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फूलकुँवर बाईसाहब

पूर्णिमा मित्रा
कहने को राजा साहब की तीन रानियाँ और तीन रखेलें थीं, न केवल राजमहल में, बल्कि सत्ता संचालन में भी डंका बजता था, फूलकुँवर बाईसाहब का। क्या मंत्री और संत्री सभी बाई साहब को धोक लगाते थे।
फूली से फूलकुँवर बाईसाहब बनने का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। देश की आजादी के पाँच बरस पहले का किस्सा है। राजा थे,रजवाडे और रियासतें थीं। राजा भी अनेक प्रकार के हुए। दानी, प्रतापी, प्रजापालक, सनकी और अय्याश। यहाँ जिस राजा भानुप्रताप की बात हो रही है वे अय्याश प्रवृत्ति के थे।
घुडसवारी और शिकार के शौकीन राजा साहब मेलों- ठेलों, शिकार पर जहाँ जाते किसी सुंदर लडकी को देखते और खुद ही शिकार हो जाते, तो उसको अगवा कर देते। प्रजा देखती राजमहल में नई रखेल आ गयी।
बुढापे की दहलीज पर खडे राजा साहब एक दिन लाव-लश्कर के साथ घोर जंगल मे शिकार के लिए निकल पडे। दिन भर भाँति - भाँति के जन्तुओं, जीवों का शिकार कर लौट रहा था उनका लश्कर ।
बिखरी हुई झोपडियों का था वह छोटा-सा गाँव। काफिले के घोडों की टापों से धूल उठ रही थी। सूर्य देवता अपनी दैनिक यात्रा के तृतीय चरण में थे। राजा साहब को प्यास लग रही थी। उन्होंने देखा सामने से एक लडकी आ रही है। जिसके माथे पर पानी के दो मटके दोनो हाथों में रस्सी से बँधे दो मुष्टण्डे बैल अनुशासित सिपाहियों की तरह पीछे चल रहे थे ।
हतप्रभ रह गए थे राजा साहब । कैसे संतुलन साध रही है यह लडकी भरे हुए मटकों का बैलों के साथ । ठहर गया था काफिला ।
-ए लडकी कौन है तूं? डर नहीं लग रहा तुझे बैलों से, कहीं भडक गए, तो गिरा देगे तुझे, ये मटके भी फूट जाएँगे?
(पाणी में रेवो न मगोर थकी बिवो।) पानी में रहने वाले, मगर से नहीं डरते हैं। हम वनवासी लोग हैं। किसी से नहीं डरते। आप जिसका शिकार करते हो, उनके बीच में हम रहते हैं।
राजा साहब खुद शिकार हो गए उस वनबाला के। ढलते सूरज की आभा में उस षोडशी का रूप लावण्य द्विगुणित हो रहा था। मेंहँदी रचित हथेलियाँ तथा पीठी (हल्दी चढा बदन) स्पष्ट संकेत कर रहा था। यह लडकी लग्न मण्डप से ज्यादा दूर नहीं है । उसकी मटकी के शुद्ध शीतल जल से राजा साहब ने जब ओक लगाकर पानी, पिया तो थकान उतर गयी।
इस तरह घोडे से उतरकर उसे पानी पीते देखकर, उन्मुक्त हँसी हँस रही थी फूली, तो लगा कोई बनफूल अपने यौवन के साथ खिल रहा है ।
गाँव को पता ही नहीं चला कि कहाँ गयी फूली। उसका मंगेतर उसको खोज -खोज कर अर्धविक्षिप्त-सा हो गया । गाँव वाले भी इस पहेली को समझ नहीं पाए। फूली की माँ ने लडकी का लगनगारा (विवाह) निकट जानकर ही अच्छी तरह से आँगन को लीपा था। रिश्तेदार भी भावी अनहोनी की आशंका से भयग्रस्त हो गए। क्या पता कब नदी में ऊपर तैरती लाश दिख जाए। मंगेतर को डर था फूली का दुस्साहस कहीं उसे ले डूबा हो क्योंकि घने जंगलों में भी लकडी बिनने बेखौफ चली जाती थी। क्या पता कोई बाघ, भेडिया उसे निगल गया हो। काफी दिनों तक वह जंगली रास्तों पर फूली के कंकाल के अवशेष खोजता रहा।
मंगेतर के बापू ने बहुत समझाया था शादी करने के लिए। अब जब फूली का कोई अता-पता नहीं है, तो कैसे पता चले कि मेरी फूली के साथ क्या अनहोनी हुई। उसे धरती खा गयी या आसमान निगल गया।
क्या ये पेड, पशु, नदी फूली के प्रति इतने निर्दयी हो सकते हैं। वह एक वनबाला की तरह विचरण करती थी। नदी में मछली की तरह तैरती थी। पेडों की ऊँची टहनियों पर पक्षियों की तरह फुदकती थी। बिगडैल पशुओं को काबू करती थी ।
कहते - कहते वह रूँआसा हो गया। घोषणा कर दी मुझे कहीं और शादी नहीं करनी है। गुजार दूँगा जीवन उन यादों के सहारे जो अमरबेल की तरह लिपटी हैं मेरे वक्ष के सहारे ।
अनमनी उदास फूली राजमहल के सोने के पिंजरे में बहुत दिनों तक नहीं भुला पायी थी अपने प्रेमी मंगेतन को। राजमहल का गणित कह रहा था यहाँ कोई अतीत नहीं होता है। जो अतीत में खोया रहता है उसका भविष्य बिगड जाता है। महल की चैसर पर क्या रानियाँ, क्या रखैलें, क्या दरबारी, क्या चाटुकार सभी अपने दाँव चलते रहते हैं । कैसे दूसरो को पटखनी देकर सत्ता सुख की अधिकतम भागीदारी प्राप्त की जाए। कैसे भविष्य को सुरक्षित किया जाए।
अनपढ थी फूली पर चतुराई और समझ में किसी से कम नहीं। बहुत जल्द ही वह महलों के रस्मों - रिवाजों और षड्यंत्रों को समझ गयी। राजा साहब के दुर्बल क्षणों का उसने बहुत चतुराई से उपयोग किया।
राजा के मन का कामुक भौंर फूलकुँवरबाई साहब के रूप में उनकी देह गंध में उलझ कर रह गया। बहुत जल्दी ही फूलकुँवर बाईसाहब सत्ता की असली मालकिन हो गई। प्रमुख रानियाँ तथा रखैलें हाशिये पर चली गयी। उनके युवराज भी नाम के युवराज थे।
महल में कदम रखने के बाद जल्दी ही फूलकुँवर बाईसाहब ने एक बेटा जनकर राजा साहब को उपहार में दे दिया। राजा साहब इस खिलौने के मोह में इतने पड गए कि अन्य युवराज महत्त्वहीन हो गए । प्रजा में भी ये खबरें तथा अफवाहें फैल रही थी कि राजा तो दारूडा पीकर मारूडा गाता रहता। (दारू मे डूबे व्यक्ति का अनर्गल प्रलाप) असली सिक्का चल रहा है फूलकुँवर बाईसाहब का।
राजमहल की एक परम्परा थी। जिस दिन राजा के प्राण पखेरू उडते थे रानी पुत्रों में सबसे बडा पुत्र राज गद्दी का हकदार होता था। कहते हैं राजा की आँख बन्द होते ही रखेलों को उनकी संतानों के साथ महल के पिछवाडे के रास्ते से चुपचाप निर्वासित होकर निकल जाना पडता था । मृत राजा के शव पर उनकी परछाई भी वर्जित थी ।
चतुर रखेलें राजा से उपहार में हीरे, जवाहरात, माल मत्ता प्राप्त कर पहले ही सुरक्षित स्थान पर भिजवा देती थी। चतुराई में तो फूलकुँवर बाईसाहब का कोई सानी नहीं था। आजादी के बाद की स्थिति में तो रजवाडे भी नाम के राजा रह जाएँगे। राजपाट चले जाएँगे। तब काम आएँगी अच्छी नौकरियाँ अथवा मौके की जगह पर खडी सम्पत्तियाँ।
कुँवर अभय प्रताप के पाँव तजे जमीन खिसक गयी।
फूल बाईसाहब ने बेटे अभय प्रताप को बोर्डिंग स्कूलों में अच्छी पढाई करने भेज दिया । शहर में तालाब के किनारे वाली जमीन अपने नाम करवा ली। उसी जमीन पर शानदार कोठी बनवा दी गयी । कोठी का नाम रखा गया-रंगविलास। राजा साहब अपने बुढापे के चरम पर थे। देश आजाद हो गया । रजवाडे बरबाद हो गए, राजपाट चले गए ।
सोने के पिंजरे मे बन्द पन्छी को स्वच्छंद उडानों की ज्यादा याद आती है। फूली भी नहीं भूली थी अपना अतीत। नहीं भूली अपना पहला प्रेम और नहीं भूल पायी अपने मंगेतर को ।
उसका मंगेतर भी उसे नहीं भुला पाया। गाँव- गाँव, गली-गली खोजते हुए आखिर एक दिन आ ही पहुँचा राजमहल की चैखट पर। आँखों ही आँखों में दोनों एक साथ डूब गए थे। अतीत में दोनों के बीच मौन व्याप्त था ।
फूली का मन मंथन कर रहा था यदि राजा को पता चला तो इसकी बोटी-बोटी काट कर फेंक देगा। मंगेतर के मन मे भी यह प्रश्न खडा हुआ क्या करूँ? सलामत रहे प्रेमिका का सुखी संसार। उसे याद आया राजा जब जोग लेते हैं भिक्षा माँगने रानी के पास आते हैं। उसने तय किया जीवन की सारी खुशियाँ फूली के कटोरे को समर्पित कर कही जंगलों मे धुनी रमा के बैठ जाए।
एकटक निहार कर वह लौटने को मुडा ही था पीछे से फूली की आवाज आई - ठहरो ।
रूक गया था पथिक ।
तुम कहीं नहीं जाओगे, यही रहोगे माली की तरह बगीचे की सेवा करोगे। फूलों को सजाओगे, सँवारोगे। गुलदस्ते बनाओगे।
पथिक ने पूछा - क्या यह फूलकुँवर बाईसाहब का होकम (आदेश) है।
नहीं, यह फूली का अनुरोध है।
फूलकुँवर बाई साहब के महल में नया माली हीरा आ गया था जिसका पुराना नाम फूली के अलावा कोई नहीं जानता था ।
बिना किसी प्रतिदान की अपेक्षा के ताउम्र हीरा माली ने बाई साहब के बाग बगीचों को खूब सँवारा। हीरा के गुलदस्ते राजा साहब की टेबलों पर सजते थे। उनकी अचकन का खूबसूरत फूल हीरा ही भेंट करता था। फूलकुँवर बाईसाहब के गजरों में हीरा के दिए फूलों की महक हुआ करती थी। रोते हुए कुँवर अभय को फूल की तरह हँसाया करता था हीरा माली ।
राजपाट तो चले ही गए, राजा साहब को मरे भी बरसों बीत गए। कुँवर अभयप्रताप भी पढ-लिख कर कलेक्टर बन गए । मातृभक्त थे माँ को बडा मान देते थे।
कोठी में माँ के अलावा कोई नहीं बचा। ले देकर बूढा माली हीरा था उसने भी असाध्य रोग से ग्रस्त होकर खाट पकड ली थी ।
कलेक्टर अभय चाहते थे कोठी को रिसोर्ट के रूप में चलाने के लिए वार्षिक किराये पर दे दिया जाए। माँ उनके साथ चले। माँ भी सहमत थी, पर चाहती थी हीरा माली को भी साथ ले जाए किसी अच्छे अस्पताल में उसका इलाज करवाया जाए।
माता होकम हम लोग राजपरिवार से हैं । इस तरह हालियों (हलवाएँ), मालियों को सब जगह साथ लेकर तो नही चला सकते।
फूलकुँवर बाई साहब - हीरा माली तुम्हारा असली पिता है, मुझे जब महलों मे लाया गया, तो मेरे पेट मे एक माह का गर्भ था ।
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