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जीते जी इलाहबाद

श्रीप्रकाश मिश्र
किताब की सफलता इस बात में होती है कि वह पढवा ले जाय। इस मामले में ममता कालिया की संस्मरणों की पुस्तक जीते जी इलाहाबार सफल पुस्तक है। कारण यह है कि एक दो प्रसंगों को छोडकर उन्होंने उन्हीं प्रसंगों पर लिखा है, जिसकी वे स्वयं गवाह रही हैं, उसे बडे ही तरल और प्रवाहपूर्ण भाषा में लिखा है, उसके लिए किसी पूर्व निर्धारित संरचना का उस उपयोग नहीं किया है, किसी भी प्रसंग को कहीं से भी उठा कर कहीं भी समाप्त कर दिया है। बहुत दिनों के बाद हम यहाँ किस्सागोई की शैली का प्रयोग होते देखते हैं। अपने वृत्तांत में ममताजी ने सबसे ज्यादा स्थान दूधनाथ सिंह और ज्ञानरंजन को दिया है और दोनों के व्यक्तित्व का उम्दा वस्तुगत विश्लेषण किया है और अपनी बात बिना किसी लाग-लपेट के कही है। उन्होंने दूधनाथ सिंह में अजीब ही हीनताग्रंथी काम करते हुए पाया है, जो उनके व्यवहार को अनुशासित करता रहा है। रवीन्द्र कालिया कहते थे कि इसके चलते वे मरे लोगों पर संस्मरण लिखते थे, जिन्दा लोगों पर कहानी लिखते थे और दोनों में इरादा कोई हिसाब चुकता करना होता था, कई बदला लेना होना था। वे नयी कहानी के बाद के कहें साठोंत्तरीपीढी के प्रबल कहानीकार थे, पर हिन्दीवालों में जो तिकडी बनकार सोचने परखने की आदत है, उसमें वे फिट नहीं बैठते थे। लिहाजा उसके लिए उन्होंने स्वयं प्रयास किया अपने और विजय मोहन सिंह को शामिल कर साढे चार यार बनाकर। अब नयी कहानी की तिकडी राजेन्द्र यादव, भीष्म सहानी और कमलेश्वर की भी, पर नामवरसिंह ने स्थापित निर्मल वर्मा को किया। काशी-ज्ञान-कालिया की तिकडी से बाहर पडे दूधनाथ सिंह ने इसके लिए स्वयं प्रयास किया। ममताजी ने ज्ञानरंजन के लेखन की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। जो नहीं लिखा है वह यह कि वे कान के कच्चे आदमी हैं। नीलाम और नीलकान्त जो उन के कान में डाल देते थे, उसे वे जीवनभर गाँठ बाँध कर रखते थे।
संस्मरणों की इस दुनिया में भैरव प्रसाद गुप्त और कृष्णा सोबती की अक्कड और घमण्ड की चर्चा है, नीलाभ और उनके जैसे दूसरे लोगों की चर्चा है, यश मालवीय और अनीता गोमेश की सहजता की चर्चा है। इलाहाबाद के उस पूरे साहित्यिक महौल कीचर्चा है, जिसमें हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के रचनाकर एक साथ रहते और अंतःप्रक्रिया करते हैं। नही है तो संस्कृत और बंगाली के रचनाकरों की चर्चा। साहित्य के केन्द्रों की चर्चा है जो काफी हाऊस से लेकर विश्वविद्यालय और बडे आयोजनों से लेकर घर के भीतर होने वाली गोष्ठियों में देखने को मिलती रहीं हैं।
आधुनिक हिन्दी साहित्य का केन्द्र बनारस और इलाहाबाद रहा है। बनारस पर इतने संस्मरण नहीं मिलते जितना इलाहाबाद पर मिलते हैं। क्योंकि कोई सवा सौ वर्षों से चली आ रही यह केन्द्रीयता आज भी बरकरार है, रचनात्मक स्तर पर, मण्डी के स्तर पर भले दिल्ली हो। उत्थान काल, छायावाद, द्विवेदी युग, परिमल युग, प्रलेस, नई कविता, नक्सलवादी कविता सभी को प्रश्रय यहीं मिला है और यही से आगे बढ रहा है। उसके लिए सरस्वती से लेकर उभयन तक पत्रिकाओं की एक लम्बी श्रृंखला कहें परम्परा है, जिसका वर्णन वे मनोयोग से, बडी शिद्दत से करती हैं। हालाँकि उनका जोर कविता पर कम है, गद्य, विशेषकर कहानी पर अधिक है। यही कारण है कि यह नगर देश भर के बुद्धिजीवियों को खूब खींचता है और उनका भरपूर स्वागत होता है। स्वागत का ढंग प्रशंसा का कम, खींचाई का अधिक होता है। जो इस खींचाई को झेल लेता है, वह कुंदन की तरह चमक उठता है, जो नहीं झेल पाता है वह विनष्ट हो जाता है। मार्कण्डेय कहते थे कि साहित्य में घास-फूस बहुत उगता है, उसकी निराई के लिए यह खींचाई बहुत जरूरी है। इसे इन पंक्तियों का लेखक भी खूब झेल चुका है।
साहित्य सेआगे जाकर ममताजी ने यहाँ के दीगर संस्कृतिक माहौल की भी चर्चा की है, उत्सव, मेले, हाट कला और साहित्य का देश के स्तर की होने वाली गोष्ठियाँ उसमें हुए गरमागरम विवाद आदि। एकाध जगह अतिरेक भी है। जैसे यह सही बात है कि भैरवजी ने एक गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए मुख्य अतिथि मार्कण्डेय काटजू की उर्दू साहित्य की अतिप्रशंसा के दौरान हिन्दी साहित्य पर अवमानना भरा कटाक्ष करने पर भडक उठे थे और उनके न्यायाधीश बनने की योग्यता पर सवाल उठाते हुए उनको नियुक्ति देने वालो कोलेजियाम पर सवाल उठाया था। काटजू इससे आहत होकर मीटिंग छोडकर चले गए थे, पर ममताजी ने लिखा है कि भैरवजी उन्हें मंच से धकेलने गये थे। वही बात संचालक नीलकान्त की शालीनता थी, जो उस घटना पर खेद व्यक्त करते हुए काटजू को बाहर तक पहुँचाने गए थे। उसका जिक्र नहीं है। उसी तरह दूधनाथ सिंह के भारत-भारती समान ग्रहण करने का जो जिक्र है, उससे लगता है कि निर्मलाजी के हाल ही में दिवंगन होने के बावजूद वे बडे लालायित थे। वे कहती है कि सुबह-सुबह ... लेकर उनके घर आए पकड कर साथ चलने के लिए। हो सकता है कि ऐसा हुआ हो। पर वही ट्रेन पकडने के लिए जब मैं प्रयाग स्टेशन पहुँचा, तो देखा ममता दम्पत्ती पहले से ही एक बैंच पर बैठे थे और दूधनाथ सिंहजी अपने तीसरे पुत्र सुधीर सिंह के साथ बाद में आए।
संस्मरणों में अपने घरेलू जीवन और पाँव जमाने के लिए संघर्षों का बडा रुचिकर वर्णन है। विश्वविद्यालय में होने वाले साहित्य के पठन-पाठन, साहित्यकारों की रोजगार की समस्या, प्रकाशकों और लेखकों का संबंध, पाठकों और लेखकों का आपसी संबंध और तिकडम स्कैण्डल, पत्र-पत्रिकाओं का छपना और संपादकों का रचनाकारों के साथ संबंध आदि का बडा स्पष्ट और प्रामाणिक वर्णन यहाँ है। शहर का वर्णन आते हुए वे चुन्नीलाल के ढाबे का जिक्र करती हैं, जहाँ तमाम रचनाकार और अन्य लोग सस्ते में ताजा भोजन पाते थे, विभूतिनारायण के वर्तमान साहित्य के कथानक विशेषांक के नाटकीय विमोचन की चर्चा आती है, लालबहादुर वर्मा के साथ प्रसूनजी, वासु चटर्जी अपने नौकर बहादुर जाने कितने लोगों की बडी सरस चर्चा करती हैं। काबी तमाम बातों को जानने के लिए पाठकों को यह पुस्तक स्वयं पढनी चाहिए।
पुस्तक का नाम : जीते जी इलाहबाद
लेखक : ममता कालिया
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष : 2021
मूल्य : 199/-
विधा : संस्मरण

४०६, त्रिवेणी रोड, कीटगंज,
इलाहाबाद (उ.प्र) पिन - २११००३
मो. ८००५०९२७४७