपास दिल्ली में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन जिसमें नये-नये बने कामरेड डॉ. सुधीश पचौरी ने गंगाप्रसाद विमल पर मुझ हिंदूवादी तथा प्रतिक्रियावादी को श्रीपतराय से मिलाने का दोषी ठहराया और उन्हें पार्टी से निकालने का प्रस्ताव किया। यह रिपोर्ट आलोचना में छपी और मैंने काफी देर बाद इसे देखी, तो विमल के विमुख होने का रहस्य समझ में आया। इसका रोचक पहलू यह है कि पचौरी भी मेरे ही विभाग में थे और विमल तो थे ही, पर पार्टी के लिए अपने मित्रों/ साथियों की बलि देने में कोई संकोच नहीं था, पर काफी बाद में मुझे लगा कि यह बहुत अच्छा हुआ कि विमल खुद पार्टी के डण्डे के डर से हट गए अन्यथा आगे चलकर शायद मुझे ही अकेले चलने का फैसला करना पडता। विमल तो पार्टी के ही आदेश पर चलते और मुझे तो प्रमाणों/ दस्तावेजों के आधार पर चलना था। नियति ने फिर मेरा साथ दिया और प्रेमचंद विश्वकोश मेरे नाम से छपा और उसने मुझे प्रेमचंद स्कालर तथा प्रेमचंद का बॉसवेल के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। उस समय प्रेमचंद विश्वकोश की समीक्षा करने वालों में जैनेन्द्र कुमार, विष्णु प्रभाकर, गोपालराम, विजयेन्द्र स्नातक, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, चंद्रकांत बाँदिवडेकर, विष्णुकांत शास्त्री, धर्मवीर भारती, अवधनारायण मुद्गल जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार थे।
प्रेमचंद की जन्म-शताब्दी आने वाली थी। मैंने इस अवसर के लिए एक प्रेमचंद जन्म- शताब्दी राष्ट्रीय समिति बनाई, जैनेन्द्र कुमार इसके अध्यक्ष और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी अध्यक्ष बनीं। मैं इसका संस्थापक महासचिव था और मैं ही गतिविधियों को संचालित करता था। वैसे इस समिति के महादेवी वर्मा, उमाशंकर जोशी, मोहम्मद हसन, कवर रईस, वेदप्रताप वैदिक, विजयेन्द्र स्नातक, नगेन्द्र आदि अनेक प्रतिष्ठित लेखक सदस्य थे और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक कार्यक्रमों को आयोजित करने का लक्ष्य था। नयी दिल्ली के फिक्की सभागार में बडा सम्मेलन किया और उपराष्ट्रपति हिदायतुल्ला साहब ने इसका उद्घाटन किया। जैनेन्द्रजी के मन में मेरे विरुद्ध उनके कुछ वरिष्ठ मित्रों/लेखकों/प्रोफेसरों ने दुर्भावना भर दी थी और वे इस कारण सहयोग नहीं कर रहे थे। इस कार्यक्रम में आए अमृतराय आदि का भुगतान करना था और इसके लिए मुझे तथा प्रो. स्नातक को घर से धनराशि ले जानी पडी, पर अंत में जैनेन्द्रजी ने चैक पर हस्ताक्षर किए और बैंक से रुपये निकाल कर भुगतान किया। जैनेन्द्रजी के असहयोग ने मुझे बहुत पीडित किया, वे इंदिरा गाँधी से दो बार मिले, पर मुझे नहीं ले गए और हम सरकार से एक पैसा भी न ले सके। केंद्रीय सरकार ने हमें कनॉट प्लेस में एक भवन प्रेमचंद समिति के लिए दिया, पर जैनेन्द्रजी ने उसका कब्जा लेने नहीं दिया, जबकि मैं कहता रहा कि आप सपरिवार उसमें जाकर रहें। इस व्यवहार से प्रेमचंद अकादमी तथा प्रेमचंद संग्रहालय तथा प्रेमचंद पत्रिका की सारी योजनाएँ ठप हो गयीं। मेरे प्रस्ताव पर मॉरिशस में प्रेमचंद शताब्दी समारोह आयोजित हुआ, तो भारत सरकार ने मुझे तथा जैनेन्द्रजी को भारत सरकार का प्रतिनिधि बनाकर भेजा, पर वहाँ जैनेन्द्रजी ने भारतीय राजदूत से पूछा कि गोयनका यहाँ कैसे आया। इस पर राजदूत ने उन्हें पत्र-व्यवहार दिखाया कि यह कार्यक्रम गोयनका के प्रस्ताव पर ही हो रहा है और आप भी गोयनका के प्रस्ताव पर आए हैं। राजदूत मेरे शहर के थे, इस कारण उन्होंने मुझे इस घटना की जानकारी दी, पर मैं आज भी कहता हूँ कि जैनेन्द्रजी ऐसे नहीं थे। उन्हें मेरे बारे में गलत बातें बताई गई थीं कि यह मारवाडी है, इस पर यकीन न करें। इस संबंध में उन्होंने मुझे अमेरिका से पत्र लिखा था कि मुझे अपना कद छोटा करना होगा, तभी समिति चल सकेगी। मैं चपरासी बनकर काम करूँ तथा समिति उन लोगों को चलाने दूँ जिनका प्रेमचंद से कोई लेना-देना नहीं था, यह मुझे मंजूर नहीं था। इसकि परिणाम यह हुआ कि जैनेन्द्रजी ने एक और अंतरराष्ट्रीय प्रेमचंद समिति बनाई और अपने घर पर उसका बोर्ड लगा दिया। उन्होंने इंदिरा गाँधी का संरक्षक बनने वाला पत्र माँगा, तो मैंने मना कर दिया, क्योंकि वह मेरे द्वारा स्थापित समिति के लिए लिखा गया था। नतीजा वही हुआ, जो ऐसी स्थिति में होता। जैनेन्द्रजी की नयी समिति बिना कुछ किए खत्म हो गयी और मेरी निर्मित उनके असहयोग से। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि मैं कहाँ कितना दोषी था, पर एक बडा अफसोस हमेशा रहा कि प्रेमचंद अकादमी तथा संग्रहालय नहीं बना पाया। हिंदी लेखकों के छोटे-बडे तथा ऊँच-नीच भाव ने प्रेमचंद को स्थायी श्रद्धांजलि देने की कोशिश को पैदा ही नहीं होने दिया। मेरे जीवन का स्वप्न पूरा नहीं हुआ, लेकिन भविष्य में कोई न कोई प्रेमचंद प्रेमी इसे अवश्य पूरा करके उनके महान योगदान को तथा उनकी भारतीयता को भावी पीढियों तक पहुँचाने का इंतजाम करेगा। इस असहयोग के बावजूद मैंने लगभग 40 पत्रिकाओं के प्रेमचंद विशेषांक निकलवाए, सामग्री दीं, डाक टिकट निकलवाया, साहित्य अकादमी प्रांगण में प्रेमचंद प्रदर्शनी लगवाई और कुबेरदत्त के साथ दूरदर्शन के लिए वृत्तचित्र बनवाया तथा अनेक लेख लिखें और मूल पाण्डुलिपियाँ आदि प्रकाशित कराईं। मॉरिशस में प्रेमचंद प्रदर्शनी का उद्घाटन वहाँ के प्रधानमंत्री डॉ. शिवसागर रामगुलाम ने किया और बडी प्रशंसा की।
मेरे ऊपर विपत्तियों का पहाड कम नहीं हुआ। इमरजेंसी में इंदिरा गाँधी ने जेल में बंद करवा दिया और कई महीने तिहाड जेल में रहा। इससे छूटा, तो प्रगतिशीलों का जो आक्रमण सुधीश पचौरी ने शुरू किया था,वह मलयज, शिवकुमार मिश्र तथा नामवर सिंह आदि से होता हुआ देश के सभी प्रगतिशील लेखक संघों तक फैल गया। ये प्रगतिशील लेखक/आलोचक/ कामरेड के खुद को प्रेमचंद का वारिस मानते हैं और प्रेमचंद नामक पूँजी पर पूँजीपतियों की तरह उस पर एकाधिकार चाहते और मानते रहे हैं। यही कारण है कि जब मैंने प्रेमचंद के जीवन, साहित्य तथा विचार के संबंध में दस्तावेजों के आधार पर नवीन तथ्यों का उद्घाटन किया, तो ये मधुमक्खी की तरह मुझ पर टूट पडे और गंदी गालियों एवं क्रूर आरोपों से घायल करने का कोई मौका नहीं छोडा। असल में, इनकी सारी मान्यताएँ धराशाही हो गयीं और इनकी राजनीतिक साजिश खुलकर सामने आ गयी। इनके झूठ को पहली बार किसी ने सप्रमाण चुनौती दी थी और इनके पास कोई उत्तर नहीं था सिवाय धमकाने, डराने तथा बदनाम करने के। हैदराबाद में वेणु गोपाल ने तो देखने की धमकी दी, तो वह केवल धमकी देकर ही रह गए। मैंने उन्हें शरीर या बुद्धि से संवाद करने का अवसर दिया, पर वे मुँह फेर कर चले आते। यह स्थिति लगभग 40 साल तक चलती रही और मैं सबका जवाब देता रहा और वे चुप होते गए, पर फिर कुछ दिन बाद एक नये कामरेड गाली देते नजर आते। आज से तीन साल पहले दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में प्रेमचंद पर एक पुस्तक का लोकार्पण करते हुए डॉ. नामवर सिंह ने मुझ पर कृपा करते हुए कहा कि गोयनका मारवाडी सेठ है, वह लिखना पढना क्या जाने। वह प्रेमचंद को हिंदू बना रहा है और हम उसका अहंकार चूर-चूर कर देंगे। यह खबर मैंने जनसत्ता अखबार में पढी, तो यकीन नहीं हुआ कि नामवरजी ऐसा मेरे बारे में कह सकते हैं। वे जब भी मिलते, मेरी प्रशंसा करते, मंच से भी करते और अपने शिष्य वीरभारत तलवार को प्रेमचंद पर काम करने से पहले मेरे पास भेजा और आलोचना में प्रेमचंद विश्वकोश की लंबी समीक्षा प्रकाशित की। मैं कईं दिन परेशान रहा और जब इस खबर को वापस नहीं लिया गया, तो मैंने नामवर सिंह का आलोचना विवेक शीर्षक लेख लिखा जो जनसत्ता में ही छपा। मैंने लिखा कि साहित्य को धर्म- जाति में न बाँटें, मारवाडी होना अपराध नहीं है। सेठ का अर्थ श्रेष्ठ है और सेठ हर जाति में हो सकते हैं। मैंने लिखा कि आप तो ठाकुर हैं और प्रेमचंद ने ठाकुरों का कैसा चरित्र खींचा है,यह आप जानते ही हैं। दूसरे, प्रेमचंद तो पहले से ही हिंदू थे, मैं उन्हें हिंदू क्या बनाऊँगा। इसके बाद वे मुझे मिले, तो बोले कि आप मुझसे नाराज हो गए, पर मैंने कहा कि मैंने केवल आपकी बात का उत्तर दिया था, पर आप मुझसे बहुत बडे हैं और यदि मुझसे गलती हुई है, तो माफी चाहता हूँ। इस पर उन्होंने कहा कि गोयनकाजी, गलती तो मुझसे हुई है, अतः माफी तो मुझे माँगनी चाहिए। इससे नामवरजी बहुत बडे हो गए और जब उनका देहांत हुआ, तो मैं बहुत दुःखी था और अंतिम संस्कार में शामिल हुआ। यदि नामवर सिंह कम्युनिष्ट पार्टी के साहित्यिक प्रवक्ता नहीं होते, तो वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जगह के हकदार हो सकते थे। नामवरसिंह के जाने से प्रगतिशील युग का अंत हो गया और प्रेमचंद का भारत-बोध और भारतीयता ही केंद्र में स्थापित हो गयी। प्रेमचंद ने साहित्य के द्वारा भारतीय आत्मा की खोज का संकल्प किया था। इसी भारतीय आत्मा की खोज में गाँधीवाद, माक्र्सवाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना समाहित हो जाती है। प्रेमचंद को इसी समग्रता से समझा जा सकता है।
इन सब प्रतिरोधों, आरोपों तथा प्रतिकूल धारा के बीच कई बार नासमझ विरोधियों ने डूबाने की पूरी कोशिश की, लेकिन हिंदी के अनेक प्रतिष्ठित लेखकों/ प्रोफेसरों/ संपादकों तथा पाठकों के समर्थन ने मुझे तूफानों में भी नौका चलाने की ताकत दी। एक ओर प्रगतिशील गुट विरोध की हुँकार लगा रहा था और दूसरी ओर जैनेन्द्र, श्रीनारायण चतुर्वेदी, धर्मवीर भारती, प्रभाकर मामले, विष्णु प्रभाकर, राजेन्द्र यादव, सर्वेश्वर लाल सक्सेना, शिवमंगल सिंह सुमन, मृणाल पाण्डेय, विष्णुकांत शास्त्री, चंद्रकांत वांदिवडेकर, विद्यानिवास मिश्र, विजयेन्द्र स्नातक, कल्याणमल लोढा, रमेश कुंतल मेघ, देवेश ठाकुर, विनय आदि अनेक लेखकगण मेरे प्रेमचंद के कार्यों पर प्रशंसा का शंखनाद कर रहे थे। इसके अतिरिक्त पाठकों का तो एक पूरा समूह ही देश में बन गया और मैं आर्श्यचकित था यह देखकर कि हिंदी में आलोचक-शोधार्थी के भी क्या पाठक होते हैं? इससे मुझे अद्भुत शक्ति मिली और हर छोटे-बडे झंझावातों को झेलना आसान हो गया।
मेरे जीवन में एक नया अध्याय तब जुडा जब नरेन्द्र मोदी की केंद्र में सरकार बनी और मुझे भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा का उपाध्यक्ष बनने का न्यौता मिला। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि मुझ पर किसकी कृपा हुई। मैं केंद्रीय मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी से मिला जिनके आदेश पर यह नियुक्ति हुई थी। मैंने आभार व्यक्त किया और यथाशक्ति संस्थान को आगे बढाने का विश्वास दिलाया और उन्होंने भी पूरा सहयोग देने की बात कही। मैं सितंबर, 2014 से फरवरी, 2020 तक उपाध्यक्ष रहा और अनेक महत्त्वपूर्ण काम हुए-- हिंदी की दो पत्रिकाओं की जगह आठ पत्रिकाएँ शुरू की और पूरे देश के साथ प्रवासी साहित्य को भी जोडा, 40 लघु पत्रिकाओं को 50 हजार रुपये वार्षिक अनुदान दिया जाने लगा, हिंदी भाषा और साहित्य के 14 पुरस्कारों को 26 किया गया और एक लाख की राशि पच लाख की गई जो सरकार में असंभव बात थी, लेकिन स्मृति ईरानी ने मेरा प्रस्ताव तत्काल मान लिया। हिंदी विश्वकोश की मृत प्रायः योजना को पुनर्जीवित किया और उसे 16 खण्डों का बनाया। इसके 3 खण्ड छप गए, शेष का भविष्य नये उपाध्यक्ष देखेंगे, लेकिन यह उल्लेखनीय है कि इसके प्रधान संपादक प्रो. इंद्रनाथ चौधरी बिना किसी पारिश्रमिक के कार्य करते रहे और लाखों की राशि नहीं ली। हिंदी की बोलियों के साथ भी शब्दकोश बनाते जा रहे हैं और 15 छप चुके हैं। आगरा परिसर में भव्य अटलविहारी वाजपेयी सभागार बनवाया, शिलांग तथा हैदराबाद में नये भवनों का निर्माण हुआ और कार्यालय, हॉस्टल आदि का नवीनीकरण हुआ, कर्मचारियों का 35त्न वेतन बढाया और महत्त्वपूर्ण गोष्ठियाँ हुईं, लेकिन सोलर एनर्जी तथा लिफ्ट का काम नहीं हो सका। इनके क्रियान्वयन में निदेशक प्रो. नंदकिशोर पाण्डेय की सक्रियता तारीफ के लायक है। एक बडा काम और नहीं हो पाया। केंद्रीय हिंदी संस्थान को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने के प्रयास शुरू किए थे और सहमति बन चली थी, पर अब भविष्य ही उसका भविष्य तय करेगा। अभी संस्थान में बहुत करना शेष है और उसके कर्मक्षेत्र, ज्ञानक्षेत्र तथा प्रतिष्ठा को बढाना जरूरी है।
प्रेमचंद के अतिरिक्त मैंने प्रवासी साहित्य, लघुकथा, रचनावली आदि के संपादन के भी कई काम किए जो साहित्य समाज में स्वीकृत हुए। प्रवासी साहित्य को मैंने 40 साल दिए और 12 किताबें प्रकाशित हुईं। इससे प्रवासी साहित्य मुख्यधारा का अंग बना और प्रतिष्ठित हुआ। विगत पाँच विश्व हिंदी सम्मेलनों में सरकारी समितियों का सदस्य रहा और प्रवासी साहित्य के संकलन प्रकाशित कराए। मॉरिशस के हिंदी लेखक अभिमन्यु अंनत की हीरक जयंती पर 12 पत्रिकाओं के विशेषांक निकलवाए, उसे साहित्य अकादमी की मानद सदस्यता दिलवाई और 40 प्रवासी लेखकों की पुस्तकों की भूमिकाएँ लिखीं और प्रकाशित कराईं। अभिमन्यु की ही 15 पुस्तकों की भूमिकाएँ लिखीं। केंद्रीय हिंदी संस्थान से हर साल दो प्रवासी लेखकों को पुरस्कृत कराया। ऐसे बहुत से काम मैंने प्रवासी लेखकों के लिए किए ।आज देश में सर्वत्र प्रवासी लेखकों का सम्मान है और उनका पाठक वर्ग है। लघुकथा पर मेरी किताब लघुकथा का व्याकरण छपी, तो उसका स्वागत हुआ। साहित्य में कोई विधा छोटी हो या उसमें जैनेन्द्र, अज्ञेय जैसे लेखक ने हों तो भी उसकी उपेक्षा क्यों हो? मैंने इंटरव्यू में कुछ प्रयोग किए। अभिमन्यु अनंत, बच्चन तथा दिनेशनंदिनी डालमिया से 200 सवालों के उत्तर लिए और वे पुस्तक रूप में छपे। मैंने प्रेमचंद, यशपाल तथा हजारीप्रसाद द्विवेदी पर लिखे संस्मरण एकत्र किए और पुस्तक रूप में प्रकाशित हुए। इससे लेखकों के अनेक अज्ञात तथ्य सामने आये। विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसादद्विवेदी की जीवनी लिखी, तो उन्होंने बताया कि मेरी किताब से मदद ली। ऐसे कार्यों का यही महत्त्व है कि जिज्ञासु को दुर्लभ सामग्री मिल जाए। मैंने रामकुमार वर्मा, मंजुल भगत, बालशौरि रेड्डी तथा रवींद्रनाथ त्यागी की रचनावलियाँ संपादित कीं और गाँधीजी पर दो किताबें गाधीः पत्रकारिता के प्रतिमान तथा गाँधीः भाषा-लिपि विचार-कोश छप चुकी हैं और गाँधी : रामकथा विचार-कोश प्रेस में जाने वाला है। यह यात्रा खत्म नहीं हुई है। अभी कई काम अधूरे पडे हैं, लेकिन जानता हूँ कि किसी का काम पूरा नहीं होता।
यह मेरी जीवन-यात्रा का संक्षिप्त रूप है और कुछ ही याद रहा, ज्यादा विस्मृत हो गया। इसमें रोचकता नहीं, नीरसता ही मिलेगी। लेकिन एक सवाल हमेशा मेरे सामने रहा है कि ज्ञान के पिपासु तथा निश्छल कर्मशीलता को क्यों अवरोधों, प्रतिरोधों तथा तूफानों का सामना करना पडता है और उन्हें क्यों सरेआम अपमानित किया जाता है, क्यों लोग ज्ञान के शत्रु बन जाते हैं? मेरी तो कोई हस्ती नहीं थी, लेकिन एक मास्टर का कुछ नयी बात कहने का दुस्साहस अपराध हो गया। गाँधी, वीर सावरकर आदि तो बहुत बडे लोग थे, परंतु वे भी अपराधी बना दिए गए। तुलसीदास ने कहा कि ईश्वर ने जड-चेतन को गुणदोषमय बनाया है। मैंने कोशिश यही की कि दोषों से दूर रहकर गुणों को अपनाया जाए और सदैव सकारात्मक रहा जाते। इस द्दष्टि ने मुझे ताकत दी और सार्थकता एवं संतोष का बोध कराया। ईश्वर की कृपा और इस जीवन-द्दष्टि के कारण मेरी नौका तूफानों तथा झंझावातों में भी आगे बढती रही और जब डूबने का संकट आया भी, तब मेरी आत्मिक शक्ति और मेरी पत्नी ने मुझे डूबने नहीं दिया। मेरे तिहाड जेल के कारावास के समय उसने जो साहस दिखाया वह मैं नहीं कर सकता था। मेरे जीवन की आधी से अधिक सदी साहित्य- साधना में निकल गई और जो भी शेष है वह ऐसे ही चलती रहेगी। बस, एक बात खटकती है- मनुष्यता और ज्ञान-साधकों के लिए एक जीवन छोटा है, लेकिन कोई उपाय नहीं है। संभवतः हमारी संस्कृति तथा जीवन-दर्शन में इसी कारण पुनर्जन्म का सिद्धांत रखा गया है।

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