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विनोद पदरज की कविताएँ

विनोद पदरज
फोटोग्राफर
याद नहीं कि कोई युवा भी था उनमें
सब अधेड थे
और नौ दस के आसपास रामनिवास बाग में आ जाते थे
अपने तिपाये स्टैण्ड पर कैमरा टिकाते थे
फिर बैठे रहते थे इधर-उधर बीडियाँ पीते हुए

गाँवों से शहर पढने आए
गरीब लडकों के फोटोग्राफर थे वे
दो रूपये में चार फोटो निकाल देते थे तुरन्त

गरब, गुमान, अदा, मुस्कान
अच्छा दिखने की ललक से रहित
सीधी सच्ची श्वेत श्याम फोटो
हल्की-सी पहचान में आती हुई

जो फार्मों पर प्रवेश पत्रों पर परिचय पत्रों पर
सिटी बसों के पास में चिपकाने के काम आती थीं

वे हमें सामने पडी स्टूल पर बिठाते थे
हाथ से गर्दन सीधी करते हुए
फिर कैमरे को काला कपडा ओढाते हुए
कैमरे के पीछे से हमें देखते थे
काले कपडे में अपना मुँह घुसाए
एक बार फिर गर्दन सीधी करते थे
और रेडी बोलते थे
एक क्षण को कैमरे की आँख का
ढक्कन हटाकर पुन लगा देते थे

उनके पास सिल्वर की एक ट्रे थी
जिसमें पानी भरा होता था
डेवलप फोटो उसमें डाल देते थे
और चेहरा उभर आने पर
एक्सरे की तरह सुखाते थे

एक कैंची की भी याद है
जिससे फोटो काटते थे और
छोटे-से लिफाफे में रखकर
फोटो और निगेटिव थमा देते थे
कहते हुए
कि निगेटिव सँभाल के रखना
बाद में कभी जरूरत पडे

आज उधर से गुजरते हुए
सैंकडों पर्यटक दिखाई पडते हैं
मोबाइलों से फोटो खींचते हुए सेल्फियाँ लेते हुए
तो वे फोटोग्राफर याद आते हैं
जिनकी सूरतों के धुँधले से निगेटिव
अब भी हमारे जेहन में हैं




बारिशें

मैं पेड पौधों को प्यार करता हूँ
उन्हें सँभालता हूँ
दूर-दूर से पानी लाकर सींचता हूँ
निराई गुडाई करता हूँ समय पर
खाद देता हूँ

वे जीवित रहते हैं हरे भी
पर प्रफुल्ल नहीं

प्रफुल्ल वे बारिशें आने पर होते हैं

ऊपर से बरसता है धारासार
उनके भीतर से रंगत फूटती है

लगता है वे हँस रहे हैं मुस्कुरा रहे हैं
तालियाँ बजा रहे हैं, किलक रहे हैं,
छलक रहे हैं, झूम रहे हैं, गा रहे हैं,
भीग रहे हैं बाहर भीतर

उनके चेहरे चमकते हैं आँखें चमकती हैं
देह कांतिमय हो जाती है
स्नेहिल कोमल तृप्त विभोर

सब कुछ एकाकार हो जाता है

बारिशें केवल जल नहीं हैं
उस्ताद


साठ वर्षीय उस्ताद मुड्डी पर बैठे हैं
एक चीकट कपडे से हाथ पौंछते हुए

प्रशिक्षु मिस्त्री सर्विस कर रहा है मोटर साईकिल की

उस्ताद के सिखाये अनुसार
गाडी धुलवा के लाया है सीट कवर उतारकर
अब ऑयल चेंज कर रहा है
फिर पहिये खोल कर ऑयलिंग ग्रीसिंग करेगा
कार्बोरेटर चेक करेगा
फिल्टर बदलेगा
आगे पीछे की लाइटें देखेगा
तब उस्ताद कहेंगे -एक चक्कर काट के आ फिर बता

सब ठीक है उस्ताद

तब उस्ताद उठेंगे गाडी स्टार्ट करेंगे
एक चक्कर काट कर आएँगे
फिर कहेंगे-
एक दूँगा मिला के कनपटी के नीचे
स्टार्ट कर और देख ट्यूनिंग सही
नहीं है
और ब्रेक शू बदल ग्राहक को बोल ड्रम बदलेंगे
वे खुद ही लेके आयें कंपनी से
और हवा कम करवा आगे के पहिये की
और बायाँ इंडिकेटर देख
किसी को भी गाडी ऐसे ही मत पकडा देना
सारे शहर में नाम है अपना


मिस्त्री वो जो नाडी बैद की तरह हाथ
लगाते ही बता दे कि क्या खराबी है
ग्राहक को धोखा नहीं देना
साफ बोल देना कि बाबूजी गाडी बदल लो
पैसा मत लगाओ इसमें
और सर्विस के बाद गाडी स्टार्ट हो तो
कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारे लाल का
म्यूजिक फेल होना चाहिए

पैसा तो भडवे और दलाल भी कमाते हैं
पर इ*जत और ईमान बडी चीज है
कह कर उस्ताद वापस मुढी पर बैठ जाते हैं

प्रशिक्षु मिस्त्री खुशी-खुशी काम में जुट जाता है




छाया

छाया क्या है

जितनी धूप हम अपने वक्ष पर
पीठ पर कन्धों पर झेलते हैं
उतनी छाया हम देते हैं

वनस्पतियों के संदर्भ में
यह आकार-प्रकार से तय होती है

पौधे कम छाया देते हैं

मध्यम पेड थोडी *यादा छाया देते हैं

जंगी पेडों की छाया के घेरे में
एक बस्ती बसी होती है
प्याऊ, चाय की थडी, बेचें,
मोची,नाई की टेबल-कुर्सी
राहगीर, मजूर, गायें

जबकि मनुष्यों के संदर्भ में मामला भिन्न है

सभी मनुष्य आकार-प्रकार में लगभग समान होते हैं
फिर भी छाया भिन्न-भिन्न होती है

कुछ मनुष्यों को देखकर जंगी पेड याद आते हैं


सम्पर्क - 3/137, हाऊसिंग बोर्ड कॉलोनी,
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