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प्रेम की नवेली दास्तान

संदीप पाण्डे
प्रमोद अंतर्मुखी स्वभाव का लडका था। मौन मुस्कान या भौहों की सिकुडन उसके खुशी या नाखुशी का दृष्टिगत पैमाना थी। गिने चुने दोस्तों के बीच उसकी उपस्थिति अक्सर मूक श्रोता की ही होती थी। कम बोलने के स्वभाव के कारण उसके माता-पिता भी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके बेटे में कल्पनाशील अवलोकन शक्ति व लिखकर अभिव्यक्त करने की क्षमता का विकास हो रहा है। कहानी उपन्यास पढने के उसके शौक से परिचित उसके अभिभावक यह उसके समय गुजारने का साधन मात्र ही मानते थे। इसलिए उसके काफी जोर देने के बावजूद कला की जगह उसे वाणिज्य संकाय लेने के लिए मजबूर किया गया। आखिर सीए पिता को वाणिज्य में ही उसका सुनहरा भविष्य नजर आ रहा था। एकाउटेंसी और बुकीपिंग की मोटी किताब पढने से समय बचा कर, वह अपनी पसंद की कविता, कहानी आदि पढने लिखने का समय निकाल ही लेता था। ग्यारहवीं की अर्धवार्षिक परीक्षा में वो ठीक-ठाक नम्बर ले आया था इसलिए टीचर या अभिभावक में से कोई भी पढाई के लिए टोका-टाकी नहीं करता था। इस बार विद्यालय की अंतरसदन कविता पाठ प्रतियोगिता में उसका नाम लिख लिया गया था और उसको एक अच्छी कविता तैयार कर प्रस्तुत कर सुनाने के लिए आदेशित कर दिया गया था। हल्की घबराहट के बीच उसने स्वरचित कविता का जब गीत रूप में पाठ किया, तो सबने दाँतो तले उँगली दबा ली। प्रतिद्वंद्वियों द्वारा भी काफी अच्छा पाठ किया गया था, पर वो सब स्थापित कवियों की लोकप्रिय रचनाए थीं जिन्हें पहले भी सुना जा चुका था। प्रमोद का पाठ खत्म होते ही कुछ पल की खामोशी के बाद जब गगनभेदी करतल ध्वनि से इस्तकबाल हुआ, तो उसकी आँखो से खुशियों के मोती टपक पडे। उसके जीवन का यह पहला ऐसा क्षण था। अचानक सबकी नजरें उसके प्रति बदली-बदली-सी प्रतीत होने लगी। अनजाने लोग भी उसके सामने से जब मुस्कुराते हुए निकलने लगे, तो उसे कुछ अपने विशेष होने का-सा आभास हुआ।
अगले ही दिन लंच के समय में एक सुंदर-सी लडकी ने उसको हाय बोला, तो वो अचकचा-सा गया। उसके मुँह से बस इतना निकला जी, उधर से आवाज आई मेरा नाम सुलेखा है और मैं इलेविंथ आर्ट्स की स्टूडेंट हूँ। आप इतना अच्छा लिखते और गाते हैं, पर आप पहले कभी नजर नह आए? जी, मैंने पहली बार ही किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया है। आप तो पूरे कलाकार लगते हैं। आपने आर्ट्स विषय क्यों नह चुना? वो फिर बिना कुछ बोले मुस्कुरा भर दिया। अगले हफ्ते पेन्टिंग का कॉम्पिटिशन है। मैं भी उसमे हिस्सा ले रही हूँ। आप जरूर देखने आना। न जाने क्यों प्रमोद को इस आमंत्रण में कुछ अपनापन-सा लगा और उसने गर्दन हिलाकर सहमति व्यक्त कर दी।
पेन्टिंग प्रतियोगिता वाले दिन वो लंच टाइम में डिस्प्ले रूम में पहुँच गया । सुलेखा अपनी बनाई पेन्टिंग के पास ही खडी थी। उसकी चेहरे की चमक ने बता दिया कि वो उसका ही इंतजार कर रही थी। सफेद लिबास में लिपटी कल्पना में खोई तरुणी की नीले बैकग्राउंड के साथ चित्र अप्रतिम लग रहा था। कुछ मिनट तक अपलक निहारने के बाद उसके मुँह से वाह,, निकल पडी। सुलेखा भी उससे कुछ ऐसे ही प्रतिक्रिया की उम्मीद कर रही थी। प्रसन्न भाव से बोली पूरे पंद्रह दिन की मेहनत है। प्रमोद खोया-खोया अभी भी चित्र को निहार रहा था....
खोई रही ख्याल में प्रीतम की आस में
राधा खुद बनी श्याम, श्याम की प्यास में
अब वाह सुलेखा के मुँह से निकलना वाजिब था। हल्के बतियाते दोन ने बाकी सब पेन्टिंग्स पर भी नजर डाली। तुम्हारा पहला स्थान पक्का है। दूसरों की पेन्टिंग का स्तर तुम्हारे आसपास भी नह है। प्रमोद की इस तारीफ से सुरेखा एकदम लजाती हुई मुस्कुरा उठी। फिर अटकते हुए बोली तुम्हारा कामर्स पढने में दिल लग जाता है क्या? लगा लेता हूँ प्रमोद ने धीरे से कहा। आर्ट्स क्यों नह ले लेते। सुलेखा तपाक से बोली। हाँ, पर पापा मेरे नहीं मानते। उनको लगता है मेरा भविष्य वाणिज्य में ज्यादा सुरक्षित रहेगा। पर तुम्हारी काबलियत तो कला में ज्यादा नजर आती है। तुम खुल कर अपने पेरेंट्स से बात करोगे, तो वो जरूर कंन्विस हो जाएँगे और अभी तुम चेंज करोगे, तो कोर्स कवर भी कर लोगे। शायद बाद में पछताने से तुम बच जाओगे।
प्रमोद ने शाम को हिम्मत जुटा कर माँ को अपनी बात समझाई, तो उन्होंने अपनी सहमति तो प्रकट कर दी पर पापा से स्वयं बात करने को कह दिया। पिता उसके अक्सर रात देर से ही घर पहुँचते थे। माँ ने आते ही उसकी इच्छा के बारे में पिता को बताया, तो वो गुस्सा हो गए। आधे घण्टे तक पिता-पुत्र में अपनी बात मनवाने का द्वंद्व चलता रहा, पर सच्चे और दृढ मन की जीत हुई और अगले ही दिन प्रमोद कामर्स छोड आर्ट्स की कक्षा में आत्मविश्वास की नई उर्जा के साथ बैठा था।
अब उसका ज्यादातर समय सुलेखा के साथ ही बीतता था। सुलेखा उसे अबतक पढा दिए पाठ को समझाने में मदद करती और वो अपनी नई रचनाओं से उसे आनंद सागर में सराबोर कर देता। स्वाभिमान और आकर्षण की डोर से वो ऐसा बँध गए थे कि उनको स्वयं ऐसा नहीं लगता कि उनको मिले कुछ महीने ही हुए है। एक अनकहा-सा प्रेम दोन महसूस कर रहे थे। प्रमोद काव्य सृजन से तो सुलेखा रंगों से अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त कर रही थी। प्रमोद की कलम अब प्रेम गीत के सिवाय कुछ नहीं लिख रही थी और सुलेखा की पेन्टिंग में लाल रंग ही प्रधान रूप से मौजूद रहता। दोनों साथ में बैठ अपने को महकते चमन में हिंडोले खाते-सा महसूस करते, तो अकेलेपन में उस अहसास के आनंद में सराबोर रहते। एक-दूसरे के सिवा और सबकी उपस्थिति उनके लिए नगण्य-सी हो गई थी। कक्षा के व्याख्यान हो या घर पर अभिभावक की बातें, अवचेतन में एक नशे की-सी खुमारी बनी रहती थी। सच कहते हैं लोग प्रेम एक नशा है। ग्यारहवी की वार्षिक परीक्षाएँ पूर्ण हो गई थीं और अब एक महीने की छुट्टियाँ थीं। सुलेखा ने बिना माँगे ही उसे अपना मोबाइल नम्बर दे दिया और रोज शाम को सात बजे कॉल करने की हिदायत भी दे दी। तुम मेरा नम्बर भी नोट कर लो और मुझे कभी भी कॉल कर सकती हो। दोनों विदा हो गए और अब फोन पर बातचीत कर हृदय में उठती ज्वाला को शांत करने का उपक्रम करते।
दस दिन यही सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन सुबह ही सुलेखा का फोन आया। मेरे पापा का प्रमोशन के साथ गाँधीनगर बैंक ब्रांच में ट्रांसफर हो गया है। कल ही हम सब सिफ्ट हो रहे हैं। पता नहीं अब मुलाकात होगी भी या नहीं। प्रमोद के तो पैरों तले जमीन सरक गई। उसने ऐसी कोई कल्पना भी नहीं की थी। उसने तो सुलेखा से कभी उसके परिवार के बारे में भी नहीं पूछा था। स्पाट रोड पर रोमांचित करने वाली गति से चलते वाहन में अचानक जबरदस्त ब्रेक लग गया था और गाडी हिचकोले खाने लगी। दिमाग संज्ञा शून्य-सा हो गया। सुलेखा के जाने से पहले एक बार मिलने तक की हिम्मत ना जुटा सका।
दो दिन गुमसुम से बैठे निकल गए। उसने ठीक से खाना भी नहीं खाया। माँ उसके भावों को समझने का असफल प्रयास करती, पर वो जैसे तैसे उन्हे टाल देता। अगले दिन शाम को सुलेखा का फोन आया, तो उसने तपाक से उठाया। उसके हैलो करने से पहले ही सुलेखा बोली मेरे फोन का ही वेट कर रहे थे? हाँ, उसकी आवाज में पीडा थी जिसे सुलेखा ने साफतौर पर महसूस कर लिया था। अरे हम दूर ही हुए हैं अलग नहीं। हमारी दोस्ती पक्की है, जिसे दूरिया कभी नहीं मिटा सकती। हम सम्पर्क में बने रहेंगे। और तुम वादा करो अपने सृजन कार्य को जरा भी विराम नहीं दोगे। सुलेखा की उसे तपती दुपहरी में शीतल जल वर्षा के माफिक लगी । गहरे बादलों में छुपा चाँद फिर पूरी चमक के साथ आसमान को आलोकित करने लगा।
बारहवीं का नया सत्र शुरू हो चुका था। पढाई अपनी गति से आगे बढ रही थी। प्रमोद की कविता कहानी अब पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे थे। शहर के कुछ एक कवि गोष्ठियों में भी उसने शिरकत करना शुरू कर दिया था। लेखन की धार अब निरंतरता से पैनी होती जा रही थी। वो अपनी हर प्रकाशित रचना को सुलेखा के पास जरूर भेजता। सुलेखा भी अपनी पेन्टिंग की फोटो उसको भेज कर उसकी राय माँगती। दोनों का मूक प्रेम अब नए दौर से गुजर रहा था। एक-दूसरे के प्रेम सागर में गोते लगाते अपने हुनर के भी प्रेम में डूबते जा रहे थे। सुलेखा ने ऑनलाइन प्लेटफार्म में अपनी पेन्टिंग का स्टोर खोल लिया था जिससे उसे ठीकठाक कमाई होने लग गई थी। इधर प्रमोद की जेबखर्ची का इंतजाम भी उसका लेखन कार्य कर रहा था, पर उसके पिता भविष्य को लेकर अब भी आशंकित थे।
दोनों ने बारहवीं भी अच्छे नम्बर से उत्तीर्ण कर ली थी। सुलेखा ने बीए फाईन आर्ट्स और प्रमोद ने बीए हिन्दी लिटरेचर में प्रवेश ले लिया और साथ में साधक की तरह अपने फन को तराशने में अपने स्तर के प्रयास में लीन रहे। एक-दूसरे के उत्साहवर्धन हेतु वो अपने भावों को शब्दों में पिरो कर इलेक्ट्राॅनिक चिट्ठी के माध्यम से भेजते रहते। प्रेम अब गहराई के उस स्तर तक डूब चुका था कि जहाँ से बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद हो जाते है। श्याम में राधा और राधा में श्याम नजर आते हैं।
ग्रेजुएशन भी पूरा हो चुका था सुलेखा पेन्टिंग से अच्छा पैसा कमाने लग चुकी थी। प्रमोद की भी दो पुस्तक प्रकाशित हो चुकी थी। आय अभी कम ही थी। पर अब वो कुछ फिल्मकार के सम्पर्क में आ चुका था और उसके गीतों को फिल्म में शामिल करने की बात चल रही थी। जीवन की राह अब एक दिशा में चलती प्रतीत हो रही थी। प्रमोद ने अब सुलेखा से मिलने की इच्छा जाहिर की।
रुखसार से जुल्फों को अपने हाथों से हटाने की चाहत है
सदियों से रुके जज्बात को सामने अजमाने की चाहत है।
सुलेखा भी अब थोडा बहुत लिखना सीख गई थी।
बेकरारी सदा ही प्रेमियों ने तोहफे में पाई है
मिलने की घडी मुश्किलों से ही मिल पाई है।
प्रेम गहरे सागर में गोते लगाता आनंदित भी था और बेकरार भी। कर्म यथार्थ की जमी पर पल्लवित हो रहे थे और प्रेम कल्पना का नया संसार रच रहे थे।
प्रमोद की तीन गीतों का फिल्म में शामिल करने का कॉन्ट्रैक्ट साईन हो गया था। अच्छे पैसे भी मिले और नाम ने प्रगति की कई सीढियाँ एक साथ चढ ली थी। स्नातक की डिग्री हाथ में आने से पहले प्रमोद और सुलेखा अर्थ की मजबूत कुर्सी पर विराजमान हो चुके थे। अब दोनों के माता-पिता भी उनके भविष्य को लेकर आश्वस्त हो चुके थे। अपनी तीसरी किताब की पहली प्रति लेकर प्रमोद बिना बताए गाँधीनगर पहुँच गया। सुलेखा को उसके घर के पास के रेस्टोरेंट में मिलने के लिए कहा, तो वो दौडी चली आई। इतने सालों के बिछोह के बाद तो मिलन में आत्मीय आलिंगन के सिवाय कुछ और कल्पना करना नामुमकिन है। दोनों सबकुछ भूलकर बस कुछ लम्हों तक एक-दूसरे में खो गए। बिछोह प्रेम को मजबूती देता है, तो मिलन भावनाओं का सैलाब। घण्टे भर एक-दूसरे से प्रेम भरी बातों से तृप्त हो सुलेखा ने उसे लौट जाने को कहा। प्रमोद ने उसके सामने शादी कर लेने का प्रस्ताव रखा, तो सुलेखा ने उसे नकारते हुए कहा, क्या शादी करना जरूरी है? शादी करके हम प्रेमी-प्रेमिका की जगह पति-पत्नी बन जाएँगे और हमारे प्रेम की गहराई कम हो जाएगी। हम जीवन भर शादी किए बिना ऐसे ही रहेंगे। इस तरह हम अपने काम और एक-दूसरे से प्रेम के स्तर में बढोत्तरी ही करेंगे। और जब मिलने का मन करेगा, तो ऐसे ही घर या बाहर कही भी मिल सकते हैं। प्रमोद आज फिर निरूत्तर था, पर उसे अपनी सुलझी सुलेखा पर गर्व भी हो रहा था।
साठ साल के प्रमोद और सुलेखा आज भी अपने कार्य और प्रेम भरे जीवन से प्रसन्न है। लैला-मंजनू, शीरी-फरहाद जैसी अमर प्रेम ना सही पर दोनों ने प्रेम की नई दास्तान तो लिख ही दी थी।
सम्पर्क - संदीप पाण्डे,
दुर्गेश पुष्कर रोड,
कोटरा, अजमेर-305004 (राजस्थान)
मो. 9414070143