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प्रेमचंद की परंपरा का निर्वहन करती कहानियां

संजय आचार्य ‘वरुण’
प्रेमचंद से लेकर अब तक हिंदी कहानी ने एक लंबी यात्रा की है । इस यात्रा के दौरान उसने अनेक परिवर्तनों को आत्मसात किया है । आज की कहानी शिल्प, भाषा और दृष्टिकोण के स्तर पर भले ही प्रेमचंद की कहानी से कुछ अलग लग सकती है, लेकिन उसका धरातल आज भी वही है जो आजादी से पहले हुआ करता था। यह निष्कर्ष प्रियदर्शन मालवीय के सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह केंटकी चिकन का स्वाद से होकर गुजरने पर सामने आता है । यह संग्रह आम जनजीवन की पीडाओं को मुखरित करने वाला संग्रह है । वर्तमान में एक तरफ जहाँ कहानी को भी नई कविता की तरह गूढ और बौद्धिक बनाने के कुछ सुनियोजित एवं कुछ अनियोजित प्रयास चल रहे हैं, ऐसे दौर में केंटकी चिकन का स्वाद की कहानियाँ त्रासदियों की पीडाओं के प्रति चिंता और सहानुभूति जताते हुए उन्हें नए तरीके से रेखांकित करती है। निर्मल वर्मा की एक उक्ति है कि कहानी जैविक समाज का प्रतिबिंबात्मक अनुसृजन है। इसी दृष्टि से देखें तो संग्रह की कहानियाँ अपने समय के यथार्थ को उकेरती हैं इसलिए पाठक का कहानियों के पात्रों से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कई बार पाठक को उन पात्रों में अपना अक्स भी दिखाई देता है। यह भी सही है कि प्रियदर्शन मालवीय इन कहानियों के जरिये भारतीय समाज के उस वर्ग के लिए लड रहे हैं, जिस वर्ग की आवाज सदियों से आज तक अनसुनी है। वे लालमुनि प्रसाद और विनायक जैसे लाखों किसानों की अंतर्वेदनाओं को शब्द देकर ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे रहनुमाओं तक पहुँचाते हैं। संग्रह की भूमिका में अखिलेश कहते हैं-प्रियदर्शन मालवीय उन कथाकारों में हैं जिनके लिए लिखना समाज की सुंदरता को तबाह करने वाली चीजों के विरुद्ध कार्रवाई है।
केंटकी चिकन का स्वाद संग्रह में कुल 10 कहानियाँ हैं। संग्रह की शीर्षक कहानी आज की कॉरपोरेट पत्रकारिता का चित्रण बेबाकी से करती है । कॉरपोरेट कंपनियों और घरानों द्वारा संचालित अखबार शुद्ध रूप से व्यावसायिक इकाइयाँ होते हैं। मूल्यों पर आधारित संवेदनशील पत्रकारिता से इनका वास्ता कम ही पडता है। कहानी का नायक मयंक एक ऐसे ही अखबार का पत्रकारनुमा कर्मचारी है। वह वस्तुतः मूल्यपरक पत्रकारिता का समर्थक एवं संवेदनशील युवक है, किंतु आज की व्यवस्था के अनुसार चलने के लिए विवश है। कहानी में लेखक ने मौसम और नीति- नियमों की दोहरी मार झेल रहे गाँव और किसान की दहलाने वाली पीडा दिखाकर एक युवा पत्रकार की अंतश्चेतना को झकझोरा है। कहानी का अंतिम हिस्सा अत्यंत मर्मसपर्शी है जब मयंक अखबार के चीफ द्वारा दी गई पार्टी में कहता है कि दादा, दरअसल जब मैं केंटकी चिकन खाने लगा, तो मुझे लगा कि मैं रामकिशन (किसान) का माँस खा रहा हूं। मैं चिकन नहीं इनसानी माँस खा रहा हूँ।
कहानी जोंकें हमारे समय और समाज के युवा की वास्तविक मनोदशा को उजागर करती है। कॅरियर, पढाई और पैकेज की प्रतिस्पर्धा पतली गलियों से होती हुई हमारे घरों और खून के रिश्तो तक में प्रविष्ट हो चुकी है। कॉरपोरेट कंपनियां जीवन में तरक्की, अवसर और स्पर्धा की आड में देश की युवा ऊर्जा को भीतर ही भीतर किस तरह खोखला बना रही है, यह लेखक ने बहुत ही प्रभावी ढंग से संप्रेषित किया है। कहानी के मुख्य पात्र नलिनमोहन जैन पैसे के पीछे भागते अपने पूरे परिवार के साथ कोई तालमेल नहीं बिठा पाते। उनकी छोटी बहन भी समय की चाल को समझ कर जीवन की दौड में उनसे आगे निकल जाती है। कहानी हांफते हुए जीवन की विवशता और दुर्दशा को बयान करती है। प्रियदर्शन मालवीय का अनुभव संसार बहुत विस्तृत और बहुआयामी है। वे प्रत्येक विषय को अत्यंत विश्वसनीय तरीके से कहानी में पिरोते हैं। रोम जब जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था कहानी छद्म जीवन जी रहे युवा वर्ग पर केंद्रित है। कहानी का केंद्रीय पात्र अशोक कुमार अकारण पुस्तक प्रेम में पड जाता है। कुल 18 पृष्ठों में फैली हुई कहानी का संदेश बहुत छोटा-सा है किंतु कहानी बीच के अनेक पृष्ठों पर बहुत अनावश्यक और अवांछित लंबी हो गई है। जाके पाँव न फटी बिवाई कहानी, संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी प्रतीत होती है। कहानी वास्तविक किसान की लीर-लीर जिंदगी का हृदयस्पर्शी चित्र प्रस्तुत करते हुए चाँद पर जाने की मंशा रखने वाले 21वीं सदी के भारत को उसका धरातल दिखाती है। कहानी जय जवान- जय किसान इस पावन सूत्र को अपने समय से जोडती हुई चलती है जिसे इस देश का आधार माना गया है। लेखक ने आज के जवान और किसान की सच्ची तस्वीर प्रभावोत्पादक तरीके से उकेरी है । यह कहानी समकालीन व्यवस्था का विद्रूप चेहरा बेखौफ होकर बेपर्दा करती है। कहानी का आरंभिक हिस्सा जरूर कुछ बोझिल हो गया है लेकिन किसान पिता के अथक संघर्षों के साथ ही जवानों की भर्ती के समय होने वाली हुडदंग और उसी जानलेवा अफरा-तफरी में पुत्र की मृत्यु के जरिए मार्मिक चित्रण किया गया है। कुमाता न भवति कहानी का विषय वास्तव में लघुकथा का विषय है । शीर्षक भी उपयुक्त नहीं जान पडता। पूरी कहानी उद्देश्यविहीन-सी लगती हुई आखिरी एक- डेढ पैराग्राफ में कुछ अर्थपूर्ण प्रतीत होती है । माता पिता का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करने हेतु बच्चे के अपने ऊपर गर्म दूध गिरा लेने की घटना बहुत बार कहानियों और लघु फिल्मों में इस्तेमाल की जा चुकी है।
भ्रष्ट व्यवस्था के अंदर कर्मनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार होना भी किसी अपराध से कम नहीं होता। ब्लैक होल कहानी इसी विषय के इर्द-गिर्द गढी गई है। कहानी स्पष्ट करती है कि सॅपूर्ण सरकारी तंत्र में व्याप्त हो चुके भ्रष्टाचार का रिमोट राजनीति के हाथ में है । कहानी जबरा की मार लेखक की अन्य श्रेष्ठ कहानियों की तरह कई प्रकार की मार झेल रहे किसानों की पीडा का सशक्त बयान है। कहानी का नायक विनायक एक निडर किसान है। राज्य के मुख्य सचिव का घनिष्ठ मित्र होने के बावजूद उसे अपनी निडरता और बेबाकी की कीमत पहले अफसरी भ्रष्टाचार का शिकार होकर एवं बाद में अपनी जान देकर चुकानी पडती है। केंटकी चिकन का स्वाद संग्रह में तीन कहानियाँ किसानों की अनकही पीडाओं को प्रभावी ढंग से मुखरित करती हैं। इन कहानियों में दुखों और चिंताओं के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्याओं के मुद्दे को भी उठाया गया है। मर्सी अपील कहानी तंत्र के हर विभाग में राजनेताओं की धमाचौकडी को सामने लाती है। शिक्षा जैसे संवेदनशील विभाग में मंत्री निलंबन और ट्रांसफर की धमकियाँ देकर कर्मचारियों और अफसरों से नैतिक- अनैतिक कार्य करवाते रहते हैं । भ्रष्ट व्यवस्था के शिकार ईमानदार कर्मचारी या तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं या फिर उन्हें दिमागी बीमार घोषित कर दिया जाता है। कहानी में देवीशंकर मौर्य एक ऐसा ही पात्र है जो विभागीय एवं राजनीतिक षडयंत्र का शिकार हो जाता है। मंत्री की धमकी के दबाव में अधिकारी यह जानते हुए भी कि मौर्य निर्दोष और ईमानदार शिक्षक है, मौर्य को निलंबित करने पर विवश हो जाता है। ब्लैक होल और मर्सीअपील कहानियाँ इसी विषय पर केंद्रित हैं।
सुनामी कहानी में सुनामी तूफान से हुए विनाश और जनहानि तथा एक अफसर की अधूरी असफल प्रेम कहानी को गडमड किया गया है। हो सकता है कि प्रियदर्शन मालवीय के पास इसके कोई सार्थक कारण हों । वैसे सतही तौर पर उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में आए तूफान की तुलना भौगोलिक तूफान से की है। डांस इंडिया डांस एक मार्मिक कहानी है। युवा मन के सपनों और महत्त्वाकांक्षाओं को किस तरह रौंद दिया जाता है, यह लेखक ने कहानी के युवा नायक नर्तक बिरजू के माध्यम से बखूबी बताया है। कहानी कसावट लिए हुए है। एक गरीब परिवार की आर्थिक विवशताओं के चलते एक ऊर्जावान कलाकार के समझौते के द्वारा लेखक पाठक को कई सवाल सौंपते हैं।
कहानी साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका भाषाई पक्ष बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। अनेक बार कहानी लेखक की परिकल्पना में तो परिपूर्ण होती है, किंतु भाषान्तरण के समय कहानी के कई सूक्ष्म महत्त्वपूर्ण मोड अव्यक्त रह जाते हैं। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि सम्प्रेषणीयता किसी भी कहानी की पहली कसौटी होती है। भाषा ही वह सेतु है जिसके माध्यम से भाव अभिव्यक्त होते हैं, इसलिए लेखक का भषा के प्रत्येक पक्ष पर पूर्णाधिकार होना ही चाहिए। भाषा के सशक्त होने का एक अर्थ यह भी है कि कथाकार जगलरी भी नहीं करे। केंटकी चिकन का स्वाद की कहानियों की भाषा परिपक्व और सधी हुई है। कहानियों की भाषा में आँचलिकता का प्रभाव, अवसर अनुसार लोकोक्तियों, मुहावरों, कहावतों और शेरो- शायरी का समावेश उन्हें न केवल स्वाभाविक बनाता है, बल्कि कथाकार के लेखकीय तजुर्बे को भी बयान करता है।
केंटकी चिकन का स्वाद संग्रह की कहानियाँ जीवन से सीधा सरोकार रखती हैं। इन कहानियों में मानवीयता को बचाने की जद्दोजहद प्रबलता से उभरती है। मनुष्य के प्रति मनुष्य की संवेदना का क्षरण लेखक की प्राथमिक चिंताओं में शामिल है। कथाकार- समालोचक अखिलेश इन कहानियों को लेखक का सामाजिक हस्तक्षेप मानते हुए कहते हैं कि उनकी कहानियाँ मनुष्य विरोधी शक्तियों का प्रत्याख्यान उपस्थित करती हैं।
ये कहानियाँ वर्तमान की परिस्थितियों का एक ऐसा कोलाज बनाती हैं जिसमें माटी के साथ क्षण- क्षण माटी होता किसान है, कॉरपोरेट कंपनियों की चक्की में पिसने को विवश युवा है, माँ-बाप की महत्त्वाकांक्षाओं के चलते अपने बचपन के आनंद और मासूमियत को खो चुके बच्चे हैं, तो हृदय में संवेदनाएँ होने के बावजूद बिकी हुई ग्लैमरस पत्रकारिता करने को लाचार पत्रकार हैं। नेताओं मंत्रियों के इशारों पर नाचने वाले अधिकारी हैं तो भ्रष्ट तंत्र के शिकार कुछ ईमानदार लोग भी हैं। अपने विभाग द्वारा सामाजिक- सार्वजनिक जीवन से सीधी संबद्धता के अनुभवों ने लेखक को ये कहानियाँ रचने में भरपूर सहायता की है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये कहानियाँ अपने समय और समकालीन समाज का प्रतिबिंब हैं, किंतु अनेक कहानियों में आया अनावश्यक वर्णन पठनीयता को प्रभावित करता है। कुछ कहानियों के शीर्षकों पर भी पुनर्विचार किया जा सकता था। कहानियों की विशेषता ये है कि विस्तृत होने के बावजूद इनमें आज की कहानियों जैसा बोझिल, बौद्धिक प्रपंच नहीं है। जीवन का यथार्थ होने के कारण कहानीकार अपने कर्म के प्रति अत्यंत ईमानदार हैं और वे कहानी को समाज की मोचें निकालने के लिए औजार की तरह प्रयुक्त करते हैं। कुल 158 पृष्ठों के संग्रह का मुद्रण स्वच्छ और त्रुटिरहित है। आवरण की साज-सज्जा और चित्र आकर्षक तथा अर्थपूर्ण है। निश्चित रूप से संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है।
पुस्तक : केंटकी चिकन का स्वाद
लेखक : प्रियदर्शन मालवीय
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि. नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2020
पृष्ठ : 158
मूल्य : 395/-
विधा : कहानी संग्रह