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दियारा की कहानी आजी की जुबानी

आशालता सिंह
दो बडी नदियों के बडे भूभाग को दियारा कहा जाता है। इसीलिए गंगा और सरयू के बीच जमीन का बडा भूभाग सिताब दियारा कहलाया। आज मैं जो कहानी कहने जा रही हूँ, वह कहानी आजी (दादी) की जुबानी सुनी है., और कुछ मेरे स्वयं के अनुभवों पर आधारित है...!!
सैकडों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज कुछ राजस्थान, कुछ विजयगढ से पलायन कर गंगा और सरयू-पार यहाँ आकर बस गए। बाईस गाँव मिलकर सिताब दियारा बना। इसी सिताब दियारा के सुफल टोला में मेरी आजी ब्याह कर आई थीं। गोरी चिट्टी सुन्दर नाक नक्श वाली महज आठ साल की बालिका वधू ने सुफल टोला में कदम रखा। उस समय बाबा लगभग 16-17 वर्ष के लम्बे अच्छी कद काठी के, शान्त प्रकृति के पुरुष थे। धीरे-धीरे आजी ने होश सँभाला और बडी हुई। आजी स्वभाव से काफी तेजतर्रार थीं। किसी से ज्यादा पटती नहीं थी, पर पूरे गाँव में उनका दबदबा था। किसी के घर शादी ब्याह हो, तो उनके बिना पूरा नहीं होता था। क्योंकि वे लोकगीत बहुत अच्छा गाती थीं। दियारा में बाढ बहुत आती। हर साल सरयू में भयंकर बाढ आती। कभी-कभी तो पूरा गाँव पानी में डूब जाता। कुछ घर जो ऊँचाई पर बने होते और पक्के होते वे ही बच जाते, बाकी सब सरयू पार करके एक दो महीने वहीं रहते। जब बाढ का पानी वापस जाता, लोग आकर फिर से अपनी जिन्दगी शुरु करते। कमाने के लिए कुछ शहरों में जाते थे, पर हर तीज त्योहार पर अपने गाँव लौट आते थे और बडे उमंग उत्साह के साथ सब मिलकर होली, छठ और दीवाली मनाते। बिहार का सबसे बडा त्योहार छठ है। जो जहाँ भी रहते, छठ पर अपने गाँव पहुँच ही जाते थे। तब गाँव की रौनक और बढ जाती थी।
आजी बताती हैं, हर सौ साल के बाद नदी अपना विकराल रूप धारण करके उस जगह से सबको बेदखल कर देती थी, और अपना रास्ता बदल देती। पर जब वह ब्याह के आई थी, उसके कुछ ही साल बाद हम गाँव छोड कर इस जगह पर बस गए। गाँव की जिंदगी मुश्किल होती ही है और गरीबी भी बढती जाती है। फिर भी लोग हिम्मत नही हारते और बहादुरी से हर समस्याओं को सुलझाते हैं। कुछ अजीब-सी घटनाएँ भी घटती थीं, जिसे गाँव के लोग कभी कहते ईश्वर का प्रकोप है, तो कभी आन गाँव की चुडैल की नजर। और इस तरह उनकी रूढिवादिता और अंधविश्वास बढता जाता है। समय-समय पर लोग उन्हें झाड-फूँक से और पूजा पाठ के द्वारा ठीक करते, किसी तरह उनकी जिंदगी चलती रहती। उनका पेशा खेती-बाडी पशुपालन ही ज्यादा था। बाढ के कारण नदी के द्वारा लाई गई मिट्टी उपजाऊ हो जाती थी। कुछ प्रौढ और वृद्ध लोग ही खेती करते थे, औरतें घर सँभालती थी, और गाँव के नवजवान झरिया, टाटा (पुराने कल कारखानों और कोयले के खाद्यान ) निकल जाते रोजगार की तलाश में।
आजी अक्सर बताती थी कि हमारे समय में आग बहुत लगती थी, क्योंकि ज्यादातर घर घास फूस के होते थे। पक्के और खपरैल घर बहुत कम होते थे। यह केवल गरीबी के कारण ही नहीं था। बाढ और अन्य प्राकृतिक विपदाओं के कारण अधिक था। इसी कारण दियारा के लोगों में एक अस्थायित्वता और जीवन एक खेल है वाली भावना थी। जब गाँव में आग लगती, तो गाँव के सभी बच्चों को नदी किनारे भगा दिया जाता था। हम लोग जब पीछे उलट कर देखते, तो आग की लपटें ऊपर जाते दिखाई देती। इधर गाँव के सभी लोग पानी लेकर कच्चे मकान और खपरैल के घर बुझाने में लगे रहते, आस पडोस के खपरैल घर में आग न लगे इसलिए एक समूह केवल उन पर पानी डालने के लिए होता था। इस तरह दियारा बाढ और आग के चपेट में आता रहता। पहले डकैती भी बहुत होती थी, जो अब धीरे-धीरे कम हो रही है। आजी थी तो दबंग और बहादुर, पर वे किसी चीज का सामना नहीं कर पाती- जैसे साँप, साण्ड,भैसा। इन सबसे उन्हे बहुत डर लगता था।
दियारा में साँपों का भण्डार था। बाढ में बह कर आए हुए साँप कभी-कभी घरों में घुस जाते और लोगों को डस लेते थे। वहाँ कोई अस्पताल तो था नहीं और लोग जानते भी नहीं थे कि साँप काटने पर कोई दवाई होती है। लेकिन ज्यादा से ज्यादा मंत्र के द्वारा साँप के जहर को उतार दिया जाता था। गाँव में कहीं भी साँप काटता, ऐसे में कोई भी मंत्र जानने वाला व्यक्ति, एक आवाज पर सारे काम छोडकर भाग आता था। मैंने भी देखा है कि प्राथमिक चिकित्सा के रूप में साँप काटी हुई जगह को चाकू से छेद कर खून निकाला जाता है और उस जगह पर पोटाश भर दिया जाता है। कटी हुई जगह के ऊपर रस्सी से कसकर बाँध दिया जाता, ताकि जहर ऊपर न जा सके। तब तक मंत्र झाडने वाले पहुँच जाते थे और रोगी को बैठाकर कोई मंत्र उच्चारण करता था, तो कोई रोगी के पीठ पर काँसे या पीतल की थाली चिपका देता था। साँप का जहर जब तक रहता तब तक थाली पीठ पर चिपकी रहती।
शायद इस तरीके से वह धातु जहर को खींचती होगी। यह प्रक्रिया देर तक चलती थी और रोगी को सोने नहीं दिया जाता था। जब साँप का जहर पूरी तरह निकल जाता, तब वह थाली भी गिर जाती थी। रोगी निढाल पड जाता। इसके एवज में मंत्र उच्चारण करने वाले कुछ भी नहीं लेते, चाहे वह खाना-पीना हो या रुपया पैसा हो। यहाँ तक कि उस घर का पानी भी नहीं पीते थे। उनका कहना था कि अगर हम किसी लालचवश मंत्रोच्चार करते हैं, तो मंत्र काम ही नहीं करता है।इसके अतिरिक्त अगर किसी को साँप काट लेने पर मंत्र झाडने वाले को आवाज दे, तो मंत्र जानने वाला अनसुना नहीं कर सकता था, चाहे रात हो या दिन।
दादी के पास साँपों से जुडी सच्ची ( या कई बार उनके स्वयं की रचित ) कहानियों का जखीरा था। एक वाकया आजी अक्सर बताती कि, जब बाढ आयी, तो उसके साथ कई तरह के साँप व अजगर और अन्य जहरीले जन्तु अपनी सुरक्षा के लिए घरों में जगह-जगह घुस गए । एक बार आजी सोयी रही थी, उनकी आँख खुली, तो देखा कि ऊपर एक मोटा साँप धरन से लिपटा हुआ था। कई फीट लम्बा व काफी मोटा साँप था। धरन खपरैल के मकान के बीच की मोटी लकडी जो ताड के पेड या सागौन की मोटी लकडी का बना होता है। वे इतनी डर गयी कि उसके गले से आवाज भी नहीं निकल रही थी। बडे धीमें-धीमे स्वर में बोलीं- रस्सी गोइठा, क्योंकि पुराने समय में कोई साँप को साँप न कह कर रस्सी गोइठा बोला जाता था, उनका तात्पर्य था कि एक मोटा साँप है। आजी के कमरे के सामने से पानी भरने वाली कहारिन जिसे लौंडी कहते थे, गुजर रही थी, तब उसने आजी की आवाज को सुना और बाहर जाकर जोर-जोर से चिल्लाई। गाँव के लोग साँप मारने का हथियार लेकर दौडे और किसी ने दादी को पकडकर हटाया। लोगो ने उस साँप को मार दिया। वह लगभग 10 फीट लम्बा जहरीला साँप था। दियारा के लोग साँप मारने के तीन चार तरह के भाले नुमा हथियार को बाँस के लाठी में लगा कर रखते। कुछ अंकुशाग्र (हुक) नोक नुमा, कुछ छोटे-छोटे त्रिशूलों के गुच्छे और कुछ काँटेदार कंदुक के आकार के। आज भी हर घर में वह औजार सँभाल कर रखा जाता है। जो हर घर के कोने में रखा मिलेगा। इस तरह दादी की कही हुई साँप से सम्बंधित कहानियाँ बहुत थी। जिसमें सबसे प्रसिद्ध कहानी साँप और बिल्ली की लडाई होते हुए देखना इत्यादि हैं...जिसे हम बच्चों ने भी देखा था। दादी की बताई हुई बातों को हम सभी बच्चे चौकन्ने होकर सुना करते थे।
किसी काम से हम सभी बच्चों को दादी के पास छोड कर, माँ कहीं बाहर गयी थीं। मेरी एक बुआ जो काफी बहादुर थी, आजी की देखभाल के लिए आई थीं। अचानक हमने साँप की फुफकार सुनी। बिल्ली का गुर्राना सुना। हम सभी बाहर के ओसारा ( दलान ) में बैठे थे। उन दिनों बिजली नहीं आई थी। हम सभी ने लालटेन की रोशनी में देखा, बाहर की ओर खुलने वाले दरवाजे पर एक बडा-सा करैत लटका हुआ था। जिसका आधा से ज्यादा भाग अन्दर की ओर था। उसका मुँह ओसारे की तरफ लटका था और उसी के ठीक नीचे जमीन पर काली/सफेद बिल्ली उस साँप को देखकर गुर्रा रही थी। दरवाजा लगभग छह फीट ऊँचा था। साँप आधा से ज्यादा अन्दर की ओर लटका हुआ था। दोनों की लडाई चल रही थी। हम सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम थी। किसी के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी।
आजी सबसे ज्यादा डरी हुई थी। किसी की हिम्मत नहीं थी कि बाहर से आवाज देकर किसी को बुलाए। इतने में मेरी बुआ धीरे-धीरे उठ कर , दरवाजे का जो पल्ला खुला हुआ था, बिना आवाज किए, धीरे से दालान में घुस गईं। क्योंकि साँप मारने वाला भाला दालान के कोने में था। वो एक साँप मारने वाला भाला लेकर वापस लौटी। तब तक दोनों की लडाई जारी थी।......कभी साँप फुफकारता, तो कभी बिल्ली अपने पंजे को ऊँचा करके मारने की कोशिश करती। मगर दोनो के ही दाँव फेल हो रहे थे। इसी बीच साँप ने एक दो बार बिल्ली पर हमला किया। तभी बिल्ली ने साँप पर अपने पंजे से उसके मुँह पर वार किया। तब तक बुआ ने भाले को साँप के गले पर घुसा दिया था। बुआ ने हम सबको इशारा किया और बोली कि बुलाओ लोगों को। तब तक वे बडी मजबुती से साँप को भाले से दबाए रहीं और साँप तडपता रहा। पडोस के लोग दौडे आए और साँप को मार कर बाहर की ओर बिछा दिया। दियारा में इन सब गतिविधियों से एक जोश-खरोश बना रहता था। साँप एक दम काला और धब्बे नुमा करैत था। ज्यादा मोटा तो नहीं था। मगर 8-10 फीट लम्बा रहा होगा। मेरे गाँव में मुसहर जाति के लोगों के दो चार घर भी थे। उनमें से किसी ने कहा कि इसमें से आधा किलो साँप का तेल निकलेगा, गाँव के लोगों ने कहा आप इसे ले जाओ। शायद साँप का तेल दवाई बनाने के काम में आता था। कुछ लोग बताते हैं कि जोडों के दर्द, कंधे और गर्दन की जकड और गठिया जैसे असाध्य रोगों के इलाज में कारगर होता है। मुसहर जाती के लोग मोटे और पुराने साँप के चमडी का थैला और झोला भी बनाते हैं। केंचुल छोडते हुए साँप को देखना अशुभ माना जाता है, और कहते हैं की साँप इतने कष्ट से गुजरता है की वो देखने वाले को मार देता है। अक्सर साँप के काटने से मृत व्यक्ति को नदी में बहा दिया जाता है। यहाँ के लोगों का कहना तो यह भी है कि जल की शीतलता से साँप का विष उतरने लगता है और मृतप्राय व्यक्ति कई बार जीवित भी हो जाता है।
इतना सब कुछ होने के बाद लोगों को ध्यान आया कि आखिर वह बिल्ली कहाँ गई? घण्टों बाद आजी के मुंह से आवाज फूटी। उन्होंने कहा कि बिल्ली मकई के खेत में घुसी है। तभी लोगों ने बिल्ली को खोजना शुरू किया। उस समय तो वह नहीं मिली, मगर सूरज निकलने के बाद वह खेत में मरी हुई पाई गई। आजी का कहना था, कि हमारे गाँव में बिल्ली का मरना अशुभ मानते हैं। इसलिए लोगों ने उस बिल्ली को अच्छे से जमीन में दफन कर, उसका अंतिम संस्कार किया। आजी ने कहा वह बिल्ली तो हमारे लिए भगवान बन कर आई थी, इसलिए आजी ने सोने की बिल्ली बनवा कर ब्राह्मण को दान किया और इस तरह वो बिल्ली के प्राणदान से मुक्त हुईं। हमारे लिए हैरानी की बात तो यह थी कि आजी को किसी आदमी, चोर आदि से डर नहीं लगता था। मगर जानवरों से वे बहुत डरती थीं।
एक बार का वाकया आजी बताती हैं, कि खूब गर्म खिचडी बनाकर कमरे में रखी गई थी। बरसात का मौसम था। खिचडी ठण्डी न हो, इसलिए ढक्कन थोडा खुला हुआ था। अचानक ऊपर की धरन से एक गेहूअन साँप फिसला और सीधे गरम खिचडी में गिर गया और मर गया। दादी चिल्लाईं और सारे परिवार के लोग आए। बाबा उस खिचडी को उठाकर ले जाने लगे, ताकि उसे किसी गड्ढे में गाड सकें, मगर आजी चिल्लाने लगी। इतना सारा खाना फेंका जाएगा। बाबा ने कहा इसका क्या होगा? गाय या अन्य पालतू जानवर खाएगा, तो मर जाएगा क्या? आजी ने कहा। वो जरा-सा भी अन्न बर्बाद होते हुए देख नहीं सकती थी। उस दिन हर किसी ने उसे बुरा भला कहा।
बाढ के दिनों में नदी में अनेक तरह के जीव जंतु आ जाते थे। एक बार एक अजगर बहकर आया और एक साधु के बगीचे के पेड में लिपट गया। रात में गाय के बछडे की जैसी आवाज सबको सुनाई देती है और सब अपने घरों से निकल बाहर देखने निकले। चारों तरफ बाढ का पानी था। सब ने देखा कि पेड पर टॉर्च की रोशनी में दो आँखें चमक रही थी, वे आँखें अजगर की थी, और उसके मुँह में गाय का बछडा आधा समा चुका था। वही बछडा धीरे-धीरे रंभा रहा था। यह सब देखकर एक गाँव का लडका अपनी बंदूक से अजगर पर निशाना लगाते हुए दो गोलियाँ चलाई। गोली लगते ही अजगर पानी में गिर गया और छटपटाने लगा। उसके बाद उस बछडे को अधमरी हालत में उसे गाँव वालों ने छुडाया। अजगर की मौत हो गई।
आज हम सोचते हैं कि कैसे प्रकृति के प्रकोप के बीच सभी लोग हँसी-खुशी के साथ रहते थे। दियारा के एक तरफ गंगा थी दूसरी तरफ सरयू। कहते हैं गंगाजी जितनी शांत रहती है, सरयू उतने ही भयंकर रूप से आती थी। गंगा में बाढ के बाद भी लोगों को बहुत तकलीफ नहीं होती थी, लेकिन सरयू में जब भी बाढ आती थी, तो भयंकर तबाही होती। गाँव की फसल बर्बाद हो जाती, लोगों के कच्चे मकान गिर जाते। लोग नाव और स्टीमर के सहारे दूसरी जगह शरण लेते। किसी-किसी साल नदी अपना पाट छोडकर थोडा दूर बहने लगती है, हालाँकि कुछ सालों बाद नदी के भीतर की जमीन ऊपर आ जाती थी और उस जगह जंगल हो जाते थे। लोग उस जंगल की सफाई कर अपनी अपनी जमीन नाप कर ले लेते और फिर से फसल लगाते थे। दीयरे के लोग बहुत ही कर्मठ होते हैं, उनमें, जुझारू जिजीविषा के साथ एक तरह की जीने की असीम लालसा होती है। जिसके कारण वे कठिन से कठिन कार्य सुगमता से कर लेते थे। दियारा के लडके बचपन से ही मेहनत करना जानते। जरूरतों को पूरा करने के लिए, खरीदारी के लिए शहर जाना पडता था, नौ दस की उम्र से यह लडके अपने परिवार की शादी ब्याह की खरीदारी के लिए नाव में बैठकर सरयू पार करके ट्रेन या बस से छपरा या बलिया (पास के शहर) जाते थे। जबकि सरयू का पाट बेहद चौडा होता है। वह वापस शाम तक नाव से नदी पार कर, फिर बालू में मीलों पैदल चलकर अपने घर पहुँचते।
जब नदी की बात हो ही रही है, तो सरयू नदी की डॉल्फिन की कहानी भी सुनी जाए। सरयू के पानी में डॉल्फिन और घडियाल के अलावा अनेक प्रकार की बडी जातियों की मछलियाँ पाई जाती थी। गाँव में जो बडे घर कहलाते थे उनकी जमीन में बडे-बडे गड्ढे खुदे होते थे। ज्यादातर लोग उसी गड्ढे से मिट्टी निकाल कर अपने घर बनाते थे, और वह गड्ढा एक छोटा मोटा तालाब बन जाता। जब सरयू में बाढ आती, तो बाढ के साथ विभिन्न प्रकार की मछलियाँ आ जाती हैं और निकलने के रास्ते न होने से वहीं रह जातीं। उन मछलियों में हिलसा, फरहा, झींगा, गोडरा, मूवी, रोहू, नैनी, कतला, बाम, टेंगरा, बोआरी, जैसी तमाम मछलियाँ पानी में रहती। गड्ढे में रहने वाली मछलियों का गाँव के लोग उपयोग करते। इनमें से कई प्रकार की मछलियाँ तो अब विलुप्त हो गयी हैं। लगे हाथ यह भी बता दूँ कि हर मछली को बनाने और पकाने की विधि अलग-अलग थी। छोटी मछलियों को हलके मसाले और सरसों के तेल के साथ लोहे की कढाई में धीमे आँच पर, बिना हिलाए पकाया जाता।और फिर कडाई के बेंट को पाकर कर उसको पलट दिया जाता। लेकिन हम लोगों को सबसे मजा आता था जब माई (माँ), छोटी-छोटी पुट्टी मछली या फिर झींगा को सरसों के तेल में भूँज कर बडे बडे कसोरा में शाम को बतौर नाश्ते में देती थी।
रिवर डॉलफिन के तो अद्भुत निराले थे। वह अक्सर पानी के साथ आ जाती थी। जब वह पलटती, तो उसका चाँदी की तरह चमकता हुआ उदर, नाव के पेंदे की तरह दिखता था । डॉल्फिन बडी खूबसूरत होती है , उसकी हरकतें मनुष्यों जैसी होती हैं। वे तरह तरह की अठखेलियाँ हमारे सामने करती थीं, मानो हमसे सम्पर्क करना चाहती हों। कहते हैं कि, जिस व्यक्ति की मौत डूबने से होती है , उसकी आत्मा डॉलफिन में प्रवेश कर जाती है। मेरे गाँव में इसे सुईस या सोंस कहा जाता। बडे बुजुर्गों का कहना है कि, अगर सुईस फूँक दे, तो व्यक्ति का शरीर फूल जाता है। हमारे गाँव का एक मल्लाह गाँव में मछली मारने गया, लौटा तो उसकी शरीर फूला हुआ था। कुछ दिन बाद उसकी मौत हो जाती, सबने यही कहा मछली मारने गया था, तो सुईस ने उसे फूँक मार दिया, अब तो यह कितना सच है, कितना झूठ पता नहीं...।
घडियाल भी कभी-कभी दिखाई देते थे। एक बार घडियाल अपने भयंकर रूप में पानी से निकलकर बाहर बालू पर आ गया और आदमियों पर हमला करने लगा। लोग घबरा गए और उसे गोली से मार दिया। दादी की ही जुबानी है।एक बार हम सभी बैठे हुए थे तभी घडियाल की बात चली। सरयू में घडियाल बहुत ज्यादा होते हैं और अक्सर , बाहर आकर बालू पर बैठते हैं। उनमें से एक घडियाल आदमखोर हो गया था और जहाँ कोई जानवर आता है या कोई बच्चा उधर से गुजरता उसको वह खा लेता था। इसलिए उससे काफी लोग डरे रहते थे। एक रोज, घात लगा कर मेरे बडे भाई ने, उस घडियाल को मार डाला। उस समय आजी ने कहा कि मैं तुम लोगों को घडियाल की एक कहानी सुनाती हूँ। उन्होंने जो कहा वह सच में रोंगटे खडे करने लायक था। बात उन दिनों की थी जब वह तुरंत ब्याह कर आई थी और छोटी थी और वह समय अंग्रेजों का था। भारत स्वतंत्र नहीं था। उन्हीं दिनों जिले के एक डिप्टी कलेक्टर का बडा मुआयना था। दियारा में आकर वह घोडे पर चारों तरफ घूमता था। अंग्रेज को देखकर गाँव के लोग भी डर जाते थे। उस समय गंगा का पानी बहुत साफ होता था, मगर सरयू का पानी हमेशा गंदा रहता था।लोगों को उसमें घडियाल दिखते नहीं थे। उस वक्त पानी में एक आदमखोर घडियाल था। कितने जानवरों और बच्चों को वह खा चुका था। यह खबर जब अँगरेज कलेक्टर को मिली तो उसने उस इलाके के डिप्टी कलेक्टर, जिसका बडा मुआयना चल रहा था इसकी जाँच पडताल करने के लिए आदेश दिया तथा यह भी कहा की किसी भी हालत में उस आदमखोर को मारना ही है। आजी बताती थीं कि, चूँकि वह घडियाल बेहद शातिर और धूर्त था, उसको मारना आसान नहीं था। इसलिए डिप्टी कलेक्टर ने गाँव वालों को समझा-बुझाकर बोला कि हम लोगों को चालाकी से उस घडियाल को मारना है। इसके लिए उसने एक बकरी के पेट में काफी मात्रा में कच्चा चूना भर दिया, और उसे नदी किनारे उसी स्थान पर खडा कर दिया गया जहाँ यह आदमखोइर अक्सर घात लगाता था। लग रहा था जैसे कोई जीवित बकरी खडी है। घडियाल को तो आदत पडी हुई थी। वह पानी से निकल कर आया और बकरी को पानी के अंदर खींचते हुए निगल गया। घडियाल के पेट में चूना भर गया और कच्चे चूने के गैस से वह छटपटाता हुआ पानी से बाहर आया और उसकी मौत हो गई। इस तरह से उस अंग्रेज की चालाकी से उस आदमखोर घडियाल का अंत हो गया। इस कहानी को सुनने के बाद हम सब सच में चकरा गए कि कितनी आसानी से उस घडियाल का अंत हुआ। यह सब अंग्रेज के बदौलत ही हो पाया।
आजी बताती हैं, सरयू के कछुए बहुत बडे-बडे होते हैं। मेरे गाँव में मल्लाह और बीन (मछली पकडने के जाल को बुन कर जीविका चलाने वाली एक जाति) जाति के लोग थे, वह लोग कछुए का माँस खाते थे और गाँव के भी बहुत-से लोग उसे खाना पसंद करते थे। क्योंकि कछुए का माँस बहुत विशिष्ट और स्वादिष्ट होने के साथ काफी महँगा भी होता था।
आँखों देखी बात है, एक बार मल्लाहों ने एक बडा सा कछुआ पकडा और जिंदा पकडे कछुए को उल्टा कर के उसका आधा माँस निकाल लिया और फिर जिंदा कछुआ को नदी में फेंक दिया। पूछने पर कहा कि नदी में फेंकने के बाद कछुए पुनः अपने कटे हुए माँस को विकसित कर लेते हैं।
आजी बताती हैं, उनके समय में दियारा में कभी भी लडकियों के साथ छेडछाड नहीं हुई। इस तरह दियारा की लडकियाँ निश्चिंत होकर गाँव में रहती। वह नदी में स्नान करने जाती, वह साग तोडने जाती इत्यादि। पर्दा प्रथा केवल नई बहुओं के लिए ही थी, वह भी साल छह महीने के लिए ही जरूरी होता। माताएँ अपनी बेटियों से कम से कम काम करवाती। गाँव में प्राइमरी स्कूल होते थे। लडकियाँ उन्हीं तक पढ पाती। कुछ बडे घर की लडकियाँ बाहर हॉस्टल में रहकर पढती। कहने को शिक्षा बहुत कम थी, लेकिन समझदारी और बहुत थी।
दादी को पता नहीं क्यों साण्ड और भैंसे से बहुत डर लगता था। बैल और गाय से नहीं डरती थी, बल्कि वह गाय की सेवा करती थी। नदी द्वारा छोडी गई जमीन दियारा से लेकर सरयू नदी तक फैली हुई थी। इसमें गाँव के सभी पट्टेदारों के खेत थे। आपसी समझदारी से उसमें सबका हिस्सा लगता और वह जमीन छह हिस्सों में बाँट दी जाती। उस जमीन में रवि की फसल बहुत अच्छी होती, जैसे चना, मटर, गेहूँ इत्यादि। चने और मटर के पौधों से औरतें साग तोड लाती।
बडे भूभाग में खुले साण्ड और भैंसे दौडते रहते। इन्हें बांधकर नहीं रखा जाता था। अक्सर यह लाल रंग से भडक जाते थे। इसलिए हम बच्चों को लाल रंग के कपडे नहीं पहनाए जाते थे। उस वक्त मैं 10 साल की रही हूँगी। मेरी एक सहेली थी कलावती। जिसके साथ नदी में नहाना, तैरना, बालू में बैठना बहुत अच्छा लगता था। एक दिन हम खेलने के लिए नदी की ओर चले गए। हमने ध्यान नहीं दिया और हमें पता ही नहीं चला कि लाल रंग से जानवर भडकते हैं। कलावती लाल फ्रॉक पहने थी। हम दौडते भागते नदी के किनारे जा रहे थे। इतने में एक साण्ड कहीं से आ गया और कलावती को अपने सींग से कंधे के ऊपर बैठा दिया। मैं भी डर के मारे चिल्ला रही थी और वह भी। जब तक लोग दौडे, तब तक साण्ड ने कलावती को चार-पाँच बार जमीन में पटक दिया। लोग आए साण्ड को भगाया, तब तक कलावती बेहोश हो गई थी।
दो लोग मुझे घर की ओर ले गए। मैं यह बात कभी नहीं भूल पाती। बार-बार सपने में साण्ड आ जाता और कलावती का रोना बहुत याद आता। कलावती गरीब घर की लडकी थी, उसका इलाज डॉक्टर से तो नहीं हो सका, मगर घरेलू इलाज जैसे हल्दी चूना का इलाज चलता रहा। दूध में हल्दी मिलाकर पिलाया जाता। उसको ठीक होने में करीब छह महीने लगे। उस घटना से आजी ज्यादा ही डर गई और बच्चों पर नए सिरे से पाबंदी लग गई। अब हम अकेले बाहर यानी नदी या खेत की ओर नहीं जा सकते थे, इस हादसे के बाद आजी के मन में जानवरों से डर में बढोत्तरी ही होने लगी।
हम लोग अक्सर त्योहारों की छुट्टियों में गाँव आ जाया करते। नदी में नहाने का आकर्षण तो था ही। एक दिन मैं अपनी कुछ सहेलियों के साथ नहाने जा रही थी। कार्तिक का महीना दोपहर का समय था। उस समय नदी का पानी बहुत साफ रहता है। लेकिन हम सबको ठण्ड में नहाने के लिए मना किया जाता। इसलिए हम दोपहर में नदी में नहाने के लिए जा रहे थे। अचानक रोने चिल्लाने की बडे जोर की आवाज आई । साथ ही पानी में कुछ बडी चीज गिरने की भी । हम सब चौंक कर चारों तरफ देखने लगे। दियारा को बलिया से जोडने वाला एक बहुत बडा पुराना पुल था। जिसे अंग्रेजों ने बनवाया था। उस पुल से ट्रेन भी गुजरती थी। आज भी उसे माँझी का पुल कहा जाता है। जी हाँ आपने ठीक समझा, यह वही माँझी का पुल है जिस पर केदारनाथ सिंह जी की खूबसूरत कविता है। हमारे नहाने का घाट माँझी के पुल से काफी दूर था। हम सभी लोग माँझी के पुल की तरफ देखने लगे, आखिर हुआ क्या? अचानक हमने नदी में बहती हुई लाशों को देखा और हम सभी बिना नहाए घर की ओर भाग गए। हमारे पहुँचने के पहले ही गाँव में हडकंप मचा था। लोग कुछ कुछ बोल रहे थे, घबराए थे। हमने उन्हें बताया कि नदी में हमने लाशों को बहते हुए देखा। सब ने कहा हाँ, हाँ, हमें मालूम है। माँझी के पुल से रेलगाडी सवारी के साथ नदी में गिर गई। शायद यह सबसे बडी रेल दुर्घटना में से एक थी। अगले दिन कोई नहाने नहीं गया, क्योंकि लाशों के सडने से बदबू फैल चुकी थी। सरकार के द्वारा भेजे गए लोगों के द्वारा लाशें हटाई जाती रही और उस में बहुत समय लगा। सरयू नदी इतनी गहरी नदी है कि ट्रेन का तो पता नहीं चला कि कहाँ गहरे पानी के अंदर डूब गई। जो लाशें नदी के किनारे लग गई थी, उन्हीं को हटाया जा रहा था बाकी जो पानी में थीं उन्हें पानी के जानवरों जैसे मछली, घडियाल इत्यादि के द्वारा खा ली गई थी। काफी समय तक , यूं कहें तो महीनों तक गाँव में दहशत बनी रही। फिर धीरे-धीरे दियारा के स्वभाव के अनुसार सब भूलकर लोग अपने-अपने कामों में लग गए। मगर वह बचपन की यादें , कभी भुलाई नहीं जा सकी। आज भी आँखों के सामने वही बहती हुई लाशों का दृश्य कौंध जाता है।
दियारा में खेतों का विभाजन और वितरण भी अनोखा होता है। क्योंकि वहाँ किसी का खेत स्थायी नहीं है। जब खेत पानी से निकलता, तो वह जमीन खेती के लायक नहीं रहती। उस पर जंगल बहुत ज्यादा हो जाता। जमीन मूँज और बेंत तथा जंगली घास से भरी रहती थी। जमीन नापने के बाद जिसके हिस्से में जो जमीन होती, वह अपने आसामी को तीन साल के लिए दे देता था। इस बीच वे जंगलों को साफ करते, खेत तैयार करते और उसमें जो भी फसल होती, गर्मियों में चूँकि बालुवाही जमीन होने के कारण खरबूज, ककडी, करेला खीरा और दियर का मशहूर परवल जिसकी सप्लाई बिहार के सभी प्रमुख शहरों में होती थी। तीन साल तक जमीन उन्हीं की होती। तीन साल बाद खेत मालिक का हो जाता था। जो लोग खेती नहीं करते थे, वह अपनी जमीन दूसरों को बटाई पर देते थे। मतलब पैदा हुए अनाज में से आधा हिस्सा खेत के मालिक का होता, बाकी आधा हिस्सा पैदा करने वाले का। अधिया पर भी खेत दिया जाता, इस प्रकार के ताल मेल में उपज को मण्डी में बेचने के पश्चात पैसे का आधा आधा हिसाब होता। जाडों में खेतों में चना मटर व अन्य साग होता, जिसे हम तोडते और नमक के साथ खाते। बाकी गरीब अपने घर साथ ले जाते।
गर्मियों में नदी का पाट बहुत चौडा नहीं होता, वही बालू पर खरबूज तरबूज खीरा ककडी यदि तैयार है, तो, खेत में काम करने वाले लोग हमको खीरा ककडी इत्यादि देते। बाकी तो गाँव में लेकर बेचते थे। लोगों के पास पैसे तो होते नहीं थे, इसलिए अनाज के बदले फल खरीद लेते। इस तरह बेचने वालों को भी अनाज मिल जाता था। कई बार घर के प्रांगण में लगे फलों के पेडों का भी सौदा तुरहा (फल और सब्जी की खेती और धंधा करने वाली जाती) से हो जाता था। आज जब सोचती हूँ, तो याद आता है कि मेरी आजी उनसे बडी मुश्किल से कुछ देकर लेती थी। ये औरतें मल्लाहों की औरतें होती या तुरहिन होती। इस आदान-प्रदान में आजी के साथ खूब नोकझोंक होती।
मेरी आजी को गाय पालने का शौक था। काली गाय उन्हें बहुत पसंद थी। वह अपने हाथों से उसे रोटी और गुड खिलाती थी।वह अपनी गायों को बडे प्यार से खिलाती, मगर वहीं कोई गरीब बच्चा हो और वह ललचाई नजर से उस रोटी को देख रहा हो तो, उसे वे कतई नहीं देती थी। उल्टा उसे भगा देती। यह बात हम सभी भाई बहनों को और माँ को बुरी लगती। दादी की नजर में मनुष्य का कोई मूल्य नहीं था। गाय के अलावा हमारे यहाँ दो बैल भी थे, जो खेत बटाई में नहीं दिए जाते, उनकी खेती उन बैलों से की जाती।इसके लिए हमारे घर में कहार जाति का एक हलवाहा था। जिसका नाम पूर्णमासी था। उसका एक भाई भी था, जिसका नाम अमावस था। पूरे दियरे में यह दो तीन घर कहार के थे। पुरुष खेतों में काम करते या मजदूरी करते थे, उनकी औरतें बडे घरों में पानी भरने का काम करती थी। गाँव में नल की व्यवस्था नहीं थी। किसी के घर में चापाकल लगा होता था। बाकी घरों में खुद कुँए से पानी भरते थे। लेकिन जो मजदूरी दे सकते थे, उनके घरों में कहारिन पानी भर लाती और घर के सारे बर्तन भर देती थी। मजदूरी भी क्या होती थी, जिसके घर में जैसा अनाज होता था, वह दिया जाता था। धान तो होता नहीं था, मोटा अनाज चना मटर , खेसारी ( अरहर से मिलता जुलता मोटा दाल ) , मक्का , कोदो , तिन्नी और सांवा ( यह सभी चावल की तरह घास के बीज हैं जो बिना जाते हुए पैदा होते हैं , संभवतः यही कारण है कि इनका व्रत में सेवन स्वीकार्य है ), दिया जाता था। दियारा में धान नहीं होता था। आरा जिला से दियारा में धान मँगाया जाता और धान की रोपाई और कटाई के समय सारे मजदूर बाहर चले जाते थे और मजदूरी के रूप में चावल या धान लेकर दो महीने बाद वापस आते थे।
यहाँ बात हो रही थी कहारों की। कहारों को हम अछूत नहीं मानते थे। यह शादी ब्याह में डोली भी उठाते हैं। पूर्णमासी अपने नाम के विपरीत लम्बा चौडा हट्टा कट्टा और बिल्कुल काले रंग का था। दोनों बैलों की सानी पानी वही करता था। बाहर की साफ-सफाई उसी के जिम्मे थी। सुबह-सुबह वह आ जाता। मेरी माँ की आदत चाय पीने की थी। मेरी माँ उसके लिए भी चाय बनाती थी, यह भी आजी को बिल्कुल पसंद नहीं था। उसको कटोरी में चाय दी जाती। उसको माँझ कर, रख कर, दोनों बैलों को लेकर खेत की ओर चल पडता। उसके चमकते हुए आबनूसी बदन पर कोई कपडा नहीं होता था। केवल एक धोती.., चाहे गर्मी हो या जाडा।
खेत का काम करके दोपहर में लौटता। बैलों को सानी-पानी देकर, खुद हाथ पैर धो कर खाने बैठ जाता। माँ उसे खाना देती। एक ऊँचे धार वाली काँसे की थाली में ढेर सारा उसिना भात (धान को उबालने के बाद कूट कर निकाला गया चावल), किसी किसी दिन सत्तू या मकई का भात होता उसके साथ कभी थोडी दाल या सब्जी। दो चार हरी मिर्च, नमक और एक आध प्याज के टुकडे उसकी थाली में होते थे। उसका खाना देख कर मैं अक्सर पूछती पूर्णमासी काका आप इतना भात खाते हो। तो वह हँस के जवाब देता, बबी आफ खाने में खूब सारा दाल होता है, खूब सब्जी होती है, थोडा-सा चावल रहता है और तुम्हारा छोटा-सा पेट होता है, तो पेट भर जाता है। लेकिन हम मेहनत करते हैं और और हमारा पेट काफी बडा है, हम एक ही वक्त खाते हैं। इसलिए ज्यादा खाते हैं कि बार-बार भूख न लगे। वो अपना बर्तन माँजता और घर चला जाता। इस तरह दियरे में अमीर गरीब सबकी जिंदगी अपने ढंग से चलती रहती।
हमारे गाँव की दक्षिण दिशा में एक शिव मंदिर है और पश्चिम में छोटा-सा कालीजी का मंदिर। बहुत ज्यादा मंदिरों का तामझाम नहीं है। साधु भी बहुत ज्यादा नहीं है। एक साधु बस्ती में दूर कुटिया बनाकर नदी किनारे रहते थे, कभी-कभी गाँव से कुछ लेकर जाते या लोग उनकी कुटिया में खाने का सामान दे आते। उनके कुछ चेले उनके साथ रहते। पूजा-पाठ के अतिरिक्त उनका एक बगीचा भी था, जिसमें तरह तरह के फल लगे होते। दोनों साधुओं को साधु बाबा ही कहा जाता था। पहले वाले को मठिया के साधु बाबा, दूसरे को केवल साधू बाबा। शिव मंदिर को लेकर कई तरह की किवदंतियाँ मशहूर थीं। कहा नहीं जा सकता कि इसमें कितनी सच्चाई थी।
मगर आजी पूरे विश्वास के साथ उन घटनाओं को बताती। कैसे शिवजी हमारे गाँव में आए। लगभग 80 साल पहले जहाँ हम लोग रहते थे, वहाँ एक छोटा-सा मंदिर था, जब सबसे बडी बाढ आयी, तब उसमें हम सभी का घर और शिव मंदिर बह गया।
आजी बताती हैं कि हम सभी जब इस जगह पर आकर दुबारा बसे, तो शिवजी नहीं मिले। हम सभी बच्चे मह फाड कर आजी की कहानी सुनते रहे। उसने बताया कि उनके ससुर के सपने में शिवजी आए और कहने लगे मैं बहुत कष्ट में हूँ, मुझे यहाँ से ले जाओ। मेरे ऊपर मूँज को पीटा जाता है। इससे मुझे बहुत तकलीफ होती है। शिवजी ने यह भी बताया है कि वह कहाँ हैं? उनकी आँख खुली तो उन्होंने अपने सपने की बात लोगों को बताई और दो लोगों के साथ उस जगह पर पहुँचे। वह एक मल्लाह और बीनों का मोहल्ला था। उन्होंने जाकर मल्लाह से कहा आफ पास कोई पत्थर है, जिसमें आप मूँज पीटते हैं। मल्लाह ने बताया कि एक बार मैंने बहुत बडी मछली पकडी थी। उसके पेट में से एक पत्थर निकला था। वह पत्थर हमारे लिए सिरदर्द है। यदि हम इसे बटखरा बनाते हैं, तो कभी ज्यादा तो कभी कम होने लगता है। इसलिए हम इस पर मूँज पीटते हैं। यह सुनकर आजी के ससुरजी ने कहा कि यह पत्थर आप हमें दे दीजिए। मल्लाह को उस पत्थर को देने में कोई परेशानी नहीं हुई। वह बडे खुश होकर उस पत्थर को बाबूजी के सुपुर्द कर दिया। ससुरजी बुजुर्ग आदमी थे, लेकिन उस पत्थर को वे खुद ही अपने कंधे पर बिठाकर अपने गाँव लेकर आए। गाँव में आते ही सब ने गंगाजल से उस पत्थर की धुलाई की। पत्थर को गौर से देखा गया कि एक तरफ का पत्थर थोडा गहरा हो गया है। सब ने मिलकर उसकी पूजा-अर्चना की और दूसरे दिन उसकी स्थापना भी कर दी गई।
लोगों ने चंदा उगाही कर, एक छोटा मंदिर बनवाया। जो लोग गाँव से बाहर कमाने के लिए गए थे, उन्होंने काफी पैसा दान दिया और मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। आज वह मंदिर काफी बडा हो गया है। मंदिर के प्रति लोगों की आस्था पहले से ही अधिक थी, जो समय के साथ बढती ही जा रही है।
मेरी आजी मंदिर के महत्त्व के विषय में बताती है कि, गाँव में कोई संकट आना चाहे, वह आग हो, बाढ आने वाली हो या डकैती होने वाली हो, मंदिर का घण्टा अपने आप बजने लगता था। कितनी भी रात हो। लोग देखते थे कि मंदिर का दरवाजा बंद है, मगर घण्टा अपने आप तेजी से बज रहा है। बडे होने के बाद मुझे इस विषय में कुछ समझ में नहीं आया। मेरे पिता ने भी मुझसे कहा, इसमें सच्चाई तो है।
वह बताते हैं कि 1948 में भयंकर बाढ आई थी। जिसमें हमारा सब कुछ डूब गया था और हम भी विस्थापित हो गए थे। ऐसे संकट के समय में मंदिर में रोज घण्टी बजती रहती। इसी तरह प्लेग और हैजा फैला। जिसमें हजारों लोगों की मौत हो गई। तब लगता था कि दियरे का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। लेकिन फिर से दियारा पूरी मजबूती के साथ खडा हो जाता है।
हमारे गाँव के पश्चिम के अंतिम छोर पर काली का मंदिर है। ऐसा हर गाँव के अंतिम छोर पर काली जी का मंदिर होता है। उस छोटे से मंदिर के भीतर एक बडा गोल पत्थर है, जिसे भैरवजी कहा जाता है। उसके बाद नौ छोटे आकार के गोल पत्थर रखे हुए हैं। उन नौ पत्थरों पर पीला सिंदूर लगा होता है। मुख्य मंदिर ऊँचाई पर है। कुछ सीढियाँ हैं, जिसमें लोग चल कर जाते हैं। मंदिर के अगल-बगल एक या दो नीम के पेड जरूर लगे होते हैं। हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा को कालीजी की वार्षिक पूजा होती और वह पूजा जेठ की तपती दोपहरी में होती। इस पूजा में घर से लोग पकवान खाते हैं, भीगे चने, गुड, गुलगुले आदि चढता है। पूजा शुरू होने के पहले गाँव की औरतें मैया का गीत गाती थीं,निमिया के डार मैया.....
रोट और बखीर ( गन्ने के रस में फ चावल ) काली जी को चढाया जाता है। मेरी आजी प्रसाद के उस भीगे चने के मुँह के टेढे भाग को तोड कर इतना स्वादिष्ट सब्जी बनाती, उसका स्वाद आज भी मुझे याद है। इसके अलावा बलि चढाई जाती थी। बलि में बकरे की बलि दी जाती थी। तीतर, मुर्गा आदि की भी बलि दी जाती थी। जो बलि में विश्वास नहीं करते, वह नारियल चढाते। बलि के बाद बकरे का माँस हर घर में बाँटा जाता। बलि के बकरे के सालन में भी अद्भुत स्वाद होता।
बचपन की सारी यादें ज्यों का त्यों दिमाग में हैं। शुरू में तो गाँव के अंदर आने का कोई रास्ता नहीं था, सिवाय नाव के। हम ट्रेन से रीविल गंज स्टेशन से उतर कर सरयू घाट तक आते। वहाँ नाव से हम अपने गाँव नाव से पार करते। जाडे और बरसात में नदी का पाट बहुत चौडा होता। इतनी गर्मी आते-आते नदी का पाट सिकुड कर छोटा हो जाता था। तब हमें नाव से नदी पार करने में कम समय लगता, लेकिन नाव से उतरकर मीलों बालू पर चलना पडता। ऐसा लगता था, जैसे हम रेगिस्तान में हैं।
जब चंद्रशेखरजी प्रधानमंत्री बने। तब उन्होंने बाढ से बचने के लिए बाँध बनवाया। बाँध के कारण लोगों का आना जाना काफी सुगम हो गया और बाढ का पानी भी गाँव में कम घुसने लगा। उस बाँध की वजह से हम अपने दरवाजे तक जीप, बस या थ्री व्हीलर से पहुँच जाते। चंद्रशेखरजी ने दियारा के लिए बहुत काम किया। बाढ आने पर आठ गाँव निकाल कर अठगाँवा बना।बाढ के दिनों में वे , आठ गाँव के हर घर को, चाहे अमीर हो या गरीब, एक बोरा चावल, आटा, चूडा, आलू देते थे।
चंद्रशेखरजी थे तो बलिया के, लेकिन अपने गुरु जयप्रकाश नारायण, जो दियारा में लाला टोला के थे, वहाँ उन्होंने बिजली तक को पहुँचाया। आज भी 11 फरवरी को दियारा की रौनक बढ जाती है। क्योंकि वहाँ एक सर्वोदय मेला लगता है। उस मेले में देश-विदेश से लोग आते हैं। जयप्रकाश नारायण के नाम पर लाला टोला को जयप्रकाश नगर कर दिया। जयप्रकाश नारायण के अलावा हजारीप्रसाद द्विवेदी भी दोआबा के थे, दोआबा दो नदियों के बीच की जमीन को कहते हैं। वह जमीन भी दीयरे में मिल जाती है। केदारनाथ सिंहजी भी चंदौली के थे, जो दियारा के नजदीक था। इस तरह दियारा के लोग, बडे-बडे अफसर हो चुके हैं। खासकर फौज में। हर गरीब घर का एक जवान फौज में सैनिक होता है, जिससे उसके घर की स्थिति सुधर जाती है। बाद में मेरे बडे भाई फौज में अफसर बने, तो उन्होंने मेरे गाँव के लगभग हर घर के एक व्यक्ति को फौज में भर्ती करवाया।
पूरे दियारा में दो या चार मुसलमान परिवार भी थे। बहुत ही गरीब परिवार थे। उनका कोई सदस्य बाहर नौकरी नहीं करता था। उनकी आजीविका थोडी-बहुत खेती से जो बटाई पर थी, उनका मुख्य पेशा कसाई का था। जब भी दियारा में बाजार लगता, उस दिन में बकरा कटता और जिसको जरूरत होती वह बकरे का सालन खरीदता था। आमतौर पर बकरियों को अपने घरों में पालते थे। जब भी साप्ताहिक बाजार लगता, तब उस दिन वह लोगों की माँग को देखते हुए, बकरा काटते। उनके दो मुख्य त्योहार होते थे। जिन्हें वह आपस में मनाते थे। जब ईद आती थी, तब वह आपस में सिवैया बाँटते और बकरीद के दिन कुर्बानी के बकरे का मांस। क्योंकि उन्हें डर रहता था, शायद उनके घर की सामग्री हिंदू लोग नहीं खाएँगे। लेकिन मेरी आजी और अन्य बडे घर की औरतें रोजा में उनके घर फल या कुछ अनाज भेजा करती थी। मोहर्रम का ताजिया उठता तो वे उस ताजिये को सभी हिंदू घरों के सामने रखते थे। खासकर मेरे घर अवश्य। तब मेरी आजी और अन्य औरतें उसी ताजिए की पूजा करती थीं, दान, अनाज और अन्य चीजें रखती थीं।
उस समय हिंदू परिवारों में चाहे वे राजपूत हों, ब्राह्मण हों, सब में हर धर्म के प्रति श्रद्धा होती। कहने को दियारा में दो चार मुस्लिम परिवार थे, लेकिन वहाँ कोई मस्जिद नहीं था, कोई ईसाई का घर भी नहीं होने से गिरजाघर भी नहीं था। मुस्लिम औरतों के मन में भी हिंदू धर्म के प्रति बहुत आस्था थी। वह छठ जैसे पर्व को उपवास और अर्घ्य देती थी। जबकि वह जमाना छुआछूत से भरा था, लेकिन दियरे में एक खूबी थी कि, अगर कोई तथाकथित अछूत भी है, तो उसके हाथ से खाना या पानी बेशक नहीं पीते थे, मगर कभी उसका अपमान नहीं करते थे, दण्ड नहीं देते थे, जबकि उसी जमाने में अछूतों पर जो अत्याचार होते थे, उन पर ढेर सारी कहानियाँ लिखीं गईं हैं, जैसे ठाकुर का कुँआ...! आज की तरह उस समय हिंदू मुस्लिम के बीच नफरत नहीं थी। जबकि ज्यादातर लोग अशिक्षित और अंधविश्वासी थे।
मेरी आजी और माँ छठ का प्रसाद सबको बांटती, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान। बचपन से आज तक मैंने दियारा में दंगा होते नहीं देखा था,आजी का कहना था, जब पाकिस्तान बना, तब भी यहाँ हिंदू मुसलमानों का दंगा नहीं हुआ। मुसलमानों के जो थोडे-से घर थे, जो पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे। यहीं रहना चाहते थे। हम सभी लोग उनके लिए रक्षा कवच बने हुए थे। किसी को किसी तरह की तकलीफ नहीं होने दी। वही परिवार आज तक दियारा में हैं।
आजी की उम्र धीरे-धीरे बढ रही थी। वह एक तरह से कमजोर हो रही थी।ज्यादा घूम नहीं पाती। लाठी लेकर चलती थी और उसी में अपना उनका जो तरीका था लोगों को अपने बस में करने का वह करती रहती थी। शाम के समय उनके पाँव में काफी दर्द होता था, तब वह अपनी पोती या अपनी बेटी से अपने पैर दबवाती थी। दीदी जब पाँव दबाती थी तो घण्टों लग जाते थे। उस समय दादी कहती कि देखो तुम लोगों की शादी हो जाएगी, तब तुम ससुराल में जाओगी और सास के पाँव दबाना पडेगा। तब उस समय तुम लोगों को जब तक कि सास ना बोले तब तक उनका पैर को दबाना मत छोडना। उस समय मेरी दीदी कहती कि अब तू त कह कि अब छोड दे पाँव दबा वल हो गईल अब हम जा तानी . इस तरह से दीदी अपना पीछा छुडा कर भाग जाती थी और इसी तरह से उनकी कहानियाँ बुढापे तक चलती रहती। लेकिन अब वह काफी वृद्ध हो चुकी थी, उनमें अब वह शक्ति नहीं थी,आजी अब बिस्तर पकड चुकी थी। उन्हें अपने बेटे को देखने की लालसा हमेशा बनी रहती थी। मुझे याद है कि बुढापे में आजी झुक गई थी और एक डण्डे के सहारे चलती थी। उनके स्वभाव में काफी परिवर्तन भी आ गया था। मेरे माता-पिता के अलावा अन्य लोग भी उनकी देखभाल करते थे। सन अडतालिस की बाढ के बाद गाँव में हैजा फैला, दवा थी नहीं। मेरी आजी उसी की चपेट में आगई।
अंतिम समय में आजी की आँखें अपने बेटे को ढूँढ रही थी। कहते हैं मरने के आधा घण्टा पहले, मेरे पिताजी आ गए और आजी के चेहरे पर मुस्कान-सी आ गई। माँ बताती है कि आजी के चेहरे पर एक चमक आ गई थी। धीरे-धीरे उसने अपनी आँखें सदैव के लिए बंद कर ली थी। जो फिर कभी नहीं खुली। आजी के जाने के बाद हम सब दुखी थे।
आजी के कटु स्वभाव होने के बावजूद भी उनके जाने पर सारा गाँव दुखी था।अपने ऐसे स्वभाव के बाद भी वो लोगों की मदद करतीं। हर पर्व त्यौहार में आजी रौनक लाती थी। बच्चों को दुख था कि,अब उन्हें कहानियाँ कौन सुनाएगा? लडकियों को दुख था, उन्हें शादी ब्याह के गाने, बारहमासा, जतसार कौन सिखाएगा? खैर जो भी हो, आजी के नहीं होने से भी क्या? दियारा तो है। आजी के साथ आजी की जुबानी,दियारा की कहानी, खत्म होती है। आधुनिक दियारा में कितना बदलाव आया, यह तो बताने की जिम्मेदारी हमारी है, वह फिर कभी... अभी बस इतना ही....!!!
सम्पर्क - द्वारा वर्तुल सिंह
सहायक महानिरीक्षक
केऔसुब पूर्वी खण्ड मुख्यालय,
केऔसुब परिसर (त्रिल आश्रम के निकट)
पोस्ट धु*र्वा, राँची (झारखण्ड) पिन-८३४००३
मो. 9479666969