fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

-बाकी वार्ता फिर कभी

अम्बर पाण्डेय
पिताजी और गोबरगौरी के देहान्त के आसपास जब बम्बई में बारिस्टर गाँधी की सभा बैठी थी तब बम्बई में रहते उनसे मेरी भेंट न हो सकी इसका पश्चाताप सदैव मुझे होता था इस वास्ते सुन चुंग शान को और ज्यादा जानने का अवसर मैं हाथ से न जाने देना चाहता था क्योंकि सुन चुंग शान में भी मुझे बारिस्टर गाँधी जैसे ही गुण नजर आते थे, वे भी चीन में रिपब्लिक राज लाने को मरने-मारने पर उतारू थे और अपना खासगी जीवन भी इस वास्ते दाँव पर निधडक लगा रहे थे। हॉन्गकॉन्ग में रहने का मंसूबा यदि मैं पाल रहा था तो इसमें सुन चुंग शान की अराजक जमात में चाकरी पाना सबसे आवश्यक था, खाने-खर्चे पेटे रोकड का बंदोबस्त तो आखीर कहीं से करना ही था फिर सुन चुंग शान के अराजक दस्ते में चाकरी बजाने का मतलब था पगार जास्ती और काम के घण्टे कम, हालाँके मारामारी से मैं ब्राह्मण जीव दूरी वापरना ही मुनासिब जानता था, किन्तु मांसाहार और समुद्र की मुसाफिरी ने मुझे इतना जोखम उठाने वास्ते तैयार तो कर ही दिया था।
जहाज कम्पनियों पर नजर रखूँ और पता लगाता रहूँ कि गोलाबारूद की आवक-जावक कहाँ से किधर है और ऊपर खबर करूँ ताकि उन जहाजों से ठगोरी पाडकर गोलाबारूद हासिल किया जाए, ठगोरी मुमकिन न होने पर लूटमारी भी की जाती थी ऐसा हुआंग महाराज ने बताया था किन्तु मैं किसी भी मोल पर हॉन्गकॉन्ग में टिकना चाहता था और इसके पीछे कुवा से मेरा गाढापन वजह था, उसके प्रेम ने मेरी बुद्धि का सत्यानाश कर दिया था। इसके साथ ही हथियार-बारूद गोदाम की कारकुनी और चौकीदारी का हिसाब रखना भी मेरे जिम्मे था, गुजराती होने के नाते हॉन्गकॉन्ग में चीन के सरकारी जासूसों को मुझ पर संदेह करने का कोई हेतु न था और इसी वजह से मुझे मुँहमाँगी पगार प्राप्त होती थी। डाक्यॉर्ड पर जहाजी तख्तों से बनी विशाल इमारत के पिछवाडे बने मकान में मुझे रहवास खातिर स्थान भी मिल गया था, कुवा के अनुसार बारूद गोदाम के पिछवाडे रहने से मुझे प्राण का अन्देशा था, किन्तु दूसरा ठिकाना लेकर रहता तो भाडे में मोटी रकम फना होती और बम्बई भेजने को दमडी तलक न बचती।
रहवास के पिछवाडे फल मंडी और दायीं तरफ मच्छी बाजार था, चार कदम चलो तो लोहा मार्केट और उसके आगे शीशे और आईने का बाजार था जिसके कारण रात-दिन गुल्ला मचा रहता था, शान्ति मुहाल थी। नौकरानी और फुदु के घर में चौबीसों घण्टे गुजारने के कारण नर्मदाप्रसादजी के गृह में कुवा से मिलना मुश्किल था और उसे मेरे ठिकाने आना पडता था जो अब रोजाना की परिपाटी बन चुकी थी। जाहिर बात है आप यह बात सुनकर मुझे पापात्मा जाँचेंगे, किन्तु इतना दुख उठाने के पीछे क्या चैन के कुछ घण्टे तलक पर मेरा हक न था? कादों-काँटें में चल चलकर जिसके तलवे जख्मी हो उसे क्या लोटा भर गरम पानी की हकदारी नहीं? इस विषय में मैंने अत्यन्त तीव्र मगजमारी करके यह निकाल पाया था कि यदि कुवा के प्रति मेरे गाढेपन में दुनिया चरित्र की खराबी देखती है, तो इसके पीछे उसकी अपनी टकटकी की खामी है, मैंने संसार में क्या क्या दुःख उठाए, क्या किया और कैसे जिया जाने बिना अच्छे-बुरे की परख करना दुनिया का दोष है। अपना आत्मवृत्तान्त लिखने के पीछे मेरी गरज दुखडा रोने की न होकर यही स्थापित करना है कि मानुष को हम कितना कमती जाने बिना जाँचते हैं, जाहिर है ऐसी जाँच दोषपूर्ण है और जगत की अधिकतर गैरसमझी की वजह है। इसका मुझे ज्ञान था कि नर्मदाप्रसादजी को जिस रोज पता पडता कि उनकी औरत पर मेरी आसक्ति है वह मेरा खून तलक करने की सोचेंगे, किन्तु मैं लाचारी अनुभव करता था और हृदय के किसी कोने में मुझे यह तसल्ली भी थी कि जापानी नारी के पीछे नातेदार का खून करने की हिम्मत सम्भवतः नर्मदाप्रसादजी न करेंगे, भले कुमुद का देहान्त हो गया था किन्तु आखीर थी, तो वह अब भी नर्मदाप्रसादजी की बैकुण्ठवासिनी धर्मपत्नी।
बाँस का पाँच मंजिला टिफिन लेकर साढे ग्यारह बजे वेलिंगटन स्ट्रीट से कुवा डाक्यॉर्ड आने वास्ते रिक्शा पकडती थी, अभी-अभी नहाकर नवा बदन इतना सुगन्धित रहता था कि जिस वीथी से रिक्शा गुजरता वह लेन महकने लगती थी, काँच बाजार में धडाका मच जाता, कुवा को देखने की चटपटी में हम्माल एक-दूसरे से टकरा जाते और सेठों को दर्पण टूटने की वजह से घाटा उठाना पडता, हम्माल माहवार घाटे की रोकड अपनी पगार से कटवाते और उनके बच्चे भूखों मरते थे।
रिक्शा खींचनेवाला हालाँकि तिरपाल की आड करता था, किन्तु तब भी कुवा बाँस के अपने छाते के बिना चलती न थी और मुख के आगे धूप से बचने वास्ते छाता लगाए रखती थी, कई शोहदे और आवारा रिक्शे के पीछे पीछे दौडते थे कि कुवा का दर्शन कभी नसीब हो जाए और इस अफरातफरी में बहुत गोलमाल हो जाता, कइयों की जेबें कट जाती, कई गिरकर हाथ पैर तुडवा लेते, तो कई लम्पटों का ठेलों से टकरा सिर फूट जाता था। कुवा की परिपाटी इस सबसे बेखबर बैठने की थी, वह अपने आसपास घटनेवाले तमाशे पर किंचित तवज्जो न करके रिक्शा में बैठी मेरे बारे में विचार करती रहती थी। रोजाना नवे स्वाँग-चमत्कार घटित होते थे, फलों के टोकरे उलटने या दूध-दधि की बहँगी में लटकी मटकियाँ फूटने पर भारी भगदड मच जाती, फलवाला फल बटोरने वास्ते दूसरों को डण्डे से दूर झटकता, किन्तु गुरबा की सन्तानें फल चुराने वास्ते दौडी आती थी जबकि दूध दधि फैलने पर बिल्लियाँ हमला कर देती, हाँगकाँग में वैसे बिल्लियाँ दूध दधि के पीछे उतनी बावली न थी जैसी बम्बई में, यहाँ जगह-जगह मटन-मच्छी बिकती थी सो बिल्लियों को दूध पीने की उतनी गरज न थी। कई दफा बेचारे डंपलिंग बेचनेवालों की टोकरियाँ उलट जाती और दिनभर की कमाई मारी जाती। सुन चुंग-शान जमात इकट्ठा करके जो अंधाधुंध मचाने की योजना करते थे वह कारनामा कुवा रिक्शे में हाथ पर हाथ धरकर बैठी बैठी कर रही थी।
टिफिन, बटुआ, छाता और अपना किमोनो सम्भालती कुवा गोदाम के पीछे एकटे लगे कचनार के पेड के नीचे रिक्शा से जब उतरती, तो उसकी रिक्शावाले को भाडा भुगतान की आवाज सुनकर मैं फौरन खिडकी पर जाकर खडा हो जाता, मच्छी बाजार के कोलाहल के मारे दो घडी का चैन दिन रहते मिलना मुश्किल रहता था ऊपर से खिडकियों के पल्लों पर शीशे जडने के बजाय बाँस और जापानी कागज चिपकाए गए थे जिनसे बाहर की आवाज तो अंदर आती ही थी, बल्कि अंदर का भी जरा खुटका बाहर जाता था।
पहुँचने तलक कुवा पसीने से भर जाती थी, गीला होकर रेशम शरीर से चिपक जाता और माथे से बूँदें छलकने लगती थी, इससे कुवा और रूपमती नजर आती थी। कई दिन बेसबरेपन की वजह से भोजन से पूर्व ही मैं कुवा को कस लेता, वह देर तलक कसमसाने के पश्चात् ढीली पड जाती थी, कई दफा पहले मध्याह्न भोजन होता था। जापानी होने के कारण कुवा प्रत्येक काम रीतियुक्त करने की हामी थी, इस वास्ते पहले वह पटिया धोती और उसपर अगरबत्ती सुलगाती पीछे संग लाया पाँच माले का टिफिन खोलती। व्यंजन गरम करने को घासलेट का स्टोव चेतन करती। धूला, पसीने और कीमती अत्तर के मारे मैं कामुक हो जाता था और भोजन करने में मेरी किंचित रूचि न जागती थी।
इतने प्रयत्न पीछे तुम्हारे वास्ते खुराक पकाती हूँ, पर तुम हडबडी में खाते हो ताकि थाली से फारिग होकर बिस्तरे की हरकत करो। कुवा अंग्रेजी और गुजराती भाषा, चार शब्द कंटोनी और दस जापानी के शब्द जोडकर अटपटी बानी में वार्ता करती थी जिसे समझने में जोर भले लगाना पडे, किन्तु अर्थ बरोबर प्राप्त हो जाता था। अब तलक मुने (?) और डांकों (??) यह दो निर्लज्ज जापानी शब्द मैं सीख सका था, मुने (?) मतलब स्तन और डांकों (??) माने पुरुष की इंद्री, मैथुन के बखत कुवा इन्हीं दो शब्दों का अनेक बार उच्चारण करती थी बाकी बेला भाँति-भाँति के शब्दों के घोल-मेल से काम चलता था। दोपहर के बखत कोई मानुष हमारी विश्रांति में खलल न करे ऐसी मेरी कडी ताकीद थी और कोई जन इस बखत मेरे कमरे में आने की जुर्रत न करता था, बाकी सायंकाल से दोपहर तलक काम करने में मैं कोताही न वापरता था, हालाँकि इतना काम था भी नहीं। हुआंग महाराज और रामदीन भी गोदाम में ही रहते थे इस कारण खाद्य-खुराक और चाय-पानी की कोई तकलीफ नहीं थी।
बिस्तरे पर तुम्हारे संग बखत गुजारूँ उसके पश्चात् भूख बहुत लगती है इस मारे अभी अधिक नहीं खा रहा। मैं लाड से कुवा को मनाने का यत्न करता और उसके कपोल पर चुम्बन टाँकता, किन्तु वह हाथ रगडकर मेरा चुम्बन मिटाते हुए कहती, खबरदार जो तेल की वस्तु खाकर मेरे गाल पर चुम्मी टाँकी, फुंसी निकलते देर न लगेगी, कुवा के इस व्यवहार से मुझे चोट लगती मैं चुपचाप कटोरे में आँख दिए भोजन करने लगता, प्रियतम के चुम्बन के ऊपर जिसे फुंसी उठने का भय हो वह मुझसे प्रीति रखती भी थी या नहीं?
कुवा को अपनी चूक का तुरन्त अनुभव होता और आगे बढकर वह ही मेरे होंठ चूमने लगती, बात जिह्वा तलक आती और भोजन अपूर्ण रह जाता, ऐसा कई बार होता था और सप्ताह तलक घटनाक्रम ऐसे ही घटित होने के पश्चात् हम नाटिका खेलने की भाँति अपनी अपनी भूमिकाएँ करने लगे थे। हम कई दुपहरियाँ इसी में बरबाद करते थे। तैलाक्त अधर से चुम्बन टाँकना, कुवा का गुस्सा जाहिर करना, मेरा माथे पर दुख की सलवट डालना और उसका पलटकर मुझे चुम्बन करना, यह नित्यऋम की लीला थी।
तुम्हारे गृह शान्ति का एक मिनट नहीं मिलता कुवा ने कहा, वह हाँफ रही थी और चिल्लाती भी थी, एक हाथ से स्तन के नीचे खिंचती शिरा दबाती वह मुझे खुद से दूर धकेलती थी जो मुझे और ज्यादा सुहाता था और मैं उसे बस में करने वास्ते और जोर लगाता जिससे उसे और ज्यादा सुख होता वह और ज्यादा हाँफती और मुझे दूर धकेलती थी। बिस्तरे से लगी खिडकी के बाहर एक आदमी दूसरी औरत से रेशमी थान का सौदा पटा रहा था, किन्तु दोनों को हाट की धूम की वजह से एक-दूसरे की बातचीत सुनने में बहुत खलल पडता था और दोनों कुछ कहते और कुछ का कुछ समझते थे, इस कारण और जोर-जोर से चिल्लाते थे, मैंने शीश उधर घुमाया, तो कुवा ने मेरी गरदन पकडकर अपनी और मोड ली, वह क्रीडा के बखत अत्यन्त निर्लज्ज हो जाती थी, छोडो उन वेपारियों को, कहकर उसने मेरी गरदन को काटा, उन्होंने हमारी आवाज सुनी, तो मैंने कहा किन्तु ताजिरों के घोष की वजह से वह सुन नहीं पाई और जापानी में अत्यंत भ्रष्ट भाषण करने लगी, नारीजात में ऐसी वासना से सामना होने का मेरा पहिला योग था, एक तरफ आनन्द होता था तो दूसरी तरफ भय भी लगता था कि ऐसी औरत को बस में रख सकूँगा कि नहीं।
उस बखत हॉन्गकॉन्ग नगर न होकर एक बहुत बडी मण्डी था, प्रत्येक स्थान पर बेचवाल सौदे पटाने में मशगूल रहते थे, चाहे दिवस हो कि आधी रात प्रत्येक मानुष नफा बनाने के चक्कर में लगा रहता था। नारी के आदमी से प्रेम में भी मन से ज्यादा मुनाफे का लोभ होता था इसलिए कुवा के अपने प्रति प्रेम को परखने की फिराक में मैं हर घडी रहता था, एक रोज भोजन में वह पोर्क के रसे में सूरन की सेंवई लाई थी, टिफिन के दूसरे माले में चावल, तीसरे में मांटॉओ (चीनी रोटी जो उबालकर बनाई जाती है), चौथे में अनानास का केक और पाँचवें में अरबी के पातरे थे, घर याद आ गया, बुआ को चार पत्र लिखने के पश्चात् दो लीलावती को भी लिखे और एक गणपति दादा को, किन्तु किसी को भी उत्तर पहुँचाने की गरज नहीं लगी, अब तलक मैंने कुमुद के अकाल देहान्त का समाचार बम्बई को न लिखा था।
यह तो नर्मदा जी पकाते हैं, एक घण्टा खरच होता है इसे बनाने में मुझे पातरा खाते देख कुवा ने कहा, उसके इतने जतन से तैयार व्यंजनों के ऊपर नर्मदाप्रसादजी के पातरों को तवज्जो मिलना उसे खटका था। मैंने आखिरी पातरे को बम्बई से लाए नींबू अचार के संग खाया और कहा, तुम बनेवीजी को नाम से पुकारती हो? कुवा ने पोर्क का सूप चम्मच से खाते हुए जवाब दिया, तो नाम किसलिए रखा उनके माता पिता ने? जापानी नारियाँ पति को नाम लेकर पुकारती है ऐसा सुनने में तो न आया था, किन्तु मुझे जापानी संस्कारों के विषय में ज्ञान भी कितना था? मुझे तो इतना तलक न पता था कि देहान्त पीछे जापानी मुर्दे को जलाते हैं या भूमि में गाडते है। वासना ठण्डी होने पर मुझे इसकी जल्दी रहती थी कि कुवा अपने गृह चली जाए, किन्तु वह दोपहर की चाय तलक बिस्तरे पर पडी रहती थी और मुझे भी चिपटाए रखती, इससे बखत ही खोटी नहीं होता था, बल्कि काम का भी हर्जा होता था।
एक रोज तो रामदीन को दखल देना ही पडा, खिडकी से उसने साढे तीन बजे के आसपास आवाज लगाई, साहेब, साहेब, खबर है, कुवा को चद्दर ओढाई और फिरंगी ढंग का जाँघिया चढाकर मैं बाहर दौडा, कुवा पीछे किंचित कुनमुनाती रही। रामदीन मुझे देख देखकर मुस्कुरा रहा था, कुवा की कंटोनी नौकरानी डोकरी अवश्य थी, किन्तु रामदीन ने उसे खुशी से अपनी जीव-लगी स्वीकार कर लिया था और मुख पर अपनी सेठानी कुवा से उधार लेकर पाउडर लगाने पर सोलह और साठ में जास्ती फरक नहीं रहता था। वह भी जापानी औरतों की माफिक मुख पर अत्यधिक पाउडर लेफ जहाँ-तहाँ फिरती थी।
आवाज थमी, तो मुझे लगा आप लोग निपट गए इसलिए पुकारा रामदीन के आगे अब तलक मेरे कोप का खासी थरथरी बैठ गई थी इसलिए पहले ही बेचारे ने सफाई पेश कर दी, खबर लगी है कि एदा मेलमोरे नाम के किसी जहाज से बारह सौ पाउण्ड बारूद आनेवाला है, रामदीन दिनभर बन्दर से डाक्यॉर्ड तलक फेरे लगाकर नवी-नवी जानकारियाँ जुटाता था। उसे यह काम खूब भाता था, जहाज पर रोटी बनाने से अच्छा काम है कि जासूसी करके पेट पालो, जान का अन्देशा भले हो, किन्तु इज्जत कमती न थी। नाम से तो जहाज इतालवी लगता है, मैं खुद को अक्लवान बताने का कोई अवसर हाथ से जाने न देता था। रामदीन दो घडी चुप रहा फिर कहा, ब्रितानिया का मालवाहक जहाज है, गैर-फौजी कामकाज वास्ते बारूद ला रहा है, इसका मतलब था खेप प्राप्त करने में अधिक माथापच्ची न थी, फौज का माल उडाना अत्यन्त कठिन था या होता होगा, मुझे खास पता न था क्योंकि अब तलक हम लोगों ने अराजक जमात वास्ते कोई बडा हाथ न मारा था।
मुखबिर से आमना-सामना करना आवश्यक जान पडा इसलिए कुवा को सोती छोडकर धोती और बुशर्ट पहनकर सिंगापुर-शंघाई शिपिंग कम्पनी के दफ्तर को निकला, रामदीन ने बताया कि मुखबिर कंटोनी है, किन्तु किसी संकट में नहीं पडना चाहता, बस खबर पहुँचाने जितनी सेवा कर सकता है। देर तलक सिंगापुर-शंघाई शिपिंग कम्पनी के दफ्तर वाली गली में तम्बाकू पीते रहे, किन्तु कम्पनी का कंटोनी नौकर बाहर न आया, पास में बने काउलूं टीहाउस में मोटी रकम बर्बाद करके चमेली की चाय पी ली और रामदीन को गुढहल के पकौडे खिला दिए, किन्तु अन्धेरघुप्प होने तलक उस कंटोनी मुखबिर से भेंट न हो सकी। हॉटेल वाले भी बारम्बार आकर मुख ताकने लगे कि हम लोग नयी वस्तु खरीदे या तो रवाना हो, इसलिए मैंने एक प्याला सिलॉन टी मय दूध-चीनी का हुकम किया, रामदीन सिंगापुर-शंघाई शिपिंग कम्पनी के दफ्तर का एक और फेरा लगाने गया था, लौटा तो साथ में एक काना कंटोनी मानुष भी था, उसकी दूसरी आँख पर भी मोटी ऐनक चढी हुई थी।
एक पर्ची पतलून की जेब से निकालकर उसने टेबुल पर रखी, इनका नाम श्रीमान ग्वान पेहोजी, जहाजी कम्पनी में मोटे कारकुन है रामदीन ने श्रीमान ग्वान पेहोजी का परिचय दिया जिसपर पेहोजी ने मेरी तरफ अपनी एक आँख से देखा, ऐनक की दूसरी आँख का काँच काला था। पर्ची पर चीनी या जापानी में कुछ लिखा था, डाइनमाइट जाएगा तारीख 15, ऑस्ट्रेलिया की तरफ रवानगी, जहाज का नाम एदा मेलमोर (Ada Melmore)। इसका अर्थ था माल हाँगकाँग से चढेगा, तो बारूद आएगा कहाँ से? इसकी जानकारी पेहोजी को न थी, वह पर्ची पर चंद चीनी शब्द लिखकर लाया था और इसके एवज नगद पाना चाहता था, तो क्या इन्हें खबर मोल देना है? मैंने रामदीन से पूछा, उसने भाषा में जवाब दिया, कहा तो था कि चीन में राजपाट के खात्मे वास्ते खबर देना चाहता है, अब इसमें अपना नफा निकालना चाहता है। रुपए वास्ते सफा मनाही है। पहले बताया होता, तो टका-धेला दे देता, परन्तु अब नहीं मैंने निश्चय कर लिया था कि खबर पछची है ऐसा पता लगने पर ही रोकड दूँगा, वरना रोजाना मानुष आकर नवी खबर देंगे और फायदा बनाएँगे भले खबर सच्ची हो कि काल्पनिक, वैसे भी हमारा जत्था चीन देश का भला चाहनेवालों को संग करना चाहता था न कि व्यापारियों को।
पेहोजी लोभी था दंगल करने पर उतारू होने लगा, रामदीन अलग पेहोजी को रुपया न देने पर मुझसे रूठा होकर किनारे बैठा था। मैंने पेहोजी को धमकाया, हम लोग सुन चुंग-शान के संगाती है, हमारे आगे जबर निष्फल है। चीन में पब्लिक राज आए इस वास्ते सुन चुंग-शान ने यह इतनी बडी जमात बैठाई है न कि लोग मुनाफा बनाए इस वास्ते। पेहोजी की आँख भले कमजोर थी बदन में जोर कमती न था, उसने टेबुल पर हाथ मारकर हॉटेल में तूफान खडा कर दिया, रामदीन कूदकर मेरे आगे खडा हो गया कि पेहोजी मुझसे मारपीट करने से पूर्व उससे लडाई करे। पेहोजी ने कहा, मैं कानून से चलनेवाला मर्द हूँ। पास में मेरा दफ्तर है इसलिए फसाद नहीं करना चाहता। हाँ, तुम लोगों को नहीं छोडूँगा। तुम्हारे विरुद्ध रियासती पोलीस में उपालम्भ दाखिल करूँगा और चलता बना।
हॉटेल का सेठ आकार टूट-फूट का हिसाब माँगने लगा, जिसने फसाद खडा किया, टेबुल आडी की उसे जाने दिया और हमसे हिसाब माँगने खडे हुए, क्यों? मैंने पूछा। वह सेठ कंटोनी में देर तलक कुछ बोलता रहा, रामदीन ने बताया, हॉटेल के सेठ का कहना है वह हमारा मेहमान था इसलिए नुकसान भरपाई हमारे ही माथे है, सेठ के चार-पाँच नौकर और आकर खडे हो गए, तो मैंने रुपया निकालकर सेठ को दिया और जैसे तैसे बाहर आए। जान बची तो लाखों पाए रामदीन ने कहा किन्तु मुझे वापस हॉटेल में जाने की गरज थी क्योंकि पेहोजी के हाथ की लिखी पर्ची वहीं रह गई थी। मैं दौडकर अंदर गया तो सेठ मेरे पीछे पीछे दौडा, कंटोनी में अब भी कुछ बडबडा रहा था। मैं पर्ची ढूँढने लगा, ऐनक लगाना मैंने जहाज से ही छोड दिया था क्योंकि इससे मेरे पौरुष में कमी आती थी इसलिए ढूँढने में बखत लगा मगर पर्ची मिल गई, दो पर्ची और मिली जो मैंने उठा ली- चीनी पढना अब तलक मुझे आया न था।
कारकुन कह रहा था चीनी हकूमत की पोलीस से हमारा शिकवा लगाएगा रामदीन ने कहा, रिक्शावाले शाम पडे भाडा बढा देते थे इसलिए हम लोग पैदल ही चल रहे थे। हम लोग ब्रितानी शासन के नागरिक है चाहे बम्बई में हो चाहे हॉन्गकॉन्ग में। चीनी हकूमत का यहाँ बोलबाला नहीं, मैंने उसे ढारस बँधाया, किन्तु मेरा हृदय भी भय के मारे संकुचित हो रहा था, कौन जाने शिकवा लगाया और चीनी हकूमत की पोलीस हमें उठाकर ले जाए फिर हमारे वास्ते ब्रितानी सरकार चीनी हकूमत से झगडा क्यों मोल लेगी? सुनते थे चीन में चिंग राज कुटुम्ब की जुलमशाही थी और अत्याचार की वे नित नई रीतियाँ ईजाद करते थे, अराजकतावादियों को जेलखाने के बजाय सीधे गोलोक भेजा जाता था, चीन में अंग्रेजों के माफिक कायदे की हकूमत न थी। मौन ही हम दोनों चलते गए, भयभीत अवश्य थे, किन्तु खुद को शूर बताने में पीछे न रहना चाहते थे।
घर पहुँचकर देखा कुवा अब तलक घर पर खर्राटे भर रही थी, अँधेरा हुए भी बहुत बखत हो गया था, आठ बजने आए थे, कुवा, कुवा, ओत्तो नोइए (???) जैसे तैसे जापानी में मैंने पति के गृह का अनुवाद किया, अब तलक यहीं हो, ओत्तो नोइए, जापानी पुस्तकों से पढकर सीखने से उसे बोलना बिलकुल न्यारी बात है। जापानी उच्चारणी ढब में मैं अज्ञानी था और गुजराती लय में जापानी बोलता था। देर तलक रीते मुख कुवा मेरे मुख को हेरती रही, घडी भर पूर्व जागी बेचारी गुजराती ढंग में बोली जापानी क्या समझ पाती, किन्तु मेरी अवस्था तीव्र रोष के मारे उसके माथे पर मुष्टिप्रहार करने की हो चुकी थी, उसने गैर-मिलावटी कंटोनी में कुछ कहा और बिस्तरे में मुख छुपाने लगी, तेरे पिछवाडे पर लात मारकर भगाऊँ दारी तुझे मैंने कहा, किन्तु मेरी साध कुवा का हृदय भेदने की न थी बस अपने जी का रोष निकालने की थी और इस वास्ते मैंने गुजराती में अपनी बात कही, किन्तु तब भी कुवा जोर से रोने लगी, हिचकी बंद हो गई। बात बनना तो दूर अब तो बात करना भी मुश्किल था।
इतने में रामदीन चाय की केतली और प्याले लेकर हाजर हो गया, पूरा संसार हमारे प्रेम की जासूसी में मशगूल था, हम एक-दूसरे को चुम्बन टाँके या तमाचा लगाए कान सबके इधर ही लगे रहते थे, चाय का तगादा किसने किया था जो इस बखत लाए? मैंने रामदीन को डपटा, पीछे हुआंग महाराज भी जलपान की तश्तरी लाता दिखाई दिया, साहेब, रोज की रीत है, बाहर से आकर चाय जलपान करना रामदीन ने कहा और कुवा को बिस्तरे में छुपा मुख देख मसले की थाह पाते ही पलट गया। हुआंग महाराज भी दिमसम की तश्तरी घुमाता पलटकर चलता बना ही था कि मैंने ही उन्हें पुकार लगाई, आसपास कोई औरत जो कंटोनी और अंग्रेजी जानती हो, आ सकती है क्या?
केतली से प्यालों में चाय ढालकर मुझे पकडाते रामदीन ने हुआंग महाराज से कंटोनी में कुछ कहा, फिर मुझसे बोला, दो गोदाम छोडकर एक चीनी डोकरी रहती तो है जो अंग्रेजी में खत-पत्री लिखने का काम करती है मर्चेंट मरीन ऑफ नानकिंग के जहाज कारखाने में, आप कहे तो उसे बुला लाऊँ? इसपर हुआंग महाराज ने जोर जोर से मुख हिलाना आरम्भ कर दिया और देर तलक रामदीन और हुआंग महाराज कंटोनी में मुबाहिसा करते रहे। कुवा का रोना थम गया था बस बीच-बीच में हिचकी भरकर मौन हो जाती थी। दोनों झगडते ही दफा हो गए, मुझे तडप लगी कि कंटोनी-अंग्रेजी जाननेवाली डोकरी को लाएँगे भी कि नहीं और कि चीन में ऐसी पढी लिखी औरत है भी? बम्बई तलक में ऐसी औरत मुहाल थी। प्याले में चाय निकालकर कुवा को दी, तो उसने ठण्डीगार कहकर परे रख दी। तुम घर क्यों नहीं जाना चाहती? मैंने अंग्रेजी में कुवा से पूछा, कितना समझी यह तो ज्ञात नहीं हुआ उलटे उसने रोना पुनः आरम्भ कर दिया, अजब औरत माथे पडी थी, पहले ज्ञान होता तो बन्दरगाह की रण्डियों से काम चलाता। साढे आठ बजने आए थे और रोटी का भी कोई ठिकाना न था।
फिर एक चीनी डोकरी को लेकर रामदीन और हुआंग महाराज आए, साथ में एक चीनी छोकरा भी था, साहेब यह आपकी बातें करवा देंगी, रामदीन ने कहा मतलब उसे ज्ञात था कि कुवा से बात साफ करने वास्ते मैंने इस डोकरी को बुलवाया था। चीनी डोकरी ने हाथ मिलाने वास्ते हाथ आगे बढाया और फर्राटेदार अंग्रेजी में अपना परिचय दिया, आई अम मिस मिनी मून, रामदीन ने हुआंग महाराज के कान में कंटोनी में फुसफुसाकर कहा, कह रही है मैं मिनी मून माने छुटक चंद्रमा हूँ, फिर दोनों हँसे, देखा, इतनी अंग्रेजी तो मुझे भी आती है। मैंने मिस मिनी मून से हाथ मिलाया फिर रामदीन और हुआंग महाराज को डपटा, तुम दोनों बाहर जाओ, आप भी संग आए चीनी छोकरे को भी कहा। मिस मिनी मून की वय साठ-बासठ होगी, कुवा और मेरे सम्बंध का रहस्य वह उजागर करेंगी ऐसा अंदेशा न होता था। मैंने अंग्रेजी में उनसे कहा, यह मेरे बनेवीजी की धर्मपत्नी है, किन्तु दोपहर से यहाँ आकर बैठी है और घर नहीं जा रही, पूर्ण बात सफा-सफा कहूँ इतनी हिम्मत मुझमें न थी। डोकरी ने कुवा के कान में जाकर कुछ कहा और मुझे भी बाहर जाने का संकेत किया। बाहर रामदीन, हुआंग महाराज और चीनी छोकरे का ठट्ठा चल रहा था,भागो यहाँ से मैं गरजा।
दस मिनट पीछे कुवा ने मुझे पुकारा, आवाज से चित्त उजला है ऐसा अनुभव होता था। मिस मिनी मून ने मुझसे कहा, आपकी मेम कह रही है कि उनके जीवन में आफ आने के पश्चात उनके खसम ने उन्हें पहले चार पाँच दिवस तो पीटते रहे, परन्तु गई रात उन्होंने आपकी प्रेमिका के शीश का चुम्बन लिया। पिटाई बर्दाश्त है चुम्बन अब बर्दाश्त नहीं इसलिए पति के गृह नहीं जाना चाहती, कहते कहते डोकरी हाँफने लगी और छाती पर हाथ धरकर बिस्तरे पर कुवा के पास बैठ गई। मेरी कुवा मुझसे कितना गाढा अनुराग रखती थी और मैंने उसे लात मारकर भगाने की बात कही, मुझे पश्चाताप होने लगा, किन्तु यह विचार भी विकल करता था कि इस परदेशी नारी के पीछे अपने बनेवी से कपट करना कितना सही था और फिर छोटे कपट की अनदेखी तो की जा सकती थी, उनकी धर्मपत्नी को मैं रखूँ ऐसा वह बामन मर्द कैसे बर्दाश्त करता किन्तु यदि कुवा गीशा यानी जापानी रण्डी थी तो उससे किस भाँति नर्मदाप्रसादजी का लग्न हो सकता था?
कुवा के संग रात काटना जहर हलाहल पीने के बरोबर था, इस मारे उससे देर रात तलक घर जाने वास्ते मनाता रहा, आखीर में गेज गली में अपनी किसी सहेली के संग जाने की उसने हामी भरी, हुआंग महाराज ने मोटे भाडे पर रिक्शे बंदोबस्त किया, मैंने पतलून और बुशर्ट पहनी और टोप लगाकर कुवा को छोडने निकला, जगह जगह बत्ती रोशन थी और रात पडे भी हाँगकाँग में टोले के टोले मानुष टहल रहे थे। डेढ घण्टे तक रिक्शा खींचते खींचते कुली का दम निकल गया, दया खाकर मैं ही मील तलक पाँव-पाँव चला, कुवा मुख पर अँधेर-घुप्प में भी छाता लगाए थी, रस्ते पर न गर्द न मानुष फिर छाता वापरने की वजह? मैंने पूछा, कुवा ने देर तलक शब्द न बोला, मेरे उसके मुख पर आँख गडाए रखने पर उसे जवाब देना ही पडा, बत्ती मेरी नजर में चौंधती है, रिक्शा खींचनेवाले ने कंटोनी में कहा, उजेला भी अंधा करता है हजूर। मुझे रिक्शावाले का बीच में बोलना नागवार गुजरा, घरवाले-लुगाई के बीच में बोलनेवाले तुम कौन हुए? अंग्रेजी उसे समझ न आई, किन्तु बात समझ गया, कुवा मुझे अपलक ताकने लगी, उसकी कंटोनी समझने में मुझे बाधा गुजरती है, किन्तु रिक्शावाले की बात समझने में घडी खर्चा न हुई और उस पर मैं और वह आदमी-घरवाली कैसे हो गए और फिर घरवाली के संग रात बिताने पर कौन-सी रोक हुई कि गेज गली में छोडने जाना पडे।
गेज गली पहुँचे, तो वहाँ भगदड मची हुई थी, पोलीस के लोग कोने आँतर सब तरफ पहरेदारी करते खडे थे। मुख का अत्यन्त चटक बनाव करके कई निर्लज्ज नारियाँ जगह-जगह खडी हुई थी, इस रण्डी रहवास में तुम्हारी सहेली का गृह है! मैंने त्यौरी चढाई, किन्तु कुवा ने जवाब न दिया बस आसपास देखती रही, जंघामथानियों की गली में रहनेवाली कुवा की सहेली कैसे है? मैंने कुवा को कुपित आँख से देखा, तो वह मुख दूसरी तरफ करके बैठ गई। इतने में पोलीस के एक आदमी ने रिक्शा रोका और अंग्रेजी में कहा, आगे जाना मना है। खून हुआ है रिक्शावाले की सुनकर आँख फटी की फटी रह गई और वह रिक्शा वहीं छोडकर, भाडे भुगतान के बगैर वहाँ से भागा, पोलीस का आदमी उसकी धडपकड वास्ते दौडा। दो सिपाहियों ने हमें बैठा लिया और पूछताछ करने लगा, आप यहाँ किस वास्ते? देर तलक समझाने पर भी सिपाही यह मानने को तैयार न थे कि कुवा अपनी सहेली के संग रात गुजारने यहाँ आई और मेरी पत्नी है।
यंग कुवान के माथे पर गोली चलाई गई है। जाँच का निकाल आने तलक आपको यहीं बैठना होगा पोलीस अफसर ने हमसे कहा, कुवा रोने लगी, मेरी भी घबराहट के मारे हृदयगति तेज थी, हमारा उससे क्या लेनदेन। वारंट बगैर हमें आप यहाँ बैठा कैसे सकते है! अफसर ने आव देखा न ताव, कुवा और अन्य पोलीसकर्मियों के आगे झपसट में मुझे एक तमाचा लगा दिया, आज तलक जीवन में मेरा इतना बडा अपमान न हुआ था। पलटकर मैं भी उसे तमाचा लगाता, किन्तु वर्दी से भय हुआ और गाल मसलता मैं वहीं खडा रहा, समझ नहीं आता था कि इस अपमान को कैसे ग्रहण करूँ और संग खडी कुवा से कैसे आँख मिलाऊँ। पोलीसकर्मी अपने-अपने काम में मगन हो गए किन्तु मेरा बदन तो वहीं जड होकर रह गया, लगा हाँगकाँग और मेरा हृदय एक हो गए है और लोहे की चाशनी की भाँति मेरी सब भावना बह रही है, किन्तु मैं उसका अर्थ लगा सकने में असमर्थ हूँ, हाथ लगाते ही जी जलता है। पढे लिखे मर्दुम से मारापीटी हो ऐसा तो बम्बई में देखने में कभी न आया था और यहाँ वारण्ट माँगने पर खुलेआम मुझे तमाचा लगा दिया। कौन था यह यंग कुवान जिसके खून होने की जाँच हम लोगों पर बैठाई गई थी, यह तलक न ज्ञात था। किसी बापडे ने जल का गिलास लाकर दिया और कुवा भी कने आकर खडी हो गई।
आधी रात गँवाई तब पुनः पैदल चलकर गृह पहुँचे, तो नजारा किया कुवा की कंटोनी नौकरानी के साथ रामदीन जीने के नीचे खटिया पर सोया हुआ था, फुदु भी खटोले के नीचे टोकरे में सोई पडी थी, यह दोनों यहाँ कैसे आ गए? चलकर चलकर वैसे ही पसीना हो रहे थे अब तो ठण्डा पसीना छूटने लगा। कुवा बेहोश होते बची, गिरती उससे पहले मैंने कन्धा दिया, तुम अंदर देखो, कहीं नर्मदाप्रसाद न हो अंदर कुवा ने फौरन चतुराई बताई वरना उस दिन तो मान मटियामेट होते घडी खर्चा न होती, दबे पाँव अंदर आया तो नर्मदाप्रसादजी पर नजर पडी, नींद में उनका मुख हताश लगता था, बेचारे की चिन्ता करते करते नींद लग गई थी। मैं उलटे पैर बाहेर आया, तो देखा कुवा नदारद थी, रामदीन और उसकी कंटोनी औरत के खर्राटों से सन्नाटा भंग हो रहा था। देर तलक ढूँढने पर कुवा को बारूद गोदाम में बैठी पाया, पैदल चल-चलकर पिंडलियाँ अकड गई और कटि में भी दुख था, भूख अलग थी। बिना ज्यादा गुल मचाए जैसे तैसे मैंने चायपत्ती उबाली और बिस्कुट निकाले, तुम सकाल जैसे ही रिक्शा मिले घर को रवाना हो जाना तब तक मैं नर्मदाप्रसादजी के संग तुम्हें ढूँढने की नाटिका करूँगा कुवा की चाय केतली से कप में उलटते मैंने कहा किन्तु कंटाल के कारण कुवा कुछ बूझ न सकी। कुमुद के स्थान पर जिस स्त्री को नर्मदाप्रसादजी ने अपने घर बैठाया था उसके साथ नागवार सम्बन्ध मैं कर चुका था और अब कुवा की टेव से हटना मेरे वास्ते मुमकिन न था, मेरी आँखें मूतने लगी, हृदय में कल का हौल पैठ गया था। आज अकारण पडे तमाचे से अलग खुद के वास्ते मान चौथाई टका रह गया था, गणपति दादा उचित ही कहते थे कि ब्रितानी राज पेटिकोट गवर्नमेंट है जिसमें चाहे जिसे जर मिलता थे और चाहे जिसे जूते पडते थे।
दूसरे रोज कुवा को पिछले रस्ते से रवाना करके नर्मदाप्रसादजी के संग उसे ढूँढने का ढकोसला करते आधा रोज बिगाडा, उसके रोजाना रिक्शे में भाडा खर्चा करके अपनी सहेली से मिलने जाना मुझे उसकी चूक गुजरती थी, मैंने वांदा डाला, तो हमारे मध्य तकरार हो गई, बस उसके पश्चात कुवा का मुख नहीं देखा नर्मदाप्रसादजी के अश्रु बहकर उनकी मूँछों तलक आ गए थे, मुझे खेद होने लगा, पराई नारी के वास्ते अपने बनेवी से बदी करना कहाँ तलक उचित था! आखीर में उन्हें मशवरा दिया कि गृह चलकर देखे कभी रोष के खात्मे पश्चात् पुनः आ गई हो तो। गोबरधनभाई मैं कुवा की कुदरत खासी समझता हूँ वह पुनः घर में आवेगी लगता नहीं। कुवा के लौटने में जास्ती श्रद्धा न दिखाऊँ ऐसा विचारकर उसे ढूँढने गेज गली जाने के नर्मदाप्रसादजी के निर्णय को मैंने टेका दिया और रिक्शा ठहराकर हम उधर निकले, मेरे हृदय में भय के मारे थरथरी मची हुई थी कल के पोलीस अफसर ने यदि मुझे देखा, तो अवश्य ही खून करने का आरोप लगाकर जेलखाने में डालेगा, सहज है कि रातदिन मुझे गेज गली में जाने की आवश्यकता ही क्या है? न वहाँ मेरा गृह था न कोई मेरे परिचित मानुष का वहाँ रहवास था, यदि बारम्बार वहाँ आने की वजह पूछी तो क्या कहूँगा?
गेज गली शान्त पडी थी, पोलीस के आदमी कहीं दिखाई न पडे, हाँ, एक घर के आगे भीड लगी थी, गर्दा उड रहा था और बाइयाँ भेली होकर रोना पीटना कर रही थी। अवश्य ही इस घर में कल गृह-मालिक का खून हुआ है, सोचकर मैं रिक्शे से कूदकर एक तरफ हो गया। बीच रस्ते कूद क्यों गए, गोबरधनभाई नर्मदाप्रसादजी ने पलटकर पूछा, रिक्शावाला भी रुक गया, आगे गली बंद थी। आगे भीड-भडक्के में जाने की हमें क्या गरज, जीजाजी? मैंने कहा तो नर्मदाप्रसादजी जोर-जोर से गरदन हिलाने लगे, आगे ही कुवा की सहेली रहती है और हाथ आगे बढाया कि मैं पुनः रिक्शा पर सवार हो जाऊँ। मैं नाखुशीपूर्वक पुनः रिक्शा पर सवार हुआ और चप्पल में कोई दोष आया है ऐसी लीला करते हुए झुककर चप्पल ठीक करने लगा। रिक्शा भीड में जाकर फँस गया और मैंने पुतलियाँ तिरछी करके देखा तो पोलीस के लोग भी बाइयों के बीच में दिखाई पडे, कल रात्रि मुझे तमाचा मारनेवाला तो नहीं था, किन्तु मेरे वास्ते जल लानेवाला खडा था। मैंने जल्दी से पुनः मुख नीचे किया और कपोल मसलने लगा ताकि कोई मुझे देख न सके, एक गिरती इमारत के आगे नर्मदाप्रसादजी ने रिक्शा रुकवाया जो उस गृह से अधिक दूर न था जहाँ खून हुआ था, जैसे ही रिक्शा रुका, अंदर से चार पाँच नारियाँ छज्जे पर दौडी आई, सभी बदन बेचवाल नजर आती थी- कुवा की सहेलियाँ ऐसे करम करती है और नर्मदाप्रसादजी को किंचित एतराजी नहीं मुझे अचरज हुआ।
ये कहाँ आ गए! रिक्शे से उतरते नर्मदाप्रसादजी से मैंने कहा। अरे उतरो, कब तलक यहाँ बैठे रहोगे? यहीं तो तुम्हारी कुवाबेन की सहेली का घर है नर्मदाप्रसादजी रिक्शे का भाडा चुकाते बोले। रिक्शा छोडने का मेरा बिलकुल मन नहीं था, रिक्शा छोड देता, तो पैदल भटकते पकडे जाने का अंदेशा था। पोलीस के आदमी गली में अब भी चक्कर मार रहे थे सो मैंने कहा, आप जरा अंदर जाकर देख आइए, मैं तब तक यही रिक्शे में बैठता हूँ। नर्मदाप्रसादजी मुझसे थोडा चिढ गए, उन्होंने कहा, भाडा बेवजह बढेगा। हम दोनों ही अंदर जाकर बात कर लेते है फिर रिक्शा वापस कर लेंगे। मन मारकर मैंने भी उतरने की ठानी, फिर दूसरी निगाह से विचारने पर लगा कि उतरने में ही नफा है। अगर उतर जाऊँ, तो अंदर इमारत में खडा रहूँगा और पोलीस की नजर में नहीं आऊँगा। सो मैं उतरकर अंदर चला गया। अंदर का तो हाल बताते मेरी जिह्वा जलती है। चीनी, जापानी, कंटोनी, मद्रासी भाँति-भाँति की रण्डियाँ वहाँ पर खडी हुईं थी। वह भला यहाँ क्यों आती होगी! उनकी सहेली रण्डी है क्या? मैंने नर्मदाप्रसादजी से पूछा। नर्मदाप्रसादजी ने मेरी ओर नजर की और ताकने लगे। थोडी देर पश्चात् तकनी घूरने में बदल गई और मुझे लगा कि उनके जी में मैंने कोई आग भडका दी है। मैंने शान्ति साधी और रण्डियाँ निहारने लगा।
नर्मदाप्रसादजी ने महँगे रेशम का किमोनो पहने एक जापानी नारी से कहा, अजी, कुवा यहाँ आई है क्या? वह जापानी नारी अपने मुख पर पाउडर की मोटी थर जमाए नारियल पानी पी रही थी। देर तलक उसने नर्मदाप्रसादजी को उत्तर देना उचित नहीं जाना। छोटा- सा किमोनो पहने एक जापानी बच्ची जापानी नारी के निकट खडी हुई थी उसने छटका मारकर उस जापानी नारी का ध्यान नर्मदाप्रसादजी की तरफ करवाया। जापानी नारी सोच समझकर ही नर्मदाप्रसादजी पर तवज्जो न करती थी और इस मारे उसे जापानी बच्ची का नर्मदाप्रसादजी पर उसका ध्यान लाना अनुचित गुजरा। मन मारकर उसने नर्मदाप्रसादजी से कहा, तुम्हारी ब्याहता है, तुम जानो। यहाँ क्यों आएगी हम रण्डियों के बीच तुम जैसे शरीफ हिन्दू की औरत! नर्मदाप्रसादजी पलटे और मेरी आँख में आँख दी। फिर उस जापानी नारी से कहा, सही सही बता दो कल रात से ही कुवा घर से बाहर है। पूरा हाँगकाँग छान लिया कहीं उसका ठिकाना नहीं, उस जापानी नारी ने नारियल पानी पीने के पश्चात् खाली नारियल धडाम से पटकते हुए कोप से कहा, क्या मैं तुम्हें उस कुवा की नाऊन लगती हूँ! जो मैं जानूँगी कि वह कहाँ फरार हुई! कितने दिन गुजरे वह तो मुझसे मिलने तलक नहीं आई। जापानी बच्ची उस नारियल को उठाकर अपने मुख में पूरा औंधा करके पीछे की ओर झुके हुए नारियल में जो पानी की दो एक बूँदें बची थी उसे पीने का प्रयास करने लगी। नर्मदाप्रसादजी ने उत्तर दिया, वह तो रोज कितना भाडा भुगतान करके तुमसे मिलने आती है और अब वह जब मिल नहीं रही तो तुम ऐसी नुगरी बनती हो।
जापानी नारी ने नर्मदाप्रसादजी को तरेरा, बात बिगडती अनुभव हुई, तो मैंने नर्मदाप्रसादजी से अर्ज किया कि हम बाहर कुवा को ढूँढते हैं और आवाज बढाकर बाईजियों को सुनाते हुए कहा कि कुवा अगर यहाँ होगी तो पोलीस उसे जरूर ढूँढ लेगी। हाथ पकडकर मैं नर्मदाप्रसादजी को बाहर ले आया। वापस रिक्शा ठहराने में बहुत बखत खोटी हुई क्योंकि देर तक नर्मदाप्रसादजी भाडे को लेकर मचमच करते रहे। इस गली में अय्याश जास्ती आते थे इस वजह से जाते बखत का भाडा रिक्शेवाले हमेशा अधिक माँगते थे। अब घर जाने के सिवा कोई उपाय न था इसलिए वेलिंगटन स्ट्रीट हम लोग लौट आए, अपनी इमारत में घुसते ही किसी ने नर्मदाप्रसादजी पर लीडा निचोड दिया और उनका माथा भीग गया। उन्होंने चिढकर कंटोनी में गाली दी और ऊपर निहारा तो सहसा प्रसन्नता के मारे रोने-रोने हो गए और जल्दी से पैडियों की तरफ दौडे। कुवा नहा धोकर छज्जे में अपना किमोनो सुखा रही थी। मुझे यह समझ में न आया कि मैं यहाँ रुकूँ या अपने गृह जाकर गोदाम और जासूसी का कामकाज देखूँ। सकाल से मुख में चाय नहीं बिस्कुट नहीं, जल की बूँद तलक न पडी थी इसलिए मैं भी कुवा के हाथों बनी खुराक खाने का सोचकर पैडियाँ चढने लगा।
पहुँचा तो नजारा दुखदायी गुजरा, कुवा को नर्मदाप्रसादजी आलिंगन में चपेटे जा रहे थे और कुवा भाटे के बुत की भाँति खडी हुई थी। फुदु वही पडी दूध पी रही थी और कुवा की कंटोनी नौकरानी चटाई पर बैठी शलजम काट रही थी। नर्मदाप्रसादजी का कुवा के प्रति अपने लाड का ऐसा प्रदर्शन करना मुझे किंचित भी नहीं सुहाया। मुझे वहाँ खडा देखकर नर्मदाप्रसादजी को थोडा संकोच हुआ और उन्होंने मुझसे मुखातिब होकर कहा, सकाल से दुफेर होने आई, पूरे हाँगकाँग नगर की ढुँढैया पाडी और देखो कुवा अपने गृह में बैठी मिली ऐसा करके वे खी-खी करने लगे। कुवा ने कंटोनी में कहा, चाय जलपान की व्यवस्था करवाती हूँ तब तलक आप दोनों नहा आइए, नर्मदाप्रसादजी ने कुवा पर लाड से गाढी नजर फेरी और नहाने वास्ते निचले माले पर बने स्नानघर को जाने लगे। दासी दौडी आई और बाल्टी, लोटा और साबुन नर्मदाप्रसादजी को दिए।
कुवा ने कंटोनी दासी को नर्मदाप्रसादजी का फिरंगी जाँघिया देकर स्नानघर वाले माले पर पहुँचाया, जैसे ही कंटोनी दासी जीना उतरने लगी, कुवा मेरे अत्यंत निकट आकर खडी हुई। मलागिरी रेशम के किमोनो में वह दुखियारी जोगन की भाँति दिख रही थी, हाथ में किरमिजी सूत का डोरा बाँधा था और कानों के पीछे जहाँ पर उसके अम्बरीं केस खुँसे थे वहाँ तेज इत्र के फाहे पोंछे थे। देर तक वह मुझे निहारती रही फिर अपनी शर्बती हथेली उठाकर उसने मुझसे कहा, तुम आज के आज मेरे वास्ते दीगर गृह का इंतजाम कर लो, अब मैं एक दिवस और नर्मदाप्रसादजी से लगकर बिता सकती नहीं। मुझे उसकी बात से किंचित भी सहमति नहीं हुई, मैंने पलटकर कहा, इतने फटाफट दीगर गृह का इंतजाम कैसे कर लूँ! मेरी पगार इतनी नहीं बम्बई अलग रकम भेजना पडती है। थोडा ठहरकर अगले मास पेशगी पगार लेकर ही नवादे मकान की व्यवस्था सम्भव है।
कुवा ने कटे शलजमों की टोकनी उठाई और छज्जे की तरफ चलती बनी, मैं भी उसके पीछे दौडा। वहाँ पहुँचकर कुवा ने कहा, यदि तुमने मुझे एक दिवस और नर्मदाप्रसादजी के संग बखत बिताने का कहा तो मैं प्राण त्यागना पसंद करूँगी, कुवा का यह चोंचला मुझे बर्दाश्त न था। मैंने कहा, मेरे आगे नाज में आकर तुम्हें कुछ प्राप्त न होगा। यह नखराबरदारी मेरे बस की नहीं, इस पर कुवा ने अपनी बायीं टाँग उठाई और छज्जे की मुँडेर के उस पार पाँव रख दिया।
इतने में कुवा की कंटोनी नौकरानी भी नर्मदाप्रसादजी को जाँघिया देकर ऊपर लौट आई और कुवा का तमाशा देखने लगी। मैंने नीचे झाँका, किन्तु तब तलक नीचे आती-जाती भीड को खबर न हुई थी कि ऊपर क्या नाटक चालू हुआ है। तब मैंने कुवा की जंघा अपनी तरफ खींचने का जतन किया, कुवा की कोमल, माँसल जंघा जिसका स्पर्श मुझे किमोनो के रेशम के पीछे होता था मुझे अत्यन्त उत्तेजना से भरने लगा। मैंने उसे बचाने वास्ते जंघा के अंदरूनी भाग पर पकड मजबूत करके उसे अपनी ओर जोर लगाकर खींचा। वह चिल्लाई, मैं नर्मदाप्रसाद के संग एक रात्रि और गुजारा नहीं कर सकती, अब नीचे आते जाते लोग मुण्डी उठा-उठाकर ऊपर का नजारा करने लगे। कंटोनी नौकरानी फटे-फटे दीदों से हमें देखने लगी, फुदु अलग बुक्का फाड फाडकर रो रही थी। मुझे भय हुआ कि नर्मदाप्रसादजी नहाकर ऊपर न आ जाए। मैंने कुवा से कहा, कुछ न कुछ जुगत भिडाकर तुम्हें आज रात यहाँ से भगा ले जाऊँगा, किन्तु अभी इस तमाशे पर परदा डालो। यदि नर्मदाप्रसादजी ने इस नाटक का दर्शन किया, तो अन्धेर होते देर न लगेगी। बनेवी और साले का सम्बंध नष्ट हो जाएगा और फिर मेरी बहन की बेटी फुदु के बापू नर्मदाप्रसादजी है तो मैं उनसे सदैव वास्ते हेठी करूँ सम्भव नहीं। कुवा ने अपना पाँव पुनः मुँडेर से छज्जे की ओर करने का प्रयास किया, किन्तु यह उसे मुश्किल गुजरा तो मैंने उसे स्तनों से थामकर उठाया और हम दोनों छज्जे पर गिरे।
कुवा से जैसे तैसे निस्तार पाकर घर पहुँचा। कुवा के यहाँ जलपान की योजना उसकी लीला देखने के बाद वहीं त्याग चुका था, रास्ते में फल पर नमक लगा लगाकर खाता चला। गोदाम पर हुआंग महाराज और रामदीन मेरी इंतजारी में तम्बाकू पीते गपोडगोष्ठी करते थे, आते ही मेरे पीछे दौडे और निरन्तर अभिनव समाचार देने लगे। मैंने कहा, सबूरी करो, टट्टी स्नान से फारिग होकर तुमसे बात करता हूँ। इस पर हुआंग महाराज ने मेरा हाथ पकडकर ऐसे स्वर में बताया जैसे बडा भारी रहस्यफाश करता हो, गई रात गेज गल्ली में मर्डर हुआ और यंग कुवान जाते रहे। गेज गली नाग महाराज की माफिक मेरे भाल से बारम्बार लिपटी आती, इतने बडे नगर में खून होना तो रोजाना की घटना है फिर क्यों बार बार इसकी बात चलती, कल खाया तमाचा पुनः दुखने लगता। तो इसमें हमारा क्या मामला और कौन सा नफा नुकसान जो हम किसी की हत्या का हिसाब रखे! मैंने चिढकर हुआंग महाराज से कहा। रामदीन ने अजायबी प्रगट की और बोला, यंग कुवान चीनी गदर का लीडर था। हुआंग महाराज ने कहा कि सुन चुंग शान ने हुकम किया है कि हम फौरन अपने स्थान से गायब हो जाए। उसकी भाषा मेरे पल्ले न पडी तो रामदीन ने फिर समझाया, साहेब सुन चुंग शान का हुकम है कि हम लोग फौरन जापान रवाना हो। यहाँ से शंघाई वास्ते रेलगाडी पकडे और शंघाई से जहाज करके कोबे कूच करे।
इस नमूने से जाँचे तो कुवा हेतु मेरा दुलार फोतरा निकला, बिनअनुभवी सरीखा भीरु बनकर मैंने कोबे की रस्ता पकडा। बाकी वार्ता फिर कभी।

सम्पर्क - ammberpandey@gmail.com