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मेरे भाई भरतजी

बी.एम.व्यास
फिल्मी गीतों के जरिये जनता में देशभक्ति का ज*बा जगाने तथा राष्ट्रभाषा हिंदी का परचम लहराने में जो दो कवि अग्रणी और सर्वोपरि रहे, उनमें से एक रचनाकार राजस्थान ने दिया- पं. भरत व्यास। वीर रस के विशिष्ट गायक, वहीं श्रृंगार रस के नवरंगी नायक। प्रणय, विरह, वेदना, दर्शन, अध्यात्म, आदर्श, शौर्य, देशप्रेम, देशकाल, हमारे जीवन, समाज और संस्कृति के हर रंग और रस को उन्होंने अपने शब्दों में पिरोया, तो फिल्मी रचनाओं में राजस्थान की माटी की महक भरी। उनकी फिल्मी रचना ऐ मालिक तेरे बंदे हम... प्रार्थना के रूप में आज भी गाई जा रही है। किसी कलमकार का शायद यह सबसे अहम सम्मान है। मरुधरा के इस महान गीतकार के जीवन, संघर्ष और सृजन के अंतरंग संस्मरण उनके अनुज, वरिष्ठ अभिनेता (दिवंगत) बी.एम. व्यास की जुबानी-
भरतजी मुझसे ढाई साल बडे थे। उनका जन्म छह जनवरी 1918 को हमारे ननिहाल बीकानेर में हुआ था। उनसे बडे भाई पं. जनार्दनजी हुए और 22 अक्टूबर 1920 को मेरा जन्म हुआ। मूल रूप से हम चूरू के हैं। पण्डित परिवार था, पिताजी चूरू में वैद्य थे। मैं जब पाँच साल का था, तब हमारे माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। संयुक्त परिवार था, इसलिए हम भाइयों का भरण-पोषण हो जाता था। हमारे चाचा गौकरणजी ने भरतजी को इंग्लिश में पढाई का मौका दिया, जो स्कूल में हैडमास्टर थे। भरतजी इंग्लिश स्कूल में पढते थे और मैं संस्कृत विद्यालय में। गिरने से चाचाजी का एक पाँव छोटा रह गया था, इस कारण उनका विवाह भी नहीं हुआ था। वे भरतजी को अपनी संतान जैसा प्यार करते थे। भरतजी बचपन में मजाकिया थे। हम सब उन्हें भत्ता कहते थे और बडे लोग उन्हें भत्तिया।
पढाई के साथ-साथ भरतजी में कुदरतन संगीत कला और चित्रकारी की समझ आने लगी। उन्हें फोटोग्राफी का भी शौक था। बीकानेर में काले-गोरे विषय पर हुई स्कूली डिबेट में काले रंग की महत्ता बखान करके भरतजी ने पदक जीता था। पिताजी ने चूरू में सनातन धर्मसभा कायम की थी, जहाँ हर हफ्ते भाषण और भजन होते थे। भरतजी ने वहाँ रखे हारमोनियम से अपने आप गाना-बजाना सीख लिया।
भरतजी में कवित्व कैसे जागा? इसका एक रोचक वाकया है। हमारे माता-पिता नहीं थे, पर दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची सब थे। संयुक्त परिवार में होने से जब सबके कपडे सिलते थे, हमारे भी सिल जाते थे। मोची सबके लिए जूते-मोजडी लाता, तो हमारे भी आ जाते थे। पर वर्षगाँठ हमारी चाची अपने बेटे की अपने कमरे में मनाती थी। मैं और भरतजी बाहर खडे देखते रहते थे। मेरी आँखों में आँसू आ जाते थे कि माँ होती, तो हमारी भी वर्षगाँठ मनाती। एक दिन भरतजी से रहा नहीं गया और बोल उठे- ल्यो बरसगाँठ आई फेरूं, मावडली के मन हर्ष भयो / बेटाजी बैठ बिचार करे, एक बरस गाँठ सूं और गयो। इसके बाद तो उन्होंने केसरिया पगडी बनी रहे, मरुधरा रही उर्वरा धरा और मारवाड का ऊँट सुजान जैसी कई कविताएँ लिखीं और कवि सम्मेलनों में वाहवाही लूटी। भरतजी की शादी 17-18 साल की उम्र में ही हो गई थी।
चूरू से मैट्रिक करने के बाद भरतजी कलकत्ता चले गए और हॉस्टल में रहकर बी.कॉम. की पढाई करने लगे। तब वे ट्यूशन करके अपना खर्च निकालते थे। उसी दौरान एक म्यूजिक कम्पनी के लिए मारवाडी और राष्ट्रीय गीत लिखकर भी कुछ रुपए प्राप्त कर लेते थे। उन दिनों उनका लिखा यह देशभक्ति गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ था- आओ वीरों हिलमिल गाएँ वंदे मातरम...। उसी दौर में एक गाना गवाने के लिए उन्होंने मुझे कराची से कलकत्ता बुला लिया था।
राजस्थानी भाषा में संवाद और गीतों के साथ रामू चनणा नाटक भरतजी ने एक रात में लिख दिया था। यह नाटक खूब हिट हुआ। तब भरतजी दूसरा नाटक ढोला मरवण लिखने लगे, तभी जापान ने जंग का एलान कर दिया। कलकत्ता से मारवाडी भागने लगे। लाचार होकर, कलाकारों को एक महीने की तनखा देकर ऑफिस बंद करना पडा। अब न भरतजी के पास पैसे थे, न ही मेरे पास। जैसे-तैसे बीकानेर लौट आए और बडे भाई जनार्दनजी की सलाह पर व्यास ब्रदर्स के तहत मिलकर तीनों भाइयों ने रतन बिहारी रेस्टोरेंट खोला। दिल्ली से हलवाई बुलाया। भरतजी को गल्ले पर बैठाया। कभी-कभी तो हम दोनों को झूठे प्लेट भी उठाने पडते थे।
भरतजी के एक फैन, सेठ रेखचंद परसिया बाद में उन्हें बम्बई ले गए, जहाँ सेठजी के जरिए वी.एम. व्यास की फिल्म दुहाई में गाने लिखने का पहला मौका मिला। सेठजी पूना के शालीमार स्टूडियो के मालिक डब्ल्यू.जेड. अहमद को फायनेंस करते थे, भरतजी को उन्होंने वहाँ गीत लिखने के लिए रखवा दिया। वहाँ पहली फिल्म थी- प्रेम संगीत। जोश मलीहाबादी, रामानंद सागर, भारत भूषण और चंद्रशेखर जैसी हस्तियाँ भी तब इसी कंपनी में थीं। मन की जीत में भरतजी का लिखा और गाया गीत छुप-छुप कर मत देखो जी भँवरजी... काफी हिट हुआ। गुलामी में भरतजी ने हीरोइन के पिता और पृथ्वीराज संयुक्ता में चन्दबरदाई की भूमिका की थी। डब्ल्यू.जेड. अहमद भरतजी के काम से बहुत खुश थे। उन्होंने ही भरतजी को रामू चनणा नाटक पर मारवाडी में फिल्म रंगीला राजस्थान बनाने का मौका दिया था। बाद में अहमद पाकिस्तान चले गए और भरतजी बम्बई आ गए। उस समय मैं पृथ्वी थिएटर में 75 रुपए तनख्वाह पर काम करता था, जबकि भरतजी को शालीमार में 1500 रुपए मासिक मिलते थे। उसी दौरान हम तीनों भाइयों के परिवार को भरतजी ने बम्बई बुला लिया था। तब हम सब कालबादेवी के एक कमरे में रहते थे। भरतजी के पूना से बम्बई आने पर मुफलिसी की हालत थी। उनकी धोती फट गई थी, खाना भी इधर-उधर खा लेते थे। मुफलिसी के उसी दौर में किशोर साहू से काम माँगने वे दादर से चैंबूर तक पैदल गए। वहाँ फिल्म सावन आया रे में गीत लिखने का मौका मिला। इस फिल्म का नहीं फरियाद करते हम... गीत हिट हुआ और धीरे-धीरे फिल्में मिलती गईं।
वे महान कवि थे। मेरा सौभाग्य ही था, जो भगवान ने मुझे उनके छोटे भाई के रूप में भेजा। मैं उनके प्यार को कभी भूल नहीं सकता। उम्र के 65वें वर्ष में लीवर खराब होने से 1982 में चार जुलाई को वे काल के गाल में समा गए। छह महीने बाद उनकी पत्नी चल बसी और बेटा पिछले साल (2007 में) चल बसा। अब तो भरत भवन है, एक पोता है, और हैं उनकी यादें!
तू लौट के आजा मेरे मीत,
तुझे तेरे गीत बुलाते हैं।
* यादगार फिल्मी गीत
अब होवेगा ब्याह तुम्हारा... (दुहाई), छुप छुप कर मत देखो जी भँवरजी...(मन की जीत), साथीडा रामू रे..., मार नजर तडपावे...(रंगीला राजस्थान), जगमग जगमग करता चाँद पूनम का प्यारा निकला..., न तुम आए न नींद आई तुम्हारी याद ही आई...(रिमझिम), नहीं फरियाद करते हम...(सावन आया रे), मोरी अटरिया पे कागा बोले...(आँखें), गोरे गोरे हाथों में मेहंदी रचाके..., चली राधे रानी...(परिणीता), अम्बे तू है जगदम्बे काली... (नवरात्रि), दौलत के झूठे नशे में हो चूर...(ऊँची हवेली), बडे प्यार से मिलना सबसे दुनिया में इन्सान रे...(सती अनसूया), ये कहानी है दीये की...(तूफान और दीया), जरा सामने तो आओ छलिए...(जनम जनम के फेरे), जय जय राजस्थान...(अमरसिंह राठौड), ऐ मालिक तेरे बंदे हम...(दो आँखें बारह हाथ), कली इक तुमसे पूछूँ बात...(साक्षी गोपाल), चाहे पास हो चाहे दूर हो... (सम्राट चन्द्रगुप्त), आधा है चन्द्रमा रात आधी..., ये माटी सभी की कहानी कहेगी..., तुम पश्चिम हो हम पूरब हैं..., तू छुपी है कहाँ...(नवरंग), कहू-कुहू बोले कोयलिया...(सुवर्ण सुन्दरी), जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है...(सम्राट पृथ्वीराज चौहान), तेरे सुर और मेरे गीत..., कह दो कोई ना करे यहाँ प्यार..., दिल का खिलौना हाय टूट गया...(गूँज उठी शहनाई), नैना है जादू भरे...(बेदर्द जमाना क्या जाने), आ लौट के आजा मेरे मीत..., उड जा भँवर..., इतिहास अगर लिखना चाहो...(रानी रूपमती), बुद्धम् शरणम् गच्छामि... (अँगुलिमाल), उन पर कौन करे जी विश्वास...(कवि कालिदास), नैन का चैन चुराकर ले गई...(चंद्रमुखी), थानै काजळियो बणाल्यूं..., कौन इसे कहता उजाड मरुधरा रही उर्वरा धरा...(वीर दुर्गादास), पिया कैसे मिलूं तुमसे..., हाँ दीवाना हूँ मैं...(सारंगा), ओ पवन वेग से उडने वाले घोडे..., केसरिया पगडी बनी रहे..., साँझ हो गई प्रभु तुम ही प्रकाश दो...(जय चित्तौड), सबको प्यार की प्यास...(प्यार की प्यास), ओ निर्दयी प्रीतम...(स्त्री), अपने पिया की मैं तो बनी रे जोगनिया..., सबको नाच नचाता...(कण कण में भगवान), बादलो बरसो नयन की कोर से..., सन सनन सन जा रे ओ पवन...(संपूर्ण रामायण), तुम गगन के चन्द्रमा हो...(सती सावित्री), ज्योत से ज्योत जगाते चलो..., मेरे लाडलो तुम फूलो फलो...(संत ज्ञानेश्वर), ये कौन चित्रकार है...(बूँद जो बन गई मोती), सुन ले बापू ये पैगाम...(बालक), पिन्जरा सो पिंजरा...(पिन्जरा), आदमी उसी का नाम है...(छोटा बाप), प्रार्थना कर प्रार्थना कर...(कर्म)
राजस्थानी फिल्मी गीत
खम्मा खम्मा ओ धणिया..., म्हैं जमना तट पे जोऊं कानूडा थारी बाट...(बाबा रामदेव), तू मेरी मैना म्हैं तेरो पंछी..., साथीडा रामू रे..., झिरमिर झिरमिर रे कै रामू प्यारा...(म्हारी प्यारी चनणा), छोटी-सी उमर परणाई ओ बाबासा...(बाई चाली सासरिये)

प्रस्तुति - एम.डी. सोनी