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शीन काफ निज़ाम की कविताएँ

शीन काफ निज़ाम
(1)


शाम से कौन मेरे ध्यान में है


रोशनी हर तरफ मकान में है





किस कदर शोर आस्मान में है


एक परिंदा अभी उडान में है





हो रहा है यकीन मुझको भी


ये मिरा वहम ही गुमान में है





घूमता है जिमीन-सा लेकिन


आशियाना तो आस्मान में है





अक्स है किस का आबशारों में


कोई बैठा हुआ चटान में है





कोई आया नहीं तो जाये कौन


क्या जिमाना ही अब मकान में है





कौन सुनता है कहने वाले की


सब की दिलचस्पी दास्तान में है





आईना तो अनाफरोश निजिाम


हुस्न गर है तो एक आन में है





(2)





जगना, चलना, सोना है


रोजि तमाशा होना है





सब को बोझा ढोना है


सब को थक कर सोना है





एक खजिाना ख्वाबों का


थोडा-थोडा खोना है





दुनिया ने तुझ से सीखा


किसका कितना होना है





फुरकत का इतना मतलब


आधा-आधा होना है





औरों पर हँसना भी तो


अपना रोना रोना है


(3)





वो जो तेरा नाम लिया करते थे


रस्ते ही को राहनुमा करते थे





दुश्मन तक के हक में दुआ करते थे


कैसे-कैसे लोग हुआ करते थे





मन की बातें जान लिया करते थे


बिन बोले ही बात किया करते थे





करते थे बातें आँखों आँखों में


दीवारों के कान हुआ करते थे





ख्वाबों जैसी खामोशी थी बस्ती में


बस सन्नाटे शोर किया करते थे





समझाये कैसे दादी पोते को


बस्ती-बस्ती पेड हुआ करते थे





शब की शाखों पर नींदें लगती थीं


और फिर उनमें ख्वाब खिला करते थे





किस्सों के मिस वो अक्सर रातों को


पीछे मुड कर देख लिया करते थे





सम्पर्क - कल्लों की गली, कबूतरों का चौक, जोधपुर-३४२००१