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बालकनी डायरी नन्हा गुरु

श्रद्धा थवाईत
08.08.2020
फाइकस बेंजामिना की अतिथि कमली के उडान भरने के बाद बालकनी तो भरी-भरी ही है, पर फाइकस सूना -सूना सा लगने लगा है। कभी-कभी उसके पास जाकर खडी हो जाती हूँ। कमली का छोडा खाली प्यूपा अब भी लटक रहा है। उसे पत्ती उठाकर देखती हूँ। खुश हो जाती हूँ। मन ही मन कमली को याद कर बुलाती हूँ, कि कमली तुम अपने अण्डे देने यहीं आना।
आज देखा कि दो स्केली ब्रेस्टेड मुनिया बालकनी में आए हैं। वे फाइकस पर फुदकते रहे-ऊपर-नीचे, आगे-पीछे। उसकी नन्हीं डालियों पर कूदते रहे-यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ। उन्हें शायद जगह पसंद आ गई। यूँ तो वे पहले भी आते रहे हैं, पर उनका घोंसला बनाना आज शुरू हुआ; विश्वास का सागर बूँद-बूँद ही भरता है।
नया घोंसला बनाना शुरू करने से पहले दोनों मुनिया ने अपने पुराने घोंसले का जायजा भी लिया, पर वह घोंसला एक साल की गर्मी, बारिश, हवा झेलते- झेलते जर्जर हो चुका है। उसकी छत में छेद हैं मानो टूटे खपरैल की छत हो। जिसे छाना जरूरी है; पर जिंदगी में कई बार मरम्मत का विकल्प नहीं होता। इनके लिए भी नए सिरे से शुरूआत ही एकमात्र विकल्प है। इसी विकल्प को अपनाते हुए मुनिया दंपत्ती ने फाइकस की घनी शाखाओं के बीच की जगह का चयन किया है।
खुशकिस्मती से आज रविवार है तो हम दिन भर घर पर ही रहे। उन्हें देखते रहे; आते- जाते। फाइकस खुशी से घडी -घडी सिहरता रहा। खिलखिलाता रहा। फाइकस का सिहरना, खिलखिलाना, उसमें मुनिया की उपस्थिति थी। मुनिया लम्बे-लम्बे तिनकों से घोंसला बुनती है। उस बुनने में चोंच से तिनके का फन्दा लगाने की कोशिश ही फाइकस की सिहरन है और मुनिया की फुदकन फाइकस का खिलखिलाना। फाइकस मुनिया की हर नई हरकत का आभास देता है। हम में सिहरन भरता है।
यूँ आज बेहद खुशी का दिन रहा। आज एक सनबर्ड ने भी बालकनी में अपनी आमद दी। मयूर पंखी नीली आभा लिए काली सनबर्ड उर्फ फूलचुहकी, शाही नीली अपराजिता में अपनी लंबी पतली चोंच डाल रस पीती रही। यह सुंदर दृश्य और बस एक काँच की आड में नन्ही- नन्ही मुनिया को अपनी गृहस्थी बुनते देखना आज का हासिल रहा।
इस हासिल में एक तनाव भी तारी रहा। मुनिया का इंसानों से ज्यादा दोस्ताना नहीं रहा है जबकि गौरैया को बचपन से घरों में घोंसला बनाते देखते आए हैं। मुनिया जंगली रही है। उन्होंने पिछले साल भी घर में घोंसला बनाया था तो इस पर खुशी के साथ-साथ चिंता भी हुई थी। खुशी इस बात की, कि वह हमारे घर में अपना घर बना रही है। हम से डर दूर भगा रही है। हमारे पास आ रही है। हमें अपना दोस्त पा रही है। चिंता इस बात की, कि क्या प्रकृति में इनके घोंसला बनाने लायक जगह की कमी हो गई है? क्या इनके आवास की जगहें नष्ट हो रही हैं? पिछले साल हम बारिश के बाद कॉलोनी की सैर करते हुए देखते थे, कि कॉलोनी के पीछे खाली छूटी जगह में जो खरपतवार उग आई है, वहाँ मुनिया की भरमार है। वह खरपतवार दिवाली की साफ-सफाई में काट डाली गई। इंसानों ने अपने आवास के आसपास कि मात्र सफाई की, पर इससे बहुत से जीवों का आवास ही खत्म हो गया। मैदान से मुनिया गायब हो गई बस इक्का-दुक्का ही दिखती रही। मन किया कि सभ्य जनों को चीख-चीख कर कहूँ कि ऐसे खाली मैदान जो घर से दूर है, जिनसे झाड -झंखाड से आपको कोई हानि नहीं है। उन्हें वैसे ही रहने दिया जाए। उनका अपना इकोसिस्टम है। यह झाड-झंखाड नहीं, प्रकृति का अपनी बहुत-सी संतानों के लिए बनाया आवास है, भोजनालय है; इस सत्य का एहसास अधिकांश इंसानों को नहीं; पर नक्कारखाने में तूती की आवाज कैसे सुनाऊँ। यह व्यथा मन में पलती - बढती जा रही है।
09.08.2020
आज की सुबह इंतजार की सुबह थी। कब मुनिया आएगी? क्या फुलचुहकी फिर आएगी? कुछ देर के इंतजार के बाद देखा कि बालकनी में कपडा सुखाने वाले तार पर चार मुनिया बैठी हैं। हमने आपस में बात की, कि जो दूसरा जोडा है, वह थोडा बडा है। शायद हमारी मुनिया अपने वरिष्ठों को अपनी चुनी जगह दिखाने लाई है। उनकी स्वीकृति के बाद ही काम आगे जारी रखा जायेगा। घोंसला बनाने की ट्रेन को वरिष्ठों से हरी झण्डी मिल गई। उनकी नीड निर्माण एक्सप्रेस अपनी पूरी गति से भागने लगी। आज शायद दिन ही कुछ खास है। आज फुलचुहकी के भी दो जोडे आए थे। अलामांडा की बेल पर बैठकर चर्चा की थी। अब हम दिल हाथ में लिए इंतजार कर रहे हैं उनके निर्णय का। उनकी बैठक का कार्रवाही विवरण बन जाए। उन्हें भी प्रशासकीय स्वीकृति मिल जाए। हमारी बालकनी में शायद फिर कोई नया निर्माण प्रारंभ हो। एक आस की पूर्ति सौ आस ले आती है।
आज दिल में एक के बाद एक खुशियों की नन्हीं कोंपले अँखुआती रही। अँगडाई भरती रही। बढती रही। मुनिया का फुर्र-फुर्र उडना। लंबे तिनके चोंच में दबा लाना। स्केली ब्रेस्टेड मुनिया बाँस या पाम फैमिली के पौधों के लंबे पत्तों से अपना घोंसला बनाती है। वे बाँस या पाम पत्तों को चोंच से ठुनक-ठुनक कर फाडती है फिर अपनी विजय पताका फहराती अपने घोंसले की ओर उड चलती है। मुनिया दिन भर पेड से नीड, नीड से पेड, पेड से नीड करती रही। नन्ही-सी कत्थई बिंदी और लहराता हरा आँचल। इसे देख ह्रदय के अंतर्मन में चंदन का लेप लगाने जैसी ठंडक महसूस होती है। यह एहसास लिखते हुए ऐसे गूँगे-सा महसूस हो रहा है जिसकी जिव्हा पर गुड का स्वाद हो। जब तक मुनिया की चोंच में तिनका होता है मेरी आँखें एकटक उसे ही निहारती हैं। हमारे घर के सामने पंक्तिबद्ध पाम के पेड हैं और पीछे दीवार के साथ फैला बाँस का झुरमुट है। मुनिया के घर बनाने के लिए सामग्री की कोई कमी नहीं है। इंतजार है जल्दी ही इनके घर तैयार होने का। आँगन में किलकारी गूँजने का।
12.08.2020
सब दिन बीत जाते हैं। गम बीत जाते हैं, तो खुशियाँ भी। एक-दो दिन वे अपनी गृहस्थी बुनते दिखे, फिर गायब हो गए। हम दिन -दिन भर उनका इंतजार करते रहे, पर वे नहीं आए। हमने मन को समझा लिया है कि शायद उन्हें जगह पसंद नहीं आई। इंसान ही नहीं सभी जीव अपना घरौंदा बनाने से पहले बहुत सोच विचार करते हैं। सुविधा -असुविधा, सुरक्षा-असुरक्षा का ख्याल रखते हैं। घरौंदा पहले सपनों में बनाया जाता है, फिर ही असलियत में बनता है। शायद बालकनी की असलियत, मुनिया के सपने से मेल नहीं खाती।
अब बालकनी में पौधे लहलहा रहे हैं, पर फाइकस फिर सूना सा है- अधूरे छूटे घोंसले के साथ। अब बालकनी की रौनक पौधों गौरैया, फाख्ता और कबूतरों से है। किसी नए सदस्य का इंतजार तो हमेशा बना ही रहता है। बालकनी के एक किनारे एक सकोरे में दाना और एक सकोरे में पानी धरा हुआ है। बालकनी में अधिक संख्या में चिडिया हों, तो वे सब दाना खाने के लिए कभी अपनी बारी का इंतजार करते हैं, तो कभी अधीर होकर दूसरों को भगा देते हैं। कबूतरों की अपने बडे आकार के चलते दादागिरी चलती है। वे आते हैं तो सबको हट जाना पडता है। वे हमारी बालकनी के बाहुबली हैं। वे पल में सकोरे का सारा दाना चुग जाते हैं। गौरैया, पडकी हाथ मलते रह जाते हैं। बिल्कुल इंसानों की तरह- जिसकी लाठी उसकी भैंस। लेकिन जहाँ बाहुबल हो वहाँ विरोध अवश्यंभावी है।भले विलंब से हो। इस विरोध की शक्ति अंतर्मन के अलावा और कोई नहीं दे सकता।
आज एक गौरैया ने विद्रोह कर दिया। कबूतर मगन होकर दाना चुगे जा रहा था। उस गौरैया ने मिसाइल उडान भरी और सीधे कबूतर से जा टकराई। यूं तो यह बहुत कम दूरी की मिसाइल थी पर बहुत प्रभावी रही। कबूतर तुरन्त डरकर उड गया। बालकनी का बाहुबली सबसे डरपोक निकला। साहस का शरीर के डील-डौल से कोई वास्ता नहीं। कबूतर के उडते ही गौरेयों का झुण्ड सकोरे की ओर झपट पडा। अक्सर एक साथ अधिकतम दो गौरैया सकोरे से दाना चुगती हैं। शेष आस- पास बैठी होती हैं। उनमें दाना खाने के लिए खो-खो का खेल चलता रहता है। इस बार एक ओर खो-खो चलता रहा। दूसरी ओर वह गौरैया, जिसने कबूतर को खदेडा था, शान से खाती रही। नमन दिनभर इस मिसाइल उडान को याद करता रहा। दिल कहता है कि उसने इस नन्ही गौरेया को अपना नन्हा गुरु बनाया है।
आज फिर फूलचुहकी बालकनी में आकर कुछ देर बैठी दिखी। उस पल मन ने पूछा- ऐ सनबर्ड तुझे बार-बार बुलाना हो तो मैं क्या करूँ? कमली को बुलाने तो मन गुन ही रहा है। बुलबुल को बुलाने बालकनी में किसी न किसी फल की एक फाँक रखती ही हूँ। बडों से सुना है कि मन का रास्ता पेट से होकर गुजरता है। तितली और सनबर्ड दोनों का पेट फूलों से भरता है। बालकनी में फूल बढेंगे, तो ये भी आएँगे, लेकिन सनबर्ड के लिए फूल गहरे प्याले या गिलास या कहूँ कि सारस की सुराही से होने चाहिए। जिसमें चोंच डालकर वे उसका रस पी सकें। हाँ, फूल रस भरे होने जरूरी हैं। यह नहीं कि खाली सुराही से फूल हों। चोंच अंदर डाली, तो पता चले कि यह तो सूखी सुराही पौधे ने खिला रखी है। तितली के लिए फूल प्लेट से फैले होने चाहिए, सुराही से नहीं। थाली से फूल, परात से फूल लेकिन खाने से भरपूर फूल हों। लिखते हुए सारस और लोमडी की कहानी याद आई। यदि तितली और फूलचुहकी एक दूसरे को अपने घर खाने पर बुलाएँगे,तो अतिथि तो भूखा ही रह जाएगा।
15.08.20
अब तक तो पौधों के साथ ही खुश थी। घर में आसपास पौधे हैं, हरियाली है। यह एहसास, उन पर नजर जाना मन को खुश करता रहा है। हवा के झोंकों के साथ पत्तों का नृत्य देख मन मयूर-सा नाच उठता है। उस पर हर पत्ते की अलग नृत्य शैली। हवा में डोलते एरिका पाम के गाढे हरे अकेले-अकेले पत्ते। इनका डोलना मन में ध्यान आनंद सृजित करता है। मानों संगीत प्रेमी हों। हवा की धुन सुन डोल रहे हों। बिगोनिया की लतर सीधी ऊपर चढी जा रही है। हवा के साथ यह बल खाती है। सदा सुहागन तेज झूमती है। अडेनियम हल्की धुन पर नहीं डोलता। इसे हवा का तेज संगीत चाहिए। तभी यह जरा-मरा थिरक लेता है।
मन के मरुस्थल में पानी की आस बनी ही रहती है, तो मन के जंगल में भी हरियाली की प्यास नहीं बुझती। मन कभी संतुष्ट नहीं होता। पौधों के साथ जब गौरेया, फाख्ता, कबूतर आने लगे तो दिल गुलजार हो गया, फिर कमली ने तो मन के बाग में बहार ही ला दी। क्रोटन की जगह अब मन फूल भरे पौधे चाहने लगा है। ठीक है थोडी ज्यादा मेहनत लगेगी, पर अब तो बाग में तितलियाँ, भँवरे चाहिए ही। रस पीने को फूलचुहकी को आमंत्रित करना ही है। अकेले रहने में आनंद नहीं है। जितने ज्यादा साथी बालकनी में आएँगे उतनी ही अधिक जिंदादिली जिंदगी में। कभी-कभी लगता है कि दुनिया वाकई में वही देती है जो आप चाहते हो। मैंने चाहे पौधे, पौधे मिले। मैंने चाही तितली, तितली मिली। मैंने चाही चिडिया, गौरैया फाख्ता, फूलचुहकी मिली। कबूतर बोनस में मिल गए। मुनिया भी शायद लौट ही आए।
16.08.20
आज हम चिडियों का चुगना निहारते चाय पी रहे थे। बालकनी आठ-नौ गौरेया, दो-तीन फाख्ता से गुलजार थी। उनकी चीं-चूं, ङू-ङू मन में आवाजों के फूल खिला रही थी। तभी दो कबूतर चले आए। दाने टपा टप चुगने लगे। मैंने अनायास कहा, हालाँकि कहा वही जो मन में था, ये फिर आ गए। सारा दाना दो मिनट में खत्म कर देंगे।
नमन कह उठा, मम्मा आप गौरैया को बार-बार दाना देते हो। कबूतर भी तो गौरैया के जैसे ही एक जीव है ना। उसको भी तो भूख लगती है। वह खा रहा है, तो आप नाराज क्यों हो रहे हो?
नमन की बात में मौजूद जीवन-दर्शन को दिल के दरवाजे पर ही खडे रख मैंने जवाब दिया,
वह सब खा जाता है ना बच्चा
अब मम्मा उसका पेट बडा है, तो ज्यादा ही तो खाएगा ना। गौरैया छोटी है, तो उसका पेट छोटा है।
दिल में इस दस्तक के बाद कुछ तर्क नहीं सूझा। वाकई चिडिया को ही तो खिला रही हूँ। बिना बुलाए कबूतर आते हैं, तो उन पर गुस्सा आता है। रॉबिन, बुलबुल नहीं आते, फूलचुहकी झलक दिखला कर चली जाती है, तो उन्हें बुलाने का जतन होता है। यही इंसानों के साथ भी हम लागू करते हैं। आधी रोटी को छोड पूरी की ओर भागते हैं। तब से कबूतरों के दाना खा जाने पर खीजना छोड दिया है। कहते हैं माँ बच्चे की प्रथम गुरु होती है पर बच्चे माँ के, नन्हे और सर्वाधिक प्रिय गुरु होते हैं।