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पगडंडियों पुकारती हमें

शैलेन्द्र चौहान
रेवतीरमण शर्मा का कविता संग्रह मेरे सामने है विरल है जीवन की डोर शीर्षक आकर्षित करता है और बहुत कुछ अंदर तक आंदोलित करता है। जीवन की डोर ही तो संसार है। पृथ्वी है, आकाश है, अतंरिक्ष है और जल की अनंत गहराई है। एक अच्छी और प्रभावी कविता भी कुछ ऐसी ही होती है। मेरा ऐसा मानना है। उसमें जीवन होता है, संघर्ष होता है, पृथ्वी, आकाश और जल होता है, आग होती है और जीवन रस होता है। यही जीवन की डोर है जो कवि के मुताबिक विरल है। यह बात बहुत महत्त्व की है। जो विरल है उसे ही साधना है, उसे ही ढूँढना है, उसे थामे रखना है और उसी से रस ग्रहण करना है। इस दौर में यह बात बहुत अपेक्षित है जब जीवन रस सूख रहा है। वह जीवन का रस न होकर उपभोग वस्तुओं, साधनों और मद तथा वासना का रस बन चुका है। हम प्रसन्न होते है जब हम उपभोग का कोई नया आयाम ढूँढ लेते हैं, कुछ ऐसा खरीद लेते हैं जो क्षणिक सुख दे सके, शारीरिक श्रम को कम करके उसे निष्क्रिय बना सके या थोडी देर के लिए आवेग और उत्तेजना दे सके। सब कुछ अपने निज के लिए. अपने उस घरौंदें के लिए जो आफ निज के पास है और उस मण्डली के लिए जो आफ अहम को सहला सकता है। इसलिए जीवन का असल रस विरल है। और अच्छी कविता की विरल हैं क्योंकि कविता उस रस को ढूँढने का प्रयास है और उस खेल को ध्वस्त करने की सदिच्छा है जो रस को वस्तु में बदल रहा है। कविता उन सभी मानव विरोधी रोध) षडयंत्रों का विरोध है जो उससे रस छीन लेना चाहते हैं या उसके जीवन रस को सुखा देना चाहते हैं। शील जी की एक कविता यहाँ याद आती है -
अपेक्षा की कुछ की
कुछ का कुछ हुआ
देखते रहे लोग मुआ-मुआ
उडती नैतिकता,
दोगले वादों की दृष्टि
कृदृष्टि झेलते रहे।
उपेक्षा की पीडा सालती रही
काले इरादों के सफेद भाग
नाग
कहाँ नहीं
रेवतीरमणजी की एक कविता ढोल ध्यान आकर्षित करती है। ढोल को लोक जीवन और संस्कृति में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। तमाम खुशी और दुख के अवसरों पर ढोल बजता है। ढोल बजा कर मुनादी भी की जाती थी। ढोल के अंदर पोल की भी लोक स्वीकृति है, लेकिन रेवतीरमणजी ने ढोल को जिस अर्थ में लिया है वह मार्मिक भी है और आक्रोश को मुखर भी करता है।
जो होते हैं ढोल
वे ढोल ही होते हैं
जितना मारो
उतना बजते हैं
जितना पीटो
उतना पिटते हैं फिर भी रोने से बचते हैं।
रोने से बचते हैं यही कविता है। यह व्यंजना है। यह पीडा है, यह आक्रोश है। जीवन यहीं से शुरू होता है जब यह चेतना जन्म लेती है। यह एक महत्त्वपूर्ण संदेश भी है और ललकार भी है। इसका सुनना जीवन को गति देना है, यथास्थिति को तोडना है। यहाँ एक और कविता है इरोम शर्मिला
हाँ, हम संघर्ष करते हैं।
अपने लिए
वे हमारी आजादी भंग
करते हैं
वे हमारी शांतिभंग करते हैं उन्हे खडा किया हुआ है। हमारे खपरैलों के इर्द गिर्द
वे हमारे घरों की
टूटी-फूटी सुराखदार खिडकियों से
लगाए रहते हैं
कान / आँख ।
इरोम शर्मिला के साथ हुए जघन्य अत्याचार को शब्दों में बयान कर पाना कठिन ही नहीं, बल्कि वह संभव भी नहीं है। लेकिन उसकी जीवन और जीवंत संघर्ष को चिन्त्रित किया जा सकता है। यह काम कविता भी कर सकती है। उसकी एक झलक यहाँ दिखाई देती है। रेवतीरमणजी की कविताएँ बहुत सहज है, बहुत सरल है। उनमें में न कारीगरी है, न कसीदाकारी। न उलटवासी, न कुहासा । बस सीधी-साधी अभिव्यक्ति है।
वह कहते हैं -
कुछ भी तो नहीं है।
पास मेरे
किसी को देने या
छुपा कर रखने के लिए सब कुछ खुला है....
यही खुलापन उनके व्यक्तित्व का वह गुण है जिससे प्रभावित हुए बिन नहीं रह जा सकता। यही वह बात है जो उन्हें कवि बनाती है यद्यपि पेशे से वह लेखाकार रहे हैं। यही वह प्रभाव है जो उन की कविताओं पर समीक्षा लिखने के लिए प्रेरित करता है वरना मैं साहित्य और खासकर कविताओं की समीक्षा आलोचना के प्रति विरत हो चुका हूँ। यह पढना बहुत आश्वस्ति देता है और प्रसन्नता भी जब वह लिखते हैं
एक लेखाकार कविता नहीं लिख सकता क्या वह दो और दो चार में ही उलझा रहेगा? यह तो जीवन का गणित है। जीवन व्यापार है। कविता तो संवेदनशीलता से पैदा होती है। भावनाओं के ज्वार से पैदा होती है, विचारों के आवेश से पैदा होती है और द्वंद्व से भी। बंसत ऊर्जा देता है, उत्साह देता है, आनंद भी देता है, लेकिन रेवतीरमणजी का बसंत कुछ यूं शेक-धुन-सा बज उठता है-
उसकी पीतवर्णी और
सूनी आँखों में
ठहरा हुआ-सा है पतझर
उमंगो की कोपलों बिना
लगता है सब कुछ
अ-स्पंदित है!
ये उमंगों की कोपलें एक बडे हिस्से के पास नहीं है। उनके पास कुछ लोगों की संपदा की तुलना में बहुत बहुत कम है।
सडक पर
औंधे मुँह पडा है।
किसी बालक का
गहरे नीले-लाल रंग का जूता
कईं मौसम गुजर जाने के बाद
पिता ने बमुश्किल दिलाए हैं जूते
बढता पैर है यही सोच पिता ने बडे उत्साह से

थोडे बडे दिलाए जूते
पिता के साथ साईकिल पर
घर लौट रहा है बालक
रास्ते में कहाँ गिरा
एक पैर का जूता....
यह विसंगति, यह विडंबना, यह असमानता कविता जन्मती है। इसका प्रतिरोध भी कविता
जन्मता है। संघर्ष और जुल्म भी।
और अंत में यह आकांक्षा भी कविता में
रूपांतरित हो जाती है कि फिर से मिलें (हम)
आओ हम अनजान बनें
जैसे थे कभी फिर से मिलें
छूटी हुई और कब की भूली हुई
पगडण्डियाँ पुकारती हमें..
रेवतीरमनजी की कविताएँ उनके सहज व्यक्तित्व उनके सोच और उनके परिवेश के अनुकूल तो है ही, उनकी काया और उनके सौम्य, प्रसन्नमुख, स्नेहपूर्ण व्यवहार के अनुकूल भी हैं। मैं कोई मनौवैज्ञानिक नहीं हूँ और किसी भी व्यक्ति को समझना तो मेरे लिए बहुत कठिन होता है, लेकिन में वह जैसा दिखता है उसे वैसा ही मान लेता हूँ। रेवतीरमणजी को भी मैं बहुत नजदीक से नहीं जानता। दो चार मुलाकातें, कभी फोन पर दो-चार बातें बस इससे अधिक नहीं, पर उन्हें देखकर यह लगता है वह छल छदूम से दूर सबके साथ सामंजस्य बिठाकर रखते हैं। राग-विराग से दूर रहते हैं
पेड अपने तन से गिरा देता है पतियाँ
फूल और फल
एक-एक कर
फिर भी खडा रहता है निः संग
छोडने का भी अपना सुख है।

किताब का नाम : विरल है जीवन की डोर
लेखक : रेवतीरमण शर्मा
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
प्रकाशन वर्ष : 2020
मूल्य : 150/-
विधा : कविता


सम्पर्क- 34/242 सेक्टर 23, प्रताप नगर,
जयपुर 302033
मो. 78388978 77