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कमलेश्वर की स्मृतियाँ

प्रभात रंजन
कमलेश्वर मेरे बचपन के तो नहीं लेकिन किशोर जीवन के हीरो थे। कारण यह था कि मेरे घनघोर पढाकू गिरींद्र चाचा और मेरे सर मदन मोहन झा कमलेश्वर के घनघोर प्रशंसक थे। तब मैं बिहार के सुदूर कस्बे सीतामढी के पास एक गाँव में रहता था। ये दोनों ही मेरे लिए साहित्य के आरम्भिक खिडकी.दरवाजे थे। चाचा गाँव में रहते थे और मदन मोहन झा कॉलेज में पोलिटिकल साइंस पढाते थे। गिरींद्र चाचा ने प्रेमचंद के बाद जिस दूसरे कथाकार की कहानियाँ खोज-खोज कर पढने के लिए कहीं वह कमलेश्वर थे।
चाचा के बारे में पहले ही बता दूँ कि वे लेखक या उस तरह से साहित्यिक नहीं थे। लेकिन वे रेलवे में नौकरी करते थे और अक्सर ट्रेन में रहते थे। बाद में उन्होंने रेलवे की नौकरी छोड दी और गाँव में रहने लगे। लेकिन पढने की उनकी आदत बरकरार रही। वे कहते थे कि कमलेश्वर की एक कहानी राजा निरबंसिया पढ लोगे तो कहानी में गाँव के जीवन, गाँव की कहानियों का शहर के जीवन के साथ जिस तरह से तालमेल बिठाया जाता है। वह सीखने लायक है। यही नहीं वे एक बात और कहते थे कि प्रेमचंद के बाद जिस दूसरे कहानीकार की कहानियों को पढकर कहानी लिखना सीखा जा सकता है वह कमलेश्वर हैं। वैसे वे एक तीसरे लेखक निर्मल वर्मा का भी नाम लेते थे। लेकिन कहते थे कि वह थोडा हाई-फाई लेखक है। अभी नहीं समझ आएगा। बाद में पढोगे तो बुझाएगा।
चाचा की बातों को सुन-सुन कर कमलेश्वर से परिचय हुआ। लेकिन सच बताऊँ तो प्यार उनके बारे में मदनमोहन झा सर की बातों को सुन-सुन कर हुआ। उनकी बातों से कमलेश्वर की एक अलग ही सम्मोहक छवि उभर कई आई। उनके कमलेश्वर सारिका के संपादक कमलेश्वर थे। एक बार जब उनके गाँव गया, तो सारिका की अनेक फाइलें उनके घर में देखी-पढी जो उन्होंने सहेज कर रखी हुई थी। कभी इस बात को लेकर शोध भी होना चाहिए कि साहित्य को गाँवों-कस्बों तक पहुँचाने में सारिका पत्रिका का क्या योगदान था।
संयोग से उन दिनों मैं भी अपने चाचा और पिता के कारण हिंदी की तमाम पत्रिकाएँ पढ पाता था, लेकिन मैं उन दिनों गंगा नामक पत्रिका का बहुत बडा पाठक और प्रशंसक था। मुझे अच्छी तरह याद है कि उस पत्रिका में फैजाबाद के एक स्थानीय पत्रकार का धारावाहिक स्तम्भ छपता था वे नेताजी नहीं तो कौन थे, जिसके कारण मेरे परिवार और आसपास रहने वाले अनेक लोग गंगा के अगले अंक का इंतजार करते रहते थे। बता दूँ कि यह स्तम्भ गुमनामी बाबा और नेताजी सुभाषचंद्र बोस को लेकर था। जिस गुमनामी बाबा को लेकर बाद में बडे-बडे दावे किए गए, बडी बडी किताबें लिखी गई उस गुमनामी बाबा के बारे में विस्तार से पहली बार गंगा में ही प्रकाशित हुआ था। जिसके संपादक कमलेश्वर थे।
उन दिनों उनके संपादक रूप से बहुत अधिक प्रभावित था। गंगा में हरिशंकर परसाई, राही मासूम रजा के स्तम्भ प्रकाशित होते थे। वैसे तो उस पत्रिका में अरूण प्रकाश की कहानी भैया एक्सप्रेस जैसी अस्सी के दशक की सबसे लोकप्रिय कहानियों में एक कहानी का प्रकाशन गंगा में ही हुआ था, लेकिन गंगा उस तरह से कहानी की पत्रिका नहीं थी जिस तरह से सारिका थी, जिसका उन्होंने संपादन किया था। मैं यह कहना चाहता हूँ कि कमलेश्वर इसलिए संपादक के रूप में मुझे बहुत आकर्षित करते रहे क्योंकि वे समय के साथ बदलना जानते थे और हिंदी पत्रकारिता में बौद्धिक शैली में इंफोटेनमेंट प्रस्तुत करने का काम सबसे पहले कमलेश्वर ने ही किया- गंगा पत्रिका के माध्यम से। प्रसंगवश, यह अकारण नहीं था कि हिंदी पत्रकारिता में नई शैली को लेकर आने वाले अखबार दैनिक भास्कर के भी पहले संपादक वही थे। कहने का मतलब यह है कि वे ऐसे संपादक थे जो समय को भाँपना जानते थे और उसके अनुरूप काम भी करते थे। उन दिनों याद है जब उनके घर जाता था तो वे बताते थे कि वे मोडेम पर एडिशन देखकर ओके कर देते हैं। उन दिनों इंटरनेट आम नहीं था, लेकिन वे उस माध्यम का उपयोग अपने काम के लिए करते थे।
जब बात संपादक कमलेश्वर की चल रही है, तो मुझे उनसे अपनी दूसरी मुलाकात की याद आ रही है। उन दिनों वे दैनिक जागरण के संपादक थे और मैं उनसे नॉएडा के दफ्तर में मिलने गया थाए जिसमें उनका एक विशाल ग्लास हाउस जैसा दफ्तर था। उनसे मिलने जाने का प्रसंग यह नहीं था कि मैं किसी युवा लेखक के रूप में कुछ प्रकाशित करने का आग्रह लेकर गया था। मैं उनसे एक राजनीतिक कारण से मिलने गया था। उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के नेतृत्व में मण्डल कमीशन विरोधी आंदोलन चल रहा था। उन दिनों वे भावुकतावश या उस आंदोलन के समर्थन में थे। मैं उनकी तरफ से मीडिया के काम में सहयोग कर रहा था। अप्रत्याशित रूप से दिल्ली की मीडिया में उस आंदोलन को बहुत समर्थन मिल रहा था।
हिंदी में दैनिक जागरण अकेला ऐसा प्रमुख अखबार था जो उस आंदोलन के समर्थन में कवर पर संपादक यानी कमलेश्वरजी के हस्ताक्षर सहित संपादकीय प्रकाशित करता था। उनके संपादकीयों से प्रभावित होकर मैं उनसे इस आग्रह के साथ मिलने गया था कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय के क्रांति चौक पर युवाओं को आकर संबोधित करें।
उन्होंने हाँ तो कह दिया, लेकिन उस दिन आए नहीं बाकी कई बडे नाम आए, लेकिन कमलेश्वरजी नहीं आए। इस बात पर मैंने बहुत विचार किया, तो मुझे समझ आया कि वे संपादक के रूप में अपने अखबार के प्रसार के बारे में सोचते थे, लेकिन लेखक के रूप में वे इन सबसे अलग थे। उनका लेखक रूप अलग था। मण्डल कमीशन विरोधी आंदोलन एक सामंती मानसिकता का आंदोलन था। बाद में यह बात मुझे समझ आ गई थी और मैं उससे अलग हो गया। लेकिन उस दिन कमलेश्वर जी ने नहीं आकर यह जता दिया था कि वे संपादक के रूप में हमारे आंदोलन के साथ थे क्योंकि उसको लेकर जनता में बहुत उत्तेजना थी, लेकिन लेखक के रूप में वे इस तरह के सामंती आंदोलन समर्थन नहीं करते थे।
बहरहाल, जब दूसरी मुलाकात का जिक्र आ गया है, तो पहली मुलाकात की बात भी आनी चाहिए। मैं तब हिंदू कॉलेज का छात्र था। और उसकी पत्रिका का संपादक भी था। उसके संपादक के रूप में मैंने उनको फोन किया कि आपका इंटरव्यू करना है, तो उन्होंने तत्काल समय दे दिया। दिल्ली के ग्रीन पार्क में उपहार सिनेमा के पीछे एक फ्लैट में कमलेश्वरजी से मैं अपने सहपाठी विश्वास गर्ग के साथ मिलने बल्कि कहना चाहिए कि इंटरव्यू लेने के लिए उनके घर गया था। मुझे आज भी याद है कि जिस कमरे में हम लोगों ने उनके इंटरव्यू को रेकार्ड किया था वह एक छोटा-सा कमरा था जो शायद उनका स्टडी रूम रहा हो, उसमें बहुत सारे वीडियो कैसेट रखे हुए थे, किताब थी या हैं मुझे याद नहीं। उस दिन उन्होंने बताया था कि वे मुम्बई की फिल्मी दुनिया छोडकर दिल्ली में रहने के लिए आ गए थे और अब वे सिर्फ साहित्य लिखना चाहते थे।
उन्होंने कहा था कि असली लेखन साहित्यिक लेखन ही होता है, फिल्मी लेखन से कुछ अधिक आय हो जाती है, लेकिन उससे कुछ हासिल नहीं होता। ये अलग बात है कि उसी साल दूरदर्शन के लिए उन्होंने चन्द्रकांता जैसा मेगा धारावाहिक लिखा और सावनकुमार टाक की फिल्म सनम हरजाई भी लिखी। जिसके बारे में बहुत बाद में एक बार पूछे जाने पर उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया था कि उस फिल्म में उन्होंने संवाद लेखन किया था। सावन कुमार के लिए वे पहले भी सौतन जैसी फिल्म कर चुके थे और उन्होंने सनम हरजाई की शूटिंग के लिए संवाद लेखक के रूप में मुझे भी न्यूजीलैण्ड ले जाने का वादा किया था। प्रसंगवश, उनकी प्रकाशित डायरी में न्यूजीलैंड के दौरान लिखी गई डायरी की टीपें भी शामिल हैं।
बात फिल्मों की हो रही तो मैं यह बताता चलूँ कि जिस दौरान में मैं इरोस गार्डेन, सूरजकुण्ड रोड वाले उनके घर मिलने के लिए जाता रहा उस दौरान उन्होंने दो मेगा धारावाहिक लिखे, चंद्रकांता और युग। वे अक्सर स्क्रीन राइटिंग के बारे में भी बताते रहते थे। जैसे एक बडी गूढ बात समझाई थी जो संवाद लेखक की भूमिका को लेकर थी। अगर आप ध्यान देंगे, तो पाएँगे कि कमलेश्वर और राही मासूम रजा ने संवाद लेखक के रूप में अधिक काम किया है, पूरी तरह से पटकथाएँ कम लिखी हैं। इसका भी एक कारण उन्होंने समझाया जो बहुत व्यावहारिक था। उन्होंने बताया कि संवाद लेखन सिनेमा में लेखन का अंतिम चरण होता है। जो अक्सर फिल्म की शूटिंग के समय होता है। पटकथा लेखक का भुगतान फिल्म नहीं बनने के कारण रुक भी सकता था, लेकिन संवाद लेखक हमेशा भुगतान मिल जाता है क्योंकि वह काम फिल्म के अंतिम चरण में होता है।
जब वे चंद्रकांता लिख रहे थे तो उन्होंने मुझे एक दिन यह समझाया था कि धारावाहिक लिखते हुए पर्दे पर टाइम को समझना बहुत जरूरी होता है। चंद्रकांता की शूटिंग रोजाना होती थी। कई बार वे फैक्स से एक एक सीन लिखकर भेजते जाते थे और मुंबई में उसकी शूटिंग होती थी। वे बताते थे कि समय इतना कम होता था कि उसमें किसी तरह के संशोधन की गुंजाइश नहीं होती थी इसलिए वे सीन लिखते समय उस समय का भी ध्यान रखते थे जिस दौरान घोडा हिनहिनाता था या घोडे को दौडते हुए दिखाया जाता था। वे कहते थे कि उनके लिखे सीन कभी एकदम निश्चित समय में पूरे हो जाते थे।
उनसे जो एक चीज सीखने की थी वह यह कि कभी उनको लिखने के कारण तनाव में आते नहीं देखा था। वे पूर्णकालिक लेखक थे। लेखन को भी जीवन की अन्य गतिविधियों की तरह बहुत सहजता से लेते थे। बाद में जब मेरी समझदारी बढी और थोडे बहुत डेडलाइन वाले काम किए, तो समझ में आया कि समय पर काम पूरा करने का दबाव किस हद तक होता है। जबकि वे उन दिनों रोजाना एक एपिसोड लिख लेते थे। उसी दौरान हम लोगों को मिलने का समय भी दे देते थे। चाय पिलाते, लिखते-लिखते थोडी बहुत बातचीत करते और विदा कर देते। ऐसा कभी नहीं लगने देते थे कि वे कोई बडा काम कर रहे थे और मेरे आने से उनके काम में किसी तरह की बाधा आ गई हो।
उनको लेकर मेरे लिखे में फिल्म और टीवी के प्रसंग अधिक इसलिए आ रहे हैं क्योंकि उस दौर में मैं उनके लेखन के इस रूप से सम्मोहित था।
जबकि मुझसे वे अधिकतर साहित्यिक बातचीत ही किया करते थे। मुझसे अक्सर कोई चर्चित उपन्यास या कोई अन्य किताब मँगवाते थे, जैसे मुझे याद आ रहा है कि उन दिनों मुकुल केसवन के उपन्यास लुकिंग थ्रू ग्लास की बडी चर्चा थी और एक बार जब मैंने उनको फोन करके मिलने का समय माँगा था तो उन्होंने कहा था कि वह उपन्यास मिले, तो लेते आना। मैं लेकर गया था। मैं उन दिनों उत्तर आधुनिकता को लेकर शोध कर रहा था और वे मुझसे अक्सर उत्तर आधुनिकता को लेकर अंग्रेजी में किताबों की माँग करते रहते थे। साहित्य संबंधी उत्तर आधुनिक विचारों को लेकर, भाषा को लेकर वे खूब किताबें पढते थे। बाद में जब उनका उपन्यास आया कितने पाकिस्तान तो उसमें उन्होंने हिंदी उपन्यास का एक नया ही ढाँचा दिया जो उस तरह से कथात्मक है ही नहीं जिस तरह से उपन्यास लिखे जा रहे थे। इक्कीसवीं शताब्दी में हिंदी के सबसे अधिक पढे गए इस उपन्यास को ने दौर के पाठकों ने खूब अपनाया।
कईं बार वे अपनी कहानियों के बारे में भी बात करते थे। उन्होंने एक कहानी लिखी थी तुम्हारा शरीर मुझे पाप के लिए पुकारता है, इस कहानी को लेकर वे बहुत उत्साहित रहते थे। कहते एक अजब-सी कहानी लिख गया हूँ। उस समय उस कहानी को सच में मैं कुछ खास समझ नहीं पाया था, लेकिन बहुत बाद में जब इम्तियाज अली की फिल्म लव आजकल में जब ब्रेक अप पार्टी का सीन आया, तो तुम्हारा शरीर मुझे पाप के लिए पुकारता है कहानी की याद आई। इस फिल्म के आने के करीब दस साल पहले कमलेश्वर ने ब्रेक अप पार्टी पर कहानी लिखी थी। इस कहानी में एक ब्यूरोक्रेट दम्पति ब्रेक अप पार्टी पर लोगों को आमंत्रित करता है। मेरे कहने का मतलब यह है कि उन्होंने कहानी-उपन्यास के बने बनाए ढाँचे को तोडने का साहस भी किया।
कईं बार मेरे लिखे पर भी सलाह देते थे। जैसे एक बार मैंने एक कहानी लिखी और उनको दिखाने के लिए ले गया। हाथ के लिखे 19 पेज थे। उन्होंने एक बार भी यह नहीं कहा कि मेरे पास समय नहीं है बाद में पढकर बताऊँगा। उन्होंने कहानी पढी और एक बहुत जरूरी सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि कहानी में सब कुछ है परिवेश नहीं है। कहानी में परिवेश डालो, तभी कहानी जीवंत हो पाएगी। उनके ऐसा कहने के पहले मेरा इस तरफ ध्यान ही नहीं गया था कि कहानी में परिवेश का कितना महत्त्व होता है। लगे हाथ उन्होंने यह सुझाव भी दे डाला कि कोर्स में तो तुम लोग फणीश्वरनाथ रेणु को पढते ही होगे। उनको जरा कोर्स से अलग हटकर भी पढो। परिवेश क्या होता है सीख जाओगे। उस कहानी को मैंने दुबारा लिखा और उसको मार्कण्डेय ने कथा नामक पत्रिका में प्रकाशित किया और मेरे पहले कहानी संग्रह जानकी पुल में वह कहानी लापता शीर्षक से मौजूद है।
उनकी जो सबसे बडी बात मुझे याद आती है वह यह कि वे मेरे जैसे युवा को भी कभी ऐसा महसूस नहीं होने देते थे कि वे हमसे बडे थे और हम बहुत छोटे। बतौर लेखक वे हमेशा बराबरी का मान सबको देते थे। खासकर अपने लेखन पर सलाह लेने में वे कभी यह नहीं सोचते थे कि वे एक बडे लेखक हैं और उनको किसी युवा लेखक से क्या सलाह माँगना? कितने पाकिस्तान के अंश वे पढने के लिए देते थे और बडी बेचैनी से मेरी प्रतिक्रिया भाँपने की कोशिश करते थे, चाहे मैं कह कुछ भी रहा होऊँ। डनहिल सिगरेट के धुएँ के पीछे चश्मे से झाँकती उनकी आँखें बहुत पनियल लगती थीं। उससे वे भाँप लेते थे।
वे युवाओं की मदद भी करते थे तो इस तरह से करते थे कि सामने वाले को समझ में भी न आए। उसके अहं को किसी तरह से ठेस न लगाने पाए। एक बार मैं उनके पास गया, तो मुझे देखकर उन्होंने भाँप लिया कि मैं किसी तरह की कठिनाई में हूँ, तो उन्होंने बातचीत करते-करते मुझे पाँच हजार का एक चेक दिया जो उस समय के हिसाब से अच्छी राशि थी और कहा कि आने वाले समय में मैं तुमको अपने किसी प्रोजेक्ट से जोडना चाहता हूँ। ये उसका एडवांस रख लो। मुझे भी उस समय प्रोजेक्ट से अधिक उस समय एडवांस की जरूरत थी। मैंने चेक रख लिया। उसके बाद न कभी उन्होंने किसी प्रोजेक्ट की बात की न मैंने राशि लौटाने के बारे में सोचा।

कमलेश्वर अपनी पीढी के उन कुछ लेखकों में थे जिन्होंने अपने बाद की पीढियों से लगातार संफ बनाए रखा और अपने समय को पहचानने में कभी गलती नहीं की। उनको मैंने खुद कभी कम्प्यूटर या किसी तरह की तकनीक का उपयोग करते नहीं देखा लेकिन बाद के दिनों में वे लगातार तकनीक और उसके बढते प्रभाव और उसमें हिंदी की भूमिका के बारे में बात करते थे।
कमलेश्वर हिंदी से जुडी हर विधा में सिद्धहस्त पेशेवर थे और किसी काम को छोटा नहीं समझते थे। बाद के दिनों में उन्होंने पाउलो कोएल्हो के उपन्यास अल्केमिस्ट का अनुवाद किया था। उन दिनों वे अनुवाद के महत्त्व पर बात करने लगे थे। यह बताते कि विश्व साहित्य से किस तरह अनुवाद ने हिंदी को जोडा और आने वाले समय में अनुवाद की भूमिका कितनी बढने वाली थी।
कमलेश्वरजी के संफ में जो आता था कुछ न कुछ सीख जाता था मैंने भी बहुत कुछ सीखा। सबसे बडी यह बात कि लेखक को हमेशा विनम्र होना चाहिए।
सम्फ - ए-1॰2, नागार्जुन अपार्टमेन्टस,
मयूर कुँज, नोएडा चेक पोस्ट के पास,
दिल्ली-11॰॰96

भरत व्यास ः सिने जगत में कितने रूप, कितने रंग
गीतकार ः भरत व्यास
पहली फिल्म दुहाई (1943) सहित हिंदी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी, हरियाणवी की
2॰॰ से *यादा फिल्में

पार्श्व गायन ः भरत व्यास
प्रेम संगीत (1943), मन की जीत (1944), गुलामी (1945), चंद्रलेखा (1948), नवरंग (1959)

लेखन ः कथा/पटकथा/संवाद ः भरत व्यास
प्रेम संगीत, स्कूल मास्टर (1943), पृथ्वीराज संयुक्ता (1946), रंगीला राजस्थान (1949),
अँधेर नगरी चौपट राजा (1955), ढोला मारू (1956), लव कुश (1974),
म्हारी प्यारी चनणा (राजस्थानी/1983),
हमसे मिले तुम (अपारित)
स्वरकार/संगीतकार ः भरत व्यास
स्कूल मास्टर (1943), रंगीला राजस्थान (1949)
अभिनय ः भरत व्यास
गुलामी (1945), पृथ्वीराज संयुक्ता (1946)

निर्देशन ः भरत व्यास
रंगीला राजस्थान (1949)

संयोजन - मुरली