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सबक

हरीश चन्द्र पाण्डे
नवंबर का महीना चल रहा था, और सर्दी अभी नहीं के बराबर ही थी। धूप में शायद बीस मिनट से ज्यादा देर नहीं हुए थे, पर सूरज की तीखी गर्मी से बाहर बैठे- बैठे मदन को कुछ बैचैनी-सी महसूस हुई। वो भीतर चले आ,, यों मदन की तबियत इधर कुछ दिनों से ढीली ढाली-सी चल रही थी। आज भीतर आ कर पत्नी से आग्रह किया कि, दस बजे बाद डाक्टर के पास चलेंगे। आज तो दिखा ही लेता हूँ। हाँ, ठीक है, चलो,पर आज मुझे भी खास ताकत नहीं है, इसलिए ऐसा करते हैं, बिस्कुट दूध का नाश्ता कर लेते हैं। कहकर पत्नी ने उनको खाली पेट खाने की गोली और पानी थमाया। हाँ हाँ, सही है कुछ भारी तो न खाया जा सकेगा और न पच सकेगा। ठीक दस बजे साठ साल के मदनजी दो घण्टे बाद अपनी हमउम्र अर्धांगिनी के साथ रिक्शा पर सवार होकर चल दिए। बाबूजी इधर वाली सडक से ले चलूँगा, वो वाला रास्ता खुदा हुआ है। कहकर रिक्शा चालक ने जीवन बीमा दफ्तर की गली में रिक्शा मोड लिया। आज वो दोनों एक महीने बाद घर से निकले थे। बूढे शरीर पर शहर की ताजा हवा ने स्पर्श किया तो कुछ अच्छा-सा लगा । लोग, गाडी, बैलगाडी सब उनके रिक्शे के बगल से गुजर रहे थे, पर इस कोलाहल की सडक पर भी वो अपने मन की कोई लोरी सुन रहे थे। अचानक तेज धूप उनके चेहरे से होती हुई पत्नी को तांबई करती आगे निकल गई। रोजाना बस एक कमरे की मद्धम रोशनी में जिससे हर समय बतियाना होता उसी पत्नी को आज बाहर सूरज की रोशनी में जरा गौर से देखा, बालों में सफेदी, भूरापन और रूखापन-सा आ गया था। आँखों के ठीक नीचे से ही झुर्रियों ने अपना काम कर दिया था और गले तक बस झुर्रियों का ही साम्राज्य था। खैर हू ब हू यही हाल तो मदन का भी था। नजर के सामने जीवन बीमा की बिल्डिंग देखकर मदन को एक करंट-सा लगा। एकाएक मदन का दिल मानो किसी बच्चे-सा हो बैठा, और अपने पिता याद आ गए। पचास साल पहले की बात होगी, यहीं पास में एक प्राइमरी स्कूल हुआ करता था, पिता, उसको स्कूल तक छोड कर यहाँ से दफ्तर चले जाते थे। वो देर तक पापा को देखा करता। दो साल बाद छोटी बहन भी साथ ही आने लगी थी। इतना समय जैसे पलक झपकते ही कहाँ गुजर गया, नहीं शायद उड गया। मदन ने अपने आप से कहा। पिता कैसे उसको अपना जीवन बीमा कहकर अक्सर गले लगा लेते थे। अपनी बहन को गिनती, पहाडे, कविता आदि सिखाते समय वो पापा की सराहना से कैसे फूल कर कुप्पा हो जाता था। मदन हमेशा एक मेहनती और मेधावी छात्र रहा और फिर एक दिन वो होनहार युवक मदन, पापा की नजर में कुलदीपक मदन बना, वो प्रतियोगी परीक्षा पास करके भारतीय प्रशासनिक सेवा में भी आ गया। परिणाम सुना तो पिता भावुक हो गए और तब पिता अपने आँसू नहीं रोक पा रहे थे। पिता ने खुश होकर अपनी एकमात्र जायदाद यानी वो दो कमरे का छोटा-सा मकान मदन के नाम कर दिया था। मदन के पिता की तो जैसे मुराद ही पूरी हो गई थी। तब परिवार में कोई इतने बडे पद पर नहीं पहुँच सका था । मदन पिछले तीन साल की तैयारी के दौरान कितना लोभी और स्वार्थी हो गया था यह पिता की वत्सलता से सराबोर आखों ने देखा ही नहीं। मदन को हर साल असफलता की हताशा में यह नौकरी सेवा नही,ं बल्कि हरे नोटों का पहाड लगने लगी थी। सफल होने मे तीन साल लग गए थे और एक शानदार दुनिया में मदन डूबकी लगाना चाहता था। अब अपने ऐशो आराम का कुशल प्रबंधन करना है, इसकी कल्पना में गुम मदन सब भूल गया कि उसकी दो साल छोटी बहन भी तो उस समय बस एक सामान्य शिक्षिका ही थी। बहन ने पिता की उदारता देखी, पर तब वो सरल मन वाली बहन कुछ नहीं बोली थी, वो बस अपने भाई को ऊँचाई पर देखकर और प्रेम विवाह करके ही अत्यंत प्रसन्न थी। वो भी क्या दिन थे, कैसे दिन थे? वो सोच ही रहा था कि, लीजिए, पहुँच गए। कहकर रिक्शा चालक ने ठहरे हुए रिक्शे और अपनी आवाज से उनके विचारो को भी ब्रेक लगा दिया । नोट गिनकर वो बोला, अरे, अरे, बाबूजी ,दस रुपये ज्यादा क्यों दे रहे हैं वो तीस रुपये रखकर दस वापस लौटाने लगा, तो वो बोले कि, बेटा,आप मेहनत कर रहे हो ना यह बहुत लम्बा रास्ता था। रखो बेटा बेटा शब्द की गर्माहट ने उसे गदगद कर दिया। अगर,आप कहो तो इंतजार कर लेता हूँ, वापस चलेंगे। ना बेटा एक घण्टे से ज्यादा लग जाएगा। उसे आशीर्वाद देकर वो दोनों क्लीनिक पहुँच गए और भली-भाँति पूरा परामर्श लिया। मदनजी और पत्नी दोनों की आक्सीजन, शर्करा आदि सब कुछ बिलकुल ठीक था, बस मदन जी का ही रक्तचाप सामान्य से कम निकला। जब-जब भूख लगती है, तो मनपसंद आहार लिया कीजिए। कहकर चिकित्सक ने मुस्कुराते हुए दोनों को काफी पिलाई। पिछले आठ बरस से यही उनके पारिवारिक चिकित्सक थे ।
काफी पीकर उनसे जरा हँस बोलकर वो दोनों लौट आए। घर पहुँच कर पत्नी बोली, सच, यह बहुत अच्छा चिकित्सक है। हाँ, बिलकुल सही, आठ बरस पहले इसी ने जीवनदान दिया है। कहकर मदन ने एक गिलास पानी पिया और आराम कुर्सी पर बैठ कर आठ बरस पहले का वो चौंका देने वाला घटनाक्रम याद करने लगे। उन दिनों मदन यहाँ नगर निगम में खास तौर पर बनाये गए, राज्य सरकार के औषधि सलाहकार के महत्त्वपूर्ण पद पर थे, और उस दोपहर को वो सांसद से शहर के किनारे की सौ बीघा जमीन पर औषधीय पौधों के उत्पादन आदि पर विचार करके कार से घर लौट रहे थे कि अचानक एक फोन आया जिसमें उनको कुछ सुनाया गया था। दरअसल उनकी एक गोपनीय बातचीत वायरल हो गई थी वो बेशकीमती दस बीघा जमीन पर औषधीय पौधों के नाम पर अपना हक जमाने की कोई खास मंत्रणा कर रहे थे। यह सुनकर वो सकते मे आ गए।
मगर,ब्लैकमेल करने वाले ने राज छिपाने के बदले पूरे एक करोड रुपये की माँग की। वो कुछ कहते कि उसी समय फोन अचानक कट गया और अब तुरन्त बहन का फोन आया कि, मदन भैया, प्लीज सुनो, कुछ दिनों से पिता बहुत बीमार है, उनकी सर्जरी करानी है। बहन याचना कर रही थी, पर कठोर मदन ने मीटिंग का बहाना बनाकर बहन को साफ टाल दिया और अब वो उस ब्लैक मेलर को दोबारा फोन लगाकर बात करने की कोशिश में न जाने क्या हुआ कि वो अचानक ही बेहोश हो गया, और कुछ समय बाद जब होश आया, तो उसकी आँखों के सामने यही चिकित्सक खडे हो कर ड्राइवर से बातचीत कर रहे थे। अब जाकर मदन को पता लगा कि पिछले दो घण्टे में बहुत कुछ हो गया है, सर, रक्तचाप कम होने से आपको लंबी बेहोशी आ गई, और किसी ने खबरिया चैनलों मे एक टेलीफोनिक बातचीत वायरल कर दी है। ड्राइवर से यह सुनकर एक और सदमा लगा, मदन ने उस समय अपनी शारीरिक अक्षमता तथा अपनी धन लोलुपता की कमजोरी को महसूस करते हुए हौले-से गरदन हिला दी। मदन का दिमाग बिलकुल सुन्न हो गया था। मदन को लगा कि किसी ने चाबुक मारकर उसे फुटपाथ पर पटक दिया था। उस पल के बाद उसकी जिंदगी में अनचाहा भूकंप आया । बस दो दिन लगे और मदन अपनी जिस- जिस पोजीशन और पावर पर इतराता था ,उसमें क्या से क्या हो गया। मदन पस्त और पराजित-सा पछताता रहता। नौकरी से निलंबित होने के बाद इस ब्लैक मेलर के फोन को गलत साबित करने की कोशिश में और अदालतों के चक्कर लगाने मे बंगले, बगीचे, होटल सब बिक चुके थे। और अंत में ले देकर यह दो कमरे का छोटा-सा मकान बचा, जो कभी पिता ने इस खुशी से मदन के नाम किया था, कि आई ए एस बेटा अपनी बहन को भी मान देगा, पर हुआ क्या, मदन ने तो पिता की सेवा तक नहीं की, बहन जब पिता को अपने साथ ले गई, तब भी मदन को झेंप नहीं हुई, कि बहन सीमित संसाधनों में क्या-क्या करेगी। जबकि मदन के पास तो नौकरों की फौज खडी थी। मदन यह भी भूल गया था कि कैसे अपनी बीमार पत्नी की सेवा करते करते पिता ने अनथक रात और दिन बस काम ही किया। माँ दुनिया से चली गई, तो उसके बाद मदन ने बस एक बार कह दिया कि पापा यह सौतेली माँ तो बहुत गंदी होती है,आप मत लाना पापा। और यह सुनकर मदन को सीने से चिपटाकर पिता ने अकेले जीवन काट दिया, वो फिर जीवन भर अविवाहित ही रहे। मदन के आई.ए. एस होने के बाद पिता कितनी बार उससे मिलने के लिए, गपशप के लिए फोन करते पर वो कैसे व्यस्त होने का असत्य भाषण करता और झूठ बोल देता। पापा उसके साथ बैठकर यादों की वादियों में टहलना और बहलना चाहते, पर मदन तो पाषाण हो गया था। उधर मदन की पत्नी भी बस अपनी नौकरी और अपनी मित्र मण्डली में ही दिन रात मगन थी और मदन तथा उसके पिता के बीच नहीं आती थी। उस दिन जब नौकरी, पद, प्रतिष्ठा और इज्जत सब नीलाम हो गई, तब मदन को समझ मे आया कि कुदरत ने तो पहले ही आगाह कर दिया था जब मदन का इकलौता बेटा बाइस साल की उम्र में शिमला के अपने कालेज से एक विदेशी पर्यटक के साथ किसी प्रोजेक्ट का बहाना बनाकर सीधे जर्मनी गया और ऐसा गया कि कभी लौटा ही नहीं। आज उन पगडण्डियों पर वापस लौटते हुए मदन को सब याद आ रहा था। कैसे अपनी पत्नी की पेंशन से उनका गुजारा चल रहा था वो ही जानते थे ।
मदन को अपनी हर हरकत याद आ रही थी । बहन को पिता की सेवा करते देखा, तो बहन का उपकार मानने की जगह मदन की निर्लज्जता और बढने लगी। बहन, तू तो पिता की पेंशन से अपनी जिंदगी में ऐश कर रही है। हँसकर, यह कहकर वो बहन को शर्मिंदा कर दिया करता। अपने बडे भाई के मुँह से ऐसे गलीच आरोप सुनकर वो सहम जाती पर जवाब नहीं दिया करती थी उल्टे वो एकदम खामोश हो जाती। जब पिता को यह पता लगा कि उनकी किडनी की पथरी का आपरेशन और सब दवा, दारू बेटी और दामाद ने अपने स्तर पर सँभाले हुए हैं, तो पिता ने उसी समय, एक फैसला किया और मदन को बस कोई पराया मान लिया था। एक विनती है मेरी अब पुणे चलना है, मैं इस शहर में नहीं रह सकता। वो जरा जिद करने लगे, तो सवाल उठा कि, यहाँ से इतनी दूर पुणे? पर, पापा! वहाँ क्या है?
मैं जीवन बीमा की मजेदार कहानी सुनाता था तब एक परिचित ने प्रस्ताव दिया था कि जब चाहो यहाँ पुणे आ जाना आपको, आपकी कहानी पर, मनचाहा मानदेय देगें।
यह पिता की शायद अंतिम इच्छा थी इसलिए पिता की सलाह पर बहन ने अपना स्थानांतरण पुणे करा लिया। बहन के पति एक होटल समूह में सहायक थे, उन्होंने भी पिता समान ससुर की इच्छा का सम्मान करते हुए पुणे में नया होटल समूह खोज कर वहाँ काम कर लिया। अब वहाँ पिता ने वहाँ सेहत के दुरूस्त होते ही अपने उसी सम्पर्क से जानकारी लेकर, कहानी सुनाने वाले क्लब की सदस्यता ले ली। देखते ही देखते दो पीढी एक अलग-अलग धुन में थिरकने लगी। एक तरफ तो मदन बावन की आयु मे नौकरी गँवाकर साठ का होते-होते बिलकुल अशक्त हो गया था वहीं तिरासी साल के उसके पिता की कभी इस चैनल तो कभी उस चैनल पर मजेदार कहानियाँ आती रहती। साक्षात्कार भी आते। और जब वो बोलते तब मदन साफ सुनता था कि पिता अपनी इकलौती संतान के रूप में बस बेटी का ही परिचय कराया करते ।
मदन उनके जोश और जज्बे को देखता और स्क्रीन पर ही प्रणाम करता। आज तक के सारे दुर्व्यवहार, सब निर्णय और प्राथमिकता कैसे भी थे पर वो सौ फीसदी थे तो मदन के ही, फिर उनके कारण यह दिनचर्या कितनी भी हताश निराश करने वाली हो, दुविधा कितना भी हैरान कर रही हो, अब आने वाले जीवन का स्वागत करना ही है वो खुद को समझाता रहा। मदन जानता था कि उसके पास एक - दो विकल्प तो हर हाल मे है ही और चुनते समय अब उनमें से भी सबसे बेहतरीन ही चुनना है । अब तो खुद को भ्रम में रखते हुए जीना गलत होगा। अब कल से कुछ सेवा कार्य करना चाहिए ऐसी सेवा जो प्रचार रहित हो । यही प्रायश्चित होगा। आज उसके जैसे निर्लज्ज के साथ सब सही हो रहा था। मदन को अपने कर्मो का बिलकुल सही सबक मिला था ।
सम्पर्क- शुभम् विहार, आर.के.टेन्ट रोड, कुसुमखेरा, हल्दवानी