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जयशंकर मिल जाएँ तो मौसम बदल जाए

ओमा शर्मा
एक कहानीकार के तौर पर कथाकार जयशंकर से मेरा दूर का परिचय तो था, लेकिन उनसे न तो कोई संवाद था और न मुलाकात। सन 2018 में एक पत्रिका में स्टीफन स्वाइग की मेरी अनूदित एक कहानी- अदृश्य संग्रह- के जरिये आपसी संवाद और सम्बंध का एक नितान्त नया, अनवरत और सुखद गवाक्ष खुला, तब मैंने जाना कि उनके भीतर निश्छल आत्मीयता का कैसा अथाह भंडार है जो उन्हें इस जमाने का तो एकदम विरल इन्सान बना देता है। वे आपसे विश्व साहित्य की तमाम रचनाओं के ऐसे बिन्दुओं को खोलते मिलेंगे, जिनके बारे में दूसरों- या स्वयं आपने- अन्देखी की हो। उस या उन रचनाओं का सामाजिक, कलात्मक या ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य-सा भी उत्सुकता से मुहैया करते मिलेंगे। अपने बारे में या तो वे बात ही नहीं करेंगे या बात चली भी तो कहेंगे कि उनका अधिकांश लेखन कितना औसत श्रेणी का है। यहाँ तक कि दूसरों की रचनाओं में उन्हें शायद ही कोई नुकस नजर आए, जो यदि होते भी हैं तो वे उसे उस लेखक की निजता के इलाके में रखकर, उसकी समग्रता पर या फिर उसके किसी अनछुए पहलू की बात अधिक करते दिखेंगे। उनकी इस मानसिकता के बरक्स मुझे महसूस हुआ कि दूसरों की रचनाओं की जाँच-परख के मामले में मैं बहुत उदार नहीं ही हूँ। मैंने उनसे जब उनके द्वारा प्रशंसित किसी रचनाकार की कमजोरियों की तरफ इशारा किया, तो सहमति में वे मेरे साथ खडे दिखे, हालाँकि मैं जानता हूँ कि इससे चीजों को कोमलता के साथ देखे जाने के उनके बुनियादी स्वभाव में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आएगा। बदलाव शायद मुझमें संचरित हुआ हो- चीजों को अधिक नरमाई से देखने की बाबत।
भागदौड और रफ्तार ओढती जिन्दगी के बीचों-बीच किस आसानी से उसका विपर्यस रचा जा सकता है, उसे अनुभव करना हो, तो जयशंकरजी से मित्रता बडी समृद्धकारी है। मैंने जब उन्हें अपना कहानी संग्रह भिजवाया, तो वे नियम से रोज केवल एक कहानी पढते और शाम को उस पर अपनी विस्तृत राय के साथ यह भी बताते कि इस कहानी पर उन्होंने अलग से एक चिट्ठी भी लिखी है। उनकी चिट्ठी चाहे पन्ने-दो-पन्ने की ही हो, लेकिन उसमें कुछ न कुछ ऐसा हर बार होता जो परम्परागत आलोचना या फिर पाठकीय राय से हटकर होता। यह सिलसिला पूरे हफ्ते चला। यह क्रम दूसरे संग्रहों के साथ भी उसी निष्ठा और नियम से चला। उन्होंने बताया कि जिन रचनाओं--खासकर कहानियों को- वे पसन्द करते हैं, उन्हें पूरा पचा-पचाकर पढते हैं। कोई सोच सकता है कि आज के इस दौर में कोई लेखक दूसरे लेखक की रचनाओं में इतनी आत्मीय अभिरूचि लेता होगा! इतना ही नहीं, वे उन रचनाओं के जब-तब एकाधिक पाठ अवश्य करते हैं। मुझे याद आया कि कोई साल भर पहले जब उनकी पच्चीस कहानियों का एक चयन प्रकाशित हुआ था, तब मैंने उसे बडे चाव से पढा था - खासकर उन कहानियों के भाव-बोध और भाषागत विन्यास के कारण। लेकिन मैं चार-पाँच कहानियाँ तो रोज पढ ही डालता था। एक तो इसलिए भी कि उनकी कहानियाँ इतनी लम्बी नहीं होती हैं और दूसरे इसलिए भी कि अनपढी या पढे जाने के लिए घूरती किताबों का अपना दबाव रहता है। लेकिन क्या यह दबाव जयशंकरजी पर नहीं रहता होगा, उनसे बातें करने के दरम्यान पता नहीं कहाँ-कहाँ के सन्दर्भ उछल-कूद मचाने आ ही जाते हैं। किताबों को लेकर उनकी स्मृति भी खूब है। ग्राहम ग्रीन की बात चली, तो वे पावर एण्ड ग्लोरी और ह्यूमैन फैक्टर के सिवाय दो उपन्यासों का अलग से उल्लेख करेंगे जो ग्राहम ग्रीन के औपन्यासिक रचाव के जरूरी हिस्से हैं। मैं उन दिनों पढे जा रहे सॉल बैलो के सीज द डे की बात करने लगा, तो उन्होंने बताया कि सॉल बैलो के लेखन की खूबी क्या है... एक यह कि उनके ज्यादातर उपन्यास चरित्रों को लेकर हैं...हरजोग, हमबोल्ट्स गिफ्ट, मिस्टर सामलर्स प्लैनिट, डीन्स डिसम्बर, और दूसरी ये कि उनके यहाँ घर-परिवार के बीच इन्सानी फितरत की बडी शाश्वत बातें आती हैं जो अमेरिकी साहित्य में कम दिखता है। मैं एक बार जिक्र करने लगा कि बडे दिनों से मेरी इच्छा नायपॉल के चर्चित उपन्यास हाउस ऑफ मिस्टर बिश्वास को पढ लूँ। उन्होंने सहमति में कहा कि उनकी राय में नॉयपॉल के यात्रा निबन्ध या भारत सम्बंधी सभ्यता विमर्श अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। उनकी बात के मर्म के साथ मेरी असहमति नहीं थी, लेकिन मैं लेखकों की रचनाओं को पढकर ही दम लेता हूँ। फैसलाकुन बाद में होंगे, पहले तो जानना-समझना होगा कि हुआ (लिखा) क्या है! हाउस ऑफ मिस्टर बिश्वास को दो-तिहाई पढने के बाद मुझे रखना पड गया। इसी तरह इसाक डेनिसन और फ्लेनेरी ओ कुनूर जैसी अद्भुत लेखिकाओं के सृजन में झाँकने का श्रेय मैं जयशंकरजी को दूँगा, जो जब-तब उनकी रचनाओं या उनके जीवन-प्रसंगों को बातों-बातों में साझा करते रहे।
जयशंकरजी ने इतना सब कुछ कैसे पढ डाला होगा आखिर कुछ बरस पहले तक वे भी बैंक में कार्यरत रहे थे। मैं जहाँ तक सोच सकता हूँ, एक कारण तो यही कि उन्होंने विवाह नहीं किया...इसलिए अपने लिए अपेक्षाकृत अधिक वक्त मुहैया रहता होगा। लेकिन इससे भी ज्यादा अहम बात उपलब्ध समय के इस्तेमाल की है। हमारे कितने ही लेखक तमाम तरह की चर्चाओं, यात्राओं और भाषणों में अपने को उलझाए रखते हैं - समकालिक संदर्भों में अपनी उपस्थिति और अहमियत के प्रति खुशफहमी पालते हुए ...कि वे दूसरों के हिस्से आए अँधेरे या गलतफहमी को मिटा सकते हैं, उन्हें राह दिखा सकते हैं या उनके पास ज्ञान का ऐसा खजाना है जिससे दूसरे यकीनन लाभान्वित हो सकते हैं। इस सोच में यूं कुछ गलत नहीं है, लेकिन मैं जयशंकरजी की इस सोच के साथ खुद को खडा पाता हूँ कि हमें तो अभी कितना कुछ सीखना बाकी है, कितना कुछ पढने को पडा है। वे कहते हैं कि हम कोई निर्मल वर्मा नहीं हैं, लेकिन उनकी जीवन शैली से बहुत कुछ अपना सकते हैं जिसके वे गवाह रहे हैं। हमारे भीतर की आवाज किसी न किसी बहाने समय आने पर हमें अपने प्रेक्षक-स्थलों तक ले ही आती है या कहें, जब उन प्रेरक-क्षणों में हम प्रवेश करते हैं तब एक सही समय की शुरूआत होने लगती है। कथाकार जयशंकर के जीवन में यह क्षण निर्मल वर्मा को लेकर रहा है। वे बीस बरस की कच्ची उम्र में मध्य प्रदेश के अपने कस्बे से सीधे दिल्ली केवल निर्मल जी से मिलने चले आए। और निर्मलजी ने उन्हें अपने उसी सहज-भाव से अपना लिया जिससे वह बने थे। ताउम्र- यानी निर्मलजी के अन्तिम दिनों तक - दोनों की दोस्ती रही... बीसियों मुलाकातें, गपशप, यात्राएँ और सबसे अहम दोनों के बीच लगातार होता आत्मीय और सहज संवाद-पत्राचार। निर्मलजी द्वारा जयशंकर को लिखे पत्रों की एक किताब- देहरी पर पत्र - निर्मलजी के व्यक्तित्व पर अलग से बडी गुनगुनी-सी रोशनी छोडती है।
एक दार्शनिक ने कहा है कि किसी व्यक्ति की दिनचर्या, समय के प्रति उसकी प्राथमिकताओं का कच्चा-चिट्ठा हो सकता है। पन्द्रह-सत्रह घन्टे लम्बे दिन को आप किस तरह पकडते और महसूस करते हैं, उसे किस तरह सामाजिकता और एकान्त में बाँटते हैं, अपनी प्राथमिकताओं के मद्देनजर जरूरी और गैर-जरूरी के खानों का किस सख्ती से निर्वाह करते हैं या फिर कितनी देर दुनियादारी में मौज-मजा करते हैं, यह सब दीर्घकाल में आपकी कलागत बुनावट और मिजाज को निर्धारित करेगा। जयशंकरजी का पूरा दिन या तो किसी नई, हाल ही में हासिल किताब को चाव से पढने के लिए निवेशमय रहता है या अपनी पसन्द की पहले पढी किताब को फिर से, ठहरकर पढने के लिए। वे किसी दौड में नहीं रहते, इसलिए न किसी पुस्तक को खत्म करने की जल्दबाजी रहती है और न उसके मर्म को अध्यापकों की तरह भाषणनुमा कुछ अरबा-सा बना देने की जल्दबाजी-मजबूरी। यहाँ तक कि कविताओं के भी वे बडे पारखी हैं; न सिर्फ हिन्दी कविता के, बल्कि यूरोपियन और लातिन अमरीकी कविता के भी। मैं सोच भी नहीं सकता कि कोई कथाकार पश्चिम के बिसराए कवि के हाल में आए अनुवादों को अपनी निजी लाइब्रेरी के खजाने के आधार पर पूर्व में किए अनुवादों के साथ भी परखता-तौलता होगा। लेकिन जयशंकर ऐसा खूब करते हैं और बारहा करते हैं (मैं यहाँ कवियों के नाम नहीं लिख पा रहा हूँ, तो इसलिए कि मेरे जाने वे बहुत सुपरिचित नाम नहीं हैं और फिर मेरी याददाश्त भी माशाअल्लाह है)। नागपुर की लायब्रेरी तो बरसों से उनका दूसरा घर बनी ही हुई है। मुझे तो बस उनकी मार्फत अनजाने ही हाथ लगता है कि पिछले दो सप्ताह से जनाब जेकब मेण्डल बने रहे-लायब्रेरी के धूल अटे जर्नलों, न्यू लेफ्ट से लेकर सेटरडे रिव्यू, से छटनी करने के लिए अपनी सुबह-शाम एक करते रहे--क्योंकि वहाँ का लाइब्रेरियन पुराना मित्र है और लायब्रेरी में स्टाफ कम है-ताकि उनके कुछ वाकई संग्रहणीय अंक रद्दी में जाने से बच जाए। इस प्रक्रिया में, गलती से कहें या मजबूरी में, वहीं के जंग खाए वाटर-फिल्टर का पानी पी लिया जिससे चार-पाँच रोज से गला और पेट खराब लिए बैठे हैं। फिर भी कहना नहीं भूलते कि अब तो काफी ठीक है...आपने इन दिनों क्या पढा। यानी भूले से भी बात का सिरा अपनी ओर या अपनी किसी समस्या का सुराग देने लगे, तो तुरन्त बात बदल दो। तबियत का क्या है, सब की ऊपर-नीचे होती ही रहती है।
किताब, किताबों से जुडी चर्चाएँ और लेखकी के प्रसंगों पर अपने देखे-भोगे अनुभवों में लीन रहने वाले व्यक्ति की जिन्दगी में, जाहिर है कुछ ऐसा जरूर होगा- ऐसा सुखद और मुश्किल- जो दूसरे अपने लिए नहीं चुन पाते हैं। मैंने जो लक्ष्य किया वो यह कि उनके हाथ में अभी भी एक पुराना घिसा-सा मोबाइल रहता है जिससे वे बात कर सकते हैं और आन पडने पर कोई संदेश भी दे सकते हैं। मतलब यही कि स्मार्ट फोन के व्यामोह से उन्होंने चयन के तौर पर खुद को अलग किए रखा है। ईमेल खाता बनाया हुआ है, लेकिन उसका उपयोग केवल एकदम जरूरी चीजों के लिए सीमित रहता है। प्रेषक को फोन से बताना होगा कि उसे कृपया देख लें। अपने को समकालीनता से जोडे रखने के इस मुगालते से बचना उनके लिए बहुत आसान रहा है क्योंकि तकनीकी की मार्फत सामाजिकता का भ्रम पालती सोशल मीडिया की दुनिया के इस पक्ष से वे न जाने कैसे बिन भोगे ही वाकिफ थे। कभी कुछ अच्छे वीडियोज, फिल्म क्लिप या शानदार बहस-भाषणों के अंशों को सोशल मीडिया में सहज पाकर-पढकर-देखकर उसके फायदे भरमाने लगते हैं। समयान्तर में मेरे जैसे व्यक्ति के जीवन में भी उसके बढते हुए स्पेस को देखकर खुद पर अक्सर अफसोस और चिढ होने लगती है। और तब जयशंकर का परहेज रखने का फैसला दुरुस्त और स्पृहणीय लगता है। इसका एक पक्ष यह भी है कि जयशंकर एकदम जमीनी और वास्तविक दुनिया के कद्रदान हैं। वे मित्रों से खूब बतियाते हैं। उनके दर्जनों लेखकीय मित्र तो हैं ही जिनसे वे हर सूरत पहल करके संवाद कायम रखते हैं, दूसरे इलाकों के या गैर-लेखकीय मित्र भी खूब हैं। मसलन, फिल्म संस्कृति से गहरा जुडाव होने के कारण फिल्म, खासकर डाक्यूमेंट्री फिल्म, क्षेत्र के अनेक लोग उनके मित्र हैं। वे नागपुर में फिल्म सोसायटी से गहरे जुडे हैं जहाँ हर रविवार एक क्लैसिक फिल्म का दृश्यांकन होता है। उनसे बातों के दौरान ही मैं जान सका कि कला के स्तर पर फिल्म और साहित्य कैसे एक-दूसरे से गहरे जुडे रहे हैं और कैसे साहित्य की बडी रचनाओं ने देश-काल की सीमाओं को भेदकर अनेक निदेशकों ने अपनी-अपनी आजमाइशें रची हैं। दोस्तोएवस्की के सृजन के ब्रह्माण्ड को खोलने के लिए कैसे ब्रेसां जैसा फ्रेंच निदेशक अधिक कारगर रहा है, बजाय किसी रूसी निदेशक के...कि कीसलोवस्की की केवल वह मशहूर फिल्म त्रयी... रेड, ब्लू, व्हाइट ही नहीं है, उसकी सोच को वृहत आयाम देती फिल्मों से सम्बंधी पूरी दुनिया है जिसे देखा जाना चाहिए। फिल्मों की बातें करते हुए वे कभी गंगूबाई हंगल की गायकी की बात करने निकल सकते हैं, तो कभी किसी पश्चिम के जीनियस की। मैं हतप्रभ होता हूँ कि इतने दिनों आमला जैसे कस्बे में बैंक की नौकरी करने वाला व्यक्ति बीथोविन की अलां-फलां सिम्फनी का पारखी या रसिक कैसे हो गया अपनी बहुत सारी चीजों के अच्छे होने का श्रेय वे निर्मल वर्मा को सादर देते हैं।
निर्मलजी के पास न सिर्फ अध्ययन का विपुल संसार था, बल्कि एक से एक पुराने रिकार्डस भी सुनते-रखते थे - कला की दुनिया के उनके पूरक, प्रेरक और प्रतिस्पर्धी। उन्हीं के सहारे उन्होंने एकान्त को पूरे चयन और इच्छित संपूर्णता के साथ जीने का नियम-क्रम बनाया था- उनके यूरोपीय प्रवास का भौतिक हासिल और विस्तार। संगीत, चित्रकारी और साहित्य की दुनिया के गहरे और उभयधर्मी सम्बंधों की बारीकी को उन्होंने उस प्रवास में महसूस कर लिया था जिसे- जैसा कला का आस्वाद लेने वाले हर व्यक्ति को होता है- समयांतर में वे और प्रौढ और पुख्ता करते गए। अभी तक निर्मलजी के व्यक्तित्व को लेकर- खासकर यूरोपीय प्रवास का उन पर पडने वाले असर को लेकर- कोई जीवनीपरक अध्ययन सामने नहीं आया है, लेकिन समझा जा सकता है कि चेकोस्लोवाकिया में कार्यरत होकर उन्हें वास्लव हावल, ईवान क्लीमा या मीरोस्लाव क्रासा जैसों की जब-तब मिली सोहबत से भी अधिक, साहित्य और कला के विशाल खजाने की मिली उपलब्धता- और अवकाश- था जिसकी धुन उनके भीतर यूरोप के प्रवास पर जाने से पहले ही उनके भीतर छेड मचा चुकी थी। जयशंकर के सन्दर्भ में निर्मलजी का उल्लेख करने का मेरा लोभ शायद यही कि मैं इस मकाम पर दोनों के मिलन को एक अभूतपूर्व संयोग के रूप में देखता हूँ: जीवन और कला की भरपूर आँच से तपे राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समादृत होते पचास वर्षीय निर्मल वर्मा अपनी भाव-भूमि और विशिष्ट भाषाई पहचान के कारण उन दिनों भी सम्मोहित करते थे जैसे खास पाठक वर्ग को वे आज तक करते हैं। युवा जयशंकर ने जल्द ही पोटुओं पर गिने निर्मल वर्मा के उन चन्द लेखक मित्रों में जगह बना ली जो उस सम्मोहन की जद को तोडे बगैर आपसी सम्बन्धों के अलावा साहित्य और कला के अनसुलझे प्रश्नों पर सहज संवाद की आत्मीय छूट थी।
जयशंकर वय के साठ बरस पूरे कर चुके हैं। कह सकते हैं कि पिछले चालीस बरस का उनका जीवन साहित्य, कला और कला-फिल्मों के हवाले रहा है। लेकिन न तो उनमें किसी बुजुर्गियत की छाया दिखेगी और न किसी साठोत्तरी लेखक की किंचित अहमन्यता और रुखाई। वे हरदम किसी विद्यार्थी के जोश और जिज्ञासा के साथ-साथ, वस्तुतः किसी संत की सरलता से जीते हैं। उनकी कहानियों के खास वातावरण और अनछुए सन्दर्भों का मैं कभी उल्लेख करने लगूँ, तो वे उसे हँसते हुए टाल जाएँगे और कहेंगे कि उन्हें अपनी लगभग सभी कहानियाँ आज भी बडी अधूरी और कमजोर लगती हैं। फोरन से पेश्तर और लगभग आदतन, बात को वे या तो सामने वाले की किसी सामान्य रचना की खासियतें गिनाने लगेंगे या उस रचना के दूसरे सन्दर्भों पर देर तक बातें करने लगेंगे जो वे दक्षता से करते हैं क्योंकि विश्व साहित्य को इतना उन्होंने न सिर्फ पढा है, बल्कि उसमें रमे भी रहते हैं। वे इस बात में तो मित्रवश दिलचस्पी लेंगे कि इन दिनों मैं क्या लिख-पढ रहा हूँ, कभी लिखने का अन्तराल लम्बा होता लगे, तो मित्रता की गरिमा सधे संकोच के साथ, किसी परिजन की आत्मीयता से प्रेरित भी करते लगेंगे कि लिखने का अन्तराल क्यों ज्यादा लम्बा नहीं रहने देना चाहिए...कहानी नहीं हो रही है तो कुछ और... कुछ और नहीं तो डायरी (जैसे कि मैं यह लिख रहा हूँ) ही...क्योंकि लिखने की प्रक्रिया के चलते ही कुछ सार्थक लिखने की संभावना खुलती है। लेकिन इस मित्रवत छूट पर वे जल्द ही बडे संयम से काबू पाकर यह भी कहते मिलेंगे कि रचनाकार को किसी जल्दबाजी या दबाव में नहीं रहना चाहिए... बिना लिखे अन्तराल को यदि बडी रचनाओं के पाठ-पुनर्पाठ में निवेशित किया जाए, तो यह भविष्य में सृजित होने वाली रचना के बडे काम का होता है...हैमिंग्वे ऐसा करते थे, जॉर्ज ऑरवेल भी...चेखव जरूर प्रोलिफिक रहे, लेकिन बाद में उन्होंने भी ऐसा ही कुछ किया। अपनी बात को कहते हुए दूसरे के प्रति निरंतर सम्मान रखने का यह भाव उनके भीतर इतना गहरा है कि उनके मित्र इससे भरपूर लाभान्वित और प्रेरित ही हो सकते हैं।
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मित्रता जयशंकरजी के जीवन की बडी धरोहर होगी। वे ऐसे अजातशत्रु हैं कि हिन्दुस्तान के हर शहर में उनके पाठक-मित्र और लेखक-मित्र हैं। एक बार उनके दायरे में आकर कोई भी उनमें दूर नहीं जाना चाहेगा। उनकी दिलचस्पी केवल इसी चीज में नहीं है कि आप क्या लिख या पढ रहे हैं, आप और आफ घर-परिवार से जुडे लोगों की तबियत कैसी है, वे क्या-क्या करते हैं, उनकी दिनचर्या और रूचियाँ क्या रहती हैं...इसे जानने को भी वे बराबर उत्सुक दिखेंगे। और मित्रता के लिए वे क्या कुछ करने को तैयार नहीं रहते। मुझे याद है हमारी मुलाकात उन दिनों मुम्बई में इसलिए हो सकी क्योंकि उनकी एक चित्रकार मित्र की जहाँगीर कला-दीर्घा में होने वाली प्रदर्शनी में वे नागपुर से खासकर उसमें शामिल होने आए थे। न सिर्फ स्वयं आए, बल्कि इस युवा चित्रकार को अपने दायरे के मुम्बई के दस-बीस कला प्रेमी मित्र भी थमा दिए जिससे विमोचन के समय उनका मनोबल- और मनोरथ- खूब सधा।
मुम्बई की वह बहु-अपेक्षित मुलाकात मेरे जेहन में आज भी खूब बसी है। इतने मित्र दायरे को सँभालते जयशंकरजी ने मुझसे आग्रह किया कि वे मेरे साथ अकेले में कुछ घंटे बिताना चाहेंगे क्योंकि भीड में हलो-हाय या औपचारिक मेल-मिलाप से उन्हें तसल्ली नहीं होती है। हम लोगों ने साथ में एक रेस्टोरेन्ट में खाना खाया। मैं उन्हें मुम्बई की अपनी बेहद पसंदीदा जगह- एशियाटिक लाइब्रेरी- घुमाने ले गया, उसके रीडिंग रूम्स और तहखाने को दिखाया जो पुरानी दुर्लभ किताबों और जर्नल्स से अटे पडे हैं। ऐसी जगहों को देखते हुए जयशंकरजी को देखने का मतलब है किसी बच्चे को अपनी मनचाही साइकिल मिलने पर मन ही मन ट्रिन-ट्रिन करते महसूस करना। जैसा मैंने पहले बताया, नागपुर में जयशंकर अपना अधिकांश दिन वहाँ की एक लाइब्रेरी में ही बिताते हैं इसलिए मेरे साथ एशियाटिक में घूमते हुए वे बडे संतुष्ट और एट होम लगे। लाइब्रेरियाँ अब निर्जन पडी रहती हैं। आमजन के जीवन में पुस्तक के इतने विकल्पों ने अपनी पैठ कर ली है कि यह गए जमाने की बात लगती है कि वे कभी सरगर्मियों से भरी रहती रही होंगी। यह एक अखिल भारतीय प्रवृत्ति है। हर किसी बात में जयशंकर के यहाँ निर्मलजी का सन्दर्भ बेसाख्ता आ ही जाता है।
निर्मलजी अपना ज्यादातर वक्त लाइब्रेरियों में बिताते थे। उनका बहुत सारा पढना और लिखना वहीं होता था। सप्रू हाउस और आई.आई.सी उनके सुपरिचित ठिकाने थे। मेरे कभी दिल्ली आने पर जब वे करोल बाग वाले अपने घर में नहीं मिल पाते थे, तो हम (यानी वे और गगल गिल) मजे से बस पकडकर पहले सप्रू हाउस की लाइब्रेरी में उन्हें खोजते। और वहाँ नहीं मिलते, तो इंडिया इण्टरनेशनल सेंटर में तो होते ही। मोबाइल नहीं होता था न तब अपनी बातों के क्रम में जयशंकर किताबों के प्रति मेरे आकर्षण को देखकर बडी आश्वस्ति में मग्न होते हैं। एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में मेरे किसी किताब को चोरी से निकालकर फोटो-कॉपी कराने के किस्से ने उन्हें बहुत गुदगुदाया। हर्निमन सर्कल के इलाके में घूमते हुए जब मैंने बताया कि कुछ समय पहले यहाँ के स्ट्रेंड बुक सेण्टर पर ताला पड चुका है, तो हम लोग अनायास किसी अदृश्य खिंचाव के चलते उसके बन्द शटर को भी देखने मुड गए; मानो किताबों के कारोबार की विरासत की इस कब्र को संयुक्त सलामी पहुँचा रहे हों। अपनी अद्भुत स्मरण शक्ति का परिचय देते हुए उन्होंने चार-छह किताबों के नाम भी गिनाए जो पहले कभी उन्होंने स्ट्रेंड से ली होंगी। मैंने उन्हें स्ट्रेंड की पूर्व में होती स्टॉक क्लीयेन्स सेल के बारे में बताया जहाँ एक से एक नायाब किताबें किफायती दामों पर मिल जाती थीं। स्ट्रेंड अब वह भी करने लायक नहीं है। किताबों के उस मेले की जगह अब किलो के भाव से बिकने वाली दुर्घटना ने ली है जहाँ पश्चिम के चलताऊ माल को स्थानीय लोगों के बीच डंप किया जाता है। एक भाग में सौ रूपए किलो वाली, दूसरे में दो सौ रूपए वाली। उसमें से भी कुछ अच्छी चीजें हाथ लग ही जाती हैं। 20th Century नाम की कोई दो हजार पृष्ठों की सचित्र, सजिल्द पोथी इसी के चलते ढाई सौ रूपए में मेरे हाथ आ गयी थी। वाकई सहेजने योग्य किताब।
आप बीयर पीना चाहेंगे जयशंकरजी
फोर्ट एरिया में कुछ देर यूँ ही भटकने के बीच राहत- और बैठकर बतियाने- के इरादे से मैंने पूछा।
नहीं, मैं बीयर या शराब नहीं पीता उन्होंने क्षमा सी माँगते हुए कहा।
अरे, निर्मलजी तो पीते थे
मैंने चुटकी ली।
निर्मलजी क्या, मेरे लगभग सभी मित्र पीते हैं। मुझे तो उन्हें पीते हुए देखकर ही इतनी खुशी होती है कि जरूरत ही नहीं लगी
कोई नैतिक आग्रह तो नहीं है ना
खाने या पीने का नैतिकता से क्या रिश्ता... दरअसल मैं छोटे कस्बों में रहा, अधिकांश समय अकेला। वहाँ कभी इस तरह की गुंजाइश ही नहीं थी। हमारा परिवार गरीब था। माँ भी कभी साथ रहने आ जाती थी। वह बहुत प्यार करती थी मुझे - मैं घर में सभी भाइयों से छोटा हूँ, शायद इसलिए भी। उन्हें भी पढने का शौक था। जल्द ही निर्मलजी के कारण पढने-लिखने की इतनी विशाल दुनिया खुल गयी कि दूसरा कुछ सोचने की जरूरत ही नहीं रह गयी
यह व्यक्तित्व की इसी विराटता का संलग्नक है कि उनके दायरे के सभी मित्र सहज रूप आफ मित्र होने लगते हैं। आप किसी दूसरे शहर जा रहे हों, तो वे फट बता देंगे कि वहाँ उनका वह अलां-फलां मित्र रहता है और सामने से उसे फोन भी कर देंगे कि मेरे मित्र तुम्हारे शहर इस तारीख को आ रहे हैं। क्या इनकी यह या वह मदद हो जाएगी वे स्वयं चूंकि उदारता से मित्रों का साथ देते हैं इसलिए भरोसा रहता है कि कुछ न कुछ जरूर हो जाएगा। जैसे पिछले दो सप्ताह से वे रोज अपनी एक बुजुर्ग मित्र को देखने जाते हैं। उस बुजुर्गवार की ऐसी जरूरत है कि रात नौ बजे से पहले उनका कोई जिम्मेदार परिजन वहाँ नहीं आ सकता है। कोई बात नहीं, मैं हूँ ना और जयशंकरजी अपने आप से प्रण-सा लेकर शाम सात से नौ वहीं अस्पताल में बिता रहे हैं। बेनागा। बूढों और स्त्रियों के प्रति उनके भीतर पसरा अतिरिक्त करूणा-भाव का असर उनकी शोकगीत, सहयात्री और राग-विराग समेत कई कहानियों में भी दिखता है। इस मुलाकात से पहले भी वे मुम्बई कई मर्तबा आ चुके थे। लेकिन पिछले दिनों यहाँ आना उनकी एक आण्टी के केन्सर के इलाज के सिलसिले में था। किसी मित्र या परिजन की मदद के लिए वे अपने पढने-लिखने को बेहिचक स्थगित कर देंगे। कथाकार मनोज रूपडा ने एक बार चुटकी लेते हुए बताया था कि जयशंकर को अपने पास बुलाने का एक अचूक तरीका हैः बीमार होकर अस्पताल में पड जाओ। वह सारे काम छोडकर आपकी तीमारदारी करने को हाजिर हो जाएँगे। नया ज्ञानोदय के हालिया अंक में सन 1981 में लिखी डायरी के अंश से ज्ञात होता है कि जनाब बाइस बरस की अपनी उस अधपकी उम्र में दोपहर के वक्त, बैंक के लंच टाइम में अक्सर उस कस्बे के अस्पताल का चक्कर लगाने जाते थे- अनजान मरीजों की पीडा को खुद महसूस करने! ऐसी सघन मनुष्यता की जीती-जागती मूर्ति और कहाँ देखने को मिलेगी
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सोलिच्युड का निकटतम पर्याय हिन्दी में भले एकांत को माना जाए, लेकिन वस्तुतः दोनों से एक-सा भाव-बोध ध्वनित नहीं होता है। जयशंकर की कहानियाँ इंसानी जीवन के बीच इस सोलिच्युड को रेखांकित और सेलिब्रेट करती जाती हैं। वहाँ दुख किसी आततायी की चुभन की तरह न होकर जीवन के एक सहज संगी-साथी की भूमिका की तरह उपस्थित रहता है। वह चयनित भले न हो, मगर उनके चरित्र उससे बिंधे या बँधे नहीं है। वे किसी बडे सुख की आकांक्षा से आहत या हलकान नहीं हैं। उनके चरित्र अपने सर्जक की गुह्यतम जिज्ञासाओं और वरीयताओं के चलते निरंतर उसकी संभावनाओं को तलाशते रहते हैं। इसी के चलते अस्पताल में इलाज कराती एक अधेड स्त्री रवीन्द्रनाथ टेगोर की रचनाओं में निमग्न रहती है, पहाड पर सैर करने गया किरदार रिल्के की कविताओं या चेखव की कहानियों में रमा रहता है, उसे फेलिनी, ब्रेसां, हिचकॉक या बर्गमेन की फिल्मों के साथ करीम खान या किशोरी अमोनकर के संगीत के पुराने रिकार्डों या कन्सर्ट के जरिए उनके आनंद की उठान राहत देती है। उसके मेल-जोल के ठिकाने किसी गिरजे का सुनसान या पुरातन मंदिर के खण्डहर होंगे। नवंबर के नीले आसमान तले धानी रंग की पोशाक पहने कोई साँवली प्रेमिल लडकी अपने अकेलेपन में वैन गौग की चिट्ठियाँ पढ रही होगी। बस, उन्हें बाजार का मोह कहीं लुभाता नहीं दिखता है। उनके आपसी सम्बन्धों में किसी प्रायश्चित का वास तो दिख जाएगा, मगर कुटिलता, जोड-तोड या चालाकी हर्गिज गोचर नहीं होगी। उनके एकांत में स्थितियों, सम्बन्धों या फैसलों की टीस पसरी होती है जो अक्सर अनिर्णीत रहकर कहानी के पाठ में जायके सी घुली रहती है। अमूमन तो वे जीवन की सामान्य स्थितियों से ही सामान्य को अपने ढंग से पुनःसृजित कर रहे होते हैं या फिर असामान्य जीवन-स्थितियों से जीवन के ऐसे तत्वों को पकडने की कोशिश कर रहे होते हैं जो पाठक को अपने और सामान्य होने की प्रतीति देता है। उनका हरेक चरित्र इतर संवेदना का निमित्त है, ना कि अपने आप में स्टेटिक काला-सफेद। उनकी कहानियों के कथानक विराट नहीं होते हैं, लेकिन उनमें पैबस्त पात्रों की उलझनें और एकाकीपन कहानी पूरा होने पर अपने अधूरे और अनसुलझे स्वरूप में पाठक को अपने आंतरिक सत्यों का आस्वाद देकर उसके पैताने पोशीदा हो जाती हैं। यथा-
...सचमुच में हमारा जीवन कितने कम लोगों से बनता है, कितने कम लोगों से प्रभावित होता है ...अजनबी लोगों और अजनबी आवेगों का कोई ठिकाना नहीं, ये कभी भी हमारे लिए अराजक और असहनीय हो सकते हैं ...कभी-कभी मुझे लगता है कि मनुष्य का हर रिश्ता एक-न-एक दिन बासी हो जाने को अभिशप्त रहता है...कस्बाती एकान्त के गहरे आलोक में मुझे पहली बार मनुष्य होने के सुख का बोध हुआ और मैं भाषा, संस्कृति, कला, इतिहास और इसी तरह की मानवीय विरासत का अध्ययन करने लगा... हमारे जीवन में अजनबीपन कुछ इस तरह रहने लगा जैसे वह हमारा सगा हो...अपनी पीडा का पराया हो जाना एक तरह का वरदान ही है ...मृत्यु की लीला के बाद प्रेम की पीडा छोटी और छिछोरी हो जाती है... मैं इतनी-सी बात से थक जाऊँगा, तो सन्तों की निराशाओं को कैसे समझ पाऊँगा... क्या उम्मीद एक तरह की निराशा नहीं है, मन की तसल्ली के लिए एक खिलौना... सुख के बारे में सोचना किसी सैकडों साल पहले सूख चुकी नदी को याद करना है...क्या समय का खो जाना हर समय के आदमी का दुख नहीं रहा है...।
मुझे यह भी दिलचस्प लगा कि जयशंकर जी की कथा-स्थितियों में रचा एकांत, निर्मलजी के एकांत से भी कुछ अलहदा है। निर्मलजी का कथा-एकांत जहाँ व्यक्ति-केन्द्रित और प्रशांत-सा है, जयशंकर के यहाँ वह सम्बन्धों के बीच, नोस्टेल्जिया बनने से पूर्व की स्थितियों में अधिक अवस्थित और गुंजायमान है, गालिबन इसीलिए वह अधिक हरा महसूस होता है।
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सोशल मीडिया ने फादर्स-डे, मदर्स-डे, वेलेन्टाइन-डे की तरह इधर एक दिन मित्रता दिवस यानी फ्रेंडशिप-डे के लिए भी मुकरर्र कर रखा है। कृष्ण-सुदामा से लेकर दोस्ती की एक से एक कहानियाँ और जिन्दगी को लेकर उसकी जरूरत ही नहीं, मायने प्रशस्त करती ऐसी आसमानी गाथाएँ कि एक बारगी गुमान होने लगता है कि वाकई, दोस्ती बडी चीज है। बडी क्या, दोस्ती ही जिन्दगी। दोनों एक-दूसरे के पर्याय। भावुकता का आलम ये कि कुछ ऐसे भूले-भटके लोगों के सन्देश भी हाजिर-नाजिर होने लगते हैं जिनसे बरसों से कोई ताल्लुक नहीं, या केवल अपने फोनों की अदला-बदली की। अन्तरंग दोस्ती या जिसे दोस्ती कहें उसकी सीमा क्या है एक अध्यापक ने कॉलिज के दिनों में मुझे अपने खुले पंजे का संकेत देकर स्वीकारा था कि जीवन में यदि आपको पाँच दोस्त नसीब हो जाए, तो आप वाकई किस्मत वाले हैं। कहाँ पाँच और कहाँ पाँच हजार!
साहित्य की दुनिया में दोस्ती या कहें दोस्तियों, का क्या हाल है इस बारे में कुछ भी कहने से पहले कहने का मन है कि साहित्यकार समाज से अलग प्राणी नहीं होता है। वह लाख अपनी सामानान्तर या अलग दुनिया में विचरता रहे, उसकी दैनंदिनी उसी आबोहवा से जुडी है जिसमें बाकी समाज। इसलिए समाज के स्तर पर जो वृत्तियाँ बनती-बिगडती हैं, साहित्य की दुनिया में भी वे कमोबेश रहती हैं। लेखक के बारे में गोइथे ने इस बात को जरा मरोडकर यूँ कहा है कि लेखक और सामान्य जन में कोई फर्क नहीं होता, सिवाय इसके कि उसमें आमजन के मुकाबले कमियाँ भी ज्यादा होती हैं और खूबियाँ भी। अपने अर्जित निरीक्षणों और अनुभवों को कल्पनाशील ढंग से अपनी अभिव्यक्ति प्रदान करने वाला सर्जक, क्या मनुष्य के स्तर पर उन निजी क्षुद्रताओं, कलुषताओं, वैमन्स्यों से मुक्त रहता है पता नहीं क्यों लेकिन एक लेखक से मनुष्य के रूप में कम से कम समाज के दूसरे लोग यह उम्मीद करते हैं कि वह औरों बेहतर मनुष्य होगा- आखिर दूसरों के अन्तस के भेद जानने-खोलने वाले भेदिये का अन्तस भी तो थर्मामीटर के पारे की तरह संवेदी होता होगा! तभी तो वह अपने पार जाकर दूसरों की खबर-सुध ले सकेगा।
क्या वाकई ऐसा है
इसमें कोई दो राय नहीं कि विश्व साहित्य ही नहीं, हिन्दी में ऐसे अनेक लेखक हैं, जिनकी वृहत्तर समुदाय तक पहुँची मनुष्यता, उनकी रचनात्मकता के समांतर खडी होती हैं- निर्मल वर्मा, वीरेन डंगवाल, भीष्म साहनी और कुँवर नारायण के रचे असाधरण कृतित्व के सामने इनका निजी व्यक्तित्व भी उतना ही मनमोहक रहा है। लेकिन ये अपवाद अधिक जान पडते हैं। अधिसंख्य हिन्दी लेखक दूसरे मनुष्यों की तरह कदाचित द्वंद्वात्मक तत्त्वों के युग्म की पोटली ही होते हैं। अमूमन तो इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए, लेकिन परेशानी सम्भवतः इसलिए होती है कि जहाँ लेखक प्रजाति अपने को आमजन से बेहतर मानने का गुमान भरती है, दिखती है, तो वहीं आमजन भी अपने लेखकों को अपने से कुछ पायदान ऊपर ऐसा आधा मनुष्य, आधा देवता मानते हैं जो एक तरफ उसकी मनुष्यगत कमजोरियों से मुक्त भले न हो, कुछ ऊपर अवश्य होता है। मनुष्य और सर्जक का संघर्ष यदि अन्तर-घर्षण की जटिल और निष्कर्षहीन जंग है जिसके एक छोर पर यह मूलभूत मान्यता काम करती दिखती है कि हर कला-सृजन संवेदनाओं के उत्खनन से जुडा होकर अन्ततः मनुष्य की बेहतरी के लिए ही होता है, इसलिए मनुष्यता के उन्नयन का प्रशस्तकर्ता होने के नाते उसका सर्जक उन उदात्त मूल्यों से लैस होगा ही जिन्हें परोक्ष रूप से वह अपने सृजन के माध्यम से दूसरों के लिए अपने श्रम से पिरोता है। इससे अलग दूसरी मान्यता यह है कि कला-सृजन का अपना नितांत स्वायत्त संसार होता है। कला-सृजन के पलों में व्यक्ति इस आधा मनुष्य, आधा देवता की ओढी/ओढा दी गई अदृश्य कैंचुल से मुक्ति पाकर एक नई-निकोरी दुनिया के वर्क-इन-प्रोग्रेस में शामिल जा रहता है जहाँ इस दुनिया के चले आ रहे नियम-कानूनों के ट्रैफिक को अनिश्चितकाल के लिए कहीं और- और ऐसा- डायवर्ट कर दिया गया होता है कि अब वह उसकी बाध्यताओं से स्वतंत्र-सा रहता है। इस बिगडैल मानस की थाह पाना मुश्किल तो है क्योंकि अपने इस नन्हें निरापद द्वीव में यह तुनकमिजाज फितूरी दूसरों की कम ही सुनता है। बर्दाश्त जरा इसलिए करना पडता है कि झाड-झंखाड, पथरीली जमीन और दलदलों के बीच अक्सर यह अपनी मैट्रो लाइन बिछा डालता है।
क्या यह बेदुनियादार जीव किसी का दोस्त होगा कोई निश्चित जवाब नहीं है, लेकिन फॉकनर के जाने तो नहीं क्योंकि जब यह खुद का दोस्त नहीं होता है, तो दूसरों का क्या होगा। वैसे भी दुनियादारी की दोस्तियों के आधार में कहीं न कहीं स्वार्थ ही होता है जिसे परतों से बिंधे इस असुरक्षा-काल ने और धुँधला कर दिया है।
समकाल के इस पक्ष को जाने भी दें, तो रोज या कभी-कभार मिलते गम्भीर लेखकों के क्या हाल हैं कुछ बरस मुझे युवा रचनाशीलता के सर्वाधिक प्रमाणिक और अपनी तरह के अनूठे अनौपचारिक आयोजन संगमन की गोष्ठियों से जुडने का संयोग मिला। तीन घण्टे के तीन सत्रों में चयनित विषय पर खूब खुलकर बेलौस बहसें होती। सुबह शाम की चाय या भ्रमण के दौरान भी जब-तब उनके छूटे हुए सिरों पर चर्चा के बाद जो मामला ज्यादा अहमियत साधता लगता वह यही कि फलाने ने जो बात कही, उसके निहितार्थ --सीधे शब्दों में स्वार्थ-- क्या थे। धारावाहिक चर्चाओं के बीच टहलते विमर्श में कमोबेश सभी एक दूसरे को--मगर पीठ पीछे-- मिडियॉकर मानते। अवमूल्यित करने के लिए इस्तेमाल इस अंग्रेजी पद पर कुछ समय सोचने के बाद मुझे वह गुत्थी-सी हाथ लगी, जो सम्भवतः अरसे से हिन्दी लेखकों के बीच गहरे दोस्ताना सम्बंधों के अभाव को उद्घाटित कर सकती हैः एक-दूसरे की रचनात्मकता के प्रति बदगुमानी। किसी स्तर पर यदि आपकी रचना किसी अलग अनुभव क्षेत्र से है, तो आप मीडियॉकर हो सकते हैं। पिछले दिनों कृष्ण बलदेव वैद की डायरियों को पढते हुए लगा कि अपने तमाम रचना-वैविध्य -उपन्यास, कहानी, नाटक और अनुवाद और आधी सदी से भी ज्यादा सक्रिय रचनात्मक उपस्थिति- के बावजूद वे दिल्ली के जंगल में कैसे दोस्त-विहीन और अकेलेपन से त्रस्त थे। निर्मल वर्मा के पत्र भी इस वृत्ति की तस्दीक करते हैं। राजेन्द्र यादव ने अपने एक साक्षात्कार में हंस के मंच से समाज-दर्शन- के बीचों-बीच खुद को दोस्तविहीन स्वीकारा था। ये धुँआ-सा कहाँ से उठता है में कथाकार प्रियंवद ने लेखकीय अकेलेपन की पीडा पर बडी निरपेक्षता मार्मिकता से उंगली रखी थी। सोशल मीडिया में हजारों की तादाद बताती मित्र-सूची के रहते, खुदाना-खास्ता बीमार पडने की स्थिति में, अस्पताल में भर्ती होने की सूचना देने भर को आश्वस्ति स्वरूप चार नाम मुश्किल से सूझते हैं। प्रियंवद कहते हैं कि यह कोई नई या अनहोनी बात नहीं है। आखिर गालिब जैसा शायर सैकडों बरस पहले क्यों इसस तलखी से लिख चुका हैर्
रहिए अब ऐसी जगह चलकर
जहाँ कोई न हो
हम सुखन कोई न हो
और हम जबां कोई न हो।
बे-दर-ओ-दीवार का-सा
एक इक घर बनाना चाहिए
कोई हमसाया न हो और पासबां कोई न हो।
पडिये गर बीमार तो
कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाइए तो
नोहख्वां कोई न हो।
इसे विडम्बना ही कहें कि आज लेखक एकांत से नहीं, कोलाहल के बीच अकेलेपन से पीडित है।
मुझे लगता है हम सबको यदि पाँच जयशंकर मिल जाएँ, तो मौसम बदल जाए।
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