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सितारों की महफिल में भरत व्यास

अमीन सायानी
अमीन सायानी : बहनो और भाइयो, संगीत के सितारों की महफिल अब ले रही है एक करवट, और पहुँच रही
है उस दौर में जो शुरू हुआ था फिल्म संगीत के सुनहरे युग के साथ-साथ और खत्म हुआ
1982 में जब एक अनुपम कवि और गीतकार का देहान्त हो गया।
गीत : चाहे पास हो चाहे दूर हो... (फिल्म-सम्राट चन्द्रगुप्त / 1958)
अमीन सायानी : फिल्म सम्राट चन्द्रगुप्त के इस गीत के गीतकार कौन थे, ये शायद आपको झट से याद न आ
पाएगा, भाइयो-बहनो इसलिए मैं उनके द्वारा लिखे कुछ और यादगार गीतों के मुखडे अंतरे
आपको सुनवाउँगा और इन्हें सुनते-सुनते आपको गीतकार का नाम याद आ गया, तो क्या
बात है और अगर नहीं याद आया, तो भी आप इन अमर गीतों का मजा तो लेंगे ही लेंगे, है
न हाँ तो लीजिए शुरू करता हूँ उनके गीतों की माला, फिल्म परिणीता के एक बडे ही मशहूर
गीत से...
गीत : गोरे-गोरे हाथों में मेहंदी रचा के... (फिल्म-परिणीता / 1953)
अमीन सायानी : परिणीता के इस गीत के संगीतकार थे अरुण कुमार, और क्या आप जानते हैं कि फिल्म
सारंगा में किसका संगीत था...जी हाँ, सरदार मलिक का था संगीत, मगर सवाल तो ये है कि
गीतकार कौन थे?
गीत : सारंगा तेरी याद में... (फिल्म-सारंगा/ 1960)
अमीन सायानी : और साहब वसंत देसाई के संगीत में भी इस बडे ही प्रसिद्ध गीतकार ने कईं गीत लिखे थे जैसे
कि फिल्म गूँज उठी शहनाई इसमें तो इनके जो तमाम गीत थे वो हिट हुए थे।
गीत : जीवन में पिया तेरा साथ रहे. (फिल्म-गूँज उठी शहनाई / 1959)
अमीन सायानी : तो बहनों और भाइयों आप भी हाथ छुडाकर कहीं जाईयेगा नहीं, बस एक छोटा-सा ब्रेक लेना
है अब हमें इस प्रोग्राम में... (ब्रेक के बाद) संगीत के सितारों की महफिल में हमने एक
मशहूर गीतकार के गीतों की माला शुरू की है जिसकी एक और कडी ये आई...एक सीनियर
संगीतकार और भी थे सी. रामचन्द्र उनके लिए भी हमारे आज के सितारे शायर ने कईं फिल्मों
में गीत रचे थे जैसे नवरंग...
गीत : आधा है चन्द्रमा रात आधी...(फिल्म-नवरंग / 1959)
अमीन सायनी : मगर इन सबके बाद लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल की शुरू-शुरू की फिल्मों में भी इन्हीं कवि के
गीत पिरोए हुए थे, फिल्म सती सावित्री का ये गीत याद है आपको...
गीत : जीवन डोर तुम्ही संग बाँधी... (फिल्म-सती सावित्री/1964)
अमीन सायानी : और अगर अभी तक इस कविराज का नाम आफ लबों पर नहीं आया बहनो और भाइयो
तो उनकी अपनी आवाज में सुनाई हुई एक कविता सुन लीजिए, बल्कि उस कविता से भी
पहले उन्हीं से उस कविता की कहानी भी सुनिए कि वो कविता पैदा कैसे हुई...
भरत व्यास : मैं शालीमार की फिल्म कम्पनी में काम करता था और एक पिक्चर का डायरेक्शन कर रहा
था, रंगीला राजस्थान का और बडी-बडी आशाएँ लेकर कर रहा था, लेकिन देश का दुर्भाग्य
ऐसा आया कि यहाँ दंगे छिड गए और देश दो टुकडों में बँटने लगा और हमारे जो मालिक
थे डब्लू जेड, अहमद साहब वो कराची चले गए और वापस लौट कर नहीं आए। मैं बहुत
दिनों तक डायरेक्शन के चक्कर में यहाँ पडा रहा, लेकिन अन्त में मुझे भी वो पिक्चर अधूरी पूरी
कर करा के और अपने घर के बर्तन-वर्तन बेच कर के वापस बम्बई आना पडा और बम्बई
में सच पूछा जाए, तो मेरी हालत बडी खराब थी। मैंने मलाड में एक खोली ली पन्द्रह रूपये
भाडे की और हमेशा सोचा करता था अब मैं क्या करूँ। तो किताबें कुछ छपवाई मैंने अपनी
कविताओं का जिसको दीमकों ने चाट डाली बिकी-विकी कुछ नहीं, तो अब मे कवि
सम्मेलनों में जाने लगा मैंने कहा कि यहाँ से कुछ काम चले, लेकिन वहाँ भी बहुत कुछ थोडा-
सा मिलता या काम पूरा चल नहीं पाता था। एक दिन एकाएक मैने देखा एक बडी गाडी मेरे
दरवाजे पर आ कर के, खोली के नीचे खडी हो गई, ड्राइवर ऊपर आया और कहा कि फलाने
फलाने हमारे यहाँ के करोडपति सेठ हैं और उन्होंने एक कवि सम्मेलन बुलाया है और आपको
खास करके बुलाया है। मुझे तो मजा आ गया, मैने कहा भाग्य पलटा, अपनी ब्राह्मणी को
बोला कि मेरे कपडे-वपडे तैयार करो मैंने कहा जाएँगे वहाँ पर शायद कोई अच्छा बात बने
और भाग्य बदले। खैर उसने मुझे अपने कपडे-वपडे दे दिए और मैं गाडी में बैठ गया। गाडी
सीधे मुझे ले आई जहाँ प्रोग्राम था, वहाँ पर लाकर मुझे खडा कर दिया। वहाँ पर और भी कवि
थे, मैं भी था, सब लोग सम्मिलित हुए। मैंने अपनी अच्छी-अच्छी कविताएँ सुनाई बडी दाद
मिली बडी तालियाँ मिलीं, फूलों की मालाएँ पहनाई गईं, पान चाय नाश्ते-वास्ते सब करवाए
गए उसके बाद मैं खुश हो गया कि रंग भी जम गया और काम भी बन गया और शायद
भविष्य अच्छा रहेगा, लेकिन जब मैं बाथरूम में घुस कर के बाहर निकला और इधर-उधर
घूम के आया, तो देखा सारा हॉल खाली पडा था। न वहाँ कोई आदमी था न मुझे कोई पहुँचाने
वाला था नीचे आ के देखा मैंने शायद वो गाडी खडी होगी वापस छोड के जाएगी, लेकिन
गाडी-वाडी थी नहीं। कपडे मेरे अच्छे थे इसलिए मेरा अंदाज भी किसी ने नहीं लगाया,
लेकिन सच पूछो तो मेरी जेब में सिर्फ एक अठन्नी थी, उस अठन्नी से मैंने किसी ताँगे जैसे
आदमी को पकडा और कहा यार तू मुझे दादर तक तो पहुँचा, दादर से मै मलाड जाऊँगा, तो
दादर तक उसने मुझे छोड दिया उसको अठन्नी मैंने दी, दादर से मलाड तक में पैदल आया उस
दिन और आते-आते रास्ते में मैंने वो एक कविता लिखी जो नवरंग में भी है। वो कविता तो
मेरी हास्य रस की लोग समझते हैं कि मजाक की कविता है, लेकिन हमारे साहित्य के बडे
अच्छे जाने-माने अब्बास साहब एक दिन मिले, तो उन्होंने मुझे कॅम्पलीमेंट दिया कि पण्डित
जी आप इसे हास्य रस की कविता कहते हैं ये आपकी पेथेटिक कविता है, करुणा की कविता
है, तो वो मैं आपको सुनाऊँ जो शान्तारामजी ने नवरंग में भी रखी थी और मैंने ही वो सुनाई
थी वो है कविराजा कि...
* कविराजा कविता के मत अब कान मरोडो, भई कविराजा कविता के मत अब कान मरोडो,
धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोडो,
ये शेर शायरी कविराजा न काम आएगी, कविता की पोथी को दीमक खा जाएगी,
ये भाव, भावना, शब्द योजना धरी रहेगी, प्राणों की अनुभूति गले में आ जाएगी,
भाव चढ रहा, अनाज हो रहा महँगा दिन-दिन भूख मरेंगे,
रात कटेगी तारे गिन-गिन, राशन कार्ड बिना कविराजा क्या खाएँगे,
पेट पीठ दोनों मिलकर एक हो जाएँगे, इसीलिये कहता हूँ बेटा ये सब छोडो,
धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोडो.
तो रोज-रोज मत कागज काले करो निठल्लू, वाह-वाह कर दुनिया तुम्हे बनाती उल्लू.
वाह-वाह ये नहीं तुम्हारी बिक पाएगी, भरी सभा में बेटे पगडी उठ जाएगी,
दो आँखें गुपचुप अन्दर को धँस जाएँगी, भूखी अन्तडियाँ मेदे में फँस जाएँगी,
इसीलिये कहता हूँ मत काँटो पर दौडो, कवि की जात बुरी मत इससे नाता जोडो,
बन जाओ पनवाडी पर ये कविता छोडो, धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोडो.
तो बात करो कम, बढ-बढ कर दिन भर मत बोलो,
अपनी हर हरकत को तुम पैसों से तोलो,
भावुकता-वश काम उधार करो ना किसी का, जो दे पहले दाम सलाम प्रणाम उसी का
जो परसों पैसे दे करो उन्हें गुडबाई, परसों-परसों में बरसों तक जान गँवाई,
परसों के पैसे वालों से सदा डरो तुम, जो दे आज उन्हें प्यारे जय हिन्द करो तुम,
धंधे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोडो,
ओ कवि के पुत्तर, ओ कवि के पुत्तर
सुनो शायर के बच्चे, शेर सुनाऊँ तुमको मैं मतलब के सच्चे,
चेक बने तो ये तेरी कविता है सच्ची, सिर्फ रहे कागज तो इसे चबाओ कच्ची,
मुफ्त समय ले डाले ना कविता की बच्ची, हम तो बात कहेंगे प्यारे हित की सच्ची,
ये शब्दों का जंजाल बडा लफडा होता है, कवि सम्मेलन दोस्त बडा झगडा होता है,
मुशायरों के शेरों पर रगडा होता है, पैसे वाला शेर बडा तगडा होता है
इसीलिये कहता हूँ मत काँटो पर दौडो, कवि की जात बुरी मत इससे नाता जोडो.
बन जाओ पनवाडी पर ये कविता छोडो, धंधे की कुछ बात करो भाइयों कुछ पैसे जोडो....
अमीन सायानी : अब देखा भाइयो और बहनो में ख्वामाख्वाह ही सीधी-सी बात को सस्पेंस बनाए चला जा
रहा हूँ आप तो खुद संगीत के रसिया हैं और आपको मालूम हो ही गया कि ये आवाज जो
अभी आपने सुनी और उससे पहले जो गीत आपने सुने उनके कविराज थे भरत व्यास, जी हाँ,
भरत व्यास जिनके गीतों में दर्द भी होता था और राहत भी होती थी, प्यार की झंकार भी होती
थी और फलसफे की गूँज भी....
गीत : ज्योत से ज्योत जगाते चलो प्रेम की गंगा बहाते चलो (फिल्म-संत ज्ञानेश्वर / 1964)
अमीन सायानी : संगीत के सितारों की महफिल के मेहमानों आज के सितारे पण्डित भरत व्यास के जीवन की
ज्योत सन 1982 में बुझ गई, लेकिन उनकी यादों को दोबारा रोशन करने हम आफ लिए
ले आए हैं उनके दो इन्टरव्यूज के आधार पर बना यह प्रोग्राम भरत व्यास के कलाम की
जवानी का गुलदस्ता
भरत व्यास : हर उम्र में जवान हूँ. मैंने लिखा है कि
जब तक जिन्दा हूँ जवान हूँ
मुक्त विश्व की रणमेरी में अग्निवील की तान हूँ,
जब तक जिन्दा हूँ जवान हूँ,
जब तक तन में प्राण, प्राण में कम्पन, कम्पन में गति डोले,
जब तक मन में श्वास, श्वास में आस, आस में जीवन बोले,
तब तक पथ-विघ्नों को दलने वाला मैं विधि का विधान हूँ,
जब तक जिन्दा हूँ जवान हूँ
जब तक रवि में किरण, किरण में ज्योत, ज्योत में नवजीवन है,
जब तक घन में वज्र, वज्र में प्रलय, प्रलय में उद्वेलन है,
तब तक धरती के सर पर अंगडाई लेता आसमान हूँ,
जब तक जिन्दा हूँ जवान हूँ...
अमीन सायानी : दोस्तों, ये कविता भरतजी ने हमें हमारे स्टूडियो में ही सुनाई थी और इसके अलावा भी बहुत
कुछ सुनाया था हमें, जिसे आप सुनेंगे बस कुछ मिनटों के बाद (ब्रेक के बाद) अच्छा बहनो
और भाइयो वैसे तो पण्डित भरत व्यास के बीसियों गीत बेहद हिट हुए थे, लकिन उनमें से एक
गीत सन 1957 की गीतमाला हिट परेड में इतना चला. इतना चला कि उस साल का सबसे
ज्यादा लोकप्रिय गीत बन गया वार्षिक संगीत श्रेणी की चोटी की पायदान का गीत, फिल्म थी
जनम जनम के फेरे संगीतकार थे एस. एन त्रिपाठी, उनका भी इन्टरव्यू आएगा हमारे प्रोग्राम
में जी हाँ, मगर फिलहाल भरत व्यास के इन्टरव्यू में सुनिए जनम जनम के फेरे का वही सुपर
हिट गीत....
गीत : जरा सामने तो आ ओ छलिये (फिल्म-जनम जनम के फेरे / 1957)
अमीन सायानी : तो मैंने भरतजी से ये पूछा था उस इन्टरव्यू में कि जब आपने जरा सामने तो आओ छलिये और
ऐसे कई-कई जबरदस्त हिट गीत लिखने की सलाहियत है, योग्यता है, तो फिर आपने और
फिल्मी गीतकारों के मुकाबले में इतने कम गीत क्यों लिखे...
भरत व्यास : महत्त्वपूर्ण ये नहीं है कि मैंने कम लिखा या ज्यादा, महत्त्वपूर्ण ये है कि जो कुछ लिखा गया
उसमें लोकप्रियता की सुगंध है या नहीं, हिन्दी के कवि रहीमदासजी ने जीवन भर में केवल
सात सौ, केवल सात सौ दोहे लिखे, लेकिन इतना अल्प-साहित्य ही उन्हें अमर कर गया।
उनकी तुलना में मैं कुछ भी नहीं हूँ, पर उनके गुणों का पथगामी अवश्य हूँ और उनके बारे मे
जो कहा गया है वो ही रास्ता में अपने लिये अख्तियार करना चाहता हूँ। सात सौ दोह
रहीमदासजी ने लिखे, लेकिन कहा गया है कि सतसेया के दोहरे ज्यों नावक के तीर, देखन
में छोटे लगे लेकिन घाव करें गम्भीर...
गीत : निर्बल से लडाई बलवान की.. (फिल्म-तूफान और दीया/ 1956)
अमीन सायानी : मन में आशा की किरण जगाता ये गीत और ऐसे अनेकों गीत लिखने वाले गीतकार भरत
व्यास ने सिर्फ धार्मिक गीत या सिर्फ साहित्यिक गीत लिखे हों ऐसी बात नहीं। फिल्म में
सिचुएशन की माँग के अनुसार उन्हें खुद को कईं बार बदलना भी पडा, ऐसे ही एक मौके का
जिक्र भरत व्यास जी ने यूं किया था...
भरत व्यास : ये सच है कि मैंने अधिकतर धार्मिक, पौराणिक या ऐतिहासिक फिल्मों में ही गीत लिखे हैं,
लेकिन धार्मिक और पौराणिक और ऐतिहासिक फिल्में अपने समय में तो सामाजिक फिल्म
ही थी जिस वक्त ऐतिहासिक समय था, उस वक्त ऐतिहासिक समय का समाज था और उस
समाज के हिसाब से वो गीत लिखे गए तो फिर गीत ऐतिहासिक, पौराणिक या धार्मिक कैसे
हो जाते हैं, गीत तो गीत होते हैं, उनको आप सामाजिक फिल्मों में डाल दीजिए तो सामाजिक
लगेंगे, ऐतिहासिक फिल्मों में डाल देंगे, तो ऐतिहासिक लगेंगे, हाँ, ये बात अवश्य है कि जिस
समय मैंने इस चित्रजगत में प्रवेश किया था उस समय फिल्में ही धार्मिक, पौराणिक और
ऐतिहासिक बनती थी और मैं उन्हीं फिल्मों के मुताबिक अपने गीत लिखता था जो सफल भी
होती थी।
अमीन सायानी : चलिए माना कि उस जमाने में ज्यादातर फिल्में जो बनती थी, वो ऐतिहासिक होती थी या
धार्मिक होती थी, लेकिन उन फिल्मों के बाद सामाजिक फिल्में भी तो कईं बनी....
भरत व्यास : अवश्य बनीं, परिणीता बनी, तूफान और दीया बनी, गूँज उठी शहनाई बनी, बेदर्द जमाना क्या
जाने फिल्म बनी, नवरंग बनी, दो आँखें बारह हाथ बनी, उनमें भी तो मेरे ही गीत थे, वो
सामाजिक फिल्म नहीं थीं?
गीत : ऐ मालिक तेरे बन्दे हम.. (फिल्म-दो आँखें बारह हाथ / 1957)
अमीन सायानी : हाँ, तो बहनो और भाइयो आइए अब लौट चलें फिर एक बार दो आँखें बारह हाथ और नवरंग
और बूँद जो बन गई मोती, सारंगा, गूँज उठी शहनाई ऐसी कई सुप्रसिद्ध फिल्मों के शब्दकार
भरत व्यास के एक इन्टरव्यू में जिसमें अपने ऊपर लगे हुए एक आरोप को सुनकर, सुनिए
उन्होंने क्या कहा था, इल्जाम ये था कि भरत व्यासजी अपने गीतों में कठिन शब्दों का प्रयोग
जरूरत से ज्यादा करते हैं...
गीत : आज मधुवातास डोले.. (फिल्म-स्त्री / 1961)
अमीन सायानी : हाँ, तो पण्डित भरत व्यासजी बताइए आफ कुछ गीतों में इतनी क्लिष्ट, इतनी मुश्किल हिन्दी
की आवश्यकता क्या थी। फिल्मी गीतों में तो सरल सीधी-सादी भाषा होनी चाहिए जो सब
बडी आसानी से समझ लें..
भरत व्यास : फिल्मी गीतों में कुछ शब्द पिछले 25-30 साल सुनकर बेजान और बेमतलब लगते हैं। ये
मुझे मंजूर है कि मैं अपने गीतों में हिन्दी का ही इतनी बार दोहराये गए हैं कि वे बार-बार
अधिक प्रयोग करता हूं. क्योंकि मेरा विश्वास है कि हिन्दी में हर तरह के भाव या रस प्रगट
करने का पूरा-पूरा सामर्थ्य है। रही बात अहिन्दी भाषियों की कठिनाई की, तो मुझे बताने में
हर्ष होता है कि यह सब गीत पूरे देश भर में बहुत लोकप्रिय हुए हैं, यदि ये गीत जनता की
समझ में नहीं आते, तो भला इन्हें इतनी लोकप्रियता कैसे मिलती ?
अमीन सायानी : अच्छा क्या आप जानते हैं बहनो और भाइयो कि उन दिनों जब भरतजी जिन्दा थे कुछ लोगों
को ये ताज्जुब होता था कि इतने सुप्रसिद्ध कवि होते हुए भी भरत व्यास कवि सम्मेलनों में
भाग क्यों नहीं लेते थे? तो इसका कारण उस पुराने इन्टरव्यू में भरतजी ने कुछ यूं बताया।
भरत व्यास : मैं कवि सम्मेलनों में जाया करता हूँ, जाया करता था और जाना चाहूँगा, लेकिन एक
धर्मसंकट सामने वहाँ अवश्य आता है....
अमीन सायानी : वो क्या पण्डित जी...?
भरत व्यास : कि कवि सम्मेलनों में जबकि हमारे कवि मित्र अपनी साहित्यिक रचनाएँ सुनाते हैं, तो मेरे
पास अधिकतर फरमाइशें फिल्मी गीतों की आती हैं कुछ लोग चाहते हैं कि जरा सामने तो
आओ छलिये सुनाऊ, कुछ चाहते हैं कि आ लौट के आजा मेरे मीत सुनाऊ, कुछ लोग चाहते
हैं कि वो कौन चित्रकार है सुनाऊँ। अब आप ही सोचिए इन फिल्मी गीतों के पीछे ऑर्केस्ट्रा
होता है, अच्छी-अच्छी आवाजें होती हैं उन सबको लेकर वो गीत लोकप्रिय होते हैं। मैं
अकेला अपने गले से वो गीत वहाँ सुनाऊँगा तो न मै फिल्मी गीत वाला रहूँगा और न मैं
साहित्यिक कवि रहूँगा। यही कारण है कि इस धर्मसंकट के कारण से मैं कवि सम्मेलनों को
टाला करता हूँ। मेरे कई कविता संग्रह जैसे रिमझिम, तेरे सुर और मेरे गीत, गीत मेरा संसार,
राष्ट्रकथा आदि अब भी लोग चाव से पढते हैं, पसंद करते हैं।
अमीन सायानी : जी बिलकुल, और इसीलिए पण्डितजी हम आपसे विनती करेंगे कि आप यहाँ हमारे प्रोग्राम
में भी अगर कोई अपनी कविता सुनाएँ, तो बडी कृपा होगी आपकी और जनता खुश हो
जाएगी...
भरत व्यास : सुनिए कविता आदमी और अक्ल
ध्यान से सुनना है छोटी बात पर कितनी बडी,
ध्यान से सुनना है छोटी बात पर कितनी बडी,
और बात है उसके मुत्तल्लिक जिसने ये दुनिया घडी,
घास की पत्ती से लेकर ताड तक उसने घडा,
एक च्यूटी से शुरू कर, कर दिया हाथी खडा,
इस तरह धरती के मुँह पर खूबियाँ जडने लगा,
शक मुझे आया कि जब वो आदमी घडने लगा,
वैसे तो सब तरह उसने आदमी पूरा किया,
वैसे तो सब तरह उसने आदमी पूरा किया,
शेर की ताकत भरी और रौब हाथी का दिया.
तेज बिजली का, समन्दर की भरी उसमें गरज
इस तरह फनकार ने पूरा किया अपना फर्ज,
तो शान शौकत रूप और गुण भर दिया सारा,
अब बताता हूँ उसे आकर कहाँ मारा,
तो जिन्दगी भर जो दिखाई दे ना अपनी शक्ल में,
एक ऐसी अक्ल दी और मौत थी उस अक्ल में,
अक्ल भी देने लगा तो कम क्यूं दे डाली तमाम,
सिर्फ अपने हाथ में उसने रखी उसकी लगाम,
बस उसी दिन से जगत में खलबली मचने लगी,
आदमी की आदमियत फंद नित रचने लगी
इस तरफ खोपडी में अक्ल ये दलने लगी,
उस तरफ मेहरो प्रभु की सृष्टि ये चलने लगी,
तो अक्ल से फिर आदमी ने ऐब पैदा कर लिए,
कीमती मोती बिसोरे और काँटे भर लिए,
तो अक्ल पर काबू ना अपना इसलिए
अब तन नहीं बदला है अपना
मन से भी आदमी कुछ कम नहीं बदला है....
(इस कविता को फिल्म महासती बेहुला (1964) में इस्तेमाल किया गया है)
अमीन सायानी : अच्छा, इधर एक आजाद कवि और उधर संगीतकारों की धुनों की बंदिशें, तो ऐसे में कैसा
लगता होगा भरत व्यासजी को, ये ही मैंने उनसे पूछा और उन्होंने कहा...
भरत व्यास : वैसे हमारे कला-क्षेत्र में संगीतकार भी अपने फन के माहिर होते हैं। हम लोग कवि हैं,
गीतकार हैं, अपने गीत लिखते हैं, ये तो हेलमेल का खेल है, लेकिन सत्य बात यह है गीत का
पहले भाव कवि के दिमाग में आने चाहिए। कुछ प्रथा कुछ दिनों से ऐसी चल पडी है कि लोग
धुन बना लेते हैं, उस पर गीत लिखवाते हैं अब आप समझिए कवि के सामने दो तीन चक्कर
बनाए जाएँ और कवि को कहें कि आप दीडते-दौडते इन चक्करों से निकलिए, तो कवि का
फ्लो नहीं रहेगा, कवि की स्वतंत्रता नहीं रहेगी। इसके लिये में आपको एक उदाहरण दूँ. मुझे
भी शक हो गया था कि शायद धुनों पर गीत लिखने पडेंगे और एक बार स्वर्गीय खेमचन्द्र
प्रकाशजी जो हमारे बहुत बडे संगीत निर्देशक थे, मैं इसी भ्रम के अन्दर उनके पास गया, उनसे
कहा कि गुरुजी, आप धुन दीजिए मैं गीत लिखूँ, उन्होंने कहा, भई आप शब्द दीजिए ताकि
मेरी उँगली चले, वर्ना मेरी उँगली किस भाव पर चलेगी, आप कुछ ऐसी पंक्ति दीजिए,
जिसमें कोई भावना हो, कोई भाव हो ताकि मेरी उँगली चले...
अमीन सायानी : और बहनो और भाईयो, सचमुच भावनाओं का एक महासागर प्रदान किया भरत व्यास जी
ने हमें शब्दों के अनमोल...
गीत : तुम गगन के चन्द्रमा हो (फिल्म- सती सावित्री/1964)
अमीन सायानी : आज संगीत के सितारों की महफिल में आप गीतकार भरत व्यासजी के दो पुराने इन्टरव्यूज
के कुछ हिस्से सुन रहे हैं बहनो और भाईयो उनमें से एक में मैंने भरतजी से गुजारिश की थी
कि वो हमें अपनी पसन्द के कुछ गीत चुनकर सुनवाए और उन गीतों के पीछे कवि की जो
सोच थीं, जो विचारधारा थी उसके बारे में भी कुछ बताएँ, तो दोस्तों यहाँ उनके प्रस्तुत किए
हुए दो गीत आप सुनेंगे....
भरत व्यास : सारा जीवन प्यार की प्यास के लिये तरसता है, इस प्यार के लिये धरती का कण-कण तरसता
है, सागर के लिए लहरें तरसती हैं, धरती के लिए बादल तरसते हैं, बादलों के लिए धरती
तरसती है, लेकिन प्यार का पूरे रूप से मिलना हजारों लाखों प्रेमियों के लिये दर्द करुणा और
दुख का कारण बना हुआ है और शायद इसीलिए हो सकता है दर्द भरे गीत ज्यादा लोकप्रिय
होते हैं मेरी इस दुख भरी गीतनुमा गजल को जो गूँज उठी शहनाई में वसंत देसाई के निर्देशन
में सावन की घटाओं की आवाज वाले मोहम्मद रफी ने शायद हजारों निराश प्रेमियों के सुर
में सुर मिलाकर गाया है और कहा कि कह दो कोई ना करे यहाँ प्यार
गीत : कह दो कोई ना करे यहाँ प्यार (फिल्म-गूँज उठी शहनाई / 1959)
अमीन सायानी : और जिस अगले गीत के बारे में भरत जी ने कुछ फरमाया था वो सुनिए अब....
भरत व्यास : आज मानव ने चन्द्रमा की छाती पर पहला कदम रख कर हम कवियों की चन्द्रकला की
कल्पनाओं को तो समाप्त कर दिया है, लेकिन हमें गर्व है, अभिमान है कि हमारे जीवन काल
में हमारे देखते-देखते आदमी के सदियों के सपने, आदमी ने सच कर दिखाए, हमें खुशी होती
है और हमें जोश आता है और प्रेरणा मिलती है, लेकिन जो मैं गीत सुना रहा हूँ उसमें एक
सवाल पैदा होता है कि आदमी महानतम तरक्की तो करता जा रहा है, और करता ही जाएगा,
लेकिन उसकी ये तरक्की निर्माण या क्रियेशन करने में नहीं है, बल्कि निर्माण करने वाले और
क्रियेशन करने वाले उस महान भगवान के भेदों की खोज करने में लगी हुई है वो हजारों रंगों
वाली तितलियों कि पंख नहीं बना पाया, वो करोडों रंगों वाले फूल नहीं खिला पाया, वो
बरसात से पहले सात रंगो वाली इन्द्रधनुष की चुनरी नहीं लहरा पाया है। इसलिए फिर
सोचना पडता है कि ये कौन चित्रकार है जो दिखाई नहीं देता, जिसकी तूलिका नजर नहीं
आती, लेकिन उसकी कोटि-कोटि रंगों वाली चित्रकारी हर भोर को जब सूरज की पहली
किरण धरती को चूमती है, तब रंग बिरंगे फूलों में हमें नजर आती है। ये गीत श्री शान्तारामजी
के चित्र बूँद जो बन गई मोती में मीठे और मधुर मुकेश ने मिश्री भरे स्वरों में गाया है। ये कौन
चित्रकार है....
गीत : ये कौन चित्रकार है (फिल्म- बूँद जो बन गई मोती /1967)
अमीन सायानी : तो बहनो और भाईयो भरत व्यास अपनी बातों और अपने गीतों का खजाना हमें देकर 1982
में हमसे जुदा हो गए, आज हमने उन्हें उनके शब्दों के जरिये फिर अपने पास बुला लिया...
गीत : आ लौट के आजा मेरे मीत (फिल्म-रानी रूपमती/1959)
अमीन सायानी : तो दोस्तों, ऐसे कई अनमोल मोती सजे हुए हैं, संगीत के सितारों की महफिल के खजाने में
और उस दरवाजे का दरवाजा आपका दोस्त अमीन सायानी सिर्फ आप जैसे संगीत प्रेमियों के
लिये ही खोला करता है, हर बार आया कीजिए और लूट लिया कीजिए ये खजाना...
(यह ऑडियो रिकॉर्डिंग आगरा के श्री चित्रपालजी के सौजन्य से संजीव तँवर को मिली और तुझे मेरे गीत बुलाते हैं के रचयिता संजीव तँवर से मधुमती को प्राप्त हुई)