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जीवन मूल्यों की नई व्याख्या

कौशलनाथ उपाध्याय
बौराए प्रतिबिम्ब कथा-लेखिका दीप्ति कुलश्रेष्ठ का नया और नौवाँ उपन्यास है। इस उपन्यास को पढना, इससे गुजरना एक सफर करने जैसा लगता है । उपन्यास से गुजरते हुए ऐसा लगता है जैसे हम किसी जीवन-यात्री के सहचर बन गए हों । उपन्यास की यात्रा पूर्ण होने पर कथा-नायिका नीना तो अपने को एक विचार की मंजिल पर पहुँचा हुआ पाती है- इस घर में, मैं अगर किसी की भी आँखों का नूर न बन सकी, न सही... अपने बच्चों के लिए ममता का मीठा झरना हूँ...मेरे लिए यही बहुत है...।...उसे महसूस हुआ जैसे उसके हृदय से एक भारी बोझ उतर गया हो और अब वह चैन से सो सकेगी। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 589) -लेकिन हम अपने को एक चौराहे पर खडा पाते हैं - विचारों एवं भावनाओं के चौराहे पर- जहाँ हम एक बार फिर पलट कर उन सभी सडकों और पगडण्डियों को देखने की कोशिश करते हैं जिन पर चलते हुए कथा-नायिका तमाम विरोधों-अवरोधों, संगतियों-विसंगतियों से दो-चार होते हुए भी अपने को टूटने से बचाती ही नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को नई पहचान देते हुए सार्थक मोड पर अपने को खडा भी करती है ।
उपन्यास में कुल चार पक्ष हैं जिन्हें क्रमशः प्रथम खण्ड- विक्षिप्त प्रतिध्वनियाँ, द्वितीय खण्ड - गूँगी चीखें, शेष- विक्षिप्त प्रतिध्वनियाँ, तृतीय खण्ड-सुलगती परछाइयाँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वस्तुतः ये उपन्यास के चार अलग-अलग तरह के प्रस्थान बिन्दु हैं। कथा के केन्द्र में कथा-नायिका नीना है। नीना का पति विनय है। तीसरे पुरुष के रूप में उपस्थित तनेश है। नीना का पुत्र दिव्यांश और पुत्री मिनी है । इसके अतिरिक्त नीना की माँ श्रीमती राय, भाई अरविन्द, बहन शिखा, सहेलियाँ- सरिता, संध्या, ज्योति, संगीता, रागिनी, सास- कांति देवी, ससुर- अभयनारायण, देवर - विपुल, ननद- रेखा, मनोचिकित्सक डॉ. राकेश- डॉ. पदमचंद जैन- डॉ. ओ. पी. गर्ग जैसे पात्र हैं जो कथा के सूत्र को जोडते और आगे बढाते हैं । उपन्यास को पढते हुए एक सवाल खडा होता है कि इस उपन्यास की पहचान किस रूप में की जाए ? क्या यह अनुभूत सत्य का रचनात्मक प्रयोग है, याकि यह एक संस्मरणात्मक उपन्यास है, याकि यह आत्मकथा जैसा है, याकि यह देख-सुने जीवन एवं समाज का यथार्थ है जिसे कलात्मक रूप में औपन्यासिक कलेवर में ढाल दिया गया है। जो भी हो इसका निर्णय तो पाठक अपने-अपने ढंग से करेंगे, लेकिन यह एक सच है कि इस उपन्यास में कई एक विधाएँ आवाजाही करती दिखाई देती हैं। और यह भी एक सत्य है कि यह एक ऐसा उपन्यास है जो कल्पना से कोसों दूर समय,समाज,व्यक्ति,परिवार और उन सब की मानसिकता के यथार्थ को ठोस आधारों पर अभिव्यक्त करते हुए, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की अक्षुण्ण परम्परा को कायम रखते हुए, जीवनमूल्यों की नई परिभाषा को मूर्त करते हुए नारी के जीवन और उसके संघर्ष को खूबसूरत मोड दे कर समाप्त होता है ।
उपन्यास की शुरुआत होती है अनमनी-सी सुस्त कदमों से बँगले के परिसर में टहलती-कथा-नायिका नीना से - वह नीना जो अपने आप में पूरी तरह बन्द है; जो बहुत उदास और गुमसुम-सी है; जो अजीब से सदमे की गिरफ्त में आती जा रही है; जो भीतर से खासी डगमगाई हुई है; जिसने मन-ही-मन अपने आप से बातें करनी सीख ली है; जो खुद अपने लिए भी एक पजल पहेली बन गई है; जो पजल से बाहर निकलना चाहती है पर निकल ही नहीं पा रही; जो पस्त हो चुकी है अपनी जिन्दगी से और अब नितांत अकेले रहना चाहती है कुछ दिन; जो अपने आत्मसम्मान का हनन नहीं करना चाहती; जो इच्छाशक्ति से अपने पैरों पर कायम रहने की पूरी कोशिश के बावजूद अन्ततः हर बार उखडी है; जो अपने को अनावृत्त करके अपने अस्तित्व के लघु हो जाने के आहत भाव से बेचैन होती है और जो जानती है कि - कितना असह्य होता है - मन की वंचनाओं को सबसे छुपाकर ढाँपते चले जाना, दर्पण में अपने ऐसे बौराए प्रतिबिम्बों को देखकर मन का विरस हो जाना। कईं बार क्षत-विक्षत क्षणों को देखना और झेलना। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 41) अर्थात् एक ऐसी नीना जो अपने भीतर की आवाजों के सरोकारों से परे जिन्दगी एवं समाज की तमाम दलीलों और टकराहटों से टकराते-टकराते मानो अपने आप को खो चुकी है । लेकिन जब उपन्यास समाप्ति की ओर होता है तब वह बिल्कुल बदले हुए रूप में सामने आती है जहाँ वह अपनी सभी सामाजिक-पारिवारिक जिम्मेदारियों के कुशल निर्वाह के साथ अपने लेखन की दुनिया में व्यस्त होकर, अपने अतीत, अपने संस्कारों, अपने कुछ खास खून के रिश्तों से नाता जोडती, अपने लेखन को नई धार देती है तथा अपने पहले ही उपन्यास में एक नई जमीन तोडती है, सामाजिक सरोकारों से नाता जोडती है और नारी-संघर्ष की अद्भुत गाथा का बयान करती है ।
दीप्ति ने जितने भी उपन्यासों का सर्जन किया है उन सब में एक उल्लेखनीय विशिष्टता देखने को मिलती है - वह यह कि वे बिना स्त्री-विमर्श के साँचे में बँधे स्त्री के पक्ष को सार्थक एवं सशक्त रूप में सामने लाती हैं । वे अपने अनुभवों के आधार पर और अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता और विजन के आधार पर स्त्री की एक नई छवि लेकर आती हैं-जो बनावटी नहीं लगती, जो यांत्रिक नहीं लगती, जो गढने के लिए सायास गढी हुई नहीं लगती-एक ऐसी छवि नहीं जो पुरुष-सत्ता से, उसकी जडता से, उसके परुष व्यवहार से बदला लेना चाहती है; ऐसी छवि भी नहीं जो अपने पति को - किसी तीसरे को अपनाकर - अपनी विद्रोही मुद्रा दिखाती है; ऐसी छवि भी नहीं जो अपने बच्चों से अलग होकर अपना नया संसार रचती-रचाती है; बल्कि एक ऐसी स्त्री की छवि लेकर आती हैं जहाँ वह सामाजिक-पारिवारिक जडता की तमाम स्थितियों-परिस्थितियों के बीच भी एक दीपक की लौ के समान उजाला देती है और वह दीपक भी ऐसा है जिसका तेल, जिसका स्नेह, जिसकी ऊर्जा, जिसकी चमक तिल-तिलकर समाप्त नहीं होती अपितु और अधिक बढती चली जाती है।
दीप्ति के इस उपन्यास के केन्द्र में नारी है, लेकिन उनके अन्य उपन्यासों की ही तरह इस उपन्यास में भी दिखाई देता है कि वे न तो स्त्री को किसी प्रकार का नकली,बनावटी, दिखावटी या यांत्रिक जमा पहनाती हैं और न ही उसका अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन करती हैं।
हाँ ! यह जरूर है कि वे पूरी शिद्दत से उसके पक्ष को सामने रखती हैं -वह पक्ष जिसका वास्तविकता से नाता है, वह पक्ष जो उसके मानसिक द्वन्द्व से जुडा है, वह पक्ष जिसका संबंध उसके अनेकानेक स्तर के संघर्षों से है । दीप्तिजी के इस उपन्यास में भी नारी के उस पक्ष को देखा जा सकता है जहाँ निर्णय का उहापोह तो है लेकिन अंगद के पाँव की तरह - अपने मूल्यों, अपनी मान्यताओं, अपने आदर्शों, अपने संघर्षों और अपने वजूद की रक्षा के लिए - थिर होने का संकल्प भी है । यह सच है कि बौराए प्रतिबिम्ब की कथा-नायिका नीना स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता और परिस्थिति दोनों के होने के बावजूद अपने आपको विवश पाती है, वह अनेकानेक बार बेचैन होती है, सारी निषेधात्मक-नकारात्मक-अमानवीय-जड शक्तियों के सामने समर्पण करती दिखाई देती है लेकिन उसकी खासियत इस बात में है कि वह उन सबसे बाहर आ अपने एहसास को, अपने हस्तक्षेप को, अपने होने की प्रामाणिकता को साबित ही नहीं करती है, बल्कि अपने वजूद को, अपने अस्तित्व को नए कलेवर के साथ, नई छवि के साथ उभारती हुई सामने आती है।
दीप्ति इस उपन्यास के माध्यम से पुरुष-मानसिकता के प्रति, परम्परा के नाम पर पोषित होने वाली पारिवारिक जडता के प्रति सिर्फ घृणा या अक्रोश ही नहीं व्यक्त करती हैं, बल्कि समूचे परिवेश के कार्य-कारण की श्रृंखला को मनोवैज्ञानिक धरातल के साथ-ही-साथ सामाजिक बनावट एवं बुनावट के धरातल पर व्यक्त करते हुए, उन्हें जाँचते-परखते हुए, उनके अंतर्विरोधों की पहचान कराने में भी सफल होती हैं । गूँगी चीखें खण्ड में ऐसे अनेक चित्र हैं, ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो चीख-चीख कर इसका बयान करती हैं ।
वस्तुतः कथा-नायिका के वैवाहिक जीवन की शुरुआत से ही मानों उपेक्षा और तिरस्कार उसकी नियति बन जाती है । वह अनेकानेक बार उपेक्षित की जाती है, तिरस्कृत की जाती है - फलतः वह जड-सी होती चली जाती है । लेकिन उसके पास एक बडी पूँजी है- उसके संस्कार, उसकी मर्यादाएँ, उसका धैर्य और उसका संघर्ष। गूँगी चीखें खण्ड में दीप्ति लिखती हैं या कहें कथा-नायिका की तरफ से बोलते हुए कहती हैं -किन्तु वह कितनी ही जडविहीन पीढी की समझी जाए, उसकी जडें जहाँ हैं उसे जान पाना इस परिवार के सदस्यों के बस की बात नहीं है। अवचेतन में सक्रिय संस्कार, ऐसे समय में ही प्रकट होते हैं और ऐसे अभाव में भी पूरेपन को ढूँढ लेते हैं । ऐसे संस्कार केवल उस व्यक्ति में ही प्रकट होते हैं जो अपने अहं से मुक्त, कुदरत का ही हिस्सा जैसा होता है । ऐसा व्यक्ति ही विपरीत परिस्थिति में भी हरेक को आश्वस्त करता है। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 25।-58)
यहीं पर एक बात पर और विचार कर लेते हैं । उपन्यास के गूँगी चीखें खण्ड को प्रारम्भ करने से पहले दीप्ति ने हिमानी कुलश्रेष्ठ की कविता की कुछ पंक्तियों को दिया है। एक बारगी इसे देखकर मन में सवाल खडा होता है कि इन पँक्तियों का उपन्यास के बीच यहाँ क्या औचित्य है, लेकिन जब ठहर कर देखते हैं, तो पाते हैं कि ये पँक्तियाँ तो मानों कथा-नायिका की उन चीखों-गूँगी चीखों- का जवाब है, उन चीखों के बीच भी उसकी निष्ठा की प्रस्तुति है, उसकी अपनी ख्वाहिश का इजहार है। हिमानी की पँक्तियाँ हैं -
जैसी भी गुजरी है जिन्दगी....मगर / हमने मुड कर फिर कभी नहीं देखा।
और यह भी कि -
ख्वाहिश है उस शख्स की / जिसको अभी तक नहीं देखा। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 126)
दीप्ति की कथा-नायिका नीना की विशेषता यह है कि वह सिर्फ अतीतजीवी नहीं है । उसके पैर पीछे की तरफ नहीं जाते हैं। वह एक सदानीरा नदी की तरह अपने आसपास की सारी-की-सारी मलिनता को अपने में समेट कर चलती हुई आगे बढती है और अपनी सोच और कर्म की पवित्रता को प्रमाणित करती है । यह उसकी वह पहचान है जो उसे बुझते एहसास के बीच भी रोशन बनाकर रखती है । उपन्यास में नीना अनेकानेक रूपों में हमारे सामने आती है । उसकी जीवन-यात्रा - सहज जीवन-यात्रा नहीं है, सीधी-साधी पगडण्डियों वाली भी नहीं है, बल्कि उसमें तो भयभीत करने वाली ऊँची-ऊँची लहरें भी हैं और बंजर धरती की पीडा भी है; नदियों-सा लहरिल प्रवाह भी है तो वृक्ष-सा सब कुछ देकर नवीन होने की आशा भी है । कदम-कदम पर हमें उसके इन रूपों के दर्शन होते हैं और हर बार अलग-अलग रूपों में- कभी वह उपेक्षाओं और अवमाननाओं में बिंधी नीना है तो कभी अनेकानेक जकडनों की असहनीय तकलीफों से जूझती नीना है; कभी अतीत की अनुगूँजों- आहटों से छुटकारा पाने के लिए तडपती नीना है तो कभी अनछुई प्रेमिल संवेदनाओं से भरपूर आकाश को छू लेने की चाहत वाली नीना है । वस्तुतः वह प्रेम, आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान की चाहत वाली है और अपनी उस चाहत को उसने कईं-कईं बार टूटते हुए पाया है । उसकी खास बात यह है कि इन सब के बावजूद वह टुकडों-टुकडों को भी सँभालती रही है और जडता की अनेकानेक स्थितियों-परिस्थितियों- घटनाओं के बावजूद चेतना की प्रतीति से सराबोर सामने आती है। उसे डर किसी का नहीं है । डर है तो उसे अपने उस कुछ का जिसे वह किसी भी रूप में खोना नहीं चाहती है। और कथा-लेखिका के ही शब्दों कहूँ - जिसे वे तनेश की डायरी में दर्ज कराते हुए तनेश के माध्यम से कहती हैं कि- वह कुछ शायद उनका आत्मसम्मान और आत्माभिमान ही है। (बौराए प्रतिबिम्ब पृष्ठ 10।)
दीप्ति की कथा-नायिका के लिए उसकी निजता भी काफी माने रखती है। वह हमेशा अपनी उस निजता की रक्षा करके चलने वाली है। अपने को परिवेश, परिवार, समाज से जोडकर चलते हुए भी वह अपनी निजता की रक्षा के प्रति हमेशा सतर्क रहती है। उसके पास अपने स्वप्न हैं, उसके पास अपना अभिमान है, उसके पास अपनी कल्पनाएँ हैं। यह बात दूसरी है कि वो स्वप्न, वो अभिमान, वो कल्पनाएँ अनेकानेक बार टूटती-सी, बिखरती-सी दिखाई देती हैं, लेकिन वह अपने को नितांत अकेली और अपने आप से भी मानों अजनबी-सी दिखती हुई भी, न कभी अकेली होती है, न अजनबी । यही वह पक्ष है जहाँ कथा-नायिका बौराए प्रतिबिम्बों के बीच भी - मुकम्मल प्रतिबिम्ब के साथ खडी दिखती है - प्रेम और ऊर्जा से, स्नेह और निष्ठा से, साहस और संघर्ष से भरी-पूरी छवि के साथ।
दीप्तिजी के यहाँ प्रेम के विषय में उनकी कुछ स्पष्ट धारणाएँ हैं जिसे वे कथा-नायिका नीना में भी प्रतिबिम्बित कराती हैं। हम पाते हैं कि नीना के यहाँ प्रेम न तो सामाजिक सुरक्षा और सुविधा का पर्याय है और न ही शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति का पर्याय है । तभी तो वह तनेश - जोकि उसके दिल को समझता है, जो उसकी भावनाओं को समझता है, जो उसके भीतर हिलोरें लेती प्रेमिल संवेदनाओं को समझता है, जो उसकी भीतरी ताकत को समझता है, जो उसके प्रति उसकी तरह की ही संवेदना से भरपूर है- के आगे पूरी तरह से अपने को खोलकर रख देने के बाद भी वह अपने संस्कारों के कारण नारी की मर्यादा को अनजाने में भी नहीं भूलती है। दीप्ति उसकी मनोदशा के चित्र को बडी संजीदगी के साथ प्रस्तुत करती हैं । उदाहरण के तौर पर इन दो चित्रों को देखा जा सकता है -
पहला चित्र : नीना ने निढाल हो उसके कंधे पर सिर टिका दिया। ऐसा महसूस हुआ जैसे सदियों से बीमार रूह ने दुआ पाई हो, सुकून पाया हो । बुझते अहसासात में फिर से कुछ रोशनी लौटी हो । सर्द अहसास की तपिश से सुलगता मन मानो ठण्डी फुहारों में भीग कर पुरसुकून हो गया हो। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 124)
दूसरा चित्र : उस वक्त नीना को महसूस हो रहा था जैसे यह शिकारा उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता फूलों से ढँकी किसी खूबसूरत घाटी पर पहुँचा देगा... जहाँ से वे फिर कभी दर्द भरी दुनिया में नहीं लौटेंगे । जहाँ वह तनेश की बाँहों में सिमटी, नई-नवेली दुल्हन की तरह उतरेगी... अपने ख्वाबों की सरजमीन पर। बादलों से भरे आसमान तले, उसकी माँग में कलियाँ सजा देगा वह। ममम नीना ने तनिक संकोच से उसकी ओर देखा, उसकी दृष्टि की कोमलता, हाथों का हल्का प्रेमिल स्पर्श, मृदु चेहरा... यह सब सह पाना उसके लिए कठिन हो गया, उसकी आँखें मुँद गईं, वह उसके सीने में समा गई। सजीला दिन...जिसके चारों तरफ चैन-ही-चैन ! भीगे आँचल तले ख्वाहिशों, उमंगों और आरजुओं की तपिश। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 35।-58) लेकिन सारी चाहतों को पूरी होते देखने की कल्पना के बाद भी वह स्वयं जो निष्कर्ष निकालती है वह निष्कर्ष रेखांकित करने योग्य है और उससे वह अपनी नई छवि के साथ हमारे सामने आती है। वस्तुतः उसका निष्कर्ष कथा-लेखिका की सोच और दृष्टि के अनुरूप है जो कथा-नायिका नीना की सोच और दृष्टि में प्रतिफलित होती दिखाई देती है। दीप्ति लिखती हैं - गहरी नींद ले लेने के बाद नीना सोच रही थी, यह जो कुछ उसके लिए अनमोल है, स्वार्गिक है - वह दुनिया की नजर में कितना सस्ता, उपहासास्पद है ! रजाई के बाहर निकला हाथ कँफपा उठा । (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 358)
वस्तुतः स्त्री-पुरुष-सम्बन्धों के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पक्षों को, स्वस्थ भावनाओं को, संवेदना की बहुविध रेखाओं को तथा अनेकानेक अनछुए प्रसंगों को दीप्ति ने जिस खूबी के साथ वाणी प्रदान किया है वह हिन्दी उपन्यास-लेखन के क्षेत्र में अपने आप में अनूठा है। निस्संदेह दीप्ति की कथा-नायिका नीना छुईमुई जैसे नहीं है और जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि न ही वह अपनी किसी भी तरह की जरूरत के लिए मर्यादा से विचलित राह पर चलने का आचरण करती है । सच तो यह है कि बौराए प्रतिबिम्ब में स्त्री-पुरुष संबंध के दो रूप देखने को मिलते हैं -
पहला रूप : कथा-नायिका नीना और उसके पति विनय के रूप में दिखाई देता है- जहाँ सम्बन्धों में निषेध, अपमान, तिरस्कार, अवहेलना, परुषत्व की प्रधानता है; जहाँ पुरुष का अहं है; जहाँ उपेक्षा एवं तिरस्कार के अनेकानेक क्षण हैं; जहाँ अपने को सर्वोच्च मानने का परुष-भाव है, जहाँ लगाव और अपनेपन का नितांत अभाव है; जहाँ दूसरों को विशेषकर अपनी पत्नी को (और अपने बच्चों को भी) कमतर आँकने और समझने की थोथी सोच है; जहाँ यौनिक अत्याचार है; जहाँ सम्बन्धों के बीच यांत्रिक एवं बनावटी व्यवहार है और इसीलिए जहाँ हीनताबोध की स्थितियाँ देखने को मिलतीं हैं।
और दूसरा रूप : कथा-नायिका नीना और उसकी संवेदना से अपनी संवेदना को जोडकर चलने वाले तनेश के रूप में देखने को मिलता है- जहाँ सम्बन्धों के बीच एक खुलापन है; जहाँ आपस की गहरी समझ है; जहाँ मर्यादित प्रेम है; अपने को उत्सर्ग करने का भाव है; जहाँ एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान है; अपने को विधाता नहीं, अपितु सिर्फ एक निमित्त भर मानने का भाव है; जहाँ सम्बन्धों में एक विशेष प्रकार की संवेदनशीलता, तरलता एवं स्वाभाविकता है; जहाँ मित्रवत भाव है; जहाँ यौनिक मर्यादा है । शायद इसीलिए दोनों के व्यक्तित्व और भावनाओं में उन्मुक्तता एवं उदात्तता देखने को मिलती है। सच तो यह है कि तनेश वह पात्र है जिसके चरित्र में दया, माया, ममता, करुणा जैसे नारी-सुलभ गुण कदम-कदम पर देखने को मिलते हैं ।
सच तो यह है कि यहाँ दीप्ति ने एक स्त्री कि व्यथा-कथा की संघर्षपूर्ण यात्रा को स्त्री-संवेदना और स्त्री की दृष्टि से देखा है। इन सारे सम्बन्धों तथा जाने-अनजाने घटित होने वाली घटनाओं के बीच कथा-नायिका नीना अपने उस गुण के कारण विशेष रूप से अपनी ओर ध्यान खींचती है जो उसके संयमित आचरण से जुडा है। वह पुरुष द्वारा बनाए गए नैतिक मानदंडों से सहमत नहीं होती है, लेकिन उनको वह चुनौती नहीं देती है बल्कि अपने नए मानदण्डों की सर्जना करती है । ये नैतिक मान क्या हैं? इसका जवाब तो उपन्यास से गुजरते हुए कदम-दर-कदम की यात्रा के साथ स्वतः ही मिलता जाता है, लेकिन मैं यहाँ शायर उमैर न*मी के उस शेर जो उपन्यास के समर्पण के बाद दिया गया है -ये रूह बरसों से दफ्न है तुम मदद करोगे / बदन के मलबे से इसको जिंदा निकालना है।
निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिन्दा / अब इस परिन्दे के दिल से पिंजरा निकालना है। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 358)
वस्तुतः सच्चाई यही है कि दीप्ति ने इस उपन्यास के बहाने से एक रचनात्मक व्यक्तित्व के भीतर कुलबुलाते और दफ्न सर्जनात्मक रूह को मानों बदन के मलवे से डायरी-लेखिका, उपन्यास-लेखिका, कहानी-लेखिका के रूप में जिंदा निकाला ही नहीं है, बल्कि उसकी संवेदना और उसके सौंदर्यबोध को भी बखूबी जीवंत किया है । और यह भी एक तथ्य है कि वे कथा-नायिका नीना को पिंजरे से बाहर निकालने में तो सफलता हासिल करती ही हैं, साथ ही उसके मन के भीतर जिस पिंजरे ने घर कर रखा था और जिसे वे निकाल बाहर करना चाहती हैं उसे निकालने में भी वे सफल हुईं हैं। एक तरह से देखें, तो यह दीप्तिजी की साहित्यिक धर्म-पालन की भी एक उल्लेखनीय सफलता है। अगर मैं यह कहूँ, तो वह अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पिंजरे से परिन्दे को और परिन्दे के भीतर से पिन्जरे को निकालने के लिए ही वे संवेदनशील, भावुक, सरल, सहज, और जीवन को संपूर्णता में जीने की चाहत रखने वाली नारी नीना तथा रूखे व्यवहार वाले, लापरवाह, चरित्र से कमजोर, गैरजिम्मेदार, पुरुषत्व के अहंकार में डूबे, छोटी-छोटी बातों पर बौखलाने वाले, संकीर्ण सोच वाले, कुतर्की और असंवेदनशील पति विनय के बीच तीसरे अर्थात् तनेश को लेकर आती हैं - उस तनेश को जो संवेदनशील है, जो खुली सोच वाला है, जो प्रेमिल भावनाओं वाला है, जो चरित्र से मर्यादित है, जिसमें लेशमात्र भी अहंकार नहीं है और जो छोटी-सी-छोटी बातों को भी हृदय से समझने-समझाने की सोच रखता है। इस तरह यह तीसरा अर्थात् तनेश उपन्यास को और उपन्यास की कथा-नायिका नीना दोनों को सार्थक मोड देने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
इस त्रिकोण के महत्त्व पर विचार करने से पहले दीप्ति के समर्पण पर नजर डालते हैं। समर्पण के पहले ही बिन्दु में दीप्ति कहती हैं- बियाबान में खडे उस खण्डहर को जिसकी ध्वस्त दीवारों में एक खिडकी फिर भी बची रह जाती है, बाहर से रोशनी और हवाओं को भीतर आने देने के लिए। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 03) वस्तुतः यह तीसरा अर्थात् तनेश ध्वस्त दीवारों की उस खिडकी को बचाता है जिससे कथा-नायिका के हृदय में, उसके मन-मस्तिष्क में, उसकी सोच में, उसके कर्म में नई रोशनी और नई हवाएँ आवाजाही करने में सफल होती हैं। समर्पण का दूसरा बिन्दु है -उस गहन कालिमा को जो उजालों की तरफ जाने को उकसाती हैं। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 03) वस्तुतः यह तीसरा अर्थात् तनेश कथा-नायिका के लिए बहुत बडी प्रेरणा बन कर आता है। जीवन के तमाम गहन कालिमा वाले अंधकारों के दौर से कथा-नायिका को निकालने में तनेश महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है- वो कालिमा जो उसे ससुराल से मिली, पति विनय से मिली, सास-ससुर से मिली, उन सारी कालिमाओं को उजालों में बदलने का कार्य करता है- यह तनेश । समर्पण का एक बिन्दु है जिसमें वे लिखती हैं- उन पगलाई अनुगूँजों को जिनमें जिन्दगी की तडप होती है। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 03 ) हम यह नहीं भूल सकते हैं कि कथा-नायिका की सारी-की-सारी पगलाई गूँजें-अनुगूँजें उसकी जिन्दगी के कुएँ में ही घुटकर रह जातीं यदि यह तनेश तीसरे के रूप में उसके जीवन में न आया होता। बेशक यह तनेश ही है जो नीना की पगलाई गूँजों-अनुगूँजों को जिन्दा करता है और जिसके चलते उसमें जिन्दगी को एक बार पुनः नए तरह से - अपनी तरह से जीने की तडप पैदा होती है । दीप्तिजी के इस उपन्यास से ही शब्दों को उधार ले कर कहूँ कि जी हाँ ! यह तनेश ही है जो कथा-नायिका के लिए मेंटल नरिश्मेण्ट का कार्य करता है ।
वस्तुतः कथा-नायिका नीना एक जीवन्त चरित्र है इसलिए दीप्तिजी नहीं चाहती हैं कि कुछ एक घटनाओं तथा कुछ एक व्यक्तियों की संकीर्ण सोच एवं व्यवहार के चलते एक जीवंत पात्र का जीवन बिखर जाए। वे उसकी जीवंतता को ही सुरक्षित नहीं करना चाहती हैं, बल्कि उसे पूरी तरह से उमग कर उगने देना चाहती हैं; उसे सहज एवं स्वाभाविक रूप में अपनी तासीर के साथ दीप्त होते देखना चाहती हैं । और शायद इसीलिए वे उसे नियति से स्पर्श जरूर कराती हैं लेकिन नियतिवादी की तरह उसे व्यवहार करते हुए नहीं देखना चाहती हैं । वे उसे विज्ञान-सम्मत, विश्वास-सम्मत, संघर्ष-सम्मत, मूल्य एवं मर्यादा-सम्मत जीवनसूत्रों को लेकर आगे बढाना और बढते देखना चाहती हैं। कथा-नायिका नीना के पहले पक्ष को देखकर एकबारगी लगता है कि इस चरित्र की परिणति दो ही रूपों में हो सकती है याकि होगी -- एक : वह नारी की रूढ और परम्परागत जडता की अथवा नियति की शिकार होगी और उसी में बँधी कोल्हू के बैल की तरह जीवन जीने के लिए विवश होगी और पुरुष का अहंकार, उसकी जडता, उसका परुषत्व जीत जाएगा । दूसरा : यह कि वह अतिआधुनिकतावादी नारियों की तरह अपने सारे सम्बन्धों, मूल्यों एवं मर्यादाओं को ठोकर मार अपने को बोल्ड नारी या कहें बोल्ड स्त्री के रूप में सामने लाएगी, जहाँ सिर्फ वह होगी और उसका वर्तमान होगा - अतीत के सम्बन्धों से पूरी तरह रहित । लेकिन ऐसा नहीं होता है । और ऐसा न होने के पीछे कथा-लेखिका दीप्ति कुलश्रेष्ठ की लेखकीय मर्यादा, सोच तथा उनकी नारी की संघर्षशील जीवंत प्रतिमा के निर्माण को भारतीय आदर्शों से दीप्त रखने की चाहत रही है । इसीलिए वे नीना के द्वारा पारिवारिक, सामाजिक एवं नैतिक मर्यादाओं को कहीं भी, किसी भी रूप में खंडित नहीं होने देती हैं । और इसी चाहत के चलते कथा-नायिका नीना का व्यक्तित्व प्रतिभा, त्याग, सहिष्णुता, सहनशीलता, संघर्ष और मर्यादित हस्तक्षेप से दीप्त है । वह सृष्टि के सौंदर्य के एक-एक कोने को, एक-एक पक्ष को, एक-एक विस्तार को अपने में समेट लेना चाहती है; वह परिवार एवं समाज के बंधनों में बँधकर भी उन्मुक्त रहना चाहती है; वह यांत्रिक भाव से किसी को बाँधना भी नहीं चाहती है; वह अपने साथ-ही-साथ अपने आसपास को भी उन्मुक्त वातावरण देना चाहती है; वह जडता में नहीं गतिशीलता में विश्वास करती है। सच तो यह है कि उसमें जिन्दगी को नए साँचे में ढालने की एक जिद रही है और उस जिद को सार्थक आयाम तक पहुँचाने में सफल भी होती है।
यह उपन्यास यौन साहसिकता को छूकर निकल जाता है । ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कथा-लेखिका यदि चाहतीं तो तीसरे के रूप में तनेश की उपस्थिति के साथ - नए बनते वातावरण के बीच - वे कथा-नायिका को यौन संबंधों की उन्मुक्तता की ओर यात्रा करा कर बोल्ड लेखन के संसार से अपने को जोड लेतीं, लेकिन निश्चित तौर पर उनका लेखकीय आदर्श औए धर्म उन्हें उस राह की ओर नहीं ले जाता है बल्कि उसे एक मनोवैज्ञानिक मोड पर ले जाकर - भारतीय सभ्यता, संस्कृति और मूल्यगत सोच और दृष्टि से जोड देता है, जिसके चलते प्रेम-सम्बन्धों का औदात्य भी बना रहता है और पवित्रता की डोर भी नहीं टूटती है । और इसीलिए अनेक आधुनिकतावादी उपन्यासों की तरह यहाँ स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के कच्चे-पक्के, झूठे-सच्चे, क्षण-क्षण में टूटते-बनते सम्बन्ध नहीं दिखाई देते हैं । निस्संदेह यह उपन्यास सिर्फ नारी की व्यथा-कथा का ही प्रामाणिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह - परम्परागत जड परिवारों के पुरुषों एवं स्त्रियों की जडता और उनकी संकीर्ण, भोथरी मानसिकता का भी दस्तावेज है; पढे-लिखे होने के बावजूद नारी को कमतर आँकने की सोच वालों के क्रियाकलापों का भी दस्तावेज है; मानसिक धरातल पर एक युवा के डूबने और उभरने का भी दस्तावेज है; एक नारी के सार्थक समर्पण और हस्तक्षेप का भी दस्तावेज है ।
बौराए प्रतिबिम्ब उपन्यास विचार की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है । प्रेम के विषय में, चाहत के विषय में, सम्बन्धों के विषय में दीप्ति के विचार और उनकी सोच बिल्कुल स्पष्ट है। वे जीवन एवं समाज के बीच रहते हुए प्रेम को, चाहत को, सम्बन्धों को पूरी संवेदना, पूरी ईमानदारी, पूरी निष्ठा, पूरे समर्पण के साथ जीना चाहती हैं। इसीलिए वे हर एक से उसी तरह की संवेदना, ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण की चाहत रखती हैं । प्रेम और चाहत के चित्रों को प्रस्तुत करते समय दीप्ति भावुक-सी हो जाती हैं। एक चित्र देखिए जिसका संबंध कथा-नायिका नीना और तनेश से है - उसकी मुस्कानों में सहस्रो आमंत्रण थे। कमरे में छाई स्तब्धता उसकी आवाज को छू रही थी । नीना के गुलाबी होंठ कँफपा उठे, उन काँपते होंठों को तनेश ने अपनी अँगुलियों से छुआ, इस छुवन से वह लरज उठी, वह चुप थी, किन्तु उत्कंठित प्रकम्पन उसकी देहयष्टि में था, उसकी उष्ण उसाँसें तनेश को स्पर्श कर रही थीं । हर अगला निमिष असह्य होता जा रहा था, तनेश ने बाँहों का अर्धवृत्त-सा बनाकर नीना को थाम रखा था । उसकी तरुणाई की चंचलता ने उच्छल-उज्ज्वल झरने की तरह नीना को सराबोर कर दिया । उसकी आँखों में प्यार का सागर लहरा रहा था । उसके स्पर्श की स्निग्धता से भीगी... ! उफ ! सुख के इन क्षणों में वह नितांत अकेली है, अपनी निजता के अधिकार में ! निष्प्रयास मिल रहा था सब ! कोई खलल नहीं ! अपने आप में सिमटा एकांत ! ऐसा सुख उसके भाग्य में ! उसकी आँखें फिर भीग गईं जिन पर सहसा तनेश के होंठ आ लगे । वह जैसे नीना से बडा हो गया था, वह एक कपोती की भाँति उसके सीने में समा गई। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 335)
ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस उपन्यास के अंतर्गत दीप्ति ने पति-पत्नी के बीच तनेश के रूप में तीसरे को उपस्थित जरूर किया है, लेकिन यह उपस्थिति जैविक जरूरतों के लिए नहीं है, बल्कि मानसिक जरूरतों के लिए है, भावनात्मक जरूरतों के लिए है। इसीलिए उसमें मर्यादा है, संयम है, आदर्श है, खुलापन है । यह तीसरा उसे भटकाता नहीं; न ही अपना कोई जगमगाता संसार दिखाकर लुभाना चाहता है; न ही कल्पना-लोक में विचरण करवाता है; न ही अपनों से बाँटता याकि काटता है । वह कथा-नायिका की उस सोच को जानता और समझता है कि - सेक्स इज नॉट ए वायलॉजिकल नैसैसिटी; इसलिए वह उसे मानसिक हौसला देता है, सही राह दिखाता है, उसे यथार्थ से रूबरू करवाता है, उसे उसके अस्तित्व का भान करवाता है। और यही वह धरातल है जहाँ तीसरा खलनायक के रूप में नहीं बल्कि असली नायक के रूप में खडा दिखाई देता है ।
वस्तुतः इस तरह के अनेक चित्र हैं, अनेक घटनाएँ हैं जिनसे सजा-सँवरा यह उपन्यास भावों और विचारों के अद्भुत सम्मिलन के साथ सामने आता है । सच तो यह है कि यह एक बडे कैनवास वाला चरित उपन्यास है जिसकी संरचना के अनेक कोण हैं। कथा-नायिका नीना के चरित्र की सार्थक पूर्णता ही इस कथाकृति को ऊँचाई देता है। कथा-नायिका के अपने संस्कार हैं, अपनी शिक्षा-दीक्षा है, अपनी चाहत है, अपनी प्रेमिल संवेदनाएँ हैं। जिस जमीन से वह आई है वैसी ही जमीन की चाहत रखते हुए वह नई जमीन का निर्माण करना चाहती है। उसका अपना चिंतन है, अपनी न हारने वाली सोच है, जिसके चलते वह तमाम विवशताओं के बीच भी अपनी सार्थकता की तलाश को विराम नहीं देती । यह भी तो एक सत्य है कि व्यक्ति की चेतना का, उसके ज्ञान का, उसके हस्तक्षेप की दशा और दिशा का निर्माण एवं विकास परिवेश, परिवार एवं समाज के बीच में ही होता है - उसी परिवेश, परिवार एवं समाज के बीच जिसमें वह चाहे-अनचाहे जीवन जीता है । इस प्रकार परिवेश के साथ, परिवार के साथ एवं समाज के साथ उसका जो संघर्ष होता है, वह संघर्ष ही उसके व्यक्तित्व-निर्माण की पहली सीढी होती है । कथा-नायिका नीना के व्यक्तित्व का निर्माण भी परिवेश, परिवार एवं समाज की टकराहटों के बीच ही होता है।
दीप्तिजी की कथा-नायिका नीना बहिर्मुखी है और सूक्ष्मदर्शी भी, भावुक भी है और अतिसंवेदनशील भी। इसीलिए वह उदासी और पीडा के बीच भी, पराजय एवं टूटन की स्थितियों के उपस्थित होने के समय भी चिंतनशील बनी रहती है, अपनी सोच को दुरुस्त रखने की कोशिश करती है, वर्तमान से अतीत और अतीत से वर्तमान के संदर्भों को देखने और जोडने की कोशिश करती है। अति संवेदनशीलता के चलते वह छोटी-सी-छोटी घटना से भी उद्वेलित हो उठती है। थोडा-सा भी, हल्का-सा भी आघात उसकी संवेदनाओं को झनझना देता है । उसमें भावुकता का प्राधान्य है, इसीलिए सिंक में पडी दो जूठी प्लेटें देखकर जब उस पर यह शक किया जाता है कि कोई उससे मिलने आया होगा, तब वह चिंतित भी होती है और आक्रोश में भी आती है। वह सोचती है कि वह यहाँ अजनबियों की तरह रहते हुए भी शक का शिकार होगी। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 180) इसी तरह ननद की बाली की चोरी का इलजाम लगाए जाने पर, चोरी से दूध पी लेने का तोहमत लगाए जाने पर वह बेचैन हो उठती है । वह महसूस करती है जैसे- उस पर ऐसे-ऐसे दोष लगाकर वह मानसिक विक्षिप्तता की ओर ढकेली जा रही थी। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 263) यद्यपि वह जानती है कि अपने ससुराल के इन जड मानसिकता वाले लोगों के सामने कुछ कहने का फायदा नहीं है क्योंकि काली भीत के आगे रोए और अपने नयन खोए। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 263) लेकिन वह ऐसी स्थितियों-परिस्थितियों से विचलित नहीं होती है और यह भी कि वह न तो काली भीत के आगे रोती है न अपने नयनों को खोती है । लेकिन यह एक सच जरूर है कि उसकी गूँगी चीखें उपन्यास में पूरी मार्मिकता के साथ मुखरित हुई हैं।
वस्तुतः नीना स्त्री-पुरुष के बीच, पति-पत्नी के बीच सम्बन्धों में प्रेम और संवेदना को जरूरी मानती है। और वह यह भी चाहती है कि उन सम्बन्धों में एक तरह की आध्यात्मिक पवित्रता होनी चाहिए। और यह भी एक सच है कि वह जिस पवित्रता, जिस संवेदना, जिस प्रेम की चाहत रखती है वह नीना को अपने पति विनय में रंचमात्र भी नहीं दिखाई देता है, अपितु वह पवित्रता, वह संवेदना, वह प्रेम उसे तनेश में दिखाई देती है। और यही कारण है कि वह सहज ही उसकी भावनाओं के करीब आता जाता है, और शायद इसीलिए वह तनेश के साथ अपने आपको सहज महसूस करती है। कथा-नायिका के आसपास के रिश्तों को समझने की कोशिश करें तो हम पाते हैं कि नीना और उसके पति विनय के बीच पति-पत्नी का रिश्ता जरूर है, लेकिन संवेदनापूर्ण रिश्ते, हृदय से जिए जाने वाले रिश्ते, प्रेमिल भावनाओं से भरे रिश्ते की एक झलक तक भी नहीं मिलती है। सच तो यह है कि संवेदनापूर्ण हार्दिक रिश्तों की जिस चाहत को लेकर नीना आई थी उसे वह पूरी जिंदगी तलाशती रह गई, लेकिन उसकी वह तलाश कभी पूरी नहीं हुई। दूसरी ओर नीना और तनेश के सम्बन्ध कुछ ही समय के रहे लेकिन दोनों के बीच संवेदनापूर्ण हार्दिक रिश्ते की भरपूर झलक देखने को मिलती है ।
सच तो यही है कि प्रेम के लिए, संवेदना के लिए, आदर्शों के लिए, मूल्यों के लिए, परिवार के लिए, जीवन के सुकून के लिए, अपने वजूद को बचाए रखने के लिए कथा-नायिका नीना को जीवन भर संघर्ष करना पडा। उसे एक के बाद एक निराशा मिली, अनेक बार वह टूटन से गुजरी, अनेक बार उसमें क्षोभ जन्मा, न मालूम कितनी बार वह व्याकुल और बेचैन हुई और ये सारी-की-सारी स्थितियाँ उसके लिए चुनौतियाँ थीं; लेकिन उसने हर एक चुनौती का सलीके से सामना किया, पूरी सामर्थ्य और विवेकनिष्ठता के साथ उनसे रूबरू हुई और सबसे बडी बात यह कि उसने सब पर सार्थक विजय भी पाई - विजय भी अपने सोचे का, अपने तईं का, अपने ढंग का । कथा-नायिका नीना की विजय परम्परा से बनी-बनाई विजय की परिपाटी से भिन्न और उल्लेखनीय रचनात्मक विजय है । अज्ञेय लिखते हैं कि - मनुष्य की विवेकवत्ता और आत्मचेतना ही उसे आत्यंतिक रूप से पशु से अलग कर देती है। (अज्ञेय : स्रोत और सेतु, पृष्ठ : 112) कहना न होगा कि यदि कथा-नायिका नीना अपनी विवेकवत्ता और आत्मचेतना से जुडकर सामने न आती तो उसका वजूद जड परिवार के खूँटे में बँधे जानवर से *यादा न होता । लेकिन वह अपनी विवेकवत्ता और आत्मचेतना के बल पर - जड परिवार और उनके गाडे गए खूँटे और संकीर्ण सोच के आसपास रहते हुए भी - मनुष्यता की कसौटी पर खरी उतरती है ।
अज्ञेय यह भी कहते हैं कि - अपने से बडा कुछ रच सकने की और लगातार रचते रहने की शक्ति, यह अशेष सर्जनशीलता ही मनुष्य की मनुष्यता की कसौटी है । मानव इसलिए मानव है कि वह मूल्यों का स्रष्टा है और उसके सरजे हुए ये मूल्य उससे बडे हैं और उसे इस बात का बोध है। (अज्ञेय : स्रोत और सेतु, पृष्ठ - 113) अज्ञेय के इस कथन के परिपेक्ष्य में कथा-नायिका नीना को देखें, तो हम पाते हैं कि उसमें अपने से बडा रचने की चाहत है, वह सर्जनशील है, वह मूल्यों में विश्वास रखने वाली है। यह अशेष सर्जनशीलता ही उसे टूटने पर भी बिखरने से बचाती है। वह अपनी चाहत के कुछ मूल्यों को लेकर ससुराल आती है और अनेकानेक बाधाओं, विसंगतियों, विडम्बनापूर्ण स्थितियों के बावजूद वह अपने उन मूल्यों से नाता नहीं तोडती है, उसे उन मूल्यों के महत्त्व का बोध है, तभी तो वह यह भी जानती है कि - तनेश कभी-न-कभी उससे अलग होगा ही। और इस सत्य को जानते हुए भी उसके उस अलभ्य प्रेम को वह जी लेना चाहती है । उसे वह अपने जीवन में आया हुआ अप्रत्याशित मोड मानती है । और जिसकी आकांक्षा उसे सदा रही, वैसा अलभ्य-प्रेम उसने पाया । जिसे पाने को इतने बरस तरसती रही और जूझती रही, उसे तनेश से निरायास ही पा लिया । उसे लगता था यह सब पाना शायद बहुत अलग-अनूठा-सा होता होगा... !
कुछ खास... ! किन्तु ऐसी विलक्षणता से भरी घटना नहीं घटी । सब कुछ कितना चुपचाप चलता चला आया उसके पास... ! और कब इस सागर में इतने गहरे उतर गई, जान ही नहीं पाई । (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 345) लेकिन यह भी एक सच है कि अलभ्य-प्रेम के सागर में गहरे उतर जाने के बाद भी वह अपने मूल्यों के प्रति अत्यंत सजग है । उसका मूल्य-बोध, उसके अपने सिरजे हुए या संस्कारों से पाए मूल्य और भी मूर्त होकर तब सामने आते हैं जब वह तनेश से उसके स्वयं के जीवन तथा जीवन-साथी के विषय में गम्भीरता से सोचने के लिए कहती है । वह कहती है - तुम्हारे घर वाले तुम्हारे लिए अच्छी लडकियाँ देख रहे हैं, तलाश कर रहे हैं... लेकिन तुम किसी को भी पसंद नहीं कर रहे! टालते जा रहे हो ! यह मुझे जरा भी अच्छा नहीं लग रहा। अपराधबोध होता है तनेश ! क्या तुम समझ सकते हो इस भावना को ।ममम इतने समय तक जो तुम्हारा प्यार मुझे मिला, मैं इसकी ऊष्मा में जी लूँगी तनेश ! अब तुम्हें अपने जीवन के बारे में गंभीरता से सोचना पडेगा । जीवन-संगिनी का चुनाव करना पडेगा । वक्त रहते यह कर लो... अच्छी जीवन-साथी मिल जाएगी । मेरी तमाम दुआएँ तुम्हारे लिए हैं। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 350) सच तो यह है कि वह ऐसा इसलिए कह पाती है क्योंकि उसमें मानवीय मूल्यों के न मालूम कितने आयाम एक साथ क्रियाशील रहे हैं । उसका सौंदर्यबोध तोडने या बिगाडने की नहीं, बल्कि बनाने और रचने की कल्पना से ओतप्रोत रहा है । यहाँ वह अपने इस निर्णय से अपने व्यक्तित्व, अपने चरित्र, अपने स्वभाव को और भी ऊँचा उठा लेती है, जिसकी थाह पाने की कोशिश उसके पति विनय या पति के परिवार वालों ने कभी नहीं की।
वस्तुतः कथा-नायिका एक ऐसे दकियानूसी, जड परम्परावादी परिवार में रह रही थी जहाँ - वे सब शक्तियाँ मौजूद थीं जो मनुष्य को एक संकीर्ण यांत्रिक ढाँचे में बन्द करने को आतुर थीं। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 19।) उसकी गलती सिर्फ इतनी रही है कि वह यह जानते हुए भी कि
विनय- जिसके दिल में उपेक्षा, अवहेलना, अपमान, तिरस्कार जैसी निषेधात्मक - नकारात्मक भावनाएँ भरी हुई हैं, उस विनय में भी वह प्यार और अपनापन ढूँढती है; जिस विनय के भीतर सिर्फ हक जताने की प्रवृत्ति है, जो हर समय उस पर चौकसी रखने की आन्तरिक भावना रखता हो, उस विनय में भी वह दया, करुणा, प्रेम और संवेदना की खोज करती रहती है; वह विनय जो सिर्फ अपनी हित-चिन्ताओं में डूबा रहता हो, उससे पर-पीडा को समझने की चाहत रखती है; जो विनय जन्मजात स्वार्थ-स्वभाव वाला है-क्रूरता की हद तक के स्वभाव वाला है, उसमें वह संवेदनशीलता की खोज करती है । यही नहीं अपितु हर चीज को अपने सिरे से नापने और आँकने वाले विनय से न्याय की चाहत रखती है । और अपने इस तरह के हर खोज में, हर चाहत में वह टूटती ही है, लेकिन खास बात यह है कि टूट-टूट कर भी वह टूटती नहीं, बल्कि और अधिक सबल रूप में खडी हो आगे बढने की कोशिश करती है। उसकी इस सकारात्मकता की ओर संकेत करते हुए दीप्तिजी लिखती हैं - नीना की आँखों में बार-बार भर आए आँसुओं ने उसकी दृष्टि को धुँधला करने के बजाए गहरी अंतर्दृष्टि और नीर-क्षीर विवेकात्मक आलोचना से समृद्ध किया। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 198)
उपन्यास में हम पाते हैं कि दिव्यांश उसकी इस स्थिति को समझता है तभी तो वह अपनी मम्मी से कहता है कि - अपने आप को एंटीफ्रेजाईल बनाइए। अर्थात् जितनी बार कोई चीज टूटे उतनी ही बार और *यादा मजबूत होकर खडी हो जाए...। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 559) निस्संदेह वह अपने को एंटीफ्रेजाईल बनाती है और इसीलिए हर टूटन के बाद वह और अधिक मजबूत होकर सामने आती है; उसकी अंतर्दृष्टि में पैनापन आता है; उसका विवेक और अधिक जाग्रत अवस्था में दिखता है । तभी तो उसे - अब यह सोचकर दुःख नहीं होता कि विनय उसके भीतर उठते हुए अर्न्तद्वन्द्व को कभी समझ नहीं सका । (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 576) हम यह भी देखते है कि दिव्यांश स्वयं भी टूटता है, बिखरने की कगार तक चला जाता है, उसका आत्मविश्वास डगमगा जाता है, लेकिन अपनी माँ और अपने सच्चे-अच्छे दोस्तों की सहायता से वह पुनः जीवन में लौटता है और जब वह लौटता है तब उसे हम बिल्कुल बदले हुए रूप में पाते हैं। हम देखते हैं कि वह साहस से भरपूर हो गया है, ऊर्जावान हो गया है, अँधेरों से बाहर आ गया है। इसलिए जब वह अपनी माँ को टूटते हुए देखता है तब उसे वह साहस देने का कार्य करता है, उसमें नई ऊर्जा का संचार करता है, उसे उसके अँधेरों से बाहर लाने वाला बनता है, वह उससे छोटा होते हुए भी उसे प्रेरणा देने वाला बनता है। वह कथा-नायिका का पुत्र है, उम्र में बहुत छोटा है, पर विचार में बडा है, साहस में बडा है, सोच में बडा है, उसे पता है कि कुछ लोगों ने मिलकर उसकी माँ की पहचान छीन ली है । तभी तो वह अपनी माँ से बार-बार जंजालों से बाहर निकलने की बात करता है, अपने वजूद को पहचानने की बात करता है। वह कहता है - आपको हर बात के लिए अपराधबोध क्यों होता रहता है ? क्या आप हर बात के लिए अपराधी हैं ? आप इससे बाहर निकलिए मम्मी ! वह ठीक नहीं है ! इस तरह आप अपने मन पर जाने कौन-कौन से बोझ ढोती रहती हैं ! मैं चाहता हूँ कि अब आप इस सबसे बाहर आ जाएँ ! (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 564) वह यह भी कहता है कि -मम्मी ! आप अब तक अपने जीवन में सबको खुश करने में लगी रहीं... और अपनी खुशियाँ दाँव पर लगाती रहीं, उन्हें गँवाती गईं और फिर भी कोई खुश नहीं हो पाया, तब भी आप अपराधबोध का शिकार होती रहीं....! जिसने आफ आत्मविश्वास को भी लडखडा दिया...। अब मैं चाहता हूँ कि आप सिर्फ और सिर्फ अपनी खुशियाँ हासिल करें...अपने लिए जिएँ...। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 564)
मैंने प्रारम्भ में ही यह कहा है कि इस उपन्यास से गुजरना एक जीवन-यात्रा से गुजरना है । कथा-नायिका के साथ कथा-लेखिका ने पूरी निष्ठा से, पूरी संवेदना से, पूरे अपनेपन के साथ यात्रा की है और शायद इसीलिए वह बिखरती नहीं, बल्कि एक मुकम्मल स्त्री बनकर, रचनात्मकता से परिपूर्ण सर्जनात्मक व्यक्तित्व बनकर सामने आती है। दीप्ति तनेश से उसकी डायरी में लिखवाती है -जो भी हो समय रहते यदि कोई जान लेता कि वे क्या हैं, तो वे जो बिखर रही हैं, नहीं बिखरतीं इतना ! और शायद सँभल जातीं। अब तक वे अकेली ही यात्रा कर रही हैं तो कैसे कोई यह रहस्य जानेगा कि वह रहस्य क्या है जो उनकी ऐसी नियति को निर्धारित कर रहा है ? यदि वे ऐसे ही बिखरती चली गईं तो वह रहस्य हमेशा के लिए लुप्त हो जाएगा । अगर हमें सब जानना है तो हमें उनकी यात्रा, उनके कठिन समय, उनकी जटिल हो चली मनःस्थिति के साथ सतत रहना होगा। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 10।)
निस्संदेह इस उपन्यास को समझने के लिए हमें भी कथा-नायिका नीना की जीवन-यात्रा के साथ यात्रा करना होगा, तभी हम उसकी सोच और उसके संघर्ष के बीच के सारे आयामों को भलीभाँति समझ पाएँगे और इतिहास के जिन पन्नों को यहाँ पलटा गया है उन पन्नों पर जितनी भी गूँगी चीखें हैं, जितनी सुलगती परछाइयाँ हैं, जितनी विक्षिप्त ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ हैं उन सबसे हम रूबरू हो सकेंगे । वस्तुतः अनेकानेक बौराए प्रतिबिम्बों को अपने में समेट कर चलने वाले इस उपन्यास का एक सच यह भी है कि यह उपन्यास कल्पना के पंखों पर उडान नहीं भरता है, बल्कि इसका सीधा सम्बन्ध परिवेश, परिवार, समाज और व्यक्ति की मानसिकता और उसके व्यावहारिक - अव्यावहारिक यथार्थ से है । इसीलिए यह मनोरंजन नहीं करता बल्कि हमारे विवेक को जाग्रत करता है, हमारी संवदनाओं को झिझोडता है, लेखकीय प्रतिबद्धता से जोडता है, जीवन- मूल्यों की नई व्याख्या करता है, संघर्ष के रचनात्मक रास्ते की ओर संकेत करता है और सबसे बडी बात यह कि तोडने नहीं, बल्कि जोडने की दृष्टि को जन्म देता है । कुल मिलाकर भावों एवं विचारों का एक अद्भुत सम्मिलन मिलता है- इस बौराए प्रतिबिम्ब में ।
वस्तुतः बौराए प्रतिबिम्ब में दीप्ति ने अनेकानेक बौराए प्रतिबिम्बों को उनकी सारी अच्छाइयों-बुराइयों के साथ प्रस्तुत किया है और इस प्रस्तुति की प्रक्रिया में वे हमें अनेकानेक स्थितियों-परिस्थितियों-चरित्रों-घटनाओं-मानसिक स्थितियों-द्वन्द्वों-अंतर्विरोधों-जडताओं और संघर्षों की यात्राएँ करवाती हैं । इस उपन्यास में कथा-विन्यास, चरित्रों के विविध रूप, उनकी संवेदना-असंवेदना सब इस तरह घुले-मिले हैं कि उन्हें अलग-अलग करके देखना उपन्यास के मूल अंतर्वस्तु से अलग होना होगा । यहाँ परम्परागत चारित्रिक योजना है लेकिन उनका पर्यवसान परम्परागत रूप में नहीं बल्कि नए रूपों में दिखाई देता है -कथा-लेखिका के अपने सिरजे हुए मूल्यों के आधार पर । और इन सारी यात्राओं का निचोड यह है कि दीप्ति नीना जैसे चरित्रों को जिनके भीतर संवेदनशील, मानवीय, आदर्शयुक्त, सौंदर्यबोध-समन्वित, संघर्षशील, सर्जनात्मक इंसान है; जो अपने से भी बात करना चाहता है और अपने आसपास से भी बात करना चाहता है और जो किन्हीं चाही-अनचाही स्थितियों के कारण कहीं गुम हो गया है - उसे ढूँढना चाहती हैं, उसे सामने लाने की चाहत रखती हैं; घुट-घुटकर मर गई इच्छाओं के शवों को बाहर निकालकर उनमें नई इच्छाओं को अँकुरित करना चाहती हैं; किशोरावस्था में जन्मीं प्यार की उत्कट भावना की नई-नवेली कोंपलों को पुनः पुष्पित एवं पल्लवित करना चाहती हैं; नीना जैसी स्त्रियों को नए सिरे से वह सब अर्जित करते देखना चाहती हैं जो कालचक्र के नीचे किन्हीं-न-किन्हीं कारणों से मर्दित हो गए हैं। इसीलिए दीप्ति पूरे उपन्यास में कथा-नायिका के साथ यात्रा करते हुए उसमें नई इच्छाओं को तो जन्म देती ही हैं साथ ही उसकी सर्जनात्मकता को नया आयाम भी देती हैं, उसकी भावनाओं को उसके बनाए तरीके से नया बाना भी पहनाती हैं और उसे टूटकर बिखरने नहीं देती हैं, बल्कि मजबूत हौसलों के साथ, रचनात्मक हौसलों के साथ अपनी अलग, विशिष्ट और अनुकरणीय छवि के साथ खडे होते दिखाती हैं।
वस्तुतः इस उपन्यास में कथा-नायिका नीना - कथा-लेखिका दीप्ति की रचनात्मक सोच के अनुरूप ही - अपने पंखों में जान भरकर खूब उडान भरती है, आसमान छूती है, हवाओं की हमसफर (बनती) है, उनसे बातें करती है, वह यों ही बैठकर आसमान नहीं देखती। (बौराए प्रतिबिम्ब, पृष्ठ 25) वह पिंजरे से बाहर भी आती है और अपने भीतर के पिंजरे को भी बाहर फेंककर अपने जीवन को नए साँचे में ढालने में सफल होती है । इस उपन्यास से ही कुछ पंक्तियों को लेकर कह सकता हूँ कि बौराए प्रतिबिम्ब उपन्यास नारी-संघर्ष की अद्भुत गाथा है जिसमें कथा-लेखिका दीप्ति कुलश्रेष्ठ ने नीना जैसे चरित्र को नए आयामों के साथ प्रस्तुत कर नई जमीन तोडी है और यह भी कि यह उपन्यास नारी-मन की गहन परतों को भी छूने और उकेरने में सफल हुआ है । निस्संदेह यह उपन्यास अनेकानेक नकारात्मक-निषेधात्मक स्थितियों-परिस्थितियों-मनःस्थितियों एवं घटनाओं के बीच भी जिन्दगी को नए साँचे में ढालने की जिद वाले उपन्यास के रूप में सामने आता है।
संदर्भ-
1. बौराए प्रतिबिम्ब (उपन्यास); दीप्ति कुलश्रेष्ठ, रॉयल पब्लिकेशन, जोधपुर, प्र. सं. 2020
2. स्रोत और सेतु ; अज्ञेय, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली , प्र. सं. 19।8
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