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पं भरत व्यास : रजतपट पर हिंदी के हस्ताक्षर

संजीव तँवर
आज 21 वीं शताब्दी के पहले 25 वषों के इस युग में जब सिनेमा रजतपट से निकल कर टेलिविजन से होता हुआ सेंसर की हदों को पार करता हुआ ओटीटी प्लेटफार्म तक पहुँच चुका है, तो भाषा की शुद्वता पर बात करना वैसे तो बेमानी ही है, लेकिन नई पीढी और खास तौर से सिनेमा और साहित्य के शोधार्थियों को पं.भरत व्यास और उनके फिल्मी लेखन से परिचित करवाना बेहद आवश्यक है। जैसा कि जाने माने फिल्मकार श्री वी. शान्ताराम ने भी अपनी आत्मकथा शान्तारामा में भी लिखा है कि भरत व्यास जैसा गुणी गीतकार अपने हिन्दी में लिखने के आग्रह के कारण उर्दू शायरों से भरी इस फिल्मी दुनिया में कुछ उपेक्षित-सा रह गया।
राजस्थान की रणबाँकुरों के बलिदानों से रंजित धरती के बीकानेर में 6 जनवरी 1918 के दिन अपने नाना के घर हुआ था। उनके पिता का घर राजस्थान के ही चुरू में था। 1925 में जब भरत जी मात्र 7 साल के थे उनके पिता श्री शिवदत्तराय व्यासजी का निधन हो गया और दो वर्ष बाद उनकी माता भी चल बसी जिसके बाद उनके दादा श्री घनश्यामदासजी की देखरेख में उनका बचपन बीता। चुरू से मेट्रिक करने के बाद भरतजी बीकानेर के डूँगर कॉलेज में उच्च शिक्षा हेतु गए। बचपन से ही काव्य लेखन में रूचि को भरतजी ने यहाँ भी जारी रखा और वे कवि के रूप में अपनी आरम्भिक पहचान बनाने में सफल रहे। इसी दौर में उनका विवाह गंगादेवी के साथ हो गया जिसके उपरांत वे आगे पढाई करने के लिये कलकत्ता चले गए। कलकत्ता में उन्होंने बी. कॉम की पढाई करने के लिए विद्यासागर कॉलेज में प्रवेश लिया। यहाँ से उन्होंन अपने कलात्मक व्यवसायिक जीवन की डगर पर पहला कदम रखा जब उन्होंन रंगमंच से अपना नाता जोडा और एचएमवी कम्पनी ने भी उनके गीतों की प्रसिद्धि को देखते हुए उनके कुछ शुरूआती गैर-फिल्मी गीतों, प्रहसनों इत्यादि की रिकॉर्डिग की। साथ ही वे रंगमंच पर अभिनय भी करने लगे। उनकी कविता केसरिया पगडी ने उन्हे भारत भर में एक जाना- पहचाना नाम बना दिया था। लेकिन उनमें एक कसक थी अपनी मातृभाषा में कुछ करने की जिसकी परिणति था उनका लिखा राजस्थानी भाषा का नाटक रंगीला मारवाड, (रामू चणना) जो अपने दौर के बेहद लोकप्रिय नाटको में गिना जाता है। लेकिन दूसरे विश्वयुद्व की आहट ने उन्हे कलकत्ता छोडने पर विवश कर दिया और लगभग 1938 में वे बीकानेर वापस आ गए। फिर कुछ सालों बाद लगभग 1941 में उन्होंने बम्बई जाने का फैसला किया। जहाँ कुछ संघर्ष के बाद उनकी मुलाकात फिल्म निर्देशक वी.एम. व्यास से हुई जिन्होंने उन्हे अपनी फिल्म दुहाई (1943) के लिये उनका लिखा पहला फिल्मी गीत अब होवेगा ब्याह तुम्हारा जरा ओंखों से कर दो इशारा उनसे लिया जिसके एवज में उन्हे महज 10 रूपये मिले थे, लेकिन ये एक प्रोत्साहन था जिसने आगे चलकर उन्हे फिल्मों में संघर्ष करते रहने की प्रेरणा दी। बम्बई में उन्ही दिनों उन्होंन फिल्म स्कूल मास्टर (1943) के लिये एक गीत हमारा प्यारा हिन्दुस्तान लिखा जिसकी धुन भी उन्होंने ही बनाई थी। अब तक फिल्म जगत में उनकी पहचान बन चुकी थी जिसकी वजह से डब्लू जेड अहमद की पूना स्थित शालीमार फिल्म कम्पनी से उन्हें बुलावा आ गया और वो 1943 में पूना चले गये जहाँ उन्होंन शालीमार की फिल्म प्रेम संगीत (1943) के लिये गीत लेखन और संवाद लेखन किया इस फिल्म में उन्होंन गीत लेखन के साथ-साथ दो गीत गाये भी थे जो इस प्रकार थे घायल करके पूछते हो दर्द होता है और दूसरा गीत था मैं आगरे से जूता लाया हो रानी जी जिसमें उनकी सहगायिका थी शांता ठक्कर। अगले साल उन्होंन शालीमार की ही अगली फिल्म मन की जीत (1944) के लिये दो गीत लिखे ऐ चाँद न इतराना, आते हैं मेरे सजन... जिसे स्वर दिया था सितारा कानपुर ने इसके अलावा उन्होंन दूसरा गीत लिखा था छिप-छिप कर मत देखोजी भँवर जी... जिसे उन्होंन शांता ठक्कर के साथ मिलकर आवाज दी थी। इस फिल्म के बाकी गीत लिखे थे सुप्रसिद्ध शायर जोश मलीहाबादी ने। शालीमार की अगली फिल्म गुलामी (1945) के लिये उन्होंन 9 में से 5 गीत लिखे थे जिनमें से आजा-आजा-आजा रे ओ गीता के भगवान... को उन्होंन रेणुकादेवी के साथ मिलकर गाया था और दूसरा गीत इस नश्वर संसार में अजर-अमर दो नाम... को उन्होंन अकेले गाया था। रोचक बात ये है कि इस फिल्म में उन्होंने नायिका के पिता रेवाशंकर का अभिनय भी किया था। इसके बाद आई शालीमार की ही अगली फिल्म पृथ्वीराज संयुक्ता (1946) के लिए उन्होंन एक गीत चाँद-सा मुखडा मुस्काये, दूर गगन में देख देख कर... लिखा जिसे स्वर भी उन्हीं ने दिया था। उन्होंन इस फिल्म की पटकथा में सहलेखन किया था और साथ ही फिल्म में चंद बरदाई का रोल भी निभाया था। अगले साल शालीमार की फिल्म मीरांबाई (1947) में उन्होंन गीत लेखन तो नह किया और न ही किसी अन्य विभाग में काम किया, लेकिन उन्होंन मीराबाई के भजनों का सरल हिंदी रूपांतरण किया।
1947 तक पं. भरत व्यास शालीमार फिल्म कम्पनी के साथ काम कर रहे थे और उन्होंन शालीमार के बाहर की किसी भी फिल्म में काम नहीं किया। ऐसा कर पाना संभव भी नहीं था क्योंकि वे शालीमार के साथ अनुबंध में बँधे थे जिसकी वजह से वे बाहर की फिल्मों में काम नहीं कर सकते थे। और वैसे भी पूना में बम्बई के विपरीत बहुत कम फिल्में बनती थी। लेकिन शालीमार में काम करने का खमियाजा उन्हे जिंदगी भर उठाना पडा, दरअसल हुआ ये कि शालीमार में ज्यादातर धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्में ही बनती थी जिसकी वजह से उन्हें आने वाले दिनों में भी ऐसी ही फिल्में मिलती रही और वे बम्बई फिल्म जगत में पौराणिक फिल्मों के गीतकार के रूप में जाने जाने लगे। 1947 में भरत व्यास शालीमार के लिए अपने नाटक रामू चणना पर आधारित फिल्म रंगीला राजस्थान जो 1949 में रिलीज हुई थी, का निर्देशन कर रहे थे, लेकिन बदकिस्मती से देश का विभाजन होने वाला था और शालीमार के मालिक डब्लू जेड अहमद अचानक पाकिस्तान चले गये और पीछे छोड गये ढेर सारा कर्ज, ऐसे हालात में फिल्म रंगीला राजस्थान जैसे तैसे पूरी की गई और पाई-पाई से मोहताज पं. भरत व्यास को पूना छोड कर बम्बई आना पडा। यहाँ अपने संघर्षों भरे दिनों में उन्होंन फिल्म अंजना (1948) के लिये 6 गीत लिखे और दो कलियाँ (1948) के लिए एक गीत लिखा जिसे वसंत पवार ने संगीतबद्ध किया था। साल 1949 में जे.एस. कश्यप के साथ मिलकर उन्होंने फिल्म अन्याय के लिये मेरे मन की बीना गीत लिखा। इसी दौरान पं. इंद्र ने, जो कि खुद भी राजस्थान से थे और स्थापित लेखक और गीतकार थे, भरतजी को दक्षिण भारत की फिल्म चंद्रलेखा (1948) के लिए मद्रास बुलवाया। इस फिल्म की अपार सफलता ने भरतजी के लिये सफलता के द्वार खोल दिए आखिरकार लगभग 9 साल के संघर्ष के बाद पं. भरत व्यास स्थपित हो रहे थे, लेकिन अभी भी मुश्किलें कम नहीं हुई थी। अब तक उनके छोटे भाई बी.एम. व्यास भी फिल्मों में अभिनय करने के लिए बम्बई आ चुके थे। भरतजी को उनका भी ध्यान रखना पड रहा था। बी.एम. व्यासजी पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर से जुड गए और कुछ संघर्ष के बाद उन्हे फिल्म नीचा नगर से काम मिलना शुरू हो गया। उधर भरतजी को भी किशोर साहू की फिल्म रिमझिम (1949) में 6 गीत लिखने का अवसर मिला जिसकी सफलता से उनके करियर को नई ऊँचाई मिली, लेकिन उन्होंन कभी भी हिंदी के साथ समझौता नहीं किया जिसका परिणाम हुआ कि उन्हें ज्यादातर पौराणिक फिल्में ही मिली। अब भरतजी के दो रूप थे एक तो वो, जो फिल्मों के लिए गीत लिखता था और दूसरा वो जो कवि सम्मेलनों में अपनी ओजस्वी कविता से दर्शकों में जोश भर देता था। यहाँ एक बात ये महत्त्वपूर्ण है कि जैसे कहा जाता है कि बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों को पढने के लिये लाखों लोगों ने हिंदी सीखी थी, उसी तरह से भरतजी जैसे कवियों ने हिन्दी फिल्म जैसे सशक्त माध्यम के द्वारा जनता में हिंदी का प्रचार करने में एक ऐसा योगदान दिया है जिसके बारे में बहुत कम चर्चा की गई है। इसी दौरान 1956 में उन्हे फिल्म तूफान और दीया के लिये गीत लिखने का अवसर मिला। ये पहली बार था जब वे वी. शान्ताराम जैसे दिग्गज निर्माता के साथ काम कर रहे थे और इस फिल्म के 9 में से 5 गीत भरतजी ने लिखे थे जिनमें से निर्बल से लडाई बलवान की बेहद लेाकप्रिय रहा और अगले साल वी शान्ताराम की ही अगली फिल्म दो आँखें बारह हाथ के गीत ऐ मालिक तेरे बंदे हम ने तो इतिहास ही रच दिया। इस गीत ने साबित कर दिया कि अभी भरतजी की प्रतिभा का भरपूर इस्तेमाल फिल्म जगत नहीं कर पाया था। ये वो गीत है जो आज भी दुनिया के किसी न किसी कोने में हर रोज सैकडों बार बजता होगा। वी. शान्ताराम और भरतजी का साथ अंत तक रहा और नवरंग (1959) गीत गाया पत्थरों ने जैसी फिल्मों ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए। वी. शान्ताराम जी के अलावा भरत व्यास प्रतिभा का सही आकलन किया संगीतकार एस.एन. त्रिपाठीजी ने जिनके साथ भरतजी ने रानी रूपमति एवं कवि कालिदास जैसी अनेक कलात्मक फिल्में की, जिनके गीत आज भी पसंद किए जाते हैं। 1959 की फिल्म गूँज उठी शहनाई उनकी उल्लेखनीय फिल्मों में से एक है। 1960 के दशक में वे बेहद व्यस्त गीतकार थे। 1970 के दशक में फिल्मों के बदलते स्वरूप और पौराणिक और ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माण में गिरावट के कारण उनके काम में कुछ कमी आई, लेकिन फिर भी उनके पास लगातार काम रहता था। हिंदी के अलावा भरतजी ने अपनी मातृभाषा को बढावा देने के लिये 4 राजस्थानी फिल्मों में भी संगीत दिया था। 4 जुलाई 1982 को मुम्बई में उनका निधन हुआ। जिसके साथ ही भारत के सिने जगत से एक प्रतिभाशाली कलाकर और हिंन्दी जगत से एक महान कवि सदा के लिए लुप्त हो गया और अपने पीछे छोड गया ये पंक्तियाँ आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते हैं।

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