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भरत व्यास : अर्थ की लय

-ब्रजरतन जोशी
कब दो श्रेणियाँ बँट गईं नहीं मालूम। एक श्रेणी कवियों की, एक गीतकारों की। गीत लिखने की न्यूतम अर्हता कविता लिखना है। गीत लिख पाना साधना की चरम परिणति है। हर कविता की इच्छा अंततः गीत बन जाना है।
-अरुण कमल
भरत व्यास हिन्दी गीत साहित्य के उन गिने-चुने गीतकारों में अग्रणी है जिनका लिखा आत्म और विश्वचेतस के सुन्दर संयोग से हिन्दी गीत का भारतीय संस्करण कहे जाने योग्य है। उनके गीत केवल भावुकता, रूमानियत और संवेग की स्वर लहरियाँ ही नहीं हैं, बल्कि वे अर्थ की लय वाले गीतकारों में एक जगमगाती उपस्थिति हैं। वे केवल मनोरंजानार्थी गीत लिखने वालों में या कह लें केवल लोकप्रियता की धारा में बह जाने वाले गीतकार नहीं थे। उन्होंने अपने दमखम से ही अपनी धरती और अपना आकाश रचा है। वे अपनी मेहनत से इतिहास रचनेवाले सुधी व्यक्तित्व थे। कवि प्रदीप और भरत व्यास हिन्दी के उन गीतकारों में अग्रणी हैं जिन्होंने हिन्दी गीत की एक अलहदा पगडण्डी बनाई। इस पगडण्डी की खास बात यह थी कि जहाँ एक तरफ वे आवेग और आवेश पर सम्यक नियंत्रण साधे थे, वहीं दूसरी ओर बदलते समय के यथार्थ और कोमलता के साथ संगीत के दबाव से भी स्वयं को मुक्त रखकर आगे बढे थे। भरत व्यास ने आम बोलचाल की हिन्दी के गीत लिखकर अपार यश अर्जित किया। विचारधारा के खूँटे से मुक्त रहकर उन्होंने अपनी आत्मा की आवाज को महत्त्व दिया। इसलिए उनके लिखे गीत भारत की सरहदों के पार प्रार्थना के रूप में आज भी गाए जाते हैं। क्योंकि वे मनुष्य मात्र के आत्म की झाड पोछ करते हैं। राष्ट्रपिता बापू भी कहा करते थे कि प्रार्थनाएँ तो आत्मा की झाडू हैं। अपनी अंतर्वस्तु के कारण उनके गीत मंचीय गीतों की लोकप्रिय परम्परा से अलग एक भावक के गीत हैं। छन्द के बन्द से दूर उनके अक्षरों का सम्मुच्चय अर्थ के गहरे सागर में उतरता है और अपने पाठक/श्रोता के लिए अनुभव के चुने हुए मोती लेकर आता है। लोकप्रियता का मार्ग ऐसा चिकना और तीव्रगामी मार्ग है कि जिस पर प्रायः कवि का धैर्य जल्द ही जवाब दे जाता है। पर भरत व्यास का गीतकार अपने मूल से हटा नहीं, वरन् डटा रहा। वे अपनी भाषा की साम्र्थ्य पर भरोसा रखने वाले अन्वेषी थे। उनकी भाषा और शब्द चयन उनके संस्कारित मन से उपजा अन्तः संगीत है। इसलिए प्रायः अपने गीत की धुन वे स्वयं ही बनाते थे और गाते भी स्वयं ही थे। उनके गीतों में भारतीय परम्परा के मूल स्वरों की जातीय स्मृतियों का सहचर्य आसानी से दृष्टिगत किया जा सकता है। इस पर और अनुसंधान अपेक्षित है।
एक अच्छे और श्रेष्ठ कवि की पहचान यह भी होती है कि वह अपने सृजन से हमें अनुभव के निराले लोक की यात्रा करवाए। हम गौर करेंगे, तो पाएँगे कि उनके लिखे में कोई उद्दामता नहीं है, सांवेगिकता नहीं है वरन् उनके गीतों में एक खामोशी है यानी उनका रचनाकार स्वनिर्मित मौन का एक नया व्याकरण रचता है। तभी तो बम्बई के एक कवि सम्मेलन, जिसकी अध्यक्षता हिंदी के यशस्वी रचनाकार धर्मवीर भारती कर रहे थे, में जब भरत व्यास मंच पर अपने गीत सुनाने के लिए उठे, तो भारतीजी ने मंच से उनके परिचय में कहा कि भरत व्यास तो विनम्रतावश स्वयं को व्यास कहते हैं। ये तो हिन्दी गीत की परिधि हैं।
भरत व्यास का रचा इसकी साखी भरता है कि उनके आत्म और सृजन में कोई फर्क नहीं है वरन् एकत्व है। यही एकत्व ही उन्हें अमरत्व भी प्रदान करता है। उनकी भाषा में मौजूद स्वभाविकता से भी इसे आसानी से लक्षित किया जा सकता है।
उनके गीत अस्तित्व के विविध आयामें के बहुरंगी छटाओं का शब्दांकन हैं। इसलिए हम पाते हैं कि अनुभव परछाई की तरह उनकी रचनाओं से एकमेक है। उनके लिखे में वे स्वयं कम और उनका अनुभव, उनकी भाषा, जीवन के व्यापार, परिस्थितियाँ, परिवेश अधिक बोलता है। ऐसा जान पडता है कि उनका रचयिता किसी विराट सत्य के उद्यम में लगा अनुसंधित्सु है, जो अपनी अन्तर्यात्राओं में हमें एक सैलानी की तरह शामिल करता है और उन क्षणों में हमारे मन के अवसाद, धुँधलके और दागों को नष्ट कर एक उजाले से भर देता है। उम्मीद की वर्णमाला से शुरू होती उनकी सृजनयात्रा आशाओं को पार करती हुई भावनाओं के उस उन्नत शिखर पर पहुँचती है, जहाँ उनका रचयिता विविधता, समावेशीपन और सामूहिकता का एक विराट उद्यम रचता है। जिसके तले आज भी मानवता का उपवन लहलहा रहा है।
भरत व्यास हिन्दी के उन गीतकारों में थे जो पहले निर्देशक से कहानी, सीन आदि की भूमिका और सोच को भली-भाँति समझते और फिर सीन की माँग व अपने अनुभव के घोल से रचना का प्रणयन करते थे। वे दबाव या प्रलोभन में आकर लिखने वाले गीतकार नहीं थे। इसीलिए उनका रचा सदाबहार और कालजयी के भेद को अभेद में बदलता है। क्योंकि उनके गीत जीवन के दर्शन के साथ तत्कालीन समय में उपजी मोहभंग की परिस्थिति में निराशा के कुहासे को छाँटकर आशाओं का उजला संसार रचते हैं।
भरत व्यास कविता के विषय और गीत की परिस्थिति के सूक्ष्म अन्तर से वाकिफ थे। इसलिए गौर से देखेंगे, तो हम पाएँगे कि उनके रचे गीत (फिल्मी) सामाजिक परिदृश्य में अपनी सिचुएशन की सीमा लाँधकर भी लोककण्ठ का हार हो गए।
उनके विविधता भरे गीत संसार में प्रेम का सीधा-साधा मारग भी है तो लोरियाँ, ऐतिहासिक, पौराणिक चरित्रों पर गीत, विरहगीत, चुलबुले गीत, भजन और योरोपिय प्रभाव के गीत भी है। मात्रा में थोडा होने के बावजूद भी उनका गीत संसार शास्त्र और लोक दोनों ही दृष्टियों से विविधता का अनुठा संगम है। उन्होंने अपने समय की प्रचलित सभी धाराओं को आत्मसात करते हुए अपनी रचनात्मक यात्रा तय की वे हिन्दी के उन चुनिन्दा गीतकारों में भी अग्रणी है कि जिनकी शास्त्रीय संगीत पर जबरदस्त पकड थी। परिणामस्वरूप उन्होंने ऐसे गीत भी लिखे जिनके चार अन्तरों में चार भिन्न-भिन्न रागों को संयोजित किया गया।
हम देखते हैं कि अपनी रचनाओं में वे अपने प्रिय को कोसते नहीं है वरन् प्रश्न जरुर करते हैं। अधिकांशजन यह मानते हैं कि वे शुद्ध में यानी तत्सम शब्दावली में सृजन करने वाले गीतकार है, पर मैं जब उनके गीत साहित्य से गुरता हूँ, तो पाता हूँ कि वे जिस समय रचनाशील थे, उस समय के फिल्मी गीत साहित्य पर उर्दू-अरबी, फारसी, पारसी थिएटरके साथ यूरोपियन ओपेरा का प्रभाव भी था। इसके बरअक्स भरत व्यास का काव्य संसार उस काव्यभाषा का संसार हैं, जो भावों के साथ भाषाओं के संगम (खासतौर पर हिन्दी-उर्दू और राजस्थानी) से अपने रचे को आमजन में तो स्थापित करता ही है, साथ ही काव्य-भाषाओं के संगम का एक अनूठा उदाहरण हमारे सामने रखता है, जिस पर सघन अध्ययन की पर्याप्त जरूरत है।
हम देखते हैं कि हिन्दी काव्य क्षेत्र में लोक संवेदना का आग्रह सदैव ही रहा है, फिर भी जो भावात्मक, रागात्मकता भरत व्यास, प्रदीप और इसी धारा के अन्य गीतकारों के गीतों में थी, उसकी अभिव्यक्ति के शिखर को पाना अभी शेष है। भरत व्यास चालीस के दशक की उन साहित्यिक प्रतिभाओं में अग्रणी थे जिन्होंने फिल्मी दुनिया की राह पकडी। पर इस राह में उनकी साहित्यिकता पीछे नहीं छूटी। उनके गीत संसार में काव्यात्मकता और भावनात्मकता दोनों ही थीं। इसलिए वे हिन्दी फिल्म गीत लेखन के स्वर्णिम काल में अपनी तरह के विरल नायक के रूप में समादरित हुए। उनके लिखे को सुर सम्राट पं. जसराज ने भी अपने प्रारंभिक दिनों में गाया, जो बहुतश्रत भी हुआ। उनका लिखा हमें आज भी किसी निर्झर की तरह ताजा और साफ होने के अनुभव से सम्पन्न करता है। उनके गीत सरलता के साथ गहराई और भाव के स्तर पर परिस्थिति के, धुन के मीटर पर पर्याप्त खरे उतरते हैं। यही कारण रहा कि वे आज भी हिन्दी फिल्मी गीत के स्वर्णिम इतिहास के अनूठे हस्ताक्षर के रूप में याद किए जाते हैं और किए भी जाते रहेंगे।
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अंक के लिए सामग्री जुटाने में पं. भरत व्यास के भतीजे संगीत प्रेमी मनमोहन व्यास, श्रीमती यामिनी-अजय जोशी, श्री एम.डी.सोनी, संजीव तँवर के साथ मेरे अग्रज श्री नारायणदास पुरोहित का निश्छल सहयोग मिला। इन सबका हृदय से आभारी हूँ। अल्पसमय में मेरे न्यौते पर लिखने के लिए श्री राजेन्द्र बोडा, श्री मालचन्द तिवाडी और महेन्द्र लालस के सहयोग हेतु भी आभार प्रकट करता हूँ। अंक में शेष कॉलम यथावत हैं। अंक पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।
करोना की तीसरी लहर का आगमन घोषित किया जा रहा है। अतः आप सबसे आग्रह है कि आप अपना खूब ख्याल रखते हुए, कोविड अनुरूप व्यवहार एवं राजकीय निर्देशों की पालन करें।
नववर्ष की अशेष शुभकामनाओं के साथ-
- ब्रजरतन जोशी