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जाबिर हुसेन की कविताएँ

जाबिर हुसेन
तुम ही कहो

तुमने सोचा, कभी

क्यों थम गए हैं

इन गुफाओं की

दहलीज पर आकर

तुम्हारे पाँव



इस कदर एकाग्रचित्त

ध्यानमग्न होकर

इन आदिम खण्डहरों के बीच

कहीं तुम वो बुनियादें तो

नहीं ढूँढ रहे, जो

हजारों बरस पहले, खुद तुमने

इतिहास की रेतीली धरती पर

अपने कठोर तप से उगाई थीं



याद है ना!

इन बुनियादों को कभी

तुमने अपनी धर्म-संरचना में

नीति की संज्ञा दी थी, और

सत्ता की मूल चेतना कहा था



इन बुनियादों के दीर्घ जीवन

के लिए तुमने, गली गली

घर घर, गुप्तचरों की

टुकडियाँ तैनात की थीं

विष-कन्याओं की

सेवाएँ ली थीं

तुमने केवल

अपने शिष्यों को नहीं

संपूर्ण धरा को

अर्थ की नीति, और

नीति के अर्थ

का दर्शन समझाया था



तुमने अपने शत्रुओं, और

उन तमाम लोगों को

जो तुमसे सहमत नहीं थे

मौत की नींद सुला दिया था

लेकिन, इतिहास ने कभी तुम्हें

अपनी जीत का

जश्न मनाते नहीं देखा

न कभी तुम्हें दुश्मनों की हार

पर अट्टहास करते सुना



इन गुफाओं की तंग, और

तारीक दुनिया में रहकर

तुमने, नहीं मालूम, अपने तप की

कितनी सदियाँ बिताईं

कितनी लडाइयों का नेतृत्व किया

कितनी सत्ताएँ गिराईं

कितनी विजय-आकांक्षाओं को

धूल चटाया



तुम ही कहो

इन गुफाओं की

दहलीज पर आकर, आज

थम क्यों गए हैं

तुम्हारे पाँव

तुम्हारी भुजाओं का वो बल

तुम्हारी शिखा का वो तेज

कहाँ खो गया है

तुम ही कहो

आचार्य !



मेरी पतवार



कहीं देखी है तुमने

आँसुओं की

झील में बहती

शिकस्ता नाव मेरी



मैं कब से ढूँढता हूँ

अपने हाथों में लिए

पतवार अपनी

न जाने किस दिशा में

चल रही है, नाव मेरी



हवाएँ तेज हैं

कुहरा घना है

तुम्हारी झील का

पानी भी अब

आहिस्ता-आहिस्ता

किसी के खौफ से

जमने लगा है





किधर जाएगी मेरी नाव

बर्फीली सिलों के

ताप से होकर

मेरी पतवार है

हाथों में मेरे

कहाँ ढूँढूँ, तुम्हारी झील में खोई

शिकस्ता नाव अपनी



तुम्हें शायद पता हो

नाव मेरी

किस दिशा में

बह रही है



हवाएँ तेज हैं

कुहरा घना है

मेरी पतवार मुझसे

पूछती है

मैं किधर जाऊँ

कहाँ जाऊ!



247 एम आई जी, लोहियानगर

पटना - 800020

मो - 09431602575

jabirhusain@yahoo.com